Wednesday, April 26, 2023

चर्चा प्लस | गोलियों की रासलीला से उपजे हुए प्रश्न | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
गोलियों की रासलीला से उपजे हुए प्रश्न  
     - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                   
          यह बाॅलीवुड वाली गोलियों की फिल्मी रासलीला नहीं, वरन गोलियों की सच्ची रासलीला थी जिसने ‘‘अतीक अहमद शूट आउटकांड’’ का एक पन्ना अपराध की इतिहास-कथा में जोड़ दिया। विभिन्न संदर्भों में इसे अनेक बार पढ़ा जाएगा जैसे मुंबई बम कांड को पढ़ा जाता है। लेकिन अतीक अहमद शूटआउट कांड ने बेंगलुरु के रेपिस्ट्स एन्काउन्टर कांड की याद दिला दी। निःसंदेह दोनों घटनाओं में कोई समानता नहीं है, यदि कोई समानता है तो अपराधी/अपराधियों को गोली मार दिए जाने पर जनमत से वाहवाही की। इसीलिए यदि बारीकी से देखा जाए तो अतीक अहमद शूटआउट कांड ने प्रश्नों की एक ऐसी पैदावार खड़ी कर दी है जिसे काटा जा सकेगा या नहीं यह भी अपने आप में एक प्रश्न है।  
वह रेल की बोगी में बैठा था। उसकी कमर में कमीज के नीचे पिस्तौल खुंसी थी जिसका ठंडा स्पर्श उसे रोमांचित कर रहा था। उसी दौरान कुछ कुछ ऐसा घटित होता है जिससे उसे गुस्सा आ जाता है लेकिन फिर पिस्तौल का स्पर्श उसे ‘‘भाईनुमा’’ होने का बोध कराता है और वह स्वयं के गुस्से पर काबू पा लेता है। कल तक जो झगड़े उसके लिए बड़े होते थे, आज वही झगड़े उसके लिए मामूली थे। इतने मामूली कि वह उनमें नहीं उलझना चाहता था। उसे तो कुछ बड़ा करना था। - ये घटना एस. हुसैन जैदी के उपन्यास ‘‘ब्लैक फ्राईडे’’ में वर्णित एक प्रसंग की झलक है। हूबहू नहीं, पर मूल यही सब कुछ जिसमें एक युवक के अपराध क्षेत्र में प्रवेश करने का मनोवैज्ञानिक पक्ष है। खोजी पत्रकार एस हुसैन जैदी का यह उपन्यास मुंबई बम धमाकों की सच्ची घटना पर आधारित यथार्थवादी कृति है। इस उपन्यास की चर्चा यहां मैं इसलिए कर रही हूं कि इस उपन्यास में अपराध जगत के कई चेहरे सामने आते हैं। उस ग्लैमर की भी परछाईं दिखती है जो बेरोजगार, कम पढ़े-लिखे युवाओं को अपनी ओर तेजी से आकर्षित करती है। निःसंदेह अपराध जगत का भी अपना एक ग्लैमर है जिसे दुनिया भर के फिल्म निर्माताओं ने बखूबी भुनाया है। समूचे अमेरिका के अपराध जगत पर राज करने वाले एक गैंगस्टर की कहानी पर आधारित फिल्म ‘‘गाॅड फादर’’ को भला कौन भुला सकता है? लेकिन अमेरिकी लेखक मारियो पूजो का अपराध अधारित यह उपन्यास एक ऐसे अपराधी के पैदा होने के कारणों पर भी प्रकाश डालता है जो भूख, ग़रीबी और सामाजिक दुत्कार से जूझता हुआ अपराध जगत की ओर मुड़ता है। लेकिन फिल्मी दुनिया ने इसे कुछ अधिक ही ग्लैमराईज् कर दिया। यही कहानी जब बाॅलीवुड में लाई गई तो उसमें ग्लैमर का तड़का लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई। चाहे ‘‘पुतलीबाई’’ का किस्सा हो या ‘‘फूलनदेवी’’ का, चाहे हाजीमस्तान का किस्सा हो या मुन्ना बजरंगी का - पहले बाॅलीवुड भर था अब ओटीटी प्लेटफार्म भी है जो अपराध के ग्लैमर को थाल में भर-भर के परोसता चला आ रहा है और फिर भी हम माथे पर हाथ दे कर सोचते हैं कि दिन-दहाड़े गोलियों की रासलीला क्यों होती है? गोलियों की इसी रासलीला के चलते अतीक अहमद मारा गया। मरने वाला तो खलनायक था, लेकिन मारने वाले हीरो बना दिए गए। इसे न्यायालयिक व्यवस्था की लम्बी चलने वाली प्रक्रिया के शाॅर्टकट के रूप में देखा गया। यही कारण था कि मारने वालों को वाहवाही मिली। यह बात और है कि आज हर वाहवाही और हर तिरस्कार मीडिया द्वारा गढ़ी गई और दिखाई गई छवि पर आधारित हो गया है। यह मान लिया जाता है कि टेलीविजन के न्यूज़ चैनलों जो दिखाया जा रहा है अथवा सोशल मीडिया पर जो ट्रेंड कर रहा है, वही अंतिम सत्य है। दरअसल, किसी को इससे अधिक जानने या सोचने की फ़ुर्सत भी नहीं है। जिन्दगी डिज़िटल्स की बाइनरी में उलझ कर रह गई है। नंबरों के बेजान खेल जीवित मनुष्यों को अपने तरीके से शह और मात में चला रहे हैं।      
यह सच है कि अपराध कथाएं इंसान को सदा रोमांचित करती हैं। लेकिन अपराध कथाओं या यूं कह लीजिए कि अपराध का अनुपात जनजीवन में इस कदर हावी होने लगा है कि अब रोमांच कम और भय का संचार अधिक होता है। कब कौन आपराधिक हरकत कर बैठे इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। समाज में बढ़ती जा रही उच्छृंखलता बार-बार चेतावनी देती आ रही है लेकिन हम सामाजिक प्राणी ही उसे अनसुना करते जा रहे हैं। यदि किसी लड़के को मनचाही लडकी का प्रेम नहीं मिल पाता है तो वह मजनूं बनने के बजाए उस लड़की को ही मौत की नींद सुला देता है। क्या यह घटना ख़ौफ़नाक़ नहीं है? एक पांच साल की नन्हीं बच्ची को कोई कथित अंकल चाॅकलेट का लालच दे कर उसे अपनी अमानुषिक वासना का शिकार बना लेता है, क्या यह डरावना नहीं है? ज़िन्दगी से जूझते परेशान हाल लोगों को महज़ दहशत फैलाने के लिए बम से सामूहिक रूप से मार दिया जाता है, क्या यह दहशतनाक नहीं है?

 सुनते तो यही आए हैं कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। लेकिन आजकल के सिक्के भी जो अपराध की ऐसी टकसाल से ढल कर निकल रहे हैं जिनके दो नहीं बल्कि अनेक पहलू हैं। ये टकसालें हमारी भीरुता और व्यवस्था की छिद्रता ने निर्मित की हैं।

अपराध के सिक्के का एक ग्लैमराईज़ पहलू वह था जब मीडिया में किसी हाॅलीवुड के हीरो की तरह कसाब का चित्र बहुचर्चित हुआ। न जाने कितने युवकों को उस चित्र के ग्लैमर ने वशीकृत किया होगा। बेशक़ कसाब को अंततः मृत्युदंड मिला लेकिन इससे पहले उसे जेल में जो सुविधाएं मुहैया कराई गईं उनका लेखा-जोखा भूख से पीड़ित युवकों को भ्रमित करने के लिए पर्याप्त रहा होगा। अपने और उससे भी बढ़ कर अपने परिवार के पेट की भूख ऐसी चीज है जो बड़े से बड़े अपराध को भी अराधियों की बड़ी खेप उपलब्ध करा देती है।

सिक्के का एक पहलू उस समय चमचमाता हुआ दिखा था जब बेंगलुरु में 27 वर्षीया डाॅक्टर को गैंगरेप के बाद अपराधियों द्वारा नृशंसतापूर्वक मार दिया गया था। उस समय जनाक्रोश उमड़ा। अपराधी पकड़े गए और एन्काउंटर में मारे गए। एन्काउंटर को संदिग्ध माना गया और जांच भी बिठाई गई मगर जनता की अदालत ने उक्त पुलिसबल को तत्काल क्लीनचिट दे दिया था। यह उन पुलिसवालों के प्रति जनता का मोह नहीं था बल्कि त्वरित न्याय की प्यास थी जो एन्काउंटर की ख़बर से बुझ गई थी। अर्थात् सोचना तो उस समय से ही चाहिए था कि यदि यह प्यास इतनी अधिक बढ़ चुकी है तो स्थिति चिंताजनक है। यानी न्याय-प्रक्रिया को आमूलचूल रीफाॅर्मेशन की जरूरत है। लेकिन इस घटना से जुड़े तमाम समाचारों के पहले पन्ने से आखिरी पन्ने तक आते-आते हमेशा की तरह उबाल ठंडा पड़ गया। आपराधिक मुकद्दमों के बोझ तले चरमराती अदालती व्यवस्थाएं ‘‘तारीख पर तारीख’’ का मुहावरा बन कर रह गईं और बाकी सब कुछ यथास्थिति चलता चला जा रहा है। ऐसे में यदि अतीक अहमद पुलिस की मौजूदगी में तीन लोगों द्वारा गोलियों से मार गिराया गया और इस घटना को ‘‘लाईव’’ किया गया तो इसमें बहुत बड़े आश्चर्य का विषय नहीं होना चाहिए। हम वही फसल काट रहे हैं जो दशकों से बोते चले आ रहे हैं। अपराध निद्र्वन्द्व होता जा रहा है और हम पराजित भाव से हर उस व्यक्ति की वाहवाही करने लगे हैं जो ‘‘त्वरित न्याय’’ की झलक दिखा देता है। लेकिन क्या यह सचमुच त्वरित न्याय है या फिर कोई गैंगवार या फिर कोई ऐसा पहलू जो पूरी तरह से अभी हमारे सामने नुमाया नहीं हुआ है?

यह सच है कि जब एक अपराधी जेल की सज़ा काटता है तो उसे अपने किए हुए अपराध के बारे में चिन्तन करने का और उस पर पछताने का समय मिलता है। लेकिन उन अपराधियों पर ठीक यही तर्क कैसे लागू किया जा सकता है जिन्हें जेल में ‘‘वीआईपी व्यवस्था’’ मिलती है और वे जेल से बैठ कर अपने आपराधिक साम्राज्य का इस तरह से संचालन करते हैं गोया वे अपने अभेद्य किले में बैठे हों। कुछ अपराधियों के केस इतने लम्बे चलते हैं कि तब तक साक्ष्य धुंधले पड़ जाते हैं और गवाहों के हौसले टूट जाते हैं। परिणाम रहता है अपराधी के पक्ष में। क्योंकि अपराधी भी कानून प्रणाली की इस कमजोरी का लाभ उठाना जानते हैं कि ‘‘चाहे दस अपराधी छूट जाएं लेकिन एक बेगुनाह को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए’’। अब बेगुनाह को सज़ा मिले या न मिले लेकिन अपराधियों की चांदी जरूर कटती रहती है।

अपराध जगत के सिक्के का एक पहलू यह भी है कि उपभोक्तावाद जरूरत बना दिया गया है। एक ऐसी चकाचैंध जो किसी भी कीमत पर सबकुछ पा लेने को प्रेरित करती है। इसलिए आज सिर्फ़ भूखे-प्यासे युवा ही नहीं बल्कि भरपेट खाते-पीते युवा और अधिक बढ़-चढ़ कर अपराध के दनदल में धंसते जा रहे हैं। बात वही है कि अपराध एक ग्लैमर की तरह स्थापित कर दिया गया है। एक शाॅर्टकट नहीं बल्कि कट-टू-कट रास्ता जिस पर चल कर ऐशोआराम और दबदबे के साथ जिया जा सकता है। इसका कारण भी वही है कि आज हम समाज में अपने राष्ट्रीय नायकों के महिमामंडन से कहीं अधिक राष्ट्रीय खलनायकों के महिमामंडन में रमे रहते हैं।

‘‘हम’’ यानी ‘‘हम’’! - संविधान के शब्दों में ‘‘हम भारत के लोग’’। अतः यदि कहीं कोई अपराध कारित होता है तो इसके लिए मात्र एक विचार नहीं, एक राजनीतिक दल नहीं, एक समुदाय नहीं वरन पूरा का पूरा समाज अर्थात् हम सभी दोषी हैं। हमने उस विषबेल को शुरू में नहीं उखाड़ फेंका जो आज हमारे जीवन में ज़हर घोल रही है, तो अब हम परस्पर एक-दूसरे पर जिम्मेदारी थोप कर खुद को बरी कर लेने की होड़ में जीने लगे हैं। क्या अब इसका कोई हल निकल सकता है? क्या व्यवस्थाएं सुधारी जा सकती है? क्या अपराध की निरंतर लम्बी होती छाया को छोटा किया जा सकता है? क्या इलेक्ट्राॅनिक मीडिया कभी अपने खुद के गिरेबां में झाकने का साहस जुटा पाएगा? इस तरह के अनेक प्रश्न हैं जो ‘‘अतीक अहमद शूटआउट कांड’’ के बाद नवांकुरों की तरह उठ खड़े हुए हैं। देखना यह है कि इनमें से कितने समय की तीखी धूप में झुलस कर मरते हैं और कितने जीवित रह कर सोचने के लिए मजबूर कर पाते हैं। 
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