Sunday, August 7, 2022

डॉ (सुश्री) शरद सिंह बाल फिल्म महोत्सव में विशिष्ट अतिथि

"विद्यार्थियों को अपने देश का इतिहास और अपने स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बारे में अवश्य पढ़ना चाहिए ताकि यह ज्ञात हो सके की कितने संघर्ष और कितनी कुर्बानियों के बाद स्वतंत्रता मिली है। आज हम आजादी का अमृत महोत्सव वर्ष मना रहे हैं तो हमें अपने देश की आजादी का महत्व जानना समझना चाहिए और उसका सम्मान करना चाहिए। अच्छी फिल्में हमें बहुत कुछ सिखाती हैं। हमे देश भक्ति की फिल्में देख कर भी महत्वपूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। इस दिशा लोक रंगदर्पण कला केंद्र की पहल महत्वपूर्ण है।" कर्रापुर के सरस्वती शिशु मंदिर विद्यालय में दो दिवसीय बाल फिल्म महोत्सव के शुभारंभ के अवसर दर्पण कला केंद्र द्वारा दो दिवसीय बाल फिल्म समारोह  मैं विशिष्ट अतिथि के रूप में बोलते हुए मैंने (डॉ सुश्री शरद सिंह ने) कहा।
संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के सहयोग से लोकरंग दर्पण कला केंद्र के द्वारा किए जा रहे समारोह में कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे भाजपा प्रदेश कार्यसमिति के सदस्य शैलेष केशरवानी।

इस अवसर पर प्राचार्य तिलक सिंह यादव, बलवंत ठाकुर एवं संस्था की संचालक विनीता दोहरे ने महोत्सव की जानकारी दी। डॉ सुधीर तिवारी, मयंक तिवारी, महेंद्र चढ़ार, संदीप मिश्रा, मुरलीधर चोबे, बंशी प्रसाद विश्वकर्मा एवं ब्रजेश तिवारी सहित  बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।
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संस्मरण | भय की पहली लहर | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

आज नवभारत मेंं 07.08. 2022 को प्रकाशित ....
संस्मरण 
भय की पहली लहर
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
        उन दिनों तत्कालीन जिला शहडोल के बिजुरी ग्राम में अपने मामा कमल सिंह चौहान जी के साथ रह कर ग्यारहवीं कक्षा की पढाई कर रही थी। वह काॅलरी एरिया था। बिजुरी ग्राम से कहीं अधिक बड़ी, सुव्यवस्थित काॅलोनी थी काॅलरी की। कोयला खदान में विभिन्न पदों पर काम करने वाले कर्मचारी मामाजी के मित्र थे। बिजुरी गांव और बिजुरी काॅलरी के बीच छोटे-छोटे कुछ खेत थे और खेतों के बीच एक लगभग चैकोर तालाब था। उस तालाब और खेत के बीच मेंड़नुमा पतला रास्ता था। उस रास्ते से हो कर ही मैं और मामाजी काॅलरी काॅलोनी जाया करते थे। शाम को तालाब में मेंढकों के टर्राने की आवाज़ें सुनाई देती थीं। पन्ना में तो ऐसे कच्चे तालाब थे नहीं। वहां तो बेहतरीन घाटों वाले तालाब थे। इसलिए वहां इस तरह मेंढकों की आवाज़ें कभी नहीं सुनी थीं। यह मेरे लिए नया अनुभव था। यद्यपि अभी कई नए अनुभव भविष्य की ओट में छिप कर मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। कुछ अच्छे, कुछ बुरे। 
एक नया अनुभव यह भी था कि गांव के अधिकांश घरों की तरह मामाजी के घर में भी बिजली का कनेक्शन नहीं था। जीवन में पहली बार पूरे साल भर मैंने लालटेन में पढ़ाई की। किराए का घर था वह। एक बखरी जैसी जगह में। बखरी यानी जिसके चारों ओर घर बने हुए थे और बीच में बागीचा, कुंआ और बड़ा-सा आंगन था। बखरी के किसी भी घर में स्नानघर नहीं था यद्यपि देसी टाॅयलेट था। सुबह भोजन बनाने से पहले महिलाएं कुए पर जा कर नहा लेतीं और उनके बाद पुरुषवर्ग कुए पर जा कर नहाता। मगर मैंने अपने जीवन में कभी खुले में नहीं नहाया था। मामाजी जानते थे कि मैं कुए पर नहीं नहाऊंगी, इसलिए उन्होंने मेरे वहां पहुंचने से पहले ही पीछे के आंगन में बांस की टटियो और चादर से ढंका हुआ एक कच्चा बाथरूम बनवा दिया था। यद्यपि उस पर छत नहीं थी लेकिन वहां पास में कोई दुमंज़िला मकान भी नहीं था। कच्चे बाथरूम में नहाने का भी मेरा पहला अनुभव था। 
मेरे घर से सटा हुआ जो घर था उसमें एक सिंधी परिवार रहता था। काॅलरी क्षेत्र में उनका छोटा-सा जरनल स्टोर था। शायद पंजवानी सरनेम था। मामाजी ने बताया था कि उन पंजवानी अंकल का मन काम में नहीं लगता था, उन्हें जुआ खेलने की लत लग गई थी। लेकिन उनकी पत्नी जिन्हें मैं आंटी कह कर पुकारती थी। खाना पकाने में निपुण थीं। सिंधी स्टाईल की कमल-ककड़ी की सब्ज़ी उन्हीं के यहां पहली बार मैंने खाई थी और मैं उनकी बनाई उस सब्ज़ी की दीवानी हो गई थी। वे जब भी कमल-ककड़ी की सब्ज़ी बनती, मुझे जरूर खिलातीं। उन्हें मुझसे बहुत स्नेह था। जल्दी ही उन्हें दूकान बेच कर बिजुरी से जाना पड़ा। उनका जाना मुझे बहुत अखरा था। लेकिन उनके बाद जो किराएदार आए उनसे मेरी बहुत जल्दी पटरी बैठ गई। 
नए किराएदार मामाजी के परिचित थे। काॅलरी में रहते थे। उनकी पत्नी का मन काॅलोनी में नहीं लगा। इसलिए उन्हें जैसे ही मामाजी से हमारे पड़ोस वाले घर का पता चला। उन्होंने उसे किराए पर ले लिया। उनकी आयु अधिक नहीं थी। फिर भी विवाह हुए चार-पांच साल हो गए थे और उनके कोई बच्चे नहीं थे। मैं उन्हें भी अंकल-आंटी कहती थी। वे लोग रीवा के पास के किसी गांव के रहने वाले थे। परिहार सरनेम था उनका। आंटी से मेरी बहुत जल्दी दोस्ती हो गई। वे भी मुझे बहुत चाहती थीं। जब-तब दुनियादारी भी समझाती रहती थीं। जिनमें वे बातें भी होती थीं जिनकी मां ने मुझसे कभी चर्चा नहीं की थी। शायद मेरे थोड़ी और बड़ी होने पर चर्चा करतीं, लेकिन आंटी के ग्रामीण नज़रिए से तो मैं बड़ी हो चुकी थी और मुझे चैकन्ना रहना सीख लेना चाहिए था। यद्यपि उनकी इस तरह की बातें मेरे सिर के ऊपर से गुज़र जातीं। सिर्फ़ तीन साल छोड़ कर मैं बचपन से कोएजुकेशन में पढ़ी थी। बिजुरी में भी को-एजुकेशन था। इसलिए लड़कों को ले कर मेरे मन में एक मित्रवत खिलंदड़ापन ही रहा और कभी कोई ऊटपटांग भावना नहीं जगी। 
लगभग आधा साल गुज़र गया था। बोर्ड की परीक्षाओं का सेंटर बिजुरी के बजाए कोतमा में रहता था। मामाजी सीनियर टीचर थे अतः बोर्ड के काम के लिए प्रिंसिपल उन्हें ही कोतमा और शहडोल भेजा करते थे। उन्हीं दिनों एक नए टीचर मामाजी वाली शिफ्ट में कहीं से ट्रांसफर हो कर आए। उन्होंने गंाव में एक कमरा किराए पर ले लिया था। एक दिन मामाजी ने उन्हें खाने पर घर बुलाया। वे आए हम तीनों ने साथ खाना खाया। वे मुझसे मेरी पढ़ाई के बारे में पूछते रहे। मामाजी से बोले कि ‘‘यदि शरद को जरूरत हो तो मैं फ्री में ट्यूशन पढ़ा दूंगा।’’ मामाजी ने उन्हें बता दिया कि इसे ट्यूशन पढ़ना पसंद ही नहीं है। फिर उन्होंने कहा कि उन्हें रात को खाना खाने के बाद दूध पीने की आदत है और घर में दूध ले कर रखने, गरम करने की सुविधा नहीं है। इस पर मामाजी ने कहा कि ‘‘कोई बात नहीं, दूधवाले से कह देना कि हमारे घर दे जाया करे। दोपहर में शरद आ जाती है। गरम कर के रख दिया करेगी। शाम को मेरे आने के बाद तुम ले जाया करना।’’ वे मान गए।
कुछ दिन बाद मामाजी को स्कूल के किसी काम से शहडोल जाना पड़ा। उन्होंने मुझे समझाया कि जब वे सर आएं तो दरवाजे से ही उन्हें दूध का डिब्बा पकड़ा देना और दरवाज़ा बंद कर के रखना। बस, एक ही दिन की बात थी। परिहार अंकल जरूर बारह घंटे की ड्यूटी पर चले जाया करते थे। वे आठ घंटे की ड्यूटी और चार घंटे ओवरटाईम करते थे। मगर आंटी पूरे समय घर पर रहती थीं। इसलिए मुझे कोई चिंता नहीं थी। जब शाम हुई तो वे सरजी घर आए। मैंने दरवाजा खोला और दूध का डिब्बा लेने अंदर वाले कमरे में आई और जब पलट कर देखा तो वे पहले कमरे में कुर्सी पर आलथी-पालथी मार कर बैठे दिखाई दिए। दो कमरे का छोटा-सा घर था। एक दरवाज़ा बाहर सड़क पर खुलता था जिससे सरजी कमरे में पधार गए थे और दूसरा दरवाज़ा पीछे वाले आंगन की तरफ था जहां परिहार आंटी के घर का भी पिछला दरवाज़ा था। मैंने सरजी को दूध का डिब्बा दिया तो वे अजीब दृष्टि से मुझे देखने लगे। मुझे कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन कहते है न, कि लड़कियों और महिलाओं में सिक्स्थ सेंस होती है। मुझे अचानक डर-सा लगने लगा। फिर भी मैंने हिम्मत करके कहा कि ‘‘सर! मामाजी ने कहा है कि दरवाज़ा बंद कर के रहना, तो आप जाइए, मुझे दरवाज़ा बंद करना है।’’
‘‘ठीक है पानी पिला दो।’’ सरजी ने कहा। मेरे मन में अज्ञात भय बढ़ गया। अब मुझे रहा नहीं गया और मैं पानी लाने के बहाने भीतर दूसरे कमरे से होती हुई सीधे परिहार आंटी के पास पहुंची और उन्हें सारा हाल बताया। ‘‘ठीक है, चलो! मैं देखती हूं।’’ उन्होंने कहा और वे मेरे साथ मेरे घर पहुंची और ऊंची आवाज में बोलीं,‘‘बिटिया, चलो अपने सरजी को पानी दे दो। फिर मेरे घर चलो। तुम्हारे अंकल आने वाले हैं। उनकी छुटटी का टाईम हो गया है।’’ आंटी ने चतुराई से काम लिया था क्योंकि अंकल रात दस बजे के पहले आने वाले नहीं थे, पर सरजी यह थोड़े ही पता था। आंटी की बात सुन कर सरजी ने दूध का डिब्बा उठाया और बिना पानी पिए ही वहां से दफ़ा हो गए। 
आज जब मैं ‘‘गुड टच और बेड टच’’ की शिक्षा के बारे में सुनती हूं तो मुझे लगता है कि हर बच्चे में सिक्स्थ सेंस होती है। बस, जरूरत होती है किसी ऐसे बड़े की जिससे समय रहते वह खुल कर बात कर सके और मदद ले सके। मुझे परिहार आंटी के रूप में एक ऐसी ही अघोषित अभिभावक मिल गई थीं जिन्होंने जीवन का पहला पाठ पढ़ने और भय की पहली लहर को समझने में मदद की। मेरे सिक्स्थ सेंस को जाने-अनजाने उन्हीं ने जगाया था जिससे मैं उन सरजी की कुभावना को एक अनजाने भय के रूप में ताड़ गई। वे आंटी अब कहां हैं, मैं नहीं जानती। लेकिन मेरे जीवन और मेरी आत्मरक्षा की दृढ़ता में उनका योगदान मैं कभी भुला नहीं सकती हूं।                
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Thursday, August 4, 2022

बतकाव बिन्ना की | चालक अपनों सिर धुने, ढारें टेंसुआ नीर | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | साप्ताहिक प्रवीण प्रभात

 "चालक अपनों सिर धुने, ढारें टेंसुआ नीर" ... मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम-लेख "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात (छतरपुर) में।
🌷हार्दिक धन्यवाद "प्रवीण प्रभात" 🙏
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बतकाव बिन्ना की
चालक अपनों सिर धुने, ढारें टेंसुआ नीर
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

‘‘काए भैयाजी, कहां की तैयारी हो चली?’’ मैंने भैयाजी से पूछी। बे अपनी बलोरो के पांछू वारे हिस्सा में गठरिया-मठरिया सी ठूंस रए हते।
‘‘अरे कुल्ल जांगा जाने है बिन्ना!’’ भैयाजी गठरिया ठूंसत भए बोले।
‘‘कुल्ल मने कां-कां?’’ मैंने पूछी।
‘‘पैले छतरपुर जाने, उतई से दमोए निकर जाबी। फेर दमोए से जबलपुर सोई जाने। जे ई कोनऊ चार-पांच दिना तो लगई जेहें।’’ भैयाजी बोले।
‘‘मनो जे आप बाहरे जा रए कहाने, सो तनक अच्छे ढंग से समान ले जाते, जे का, के गठरिया-मठािया सी बांध लई। कोनऊ देखहे, सो का सोचे? काए अपनो सागर को नांव बदनाम करा रए?’’ मैंने भैयाजी खों टोंको।
‘‘अरे कछु नईं बिन्ना, कोन कोनऊ बड़े शहर जाने, छतरपुर में सोई गांव जाने है। अब उते, बो का कहाऊत आए के ट्रालीबैग ले के जाएं सो सबई सोचहें के हम ओंरे अपनी शान आ दिखा रए। जेई लाने गांव घांई गठरिया बांध लई है। औ तुमाई भौजी ने सोई गुझियां, पपड़ियां बना के पिकिया में भर लईं आएं।’’ भैयाजी मुूस्कात भए बोले।
‘‘सो भौजी सोई जा रईं का?’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘हऔ! बे इते रैहें सो जेई सोच-फिकर कर के तबीयत बिगार लैहें के हम उते का कर रै? कोन के संगे फिर रए?’’ कैत भए भैया हंसन लगे।
‘‘आप औ सोई, भौजी कभऊं ऐसो नईं सोच सकत आएं।’’ मैंने भौजी की तरफदारी करी।
‘‘हऔ तो! हम सो ऊंसई ठिठोली कर रए।’’ कैत भए भैयाजी ने एक लठिया बलोरो के ड्राईवर वारी सीट लिंगा रख दई। 
‘‘जे लठिया काए ले जा रए? काए उते गांव में ढोर सोई चराने का?’’ मैंने हंसत भए पूछी।
‘‘गांव में नोई, पर रोड पे ढोर हंकारबे के लाने जे लठिया रखबो जरूरी आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बात सो आप सांची कै रै भैयाजी!’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘औ का! जेई लाने सो तुमाई भौजी खों संगे लिवा ले जा रए। काए से के कहां लों उतर-उतर के गइयां हकारबी? जे काम तुमाई भौजी के जिम्मे रैहे। तुमसे ऊ दिना पूछी हती सो तुमने कै दई के तुमाए पास चलबे खों टेम नइयां।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ भैयाजी! सांची कही हती हमने। अब करो का जाए, अपने इते के जे श्यामलम संस्था वारे इत्तो नोनो कार्यक्रम करत रैत आंए के छोड़त नईं बनत। औ ऊपे हमाए उमाकांत मिश्रा भैया, बे सो गजबई की मेहनत कर रैत आंए। कौनऊ से कार्यक्रम उनके लाने सौंप देओ, कभऊं फैल नईं हो सकत। रामधई!’’ मैंने कही।
 ‘‘जे तो है!’’ भैयाजी ने गाड़ी को पांछू को गेट बंद करत भए मुंडी हिलाई।
‘‘हौ भैयाजी! अभई छतरपुर गई हती, उते सोई ऐसई नोनो कार्यक्रम देखबे खों मिलो। उते बो ‘प्रसंग नर्मदा’ भओ रओ न, सो मैंने देखी के कित्ते प्यार से, कित्ते सलीका से उन्ने कार्यक्रम करो। सच्ची, जी जुड़ा गओ! मोए सो भौतई अच्छो लगो, मनो उन ओरन खों मोरो बोलबो-चालबो कित्तो पुसाओ, जे मोए ठीक से पतो नईं। बाकी दुसरे दिना उते के सबई अखबारन में इत्ती अच्छे से खबरें लगाई गईं के उनखों देख के मोए तो आंसुवां आ गए। उन ओरन में बड़ो अपनोपन रओ।’’ मैंने भैयाजी खों बताई।
‘‘बो सब ठीक आए, पर जे सो बताओ के तुमें आत-जात बेरा रोड पे गइयन को झुंड ने टकराओ का?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘का बात कर रए भैयाजी, आप पूछ रए के का झुंड ने टकराओ? अरे, रस्ता में जात बेरा दो दफा और आत बेरा में तीन दफा, यानी कुल्ल पांच दफा गइयां हमाई गाड़ी से टकरात-टकरात बचीं। आप कछु कर लेओ, जानवर सो जानवर आए। एक दफा सो, एक गइया नांए से मांए जात-जात पलटी औ गाड़ी के आगे आ ठाड़ी भई। बा तो कओ के ड्राईवर अच्छो चलाबो वारो हतो, सो ऊने कट मार के बचा लओ ने तो गइया को गाड़ी घलती सो ऊको चोट लगती औ हमाई गाड़ी को का होतो, कओ नई जा सकत।’’ बतात भई मोए झुरझुरी सी हो आई। बे सारे सीन आंखन के आगे दिखान लगे।
‘‘हऔ, बड़ो खतरो रैत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘औ का, तीन घंटा को रस्ता चार घंटा में पूरो भऔ। जे कोनऊं इन गइयन के लाने कछु करतई नईयां। दुफारी में सो कछु कम रैत आंए, पर संझा होत-होत सबरी रोड पे आ जाए हैं। उते चुनाव टेम पे अपने शिवराज भैया ने बोली रई के हमाए मध्यप्रदेश की सड़कें अमेरिका की सड़कन से ज्यादा अच्छी हैं, मनो बे ऊ बेरा गइयन के लाने भूल गए रए। एक तो गइयां रोड पे अड्डा जमाए रैत आएं औ उत्तई नईं, गोबर कर के गंदगी सोई फैलात रैत आएं। मनो विपक्ष घांईं उन्ने सोई ठान लेओ होए के सड़कें कित्तई अच्छी बनवा लेओ, हम सो उने अमेरिका घांई होन न देबीं। उने साफ-सुथरा न रैन देबी।’’ कैत-कैत मोए गुस्सा सो आन लगो।
‘‘मोए तो जे समझ में नईं आत बिन्ना! के जे गइयन के मालिक कोन टाईप के इंसान आएं? एक तरफा सो गऊ माता-गऊ माता कैत नईं थकत औ उतई अपनी गइयन खों सड़कन पे अवारा सी छोड़ देत आएं। बो तुमने कारी वारी गइया देखी हुइए, बो जो संकारे से हमाए दरवाजे पे ठाड़ी रैत आए... बो, बो दिखा रई। बा जब हमाए दरवाजे पे भिखमंगन घांई आ ठाड़ी होत है तो हमाओ तो जी भर आत है। तुमाई भौजी ऊको दो रोटी डार देत है, बाकी इत्ते बड़े सरीर को दो रोटियन में का होत है?’’ भैयाजी बोले।
‘‘सही कही भैयाजी!’’
‘‘हऔ बिन्ना! इनके लाने सो अच्छी बड़ी गऊशाला होय सो ऊमें सब को राख दओ जाए। जोन खों दान-धरम करने होय सो उतई दान कर दओ करे। ई तरहा से इन ओरन खों कछु चारा-पानी सो मिलहे। जे भूंकी सो ने रैहें।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बात सो आप नोनी-नोनी कर रए भैयाजी, पर अपन ओरन की कोन सुन रऔ? अपनी सो ठीक के अपन ओंरे सो छोटी गाड़ियां ले के चलत आएं, तनक उनकी सोचो जो बड़े-बड़े ट्राला ले इन रोडन से गुजरत आएं। उनखों सो मूंड़ भिन्ना जात हुइए।’’
‘‘औ का, बिन्ना। जेई कारण से आए दिना कित्ते एक्सीडेंट होत रैत आएं। जेई से तो हम तुमाई भौजी को संगे ले जा रए के बे उतर-उतर के गइयां भगाउत चलहें।’’ भैयाजी बोले।
‘‘मने आप भौजी से क्लीनर को काम लेहो!’’ भैयाजी खों चुटकी लई।
‘‘अरे, जे उनसे ने कै दइयो, ने तो बे अभई चलबें से मना कर देहें।’’ भैयाजी डरात भए बोले।           
 ‘‘ने डराओ, भौजी से कछू ने कहबी। चलो, जेई बात पे मोरो जो दोहा सुन लेओ-
चौराहन औ रोड पे,  भई गइयन की भीर।
चालक अपनों सिर धुने,ढारें टेंसुआ नीर।।

‘‘बाह-बाह! भौत अच्छे! अब मोए तैयार होन देओ। लौट के मिलबी।’’ कैत भए भैयाजी अपने घरे बढ़ा गए।
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। अब चाए रोडन पे गइयां मिलें चाए कुत्ता? भौजी खों डंडा सो भांजनेई परहे। सो बोलो अब जने के -‘‘गऊ हमाई माता आए, जीको घरे राखबो नोई पोसाए।’’ बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(04.08.2022)
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चर्चा प्लस | स्वदेशी का उद्घोष करने वाले राष्ट्रकवि | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस
स्वदेशी का उद्घोष करने वाले राष्ट्रकवि    
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                
      राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का नाम सुनते ही सबसे पहले उनकी राष्ट्रप्रेम और देशभक्ति की कवितायें याद आती हैं। गुप्त जी के काव्य में तत्कालीन समाज सुधार की भावना, राष्ट्रीय भावना, जन-जागरण की प्रवृत्ति एवं युगबोध विद्यमान है। मैथिलीशरण गुप्त की राष्ट्रीय चेतना सम्पूर्ण हिंदी साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है।
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886 को झांसी के निकट चिरगांव में हुआ था। कहा जाता है कि उनके बचपन का नाम ‘मिथिलाधिप नंदनशरण’ था लेकिन विद्यालय के रजिस्टर में इतना बड़ा नाम समा नहीं रहा था तो इसे संक्षिप्त कर के ‘मैथिलीशरण’ कर दिया गया। आर्थिक रूप से सुसम्पन्न वणिक परिवार में जन्मे मैथिलीशरण गुप्त बचपन में ‘स्वर्णलता’ नाम से छप्पय लिखते थे, फिर किशोरावस्था में ‘रसिकेश’, ‘रसिकेंदु’ आदि उपनाम से भी रचनाएं लिखींे। उन्होंने अनुवाद का कार्य ‘मधुप’ नाम से किया और ‘भारतीय’ और ‘नित्यानंद’ नाम से अंग्रेज सरकार के विरुद्ध कविताएं लिखी। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का नाम सुनते ही सबसे पहले उनकी राष्ट्रप्रेम और देशभक्ति की कवितायें याद आती हैं। गुप्त जी के काव्य में तत्कालीन समाज सुधार की भावना, राष्ट्रीय भावना, जन-जागरण की प्रवृत्ति एवं युगबोध विद्यमान है। 
‘‘भारत-भारती’’ मैथिलीशरण गुप्त जी द्वारा स्वदेश प्रेम को दर्शाते हुए वर्तमान और भावी दुर्दशा से उबरने के लिए समाधान खोजने का एक सफल प्रयोग कहा जा सकता है। भारत दर्शन की काव्यात्मक प्रस्तुति ‘‘भारत-भारती’’ निश्चित रूप से किसी शोध से कम नहीं आंकी जा सकती। लेकिन 1914 में छपी ‘‘भारत-भारती’’ और 1931 में आई ‘‘साकेत’’ जैसी रचनाएं आज भी उतनी ही सटीक हैं, जितनी उस समय रही होंगी। 
1930 ईस्वी में महात्मा गांधी ने भारतीय राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला। गांधी जी के पदार्पण के बाद स्वतंत्रता आंदोलन की रूपरेखा में व्यापक बदलाव आया। राष्ट्रीय आंदोलन का प्रसार अब उच्चवर्ग तक सीमित नहीं रहा बल्कि वह मलिन बस्तियों तक फैलने लगा। विभिन्न भाषाओं के कवि भी इससे अछूते नहीं रहे और उन्होंने अपनी कविताओं में राष्ट्रीय भावना को स्थान दिया। इन कवियों ने न केवल लोगों को जागृत करने के लिए कविताएं लिखी बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भाग भी लिया और कई बार जेल भी गए। मैथलीशरण गुप्त ने कविता का सही अर्थ अपने इस वाक्य में बताया है-‘‘केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए, उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए’’। गुप्त जी ने अपनी रचनाओं के मध्यम से राष्ट्रभावना को पुनजागृत करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उनकी कविताएं देश के गौरवशाली अतीत का स्मरण कराने के साथ ही, गुलामी की जंजीरों को तोड़ फेंकने का आह्वान करती रहीं। 
मैथिलीशरण गुप्त की राष्ट्रीय भावना उच्च कोटि की थी। उनका संपूर्ण साहित्य भारत की सामूहिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने भारत को एक इकाई के रूप में देखा। गुप्त जी की राष्ट्रीय काव्यधारा की प्राण तत्व के रूप में उनकी श्रेष्ठ काव्य कृति ‘भारत भारती’ है। यह कृति मैथिलीशरण गुप्त को राष्ट्रकवि बनाने के लिए पर्याप्त है। गुप्त जी की भारत-भारती कविता यद्यपि उग्र राष्ट्रीय चेतना की प्रतीक बन गयी थी । उनकी दृष्टि में हिंदू का अर्थ है- ‘‘हिंदुस्तान में रहने वाला व भारत माता के चरणों में सर्वस्व समर्पित करने वाला।’’ गुप्त जी ने स्पष्ट शब्दों में गौरव के साथ इस बात की घोषणा की है- 
हम हैं हिंदू की संतान
जिए हमारा हिंदुस्तान 
गुप्त जी अपने काव्य में लोगों को प्रजातंत्र के वास्तविक अर्थ को बताते हुए उन्हें प्रजातंत्र प्राप्ति के लिए उत्साहित करते थे -
राजा प्रजा का पात्र है, वह एक प्रतिनिधि मात्र है 
यदि वह प्रजा पालक नहीं, तो त्याज्य है।
हम दूसरा राजा चुनें, जो सब तरह सबकी सुने 
कारण, प्रजा का ही असल में राज्य है।

 राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी स्वदेश प्रेम को सर्वोपरी मानते रहे। उनके अनुसार ‘‘स्वदेश प्रेम आत्मोत्थान एवं कत्र्तव्यों के उचित पालन की पहली सीढ़ी है। ‘स्वदेश संगीत’ में उन्होंने परतंत्रता की घोर निंदा करते हुए उसे संपूर्ण भारत के लिए अभिशाप माना। यहां तक कि परतंत्र व्यक्ति को मृत मानते हुए उसका अपनी रचनाओं में तिरस्कार किया ताकि वह पराधीनता के बंधनों को तोड़ने के लिए तत्पर हो उठे। ‘अनघ’ में भी राष्ट्रप्रेम का स्वर सुनाई देता है जिसमें गुप्त जी पर गांधीवादी विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा। गांधीवाद से प्रभावित होकर वे सत्याग्रह में स्वयं भी शामिल हुए। व्यक्तिगत सत्याग्रह के कारण उन्हें 1941 में जेल जाना पड़ा। इसके बाद भी गुप्त जी पीछे नहीं हटे। उन्होंने लिखा कि -  
अस्थिर किया टोप वालों को, गांधी टोपी वालों ने।
शस्त्र बिना संग्राम किया है, इन माई के लालों ने।

स्वाधीन भारत के बाद भी गुप्त की राष्ट्रीय भावना बलवती रही। स्वतन्त्रता के बाद विगत परतन्त्रता काल में अपनी रीति नीतियों को कवि ने ‘ध्वज वन्दना’ कविता में व्यक्त में किया है। ‘वकसंहार’ में उन्होंने अन्याय के दमन की प्रेरणा दी, तो ‘साकेत’ में स्वावलंबन का रास्ता दिखाया। ‘यशोधरा’, ‘विष्णुप्रिया’ और ‘द्वापर’ में भी गुप्त जी ने राष्ट्रीयता की भावना को अभिव्यक्ति दी। ‘वैतालिकी’ में उन्होंने भारतवासियों में स्वाभिमान जगाने का प्रयास किया। मैथिलीशरण गुप्तजी ने ‘भारत-भारती’ में भारतवर्ष की श्रेष्ठता की स्पष्ट घोषणा की-
भू-लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहां?
फैला मनोहर गिरि हिमालय और गंगाजल जहां?
संपूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है?
उसका कि जो ऋषिभूमि है, वह कौन? भारतवर्ष।

गुप्त जी ने हिमालय से घिरे तथा गंगाजल स युक्त ऋषिभूमि से अधिक किसी अन्य देश का उत्कर्ष नहीं माना। मैथिलीशरण गुप्त ने स्वर्णिम अतीत का चित्रण बड़े ओज के साथ किया है। गुप्तजी ने लिखा हैकृ’यदि किसी जाति का अतीत गौरवपूर्ण हो और वह उस पर अभिमान कर सके तो उसका भविष्य भी गौरवपूर्ण हो सकता है। आत्मविस्मृति ही अवनति का मुख्य कारण है और आत्म-स्मृति ही उन्नति का।’ मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत-भारती’ का अतीत खण्ड संपूर्ण द्विवेदी युगीन काव्य में भारत के अतीत गौरवगान का श्रेष्ठतम अंश है
वे आर्य ही थे जो कभी अपने लिये जीते न थे।
वे स्वार्थरत हो मोह की मदिरा कभी पीते न थे।।
तथा फैला यहीं से ज्ञान का आलोक सब संसार में।

गुप्तजी ने ‘भारत-भारती’ में भारतीय सभ्यता के प्रायः सभी विषयों की चर्चा की है। राष्ट्रीय भावना उत्पन्न करने के लिए मैथिलीशरण गुप्त की हिंदी भाषा के राष्ट्रभाषा होने की पैरवी की। उनकी मतानुसार, ‘‘एक ऐसी भाषा होना अनिवार्य है जिससे संपूर्ण देश के लोगों में पारस्परिक विचार विनिमय हो सके।’’  गुप्त जी का संपूर्ण साहित्य राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत है। उनका साहित्य जन-सामान्य के साथ-साथ राष्ट्रीय आंदोलन के अग्रणी नेताओं को भी निरंतर प्रेरित करता रहा। वे विदेशर चलन को सवदेशी पर प्रभावी होते देख कर ललकारने से नहीं चूके। वे ‘‘भारत-भारती’’ में लिखते हैं कि-
उच्छिन्न होकर अर्द्धमृत सा छटपटाता देश है।
सब ओर क्रन्दन हो रहा है, क्लेश को भी क्लेश है।
वह वेष-भूषा और भाषा, सब विदेशी है यहां
जातीयता क्या वस्तु है, निज देश कहते हैं किसे?
क्या अर्थ आत्म-त्याग का, वे जानते हैं क्या इसे?
 
उनके साहित्य की इसी विशेषता के कारण सन 1936 में गांधी जी ने काशी में उन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि से विभूषित किया। लगभग 59 वर्ष की अवधि में गुप्त जी ने लगभग 74 रचनाएं लिखीं, जिनमें दो महाकाव्य, 17 गीतिकाव्य, 20 खंड काव्य, चार नाटक और गीतिनाट्य हैं। भारत सरकार ने उनकी सेवाओं को देखते हुए उन्हें दो बार राज्यसभा की सदस्यता भी प्रदान की थी। गांधी जी ने उन्हें ‘‘राष्ट्रकवि’’ की उपाधि प्रदान की। आगरा विश्वविद्यालय से उन्हें डी.लिट. से सम्मानित किया गया। सन 1992 -1964तक राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हुए। सन् 1953 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने सन् 1962 में अभिनन्दन ग्रन्थ भेंट किया तथा हिन्दू विश्वविद्यालय के द्वारा डी.लिट. से सम्मानित किये गये। 1954 में साहित्य एवं शिक्षा क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
राष्ट्रीय भावना तथा राष्ट्रीय चेतना का प्रसार उनके जीवन का उद्देश्य बन गया था। 12 दिसम्बर 1964 को देहत्यागने से पूर्व जीवन के पचास वर्ष निरंतर सृजन कार्य करते रहे। देश की स्वतंत्रता, देश की प्रगति और विकास के जो स्वप्न उन्होंने देखे थे, देश की स्वतंत्रता के बाद वे उन स्वप्नों को साकार होते देखना चाहते थे। राष्ट्रकवि ने राष्ट्र को स्वतंत्र होते देखा। इसीलिए कवि स्वतंत्र राष्ट्र के विकास के लिए ‘कर्म’ करने का संदेश दिया जो कि आज भी राष्ट्रहित में कर्म करने के लिए प्रेरणा देता है-
जिस युग में हम हुए वही तो अपने लिये बड़ा है,
अहा ! हमारे  आगे  कितना   कर्मक्षेत्र  पड़ा है।
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Tuesday, August 2, 2022

पुस्तक समीक्षा | माटी का सोंधापन लिए कविताएं | समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


प्रस्तुत है आज 02.08.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई कवि आचार्य पं. महेश दत्त त्रिपाठी के काव्य संग्रह  "सोंधी माटी" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏

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पुस्तक समीक्षा

माटी का सोंधापन लिए कविताएं

समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह 

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काव्य संग्रह     -  सोंधी माटी

कवि     -  आचार्य पं. महेश दत्त त्रिपाठी

प्रकाशक        -  एन. डी. पब्लिकेशन, बाधापुर ईस्ट, नई दिल्ली

मूल्य           -  200/-  

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    ‘‘सोंधी माटी’’ सागर नगर के सुपरिचित कवि आचार्य पं. महेश दत्त त्रिपाठी का प्रथम काव्य संग्रह है। पं. त्रिपाठी उच्चकोटि के शिक्षक रहे हैं और प्राचार्य पद से सेवानिवृत्ति के साथ ही उनका यह प्रथम काव्य संग्रह प्रकाशित होना इस बात का स्पष्ट उद्घोष है कि वे अपने जीवन की दूसरी पारी मुक्तभाव से साहित्यसृजन में व्यतीत करेंगे। संग्रह की कविताओं को तीन भागों में बांटा जा सकता है- जीवनपरक, प्रकृतिपरक और व्यक्तिपरक। जीवन परक कविताओं में पं. महेश दत्त त्रिपाठी ने ‘‘लाॅकडाउन या तालाबंदी’’, ’’मानवता’’, ’’किसान’’, ’’मोबाईल’’, ’’नमस्ते’’, ’’केन्द्राध्यक्ष’’, ’’मत्स्यन्याय’’, ’’गुनगुना पानी’’, ’’आस्तिक-नास्तिक’’ आदि कविताएं लिखी हैं। कोरोना काल का सबसे सुरक्षित दौर था लाॅकडाउन। यह सच है कि उस दौर ने मजदूरों और रेहड़ी वालों को आर्थिक तंगी के शिखर पर पहुंचा दिया जहां से उतर पाने का उनके पास कोई रास्ता नहीं था लेकिन इसी लाॅकडाउन ने लोगों को घरों में एक साथ रहने की महत्ता भी एक बार फिर याद दिला दी। न्युक्लियर परिवारों के बढ़ते चलन के दौरा में लोगों को एक बार फिर अपने रिश्तों की गहराई से पहचान हुई। जो पहले सोशल मीडिया से परहेज करते थे, वे भी उस दौर में सोशल मीडिया के आदी हो गए। घर में रहने के कारण कई ऐसे काम किए गए जो वर्षों से लम्बित थे। इस संबंध में पं. त्रिपाठी की ‘‘लाॅकडाउन या तालाबंदी’’ कविता की ये पंक्तियां बड़ी रोचक हैं-

अपने ही घर को इतने नज़दीक से 

हमने कभी न जाना था

पलंगपेटी में रखी पुस्तकें

कपड़े जो उठा कर नहीं देखे।

बेचारा लोहे का संदूक

जो भीतर से साफ़ ही नहीं हुआ

उस पर पेंट कलर करके चमकाया।


‘‘मानवता’’ वह कविता है जो कवि के मानवीय सरोकारों से साक्षात्कार कराती है और यह स्थापित करती है कि आज के संवेदनहीन होते समय में मानवता कितनी आवश्यक है। आज यदि कोई हादसा होता है तो लोग घायल की मदद करने के बजाय उसके कष्ट की उस दुर्घटना की अपने मोबाइल पर वीडियो बनाना शुरू कर देते हैं। भले ही वह घायल तड़प तड़प कर मर जाए। ऐसे विपरीत समय में मानवता का परिचय देना बहुत आवश्यक है। जबकि आज के समय में किसी की मदद करना और भी आसान हो गया है सिर्फ 100 नंबर डायल करना है और मदद फौरन हाजिर हो जाती है। इसी सत्य को रेखांकित करते हुए कवि ने ‘‘मानवता’’ शीर्षक से यह कविता लिखी है- 


ये क्या /मैं चला 

रात में दलपतपुर (बंडा) से 

कर्रापुर आते-आते 

बजे रात के बारह /सामने देखा तो

बाइक किसी की /टकराई होगी 

कराह रहे थे महिला-पुरुष 

बीच सड़क पर पड़े 

रुका मैं, जगी मानवता 

डायल 100 किया दो-तीन बार 

और भिजवाया अस्पताल उन्हें।


यह संवेदना उसी व्यक्ति के भीतर जागृत अवस्था में पाई जा सकती है जिसे माटी के सोंधेपन का अहसास हो। लेकिन जीवन का एक और पक्ष है राजनीति, जहां अहसास होते हुए भी संवेदना की कमी दिखाई देती है। इस अवस्था पर कवि ने ‘‘मत्स्यन्याय’’ शीर्षक कविता में लिखा है- 

राजनीति का अर्थ है 

अब बदलते परिवेश में 

जंगलराज का होना ।

जब मानव स्वीकार करता है 

जंगलराज को 

तब वहां होने वाले 

मत्स्य न्याय को कहते हैं अधर्म।


कवि त्रिपाठी प्रकृति परक रचनाओं में मानवीय भावना के रूप में प्रेम के अस्तित्व का विस्तृत वर्णन करते हैं। ‘‘प्रेम’’ शीर्षक से लिखी गई उनकी कविता की यह पंक्तियां देखिए-

मनुष्य की भावना ही प्रेम है 

जो असीमित, 

अनंताकाश में विद्यमान है 

यह ऐसा अद्भुत भाव है 

यह सुगंध की तरह है 

अपने अस्तित्व की।


कवि त्रिपाठी ने प्राकृतिक तत्व के मध्य मौजूद सोंधी माटी के वास्तविक स्वरूप को ‘‘सोंधी माटी देश की’’ शीर्षक से रेखांकित किया है-

हमारा प्यारा भारतवर्ष 

शब्द भी कम पड़ेंगे 

इस देवभूमि की माटी पर 

जहां अवतार लिया 

भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, महाप्रभु ने, 

गौतम बुद्ध और महावीर ने ....।


वस्तुतः यही तो माटी का  सोंधापन है जो व्यक्ति को उसकी मातृभूमि से जोड़े रखता है। प्रकृति पर केंद्रित एक और कविता जिसका शीर्षक है ‘‘धरती और बरसात’’ यह बहुत सुंदर कविता है, जो शब्दों के माध्यम से वर्षा ऋतु का अनुभव कराती है-

धरती का अपनापन गहरा है 

इतना कि वह कभी 

बरसाती पहनकर या छाता लगाकर 

बरसात का स्वागत नहीं करती 

पृथ्वी तो बारिश में 

भीग जाने पर ही 

अपनी सार्थकता समझती है 


व्यक्ति पर कविताओं में कवि त्रिपाठी ने ‘‘भाई जी डॉ. सुब्बाराव’’, ‘‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय - मानवतावाद के प्रणेता’’, ‘‘संत विनोबा भावे’’ के साथ ही ‘‘मजदूरनी कोरोनाकाल की’’ जैसी कविताएं लिखी हैं। ‘‘कोरोनाकाल की मजदूरनी’’ में एक संवेदनशील और मार्मिक रचना है। कोरोनाकाल में मजदूरों के शहरों से गांव की ओर प्रस्थान के दौरान आने वाली कठिनाइयों का शब्दशः चित्रण किया गया है इस कविता में, कुछ पंक्तियां देखें-

मैं एक मजदूरन हूं 

कोई मुझे भी कोरोना की 

चाल जरा सी बतला दो 

मैं चली हूं अपने सफर पर 

बस सफर 12 - 13 दिन का 

मेरे पेट में 9 महीने 

और हाथ में छोटा बच्चा है.....

       संग्रह की कविताओं में मानवीय अनुभवों और उनके सूक्ष्मतम निहितार्थों के साथ-साथ मानव और प्राकृतिक दुनिया के अलग-अलग पड़ावों के मार्मिक अनुभवों-प्रसंगों को उभारने वाले बिंब हैं। संग्रह में सहज सरल भाषा में सुंदरता से शब्दों को पिरोया गया है। ‘‘सोंधी माटी’’ कवि के प्रथम काव्य संग्रह के रूप में स्वागतेय है।

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Monday, August 1, 2022

संस्मरण | वह मेंढक राजकुमार नहीं था | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

संस्मरण : 
वह मेंढक राजकुमार नहीं था
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
           बचपन में मेंढकों की अनेक कहानियां सुनी थीं। कुएं के मेंढक से ले कर मेंढक राजकुमार और मेंढकी राजकुमारी तक की कहानियां। मुझे भी अपने जीवन में एक ऐसा मेंढक मिला जिसने मेरा हृदय परिवर्तन कर दिया और मेरे जीवन की दिशा ही मोड़ दी। वह मेंढक ही था, ख़ालिस मेंढक, कोई राजकुमार-वाजकुमार नहीं। लेकिन उसने यह बता दिया कि मैं क्या कर सकती हूं और क्या नहीं। यह भी कि मेरी सहन शक्ति कितनी है। घबराइए नहीं, मेंढक कोई काटने वाला प्राणी नहीं होता है। उसने मुझे कष्ट दे कर मेरी सहन शक्ति की पैमाइश नहीं की, वह तो खुद ही कष्ट में था। 
बात उस समय की है जब मैं शहडोल जिले के बिजुरी गांव में अपने मामाजी कमल सिंह चौहान के पास एक साल के लिए रहने गई थी। दरअसल, उन दिनों मामा जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था। वैसे कोई गंभीर बात नहीं थी लेकिन मेरी मां का बहनापा यह मानने को तैयार नहीं था कि उनके छोटा भाई पीलिया से ठीक होने के बाद की कमजोरी की अवस्था में अकेला रहे। मेरी वर्षा दीदी उस समय काॅलेज में पढ़ रही थीं और बिजुरी में काॅलेज नहीं था। इसलिए उनका मामाजी के पास रहना संभव नहीं था। मां स्वयं व्याख्याता थीं अतः उन्हें लम्बी छुट्टी नहीं मिल सकती थी। उन दिनों मेरे नानाजी संत श्यामचरण सिंह जीवित थे और हम लोगों के साथ ही रहते थे मगर वे  मोतियाबिंद ग्रस्त थे अतः उन्हें खुद सहारे की ज़रूरत पड़ती थी। यानी कुल मिला कर मैं ही थी जिसका 11वीं कक्षा में दाखिला होना था और बिजुरी में आदिमजाति विभाग द्वारा संचालित एकमात्र उच्चतर माध्यमिक विद्यालय था, जिसमें साईंस और आर्ट दोनों के विषय पढाए जाते थे। वर्षा दीदी ने बायोलाॅजी ग्रुप चुना था ताकि वे आगे चल कर डाॅक्टरी की पढ़ाई कर सकें। किन्तु एमबीबीएस डाॅक्टर बनना उनके भाग्य में नहीं था। जैसा कि मैंने घर में बड़ों को चर्चा करते सुन रखा था कि उन दिनों मेडिकल काॅलेज में दाखिले के लिए बहुत मोटी रकम देनी पड़ती थी, मां के लिए उतनी रकम दे पाना संभव नहीं हुआ और दीदी ने एमबीबीएस के बजाए बाॅटनी में एमएससी की ओर कदम बढ़ा दिए। लेकिन दीदी की किताबें, प्रैक्टिकल फाईल्स, उनका सोबर एटीट्यूड देख कर मुझे भी साईंस स्टूडेंट बनने का भूत सवार हो गया था। उन दिनों 9 वीं कक्षा से ही फैकल्टी और ग्रुप तय हो जाते थे। मैंने भी नौवीं से साईंस में बायो ग्रुप ले रखा था। वैसे भी मैथ्स तो मेरी आज भी बेहद कमजोर है। मैथ्स में मुझे रेखागणित ही सबसे अच्छी लगती थी, वरना मैं अंक गणित के बारे में सोचा करती थी कि यह भी कोई सवाल हुआ कि सौ लीटर वाली एक टंकी को एक नल एक घंटे में भर रहा है और दूसरा नल सवा घंटे में खाली कर रहा है तो एक घंटे बाद टंकी में कितना पानी बचेगा? कुल मिला कर यह बकवास सवाल था मेरी दृष्टि में। 
मुझे बायोग्रुप में बाॅटनी, जूलाॅजी, फिजिक्स, केमिस्ट्री चारो अच्छे लगते थे। ड्राईंग में मुझे बचपन से रुचि थी इसलिए मेरी प्रैक्टिकल फाईल में सबसे बेहतरीन ड्राइंग रहती थी। बस, अपनी ख़राब रायटिंग के कारण लेबलिंग में मुझे अधिक समय खपाना पड़ता था। उन दिनों आमतौर पर 11 वीं कक्षा से ही जूलाॅजी के प्रैक्टिकल की शुरूआत होती थी। लगभग आधा सिलेबस हो जाने पर एक दिन जूलाॅजी वाले सर ने कक्षा में घोषणा की कि अगले दिन डिसेक्शन कराया जाएगा। सभी लोग मेंढक की एनाॅटामी के बारे में अच्छी तरह से पढ़ कर आएं। यह सुन कर मुझे बड़ा मजा आया क्यों कि मुझे मेंढक की एनाॅटामी लगभग कंठस्थ थी। मैंने मेंढक की रक्तवाहिनियों, स्नायुतंत्र और अस्थियों के अनेक चित्र अपनी प्रैक्टिकल फाईल में सजा-सजा कर बनाए थे। उन दिनों मोबाईल तो दूर, फोन की सुविधा भी नगरसेठ के घर या थाने में ही थी, वरना मैं उसी समय वर्षा दीदी को फोन कर के बताती कि कल मैं भी डिसेक्शन करने वाली हूं। मैं भी डिसेक्शन करूंगी, यह सोच-सोच कर खुद को किसी बड़े साईंटिस्ट से कम नहीं समझ रही थी। मेरी कक्षाएं सुबह की शिफ्ट में लगती थीं औैर मामाजी की ड्यूटी दोपहर की शिफ्ट में रहती थी। हम लोग रास्ते में ही आपस में मिलते थे, जहां बता पाना उचित नहीं था। इसलिए उन्हें यह खुशख़बरी देने के लिए मुझे शाम पांच बजे तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। 
जैसे-तैसे दूसरा दिन आया। मुझे जूलाॅजी के पीरियड का बेसब्री से इंतज़ार था। अंततः वह पीरियड भी आ गया। सर हम सभी छात्र-छात्राओं को, यानी साईंस पढ़ने वाले कुल जमा सात स्टूडेंट्स में छः छात्र और अकेली मैं छात्रा थी, हम सभी को लेकर प्रयोगशाला पहुचें। वह स्कूल की एकमात्र प्रयोगशाला थी जिसमें बाॅटनी, जूलाॅजी, फिजिक्स, केमिस्ट्री चारो की एक-एक आलमारियां थीं और चारो विषयों के प्रैक्टिकल उसी कक्ष में हुआ करते थे।
प्रयोगशाला में टेबल पर अलग-अलग सात डिसेक्शन ट्रे रखी गई थीं। हम सर के निर्देशानुसार अपनी-अपनी ट्रे के सामने खड़े हो गए। ट्रे के बाजू में डिसेक्शन की कैंची, छुरी, कांटें, पिन्स आदि रखे हुए थे। सर एक बड़ी-सी बाल्टी ले कर आए जिसमें अर्द्धबेहोश मेंढक थे। सर ने कहा कि हम उनमें से एक-एक मेंढक उठाएं और अपनी-अपनी ट्रे में उसकी चारों टांगें पिन से टांक दें। मेंढक को नंगे हाथों से पकड़ना? उफ! ईईई! मेरी हिम्मत नहीं हुई। सर ने आंखें तरेरते हुए आदेश दिया कि ‘‘चलो उठाओ मेंढक! डिसेक्शन करना है या नहीं?’’
‘‘करना है!’’ मैंने मरे हुए स्वर में उत्तर दिया। उस समय के अनुभव को बयान कर पाना कठिन है कि मैंने कैसे मेंढक को अपने नंगे हाथों से उठा कर ट्रे में पिन किया। मुझे लगा कि इस तरह पिन करने से उसे दर्द होगा। मैंने यह बात सर से कह दी। तो उन्होंने उत्तर दिया कि अभी तो उसे चीरा लगा कर काटना है और उसके अंदर के अवयव देखना है। यह सब मेरे लिए भयानक अनुभव था। लेकिन असली टेज़ड्री तो अभी होनी बाकी थी। 
सर ने मेंढक को चीरा लगाने का तरीका बताया। यह इतनी सावधानी से करना था कि उसकी स्किन भर कटे, कोई नस न कटे। मगर मैं तो पहले से ही नर्वस थी। मेंढक की नस क्या मैं अपनी नस पर भी चाकू चला सकती थी। कांपते हाथों से मैंने चीरा लगाया। फिर वही हुआ जो नहीं होना चाहिए था। पूरी ट्रे मेंढक के रक्त से भर गई। मैंने उसकी कोई नस काट दी थी। इसके बाद तो मेरा सिर चकराने लगा। सर, ने मुझे डांटा या समझाया मुझे याद नहीं। इतना याद है कि उन्होंने मुझे जा कर कक्षा में बैठने को कहा और साथ ही यह भी कि ‘‘कोई बात नहीं, कल फिर से ट्राई करना।’’
पता नहीं कितनी देर बाद मैं स्थिरचित्त हो पाई। घर लौटने पर मैंने अपने दोनों हाथ साबुन घिस-घिस कर, रगड़-रगड़ कर धोए। मगर मेंढक की वह छुवन तो मानो मेरी उंगलियों और हथेलियों में चिपक गई थी। दो-तीन दिन तक मुझसे ढंग से खाना नहीं खाया गया। रह-रह कर रक्त भरी ट्रे और उसमें मौजूद चीरा लगा मेंढक मुझे दिखाई देता था। इस घटना के बाद मैंने जान लिया कि जूलाॅजी की थ्योरी तो मैं पढ़ सकती हूं लेकिन प्रैक्टिल करने का कलेजा मेरे पास नहीं है। मैंने तय कर लिया कि 11वीं उत्तीर्ण होते ही जूलाॅजी छोड़ दूंगी। इस तरह उस मेंढक ने अपनी जान देकर मुझे मेरी हक़ीकत से परिचित करा दिया कि मैं चीरा-फाड़ी, रक्तपात देख ही नहीं सकती हूं। यह मेरे वश का नहीं है। इधर केमिस्ट्री वाले सर के जबरिया ट्यूशन फंडे के कारण केमिस्ट्री से अरुचि हो ही चली थी और अब जूलाॅजी से सन्यास की भावना जाग उठी। अतः काॅलेज में पहुंच कर साईंस से अलगाव होना तय था। काॅलेज पहुंचते ही मैं एक उम्दा आर्ट स्टूडेंट बन गई। शरारती, खिलंदड़ी और मनमौजी। अब इतिहास की किताबों में रक्तपात था, मेरी आंखों के सामने नहीं और न मेरे हाथों से। वह मेंढक राजकुमार नहीं था लेकिन मेरा हृदय परिवर्तन और विषय परिवर्तन दोनों करा गया।           
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धन्यवाद #नवभारत 🙏
31.07.2022
#संस्मरण #डॉसुश्रीशरदसिंह #हिंदीसाहित्य #लेख #memoir  #mymemories  #DrMissSharadSingh

Article | Fire, Freezing And Forests | Dr (Ms) Sharad Singh | Central Chronicle

Article | Fire, Freezing And Forests | Dr (Ms) Sharad Singh | Central Chronicle 
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Article
Fire, Freezing And Forests

-    Dr (Ms) Sharad Singh
Writer, Author & Social Activist
Blogger - "Climate Diary Of Dr (Ms) Sharad Singh"

            Climate change has increased the incidence of wildfires in the world in recent years, while record-breaking winter cold left no stone unturned to freeze the world. These events are coming to us every year more effectively than ever before. If we still believe that due to the cutting of forests, there is no fire in the remaining forests or the temperature reaches below the freezing point in winter even in normal areas and for this also the lack of forests is not responsible, then we should assume that we have made our future insecure.
In the fire near Yoshimite National Park, 12,000 acres of forest have been destroyed. About 3,000 people became homeless. The rapidly spreading forest fire forced more than 6,000 people to leave their homes to move to safer places. In view of the increasing risk of fire, Governor Gavin Newsom declared emergency in Mariposa County, California. 

In the same time, American news agency said that "the Alaska is burning this year in ways rarely or ever seen, from the largest wildfire in a typically mainly fireproof southwest region to a pair of blazes that ripped through forests and produced smoke that blew hundreds of miles to the the Bering Sea community of Nome, where the normally crystal clear air was pushed into the extremely unhealthy category. Already more than 530 wildfires have burned an area the size of Connecticut and the usual worst of the fire season lays ahead. While little property has burned, some residents have been forced to evacuate and one person was killed - a helicopter pilot died last month when he crashed while attempting to carry a load of equipment for firefighters."
Heat waves and droughts, which are exacerbated by a warming climate, are making wildfires more frequent, destructive, and harder to fight in many places. In few month ago Portugal, Spain, France, England and Germany also had affected by wildfires. No doubt, the incidence of forest fires is increasing worldwide due to climate change. According to the Council on Energy Environment and Water (CEEW) report, the incidence of forest fires has increased in India in the last two decades. More than 62 percent of India's states have been affected by forest fires. 

For the last few years, we are seeing the destruction of the forests of our earth in two ways. One is cutting down the forests for their own selfishness and secondly, the ever increasing incidents of forest fires are mixing the forests into ashes. The most recent example of a plan to destroy the forest for selfishness is the plan to cut the forests of Buxwaha in Chhatarpur district of Madhya Pradesh, India. According to the estimates of the agencies, more than two lakh trees will be cut just because diamonds have been found in that forestland. Instead of trees that give invaluable oxygen, we are going to choose precious diamonds. By the luck of these trees right now The National Green Tribunal's Bhopal bench has stayed the felling of trees in Buxwaha for diamond mining. Otherwise we have proved that we love diamonds and jewels more than life.
We have constantly shortened the forests to build big dams, and sometimes to expand cities. This is having a profound effect on wildlife. Wild animals are being forced to enter cities, where they are killed by humans. Due to this the behavior of wild animals is also changing. According to wildlife experts, the single-living leopard has been seen in groups of six to eight leopards in many places in India. This change in the behavior of wild animals is worrying. Deforestation has a direct impact on the environment. The temperature of the earth is increasing, along with the aridity is also increasing. Due to this the dangers of forest fires are increasing. The latest example of this we have seen as forest-fire of California. Wherever the forest is cut, its effect falls on the whole earth. Similarly, fire anywhere in the forests, its heat and carbon dioxide affects the whole earth. Experts say that if the temperature of the earth increases by 1.5 ° C as a result of climate change, then it can have very serious consequences. So far, global temperatures have risen by 1.2 °C from pre-industrial levels.
Under the 2015 Paris climate agreement, the goal was to allow the global average temperature to rise no more than 2 °C and it was said that it would not be allowed to exceed 1.5 °C. The final IPCC report, published in 2013, said that humans have been the 'major cause' of climate change since 1950. Climate change has been considered as the reason for the rapid increase in cases of forest fires and floods in the last few months. The report has also included those chapters in which cases of severe weather are coming to the fore due to rising temperatures. "They have been reluctant at first to specify an upper limit for sea level rise, but we think it's time to warn about this," says Professor Arthur Peterson from UCL in London.

Right now we are witnessing forest fires and half the world scorching with heat, whereas the situation will turn exactly the opposite when the cold weather arrives. Those places will face extreme freezing, fog and falling temperatures that have never fallen below about 10 °C before. Actually, due to the effect of global warming, it is getting warmer, the winter season is getting colder. In recent years, it has been seen that due to the polar vortex, the weather becomes very cold. This is a cyclone of cold winds, which comes at the poles and due to this the temperature goes down several degrees below zero. Increasing signs have been seen that these polar vortices are now forming mostly outside the Arctic. And the reason for this is jet streams. They contribute a lot in keeping the weather warm. Due to these winds, the Arctic is constantly warming and this polar vortex, moving south, reached America last winter, causing the temperature in America to drop several degrees below zero. Its effect was seen in the form of winter cold in all the continents of the world.

So, if we want to understand the effects of climate change, first we have to understand the relationship between fire, cold and forests. 
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 (31.07.2022)
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