Tuesday, April 18, 2023

पुस्तक समीक्षा | ‘‘आत्मान्वेषी’’: एक महत्वपूर्ण जीवनी का सुंदर नाट्यरूपांतर | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 18.04.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई  श्रीमती अर्चना मलैया की नाट्यकृति "आत्मान्वेषी" की समीक्षा... 
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पुस्तक समीक्षा
‘‘आत्मान्वेषी’’: एक महत्वपूर्ण जीवनी का सुंदर नाट्यरूपांतर
- समीक्षक  डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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नाटक     - आत्मान्वेषी
रूपांतरकार - श्रीमती अर्चना मलैया
प्रकाशक    - बीएफसी पब्लिकेशन प्रालि., सीपी-61, विराजखण्ड, गोमती नगर, लखनऊ- 226010
मूल्य       - 175/-
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आज जिस पुस्तक की समीक्षात्मक चर्चा मैं यहां करने जा रही हूं उसकी मूल शैली मंचीय नाटक की है। पुस्तक का नाम है -‘‘आत्मान्वेषी’’। इसका कथानक दो वीतरागी संतों के जीवन से संबद्ध है। एक आचार्य विद्यासागर तथा दूसरे उनके शिष्य मुनि क्षमासागर। इस नाट्यकृति में एक का जीवन है तो दूसरे का लेखन और चिन्तन है। अर्थात् एक महत्वपूर्ण जीवनी पर लेखिका अर्चना मलैया ने अपनी कलम चलाते हुए उसे नाट्यशैली में ढाला है। अतः नाट्यकृति ‘‘आत्मान्वेषी’’ पर दृष्टिपात करने से पूर्व दोनों संतों के बारे में जान लेना आवश्यक है।  

आत्मान्वेषण गहन दर्शन का विषय है। आत्मान्वेषण का शब्दिक अर्थ होता है आत्मनिरीक्षण या आत्मालोचन। इसे सरल शब्दों में कहें तो आत्मान्वेषण का अर्थ है स्वयं को जान लेना। स्वयं को पूरी तरह वही जान सकता है जो वीतरागी हो, अन्यथा संासारिक व्यक्ति तो सांसारिक वस्तुओं को जानने में ही भटकता रहता है। दिगंबर जैन संत आचार्यश्री विद्यासागर एक ऐसे ही वीतररागी हैं जो आत्मज्ञान प्राप्त कर कर चुके हैं। वीतरागी होने के कारण वे स्वयं के बारे में नहीं सोचते हैं वरन समस्त मानवता के लिए, समस्त जीवधारियों के लिए उनका चिंतन रहता है। वस्तुतः वे जैनाचार्य होने के सााि ही साहित्य सर्जक एवं समाजचिंन्तक भी हैं। उनके अनेक योग्य शिष्यों ने समाज और साहित्य में अपना उल्लेखनीय योगदान दिया है। उनके सुयोग्य शिष्यों में मुनि क्षमासागर का नाम लिया जा सकता है। 20 सितम्बर 1957 को जन्में तथा 13 मार्च 2015 को समाधिस्थ हुए मुनि क्षमासागर ने सागर विश्वविद्यालय से एमटेक की शिक्षा ली थी। किन्तु उनके मन में वैराग्यभाव उत्पन्न होने से उन्होंने 10 जनवरी 1980 को नैनागिरि तीर्थ में क्ष्ुाल्लक दीक्षा ली। फिर 7 नवम्बर 1980 को उन्हें ऐलक दीक्षा दी गई। यह उनकी सन्यास योग्यता का परिचायक पड़ाव था कि उन्हें 29 अगस्त 1982 को मुनि दीक्षा दी गई। मुनि क्षमासागर अपने सांसारिक जीवन में भले ही तकनीकी शिक्षा से जुड़े रहे किन्तु उनके भीतर सुप्त साहित्यिकता सन्यास के बाद जाग उठी। वे कवि थे, अनुवादक थे, संस्मरणकार थे, जीवनीलेखक थे और एक उच्चकोटि के प्रवचनकर्ता थे। उनके काव्य संग्रह हैं-‘‘पगडंडी सूरज तक’’, ‘‘मुनि क्षमासागर की कविताएं’’, ‘‘अपना घर’’ एवं ‘‘मैं तुम्हारा हूं’’। ‘‘एकीभाव स्तोत्र’’ उनकी अनुवाद कृति है। ‘‘आत्मान्वेषी’’ तथा ‘‘अमूर्त शिल्पी’’ उनकी संस्मरण पुस्तकें हैं। इनके अतिरिक्त उनके प्रवचनों को पांच पुस्तकों के रूप में प्रकाशित किया जा चुका है।
मुनि क्षमासागर ने आचार्यश्री विद्यासागर के विचारों से प्रभावित हो कर सांसारिकता का परित्याग करते हुए दीक्षा ली थी। आचार्यश्री उनके गुरु एवं पथप्रदर्शक थे। मुनि क्षमासागर ने ‘‘आत्मान्वेषी’’ के रूप में आचार्यश्री विद्यासागर की संस्मरणात्क जीवनी लिखी। आचार्य विद्यासागर का जन्म 10 अक्टूबर 1946 को कर्नाटक के बेलगाम जिले के सदलगा में शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। उनके पिता का नाम श्री मल्लप्पा था, और उनके माता का नाम श्रीमती था। इनके पिता बाद में मुनि मल्लिसागर बने और उनके माता जो बाद में आर्यिका समयामती बनी। आचार्य विद्यासागर जी को 1968 में अजमेर में 22 वर्ष की आयु में आचार्य ज्ञानसागर ने दीक्षा दी जो कि आचार्य शांतिसागर के वंश के थे। आचार्य विद्यासागर को 1972 में ज्ञानसागर जी द्वारा आचार्य पद दिया गया था। विद्यासागर जी के बड़े भाई ही गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हैं और उनके अलावा सभी घर के लोग सन्यास ले चुके हैं। उनके भाई अनंतनाथ और शांतिनाथ ने आचार्य विद्यासागर जी से दीक्षा ग्रहण की ओर मुनी योगसागर और मुनि समयसागर कहलाए। आचार्य विद्यासागर संस्कृत, प्राकृत, सहित कई आधुनिक भाषाओं हिंदी, मराठी और कन्नड़ में विशेष ज्ञान रखते हैं। उन्होंने हिंदी और संस्कृत के विशाल मात्रा में रचनाएं की है। उनकी कृतियों पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोधकार्य किए जाते हैं तथा पाठ्यक्रम में उनकी कृतियां पढ़ाई जाती हैं।

‘‘आत्मान्वेषी’’ में मुनि क्षमासागर ने आचार्यश्री की जो जीवनी लिखी है उसी को लेखिका अर्चना मलैया ने रंगमंच पर प्रस्तुत करने योग्य नाटक में ढाल दिया है। वस्तुतः यह उस स्थिति में अत्यंत दुरूह कार्य है जब आप जीवनी के मूल व्यक्ति एवं जीवनीकार के प्रति श्रद्धाभावना रखते हों। यह उस स्थिति में भी एक जोखिम भरा कार्य हो जाता है जब लेखन की मूल कथावस्तु दो संतों से कार्य एवं व्यक्तित्व से जुड़ी हो जिन पर जनसमूह अपार श्रद्धा रखता हो। ऐसी स्थिति में आवश्यक हो जाता है कि मूलकृति का केन्द्रीय आग्रह ज्यों का त्यों रहे और संवाद ऐसे हों जो बाल्यावस्था से दीक्षावस्था में पहुंच कर आचार्य बनने की कथा तो कहते हों किन्तु कहीं भी गरिमा भंग न करते हों। वहीं, यह महज एक धार्मिक ग्रंथ नहीं वरन साहित्यिक नाट्य कृति है अतः इसका साहित्यिकता की शर्तों को पूरा करना भी आवश्यक है। इस सभी बिन्दुओं को ध्यान में रखते हुए लेखिका अर्चना मलैया ने बड़ा सुंदर नाटक सृजित किया है। यह इस नाटक की सबसे बड़ी विशेषता कही जा सकती है कि इसे पढ़ते समय यह किसी कृति का रूपांतर नहीं अपितु मौलिक नाट्यकृति प्रतीत होती है। इस नाट्य रूपांतर की प्रक्रिया के बारे में लेखिका अर्चना मलैया ने आत्मकथन में लिखा है कि -‘‘‘‘एक दुर्लभ स्वप्न के साकार होने की जो रोमांचक अनुभूति होती है वही अनुभूति मैं ‘आत्मान्वेषी’ के नाट्य रूपान्तरण के संदर्भ में अपनी बात कहते हुए महसूस कर रही हूं। याद कर रही हूँ वह क्षण जब नागपुर के वरिष्ठ साहित्यकार श्री राजेन्द्र पटोरिया जी के सुझाव पर ‘मैत्री-समूह’ की सुश्री निशा जैन का फोन- भोपाल से आया था। उनका आग्रह था कि समाधिस्थ मुनि क्षमासागर जी द्वारा रचित ‘आत्मान्वेषी’ का नाट्य रूपांतरण मैं करूं। इस कार्य को अपना पुण्योदय मानकर मैंने तुरंत सहमति दे दी थी। उन्होंने शीघ्र ही मुझे पुस्तक आत्मान्वेषी उपलब्ध करायी। शीर्षस्थ साहित्यकार श्री यशपाल जी द्वारा लिखी भूमिका, मुनि क्षमासागर जी के चिंतन और नपे तुने शब्दों की असीम गहराई उस पर गुरूवर-108 विद्यासागर जी महाराज जैसे दिग्दिगन्त व्यापी आभा का चित्रण एक क्षण तो लगा कि मेरी बौनी कलम क्या न्याय करने में सक्षम हो जायेगी? फिर तुरंत ही रवीन्द्रनाथ टैगोर जी की वे प्रसिद्ध पंक्तियां मेरे जेहन में हठ पूर्वक मचल उठीं कि- ‘जितना संभव हो सकेगा मैं करूंगा नाथ।’ अपनी समस्त शक्तियों को समेट कर मैं नाट्य रूपातंरण के कार्य में जुट गई।’’

समूचा नाटक 16 दृश्यों में विभक्त है। इसमें कुल नौ पात्र हैं- मालप्पाजी (आचार्य विद्यासागर के पिता), मंा (आचार्य विद्यासागर की माताश्री), महावीर (बड़े भाई), शांतिनाथ (भाई), अनन्तनाथ (भाई), सुवर्णा (बहन), शांता (बहन), विद्याधर (संयास के पूर्व पुत्र विद्यासागर-शैशव, बचपन, युवावस्था तीन रूपों में), आचार्य (आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज), महिलर (1), महिला (2), नागरिक (4) तथा मुनि (4)।
आरम्भिक पृष्ठों में पाश्र्वस्वर और मुनि क्षमासागर की समर्पण रूपी कविता के उपरांत प्रथम दृश्य आचार्य विद्यासागर के जन्म के पूर्व उनके माता-पिता के मध्य संवाद से आरम्भ होता है। जिससे पता चलता है कि माता गर्भवती हैं तथा अपने गर्भस्थ शिशु को गर्भावस्था से ही योग्य बनाने की अभिलाषी हैं। दूसरे दृश्य में पिता मालप्पा और मां श्रीमती के पारस्परिक संवाद हैं। जिसमें श्रीमती अपना अनुभव बताती हैं कि वे पूर्व में भी गर्भधारण कर चुकी हैं किन्तु ऐसी अलौकिक अनुभूति उन्हें पहले कभी नहीं हुई। तीसरे दृश्य में पुत्र जन्म की घटना है और चौथे दृश्य में गीत के माध्यम से समय की गतिशीलता को दर्शाया गया है। शिशु शैशवावस्था से आगे 6-7 वर्ष की आयु का हो जाता है तथा इसमें बालसुलभ चेष्टाओं का वर्णन है। पांचवें दृश्य में पुत्र विद्याधर का अन्य बच्चों से अलग प्रतीत होना संवाद के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। छठे दृश्य में विद्याधर द्वारा एक घायल चिड़िया को ला कर उसके प्राण बचाने के प्रयास करना तथा चिड़िया के न बच पाने पर आहत हो उठना प्राणिमात्र के प्रति उनकी दयाभावना के प्रस्फुटन का संकेत देता है। यहां से विद्याधर की विद्यासागर बनने की यात्रा का अप्रत्यक्ष आरम्भ होता है। शेष दृश्यों में छोटी-छोटी रोचक घटनाओं को रखते हुए जीवनी के दृश्यों को आगे बढ़ाया गया है।

नाटक के संवाद पात्रों के अनुरुप सरल और सहज हैं। बालस्वरूप में माता-पुत्र के संवाद की बानगी देखिए-
‘‘विद्याधर (ठुनकते हुए)- हम जानते हैं तू रोकेगी... पर हम नहीं रूकेंगे। हम तुमसे घर से बाहर खेलने की जिद करेंगे और कहेंगे कि लो हम ये चले......हम जाते है मां। तुम पकड़ने आओगी... (अंगूठा दिखाते) पर हम पकड़ में थोड़े ही आयेंगे। (गर्व से ) बेटे हैं। ... अपनी मां के राजा।
श्रीमती जी (झूठा गुस्सा दिखाते) - कैंची की तरह जबान चलने लगी है तेरी। चल, भाग यहां से मुझे काम करने दे। अभी दही मथना है, मक्खन निकालना है फिर घी भी बनाना है। जा जरा बाहर खेल आ।
विद्याधर (जाते हुए ) - जाता हूं पर फिर कहना मत कि आता ही नहीं है खो जाता है।’’
लेकिन नाटक के अंतिम दृश्य तक आते-आते एक संत का चिंतन एवं गंभीरता संवादों में शनैः-शनैः स्थान लेने लगती है। दीक्षा के ठीक पूर्व अपना सर्वस्व त्याग करते समय भावी आचार्य वि़द्यासागर गुरुगंभीर घोषणा करते हैं जिसे शब्दों के चयन और विन्यास से सहज ही अनुभव किया जा सकता है-
‘‘विद्याधर- मैं सकल चराचर जीवों को क्षमा करता हूं, सभी मुझे क्षमा करें। मैं अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी के द्वारा प्ररूपित अनादिकालीन श्रमण धर्म की शरण को स्वीकार करता हूं। मैं समस्त पूर्वाचार्यो की शरण को स्वीकार करता हूं, मैं चरित्र चक्रवती दिगम्बर जैनाचार्य श्री शांतिसागर जी, आचार्य श्री वीरसागर जी, आचार्य शिवसागर जी महाराज की परंपरा में अपने साक्षात् गुरू श्री ज्ञानसागर जी महाराज की चरण शरण को स्वीकार करता हूं। पूज्य महाराज मुझे जैनेश्वरी दीक्षा देकर अनुग्रहीत करें।’’

नाटक ‘‘आत्मान्वेषी’’ जीवनी के नाट्य रूपांतर के रूप में एक उत्कृष्ट कृति है। इसकी खूबी यह भी है कि इसे एक ब्रोशर के रूप में भी काम में लाया जा सकता है क्योंकि इसमें नाटक के बाद के पृष्ठों पर नाटक के मंचन की तस्वीरें, नाट्य निर्देशक का परिचय, मंच से परे रह कर अपना योगदान देने वालों का विवरण तथा दर्शकों की प्रतिक्रियाएं भी दी गई हैं। यह नाट्यकृति हर उस व्यक्ति के लिए पठनीय है जिसे साहित्यिक अभिरुचि हो या धर्म और साहित्य दोनों में रुचि हो। यह एक विलक्षण बालक के संत बनने तक की यात्रा कथा है तथा अपने गुरु के प्रति एक मुनि का प्रणम्य लेखन है और एक लेखिका द्वारा इन दोनों पक्षों को सहेजते हुए नाटक में गूंथ देने का बेहतरीन उदाहरण है।
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