Wednesday, June 22, 2022

चर्चा प्लस | राजनीतिक चश्मा उतार कर देखिए "अग्निपथ" | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
राजनीतिक चश्मा उतार कर देखिए "अग्निपथ" 
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह   

                                                             भारतीय युवाओं की स्थिति वस्तुतः चिंताजनक दशाओं से गुज़र रही है। बेरोज़गारी उन पर सबसे अधिक प्रभावी है। जो पढ़े-लिखे युवा हैं वे बेरोज़गारी की स्थिति में दिग्भ्रमित हो रहे हैं। वहीं कम पढ़े-लिखे अथवा अपढ़ युवा बड़ी आसानी से अपराध की दुनिया का रास्ता पकड़ रहे हैं। इसके साथ ही एक पक्ष और है, वह है सामाजिक अपराध और उद्दण्डता का। आज अवयस्क युवा भी वयस्कों वाले अपराध करने से नहीं हिचक रहा है। ऐसे में यदि कुछ पैसों के साथ युवाओं को जीने का सलीका (डिसिप्लिन) दिया जाने वाला हो तो इसमें क्या बुरा है इसमें? यूं भी जब अग्निपथ योजना ऐच्छिक आधार पर है तो इतना हलाकान होने की ज़रूरत भी नहीं है। जब हम अपने युवाओं को मल्टीनेशनल कंपनीज़ के अनिश्चित पैकेज़ में भेजने में नहीं झिझकते हैं तो ‘‘अग्निपथ’’ योजना में युवाओं को जाने देने में हिचक क्यों?


जब से अग्निपथ योजना की घोषणा की गई तब से देश के अनेक शहरों में विरोध का दावानल फैलने लगा। कई शहरों में पचासों वाहन फूंक दिए गए। अपने ही शहर के अपने ही लोगों की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। ऐसा विरोध उस समय क्यों नहीं किया गया जब किसी युवती अथवा नाबालिग बच्ची के साथ नृशंसता से दुव्र्यवहार किया गया? क्योंकि हर सरकारी नीति का विरोध करने की राजनीति प्रभावी हो चली है। जो बात विरोध करने योग्य हो उसका विरोध बेशक़ किया जाना चाहिए लेकिन आंख मूंद कर हर बात का विरोध करना भी तो उचित नहीं कहा जा सकता है। निश्चित रूप से अग्निपथ योजना में एक भ्रम की स्थिति है कि इसे रोजगार योजना के शीर्षक के अंतर्गत रखा गया है। जबकि यह न तो अनिवार्य सैनिक शिक्षा स्कीम में है और न समुचित रोजगार योजना के अंतर्गत है। इसलिए कतिपय तत्वों के लिए यह भावना भड़काना आसान हो गया कि ट्रेनिंग के बाद जब ये युवक सेवा मुक्त होंगे तब क्या करेंगे? क्या इनमें से सभी को नौकरी की गारंटी मिलेगी अथवा वे एक बार फिर बेरोजगारी की पंक्ति में जा खड़े होंगे? इस भ्रमपूर्ण स्थिति का लाभ उठा कर ही आग लगवाने वाले आग लगवा रहे हैं और अराजक माहौल बना रहे हैं।

अग्निपथ योजना में युवाओं को अल्पावधि रोजगार के अवसर दिए जाने का दूसरा पक्ष देखना भी जरूरी है, जिसे युवाओं की दशा-दिशा के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। एक ओर बेरोजगारी और दूसरी ओर भौतिकता की चकाचैंध। हर युवा चाहे वह पढ़ा-लिखा हो या कम पढ़ा-लिखा या फिर अपढ़ हो, भारी मानसिक दबाव में जीने को विवश है। माता-पिता चाहते हैं कि उनकी संतान परिवार का आर्थिक संबल बने। जो युवा पैसे कमाने का रास्ता हासिल नहीं कर पाते हैं वे उस दोराहे पर जा खड़े होते है जहां एक ओर अपने अस्तित्व को मिटाने का रास्ता दिखाई देता है तो दूसरी ओर गलत काम कर के पैसा कमाने का का रास्ता दिखाई देता है। बहुत कम परिवार ऐसे हैं जहां बेरोजगार युवाओं की अवहेलना नहीं की जाती है। आमतौर पर तुलना कर-कर के कटाक्ष किए जाते हैं कि ‘‘फलां के लड़के को देखो, उसे पांच अंको का पैकेज मिल गया है और एक हमारा बेटा है जो पांच रुपए का काम भी हासिल नहीं कर सका।’’ यह ताने किसी घातक बाण की तरह युवाओं के दिल में चुभते हैं और वे गलत रास्ते पर कदम बढ़ाने को विवश हो जाते हैं। यही स्थिति लड़कियों की है। पहले विवाह के लिए सुंदर, सुशिक्षत, घरेलू कामों में दक्ष की शर्त होती थी अब नौकरीपेशा होने की भी शर्त रहती है। अच्छी नौकरी है तो अच्छा वर मिल जाएगा और नौकरी नहीं है तो वर मिलना टेढ़ी खीर रहता है। इस वातावरण में लड़कियों के सामने भी लड़कों की भांति ही दो ही रास्ते बचते हैं- या तो आत्महत्या (पहले नहीं तो विवाह के बाद) या फिर गलत रास्ते पर चल पड़ना।

एक समस्या और है कि न्यूक्लियर परिवार के चलन ने बच्चों में उद्दंडता भी बढ़ा दी है। माता-पिता दोनों पैसे कमाने में व्यस्त रहते हैं। बच्चों का उनसे पैसे और सुख-सुविधाओं तक का ही वास्ता रहता है। वे ‘‘आदर’’ की भावना को भूलते जा रहे हैं जो एक पीढ़ी पहले तक संयुक्त परिवार से उन्हें विरासत में मिलती थी। आजकल के बच्चे मुंहफट हो कर पलटजवाब देते हैं और अनाड़ी माता-पिता भी खिसियाकर रह जाने के अलावा और कुछ नहीं कर पाते हैं। उस पर इंटरनेट और मोबाईल की सुविधा ने आग में घी डालने का काम कर रखा है। माता-पिता की व्यस्तता का लाभ उठाते हुए युवा इन दोनों सुविधाओं का जम कर दुरुपयोग करते हैं। कुछ को गेमिंग की लत लग जाती है तो कुछ को वयस्कों की साईट्स पर जाने की। कच्ची मानसिकता वाली आयु में इन सब में प्रवृत्त हो कर वे देशप्रेम तो दूर की बात, माता-पिता के प्रति आदर और प्रेम भी भूल जाते हैं। यही अवयस्क जब वयस्कता की सीढ़ियां चढ़ते हैं तो उनका विदेश प्रेम, अपराध प्रेम और भौतिक सुविधाओं के प्रति प्रेम सिर चढ़ कर बोलने लगता है। ऐसे में उन्हें डिसिप्लिन सिखाए जाने की सख़्त जरूरत रहती है जो वे अपने घर-परिवार से नहीं सीख सकते हैं।

आज हमारे देश के औसतन युवाओं को एक बार फिर यह सीखने की जरूरत है कि यदि कोई व्यक्ति आपकी आंखों के सामने किसी संकट में फंसा हुआ हो तो उसकी मोबाईल-वीडियो बनाने के बजाए मदद करने की जरूरत होती है। ऐसी अनेक शर्मनाक घटनाएं आए दिन हमें वायरल होती हुई मिलती हैं जिनमें किसी दुर्घटनाग्रस्त की मदद करने के बजाए उसकी पीड़ा की वीडियो बना कर इंटरनेट पर डाल दी जाती है। या फिर किसी स्त्री या पुरुष को किसी समूह द्वारा नृशंसतापूर्वक मारापीटा जा रहा हो तो उसे बचाने के बजाए तब तक उसकी वीडियो बनाई जाती है जब तक वह पीड़ित मर न जाए। इस कुत्सित मनोवृत्ति पर तभी काबू पाया जाता सकता है जब युवा ऊर्जा को सही रास्ते पर चलाया जाए। 
युवाओं में देशप्रेम ओर डिसिप्लिन की भावना को सुदृढ़ करने के लिए अनेक देशों में अनिवार्य सैनिक शिक्षा योजना लागू है। प्रथम विश्व युद्ध के समय 1914 में यूरोप में अनिवार्य सैन्य सेवा शुरू हुई थी और आज भी कई देशों में जारी है। कम्युनिस्ट शासन वाले देशों में तो शस्त्र संचालन का प्रशिक्षण हर एक को लेना ही पड़ता है। मेक्सिको, रूस, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, थाइलैंड, तुर्की और संयुक्त अरब गणराज्य तक में अल्पकालीन सैन्यसेवा अनिवार्य है। इस्राइल में ढाई वर्ष की यह अनिवार्य सैनिक सेवा पुरुषों के लिए है और दो वर्ष की सेवा स्त्रियों के लिए। इस दौरान उन्हें सारे शस्त्रों के संचालन की शिक्षा दी जाती है। बरमूडा के नागरिकों के लिए भी अनिवार्य सैनिक सेवा का नियम है। 18 से 32 वर्ष की उम्र के लोगों को यह ट्रेनिंग मिलती है। चयन लाॅटरी से होता है। बरमूडा में यह सेवा 32 महीने की है। ब्राजील में तो 18 साल पूरे होते ही युवाओं को एक वर्ष की सैनिक शिक्षा दी जाती है। स्वास्थ्यगत आधार पर छूट मिलती है या फिर विश्वविद्यालयी शिक्षा लेने वालों को। लेकिन जैसे ही वह युवक शिक्षा पूरी कर लेता है, सैन्य प्रशिक्षण उसे लेना ही पड़ता है। साइप्रस में यह सेवा 2008 से लागू की गई और हर युवा के लिए अनिवार्य है। ग्रीस में 19 से 45 वर्ष की उम्र वालों को अल्पकालिक सैनिक सेवा में जाना आवश्यक है। ईरान में दो साल का प्रशिक्षण मिलता है। उत्तरी कोरिया में यह ट्रेनिंग 14 से 17 की उम्र के बीच शुरू होती है और युवा को 30 वर्ष की उम्र तक सैन्य प्रशिक्षण लेना पड़ता है। साउथ कोरिया में यह उम्र 18 से 28 है। मेक्सिको में 12वीं पास करने के बाद सैन्य ट्रेनिंग दी जाती है। सिंगापुर में तो राष्ट्रीय सेवा (एनएस) की ट्रेनिंग न लेने वालों को 10 हजार डॉलर का जुर्माना देना पड़ता है अथवा तीन साल की जेल। स्विट्जरलैंड में अनिवार्य सैन्य सेवा लागू है। सभी सेहतमंद पुरुषों को वयस्क होते ही मिलिट्री में शामिल होना होता है। महिलाएं खुद चाहें तो सेना में शामिल हो सकती हैं। यह लगभग 21 सप्ताह की होती है। थाईलैंड में अनिवार्य सैन्य सेवा 1905 से लागू है। सभी थाईलैंड निवासियों (पुरुष) को सेना में भर्ती होना जरूरी है। पुरुषों को 21 साल की उम्र में पहुंचते ही सेना में भर्ती होना होता है।

यहां हमारे देश में भारतीय सेना में भर्ती के लिए नई योजना ‘‘अग्निपथ’’ स्कीम का जमकर विरोध हो रहा है लेकिन विरोध करने वालों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि हमारे देश में अभी अनिवार्य सैनिक शिक्षा लागू नहीं की गई। जोकि दुनिया में बढ़ते हुए आतंकवाद और विभिन्न देशों के बीच बढ़ती कलह को देखते हुए जरूरी मानी जा सकती है। दूसरी बात यह भी ध्यान देने योग्य है कि जो युवा फिलहाल बेरोजगारी से जूझते हुए मानसिक दबाव और अराजकता में जी रहे हैं उन्हें सही दिशा मिलेगी। इससे उनका आत्मबल बढ़ेगा साथ ही वे कुछ पैसे भी कमा सकेंगे जिससे वे बाद में खुद का स्टार्टप शुरू कर सकते हैं। सरकार की हर योजना में व्यावसायिक सौदेबाजी की तरह खोट निकलना और उसे रद्द करने को मजबूर करना भी उचित नहीं है। जब बात देशभक्ति, युवाओं के चरित्र और मनोबल की हो तो योजना के हर पक्ष को परखना भी जरूरी है।

अग्निपथ योजना के माध्यम से भारतीय सेना, भारतीय नौसेना और भारतीय वायु सेना के लिए लगभग 46,000 सैनिकों की भर्ती की जानी है। जो ‘‘अग्निवीर’’ कहलाएंगे। अग्निपथ योजना के तहत महिलाओं की भर्ती संबंधित सेवाओं की जरूरतों पर निर्भर करेगी। वायु सेना की ओर से इसकी चयन प्रक्रिया 24 जून से शुरू हो रही है। जिसके लिए भारतीय वायु सेना ने अपनी वेबसाइट पर केंद्र सरकार की ‘अग्निपथ’ स्कीम से जुड़ी डिटेल साझा की है। इसमें योयता निर्धारण, आयु सीमा, शैक्षिक योग्यता समेत अन्य जानकारियां दी गई हैं। इस योजना में अधिकारियों से नीचे रैंक वाले व्यक्तियों के लिए रिक्रुटमेंट प्रोसेस शामिल है। इस स्कीम के तहत 75 प्रतिशत जवानों की भर्ती मात्र 4 साल के लिए की जाएगी। योजना के तहत भर्ती होने वाले सैनिकों को ‘‘अग्निवीर’’ कहा जाएगा। वहीं, केवल 25 प्रतिशत को ही अगले 15 वर्षों के लिए दोबारा सेवा में रखा जाएगा। इस योजना के तहत सभी भारतीय अप्लाई कर सकते हैं। इसमें 17.5 से 23 वर्ष की आयु के पुरुषों और महिलाओं की भर्ती की जाएगी। चार साल बाद, अग्निवीर रेगुलर कैडर के लिए अपनी मर्जी से आवेदन कर सकेंगे। योग्यता, संगठन की आवश्यकता के आधार पर, उस बैच से 25 प्रतिशत तक का चयन किया जाएगा। अन्य शैक्षणिक योग्यता और फिजिकल स्टैंडर्ड भारतीय वायु सेना द्वारा जारी किए जाएंगे। अग्निवीरों को भारतीय वायुसेना में अप्लाई करने के लिए मेडिकल योग्यता से जुड़ी शर्तों को पूरा करना होगा।

यूं भी जब अग्निपथ योजना ऐच्छिक आधार पर है तो इतना हलाकान होने की ज़रूरत भी नहीं है। जब हम अपने युवाओं को मल्टीनेशनल कंपनीज़ के अनिश्चित पैकेज़ में भेजने में नहीं झिझकते हैं तो ‘‘अग्निपथ’’ योजना में युवाओं को जाने देने में हिचक क्यों? वस्तुतः इस योजना को राजनीतिक चश्मा उतार कर देखने की ज़रूरत है।
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(22.06.2022)
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