Friday, March 1, 2019

बुंदेलखंड में अपराध का बढ़ता ग्राफ - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ... ' नवभारत ' में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh
आज ( 01.03.2019 )को #नवभारत " में प्रकाशित #बुंदेलखंड में बढ़ते अपराधों पर केंद्रित मेरा लेख....इसे आप भी पढ़िए !
🙏 हार्दिक धन्यवाद #नवभारत

बुंदेलखंड में अपराध का बढ़ता ग्राफ
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह                    
         सतना के दो जुड़वा बच्चों की नृशंस हत्या ने हर व्यक्ति के मानस को झकझोर दिया है। यूं तो सतना बघेलखंड में है लेकिन बुंदेलखंड से लगा हुआ है। उस पर जिन अपराधियों ने इस घटना को अंजाम दिया उनमें से मुख्य आरोपी बुंदेलखंड के हैं और जिस स्थान यानी चित्रकूट में घटना घटित हुई वह भी बुंदेलखंड में है। इस हृदयविदारक घटना के लिए कोई पुलिस व्यवस्था को जिम्मेदार ठहरा रहा है तो कोई उस सीमारेखा को जिससे बुंदेलखंड बंटा हुआ है और दशकों से वही चूहा-बिल्ली का खेल खेला जा रहा है जो प्रत्येक दो राज्यों की सीमा पर स्थित इलाकों में खेला जाता रहा है। अपराधी एक राज्य में अपराध कर के दूसरे राज्य में जा छिपते हैं और पुलिस कानूनी मसलों में उलझी रह जाती है। इस नृशंस घटना में कहां चूक हुई यह तो जांच पूरी होने पर ही पता चलेगा लेकिन इतना तो स्पष्ट दिख रहा है कि बुंदेलखंड में अपराधों का ग्राफ बढ़ता जा रही है। बहरहाल, मध्य प्रदेश के चित्रकूट में पांच वर्षीय दो जुड़वा भाइयों की हत्या से हर कोई सदमे में है। 20 लाख रुपये फिरौती लेकर भी बच्चों की निर्मम हत्या ने हर किसी को हिलाकर रख दिया है। इस वारदात पर बीजेपी और कांग्रेस के नेताओं के बीच सियासी जंग भी तेज हो गई है।
बुंदेलखंड में अपराध का बढ़ता ग्राफ - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ... ' नवभारत ' में प्रकाशित  An article of Dr (Miss) Sharad Singh in ' Navbharat ' on Crime in Bundelkhand
                  जुड़वां बच्चों की हत्या का घाव अभी आंखों के सामने आया ही था कि छतरपुर जिले में एक किशोरी पर एक युवक ने सिर्फ़ इसलिए जानलेवा हमला कर दिया कि उसने उस युवक का प्रेम प्रस्ताव ठुकरा दिया था। लगता यही है कि शासन किसी भी दल का रहे, अपराधियों कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। अपराधों के बहीखातों के पिछले कुछ पन्ने पलटें तो देख सकते हैं कि सन् 2010 की 04 मार्च को 18 वर्षीया संध्या रिछारिया को उनके पड़ोस में रहने वाले चार लड़कों ने बलात्कार के प्रयास के बाद मिट्टी का तेल डालकर जला दिया था। सागर जिले के छिरारी गांव में विजय रैकवार ने साढ़े सात साल की बच्ची की सात दिसम्बर 2012 को बलात्कार के बाद हत्या कर दी। छतरपुर के महाराजपुर थानांतर्गत ग्राम पुर के भागचंद पटेल ने 11 अक्टूबर 2015 को अपने सगे भाई ठाकुरदास और देवकी प्रसाद के साथ भतीजे अखिलेश की हत्या कर दी। 07 दिसम्बर 2017 को सागर के भानगढ़ थाने की 14 वर्षीय नाबालिग को देवल गांव में रब्बू उर्फ सर्वेश सेन ने अपनी हवस का शिकार बनाया । लड़की पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी। नाबालिग की अस्पताल में सात दिन बाद मौत हो गई। बुंदेलखंड में अपराध इतना बढ़ता जा रहा है की चोरी और हत्या आम बात हो गयी है

छतरपुर-दमोह में जहां देशी कट्टे और पिस्टल से जानलेवा हमले का चलन बढ़ा है तो सागर पिछले एक साल में चाकू-कटरबाजी की दर्जनों वारदातें हुईं। विगत वर्ष किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार शस्त्र संबंधी अपराधों में सबसे ज्यादा 236 प्रतिशत अपराध छतरपुर और दूसरे क्रम पर 203 प्रतिशत अपराध दमोह जिले के पुलिस थानों में दर्ज किए गए। सागर संभाग के पांच जिलों में 75 प्रतिशत वृद्धि के साथ शस्त्र संबंधी प्रकरणों में तीसरे नंबर पर और पन्ना जिले में पिछले तीन सालों 17 प्रतिशत वृद्धि देखी गई। उत्तरप्रदेश के हिस्से में फैले बुंदेलखंड के बांदा, कर्वी जैसे जिलों में मामूली बात में हथियारों का प्रयोग किया जाना आम बात है।  लड़कियों, महिलाओं और बच्चों की तस्करी के भी आंकड़े बुंदेलखंड के माथे पर जब तब दाग लगाते रहते हैं। देह व्यापार का बोलबाला भी कम नहीं है। बुंदेलखंड से तो लड़कियां महानगरों में भेजी ही जा रही हैं, वहीं महानगरों से लड़कियां देहव्यापार के लिए बुलाई भी जाती हैं।
बुंदेलखंड का ग्रामीण अंचल आज भी अशिक्षा और असुरक्षा के जाल में इस तरह जकड़ा हुआ हैकि वह अपने विरुद्ध होने वाले अपराधों के लिए आवाज़ भी बुलंद नहीं कर पाता है। उस पर अवैध हथियारों का दबाव उन्हें मुंह बंद रखने को विवश करता रहता है। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में सिर्फ़ राजनीतिक हल्ला बोल कर दशा नहीं सुधारी जा सकती है।  बुंदेलखंड में अपराधों के आंकड़े हमेशा स्थिति की गंभीरता की ओर संकेत करते रहे हैं, लेकिन उन लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा, जो इस दशा के लिए जिम्मेदार हैं। राजनीतिक शोर और चुनावी मुद्दों के बीच रह जाने वाली अपराधों की बढ़त की  समस्या आज भी जस के तस है। अब आशा यही की जानी चाहिए कि मासूम जुड़वा बच्चे प्रियांश और श्रेयांश का दुखद अंत वह जागरुकता ला सके जिससे इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो और अपराधों पर अंकुश लगे।             
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( नवभारत, 01.03.2019 )
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