Tuesday, May 10, 2022

पुस्तक समीक्षा | पवित्र प्रेम का सुंदर आख्यान है उपन्यास ‘‘काबेरी के खंडहर’’ | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह


प्रस्तुत है आज 10.05.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई आर. के. तिवारी के उपन्यास "काबेरी के खंडहर" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
पवित्र प्रेम का सुंदर आख्यान है उपन्यास ‘‘काबेरी के खंडहर’’
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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उपन्यास  - काबेरी के खंडहर
लेखक    - आर. के. तिवारी
प्रकाशक  - एन डी पब्लिकेशन 10 सिविल लाइन एलआईसी बिल्डिंग सागर
मूल्य     - 150 /-
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प्रेम हरी को रूप है, त्यौं हरि प्रेम स्वरूप।
एक होइ द्वै यो लसै, ज्यौं  सूरज  अरु धूप।।
- रसखान का यह दोहा प्रेम के स्वरूप की समुचित व्याख्या करता है। वस्तुतः प्रेम एक ऐसा समवेत है जो हर आयु वर्ग के व्यक्ति को प्रभावित करता है चाहे व्यक्ति स्वयं प्रेम में प्रवृत्त हो अथवा ना हो किंतु प्रेम की चर्चा उसे सदा सुहाती है। महात्मा गांधी कहते थे कि ‘‘जहां प्रेम है, वहां जीवन है।’’
सागर के संवेदनशील लेखक आर के तिवारी का नया उपन्यास ‘‘कावेरी के खंडहर’’ एक प्रेम कथा है। यह प्रेम कथा उस काल की है जब नवाब और तवायफ एक हुआ करती थीं। बेमेल संबंधों के बीच कभी-कभी पवित्र प्रेम कि कोंपलें भी फूट पड़ती थीं। ऐसे ही एक पवित्र प्रेम का सुंदर आख्यान है ‘‘काबेरी के खंडहर’’। शरतचन्द्र चटर्जी मानते थे कि ‘‘प्रेम की पवित्रता का इतिहास ही मनुष्य की सभ्यता का इतिहास है, उसका जीवन है।’’

हमारे देश का मुगलकालीन इतिहास नवाबों की विलासिता के किस्सों से भरा पड़ा है। नवाब वाजिद अली शाह क ही ले लीजिए, वाजिद अली शाह का नाम आते ही उनसे जुड़ी तीनों बातें दिमाग में कौन सी जाती हैं उनका नवाब होना, उनका संगीत प्रेम और उनकी मोहब्बतों की दास्तान। उनकी 300 बेगम थीं और अनेक तवायफें उनके संरक्षण में नृत्य संगीत की महफिलें सजाती रहीं। तवायफों के बारे में एक दिलचस्प बात यह भी है कि उस दौर में लोग अपने किशोरवय के बेटों को तवायफों के पास तहजीब सीखने के लिए भेजा करते थे। तब आए थे रेड लाइट एरिया में खड़ी होने वाली कॉल गर्ल के समान नहीं होती थीं बल्कि उनका अपना एक अलग मुकाम होता था। समाज में उनकी पूर्ण प्रतिष्ठा भले ही नहीं थी किंतु उन्हें पूरी तरह हिकारत से भी नहीं देखा जाता था। कई तवायफें महफिलें सजाती थीं, उसमें शास्त्रीय नृत्य एवं संगीत का प्रदर्शन करती थीं। ठुमरी, दादरा के सुर छेड़ती थीं। कई तवायफें ऐसी थीं जिनके दैहिक संबंध सिर्फ अपने संरक्षक के साथ ही रहते थे, वेद जिस्मफरोशी नहीं करती थीं। ष् काबेरी के खंडहरष् ऐसी ही एक निष्ठावान तवायफ की मर्मस्पर्शी कथा है। वस्तुतः यह एक लघु उपन्यास है। उपन्यास के आरंभिक पन्नों में लेखक द्वारा लिखित गए ‘‘चंद शब्द’’ रूपी भूमिका के बाद आलोचक डॉ लक्ष्मी पांडे द्वारा इस उपन्यास की विस्तृत समीक्षा दी गई है जिसे पढ़कर उपन्यास पढ़ने के पूर्व ही काफी-कुछ खाका पाठक के सामने आ जाता है और  उपन्यास के प्रति जिज्ञासा बढ़ जाती है। जहां से उपन्यास का कथानक आरंभ होता है वहां उपन्यास का नाम लिखते हुए लेखक ने कोष्टक में ‘‘काल्पनिक’’ लिख दिया है। यह लेखक के द्वारा उपन्यास के कथानक के प्रति एक डिस्क्लेमर है।
        उपन्यास का कथानक उत्तर प्रदेश के हमीरपुर के निकट स्थित काबेरी के खंडहरों से आरंभ होता है यह स्थान सुल्तानगंज से महत्त्व 5-6 मील दूर है। एक खंडहर जो अपने अतीत की खूबसूरत कहानी समेटे हुए हैं जिसमें ढेरों चहल-पहल है, प्रेम है, वैमनस्य है, मातृत्व है और राग रंग है। लेखक ने काबेरी के खंडहरों का परिचय देते हुए लिखा है-‘‘यह हवेली जिसे आज कावेरी के खंडहरों के नाम से जाना जाता है कभी नवाब साहब की शिकारगाह हुआ करती थी जिसे नवाब साहब ने कावेरी नाम की एक नाचने वाली को दे दिया था और फिर इस महल में रौनक आ गई थी। वह शिकारगाह जहां महीनों कोई नहीं जाता था पर कावेरी के आते ही वह महल जैसा सज गया। कहते हैं कि इस महल को नवाब साहब ने दुल्हन की तरह सजाया था फिर तो इस महल में कावेरी के घुंघरू की खनक सुनाई देने लगी। उसकी सुरीली आवाज में गाए गाने पूरे क्षेत्र में गूंजने लगे। तबला, सारंगी के सुर सुनाई देने लगे। जिन्हें सुनने के लिए इस सुनसान जगह में लोग बाग आने लगे। क्योंकि अंदर तो कोई जा नहीं सकता था इसलिए महल के बाहर से ही महल के अंदर हो रहे जश्न का आनंद कानों से लेकर आनंदित होने लगे।’’
यह परिदृश्य उस समय का है जब उत्तर भारत में नवाबों की परंपरा कायम थी। नवाब तवायफों पर अपनी जागीरें लुटा दिया करते थे। इस उपन्यास में मुख्य पात्र नवाब साहब और नर्तकी काबेरी बाई हैं। इन्हीं के समानांतर कुछ और प्रमुख पात्र हैं जो कथानक को विस्तार देते हैं तथा अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति बनाए रखते हैं। इनमें लखनऊ की नर्तकी जीतन बाई जोकि काबेरी की मां है, नवाब साहब की पत्नी सुरैया बेगम और उनकी चचेरी बहन नूरी बेगम जो नवाब साहब के छोटे भाई छोटे मियां की पत्नी हैं, छोटे मियां जो नवाब साहब के छोटे भाई हैं। यह सभी पात्र इस उपन्यास के ताने-बाने को बड़ी कुशलता से थामें रखते हैं। सुरैया और नूरी में जेठानी देवरानी का रिश्ता होते हुए भी परस्पर गजब का बहनापा देखा जा सकता है जो नवाब साहब के खानदान की गरिमा को बचाए रखने में अपना पूरा योगदान देता है।
उपन्यास में दो प्रकार के चरित्र प्रभावित करते हैं। एक चरित्र तो वह जो नवाब से अगाध प्रेम करता है किंतु उसे नवाब के साथ जीवन बिताने की सामाजिक अनुमति नहीं है अर्थात कावेरी रूपी स्त्री चरित्र। दूसरा स्त्री चरित्र है सुरैया का जो नवाब की पत्नी जिसे नवाब के साथ जीवन बिताने की सामाजिक अनुभूति प्राप्त है किंतु उसे नवाब के साथ समय व्यतीत करने के लिए भी कई कई दिनों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। तो विपरीत ध्रुवीय स्थितियों को जीने वाली दो स्त्रियां। नवाब के छोटे भाई छोटे मियां इन दोनों स्त्रियों के बीच अपनी पत्नी नूरी के माध्यम से सामंजस्य बैठाने का प्रयास करते हैं। नूरी सुरैया को समझाती है कि ‘‘यदि कावेरी चाहती तो नवाब साहब बस शादी के लिए दबाव बना सकती थी। पर नहीं उसे आपकी चिंता भी थी। वह आपका सम्मान करती थी। वह आपको दुखी नहीं करना चाहती थी। उसे आपकी सौत नहीं बनना था। बस उसे नवाब साहब से सच्ची और पाक मोहब्बत थी जिसमें खुदा की रजामंदी भी रही होगी वरना ऐसे मामले बीच में ही खत्म हो जाते हैं। ऐसे किस्से, किस्से बनकर रह जाते हैं।’’
  भले ही काबेरी सुरैया की सौत नहीं थी, लेकिन सौत के सामान थी। अपनी सोच की प्रशंसा सुनना और उसके पक्ष को स्वीकार करना एक स्त्री के लिए बहुत बड़ी दुविधा की स्थिति होती है। इस अंतर्द्वंद्व को लेखक ने बड़े ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। ऐसे स्थान पर लेखक का भाषाई कौशल बड़ी सुंदरता से उभर कर सामने आया है- ‘‘नूरी की बातें सुरैया के पूरे जिस्म में हजारों सुइयों की भांति चुभती रही और वह सुनती रही।’’
   सुरैया एक ऐसा पात्र है जो कावेरी के सापेक्ष द्वितीय स्थान पर है किंतु अत्यंत प्रभावी है। यह पात्र विषाक्त हो सकता था किंतु लेखक ने उसे अपने लेखक व कौशल से अमृतमय बना दिया। यह एक प्रेम कहानी के संदर्भ में बड़ा चुनौती भरा दायित्व था जिसे लेखक ने पूरी गंभीरता से निभाया है। कावेरी और नवाब साहब के मध्य वैवाहिक संबंध भले ही नहीं था किंतु उनके प्रेम संबंध के फलस्वरूप उन दोनों की नरगिस के रूप में एक बेटी इस दुनिया में जन्म लेती है। कावेरी और नवाब साहब के बाद नरगिस का जीवन अंधकार में हो जाता। हो सकता है कि नरगिस को भी अपनी मां कावेरी के समान किसी नवाब के संरक्षण में जीवन जीना पड़ता। समाज की दृष्टि में एक कलंकित जीवन। किंतु सुरैया नरगिस को अपनाकर एक विशिष्ट चरित्र स्थापित करती है तथा कथानक को एक सुखद मोड़ दे देती है।
     इस उपन्यास आद्योपांत रोचकता बनाए रखने वाला प्रवाह है। लेखक ने पात्रों और उनके चरित्र को करते हुए जहां एक और भावना प्रधान तत्वों को साधा है, वहीं दूसरी ओर कथानक में कसाव बनाए रखा है। लगभग 54 पृष्ठ का लघु उपन्यास होते हुए भी यह एक दीर्घ उपन्यास का आनंद देने में सक्षम है। किसी विशेष विमर्श के खांचे में न रखते हुए इसे एक विशुद्ध प्रेम कथा पर आधारित उपन्यास कहां जा सकता है, जिसमें प्रेम के विविध रंग देखे जा सकते हैं। यह उपन्यास अपने आप में एक बैठक में ही पढ़ लिए जाने का आग्रह करता है। इसमें वे सारे तत्व हैं जो पाठक को कथानक से बांधे रखते हैं और उपन्यास पढ़े जाने के बाद देर तक इसके पात्र पाठक के मन मस्तिष्क पर छाए रहते हैं। उपन्यास के अंतिम पृष्ठों पर लेखक आरके तिवारी ने अपने कहानी संग्रह ‘‘कुमुद पंचरवाली’’ पर 6 समीक्षाएं प्रस्तुत की हैं। आर के तिवारी इसके पूर्व एक और लघु उपन्यास लिख चुके हैं। वह भी नारी प्रधान है और  जिसका नाम है ‘‘करमजली’’। उनका यह दूसरा लघु उपन्यास ‘‘काबेरी के खंडहर’’ रोचक है, पठनीय है और लगभग संवेदनहीन हो चले वर्तमान कठोर वातावरण  में प्रेम के कोमल संवेग का स्मरण कराता है।             
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