Thursday, August 3, 2017

Dr (Miss) Sharad Singh at Pavas Vyakhyanmala 2017 Bhopal -1


Dr (Miss) Sharad Singh at Pavas Vyakhyanmala 2017 Bhopal, M.P. India
पावस व्याख्यानमाला में डॉ. शरद सिंह का व्याख्यान

      
सागर। मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति भोपाल द्वारा 28 से 30 जुलाई 2017 तक हिन्दी भवन, भोपाल में आयोजित तीन दिवसीय 24वीं पावस व्याख्यानमाला में ‘‘त्रिलोचन : गांव के कवि का सॉनेट शिल्प’’ विषय पर सागर की प्रतिष्ठित उपन्यासकार एवं समालोचक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने अपने व्याख्यान में शोधपरक लेखन पर बल देते हुए कहा कि त्रिलोचन के सॉनेट की तुलना शेक्सपियर के सॉनेट से करते हुए ही नहीं ठहर जाना चाहिए बल्कि सॉनेट के मूल स्थान ग्रीस, इटली और सिसली के सॉनेट की प्रवृत्तियों से तुलना करना चाहिए। क्योंकि शेक्सपीयर का सॉनेट एलीटवर्ग का सॉनेट था जबकि सिसली का सॉनेट कृषक और मजदूरवर्ग का था और इस प्रकार के सॉनेट ही त्रिलोचन ने लिखे हैं। यह भी याद रखा जाना चाहिए कि त्रिलोचन के सॉनेट में आयरिश और कैल्टिक प्रवृत्तियां भी हैं। त्रिलोचन के सॉनेट पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए डॉ. शरद सिंह ने मुक्तिबोध सृजन पीठ, सागर के अध्यक्ष रहे कवि त्रिलोचन से जुड़े अपने संस्मरणों को भी श्रोताओं से साझा किया।
     
कार्यक्रम में देश भर से आए विद्वानों में डॉ. डी. एन. प्रसाद, डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र, डॉ. स्मृति शुक्ला, श्री सूर्यप्रकाश जोशी, प्रो. रमेश दवे, मनोज श्रीवास्तव, रमेशचंद्र शाह, डॉ उर्मिला शिरीष, डॉ नीरजा माधव, राजकुमार सुमित्र, सुमन चौरे सहित मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति भोपाल के मंत्री संचालक कैलाशचन्द्र पंत, देवेन्द्र दीपक, डॉ. संतोष चौबे, रक्षा सिसोदिया, महेश सक्सेना, युगेश शर्मा आदि की उपस्थिति महत्वपूर्ण रही। अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार रमेश दवे ने की तथा संचालन डॉ. सुनीता खत्री ने किया।
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Dr (Miss) Sharad Singh at Pavas Vyakhyanmala 2017 Bhopal, M.P. India
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Dr (Miss) Sharad Singh at Pavas Vyakhyanmala 2017 Bhopal, M.P. India
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Dr (Miss) Sharad Singh at Pavas Vyakhyan Mala 2017 Bhopal - Train Journey

Sagar to Bhopal on Rajyarani Express ...
Dr (Miss) Sharad Singh at Pavas Vyakhyan Mala 2017 Bhopal - Train Journey....


Dr (Miss) Sharad Singh at Pavas Vyakhyan Mala 2017 Bhopal - Train Journey

Dr (Miss) Sharad Singh at Pavas Vyakhyan Mala 2017 Bhopal - Train Journey

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Dr (Miss) Sharad Singh at Pavas Vyakhyan Mala 2017 Bhopal - Train Journey


चर्चा प्लस ... जरूरी है जड़ों तक पहुंचना ... डॉ. शरद सिंह


Dr Sharad Singh
"सार्थक संवाद और शोधपूर्ण लेखन विचारों को जिस तेजी से उद्वेलित करता है, उतना ही दूरगामी प्रभाव भी छोड़ता है। यही मूल अवधारणा होनी चाहिए प्रत्येक साहित्यिक आयोजनों की जैसी कि #पावस_व्याख्यान_माला’ की अवधारणा है।"
.... पढ़िए मेरे कॉलम " #चर्चा_प्लस " सागर दिनकर (02.08.2017) में मेरा लेख "जरूरी है जड़ों तक पहुंचना" ।
 
चर्चा प्लस
जरूरी है जड़ों तक पहुंचना  
- डॉ. शरद सिंह
 
अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की बाढ़ और अंग्रेजी की ओर अभिभावकों की अंधी दौड़ ने मातृभाषाओं को उपेक्षित कर दिया है। दिलचस्प बात तो यह है कि हिन्दी के प्राध्यापक, साहित्यकार एवं पक्षधर भी इस अंधी दौड़ में सम्मिलित हैं। हिन्दी के लिए उपजे ऐसे कठिन दौर में कुछ आयोजन ऐसे भी हैं जो हिन्दी के मान को बचाए रखने के प्रति आश्वस्त कराते हैं। ऐसा ही एक आयोजन है -‘पावस व्याख्यान माला’ जो प्रदेश की राजधानी भोपाल में प्रति वर्ष आयोजित किया जाता है। मेरी लगातार तीन वर्ष की सहभागिता का अनुभव मुझे भरोसा दिलाता है कि हिन्दी के प्रति सत्यनिष्ठा से काम करने वाले अभी भी बहुसंख्यक हैं।

कभी-कभी ऐसा लगता है कि हमारी सारी विद्वता, सारी सोच अंग्रेजों के बनाए माप-दण्ड के अनुरूप चलती है। हम शेक्सपियर, शैली और कीट्स के इतर साहित्य को जानने से कतराते हैं। सोवियत संघ के युग में आम आदमी ने टॉल्सटॉय, गोर्की और पुश्किन के साहित्य को जाना। उससे कुछ आगे फ्रैंज काफ्का, सार्त्र और कामू को पढ़ा। आज ‘ अलकेमिस्ट’ के लेखक पाओलो कोएलो को भी हिन्दी लेखक और पाठक कम ही जानते हैं। जो जानते हैं उनमें भी पाओलो कोएलो की साहित्यिक प्रवृत्तियों को समझने वाले कम ही हैं। अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की बाढ़ और अंग्रेजी की ओर अभिभावकों की अंधी दौड़ ने मातृभाषाओं को उपेक्षित कर दिया है। ऐसी दशा में आज हमें मेहनत करनी पड़ेगी त्रिलोचन के सॉनेट की मूलप्रवृत्तियों को समझने के लिए। खैर त्रिलोचन और उनके सॉनेट की बात मैं बाद में करूंगी पहले उस आयोजन के बारे में जहां त्रिलोचन और उनके सॉनेट को पूरी आत्मीयता से याद किया गया। विगत 24 वर्ष से मध्यप्रदेष राष्ट्रभाषा प्रचार समिति भोपाल द्वारा ‘पावस व्याख्यान माला’ का आयोजन किया जा रहा है। इस वर्ष भी 28 से 30 जुलाई 2017 तक हिन्दी भवन, भोपाल में 24वीं पावस व्याख्यानमाला का तीन दिवसीय आयोजन किया गया। व्याख्यान के लिए चार विषय चुने गए थे - रामायण में प्रतिष्ठापित मूल्यों की सार्वभौमिकता, अमृतलाल नागर के उपन्यासों का वैशिष्ट्य, त्रिलोचन : गांव के कवि का सॉनेट शिल्प तथा चौथा विषय था लोक साहित्य में संस्कृति की मधुरिम छटा। जितना सच यह है कि लोक साहित्य ने हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाया है उतना ही सच यह भी है कि पाश्चात्य साहित्यिक प्रवृत्तियों ने भी हिन्दी साहित्य को विस्तार दिया है। इस क्रम में सॉनेट का स्थान सबसे पहले आता है। पश्चिमी जगत की साहित्यिक विधा सॉनेट को भारतीय परिवेश में ढालने का श्रेय यदि किसी को है तो वह है कवि त्रिलोचन शास्त्री को। 
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
 
हिन्दी साहित्य के काव्य इतिहास में सॉनेट को पूरी भारतीयता के साथ समावेशित करने का श्रेय त्रिलोचन शास्त्री को ही है किन्तु उनके देहान्त के बाद मानो साहित्य जगत ने त्रिलोचन के सॉनेट को महाविद्यालयीन पाठ्यक्रम के एक लघु अध्याय के रूप में लेख कर के छोड़ दिया। यह महत्वपूर्ण रहा कि मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, भोपाल ने अपनी 24 वीं पावस व्याख्यानमाला में त्रिलोचन के सॉनेट पर पूरा एक सत्र समर्पित किया। विषय था -‘‘त्रिलोचन : गांव के कवि का सॉनेट शिल्प’’। इस सत्र में मैंने कवि त्रिलोचन जी को याद करते हुए अपनी उन स्मृतियों को सबके साथ साझा किया जब त्रिलोचन जी सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध सृजन पीठ में अपने प्रथम कार्यकाल में पदस्थ थे। जितने ख्यातिनाम, उतने ही सहज व्यक्ति। उन दिनों मैं नवगीत लिखा करती थी (आज भी यदाकदा नवगीत लिखती हूं।) मैं चाहती थी कि त्रिलोचन जी मेरे नवगीतों पर अपनी राय दें। विश्वविद्यालय कैंपस में उनके निवास पर ही मुक्तिबोध पीठ का कार्यालय था। इसलिए प्रथम परिचय में ही उनकी धर्मपत्नी से भी मेरा परिचय हो गया। अत्यंत ममतामयी स्त्री थीं वे। दिलचस्प बात यह है कि दो मुलाक़ातों के बाद अचानक घर-परिवार की चर्चा निकली और तब त्रिलोचन जी ने मुझसे मेरे परिवार के बारे में पूछा कि मैं किस परिवार से हूं, घर में कौन-कौन हैं आदि-आदि? मैंने उन्हें जब अपनी माता जी डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ के बारे में बताया तो उन्हें सुखद आश्चर्य हुआ और वे मुझे लगभग डपटते हुए बोले,‘‘पहले क्यों नहीं बताया कि तुम विद्यावती ‘मालविका’ जी की बेटी हो और संत श्यामचरण जी की नातिन हो!’’
त्रिलोचन जी से पारिवारिक परिचय निकल आया। मैं उन्हें ‘अंकल’ और उनकी धर्मपत्नी को ‘आंटी’ कह कर पुकारती थी। त्रिलोचन जी ने जब मेरे नवगीत देखे तो मुझे सलाह दी कि उन नवगीतों को संग्रह के रूप में प्रकाशित करा लूं। मैंने उनसे पूछा कि कौन प्रकाशक छापेगा इन्हें? इस पर उन्होंने भी दो-टूक उत्तर दिया कि कोई नहीं, पहला संग्रह तुम्हें स्वयं अपने खर्चे पर छपवाना होगा। अंततः सागर के स्थानीय मुकेश प्रिंटिंग प्रेस से मेरा नवगीत संग्रह ‘‘आंसू बूंद चुए’’ सन् 1988 में प्रकाशित हुआ। अपने वादे के अनुरूप जिसका बर्ल्ब स्वयं त्रिलोचन जी ने लिखा था।
यहां मुझे स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि उन दिनों त्रिलोचन जी से उनके सॉनेट्स सुन कर मैंने भी हाथ आजमाने का प्रयास किया था। गिनती के दस सॉनेट्स लिखने के बाद ही मुझे समझ में आ गया कि यह विधा देखने में भले ही सरल लगे किन्तु लिखने में बहुत कठिन है।
मुक्तिबोध पीठ में त्रिलोचन जी का दूसरा कार्यकाल विषादयुक्त रहा। उस दौर में उन्होंने अपनी जीवनसंगिनी को खो दिया था और धीरे-धीरे वे स्मृतिभ्रम के शिकार होते जा रहे थे। तमाम विपरीत परिस्थितियां होते हुए भी साहित्य के प्रति उनका उत्साह यथावत रहा। वे अकसर अपने सॉनेट्स की चर्चा किया करते। सॉनेट विधा से उन्हें विशेष लगाव-सा हो गया था। वे कहा करते थे कि ‘‘सॉनेट में मैं अपनी बात अधिक स्पष्ट रूप से कह पाता हूं।’’ मुझे लगता है कि सॉनेट के प्रति उनका यह विश्वास उनके भीतर मौजूद उस व्यक्ति का विश्वास था जो जमीन से जुड़ा हुआ था और आमजन की बातें करना बखूबी जानता था।
त्रिलोचन जी के सॉनेट्स के संदर्भ में एक और घटना मुझे याद आ रही है जिसका यहां मैं उल्लेख करना चाहूंगी। इसी वर्ष, विश्व पुस्तक मेला 2017 में सामयिक प्रकाशन के स्टॉल पर मैं, अशोक वशिष्ठ और नंदभारद्वाज जी बैठे थे, साहित्यिक चर्चा कर रहे थे कि बातों ही बातों में भारतीय साहित्य में पाश्चात्य शैली के प्रभाव की चर्चा चल पड़ी। वहीं पुस्तक पलटते खड़े हुए एक युवक ने अचानक हस्तक्षेप करते हुए पूछा,‘‘त्रिलोचन शास्त्री जी ने भी तो पाश्चात्य शैली को अपनाया। उन्होंने सॉनेट लिखे। क्या उन्हें भारतीय पारम्पिरिक काव्य की शैलियां कम महसूस हुईं?’’
हम तीनों चौंके। पहली बात तो यह कि वह युवक पुस्तक जरूर पलट रहा था लेकिन उसका ध्यान हम लोगों के विचार-विमर्श पर केन्द्रित था। दूसरी बात कि उसने जिस ढंग से हम लोगों के सामने प्रश्न उछाला उससे साफ़ पता चल रहा था कि वह भी बहस में शामिल होना चाहता है। बल्कि शामिल ही नहीं, बहस को आगे भी बढ़ाना चाहता है। उसकी यह जिज्ञासु प्रवृत्ति अच्छी लगी। चर्चा के अंत में उसने स्वयं ही अपना परिचय दिया कि वह जेएनयू का छात्र है और हिन्दी साहित्य की पाश्चात्य प्रवृत्तियों पर ही शोध कर रहा है। अतः स्वाभाविक था उसका इस तरह बहस में शामिल होना। मैंने उस युवक से कहा कि किसी भी साहित्यकार को सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है। किसी कवि से इस बात की अपेक्षा रखना तर्कसंगत नहीं है कि उसे परंपरागत शैलियों में ही लिखना चाहिए अथवा पाश्चात्य शैली के स्थान पर देशज शैली को अपनाना चाहिए। साहित्यसृजन बलात् नहीं किया जाता। यह भावों, संवेगों और अभिव्यक्ति के संयुक्त उद्घाटन होता है और यह उद्घाटन कवि किस ढंग से करना चाहता है यह उसके मनोभावों पर, या कहा जाए तो उसकी इच्छा पर निर्भर होता है। न तो किसी से बलपूर्वक ग़ज़ल लिखवाई जा सकती है और न किसी से बलपूर्वक गीत लिखवाया जा सकता है। जहां तक मेरा मानना है कि साहित्यिक अभिव्यक्ति अपनी काया स्वयं चुनती है।
त्रिलोचन शास्त्री ने सन् 1950 के आस-पास सॉनेट लिखना आरम्भ किया। यह माना जाता है कि उन्होंने अपनी प्रयोगधर्मिता का समावेश करते हुए अपने अधिकांश सॉनेट्स पेटार्कन एवं शेक्सपीयरन शैली में ही लिखे हैं। शिल्प का आधार भले ही आयातित हो किन्तु त्रिलोचन ने भाव, विचार और शिल्प को ‘त्रिलोचनीय’ अर्थात् मौलिक रूप दिया। जहां तक मेरा मानना है कि समालोचना के दौरान लेखन हमेशा शोधपूर्ण होना चाहिए। यानी पहले जड़ों तक पहुंचो, फिर लिखो। हमें त्रिलोचन के सॉनेट की तुलना शेक्सपियर के सॉनेट से करते हुए ही नहीं ठहर जाना चाहिए बल्कि सॉनेट के मूल स्थान ग्रीस, इटली और सिसली के सॉनेट की प्रवृत्तियों से तुलना करना चाहिए। क्योंकि शेक्सपीयर का सॉनेट एलीटवर्ग का सॉनेट था जबकि सिसली का सॉनेट कृषक और मजदूरवर्ग का था और इस प्रकार के सॉनेट ही त्रिलोचन ने लिखे हैं। यह भी याद रखा जाना चाहिए कि त्रिलोचन के सॉनेट में आयरिश और कैल्टिक प्रवृत्तियां भी हैं।
बात फिर वहीं जा पहुंचती है कि यदि ‘पावस व्याख्यान माला’ जैसा आयोजन नहीं होता तो मुझे त्रिलोचन के सॉनेट की जड़ों की प्रत्यक्ष चर्चा करने का उन्मुक्त अवसर नहीं मिलता। सार्थक संवाद और शोधपूर्ण लेखन विचारों को जिस तेजी से उद्वेलित करता है, उतना ही दूरगामी प्रभाव भी छोड़ता है। यही मूल अवधारणा होनी चाहिए प्रत्येक साहित्यिक आयोजनों की जैसी कि ‘पावस व्याख्यान माला’ की अवधारणा है। मैं तो यूं भी लेखन में शोधपूर्ण तथ्यात्मक लेखन की पक्षधर रही हूं। क्योंकि शोध और सत्य की मज़बूत जड़ें ही लेखन रूपी वृक्ष को फलदायी बनाती हैं।
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#त्रिलोचन #अवधारणा #कैल्टिक #इटली #सिसली #आयरिश #पावस_व्याख्यान_माला #भोपाल #सागर #सॉनेट #साहित्यिक_आयोजन

Wednesday, July 26, 2017

चर्चा प्लस ... लिपस्टिक के बहाने स्त्रीपक्ष में बहस ... डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
हाल ही में रिलीज़ "लिपस्टिक अंडर माई बुर्का" पर आज (26.07.2017) मेरा कॉलम #चर्चा_प्लस दैनिक "सागर दिनकर" में पढ़िए ...."अलंकृता श्रीवास्तव की फिल्म ‘‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’’ ने इस बात को साबित कर दिया है कि आज की महिला फिल्म निर्देशक घाटे के जोखिम से निपटना बखूबी जानती है। स्त्री यौनिकता का संवेदनशील विषय को सामने रख कर वह स्त्री की स्वतंत्रता के पक्ष में आवाज़ बुलंद करती है और साथ ही अपने आर्थिक घाटे की संभावना को भी चतुराई से बचा ले जाती है।"

चर्चा प्लस
लिपस्टिक के बहाने स्त्रीपक्ष में बहस
- डॉ. शरद सिंह 

किसी स्त्री की स्वतंत्रता का अर्थ क्या हो चाहिए? आर्थिक स्वतंत्रता या यौनिक स्वतंत्रता अथवा दोनों या दोनों नहीं। प्रश्न पेंचीदा हैं। तय स्वयं स्त्री को करना है कि वह किस सीमा तक और कैसी स्वतंत्रता चाहती है। निर्देशक अलंकृता श्रीवास्तव द्वारा निर्देशित स्त्री के पक्ष में महत्वाकांक्षी फिल्म ’लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ इस प्रश्न को बड़ी शिद्दत से उठाती है और एक बहस छोड़ जाती है दर्शकों के मन-मस्तिष्क में। लिपस्टिक स्त्री के श्रृंगार का एक हिस्सा ही नहीं वरन् उसके अधिकार का प्रतीक है जिसे वह समाज के सामने लाना चाहती है पूरी खूबसूरती के साथ। फिर भी अनेक ऐसे प्रश्न हैं जो एक बार फिर बहस का आग्रह करते दिखाई देते हैं।
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

स्त्री अधिकारों के पक्ष में फिल्म जगत ने यू ंतो हमेशा पहल की है लेकिन जब ये स्त्री निर्देशकों और निर्माताओं ने इस क्षेत्र में क़दम रखा तब से एक अलग ही रंग इस तरह की फिल्मों में दिखाई देने लगा। यह अलग रंग बॉक्स ऑफिस का जोखिम माना जाता रहा है। भारतीय सिने जगत में अल्पसंख्यक होते हुए भी महिला निर्देषकों ने साहस के साथ इस जोखिम को बार-बार उठाया लिया। अपने परिवार के लिए एक-एक पैसे जोड़ने पर विष्वास रखने वाली महिलाएं जब सिने जगत में निर्देषक के रूप में प्रविष्ट हुईं तो उनमें से अधिकांष ने फिल्म के माध्यम से पैसे कमाने का उद्देष्य त्याग कर सामाजिक, पारिवारिक एवं वैष्विक मुद्दों पर फिल्में बनाईं, वह भी बिना किसी ‘फिल्मी-मसाले’ के।
जब प्रश्न भारतीय सिनेमा का उठता है तो आमतौर पर महिलाओं की विस्तृत भूमिका अभिनय और संगीत तक सिमटी दिखाई देती है। नायिका, खलनायिका, चरित्र अभिनेत्री अथवा पार्श्व गायिका पर जा कर स्त्री का अस्तित्व सिमटता दिखता है। भारतीय सिने जगत में महिला गीतकारों को भी उंगलियों पर गिना जा सकता है और निर्देशकों को भी। यद्यपि भारतीय सिनेमा में महिला निर्देशकों की शुरूआत बहुत पहले हो गई थी जब अपने समय की प्रसिद्ध अभिनेत्री फातिमा बेगम ने सन् 1926 में मूक फिल्म ‘बुलबुल ए परिस्तान’ का निर्देशन किया था। इसके लगभग 10 साल बाद सन् 1936 में अभिनेत्री नरगिस की मां जद्दन बाई ने फिल्म ‘मैडम फैशन’ का निर्देशन किया था। यह फिल्म हिट रही और इसके बाद उन्होंने ‘मोती का हार’ और ‘जीवन स्वप्न’ नामक फिल्मों का भी निर्देशन किया। इसके बाद शोभना समर्थ ने भी अभिनय के साथ ही फिल्म का निर्देशन का काम किया । फिर भी महिला फिल्म निर्देशक स्थायी रूप से अपनी उपस्थिति नहीं बनाए रख सकीं। कई अभिनेत्रियां ऐसी आई जिन्होंने अभिनय के साथ-साथ निर्देशन में भी हाथ आजमाया। इनमें थीं- शोभना समर्थ, साधना, तबस्सुम, हेमामालिनी, नीलिमा अजीम, सोनी राजदान, नंदिता दास और पूजा भट्ट। इन सभी अभिनेत्रियों ने निर्देशन के लिए या तो अभिनय क्षेत्र को त्याग दिया या फिर दोनों ही काम को बराबर करती रहीं। भारतीय सिनेमा में सिर्फ 9.1 फीसदी महिला निर्देशक हैं। यह अंतर्राष्ट्रीय मानक से थोड़ा ही ज्यादा है। अंतरराष्ट्रीय फिल्म उद्योग में फिल्में लिखने वाली महिलाएं ज्यादा हैं। भारत में यह हिस्सेदारी सिर्फ 12.1 फीसदी है। कैमरे के पीछे प्रति 6.2 पुरुषों की तुलना में एक महिला काम कर रही है।
सन् 2017 के मध्य में आई अलंकृता श्रीवास्तव की फिल्म ‘‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’’ ने इस बात को साबित कर दिया है कि आज की महिला फिल्म निर्देशक घाटे के जोखिम से निपटना बखूबी जानती है। स्त्री यौनिकता का संवेदनशील विषय को सामने रख कर वह स्त्री की स्वतंत्रता के पक्ष में आवाज़ बुलंद करती है और साथ ही अपने आर्थिक घाटे की संभावना को भी चतुराई से बचा ले जाती है। आज की महिला फिल्म निर्देशक व्यावसायिक क्षेत्र बारीकी से नज़र रखे हुए हैं। यह जरूरी भी है। क्यों कि जब आपकी बात अधिक से अधिक लोगों के पास पहुंचेगी तभी तो उस पर विचार-विमर्श होगा अन्यथा स्टूडियो की चौखट पर ही फिल्म भी दम तोड़ देगी। ‘‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’’ की पूरी टीम इस बात को भली-भांति जानती और समझती है।
‘‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’’ में पुरूष पितृसत्ता की वजह से इसके पीछे क्या चीजें होती है वो दिखाने की कोशिश की गई है। जहां एक लड़की लोगों के सामने डांस नहीं कर सकती क्योंकि ’लोग क्या सोचेंगे’. जहां एक अधेड़ उम्र की महिला अपने यौनिक रूचि-अरूचि के बारे में बात नहीं कर सकती। जहां एक पुरूष कभी भी सेक्स के लिए अपनी अपनी पत्नी की अनुमति या उसकी पसंद नापसंद के बारे में नहीं सोचता है। ‘‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’’ उन महिलाओं की आवाज है जो शायद ही कभी सुनी जाती है। दरअसल फिल्म में लिपस्टिक एक प्रतीक है स्त्री के अधिकारों का। लिपस्टिक चेहरे को सुंदर दिखाने के लिए लगाई जाती है लेकिन यदि चेहरा दिखाने की ही आजादी न हो तो? क्या स्त्री पुरुषों की भांति मनुष्य नहीं है जो उसके चेहरा दिखाने पर पाबंदी लगा दी जाती है। ऐसी पाबंदियां पहले घुटन, फिर क्रोध और फिर विद्रोह को जन्म देती हैं। यही इस फिल्म का मुख्य कथानक है।
‘’लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’’ के संदर्भ में एक और बात जिसने एक अलग ही बहस का इतिहास रच दिया। सेंसर बोर्ड द्वारा फिलम पर बैन लगा और फिर हटा लेकिन इन सबके विरोध में फिल्म की टीम ने साशल मीडिया पर एक फोटो-आंदोलन चलाया। फिल्म की चारों लीड स्टार्स ने फिल्म के पोस्टर के ही पोज में मिडिल फिंगर को दिखाते हुए तस्वीरें सोशल मीडिया पर अपलोड की। उन्होंने अपने फैन्स से आग्रह किया कि वो भी इसी पोज में अपनी तस्वीरें खींच कर भेजें। इसकी शुरूआत कोंकणा सेन शर्मा, रत्ना पाठक शाह, अहाना कुमरा और प्लबिता बोरठाकुर ने शुरू की है। इन सभी ने इसी मुद्रा में फोटो खिंचाई है। इसे ’लिपस्टिक रिबेलियन’ का नाम दिया गया है। चारो अभिनेत्रियों ने कहा कि एक महिला होने के नाते हम पर हमेशा ये बातें थोपी जाती हैं कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। इसलिए जिस प्रकार सभी ने मुद्रा बनाई है उसी तरह आप भी बनाये और फोटो साझा कर इस आंदोलन का हिस्सा बने। जोया अख्तर ने भी इसके सर्मथन में अपनी आवाज उठाई और अपनी तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट की। परिणाम रहा कि ’लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’ ने अपने तीसरे दिन नही कुल 2.41 करोड़ की कमाई की।
‘‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’’ में भोपाल की पृष्ठभूमि है। फिल्म वॉइस ओवर से शुरू होती है कि कैसे महिलाओं की जिंदगी में उदासी आ जाती है और फिर युवावस्था पीड़ा देने लगती हैं। इसके बाद शुरू होती है चार स्त्रियों की अलग-अलग कहानियां। चारों स्त्रियां सभी बंदिशों को तोड़कर यौनिक दमित समाज से बाहर निकलना चाहती है और वो जिंदगी अपने ढंग से जीना चाहती हैं जिसके बारे में उनका मानना है कि मनुष्य होने के नाते उनका अधिकार भी है।
एक स्त्री रेहाना ( पल्बिता बोरठाकुर ) है जो एक टीनएज है और जिसेघर में भी बुर्का में रहना पड़ता है। माइली सायरस (प्रसिद्ध युवा गायिका) बनना चाहती है। उसे लेड जेप का ‘‘स्टेयर वे टू हेवन’’ गाना पसंद है। वह कॉलेज में जीन्स पर बैन के ख़िलाफ आवाज़ उठाती है और दुकान से सामान भी चुराती है। दूसरी स्त्री शिरीन (कोंकणा सेन शर्मा) की है जो एक बुर्का पहनने वाली हाउसवाइफ है। जिसका रुढ़िवादी पति उसे उपभोग की वस्तु से अधिक कुछ नहीं समझता। वो अपनी खुशी के लिए घर-घर जाकर सेल्सगर्ल का काम करती है। तीसरी स्त्री लीला (आहना कुमारा) है जो एक पार्लर चलाती है। उसकी साच और अधिक खुलेपन की है। वह अपनी सुहागरात के लिए ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करना चाहती है और इसे लेकर कई सपने सजाती रहती है। चौथी स्त्री बुआ जी उर्फ उषा परमार (रत्ना पाठक शाह) है। वह 55 साल की महिला है जिसका यौन अस्तित्व समाज में स्वीकार्य नहीं है। वो तैराकी के लिए जाती है और नाम बदल कर फोन पर यौनिक बातें करती है। असल में ये चारों महिलाएं एक मिट्टी के घर में रहती है जो बुआ जी का है और बाकी तीनों इसमें किराएदार हैं।
इस कहानी के कई पक्ष ऐसे भी है जिनसे सभी लोग सहमत नहीं हो सकते हैं। जैसे हर स्त्री इस तरह यौनिक दबाव में नहीं रहती है कि अपनी भावनाओं को शांत करने के लिए नाम बदल कर फोन पर यौनिक बातें करने लगे। या फिर स्त्री की सारी स्वतंत्रता उसकी यौनिकता से हो कर ही गुज़रती है। सन् 1996 में दीपा मेहता ने फिल्म ‘फायर’ बनाई। इस फिल्म के कथानक एवं दृष्यांकन को ले कर जमकर विवाद हुआ। भारतीय सिने परिवेष के लिए ‘फायर’ का विषय अत्यंत नया और चौंकाने वाला था। इस फिल्म में बॉलीवुड की दो दमदार अभिनेत्रियों शबाना आजमी और नंदिता दास के माध्यम से दो महिलाओं के बीच के दैहिक संबंधों की कहानी प्रदर्षित की गई है।
नया विषय और वह भी स्त्री-जीवन से जुड़ा हो तो सभी को चौंकाता है। लोग रूचि भी लेते हैं और नाक-भौंह भी सिकोड़ते हैं। ‘‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’’ को भी इन सबसे गुज़रना पड़ा है। फिर भी जहां तक अभिनय की बात की जाए तो कोंकणा सेन शर्मा ने शिरीन के के पात्र को जिस तरह अभिनीत किया है, अद्भुत है। रत्ना पाठक शाह का अभिनय भी फिल्म में पर्याप्त प्रभावित करता है। आहना कुमारा का दमदार किरदार और पल्बिता बोरठाकुर का विद्रोही अंदाज भी प्रभाव डालता है। सुशांत सिंह, वैभव तत्ववादी भी अपना असर छोड़ते हैं। कुल मिला कर फिल्म बहुत कुछ सिखा जाती है-यौनिक दमन, यौनिक दमन के दुष्परिणाम और फिल्म का नया अर्थशास्त्र।
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#लिपस्टिक_अंडर_माय_बुर्का #अलंकृता_श्रीवास्तव #कोंकणा_सेन_शर्मा #रत्ना_पाठक_शाह #सुशांत_सिंह

Wednesday, July 12, 2017

चर्चा प्लस ... पीड़ित बेटियां और विषपान करते शिव ... डॉ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh
बैलों के स्थान पर जुती हुई दो बेटियों की अखबारों में छपी तस्वीर ने सोचने पर विवश कर दिया है कि प्रत्येक समुदाय में धर्मध्वजा उठाए रखने वाली और संस्कृति को प्रवाहमान बनाए रखने वाली बेटियां कब तक असुरक्षित रहेंगी?
पढ़िए "पीड़ित #बेटियां और #विषपान करते #शिव" मेरा कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 12.07. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper...

चर्चा प्लस
 पीड़ित बेटियां और विषपान करते शिव
 - डॉ. शरद सिंह

आए दिन समाचारपत्र भरे रहते हैं बेटियों के प्रताड़ित होने के समाचारों से। कभी हत्या तो कभी बलात्कार तो कभी किसी अन्य तरह का शारीरिक उत्पीड़न। उस पर बैलों के स्थान पर जुती हुई दो बेटियों की अखबारों में छपी तस्वीर ने सोचने पर विवश कर दिया है कि प्रत्येक समुदाय में धर्मध्वजा उठाए रखने वाली और संस्कृति को प्रवाहमान बनाए रखने वाली बेटियां कब तक असुरक्षित रहेंगी? आज के सामाजिक एवं सुरक्षा संबंधी समुद्र मंथन में बेटियों का शोषण रूपी विष बढ़ता जा रहा है और मानो शिव का कण्ठ उसे धारण करने के लिए छोटा पड़ता जा रहा है। क्या हम शिव के तांडव की प्रतीक्षा कर रहे हैं?
Charcha Plus ..  Dr (Miss) Sharad Singh

सावन का महीना और सोलह सोमवार के व्रत का घनिष्ठ संबंध है। हिन्दू परिवारों की बेटियां बड़े उत्साह से सोलह सोमवार का व्रत रखती हैं और मनचाहे जीवन साथी तथा सुखद जीवन की कामना करती हैं। ये बेटियां भगवान शिव की पूजा-आराधना करती हैं। वही भगवान शिव जिन्होंने जगत् कल्याण के लिए विषपान किया था और नीलकण्ठ कहलाए थे। ‘शिवपुराण’ के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान जब देवतागण एवं असुर पक्ष अमृत-प्राप्ति के लिए मंथन कर रहे थे, तभी समुद्र में से कालकूट नामक भयंकर विष निकला। उस विष की अग्नि से दसों दिशाएं जलने लगीं और देवताओं और दैत्यों सहित ऋषि, मुनि, मनुष्य, गंधर्व और यक्ष आदि उस विष की गर्मी से जलने लगे। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने भयंकर विष को अपने शंख में भरा और भगवान विष्णु का स्मरण कर उसे पी गए। भगवान विष्णु अपने भक्तों के संकट हर लेते हैं। उन्होंने उस विष को शिवजी के कंठ (गले) में ही रोक कर उसका प्रभाव समाप्त कर दिया। दुख तो इस बात का है कि आज के सामाजिक एवं सुरक्षा संबंधी समुद्र मंथन में बेटियों का शोषण रूपी विष फैलता जा रहा है और मानो शिव का कण्ठ उसे धारण करने के लिए छोटा पड़ता जा रहा है। क्या हम भगवान शिव के तांडव की प्रतीक्षा कर रहे हैं?
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के गृह ज़िले सीहोर में आर्थिक तंगी से जूझ रहे किसान द्वारा खेत जोतने के लिए बैल की जगह बेटियों से हल खिंचवाने की तस्वीरें सामने आने के बाद से सोशल मीडिया से ले कर विपक्षी दलों तक में जागरूकता की लहर दौड़ गई। प्रिंट मीडिया ने तो अपना दायित्व निभाया लेकिन ऐसा लगा जैसे विपक्षी दलों को कोई खज़ाना हाथ लग गया हो। यह घटना राज्य के सीहोर ज़िले के बसंतपुर पांगड़ी गांव का है। रविवार को समाचार एजेंसी एएनआई ने कुछ तस्वीरें जारी की जिसमें एक किसान बैल की जगह बेटियों से खेत की जुताई करवाता नज़र आ रहा था। सरदार बारेला नाम के इस किसान का कहना है कि उनके पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह बैल खरीद सके और उनका पालन पोषण कर सके। इतना ही नहीं उस ग़रीब किसान का कहना है कि आर्थिक तंगी की वजह से उसकी 14 वर्षीय बेटी राधिका और 11 वर्ष की कुंती को कक्षा आठ के बाद अपनी पढ़ाई भी छोड़नी पड़ी।
प्रश्न यह उठता है कि यदि उन दो बेटियों और उनके लाचार पिता की तस्वीर अखबारों में नहीं छपती तो क्या पंच, सरपंच आदि स्थानीय प्रशासन उस लाचार किसान के आत्महत्या करने की प्रतीक्षा करता रहता? ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का नारा उछालना तो आसान है, चंद स्कूली बच्चों की रैलियां निकाल कर ऐसी योजनाओं को समर्थन देना तो और भी आसान है, लेकिन कठिन है तो बेटियों की वास्तविक दशा को सुधारना। लाचार पिता को यह नसीहत दे कर कि वह अपनी बेटियों से इस तरह का काम न कराए, दायित्वों की इतिश्री नहीं मानी जा सकती है और यदि बेटियों की जगह बेटे हल में जुते होते तो क्या इस मामले को अनदेखा किया जा सकता था? सवाल यहां दायित्वों के निर्वहन और खोखली व्यवस्थाओं का है। ‘मामा शिवराज के राज में भांजियां पीड़ित’ कह कर मुख्यमंत्री को दोषी ठहराना तो आसान है किन्तु यदि दो पल के लिए राजनीतिक चश्मा उतार कर मानवता की दृष्टि से देखें तो स्थानीय व्यवस्था के जिम्मेदारों ने अपना कर्त्तव्य किस तरह निभाया अथवा समाज ने उन दोनों बेटियों के पक्ष में कितनी आवाज़ उठाई इस पर भी ध्यान दिया जाना जरूरी है। जब राधिका और कुंती को पढ़ाई छोड़नी पड़ी तो क्या किसी स्कूलशिक्षा, विकासखण्ड कार्यालय अथवा पंचायत की ओर से कोई रिपोर्ट बना कर राज्य शासन के सामने रखी गई? क्या किसी ने उसी समय यह जानने का प्रयास किया कि दो बेटियां अपनी शिक्षा अधूरी क्यों छोड़ रही हैं? क्या सर्वेयर ने उन दोनों बेटियों की माली हालत को जानने या उन्हें सहायता पहुंचाने का प्रयास किया? इस तरह के अनेक प्रश्न हैं जिनकी ओर ध्यान देना ही हमने लगभग छोड़ दिया है। प्रत्येक प्रशासन विभिन्न विभागों से मिल कर ही बनता है लेकिन विभागों और घोटालों के गठबंधन के चलते दायित्वों का सही निर्वहन हो कहां सकता है?
बेटियों के प्रति यह अनदेखी का रवैया सिर्फ़ मध्यप्रदेश में नहीं बल्कि लगभग हर प्रदेश में है। एसिड अटैक की शिकार हो चुकी युवती पर बार-बार एसिड फेंकने की घटना हैरान कर देने वाली है। पीड़िता के लखनऊ स्थित हॉस्टल में घुसकर किसी अनजान शख्स ने यह जघन्य अपराध किया। स्मरण रहे कि यह वहीं युवती है, जिस पर मार्च 2017 में ट्रेन में एसिड अटैक हुआ था। पीड़िता पर मार्च माह में ट्रेन में उस वक्त एसिड अटैक किया गया था, जब वह गंगा गोमती एक्सप्रेस से रायबरेली से लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पहुंची थी। तेजाब से झुलसी युवती को जीआरपी ने अस्पताल में भर्ती कराया। पीड़िता ने बताया था कि ट्रेन में दो युवकों ने उसे जबरदस्ती तेजाब पिलाया और ट्रेन से कूदकर भाग गए। घटना की जानकारी मिलते ही यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ पीड़िता से मिलने अस्पताल पहुंचे थे। उन्होंने पीड़िता को उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया था। साथ ही पीड़िता के मुफ्त इलाज और 1 लाख रुपये के मुआवजे का एलान भी किया था।
घटना के बाद हॉस्टल की वार्डन नीरा सिंह ने महिला सुरक्षा के मुद्दे पर चिंता जताई और कहा कि ‘‘यदि हॉस्टल के भीतर  लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं तो फिर महिलाओं के लिए सुरक्षित जगह कौन सी होगी?’’ वहीं सीएम योगी ने एक टीवी चैनल से खास बातचीत में कहा कि ‘‘रेप पीड़िता को सुरक्षित जगह रखा गया था। ये देखना होगा कि एसिड अटैक हुआ है या नहीं।’’
यदि एक पल के लिए यह मान लिया जाए कि उस युवती ने स्वयं को घायल किया तो इस पर भी यह जानना जरूरी हो जाता है कि ऐसी कौन सी विवशता पैदा हो गई जिसके कारण उसे ऐसा स्वयं को पीड़ा देनेवाला कृत्य करना पड़ा। क्या उसने पहली बार भी छद्म गढ़ा था? क्या कोई युवती स्वयं को तेजाब से जलाने का साहस कर सकती है? देखा जाए तो हर घटना पर अनुत्तरित प्रश्नों का अंबार लग जाता है।
देश की राजधानी दिल्ली में घटित निर्भया-कांड इतना भी पुराना नहीं हुआ है कि उसके घटनाक्रम को हम भूल जाएं। निर्भया अपने ब्वायफ्रेंड के साथ बस में चढ़ी थी, यानी एक जवान लड़का उसके साथ था जो उसकी सुरक्षा कर सकता था किन्तु दरिंदे भेड़ियों के सामने वह भी टिक नहीं सका। इसका अर्थ यह नहीं है कि वह लड़का कमजोर था या उसमें निर्भया को बचा पाने की चाह नहीं थी। वह तो अपनी जान पर खेल गया लेकिन भेड़ियों के समूह से हार गया। विचार करने की बात तो यह है कि ये भेड़ियों का समूह पनपा ही क्यों? क्या लचर कानून व्यवस्था इसकी जिम्मेदार है? क्या औरातों के प्रति सम्मान की भावना का ग्राफ निरन्तर गिरता जा रहा है? या फिर हम अपने भारतीय संस्कार जिसमें मनुष्य को मनुष्य का सम्मान करना सिखाया जाता है, भूलते जा रहे हैं।
अधिक नहीं मात्र दो दषक पहले, कॉलेज की एक घटना। पान की दूकान पर खड़े कुछ आवारा किस्म के लड़के एक छात्रा को देख कर फिकरे कसने लगे। इस पर पहले तो दूकानदार ने उन्हें ऐसा करने से मना किया। वे नहीं माने तो उसी पान की दूकान पर खड़े दो-तीन अन्य आदमियों ने उन लड़कों की धुनाई कर दी और फिर उसे पुलिस के हवाले कर दिया। उस दिन के बाद से उस पान की दूकान के सामने से बेखौफ लड़कियां गुजरती रहीं, मजाल है कि कोई उन्हें परेशान कर सके। ऐसा लगता है गोया नागरिकों की यह जिम्मेदारी कहीं खो-सी गई है। अब तो ट्रेन की बोगी में सहयात्री लड़की को कोई छेड़ता है, उससे झगड़ता है और फिर उसे चलती ट्रेन से बाहर फेंक देता है, तब भी निन्यान्बे प्रतिशत पुरुष यात्री खामोष रहते हैं। उस पल शायद उन्हें अपने परिवार की बेटियों, स्त्रियों की याद नहीं आती है या फिर सब के सब किसी अज्ञात भय से जकड़ जाते हैं और खामोश रहते हैं।
बेटियां चाहे किसी भी जाति, किसी भी धर्म की हों, बेटिया तो आखिर बेटियां ही होती हैं और उनकी सुरक्षा तथा उनके सुखद-सुरक्षित जीवन का दायित्व भी शासन, प्रशासन, परिवार एवं समाज सभी पर संयुक्त रूप से होता है। किसी एक को जिम्मेदार ठहरा कर शेष अपनी अयोग्यता को ढांक नहीं सकते हैं। अपनी अकर्मण्याताओं से उपजे विष को कब तक भगवान भरोसे छोड़ते रहेंगे? दरअसल, बेटियों की ज़िन्दगी को राजनीतिक मोहरा बनाने की नहीं बल्कि उन्हें हर पायदान पर मदद देने की जरूरत है।
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