Wednesday, June 1, 2022

चर्चा प्लस | वर्ल्ड मिल्क डे (1जून) याद दिलाता है दूध की महत्ता | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
वर्ल्ड मिल्क डे (1जून) याद दिलाता है दूध की महत्ता
      - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

      इस वर्ष अर्थात विश्व दुग्ध दिवस 2022 की थीम रखी गई है- ‘‘एंज्वाय डेयरी’’। इस दिन को मनाने की शुरुआत सन् 2001 में हुई थी। इसकी शुरुआत संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन विभाग द्वारा की गई थी। विश्व दुग्ध दिवस में पिछले वर्षों से 70 से अधिक देश इसमें शामिल हो चुके हैं। इस दिवस को मनाए जाने की आवश्यकता इसलिए महसूस हुई ताकि हम जीवन की आपाधापी में जीवन के आवश्यक पोषक तत्व दूध से दूर न होते जाएं और हर उम्र में इसके महत्व को समझें।


पिछले दिनों एक सामाजिक बैठक में लगभग 100 स्त्री-पुरुष एक इकट्ठे थे। आमंत्रित वक्ताओं में एक महिला चिकित्सक भी थीं। वे वहां मौजूद स्त्री-पुरुषों से स्वास्थ्य संबंधी चर्चा करना चाहती थीं। जब वह माईक पर आईं तो उन्होंने सबसे पहला प्रश्न जो पूछा वह था कि ‘‘आप लोगों में से कितने लोग चाय पीते हैं ? वे लोग हाथ उठाएं जो रोज चाय पीते हैं।’’ लगभग 99 प्रतिशत लोगों ने अपने हाथ उठा दिए।
फिर उन्होंने पूछा कि ‘‘आप लोगों में से कितने लोग दूध पीते हैं ? अब वे लोग हाथ उठाएं जो रोज दूध पीते हैं।’’ मुश्किल से 10 प्रतिशत लोगों ने हाथ उठाया। उसमें भी 8 प्रतिशत पुरुष थे। मात्र 2 प्रतिशत महिलाएं थीं। उन 8 प्रतिशत पुरुषों ने यह स्वीकार किया कि वह जिम जाते हैं, जहां उन्हें प्रोटीन ड्रिंक के अलावा दूध पीने की भी सलाह दी जाती है इसीलिए वे नियमित रूप से दूध का सेवन करते हैं।

              यही वास्तविक आंकड़े हैं जो हमें बताते हैं कि हम जैसे-जैसे अपनी बाल्यावस्था से ऊपर उठकर युवावस्था की ओर अग्रसर होते हैं धीरे-धीरे हमारे दूध पीने की आदत छूट दी जाती है। वयस्क होने पर हमें दूध पीना आवश्यक नहीं लगता है। बल्कि दूध पीने की आदत को बचपन से जोड़कर देखा जाने लगता है। यह डायलॉग अक्सर सुनने में आता है, जो कटाक्ष के रूप में बोला जाता है कि ‘‘क्या तुम दूध पीते बच्चे हो? अब तो बड़े हो जाओ!’’ यानी जो दूध पीता है वह क्या जीवन भर बच्चा रहता है? वयस्कता के साथ हमारे जीवन में चाय, कोल्डड्रिंक, शरबत, शराब आदि जुड़ती जाती है और दूध पीछे छूटता चला जाता है जबकि मानव के शारीरिक विकास एवं सुदृढ़ता के लिए दूध एक आवश्यक तत्व है।
             नवजात शिशु का जीवन दूध पर ही निर्भर रहता है। यदि बच्चे को दूध न मिले तो उसका जीना कठिन हो जाता है। मां का दूध न मिल पाने पर उसे गाय इत्यादि का दूध दिया जाता है ताकि बच्चे को पर्याप्त आहार पोषण मिल सके। हम सभी जानते हैं की हड्डियों को मजबूत करने के लिए कैल्शियम की जरूरत होता है और कैल्शियम का एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक स्रोत है दूध। यह सब जानते हुए भी हम दूध पीने से नाता तोड़ते चले जाते हैं। आयु बढ़ने के साथ एक बार फिर दूध की आवश्यकता खुलकर सिर उठाने लगती है जब हमारी हड्डियां आयु के साथ कमजोर पड़ने लगती हैं। फिर डॉक्टर से सलाह लेकर कैल्शियम की गोलियां खाने की नौबत आ जाती है। यदि दूध पीने की आदत हमेशा बनाए रखी जाए तो कैल्शियम की गोलियां खाने की स्थिति कभी नहीं आएगी और हम कैल्शियम के कृत्रिम स्रोतों से बचे रहेंगे।

            मानव जीवन में दूध और दूध उत्पाद के सेवन के महत्व को याद दिलाने के लिए ही प्रत्येक वर्ष 1 जून को विश्व दुग्ध दिवस मनाया जाता है। दूध हमारे खानपान का एक मुख्य आहार है। दूध से हमें प्रोटीन मिलता है और यह हमारे शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करता है। दूध से कई प्रकार के अन्य खाद्य उत्पाद बनाए जाते हैं। दूध के सेवन से हमारे शरीर को कई सारे फायदे पहुंचते हैं। दूध से हमें कई सारे आवश्यक पौषक तत्व मिलते हैं। दूध के महत्व को समझने और इसे व्यर्थ न जाने देने के लिए, इसके फायदों के प्रति जागरूक करने के लिए प्रतिवर्ष 1 जून को विश्व दुग्ध दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत में आज भी कई सारे लोग ऐसे हैं, जिन्हें दूध नहीं मिल पाता है जिससे कि उनके शरीर में पोषण की कमी रह जाती है।

इस वर्ष अर्थात विश्व दुग्ध दिवस 2022 की थीम रखी गई है- ‘‘एंज्वाय डेयरी’’। इस दिन को मनाने की शुरुआत सन् 2001 में हुई थी। इसकी शुरुआत संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन विभाग द्वारा की गई थी। विश्व दुग्ध दिवस में पिछले सालों में 70 से अधिक देश जुड़ चुके हैं। इन देशों में दूध के महत्व को समझने के लिए कई सारे कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

दूध में अनेक जरुरी पोषक तत्व होते हैं जैसे - कैल्शियम-हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाये रखता है। प्रोटीन- हमें ताकत देता है और मांसपेशिया बनाता है। पोटैशियम- स्वस्थ रक्तचाप बनाये रखता है। फॉस्फोरस- हड्डियों को मजबूती देता है और ताकत देता है। विटामिन डी- हड्डियों के लिए लाभकारी होता है। विटामिन बी 12 - लाल रक्त कोशिकाओं के लिए लाभकारी होती हैं। विटामिन ए- इम्यून सिस्टम को बनाये रखता है। दूध की आहार के रूप में महत्ता इसी बात से लगाई जा सकती है की नवजात शिशु को यदि लगातार मानव दूध पर लगभग 6 महीने तक रखा जाए तब भी उसकी बढ़वार एवं वृद्धि काफी अच्छी होती है। आजकल लगभग सभी चिकित्सक इसी बात की सलाह नवजात शिशुओं के लिए दे रहे है। यद्यपि उम्र बढ़ने के बाद केवल दूध ही शरीर की पूरी आवश्यकताओं की पूर्ति नही कर पाता है। एक पांच वर्ष के बालक को प्रति दिन आधा लीटर दूध देने से उसकी 25 प्रतिशत खाद्य ऊर्जा, 90 प्रतिशत कैल्सियम तथा राइबोफलेविन विटामिन, तथा 33 प्रतिशत विटामिन एवं विटामिन थाइमिन (बी 1) की पूर्ति होती है। अर्थात् आजकल के बोलचाल में कहें तो दूध एक फुल पैकेज़ डाईट है।

         यह बड़े दुख और शर्म की बात है जीवन-पोषक दूध में हानिकारक जहरीले तत्व मिलाकर बेचा जाता है। कुछ लोग दूध का अधिक मूल्य पाने के लिए उसमें अनेक प्रकार की मिलावट करते है। शोधकर्ताओं के अनुसार हमारे देश के अनेक शहरों में पचास प्रतिशत से ज्यादा दूध मिलावटी पाया जाता है। मिलावटी दूध के दुष्परिणाम लंबे अंतराल के उपरांत ही दिखाई देते हैं। गर्भवती महिलाओं एवं शिशुओं में यह विशेष हानि पहुंचाता है। विगत वर्षों में दूध के सिथेटिक होने के भी कई मामले सामने आए हैं। दूध में आमतौर पर जो रासायनिक तत्व मिलाए जाते हैं गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, पंतनगर के रिसचर्स ने उनका अध्ययन करके बताया है कि -
1. गाढ़ा करने वाले तत्व - यह दूध में फैट ( एस. एन. एफ ) की मात्रा में फेरबदल कर लैक्टोमीटर रीडिंग को प्रभावित करता है। जैसे स्टार्च।
2. न्यूट्रलाइर्जस - यह दूध की अम्लता को सामान्य करने में सहायक होते हैं। जैसे सोडियम कार्बोनेट।
3. प्रिजर्वर - इनका उपयोग दूध को लंबे समय तक खराब न होने के लिए किया जाता है परंतु आवश्यकता से अधिक मात्रा हानिकारक सिद्ध होता है। जैसे हाइड्रोजन परअक्साइड।
4. पानी - यह दूध की मात्रा बढ़ाने में सहायक होता है। पानी की मिलावट दूध की गुणवत्ता को कम कर देती है। वहीं गंदा पानी मिलाने से अनेक बीमारियों के फैलने की आशंका बढ़ जाती है। गंदा एवं दूषित पानी हमारे शरीर में अनेक बीमारियां फैलाता है। जैसे ई-कोलाई इन्फैक्शन, टाइफाइड फीवर, कालरा, लैप्टोस्पाइरोसिस आदि।
5. स्टार्च - स्टार्च का प्रयोग दूध में गाढ़ेपन के साथ शर्करा की मात्रा बढ़ाने के लिए किया जाता है। यह पानी की मिलावट को छुपाने का भी तरीका है। स्टार्च की मिलावट से दूध की गुणवत्ता कम हो जाती हैं तथा यह मनुष्य की पाचन प्रणाली पर असर डालती है। इसकी मिलावट से अनुमानित ऊर्जा से अधिक ऊर्जा प्राप्त होती है। अतः इस प्रकार की मिलावट वाला दूध पीने से मोटापा एवं मोटापा जनित रोग होने की संभावना बढ़ जाती है।
6. डिटर्जेंट - डिटर्जेंट की मिलावट फैट वैल्यू बढ़ाने में सहायक होती है। यह मनुष्य की पाचन तंत्र व पाचन प्रणाली को नुकसान पहुंचाता है। चूंकि डिटर्जेंट क्षारीय होता है इसलिए यह मानव शरीर के ऊतकों के लिए हानिकारक सिद्ध होता है। क्षारीयता के कारण अनेक प्रकार की बीमारियां होती हैं। इसी क्षारीयता के कारण उक्त दूध से पनीर इत्यादि भी नहीं बनाया जा सकता है, क्योंकि ऐसा दूध फटता नहीं है।
7. यूरिया - यूरिया की मिलावट का प्रयोग अप्राकृतिक दूध या सिंथेटिक मिल्क के उत्पादन में किया जाता है। इसकी मिलावट से दूध में नाईट्रोजन की मात्रा बढ़ जाती है। यह पाचन तंत्र एवं पाचन क्रिया को हानि पहुंचाता है। इसके कारण दूध पीने वाले को उल्टी, जी मिचलाना, आंत्र शोथ आदि का प्रकोप हो जाता है। विशेषतः किडनी पर इसके दुष्प्रभाव की आशंका भी रहती है।
8. शुगर ग्लूकोज - इसकी मिलावट से दूध गाढ़ा हो जाता है तथा लैक्टोमीटर रीडिंग प्रभावित होती है। यह पानी की मिलावट को छिपा कर दूध की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। इसलिए अधिक मूल्य प्राप्त करने के लिए इस प्रकार की मिलावट करते हैं।
9. फार्मलीन - यह दूध की आयु बढ़ाकर दूध को लम्बे समय तक खराब होने से बचाता है लेकिन यह किडनी को नुकसान पहुंचाता है। फार्मलीन मिलाने से मनुष्य के अनेक अंग खराब हो जाते हैं तथा यह आंतो एवं पाचन क्रिया पर दुष्प्रभाव डालता है।
10. सोडा (सोडियम कार्बोनेट) - यह दूध को जल्दी खराब होने से बचाता है। सोडियम की मात्रा अधिक होने से दूध पीने वाले का ब्लडप्रेशर बढ़ जाता है इसलिए यह दिल की बीमारी वाले लोगों लिए हानिकारक है। बच्चों में खाने वाली नली की परत को नुक्सान पहुंचाता है जिससे बच्चों में अपच हो जाता है और वो बीमार हो जाते हैं।

इसके अलावा हाइड्रोजन परअक्साइड, हड्डी का चूर्ण, तेल तथा चर्बी (वसा) भी मिलावटी तत्वों की गिनती में आते हैं। अतः हम दूध में मिलावट के प्रति जागरूक एवं सावधान रहें। दूषित दूध से बचाव करके ही हम इसके दुष्प्रभाव से मुक्त हो सकते हैं। हमें चाहिए कि हम उच्चतम गुणवत्ता वाला दूध ही प्रयोग करें। दूध हम जांची परखी दुकान से ही खरीदें जहां दूध की गुणवत्ता की समय-समय पर जाॅच की जाती हो। आखिर हमें दूध पीना है ज़हर नहीं।

            यह भी हमारे लिए शर्म की बात है कि सभी बच्चों को दूध नहीं मिल पाता है। दूध के उत्पादन पर तो ध्यान दिया गया किंतु बच्चों तक उसकी उपलब्धता पर गंभीरता नहीं बरती गई। दूध की कीमत इतनी अधिक है कि एक दिहाड़ी मजदूर अपने बच्चे को रोज दूध नहीं पिला सकता है। जितने में वह अपने एक बच्चे के लिए 1 लीटर दूध खरीदेगा उतने में उसका पूरा परिवार (पति पत्नी और दो बच्चे) एक समय का भोजन कर पाएंगे। ऐसे बच्चों को पर्याप्त मात्रा में मां का दूध भी नहीं मिल पाता है क्योंकि भरपेट खाना न मिल पाने की स्थिति में मांए भी शारीरिक रूप से कमजोर होती हैं और वे अपने बच्चे को नियमित लंबे समय तक दूध नहीं पिला पाती हैं। हमारे समाज में मातृत्व पर जोर दिया जाता है किंतु मातृत्व के उपरांत मां और बच्चे के पर्याप्त पोषण की व्यवस्था नहीं जुट पाती है। ऐसी स्थिति में अपनी कमियों को छुपाने के लिए ईश्वर के नाम का सहारा लेकर यह कहा जाता है कि ‘‘जिसने पैदा किया है वही दो रोटी भी देगा’’। जबकि जीवन के लिए दो रोटी के साथ अन्य खाद्य पदार्थों जैसे दूध की आवश्यकता भी होती है। विगत दस वर्ष में दूध की कीमत में 35 प्रतिशत वृद्धि हुई है। स्थिति यह है कि अनेक घरों में या तो शिशुओं के लिए अथवा मात्र चाय के लिए दूध खरीदा जाता है। बहुत से पढ़ने वाले बच्चे भी दूध से वंचित रहते हैं। कमजोर होती हड्डियों वाले वृद्ध भी दूध का अभाव झेलते हैं। जबकि हमारा देश दुग्ध उत्पादन में विश्व में अग्रणी माना जाता है। वर्गीज कुरियन की ‘‘ऑपरेशन व्हाईट फ्लड’’ के नाम से प्रसिद्ध दुग्ध क्रांति के बाद दूध के उत्पादन में रिकाॅर्डतोड़ वृद्धि हुई फिर भी यह आमजन की पहुंच से दूर होता जा रहा है। इसके कारणों पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। दूध एक प्राकृतिक पोषण स्रोत है अतः इसकी महत्ता के अनुरूप इसकी उपलब्धता और सेवन की स्थितियों को सुधारना जरूरी है।
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(01.06.2022)

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