Sunday, May 12, 2019

मैंने भी वोट किया... News 18 MP/Chhattisgarh ... 2019 का महाभारत और लोकतंत्र में आधी आबादी .... में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

मैंने भी वोट किया... News 18 MP/Chhattisgarh ... 2019 का महाभारत और लोकतंत्र में आधी आबादी .... में मैं भी ...

मैंने भी वोट किया... News 18 MP/Chhattisgarh ... 2019 का महाभारत और लोकतंत्र में आधी आबादी .... में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

मैंने भी वोट किया... News 18 MP/Chhattisgarh ... 2019 का महाभारत और लोकतंत्र में आधी आबादी .... में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

मैंने भी वोट किया... News 18 MP/Chhattisgarh ... 2019 का महाभारत और लोकतंत्र में आधी आबादी .... में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

मैंने भी वोट किया... News 18 MP/Chhattisgarh ... 2019 का महाभारत और लोकतंत्र में आधी आबादी .... में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

मैंने भी वोट किया... News 18 MP/Chhattisgarh ... 2019 का महाभारत और लोकतंत्र में आधी आबादी .... में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

मैंने भी वोट किया... News 18 MP/Chhattisgarh ... 2019 का महाभारत और लोकतंत्र में आधी आबादी .... में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

मैंने भी वोट किया... News 18 MP/Chhattisgarh ... 2019 का महाभारत और लोकतंत्र में आधी आबादी .... में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

मैंने भी वोट किया... News 18 MP/Chhattisgarh ... 2019 का महाभारत और लोकतंत्र में आधी आबादी .... में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

मैंने भी वोट किया... News 18 MP/Chhattisgarh ... 2019 का महाभारत और लोकतंत्र में आधी आबादी .... में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

मैंने भी वोट किया... News 18 MP/Chhattisgarh ... 2019 का महाभारत और लोकतंत्र में आधी आबादी .... में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

मैंने भी वोट किया... News 18 MP/Chhattisgarh ... 2019 का महाभारत और लोकतंत्र में आधी आबादी .... में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

मैंने भी वोट किया... News 18 MP/Chhattisgarh ... 2019 का महाभारत और लोकतंत्र में आधी आबादी .... में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

मैंने भी वोट किया... News 18 MP/Chhattisgarh ... 2019 का महाभारत और लोकतंत्र में आधी आबादी .... में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

लीजिए मैंने अपना वोट दे दिया ... Dr Sharad Singh Voted for Parliamentary Election 2019

Dr Sharad Singh Voted for Parliamentary Election 2019
मतदाता जागरूकता के दोहे
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

सब कामों को छोड़कर करना है मतदान।
रखना है हमको सदा लोकतंत्र का मान।।

जाति धर्म सब भूलकर निर्णय करे समाज।
होगा खूब विकास फिर होंगे सारे काज।।

विज्ञापन या व्हाट्सएप्प, ये क्या देंगे राय।
खुद को जो अच्छा लगे, वहीं चुना बस जाय।।

शोर शराबे से कभी, मत होना कंफ्यूज़।
जो लालच या धौंस दे, करना उसे रिफ्यूज़।।

इक-इक मत है कीमती, यह मत जाना भूल ।
वोटिंग पावर आज है, सबसे बड़ा उसूल।।

शासन मन का चाहिए, तो लो कदम उठाए ।
चिड़िया जो चुग जाएगी, क्या होगा पछताए ।।

'शरद' करे विनती यही, करिएगा मतदान।
दुनिया भी देखे ज़रा, इस जनमत की शान।।

       -------------------------------
Dr Sharad Singh Voted for Parliamentary Election 2019

Dr Sharad Singh Voted for Parliamentary Election 2019

Dr Sharad Singh Voted for Parliamentary Election 2019

Dr Sharad Singh Voted for Parliamentary Election 2019

Dr Sharad Singh Voted for Parliamentary Election 2019

Dr Sharad Singh Voted for Parliamentary Election 2019

Wednesday, May 8, 2019

चर्चा प्लस … चुनावी वार्मिंग तले दबा हुआ ग्लोबल वार्मिंग का मुद्दा - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस …
चुनावी वार्मिंग तले दबा हुआ ग्लोबल वार्मिंग का मुद्दा
- डॉ. शरद सिंह
लोकसभा चुनावों का क्लाईमेक्स हो तो बहसों, नारों, निवेदन और हंगामे के सिवा और कुछ हो ही नहीं सकता है। इस बार के चुनाव में वे मुद्दे कहीं हैं ही नहीं जिन पर भारतीयों की नहीं अपितु इस धरती की जीवनरेखा निर्भर है। पेड़ कट रहे हैं, खेत और हरियाली सिकुड़ रही है, धरती की ऊपरी पर्त्त शुष्क होती जा रही है क्योंकि जल का ठहराव नहीं हो पा रहा है। उस पर हमारे पास कोई ठोस प्लानिंग अथवा दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी और हम उत्सवधर्मी साल में एक दिन बच्चों से चित्रकारी करा कर, भाषण दे कर बेखबर बैठे हैं।

Charcha Plus Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily News Paper चर्चा प्लस ... चुनावी वार्मिंग तले दबा हुआ ग्लोबल वार्मिंग का मुद्दा - Dr (Miss) Sharad Singh

  जापान में आई त्सुनामी भला कौन भुला सकता है? आज भी किसी डिस्कवरी अथवा ‘नेशनल जियोग्राफी चैनल पर जापान में आई त्सुनामी के दृश्य दिखाए जाते हैं तो उन्हें देख कर आत्मा कांप उठती है। अभी हाल ही में पापुआ न्यूगिनी में 7.2 रिक्टर स्केल का भूकंप आया। इससे पहले नेपाल में आए भूकंप के कारण हजारों लोग मारे गए और कई ऐतिहासिक धरोहरें तहस नहस हो गईं। आइए एक नजर डालते हैं सन 2000 के बाद विश्व में आए ऐसे पांच बडे़ भूकंप पर, जिससे मानव जाति को काफी तबाही झेलनी पड़ी। इंडोनेशिया में 26 दिसंबर, 2004 को 9.1 तीव्रता से आए भूकंप के कारण हिन्द महासागर में सूनामी आई। दर्जनभर देशों में दो लाख 30 हजार लोगों की मौत हो गई। इंडोनेशिया के उत्तरी सुमात्रा में 28 मार्च, 2005 को 8.5 की तीव्रता का भूकंप आने से लगभग 1300 लोग काल के गाल में समा गए। चिली में 27 फरवरी, 2010 को 8.8 की तीव्रता से आए भूकंप में 524 लोग असमय मारे गए। जापान के पूर्वोत्तर तट पर 11 मार्च 2011 को 9.0 की तीव्रता से भूकंप आने से भयानक तबाही मची। लगभग 18 हजार से अधिक लोगों की इसमें मौत हो गई। नेपाल में 25 अप्रैल, 2015 को 7.8 की तीव्रता से आए भूकंप ने जो तबाही मचाई वह अभी भूली नहीं है। इस आपदा में 8857 लोगों की मौत हो गई और कई महत्वपूर्ण इमारतें तहस नहस हो गईं।
दुनिया में यह प्राकृतिक आपदाएं भीषण रूप क्यों ले रही हैं? इसका एक ही उत्तर है-ग्लोबल वॉर्मिंग। भारत में ग्लोबल वार्मिंग भले ही अभी एक आंदोलन नहीं बना है। भले ही भाग-दौड़ में लगे रहने वाले हम भारतीयों के लिए इसके बारे में सोचने का समय नहीं है किन्तु हम इससे पूरी तरह अनजान भी नहीं है। जबकि विज्ञान की दुनिया में ग्लोबल वार्मिंग को 21वीं शताब्दी का सबसे बड़ा खतरा बताया जा रहा है।

हम अपने छोटी-छोटी समस्याओं में इस कदर उलझे रहते हैं कि बड़ी-बड़ी समस्याआें की ओर हम देख ही नहीं पाते हैं। अब पेयजल के संकट पर कोई बड़े आंदोलन नहीं होते हैं। हमारी सारी चिंताएं सोशल मीडिया में उबलती हैं और सोशल मीडिया से बाहर आते ही ठंडी पड़ जाती हैं। व्हाट्सएप्प पर विवादास्पद किन्तु झूठी सूचनाओं और थोथे ज्ञान की बहार हर समय छाई रहती है। इन सब के बीच ग्रीनहाउस इफैक्ट पर चर्चा को कोई जगह नहीं मिलती है। जबकि ग्रीन हाउस इफैक्ट के कारण सन् 1880 से 2012 की अवधि के दौरान पृथ्वी के औसत तापमान में 0.85 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है। सन् 1906 से 2005 की अवधि के दौरान पृथ्वी के औसत तापमान में 0.74 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई । वैज्ञानिको के अनुसार तापमान में इस वृद्धि के कारण प्रकृति में जो परिवर्तन संभावित हैं, वे हैं - ग्लेशियरों का पिघलना यानी ताप बढ़ने से ग्लेशियर पिघलने लगते हैं और उनका आकार कम होने लगता है और ग्लेशियर पीछे हटने लगते हैं। समुद्री जलस्तर में वृद्धि - ग्लेशियरों के पिघलने से प्राप्त जल जब सागरों में मिलता है तो समुद्री जल स्तर में वृद्धि हो जाती है। समुद्री जलस्तर में वृद्धि से नदियों में बाढ़ की संभावना बढ़ जाती है। दरअसल, ग्लेशियरों से कई बारहमासी नदियां निकलती है और ग्लेशियर के जल को अपने साथ बहाकर ले जाती हैं । यदि ग्लेशियरों के पिघलने की दर बढ़ जाएगी तो नदी में जल की मात्रा बढ़ जाएगी जोकि बाढ़ का कारण बन सकती है। वर्षा-प्रतिरूप (पैटर्न) में परिवर्तन होता जा रहा है। वर्षा होने और बादलों के बनने में तापमान की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अतः ताप में वृद्धि के कारण वर्षा-प्रतिरूप या पैटर्न भी बदल रहा है। अर्थात् कहीं वर्षा पहले से कम होने लगी है तो कहीं पहले से ज्यादा होने लगी हैं। वर्षा की अवधि में भी बदलाव आ रहा है।
वैज्ञानिक मानते हैं कि समुद्री जल का ताप बढ़ने से प्रवाल भित्तियों का विनाश होने लगता है । वर्तमान में लगभग एक तिहाई प्रवाल भित्तियों का अस्तित्व ताप वृद्धि के कारण संकट में पड़ गया जो सबसे भयावह दुष्प्रभाव है। प्रवाल भित्तियों के नष्ट होने का दुष्परिणाम है -पेयजल की कमी।

जनसंख्या के तेजी से बढ़ते दबाव और जमीन के नीचे के पानी के अंधाधुंध दोहन के साथ ही जल संरक्षण की कोई कारगर नीति नहीं होने की वजह से पीने के पानी की समस्या प्रतिवर्ष गंभीर होती जा रही है। सर्दियों में स्थिति कुछ सामान्य रहती है लेकिन जैसे ही गर्मियों को मौसम आता है, जल की कमी अपना विकराल रूप धारण करने लगती है। जिसे दुनिया में सबसे ज्यादा बारिश वाली जगह चेरापूंजी में भी अब लोगों को पीने के पानी के लिए तरसना पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक आंकड़े के अनुसार भारत में लगभग 9.7 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है। जबकि यह आंकड़ा मात्र शहरी आबादी का है। ग्रामीण क्षेत्रों में 70 प्रतिशत लोग अब भी दूषित पानी पीने को ही विवश हैं। कहीं-कहीं तो वह भी उपलब्ध नहीं है। 17 अगस्त, 2008 को स्वीडन के स्टॉकहोम में हुए विश्व सम्मेलन में यह बात सामने आई कि दूषित पानी के कारण विश्व में हर साल 14 लाख बच्चों की जान जाती है। उस पर सन् 2028 तक भारत की जनसंख्या चीन से भी अधिक हो आने का अनुमान है। इससे पेयजल के स्रोतों पर अत्यधिक दबाव पड़ेगा।
योजनाओं पर अमल करने और प्रबंधन की मॉनीटरिंग के मामले में हमारा देश में दिखावे में अधिक विश्वास किया जाता है, काम पर कम। जो आंकड़े जुटाए जाते हैं वे सच्चाई से बिलकुल अलग रहते हैं। वर्ष 1984 में गंगा को साफ करने के लिए शुरू गंगा एक्शन प्लान के बाद भी गंगा आज भी स्वच्छ नहीं हो पाई है। सन् 2025 तक 1.8 अरब लोग ऐसे क्षेत्रों में रह रहे होंगे जहाँ पानी की बहुत कमी होगी। तेजी से बढ़ते कंक्रीट के जंगल जमीन के भीतर स्थित पानी के भंडार पर दबाव बढ़ा रहे हैं। आईटी सिटी के विकसित होने वाले गुड़गांव में अदालत ने पेय जल की गंभीर समस्या के चलते हाल में नए निर्माण पर तब तक रोक लगा दी थी जब तक संबंधित कंपनी या व्यक्ति पानी के वैकल्पिक स्रोत और उसके संरक्षण का प्रमाण नहीं दे देता। छोटे शहरों में इस पर कड़ाई से पालन नहीं कराया जाता है। प्रतिबंध के बावजूद गरमी के मौसम में भवन निर्माण कार्य निर्बाध गति से चलते रहते हैं।
ग्लोबल वार्मिंग के कारण धरती के तापमान में दो डिग्री सेल्सियस के संभावित वृद्धि से भारत को भयानक लू का सामना करना पड़ सकता है। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी रिपोर्ट में यह आशंका जताई जा चुकी है कि भारत में घातक लू के दौर से कोलकाता के सर्वाधिक प्रभावित होने की आशंका है। इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि नाइजीरिया में लागोस और चीन के शंघाई सहित अन्य महानगरों के तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ोतरी की आशंका के कारण साल 2050 तक प्रभावित महानगरों के लगभग 35 करोड़ लोग भीषण गर्मी से प्रभावित होंगे। रिपोर्ट में वैश्विक स्तर पर जलवायु संबंधी गड़बड़ी को देखते हुए इस बात की चेतावनी दी गई है कि यदि जलवायु में हो रहे इस परिवर्तन को सरकारों द्वारा अनदेखा किया गया तो भविष्य में समाज और वैश्विक अर्थव्यवस्था में व्यापक असर पड़ेगा। ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्र तटीय इलाकों में जलस्तर बढऩे की कीमत करोड़ों डॉलर के अतिरिक्त आर्थिक बोझ के रूप में चुकानी पड़ेगी। समुद्री जलस्तर बढऩे के खतरे से तटीय इलाकों की लगभग पांच करोड़ आबादी प्रभावित होगी। इसमें चीन, बांग्लादेश, चीन, मिस्र, भारत, इंडोनेशिया, जापान, फिलीपीन, अमरीका और वियतनाम के तटीय क्षेत्र शामिल हैं। यदि दुनियाभर में औद्योगिक गतिविधियों यूं ही चलती रही तो आने वाले 100-50 वर्षों में पृथ्वी के तापमान में 2 से 4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो जाएगी। यह वृद्धि 4 डिग्री सेल्सियस से अधिक भी हो सकती है। पृथ्वी पर अधिक तापमान का सीधा मतलब है कि पृथ्वी पर चलने वाली हवाएं और अधिक गर्म हो जाएंगी और पृथ्वी के कई हिस्से लू की चपेट में रहेंगे. पृथ्वी पर अधिक तापमान और लू के चलते वैज्ञानिकों का दावा है कि समुद्र तल में वृद्धि देखने को मिलेगी। समुद्र तल में यह वृद्धि लगभग 2 से 4 फीट होगी। वहीं दुनिया के कई बड़े देशों के इर्द-गिर्द समुद्र तल में इससे अधिक वृद्धि हो सकती है। तापमान में वृद्धि के कारण होने वाले परिवर्तनों से दुनियाभर में कृषि पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। इसके चलते खाद्य उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। पृथ्वी के तापमान में वृद्धि से कई पेड़-पौधों और प्रजातियां नष्ट हो जाएंगी। वन्य प्राणियों एवं पक्षियों की प्रजातियों पर भी इसका विपरीत असर पड़ेगा। आज ध्रुवीय भालू, पेंग्विन जैसे पशु संकटग्रस्त घोषित किए जा चुके हैं। यदि यही स्थिति रही तो पक्षियों की अनेक प्रजातियां भी कालकवलित हो जाएंगी।

ये सारी बातें किसी साईंस फिक्शन मूवी की तरह कपोल कल्पित लग सकती हैं किन्तु दुर्भाग्य से यही हमारी वर्तमान से शुरू होने वाली भावी सच्चाई है। यदि हम वंशवाद, जातिवाद, धर्म के झमेलों में उलझे रह कर जलवायु और ग्लोबलवार्मिंग को अनदेखा किए रहेंगे तो हम अपने वंशजों के जीवन के लिए हवा, पानी और जमीन भी नहीं छोड़ सकेंगे। समय रहते हमें अपनी सोच के दायरे को बढ़ाना होगा यदि हम पृथ्वी को अपनी आने वाली पीढ़ी को सौंपना चाहते हैं तो हमें अपने छोटे-छोटे स्वार्थों से आगे बढ़ कर कुछ करना होगा।
-----------------------------

(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 08.05.2019) #शरदसिंह #सागरदिनकर #दैनिक #मेराकॉलम #Charcha_Plus #Sagar_Dinkar #Daily #SharadSingh #चुनाव #मुद्दे #बुंदेलखंड #Election #Issue #ग्लोबलवार्मिंग #जलसंकट
#GlobalWarming #WaterCrisis

Tuesday, May 7, 2019

स्त्री स्वतंत्रता के समर्थक थे कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
दि. 07 मई 2019 को कविवर गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर के जन्मदिवस पर पत्रिका समाचारपत्र ने उनके कथासाहित्य पर मेरे विचारों को प्रमुखता से स्थान दिया है...आप भी पढ़िए...
💐हार्दिक धन्यवाद पत्रिका 💐
Dr Sharad Singh On Ravindra Nath Taigor Stories in Patrika News Paper, 07.05.2019

http://epaper.patrika.com/c/39169393
पत्रिका में प्रकाशित मेरे विचार....
"स्त्री स्वतंत्रता के समर्थक थे कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर*
मुझे कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर के काव्य पक्ष के साथ ही उनका कहानीकार पक्ष भी बहुत प्रभावित करता है, इसीलिए मैंने स्त्री विमर्श की अपनी पुस्तक ‘औरत तीन तस्वीरें’ में ‘टैगोर, स्त्री और प्रेम’ शीर्षक से एक विस्तृत लेख लिखा। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर मानवीय भावनाओं के चितेरे कवि ही नहीं वरन् एक संवेदनशील कथाकार भी थे। टैगोर की कहानियों में तत्कालीन समाज, मानव प्रकृति व प्रवृत्ति, एवं मानव मनोविज्ञान अपने समग्र रूप में उभर कर आया है। जैसे ‘माल्यदान’ कहानी की ‘बिन्नी’ को लें, जिसके द्वारा रवीन्द्रनाथ ने प्रेम के प्रति स्त्री की मौन साधना को वर्णित किया। या फिर कहानी ‘प्रेम का मूल्य’ को लें, जिसमें महाभारतकालीन पात्र ‘देवयानी’ के माध्यम से उन्होंने स्त्री गरिमा को स्थापित किया।
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
लेखिका एवं समाजसेवी"

Monday, May 6, 2019

बुंदेलखंड में मजदूर बनने को मजबूर किसान - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह - नवभारत में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh
 
प्रतिष्ठित समाचार पत्र "नवभारत" में बुंदेलखंड के किसान-मज़दूरों की दशा पर मेरा लेख प्रकाशित हुआ है... इसे आपभी पढ़िए...

हार्दिक आभार "नवभारत"  

 
बुंदेलखंड में मजदूर बनने को मजबूर किसान
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह 

इस बार के लोकसभा चुनावों के दौरान जिस तरह जाति, धर्म और वंशावलियों पर जंग छिड़ी हुई है उसके बीच मजदूरों के मुद्दे कहीं खो से गए हैं। गोया मजदूरों के बारे में चिन्ता करने की कतई जरूरत नहीं है। जबकि देश में अब कृषकों से भी बड़ी मजदूरों की संख्या हो चली है। इनमें वे कृषक मजदूर भी शामिल हैं जो माईग्रेट कर के एक राज्य से दूसरे राज्य मजदूरी करने जाते हैं। छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बिहार और अब बुंदेलखंड के मजदूरों की मांग सबसे अधिक होती है। वहीं इनका मेहनताना सबसे कम होता है। अपना घर, गांव, जमीन छोड़ कर कोई कहीं और नहीं जाना चाहता है। लेकिन जब पेट भरने का कोई उपाय दिखाई न दे, व्यक्ति दाने-दाने को मोहताज हो जाए तो उसे सबकुछ छोड़-छाड़ कर परदेस में भटकना पड़ता है। भारतीयों का गिरमिटिया मजदूर बन कर दक्षिण आफ्रिका में गन्ने के खेतों में काम करने जाना और पशुवत् जीवन जीने को विवश होना इसी तरह के पलायन की वह आरम्भिक कड़ी है जो इतिहास के पन्नों में दर्ज़ है। उस समय हम गुलाम थे लेकिन अब अपने प्रजातंत्र में रहते हुए भी किसानों को मजदूर बनते देख रहे हैं। 
बुंदेलखंड में मजदूर बनने को मजबूर किसान - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह - नवभारत में प्रकाशित    An article of Dr (Miss) Sharad Singh in Navbharat newspaper
         सन् 2011 को मुझे कटनी से सागर आना था। नियत समय पर स्टेशन पहुंची तो वहां देखा कि छत्तीसगढ़ी मजदूर परिवारों से प्लेटफॉर्म अटा पड़ा था। बौखलाई सी स्त्रियां, झुंझलाए से पुरुष और कुपोषण के शिकार बच्चे। मैंने अपनी आंखों से उन बच्चों को मिट्टी के बरतन में सहेज कर रखे बासी भात पर झपटते देखा। उस पल मन में यही विचार आया कि क्या यही है मेरा भारत? मजदूरों का वह समूह अकेले नहीं था। उनके साथ उनका एक कथित ठेकेदार था। उसी ने उन्हें रेल में ले जाने की व्यवस्था की थी। वह बीच-बीच में आकर समझा रहा था कि उनमें से कितने लोगों को किस डिब्बे में चढ़ना है। उन मजदूर परिवारों के चेहरों पर साफ देखा जा सकता था कि वे अपने अनिश्चित भविष्य को ले कर भयभीत हैं।
लगभग यही दृश्य मुझे सन् 2017 में खजुराहो रेलवे स्टेशन पर देखने को मिला। अंतर मात्र इतना था कि कटनी रेलवे स्टेशन में मैंने छत्तीसगढ़ी मजदूरों को देखा था जो पोटली में मिट्टी के बरतनों में बासी भात बांध कर पलायन कर रहे थे। जबकि खजुराहो रेलवेस्टेशन पर मैंने जिन मजदूरों को देखा वे बुंदेलखंड के थे और उनकी पोटलियों में बाजरे की मोटी रोटियां बंधी थीं। इन मजदूरों के साथ भी उनके बीवी-बच्चे थे। वे दिल्ली जा रहे थे। इस आशा से कि उस महानगर में उन्हें कोई न कोई काम मिल जाएगा। जिससे उनके बीवी-बच्चों का तो पेट भरेगा ही और बचा हुआ पैसा वे अपने बूढ़े मां-बाप के लिए अपने गांव भेज सकेंगें। एक छलावे भरा स्वप्न उन्हें ज़िन्दगी के रेगिस्तान की ओर ले जा रहा था।
सूखे के प्रकोप, लचर जल प्रबंधन और जल की कमी से जूझ रहे बुंदेलखंड के सैकड़ों गांवों से प्रतिवर्ष अनेक ग्रामीण अपने-अपने गांव छोड़ कर दूसरे राज्यों तथा महानगरों की ओर पलायन करने को विवश हो जाते हैं। असंगठित, अप्रशिक्षित मजदूरों के रूप में काम करने वाले इन मजदूरों का जम कर आर्थिक शोषण होता हैं। यह स्थिति तब और अधिक भयावह हो जाती है जब उन्हें कर्जे के बदले अपना घरबार बेच कर अपने बीवी-बच्चों समेत गांवों से पलायन करना पड़ता है। गरमी का मौसम आते ही गांवों में पानी की कमी विकराल रूप धारण कर लेती है। कुंआ, तालाब, पोखर और हैंडपंप सब सूख जाते हैं। अंधाधुंध खनन से यहां की नदियां भी सूखती जा रही हैं। बिना पानी के कोई किसान खेती कैसे कर सकता है? बिना पानी के सब्जियों भी नहीं उगाई जा सकती हैं। खेत और बागीचों के काम बंद हो जाने पर पेट भरने के लिए एकमात्र रास्ता बचता है मजदूरी का। हल चलाने वाले हाथ गिट्टियां ढोने के लिए मजबूर हो जाते हैं। अभावग्रस्त बुंदेलखंड से हर साल रोजी रोटी की तलाश में हजारों परिवार परदेश जाते हैं। मगर रोटी की खातिर गरीबों का यह पलायन राजनीतिक दलों के एजेंडे में दिखाई नहीं देता है। बुंदेलखंड का क्षेत्र मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में विस्तृत है। इस क्षेत्र में कुल आठ संसदीय क्षेत्र आते हैं। टीकमगढ़, खजुराहो, दमोह और सागर जैसी लोकसभा सीटें मध्य प्रदेश में आती हैं, तो झांसी, जालौन, हमीरपुर और बांदा उत्तर प्रदेश के हिस्से में हैं। इस क्षेत्र में आय का एक मात्र साधन खेती है। यहां कोई बड़ा उद्योग-धंधा नहीं है। दरअसल, खेती भी कुछ खास वर्गो के पास ही है और बहुसंख्यक वे लोग हैं, जो मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं। जब सूखा पड़ता है तो बहुसंख्यक वर्ग दाने-दाने को मोहताज हो जाता है। इन्हीं स्थितियों में इस क्षेत्र से लोग पलायन करते हैं।
बुंदेलखंड के ही चित्रकूट जिले की मंदाकिनी, गुन्ता, बरदहा, बानगंगा सूखकर नाली की तरह कहने लगती है। बांदा की रंज, बागेन, केन जैसी बड़ी नदियों की धार जगह जगह से टूट गई है। महोबा की चंद्रावल, बिरमा, अर्जुन, उर्मिल जैसी नदियों में दूर-दूर तक पानी नहीं नजर आ रहा है। बुंदेलखंड की पहज, धसान, सौर, नारायणी जैसी कई नदियां वैसे ही मृतप्राय हो चुकी हैं। सागर की बेबस नदी अपनी बेबसी पर आंसू बहाती रहती है। अवैध रेत खनन के कारण अब यमुना और बेतवा जैसी नदियों के पाट भी सूखने लगे हैं। नदियों के तटवर्ती गांव पांच-पांच किमी की दूरी तय करके किसी तरह अपनी जान बचा रहे हैं। जिन गांवों के आस-पास कहीं भी पानी का इंतजाम नहीं है उन गांवों के लोग पानी और रोटी के लिए महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। पिछले एक दशक के दौरान करीब 45 लाख लोग यहां से पलायन कर चुके हैं। कुछ साल पहले तक लोग अपने भूखे बच्चों की भूख मिटाने के लिए रोजी-रोटी की तलाश मे परदेश कमाने जाते थे। अब भूख और प्यास दोनों से बचने के लिए दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, मंबई, कोलकाता जैसे महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। स्वयंसेवी संगठनों के अनुसार बुंदेलखंड छोड़कर जाने वालों का प्रतिशत इसी जून माह में 50 फीसदी का आंकड़ा पार कर सकता है।
हमारे राजनीतिक दलों के अधिकांश बड़बोले नेताओं को जाति, धर्म और वंशावलियों से फुर्सत मिले तो वे इन मजदूरों की दीन दशा पर दृष्टिपात करें। बुनियादी मुद्दों से मुंहमोड़ कर लड़ा जाने वाला चुनाव कितना टिकाऊ होगा यह तो समय की बताएगा किन्तु तब तक पलयन के लिए विवश कृषक से श्रमिक बनते जा रहे दीन-हीन इंसानों की चिंता भी करनी जरूरी है।
---------------------
( नवभारत, 03.05.2019 )

#नवभारत #शरदसिंह #बुंदेलखंड #मज़दूर #किसान #Labour #Farmer #Navbharat #SharadSingh #Bundelkhand

Wednesday, May 1, 2019

चर्चा प्लस ... 1 मई - अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर विशेष : चुनावों के बीच मजदूरों के मुद्दे - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ... 

1 मई - अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर विशेष :
चुनावों के बीच मजदूरों के मुद्दे
- डॉ. शरद सिंह


इस बार के लोकसभा चुनावों के दौरान जिस तरह जाति, धर्म और वंशावलियों पर जंग छिड़ी हुई है उसके बीच मजदूरों के मुद्दे कहीं खो से गए हैं। गोया मजदूरों के बारे में चिन्ता करने की कतई जरूरत नहीं है। जबकि देश में अब कृषकों से भी बड़ी मजदूरों की संख्या हो चली है। इनमें वे कृषक मजदूर भी शामिल हैं जो माईग्रेट कर के एक राज्य से दूसरे राज्य मजदूरी करने जाते हैं। छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बिहार और अब बुंदेलखंड के मजदूरों की मांग सबसे अधिक होती है। वहीं इनका मेहनताना सबसे कम होता है।


सन् 2011 को मुझे कटनी से सागर आना था। नियत समय पर स्टेशन पहुंची तो वहां देखा कि छत्तीसगढ़ी मजदूर परिवारों से प्लेटफॉर्म अटा पड़ा था। बौखलाई सी स्त्रियां, झुंझलाए से पुरुष और कुपोषण के शिकार बच्चे। मैंने अपनी आंखों से उन बच्चों को मिट्टी के बरतन में सहेज कर रखे बासी भात पर झपटते देखा। उस पल मन में यही विचार आया कि क्या यही है मेरा भारत? मजदूरों का वह समूह अकेले नहीं था। उनके साथ उनका एक कथित ठेकेदार था। उसी ने उन्हें रेल में ले जाने की व्यवस्था की थी। वह बीच-बीच में आ कर समझा रहा था कि उनमें से कितने लोगों को किस डिब्बे में चढ़ना है। उन मजदूर परिवारों के चेहरों पर साफ-साफ दिखाई दे रहा था कि वे अपने अनिश्चित भविष्य को ले कर किस तरह भयभीत हैं। 
Charcha Plus Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily News Paper चर्चा प्लस ... 1 मई - अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस पर विशेष : चुनावों के बीच मजदूरों के मुद्दे - डॉ. शरद सिंह

लगभग यही दृश्य मुझे सन् 2017 में खजुराहो रेलवे स्टेशन पर देखने को मिला। अंतर मात्र इतना था कि कटनी रेलवे स्टेशन में मैंने छत्तीसगढ़ी मजदूरों को देखा था जो पोटली में मिट्टी के बरतनों में बासी भात बांध कर पलायन कर रहे थे। जबकि खजुराहो रेलवेस्टेशन पर मैंने जिन मजदूरों को देखा वे बुंदेलखंड के थे और उनकी पोटलियों में बाजरे की मोटी रोटियां बंधी थीं। इन मजदूरों के साथ भी उनके बीवी-बच्चे थे। वे दिल्ली जा रहे थे। इस आशा से कि उस महानगर में उन्हें कोई न कोई काम मिल जाएगा। जिससे उनके बीवी-बच्चों का तो पेट भरेगा ही और बचा हुआ पैसा वे अपने बूढ़े मां-बाप के लिए अपने गांव भेज सकेंगें। एक छलावे भरा स्वप्न उन्हें ज़िन्दगी के रेगिस्तान की ओर ले जा रहा था।
मुझे अच्छी तरह से याद है कि मैंने जिससे बातचीत की थी, उसका नाम था भगत पटेल। उसने मुझे बताया था कि लगातार सूखे की मार ने उसकी खेतीबाड़ी सुखा दी। सरकारी और गैर सरकारी कर्जा चुकाने में उसका ख्ेत और घर दोनों बिक गए। अब परिवार दाने-दाने को मोहताज हो चुका था। वह तो उसके एक दोस्त ने उसे बताया कि दिल्ली में वह उसे मजदूरी दिला सकता है, बस इसीलिए भगत पटेल अपने बीवी-बच्चों सहित दिल्ली के लिए निकल पड़ा। दिल्ली में कहां जाना है, उसे पता नहीं था। बस, एक विश्वास था अपने उस दोस्त के प्रति। यदि वह दोस्त सही निकला तो कुछ जुगाड़ हो जाएगा, अन्यथा भगवान मालिक है!
सूखे के प्रकोप, लचर जल प्रबंधन और जल की कमी से जूझ रहे बुंदेलखंड के सैकड़ों गांवों से प्रतिवर्ष अनेक ग्रामीण अपने-अपने गांव छोड़ कर दूसरे राज्यों तथा महानगरों की ओर पलायन करने को विवश हो जाते हैं। असंगठित, अप्रशिक्षित मजदूरों के रूप में काम करने वाले इन मजदूरों का जम कर आर्थिक शोषण होता हैं। यह स्थिति तब और अधिक भयावह हो जाती है जब उन्हें कर्जे के बदले अपना घरबार बेच कर अपने बीवी-बच्चों समेत गांवों से पलायन करना पड़ता है। गरमी का मौसम आते ही गांवों में पानी की कमी विकराल रूप धारण कर लेती है। कुंआ, तालाब, पोखर और हैंडपंप सब सूख जाते हैं। अंधाधुंध खनन से यहां की नदियां भी सूखती जा रही हैं। बिना पानी के कोई किसान खेती कैसे कर सकता है? बिना पानी के सब्जियों भी नहीं उगाई जा सकती हैं। खेत और बागीचों के काम बंद हो जाने पर पेट भरने के लिए एकमात्र रास्ता बचता है मजदूरी का। हल चलाने वाले हाथ गिट्टियां ढोने के लिए मजबूर हो जाते हैं। अभावग्रस्त बुंदेलखंड से हर साल रोजी रोटी की तलाश में हजारों परिवार परदेश जाते हैं। मगर रोटी की खातिर गरीबों का यह पलायन राजनीतिक दलों के एजेंडे में दिखाई नहीं देता है। बुंदेलखंड का क्षेत्र मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में विस्तृत है। इस क्षेत्र में कुल आठ संसदीय क्षेत्र आते हैं। टीकमगढ़, खजुराहो, दमोह और सागर जैसी लोकसभा सीटें मध्य प्रदेश में आती हैं, तो झांसी, जालौन, हमीरपुर और बांदा उत्तर प्रदेश के हिस्से में हैं। इस क्षेत्र में आय का एक मात्र साधन खेती है। यहां कोई बड़ा उद्योग-धंधा नहीं है। दरअसल, खेती भी कुछ खास वर्गो के पास ही है और बहुसंख्यक वे लोग हैं, जो मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं। जब सूखा पड़ता है तो बहुसंख्यक वर्ग दाने-दाने को मोहताज हो जाता है। इन्हीं स्थितियों में इस क्षेत्र से लोग पलायन करते हैं।
बुंदेलखंड के ही चित्रकूट जिले की मंदाकिनी, गुन्ता, बरदहा, बानगंगा सूखकर नाली की तरह कहने लगती है। बांदा की रंज, बागेन, केन जैसी बड़ी नदियों की धार जगह जगह से टूट गई है। महोबा की चंद्रावल, बिरमा, अर्जुन, उर्मिल जैसी नदियों में दूर-दूर तक पानी नहीं नजर आ रहा है। बुंदेलखंड की पहज, धसान, सौर, नारायणी जैसी कई नदियां वैसे ही मृतप्राय हो चुकी हैं। सागर की बेबस नदी अपनी बेबसी पर आंसू बहाती रहती है। अवैध रेत खनन के कारण अब यमुना और बेतवा जैसी नदियों के पाट भी सूखने लगे हैं। नदियों के तटवर्ती गांव पांच-पांच किमी की दूरी तय करके किसी तरह अपनी जान बचा रहे हैं। जिन गांवों के आस-पास कहीं भी पानी का इंतजाम नहीं है उन गांवों के लोग पानी और रोटी के लिए महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। बुंदेलखंड के विभिन्न स्वयंसेवी संगठनो की सर्वे रिपोर्ट और सरकार के पल्स पोलियो अभियान के आंकड़ों पर गौर करें तो यूपी के हिस्से के बुंदेलखंड की करीब एक करोड़ की आबादी में पिछले एक दशक के दौरान करीब 45 लाख लोग यहां से पलायन कर चुके हैं। कुछ साल पहले तक लोग अपने भूखे बच्चों की भूख मिटाने के लिए रोजी-रोटी की तलाश मे परदेश कमाने जाते थे। अब भूख और प्यास दोनों से बचने के लिए दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, मंबई, कोलकाता जैसे महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। स्वयंसेवी संगठनों के अनुसार बुंदेलखंड छोड़कर जाने वालों का प्रतिशत इसी जून माह में 50 फीसदी का आंकड़ा पार कर सकता है।
हमारे राजनीतिक दलों के अधिकांश बड़बोले नेताओं को जाति, धर्म और वंशावलियों से फुर्सत मिले तो वे इन मजदूरों की दीन दशा पर दृष्टिपात करें। बुनियादी मुद्दों से मुंहमोड़ कर लड़ा जाने वाला चुनाव कितना टिकाऊ होगा यह तो समय की बताएगा किन्तु तब तक पलयन के लिए विवश कृषक से श्रमिक बने दीन-हीन इंसानों की चिंता भी करनी जरूरी है।
बुंदेलखंड के बांदा जिले की जनसंख्या लगभग 17,99,541 है। पल्स पोलियो अभियान के तहत वर्ष 2017 में पाया गया कि जिले के 18,721 मकानों में ताले बंद है। लगभग 38,783 घरों में सिर्फ बुजुर्ग बचे हैं। बाकी सब परदेश कमाने चले गए हैं। बांदा में काम करने वाले स्वयंसेवी संगठनों के अनुसार बुंदेलखंड के गांवों, कस्बों शहरों से करीब 5 लाख लोग परदेश में रोजी रोटी कमा रहे हैं। इसी तरह चित्रकूट जिले की जनसंख्या लगभग 9,90,626 है। जिसमें लगभग 4.5 लाख लोग कमाने के लिए दिल्ली, लखनऊ, सूरत, मुंबई और कोलकाता जैसे महानगरों में जा चुके हैं। महोबा जिले के 8,78,055 की आबादी में करीब 4 लाख लोग परदेश कमाने चले गए हैं। हमीरपुर के 11,04,021 में करीब 5 लाख लोग जिले से बाहर रहकर मजदूरी कर रहे हैं। जालौन जिले की 16,70,718 की आबादी में 7 लाख से ज्यादा लोग विभिन्न शहरों महानगरों मे रोजी रोटी कमा रहे हैं। ललितपुर के 12,18,002 और झांसी जिले के 20,00,755 लोगों की आबादी में करीब 14 लाख लोग जिले से बाहर रहकर अपने बच्चों का भरण पोषण कर रहे हैं। बुंदेलखंड विकास परिषद के अनुसार रोजगार और पानी की समस्या के कारण बुंदेलखंड के करीब 40 लाख लोग लखनऊ, दिल्ली, रायबरेली, मुंबई, सूरत, चंडीगढ़, भोपाल, हरियाणा और गोवा में मजदूरी कर रहे हैं। हर साल यह संख्या थमने के बजाय बढ़ती जा रही है।
ग्रामीण पलायन रोकने के लिए सरकार अनेक विकास योजनाएं उपेक्षित वर्गों के लिए चला रही है किन्तु जमीनी सच्चाई यही है कि यिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण उन्हें योजनाओं की सही जानकारी ही नहीं है। महिलाओं के लिए भी स्वयंसहायता समूहों के जरिए विभिन्न व्यवसाय चलाने, स्वरोजगार प्रशिक्षण, राष्ट्रीय परिवार लाभ योजन आदि अनेक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं किन्तु इनमें भी लगभग वही स्थिति है। जो रास्ता दिखाते हैं वहीं उन्हें लूटने लगते हैं। सरकार ने इस दिशा में यह कदम भी उठाया कि सहायता राशि सीधे बैंकों में जाए किन्तु बैंकों का डिजिटल हो जाना कम्प्यूटर का ज्ञान न रखने वालों के लिए मुसीबत बनता रहता है। एटीएम पर होने वाली धोखाधड़ी की घटनाएं आए दिन प्रकाश में आती रहती हैं। कृषकों का मजदूरों के रूप में पलायन करने की समस्या के आकलनकर्त्ताओं के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में परम्परागत कृषि के स्थान पर पूंजी आधारित व अधिक आय प्रदान करने वाली खेती को प्रोत्साहन दिया जाए जिससे किसानों के साथ-साथ सीमांत किसानों और मजदूरों को भी ज्यादा से ज्यादा लाभ हो सके। सिंचाई सुविधा, जल प्रबन्ध इत्यादि के माध्यम से कृषि भूमि क्षेत्र का विस्तार किया जाए जिससे न केवल उत्पादन में वृद्धि होगी साथ ही आय में भी वृद्धि होगी और किसानों में आत्मविश्वास व स्वाभिमान जागृत होगा जिससे ग्रामीण पलायन रुकेगा।
असंगठित एवं अकुशल मजदूरों की भीड़ का दबाव अर्थव्यवस्था पर पड़ने और इन मजदूरों को शोषण से बचाने के लिए व्यापक दृष्टिकोण से सोचना होगा और मजबूत कदम उठाने होंगे। जिस प्रजा पर शासन करने के लिए चुनाव लड़े जा रहे हैं, उनकी भलाई के बारे में सोचना प्रत्येक उम्मीदवार की जिम्मेदारी है, चाहे वह चुनाव में जीते अथवा हारे।
--------------------------
(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 01.05.2018)
#शरदसिंह #सागरदिनकर #दैनिक #मेराकॉलम #Charcha_Plus #Sagar_Dinkar #Daily #SharadSingh #चुनाव #मुद्दे #बुंदेलखंड #Election #Issue