Wednesday, February 8, 2023

चर्चा प्लस | जोशीमठ से टर्की तक चेतावनी दे रही हैं धरती माता | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
जोशीमठ से टर्की तक चेतावनी दे रही हैं धरती माता
 - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                      
       6 फरवरी को दक्षिणी टर्की में आए भूकंप ने 10 शहरों को तबाह कर दिया और हज़ारों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। सीरिया, लेबनान, इज़रायल और साइप्रस की धरती हिल गई। टर्की के इस भूकंप ने टर्की की भूमि के साथ ही दुनिया भर के दिलों को भी हिला दिया। यह भूकंप विनाशकारी 7.8 रिक्टर स्केल पर था। हम भारतवासी भूकंप के छोटे-छोटे झटके लगातार झेल रहे हैं-कभी दिल्ली-एनसीआर, तो कभी महाराष्ट्र, कभी बिहार, कभी उत्तरप्रदेश तो कभी मध्यप्रदेश। हिमालय परिक्षेत्र भूकंप के प्रति अतिसक्रिय है तो अण्डमान निकोबार भी अछूता नहीं है। जोशीमठ की आपदा भी धरती माता की ओर से एक चेतावनी है। लेकिन हम हैं कि मानों चेतावनियों पर ध्यान देना भूल चुके हैं।  
ज़लज़ला आया और आ के हो गया रुख़सत मगर
वक़्त  के रुख़  पे  तबाही की इबारत लिख गया।
- शायर फ़राज़ हामिदी का यह शेर जोशीमठ से टर्की तक की आपदा की पीड़ा को बाखूबी बयां करता है।
            मुझे याद आ रही है एक कहानी जो मैंने प्रायमरी स्कूल के दौरान पढ़ी थी। सिलेबस में या सिलेबस के बाहर, यह याद नहीं है। बहुत सोचा लेकिन उस कहानी के लेखक का नाम याद नहीं आ रहा है। सो, यदि किसी को लेखक का नाम पता हो तो मुझे जरूर बताने का कष्ट करे। उस कहानी का कथानक और शिल्प इतना प्रभावी था कि कहानी आज भी मुझे याद है। यह कहानी सन् 1935 में क्वेटा में आए भीषण भूकंप की चर्चा पर आधारित थी। क्वेटा पहले भारत का हिस्सा था लेकिन अब पाकिस्तान में है और बलूचिस्तान प्रांत की राजधानी है। कहानी का सारांश यह था कि कपड़ा बेचने वाला एक दूकानदार अपने दूकान में दूकानदारी कर रहा है। वह ग्राहकों को कपड़ा दिखाता है और उनसे क्वेटा में हुई जान-माल की हानि के बारे में प्रश्न करता जाता है। वह एक प्रश्न करता है कि कैसा कपड़ा चाहिए? तो उसका दूसरा प्रश्न होता है कि क्वेटा में कितने लोग मारे गए? फिर वह कपड़े की खूबियां बताता है और साथ में पूछता है कि वहां तो सब कुछ बर्बाद हो गया होगा? इसी प्रकार पह कपड़ा बेचते हुए वह अपने ग्राहकों से क्वेटा में आए भूकंप की भीषणता की चर्चा करता है, जानकारी लेता है और अपनी चिंता व्यक्त करता है। भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा और मानवीय जीवन संबंधी विवशताओं के समीकरण पर यह अद्भुत कहानी थी। लेकिन आज स्थिति इससे दुखद हो गई है। आज भूकंप के खतरे बढ़ गए हैं लेकिन हमारे सरोकार प्रकृति को ले कर वर्तमानजीवी हो गए हैं। इसका ताजा उदाहरण मेरे साथ ही घटित हुआ। आज सुबह जब मैंने अपने परिचित से चर्चा की कि टर्की में कितना विनाशकारी भूकंप आया है तो पहले तो उन्होंने अनभिज्ञता प्रकट की जब कि भूकंप की ख़बरों से टीवी और मोबाईल अपडेट भरे हुए थे। फिर भी उन्हें पता नहीं था। खैर, मैंने उन्हें बताया कि भूकंप की तीव्रता 7.8 रिक्टर स्केल थी। लेकिन उन्होंने मेरी बात को अनसुना करते हुए पूछा कि टर्की तो मुस्लिम देश है न? मैं उनका प्रश्न सुन कर अवाक रह गई। भूकंप में मरने वाले मनुष्य थे, हिन्दू या मुस्लिम तो बाद की बात है। इसके बाद मुझे समझ में नहीं आया कि मैं उस उच्च शिक्षित (?) व्यक्ति से टर्की के भूकंप के बारे में आगे क्या बात करूं? फिर भी मैंने खुद को तसल्ली दी और चर्चा को भूकंप पर केन्द्रित किया। तो इस पर वे लापरवाही से बोले कि हां, अभी महाराष्ट्र में भूकंप आया था लेकिन अपने यहां सागर में कोई ख़तरा नहीं है। मैंने पूछा कि आप इतने दावे से कैसे कह सकते हैं कि यहां कभी भूकंप नहीं आएगा? तो उन्होंने उत्तर दिया कि यहां न तो कोई बड़ी नदी है और कोई बड़े पहाड़। उनके इस ज्ञान ने मुझे उन्हें याद दिलाने को मजबूर कर दिया कि हम जिस ठोस जमीन पर रह रहे हैं वह टेक्टोनिक प्लेट्स पर टिकी हुई है और ये प्लेट्स भू-केन्द्र के तरल पदार्थ पर तैर रही हैं। फिर मैंने उन्हें याद दिलाया कि जब-जब जबलपुर में भूकंप के झटके आए हैं तब-तब उसकी तरंगे हमारे सागर शहर की भूमि को भी मामूली स्तर पर हिला चुकी हैं।

भूकंप के जिस ज्ञान को हम अपनी छोटी कक्षाओं में अर्जित कर चुके हैं उन्हें बड़े हो कर कैसे भूलते जा रहे हैं? यह सोच कर आश्चर्य होता है। आज हमें सोने (गोल्ड) के भाव के उतार-चढ़ाव की चिंता रहती है लेकिन प्रकृति को अपने द्वारा पहुंचाए जा रहे नुकसान की चिंता नहीं रहती है। जबकि सोना हमें सुख दे सकता है पर जीवन नहीं। राजा मिडास की कहानी ने यही तो समझाया था हमें। जिसने राजा मिडास की कहानी सुनी होगी उसे याद होगा कि राजा मिडास ने भगवान से वरदान मांगा कि वह जिस चीज को छुए वह सोने की हो जाए। मिडास ने अपना महल, सिंहासन, पेड़-पौधे अब को छू-छू कर सोने का बना लिया। यहां तक कि जब उसने अपनी पत्नी, अपनी बेटी को छुआ तो वे भी सोने की मूर्ति में बदल गईं। फिर उसे जब भूख लगी और वह खाने बैठा तो हाथ लगाते ही भोजन सोने में बदल गया। पानी भी सोने में बदल गया। जब भूख-प्यास से प्राण निकलने की नौबत आ गई तब कहीं जा कर राजा मिडास को अपनी भूल का अहसास हुआ। लेकिन तब तक पहुत देर हो चुकी थी। जाने-अनजाने हम भी राजा मिडास की तरह प्रकृति को भूल कर लालच की ओर तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। स्थिति यह है कि हम जिस डाल पर बैठे हैं उसी को जड़ से काटते जा रहे हैं। भूकंप की बढ़ती संख्या और बढ़ती तीव्रता उसी का दुष्परिणाम है जो हमने प्रकृति को क्षति पहुंचाई है। हमने पेड़ काटे, जंगल छोटे कर दिए, भूमि से उसकी नमी सोख ली, भूमि पर मिट्टी का ठहराव घटा दिया। बड़े-बड़े बांध बना कर स्थिर और ठोस जमीन को लहरों वाले तरल पानी से भर दिया। गगनचुंबी इमारतों के जंगल खड़े कर दिए, यह ठीक से जांचे बिना कि वहां की भूमिगत चट्टानें उन इमारतों का बोझ उठा सकती हैं या नहीं? नए सरकारी नियम हैं कि भूकंप सुरक्षित भवन बनाए जाएं लेकिन सच्चाई किसी से छिपी नहीं है कि इसका पूरी तरह से पालन बहुत कम होता है। जैसे नियम बनाया गया था कि नए भवनों पर रूफ वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाया जाए लेकिन गोया हम मान कर चलते हैं कि नियम बस्तों में बंधे रहने के लिए होते हैं। टर्की तो एक विकसित देश है। वहां आधुनिक संसाधन अपनाए जाते हैं। फिर भी वहां की मल्टीस्टोरी इमारतें भूकंप की 7.8 की तीव्रता नहीं झेल सकीं। तो हमारा क्या होगा जब हमें इस तीव्रता का भूकंप झेलना पड़ेगा?

तुर्की और सीरिया में आए विनाशकारी भूकंप से दोनों देशों के कई शहरों में भारी तबाही हुई है। रिक्टर पैमाने पर भूकंप की तीव्रता 7.8 मापी गई और इससे हजारों लोगों के मारे गए हैं। भूकंप और इससे मची भारी तबाही के बाद तुर्की की सरकार ने देश में आपातकाल लगाने की घोषणा कर दी है। बताया गया कि सुबह करीब 4.17 बजे आया भूकंप करीब 1 मिनट तक जारी रहा। उस वक्त लोग अपने घरों में सो रहे थे। भूंकप के झटके साइप्रस और मिस्र तक महसूस किए गए। भूकंप का केंद्र तुर्की के 26 किलोमीटर दूर गजिएनटेप शहर के पूर्व में नूरदा के पास केंद्रित था। इस इलाके की आबादी करीब 20 लाख है जिसमें पांच लाख सीरियाई शराणार्थी हैं और यह सीरिया और तुर्की की सीमा पर स्थित। तुर्की दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंप क्षेत्रों में से एक है।
मां पहले प्यार से समझाती है। फिर भी बच्चा तोड़-फोड़ करने को उतारू रहता है तो मां विवश हो कर उस पर हाथ उठाती है ताकि वह सुधर जाए। भूकंप के रूप में धरती माता हमें बार-बार चेतावनी दे रही है कि विकास के नाम पर प्रकृति से खिलवाड़ करना बंद करो। लेकिन हम उनकी चेतावनी को लगातार अनसुना कर रहे हैं। इसका ताज़ा उदाहरण जोशीमठ आपदा के रूप में हमारे सामने है। अक्टूबर 2021 में उत्तराखंड के जोशीमठ शहर के कुछ घरों में पहली बार दरारें दिखाई दीं। एक साल बाद, 11 जनवरी तक, शहर के सभी नौ वार्डों में 723 घरों के फर्श, छत और दीवारों में बड़ी या छोटी दरारें दिखने लगीं। कई घरों में पोल उखड़ गए। जवाब में, शहर के भीतर कई परिवारों को अस्थायी रूप से सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया है। लेकिन बेहतर होता कि आपदा की आहटें पहले ही सुन ली गई होतीं।

अभी हाल ही में मेरा एक लेख प्रकाशित हुआ था -‘‘ए लेसन फ्राॅम जोशीमठ: डोंट प्ले विथ इंवायरमेंट एंड क्लाईमेट’’ (सेंट्रल क्राॅनिकल, 5 फरवरी 2023), जिसमें मैंने लिखा था जिसका एक अंश यहां दे रही हूं -‘‘जब प्रसिद्ध स्विस भूविज्ञानी अर्नोल्ड हेम और उनके सहयोगी ऑगस्टो गैस्टर ने 1936 में मध्य हिमालय की भूवैज्ञानिक संरचना पर पहला अभियान चलाया, तो उन्होंने अपना यात्रा वृतांत ‘‘द थ्रोन ऑफ द गॉड्स (1938)’’ और शोध कार्य ‘‘सेंट्रल हिमालय: जियोलॉजिकल द ऑब्जर्वेशन’’ रिकॉर्ड किया। स्विस अभियान 1936 (1939) ने विवर्तनिक दरारों, मुख्य केंद्रीय दोष (एमटीसी) की उपस्थिति की पहचान की, और चमोली गढ़वाल में हेलंग से तपोवन तक के क्षेत्र को भूगर्भीय रूप से संवेदनशील बताया। मध्य हिमालय के भूविज्ञान पर अनुसंधान और अध्ययन आगे बढ़े इसके बाद 1976 में ‘‘मिश्रा समिति’’ ने भी अध्ययन कर जोशीमठ को संवेदनशील घोषित कर इलाज के सुझाव दिए। सन 2022 में उत्तराखंड सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग ने भी जोशीमठ पर मंडरा रहे खतरे की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया था। इन तमाम चेतावनियों के बाद भी जोशीमठ को बचाने की कोशिश नहीं की गई, बल्कि वहां बड़ी-बड़ी इमारतों का जंगल उगता चला गया। बढ़ती जनसंख्या के कारण जोशीमठ के गर्भ में उतरता रहा। आज जोशीमठ उसी दलदल पर असहनीय बोझ तले दबकर अलकनन्दा की ओर सरक रहा है। उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने शहर के भूवैज्ञानिक और भू-तकनीकी सर्वेक्षण के लिए अगस्त 2022 में एक बहु-संस्थागत टीम का गठन किया। टीम ने सितंबर में अपनी रिपोर्ट पेश की, यह देखते हुए कि जोशीमठ एक अस्थिर नींव पर खड़ा है जो बारिश, अनियमित निर्माण से क्षतिग्रस्त हो सकता है। कमजोर प्राकृतिक नींव के अलावा, रिपोर्ट में कहा गया है कि जोशीमठ-औली रोड के किनारे कई घर, रिसॉर्ट और छोटे होटल बनाए गए हैं जो जमीन को कमजोर कर रहे हैं। पिछले कुछ समय से जोशीमठ के फिसलने की रफ्तार अचानक बढ़ गई है. जमीन धंसने से पूरा जोशीमठ डूब रहा है। सैकड़ों इमारतें अब रहने योग्य नहीं हैं। कई जगह जमीन पर चैड़ी-चैड़ी दरारें भी पड़ने लगी हैं। कहीं-कहीं जमीन फटने से पानी निकल रहा है। भारत के चार सबसे ऊंचे धार्मिक स्थलों में से एक ज्योतिर्पीठ की दीवारों पर भी दरारें आ गई हैं। भूवैज्ञानिक पहले ही शहर को तुरंत खाली करने की चेतावनी देते रहे हैं।’’

6 फरवरी को टर्की में आए भूकंप में भी लगभग यही बात सामने आ रही है कि वैज्ञानिकों ने पहले ही चेतावनी दी थी। बल्कि नीदरलैंड के शोधकर्ता वैज्ञानिक फ्रेंक होगरबीट्स ने 3 फरवरी को एक ट्वीट कर के लिखा था कि निकट भविष्य में, दक्षिण-मध्य तुर्की, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान में 7.5 तीव्रता का भूकंप आएगा। अपने ट्वीट के साथ उन्होंने भूकंप का केंद्र दिखाते हुए एक नक्शा भी शेयर किया था। उनकी बात सही निकली। बल्कि उनकी चेतावनी से दशमलव तीन प्रतिशत अधिक का यानी 7.8 तीव्रता का भूकंप आया।  
यदि बात करें भारत की तो सितंबर 2019 में, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनएमडीए) ने एक भूकंप आपदा जोखिम सूचकांक (एड्री) रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें महानगरों और भूकंपीय क्षेत्र जोन चार और जोन पांच के शहरों सहित 50 शहरों पर विशेष रूप से ध्यान दिया गया था। सर्वेक्षण किए गए शहरों में से 30 शहर (दिल्ली सहित) मध्यम स्तर के जोखिम पर हैं और 13 (शिमला सहित अधिकतर हिमालयी शहर) उच्च जोखिम पर हैं। लेकिन साथ में यह भी कहा गया कि दिल्ली को भी एक बड़े जोखिम का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि अधिकांश शहर स्व-निर्मित है। बिना तकनीकी इनपुट के जो इसे उच्च तीव्रता वाले भूकंपों के प्रति संवेदनशील बनाता है। दरअसल हमने प्रकृति को निरंतर नुकसान पहुंचा कर उसे अशांत कर दिया है। हम भूगर्भीय हलचलों को रोक नहीं सकते हैं लेकिन प्रकृति को संरक्षित कर के नुकसान की तीव्रता को कम कर सकते हैं। बशर्तें हम समय रहते सचेत हो जाएं और धरती माता द्वारा दी जा रही चेतावनियों पर ध्यान देना शुरू कर दें। यदि हमें किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा से बचना है तो प्रकृति-मित्र बनना होगा।
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Tuesday, February 7, 2023

पुस्तक समीक्षा | बुंदेली के विकास को गति देने वाला एक उत्तम शब्दकोश | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


प्रस्तुत है आज 07.02.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखक डाॅ. आर.पी. पाण्डेय  की पुस्तक "बुंदेली शब्दकोश" की समीक्षा...
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पुस्तक समीक्षा
बुंदेली के विकास को गति देने वाला एक उत्तम शब्दकोश
       - समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक    - बुंदेली शब्दकोष
लेखक    - डाॅ. आर.पी. पाण्डेय
प्रकाशक   - स्वराज प्रकाशन, 4648/1, 21 अंसारी रोड, दरियरगंज, नई दिल्ली -110002
मूल्य      - 195/-
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किसी भी विषय या विधा में पुस्तक लिखना उतना कठिन नहीं है जितना कि एक शब्दकोश लिखना। यह बहुत श्रमसाध्य कार्य है। इसके लिए बहुत शोध और धैर्य की आवश्यकता होती है। यह बात भी महत्वपूर्ण है जिस आयु में पहुंच कर लोग आराम से जीवन बिताना चाहते हैं उस उम्र में भी इतने बेहतरीन शब्दकोश का निर्माण करना अपने में ही एक आदर्श और अनुकरणीय बात है।

हम आजकल जब लोग गांव से शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। रोजगार में भाषा का आधार अंग्रेजी तथा अनुसूची में दर्ज़ भारतीय भाषाएं हैं जिसके कारण धीरे-धीरे हम अपनी बोलियों को भूलते जा रहे है। यह शब्दकोश ऐसे तमाम लोगों को एक बार फिर अपनी माटी से जुड़ने में मदद करेगा और अपनी बोली को ले कर उनके मन में गर्व की भावना स्थापित करेगा। यह शब्दकोश युवा पीढ़ी को भाषा का ज्ञान देने में बेहद कारगर और उपयोगी साबित होगा।

यहां मैं एक अपना अनुभव साझा करना चाहती हूं कि एक आईएएस प्रशासनिक अधिकारी से बुंदेली के बारे में मेरी चर्चा हो रही थी और उन्होंने कहा कि उन्हें बुंदेली समझ में नहीं आती है। वे पहले कभी बुंदेलखंड में रहे भी नहीं थे। अतः यह समस्या स्वाभाविक थी। मैंने उनसे मज़ाक में कहा कि मेरा काॅलम ‘‘बतकाव बिन्ना की’’ पढ़ा कीजिए, जल्दी बुंदेली सीख जाएंगे। तो उन्होंने उत्तर दिया कि ‘‘मैं आपका काॅलम पढ़ता हूं, बुंदेली समझने का प्रयास भी करता हूं लेकिन कई शब्दों के अर्थ समझ नहीं पाता हूं। बार-बार किसी से पूछना अच्छा भी नहीं लगता है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि हमें अपने प्रशासनिक क्षेत्र की बोली आती हो तो ग्रामीण अंचल के लोगों से संवाद करना आसान हो जाता है, उनकी समस्या जानना आसान हो जाता है। देखा जाए तो अपनी पदस्थापना क्षेत्र की बोली का ज्ञान होना हमारे लिए जरूरी भी है।’’ यह प्रसंग मुझे इस शब्दकोश को पढ़ते समय याद आया और मैं उन्हें इसे मंगाने की सलाह दूंगी ताकि वे आसानी से बुंदेली शब्दों को समझ सकें।
कहने का आशय यह है कि इस प्रकार के शब्दकोश प्रशासनिक अमले के लिए भी उपयोगी होते हैं। ‘‘बुंदेली शब्दकोष ’’ बुंदेलखंड के उन प्रशानिक अधिकारियों के लिए उपयोगी होगा जो बुंदेली से परिचित नहीं है।

वस्तुतः शब्दकोश, एक भाषा के शब्दों का एक संग्रह होता है जिसमें, सूचना, परिभाषाएं, उच्चारण, अनुवाद, अर्थ अन्य जानकारियां उपलब्ध रहती हैं। अर्थात शब्दकोश उस ग्रंथ को कहते हैं जिसमें अक्षरक्रम/वर्णक्रम से शब्द और उनके अर्थ दिए गए होते हैं। ऐसा ग्रन्थ जिसमें किसी भाषा के शब्दों का वर्णक्रम में संग्रह तथा उसी भाषा अथवा अन्य भाषा में विभिन्न शब्दों के उच्चारण व अर्थ दिए गये हों। कुछ शब्दकोशों में शब्दों से सम्बन्धित मुहावरे और प्रयोग भी दिए जाते हैं। संस्कृत में शब्दकोष के लिए निघण्टु, नाममाला, माला शब्दार्णव, अभिधान आदि शब्द प्रचलित रहे हैं। हिंदी भाषा में भी ‘कोश’ और ‘कोष’ शब्द ‘शब्दकोष’ तथा ‘खजाना’ के अर्थ में प्रयुक्त होते थे। परंतु 20वीं शताब्दी के मध्य तक आते-आते ‘कोश’ शब्द का प्रयोग ‘शब्दकोश’ के लिए और ‘कोष’ का प्रयोग ‘खजाना’ के लिए रूढ़ हो गया है। अमरसिंह के प्रसिद्ध ‘अमरकोष’ का मूलनाम ‘नाम लिगानुशासन’ था जिसे बहुत बाद में ‘अमरकोष’ कहा जाने लगा जब ‘कोश’ का प्रयोग आज के अर्थ में रूढ़ हो गया। अंग्रेजी भाषा में कोश के लिए ‘डिक्शनरी’ शब्द प्रयुक्त होता है, जिसकी उत्पत्ति लैटिन का ‘‘डेक्स्रे’’ शब्द से हुआ है। लैटिन में इसका अर्थ होता है- कहना या बोलना। इस प्रकार अंग्रेजी में कहे या बोले गए शब्दों के संग्रह को डिक्शनरी कहा गया। शब्दकोश एकभाषीय, द्विभाषिक या बहुभाषिक हो सकते हैं। कुछ शब्दकोशों में चित्रों का सहारा भी लिया जाता है। अलग-अलग कार्य-क्षेत्रों के लिये अलग-अलग शब्दकोश हो सकते हैंय जैसे - विज्ञान शब्दकोश, चिकित्सा शब्दकोश, विधिक (कानूनी) शब्दकोश, गणित का शब्दकोश आदि।

भाषा की भांति ही बोलियों के शब्दकोश भी तैयार किए जाते हैं। इनमें आंचलिक बोली के शब्दों का हिन्दी अथवा अन्य भाषा में अर्थ, समानार्थ, प्रकृति आदि दी जाती है। ‘‘बुंदेली शब्दकोष’’ इसी क्रम का शब्दकोश है जिसमें बुंदेली बोली के शब्दों का हिन्दी में अर्थ दिया गया है। यह वस्तुतः बुंदेली-हिन्दी शब्दकोश है।
प्रत्येक व्यक्ति के अपने भावों और विचारों को व्यक्त करने की अपनी एक अलग शैली होती है। वह अपने मुख से जिस तरह की वाणी का प्रयोग करते हुए अपने विचारों को दूसरों के सामने प्रकट करता है, वह है उसकी ‘‘निज बोली’’ होती है। बोली शब्द अंग्रेजी में ‘‘डायलेक्ट’’ कहा जाता है। भाषा विज्ञान की दृष्टि से इसे ‘‘उप-भाषा’’ या प्रान्तीय-भाषा भी कहते हैं। एक भाषा के अन्तर्गत कई बोलियां होती हैं। बोली किसी भाषा के एक ऐसे सीमित क्षेत्रीय रुप को कहते हैं, जो ध्वनि, रुप, वाक्य-गठन, अर्थ, शब्द-समूह तथा मुहावरे आदि की दृष्टि से उस भाषा के ‘‘परिनिष्ठित’’ तथा अन्य क्षेत्रीय रुपों से भिन्न होती है, इस तरह बोली ‘‘किसी सीमित क्षेत्र में बोली जाने वाली आंचलिक भाषा का एक रूप होती है, जो प्रायः साहित्य शिक्षा तथा शासन के कार्यों में भी व्यवहृत होती है।’’ बोली लोक साहित्य में प्रयुक्त होती है। यह भाषा का मानक रूप नहीं होता। अनौपचारिक स्थानों में बोली का प्रायः प्रयोग होता है। हमारी हिन्दी भाषा में अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी आदि बोलियां हैं। बुंदेली, ब्रज, अवधी, राजस्थानी अब विभाषा के रुप में प्रयुक्त होती हैं, इसमें काफी व्यापक साहित्य भी मिलने लगा है।

बोली का महत्व लोरी के समान है जो भाषाई ममत्व, संवेदना और अभिव्यक्ति से जोड़ती है। यह उस भौगोलिक मां से भी जोड़ती है जहां व्यक्ति जन्म लेता है। बोली जब तक बोली है तब तक वह मां की लोरी है, वही बोली जब भाषा के संस्कार ग्रहण कर लेती है तब वह व्याकरणीय नियमों में निबद्ध शास्त्रीय गायन बन जाती है।
बोली के शब्दों को प्रायः अपभ्रंश या अपूर्ण कह दिया जाता है किन्तु वास्तविकता में बोली के शब्द पूर्णतः मौलिक होते हैं। इनमें लेशमात्र कृत्रिमता नहीं होती है। किसी भी बोली के शब्द मन में आए विचारों की सहज अभिव्यक्ति होते हैं। इसीलिए हर सौ कोस में बोली के शब्दों का स्वरूप बदल जाता है। बोली का अनगढ़ स्वरूप ही इसकी आंतरिक शक्ति है।

किसी भी बोली के शब्दकोश की आवश्यकता क्यों है? इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि अपने गांव-घर से दूर गए व्यक्ति को शिद्दत से अपने गांव-घर की याद आती है। यदि उसे घर छोड़े वर्षों हो गए हों तो वहां की स्मृतियां परस्पर गड्डमड्ड हो कर उसके भीतर झिझक पैदा करने लगत हैं। ठीक यही स्थिति बुंदेली जैसी बोलियों की है। युवापीढ़ी अपनी बोली से बहुत दूर निकल गई है लेकिन मां, नानी, दादी की बोली की मिठास उसके मन से मिटी नहीं है। वह अपनी उस बोली से एक बार फिर जुड़ना चाहता है लेकिन कई शब्दों के अर्थ उसे पता नहीं हैं और यह समस्या उसे अपनी बोली की ओर लौटने से रोकती है। ऐसी स्थिति में आवश्यक हो जाता है एक शब्दकोश का पाया जाना।

बुंदेली शब्दकोश तैयार कर के डॉ आर.पी.पाण्डेय जी ने सचमुच एक बड़ा और महत्वपूर्ण काम किया है। इसका संपादन श्री टीकराम त्रिपाठी ने किया है। पुस्तक के संपादक श्री टीकाराम त्रिपाठी से जो परिचित हैं, वे उनकी भाषाई निपुणता से परिचित हैं। श्री त्रिपाठी हिंदी, अंग्रेजी और संस्कृत तीन भाषाओं के उपाधि प्राप्त ज्ञाता हैं। बुंदेली बोली और साहित्य से उनका जमीनी जुड़ाव है। अतः पुस्तक के संपादक का भी संक्षिप्त लेखकीय परिचय पुस्तक में दिया जाता तो उत्तम रहता। संपादक के परिचय की कमी खटकती है।

इस शब्दकोश में सहेजे गए शब्दों का जितना महत्व है उतना ही महत्व है कोश के आरंभिक पृष्ठों पर लेखक के प्राक्कथन, संपादक के संपादकीय तथा उस लघुलेख का जो डॉ सुरेश आचार्य ने शुभकामनाएं देते हुए ‘‘बुंदेली शब्दकोश का महत्व’’ के रूप में लिखा है। इनके अतिरिक्त प्रेमनारायण दयाल मलैया और डॉ प्रदीप कुमार बिसेन, कुलपति ज.ला.ने. कृषि वि.वि. जबलपुर के अभिमत भी हैं।

लेखक डॉ रामेश्वर प्रसाद पांडेय जिनका जन्म 15 अगस्त 1940 को सागर जिले के अचलपुर ग्राम में हुआ उन्होंने जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर से स्नातकोत्तर करने के उपरांत रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय से विद्यावाचस्पति की उपाधि प्राप्त की। वे उद्यानिकी विभाग के विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में कृषि एवं उद्यानिकी पर अपने शोध पत्र भी प्रस्तुत किए। उन्हें मिर्च, बैंगन, सेम आदि की उन्नत किस्में विकसित करने का भी श्रेय है। उन्होंने शोधात्मक पुस्तक ‘‘द पटैटो’’ (आलू) भी लिखी है और ‘‘बुंदेलखंड संस्कृति और साहित्य’’् नामक पुस्तक भी लिख चुके हैं, जिससे बुंदेलखंड के प्रति उनका लगाव जाहिर होता है। इस प्रकार देखा जाए तो डॉक्टर पांडे वैज्ञानिक दृष्टि के साथ ही भूमि की उर्वरा शक्ति से भी जुड़े हुए हैं। अतः जो व्यक्ति सच्चे अर्थों में भूमि के महत्व को समझता होगा जमीन से जुड़ा हुआ होगा वह गोलियों के महत्व को भली-भांति समझ सकता है और उसे स्थापना प्रदान कर सकता है।
लेखक ने प्राक्कथन में ‘‘बुंदेली भाषा का व्याकरणिक विश्लेषण’’ देते हुए बुंदेली शब्दों के वचन, लिंग, कारक, सर्वनाम, क्रिया के बारे में संक्षिप्त किन्तु महत्वपूर्ण जानकारी दी है। फिर भी व्यक्ति जहां की बोली में जन्म लेता है वहां के शब्द उसके मानस में अधिक ठहरते हैं। इसीलिए इस शब्दकोश में सागर क्षेत्र के बुंदेली शब्द-स्वरूप अधिक मिलेंगे। इस संबंध में डॉ सुरेश आचार्य का यह वाक्य सटीक है कि ‘‘उनका यह शब्दकोश मूलतः बुंदेली के सागरिया स्वरूप पर केंद्रित है मगर इसमें घटियाखाले और दतिया की बुंदेली के तत्व भी पहचाने जा सकते हैं।’’

अपने संपादकीय में श्री टीकाराम त्रिपाठी ने शब्दकोशों के रचयिता एवं बुंदेली बोली और शब्दों पर किए गए विशेष कार्यों का संक्षिप्त परिचय दिया है। वे लिखते हैं - ‘‘निघंटु के बाद हेमचंद्र, आचार्य रामचंद्र शुक्ल आप टैकोमा, राज बिहारी श्रीवास्तव, डॉ नगेंद्र हरदेव बाहरी प्रवृत्ति अनेक आचार्यों ने संस्कृत अपभ्रंश हिंदी और शब्दकोश ओं का प्रकाशन किया संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश और नागरी के साथ-साथ लोक भाषाओं के भी शब्दकोश प्रकाशित हुए। बुंदेलखंड में डॉ. नर्मदा प्रसाद गुप्त, आचार्य लोकनाथ सिलाकारी, डॉ. कांति कुमार जैन, डॉ. बलभद्र तिवारी आदि ने बुंदेली भाषा के अब गमन और उन्नयन के लिए अथक प्रयत्न किए। हाल ही में डॉ. सरोज गुप्ता, डॉ. रंजना मिश्रा के बुंदेली शब्दकोश प्रकाशित हुए हैं।’’
कुल 344 पृष्ठों के इस शब्दकोश के हार्डबाउंड का मूल्य स्वराज प्रकाशन द्वारा मात्र 195 रुपये रखा गया है जो इसे पूरी तरह ‘‘बजट मित्र’’ (पॉकेट फ्रेंडली) बनाता है। आर्थिक दृष्टि से यह मूल्य बुंदेली बोली के प्रति प्रेम को बढ़ावा देने वाला है। इस शब्दकोश में  मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश दोनों राज्यों में विस्तारित बुंदेलखंड के शब्दों को सम्मिलित किया गया है। जैसे क्रिया वाचक शब्द हुइए, हुइहै, हूहै जिसका अर्थ होता है ‘‘होगा’’। इसमें लेखक ने प्रत्येक शब्द के साथ उसकी प्रकृति अर्थात् शब्द के संज्ञा, विशेषण तथा क्रिया वाचक होना तो बताया है किंतु शब्दों का लिंग भी यदि बताया जाता तो इसे और संपूर्णता मिलती।

लेखक डाॅ. आर. पी. पाण्डेय तथा संपादक श्री टीकाराम त्रिपाठी प्रशंसा के पात्र है कि उन्होंने ऐसे समय में बुंदेली शब्दकोश को तैयार कर प्रकाशित कराया है जब बोली ही नहीं, स्वयं हिन्दी भाषा के अस्तित्व को ले कर संकट की चर्चाएं होती रहती हैं। यह शब्दकोश ऐसी चिंताओं को दूर करने में सहायक होगा और बुंदेली के विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा। युवा पीढ़ी और प्रशसनिक अमले के लिए उपयोगी ‘‘बुंदेली शब्दकोष’’ प्रत्येक व्यक्ति के लिए भी अपने निजी पुस्तकालय में रखने योग्य है जो बुंदेली को आत्मसात करना चाहता है। यह बुंदेली के विकास को गति देने वाला एक उत्तम शब्दकोश है।
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Monday, February 6, 2023

भाषाई संकट के इस दौर में यह शब्दकोश बुंदेली लोकभाषा से लोगों को जोड़ने में सहायक सिद्ध होगा। - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

"बुंदेली शब्दकोश तैयार करके लेखक ने अभिव्यक्ति की मौलिक संस्कृति को बचाने और उसका विकास करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भाषाई संकट के इस दौर में यह शब्दकोश बुंदेली लोकभाषा से लोगों को जोड़ने में सहायक सिद्ध होगा। पुस्तक के लेखक एवं संपादक को साधुवाद है।" विशिष्ट अतिथि के रूप में बोलते हुए मैंने यानी डॉ (सुश्री) शरद सिंह ने कहा।
      अवसर था वरदान होटल के सभागार में लेखक डॉ.आर.पी.पाण्डेय की पुस्तक बुंदेली शब्दकोश के लोकार्पण आयोजन का। मुख्य अतिथि थे महाराज छत्रसाल विश्वविद्यालय छतरपुर के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. बहादुर सिंह परमार, अध्यक्षता की पूर्व राज्य मंत्री डॉ रामकृष्ण कुसमरिया ने तथा मुख्य वक्ता थे डॉ हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय की भाषा प्रकोष्ठ के डॉ. अभिषेक ऋषि। श्यामलम संस्था तथा पाठक मंच के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन किया  डॉ. आशीष ज्योतिषी ने तथा आभार प्रदर्शन किया डॉ. सतीश पांडेय ने। 
इस सार्थक आयोजन के परिकल्पनाकार थे श्री उमाकांत मिश्र, अध्यक्ष श्यामलम संस्था। आयोजन में श्री आर.  के.तिवारी, डॉ. प्रदीप पांडेय, श्री हरगोविंद विश्व, डॉ.गजाधर सागर, श्री असरार अहमद, श्रीमती देवकी नायक, श्रीमती अंशिता बजाज वर्मा आदि नगर के साहित्य एवं कला मनीषी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
05.02.2023
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Sunday, February 5, 2023

Article | A lesson from Joshimath : Don't play with environment and climate | Dr (Ms) Sharad Singh | Central Chronicle


Article
A lesson from Joshimath : Don't play with environment and climate
       -    Dr (Ms) Sharad Singh
Writer, Author & Social Activist
Blogger - "Climate Diary Of Dr (Ms) Sharad Singh"

*Today, the importance of Joshimath is not only because it is an area of religious importance, but also because it is sacrificing itself to teach us a lesson. He is reminding not to run blindly in the race for development. First check the condition of environment and climate, then take steps for any major construction. That too keeping in mind that the damage caused to the environment and climate can be compensated. Remember that our rigid looking land rests on tectonic plates floating on liquids. Any construction of skyscrapers, dams or tunnels without checking these plates or testing their fragility can repeat the Joshimath disaster. That's why it is important that we take lessons from the Joshimath disaster.*


In October 2021, cracks appeared for the first time in some houses in Joshimath city of Uttarakhand. A year later, as of January 11, 723 houses in all nine wards of the city have developed major or minor cracks in the floors, ceilings and walls. Poles were uprooted in many houses. In response, 145 families have been temporarily moved to safer locations within the city. Joshimath at an altitude of 6,107 feet is a busy town in Chamoli district. Despite a population of around 23,000, it is heavily built up with hotels, resorts and a bustling market, which mainly caters to tourists, pilgrims, trekkers and personnel of the Army and the Indo-Tibetan Border Police (ITBP).

When the famous Swiss geologist Arnold Heim and colleague Augusto Gaster undertook the first expedition on the geological structure of the Central Himalayas in 1936, they recorded their travelogue "The Throne of the Gods (1938)" and research work "Central Himalaya: Geological The Observations of the Swiss Expedition 1936 (1939) identified the presence of tectonic rifts, the Main Central Fault (MCT), and described the area from Helang to Tapovan in Chamoli Garhwal as geologically sensitive. Research and studies on the geology of the Central Himalayas progressed further. After this, in 1976, the Mishra Committee also studied and declared Joshimath as sensitive and gave suggestions for treatment. In 2022, the Disaster Management Department of the Government of Uttarakhand had also drawn the attention of the government towards the danger looming over Joshimath. After all these warnings, efforts were not made to save Joshimath, but a forest of huge buildings kept growing there. The water used by the increasing population kept descending into the womb of Joshimath. Today Joshimath is sliding down towards Alaknanda under the unbearable burden on the same swamp. The Uttarakhand State Disaster Management Authority constituted a multi-institutional team in August 2022 for the geological and geotechnical survey of the city. The team submitted its report in September, noting that Joshimath "stands on an unstable foundation that can be damaged by rain, irregular constructions. Apart from weak natural foundations, the report noted that many houses along the Joshimath-Auli road, Resorts and small hotels have been built which are weakening the land.
For some time, the speed of sliding of Joshimath has suddenly increased. The entire Joshimath is sinking due to the subsidence of the land. Hundreds of buildings are no longer habitable. In many places, wide cracks have also started emerging on the ground. In some places, water is coming out due to bursting of the ground. Cracks have also appeared on the walls of Jyotirpeeth, one of the four highest religious shrines in India. Geologists have already been warning to evacuate the city immediately.

Joshimath is not an ordinary city. It is Jyotirpeeth, one of the four supreme religious peeths established in the four corners of the country by Adiguru Shankaracharya to protect Sanatan Dharma. It is the ancient capital of Uttarakhand, from where the Katyuri dynasty initially ruled. This is where the formalities of the pilgrimage to the supreme pilgrimage Badrinath are completed. The seat of Shankaracharya resides here. This city is also the base of Valley of Flowers and Nanda Devi Biosphere Reserve. Hemkund Yatra is also controlled from here. Chinese movements on the Niti-Mana passes and the Barahoti plateau are monitored from this city. It is known that the Chinese army repeatedly tries to infiltrate from Barahoti side. The Indo-Tibetan Border Police battalion and its Mountain Training Center are here to keep an eye on them. This is also the headquarters of the Garhwal Scouts and the headquarters of the 9 Mountain Brigade.

This city with a population of 20-25 thousand is falling prey to uncontrolled short-sighted development. On one hand the tunnel of NTPC of Tapovan Vishnugad project hollowed out the ground from inside, on the other hand by digging at the root of the bypass road Joshimath shook the whole city from below. The reason for this is being told by NTPC's Tapovan Vishnugad Hydropower Project. In this project, a long tunnel is being made by cutting the mountains. This project was started about 2 years ago, after which cases of cracks in the ground started coming to the fore. According to environmentalists, the clues inside the Joshimath mountain region will act like a leaking balloon. The way water seeps out of a balloon and gradually loses its shape, something similar can happen in the mountains of this area.
Due to the imbalance of weight on the mountains, cracks started early, but such cracks can also occur in the plains. It is a matter to think that if we cut a very large scale of solid rock from one place, remove it from there, make a dam there, then in this way we hand over a stable land to unstable water with waves. Now it can be easily guessed that what will be the result? In this way we dig a pit for ourselves and get surrounded by troubles. Today, when we have sophisticated instruments from which we can see the condition of the earth within seven layers, then in this way the geographical element of climate should not be ignored. It doesn't matter what kind of land we are on, hilly or plain, because a danger like Joshimath can arise anywhere. The thing to remember is that if we play with the existence of the land, then the land too will not delay in erasing our existence. It is in our hands whether we want to live with a beautiful and safe nature or want to wander as manmade disaster refugees?
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(05.02.2023)
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Friday, February 3, 2023

स्व. महेंद्र फुसकेले जी ने साहित्य में जीवन को और जीवन में साहित्य को लिखा - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

"स्व. महेंद्र फुसकेले जी ने साहित्य में जीवन को और जीवन में साहित्य को लिखा। इस बात पर हम गर्व कर सकते हैं कि हम महेंद्र फुसकेले  जी जैसे साहित्यकार के समय में हम पैदा हुए  और उनसे संवाद करने का हमें सौभाग्य मिला। आज उनके जैसा व्यक्तित्व मिलना कठिन है क्योंकि कॉमरेड महेंद्र फुसकेले होना आसान नहीं !" आयोजन के अध्यक्ष के रूप में मैंने (डॉ सुश्री शरद सिंह) अपने विचार व्यक्त करते हुए उनके वैचारिक व्यक्तित्व पर केंद्रित अपनी ताज़ा कविता का भी पाठ किया।
       अवसर था प्रगतिशील लेखक संघ की सागर इकाई द्वारा कल शाम इकाई के पूर्व अध्यक्ष, साहित्यकार, अधिवक्ता एवं समाजवादी विचारों के प्रबल समर्थक स्व.महेंद्र फुसकेले जी की 90 वीं जन्मजयंती के आयोजन का। इस अवसर पर इकाई के सदस्यों के साथ ही नगर के अनेक साहित्यकार मौज़ूद थे। इस आयोजन के सूत्रधार थे स्व. फुसकेले जी के पुत्र अधिवक्ता श्री पेट्रिस फुसकेले एवं पुत्रवधू कवयित्री श्रीमती नमृता फुसकेले।
📸 छायाचित्र साभार सौजन्य : श्री मुकेश तिवारी एवं श्री पेट्रिस फुसकेले 🙏

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Thursday, February 2, 2023

बतकाव बिन्ना की | बजट मनें आधो हरिया, आधो सूको पत्ता | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"बजट मनें आधो हरिया, आधो सूको पत्ता"  मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की
बजट मनें आधो हरिया, आधो सूको पत्ता                                                     
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
        टीवी पे बजट को हाल देखत-देखत मूंड़ पिरान लगो रओ मोरो। बे एंकर हरें ऐसो चिचिंयांत आंएं के मनो के बजट नोई भूकंप आ गओ होय। उत्तई पे चैन नईयां, बे विशेषज्ञ हरें सोई ऐसे अपनो ज्ञान बघारत आएं के मनो उनके समझाए से सब कछू अच्छो हो जेहे। मैंगाई सो कम करत बनत नईयां कोनऊं से, बाकी हल्ला ऐसो देत आएं के मैंगाई मों दिखाबे जोग ने बची होय। सो, जब मोरो मूंड़ पिरान लगो सो मैंने भैैयाजी की घरे की गैल पकरी। मोय पतो आए के भैयाजी सोई जागरूक नागरिक आंए। बे सोई ग्यारा बजे से टीबी के आंगू बैठे हुइएं औ उनको सोई मूंड़ दुखन लगो हुइए।
मैं भैयाजी के घरे पोंची सो भीतर बैठक में टीवी चल रई हती औ भैयाजी बाहरे आंगन में मूंड़ पे गमछा बांधे ऊंघत से बैठे मिले।

‘‘उते टीवी चल रई औ आप इते बैठे? बजट को हाल नईं देख रए?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘देख लओ बिन्ना, देख लओ! बोई से तो मूंड़ पिरान लगो। भैयाजी अपनो माथा ठोंकत भए बोले। अब मैंने उनको ने बताई के मोरी सोई जेई दसा आए।
‘‘सो उते बैठक में को आ? भौजी टीवी देख रईं का?’’ मैंने पूछी।
‘‘नईं, तुमाई भौजी हमाए लाने चाय बना रईं। उते बैठक में कोनऊं नइयां। तुमाई भौजी सो हमसे कै रई हतीं के इत्ते लग के ने देखों, मूंड़ पिरान लगहे, औ बोई भओ। कल अखबार में सब आई जेहे। बाकी अब कोनऊं चीज चल रई होय, सो देखे बिना चैन कोन परत आए? तुमई कहो!’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, कै सो आप ठीक रए। मैं सोई देखत रई।’’ मैंने कई।
‘‘तुमें कैसो लगो बजट?’’ भैयाजी ने पूछी।  
‘‘मोरी छोड़ो, पैले आप बताओ के आपको जो कैसो लगो बजट?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘सौ बातन की एक बात के पूरो हरिया पत्ता ने मिलो!’’ भैयाजी ने अपनी राय कहनात में बोल दई।
‘‘मने? पूरो हरिया पत्ता से का मतलब आपको?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अरे बिन्ना, मोय लग रओ हतो के चुनाव से पैले को जो बजट आए सो कोनऊं बड़ो वारो लाभ हुइए, मनो ऐसो होत भओ मोय तो नई लगो। तुमई बताओ के तुम ओरन के लाने का लाभ दओ गओ?’’ भैया जी ने पूछी।
‘‘अरे भैयाजी बजट में हम साहित्य वारे कां गिने जात आएं? कोनऊं नई पूछत हम ओरन खों।’’ मोरी दुखती रग पे उंगरिया धर दई भैयाजी ने। सच्ची, बजट के टेम पे मोय इम्फीरियरटी फील होन लगत आए। लिखबे वारन खों इनकम टैक्स छोड़ के कोनऊं गिनती में नई रखो जात आएं। रामधई राईटर बनबे से तो बिल्डर बनबो ज्यादा अच्छो! लोगन की उनसे अटकत तो आए। लोग उनसे डरात तो आएं। फेर चाए बे बिल्डिंग बनाबे वारे बिल्डर होंय, चाए बाॅडी बिल्डर। मोरे घांई कबिता-कहानी बनाबे वारन की कोनऊं पूंछ-बकत नईं रैत।
‘‘का सोच में पर गईं? हम तुम लिखबे वारन की नोंई तुम महिलाओं की बात कर रए। तुम ओरन के लाने कोन सी बड़ी राहत दई गई?’’ भैयाजी ने क्लियर करी।
‘‘अरे, हम ओरन को बी कोन सी बड़ी राहत मिली? जो कछु मिलो बो स्व सहायता समूह वारी लुगाइन खों मिलो आए। बाकी लुगाइन के लाने सो मैंगाई को तोफा आए।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘हऔ, जेई लाने तुमाई भौजी हमसे कै रई हती के जो अपन ओरन खों अच्छे दिन देखने होय सो मोय समूह बना लेने दइयो। हमने पूछी के कोन सो समूह? सो बे बोलीं के स्व-सहायता समूह। हमने उनसे कही के भागवान! तुमें स्व-सहायता की कोन सी जरूरत आन परी, तुम तो मोहल्ला भर की सहायता करत रैत हो। सो, बे भड़क के बोलीं के तुम टीवी देख रए के मोबाईल टिपिया रै? तुमने सुनी नईं के बा न्यूज वारी स्व-सहायता समूह के बारे में का बोल रई हती। अब सांची जे के हमने सुनी तो, मनो समझ में कछू नई आओ रओ। सो हम मों चिंमा के बैठे रै। पर, अब तुमने कई सो हमें समझ में आ गई के तुमाई भौजी स्व-सहायता समूह की बात काय कर रई हतीं।’’ भैयाजी खुस होत भए बोले।  
‘‘हऔ, महिलाओं को दो लाख की बचत पर 7.5 प्रतिशत को ब्याज दओ जेहे औ महिला सम्मान बचत पत्र स्कीम चलाई जेहे। मनो जे सब कछू स्व-सहायता समूह वारियन के लाने। ईसे सो नोनी रैती के मैंगाई कछू कम कर देते। रसोई गैस को सिलेंडर मंगाओं सो अंसुवां आ जात आंए। मनो एक काम मोय अच्छो लगो के फुंकनी पे टैक्स बढ़ा दओ।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘फुंकनी? कोन सी फुंकनी?’’ भैयाजी खों मोरी बात समझ में ने आई।
‘‘अरे, फुंकनी मने सिगरेट। जो सिगरेट पे टैक्स बढ़ा के भलो करो। सिगरेट पीबे वारे खुद को करेजा सो फूंकत आएं औ सामने वारो को बी अपने करेजा से निकरो धुंआं पियात रैत आएं। मोय सो बड़ो बुरौ लगत आए। बस, जे काम ई बजट में अच्छो लगो मोय।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘औ कछू अच्छो नई लगो?’’ भैयाजी ने हैरान होत भए पूछी।
‘‘नईं, मनो अच्छो सो और आए बाकी बात बोई आप वारी के पूरो हरीरा पत्ता ने मिलो। आधो हरो औ आधो सूको। हीरा के दाम घट गए सो सोना मैंगो हो गओ। अब सबरे हीरा सो पैनत नइयां और हीरा के दाम चढ़-गिरे से बाजार को कोनऊं फरक नईं परत जबके सोना के दाम शेयर मार्केट पे सीधो असर डारत आएं। हऔ जे जरूर आए के अब बिजली वारे वाहान के दाम ने बढ़हें औ सायकिलें सस्ती मिलहें। बाकी ईके बाद राज्य सरकारें बिजली वारे वाहनों के लाने बिजली पे कोन सी राहत देहें, ईपे सब कछू टिको आए। अबे तो अपने इते इत्ते चार्जर स्टेशन नोईं के मनो घर से पूरो चार्ज करे बिना निकर परे औ बीच में बिजली चुका गई, सो स्टेशन पे चार्ज कर लें। अब बिजली कोनऊं डीजल-पेट्रोल नोंई के जां गाड़ी की टंकी खाली भई, वईं गाड़ी खड़ी करी औ दौर परे पेट्रोल पंप खों औ कुप्पा में डीजल-पेट्रोल भरवाओ औ ले आए अपनी गाड़ी के लाने।’’ मैंने भैयाजी से कही।
‘‘मनो, एक दिना हम सोई ई बारे में सोच रए हते तो हमें लगो के बिजली वारी गाड़ियन वारों खों एक्स्ट्रा बैटरी रखो चइए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘कै सो आप ठीक रए। चार पहिया के लाने सो जे उपाय ठीक रैहे मनो स्कूटी वारे कां रखहें?’’ मैंने पूछी।
‘‘हऔ, जे सो हमने सोची नईं।’’ भैयाजी झेंपत भए बोले।  
‘‘आप भैया बहन की का बतकाव हो रई?’’ भौजी चाय को कप धरे आ गईं।
‘‘कछू नईं! बो स्व-सहायता समूह वारी बात कर रए हते बिन्ना से।’’ भैयाजी शान मारत भए बोले।
‘‘अरे, हऔ बिन्ना! हम का सोच रए हते के हम मोहल्ला की कछू लुगाइन खों जोड़ के एक स्व-सहायता समूह बना लैंहें, सो तुम सोई ऊमें जुड़ जइयो। बड़ो फायदो हुइए। तुमें सोई चार पैसे मिल जैहें।’’ भौजी बड़े प्यार से बोलीं। उनको ऊंसई बड़ी फिकर रैत आए मोरी।
‘‘नईं हो सकत भौजी! मोरी इनकम कछू नइयां मनो मोय इनकम टैक्स भरने परत आए, सो समूह में नईं जुड़ सकत।’’ मैंने सांची बात बता दई भौजी खों।
‘‘सो, काए? लिखबे से इत्ते पइसा मिल जात आएं?’’ भौजी भौचक्की रै गईं।
‘‘अरे कहूं नईं, लूघरा नईं मिलत! बा तो एक बेरा एक सम्मेलन में बिदेस जाबे की बात चल रई हती सो, बोई टेम पे कोनऊं नासपिटे ने मोरो इनकम टैक्स रिटर्न भरा दओ, तभई से जो फंदा मोरे गले पर गओ। बाकी ऊ टेम पे कछू अच्छी इनकम रई बी। अब सो कोरोना को टेम को रोना रो-रो के रायल्टी देबे वारन ने मों बिचका लए आएं। खैर, जे सब छोड़ो, आप सो अच्छो समूह बनाओ औ जो कछू सरकार देवे सो ले लइयो।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘अरी मोरी बिन्ना! तुम सोई कां फंसी लिखबे-पढ़बे में।’’ भौजी खों मोरी बात सुन के मोपे बड़ी दया उमड़ी।
‘‘अब का करो जाए भौजी! जो बदो रैत, बोई होत आए! मुतकी बेरा सो मोय खुदई समझ में नईं आत के साहित्य की सहायता करों के खुद की सहायता करों। बाकी इत्ती कट गई, बाकी बी कट जेहे! बस, जे बजट के टेम पे तनक पीरा होन लगत आए।’’ मैंने भौजी से कही।
‘‘ने घबड़ाओ बिन्ना! हमाओ समूह चल परहे सो हम तुमाई सोई सहायता करबी।’’ भौजी ने बड़े प्यार से मोय सहूंरी बंधाई। मोय अच्छो लगो। बजट नोई बल्कि सहूंरी।  
सो, मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। अब बजट सो बनई गओ। हमाई-तुमाई बतकाव से ऊमें फेरबदल सो हो नईं सकत। बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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चर्चा प्लस | सारा खेल क़मीज़ की बेदाग़ सफ़ेदी का है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
सारा खेल क़मीज़ की बेदाग़ सफ़ेदी का है
 - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                      
       चाहे राजनीति हो या आमजन जीवन, सारे फसाद की जड़ होती है एक अदद क़मीज़। इस जादुई क़मीज़ में बड़ी ताक़त होती है। यह किसी को भी आसानी से किसी का दुश्मन बना सकती है। अब आप सोचेंगे कि यह कौन-सी क़मीज़ है? किस ब्रांड की है? कहां मिलती है? तो इसकी विशेषता यह है कि यह अपनी ब्रांडिग खुद करने में सक्षम होती है। इसे पता है कि इसके चाहने वाले अंधभक्त इसे पाने के लिए मर-मिटने को तैयार रहते हैं। ठीक है, अब और अधिक सस्पेंस नहीं। चलिए जान लीजिए उस क़मीज़ के बारे में जिसे पाने के लिए गलाकाट प्रतिद्वंद्विता चलती रहती है और अपवाद छोड़ दिया जाए तो दुनिया का कोई भी व्यक्ति उस सफ़ेद क़मीज़ के प्रभाव से अछूता नहीं है।
इन दिनों एक पूर्व मुख्यमंत्री और एक वर्तमान मुख्यमंत्री के बीच आरोप-प्रत्यारोप भरा प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम चल रहा है। मसला वही कि तेरी क़मीज़ मेरी क़मीज़ से अधिक सफ़ेद क्यों? एक-दूसरे की क़मीज़ पर दाग़ ढूंढना ज़रूरी है। एक दाग़ी निकलेगा तभी तो दूसरा बेदाग़ दिखाई देगा। लेकिन आमजन को भी यह पूछने की फ़ुर्सत नहीं है कि इस प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम से आमजन को क्या मिलेगा? आमजन स्वयं भी एक-दूसरे की क़मीज़ की सफ़ेदी देख कर चुंधियाता रहता है। यदि सामने वाले ने एक फुट ज़मीन का अतिक्रमण किया है तो मैं दो फुट जमीन का अतिक्रमण कर के रहूंगा। इसी दांवपेंच में उलझे रहने वाले कभी जान ही नहीं पाते हैं कि खुश कैसे रहा जाता है? जो दूसरे की क़मीज़ देख कर जलते-कुढ़ते रहते हैं वे अपनी खुशी को कभी महसूस कर ही नहीं पाते हैं और न दूसरे को खुशी दे पाते हैं। दूसरे से ज़्यादा पाने की चाहता उन्हें पागल किए रहती है। बुद्धिजीवी भी इससे अलग नहीं हैं। वे भी कुढ़ते रहते हैं कि फलां की दो किताबें आ गईं तो मेरी चार किताबें आ जानी चाहिए। उसके एक शेर पर तालियां बजीं तो मेरे चार शेरों पर तालियां बजनी चाहिए। यह सारा चक्कर असंतोष नामक सफ़ेद क़मीज़ का है।    

रूसी कवि सेर्गेई येसेनिन (1895-1925) की एक कविता की ये पंक्तियां बताती हैं कि एक अदद क़मीज़ इंसान के मन को किस तरह अपने वश में रखती है-
मैं नहीं पहनना चाहता
वह क़मीज़
जिसे पहन कर
मुझे अपना अस्तित्व
लगने लगता है
छोटा और फ़ीका,
दरअसल मेरी कमीज़ है मैली-कुचैली
मेरे हालात की तरह।

जब अपनी क़मीज़ फीकी लगने लगे तो दूसरे की चमकदार, झक्क सफेद क़मीज़ से ईष्र्या होने लगती है। मन खुद से ही प्रश्न करने लगता है कि मेरी क़मीज़ उसकी क़मीज़ जैसी चमकदार झकाझक सफ़ेद क्यों नहीं? बस, सारी समस्या यहीं से शुरू होती है। हर राजनीतिक दल अपनी क़मीज़ को उजली और दूसरे की क़मीज़ को दाग़दार बताने में ही अपनी आधी शक्ति झोंक देता है। हमारे कार्यकाल में सबकुछ अच्छा और तुम्हारे कार्यकाल में सब कुछ ख़राब। या फिर विपक्षी सोच में डूबा रहता है कि सत्ताधारी इतना बेदाग़ क्यों दिख रहा है? इसकी क़मीज़ पर कोई तो दाग़ होगा ही। राजनीति तो काजल की कोठरी बन चुकी है तो उसमें रहते हुए कोई भला अपनी क़मीज़ को बेदाग़ कैसे रख सकता है? निःसंदेह बेदाग़ दिख सकता है यदि विज्ञापन रूपी बेहतरीन ब्लीचिंग सोल्यूशन उसके पास हो। सो, आजकल हर राजनीतिक दल ऐसा ब्लीचिंग सोल्यूशन अपने पास रखता ही है। राजनीति में यह सोल्यूशन हमेशा से उपयोग में लाया जाता रहा है। राजाशाही के जमाने में राजा-महाराज अपनी प्रशस्ति लिखवाते थे। चारण-भाट से अपनी प्रशंसा में गीत गवाते थे। इतना ही नहीं बल्कि शिलाओं पर भी अपने श्रेष्ठ कार्यों को लेख के रूप में खुदवा दिया करते थे ताकि आने वाली कई पीढ़ियां उनकी बेदाग़ क़मीज़ के चर्चे करती रहे। आज होर्डिंग्स, बिलबोर्ड, फुल पेज विज्ञापन, चैनलों की ख़रीद-फ़रोख़्त, इतिहास का अपने हिसाब से पुनर्लेखन आदि ब्लीच अपनाए जाते हैं। ताकि आमजन उनकी चमकदार, बेदाग़ क़मीज की चकाचैंध से अंधियाती रहे और विपक्षी यह सोच-सोच कर कुढ़ते रहें कि मेरी क़मीज उसकी क़मीज जैसी बेदाग़ सफेद क्यों नहीं? 
क़मीज की यह श्रेष्ठता भरी चमक केवल राजनीति को नहीं बल्कि आम जनजीवन को भी प्रभावित करती रहती है। पिछले दो दशकों में क़मीज़ की सफेदी ने घातक प्रतिस्पद्र्धा का रूप ले लिया है। बचपन में स्कूल में एक कविता रटाई गई थी जिसका बोध उस समय तो मेरे जैसे किसी भी स्टूडेंट को नहीं रहा होगा लेकिन बड़े होने पर उसका व्यापक अर्थ सब को समझ में आ गया होगा। यदि कच्ची पहली (किंडरगार्टन) के सहपाठियों की रीयूनियन होती तो मैं अपने सहपाठियों से ज़रूर पूछती कि उन्होंने उस कविता को कितना आत्मसात किया? वैसे उत्तर मुझे पता है कि वे सौ प्रतिशत आत्मसात कर चुके होंगे। कविता कुछ इस प्रकार थी-
क्यों न मेरा तोता
बोले जैसे तेरा
जबकि मैंने दिए
उसके दूने दाम!
इस कविता का तोता भी वह क़मीज़ ही है जिसने व्यक्ति के मन में हीनभावना की गहरी जड़ें जमा दी हैं। माता-पिता इस हीन भावना से ग्रस्त हो कर ही अपने बच्चों को परीक्षा में 99 प्लस नंबर लाने का दबाव बनाते हैं। जो बच्चे इस दबाव को सहन नहीं कर पाते हैं वे या तो विद्रोही बन जाते हैं या फिर आत्मघाती बन बैठते है। ‘‘हमारा बच्चा दूसरे के बच्चे से अधिक अच्छा होना चाहिए’’ की प्रतिस्पर्द्धा भरी सोच के कारण माता-पिता अपने बच्चों के बारे में यह जान ही नहीं पाते हैं कि उनकी खुशी किसमे है? जबकि खुशी न तो लड़ कर हासिल की जा सकती है और न खरीदी जा सकती है। इस संबंध में एक इतालवी लोककथा बताती हूं।

 यह कथा है राजा गिफाद और ग़रीब युवक सांजियो की। राजा गिफाद का इकलौता पुत्र था राजकुमार जोनाश। इतना लाड़ला कि राजा उसे दुनिया की सारी खुशियां देना चाहता था। राजकुमार जोनाश जैसे-जैसे बड़ा हुआ वैसे-वैसे उसके स्वभाव में परिवर्तन आने लगा। हमेशा खुश रहने वाला जोनाश उदास और खोया-खोया रहने लगा। राजा गिफाद से अपने पुत्र की यह दशा देखी नहीं गई। उसने राजकुमार का इलाज कराना चाहा लेकिन चिकित्सकों ने जांच कर के कह दिया कि राजकुमार पूर्णतः स्वस्थ है। अंततः राजा गिफाद ने अपने दरबार के मुख्य ज्योतिषी से इस बारे में चर्चा की। ज्योतिषी एक मनोवैज्ञानिक भी था। वह राजकुमार को देख कर ही समझ गया कि यह शारीरिक नहीं वरन मानसिक समस्या है। अतः उसने राजा से कहा कि यदि राजकुमार को राज्य के सबसे खुश रहने वाले व्यक्ति की क़मीज़ पहनाई जाए तो राजकुमार भी खुश रहने लगेगा। ज्योतिषी की सलाह पर राजा ने ढिंढोरा पिटवा दिया कि खुश रहने वाले सारे व्यक्ति दरबार में हाज़िर हों। अधिक तो नहीं, पर कुछ लोग ईनाम के लालच में दरबार जा पहुंचे। राजा ने पड़ताल करनी चाही कि वे जो स्वयं को सबसे खुश व्यक्ति बता रहे हैं, सचमुच खुश हैं या नहीं? राजा ने एक आदमी से पूछा कि तुम खुश क्यों हो? तो उसने कहा कि मेरे पास एक पेटी लीरा (इतालवी मुद्रा) हैं। इसलिए मैं खुश रहता हूं। राजा ने उससे कहा कि फिर तो यदि मैं तुम्हें दो पेटी लीरा और दूं तो तुम मना कर दोगे क्योंकि तुम तो अपने एक पेटी लीरा में ही खुश हो। इस पर वह आदमी बोल उठा। अरे नहीं, अगर मुझे दो पेटी लीरा और मिल जाएंगे तो मैं और खुश हो जाऊंगा। यह सुन कर राजा समझ गया कि यह आदमी लालची है और लालची कभी खुश रह ही नहीं सकता है। राजा ने इसी तरह सबसे प्रश्न पूछे और सभी झूठे साबित हुए। राजा निराश हो गया। तब एक दिन रानी ने उससे कहा कि इस तरह निराश हो कर बैठने से अच्छा है कि आप शिकार खेलने चले जाइए। इससे आपका मन बहल जाएगा। राजा गिफाद अपनी रानी की सलाह मान कर शिकार खेलने जंगल गया। वहां वह एक हिरण का पीछा करता हुआ जंगल के बीच बनी एक झोपड़ी में पास जा पहुंचा। झोपड़ी के पास एक मचान बनी हुई थी। मचान पर एक युवक मस्ती से लेटा हुआ बादलों को देख रहा था और बीच-बीच में गाना गुनगुना रहा था। वह बहुत खुश दिखाई दे रहा था। राजा ने राजकुमार की आयु के उस युवक से पूछा कि क्या तुम हमेशा ऐसे ही खुश रहते हो? तो सांजियो नाम के उस युवक ने उत्तर दिया कि हां, मैं तो हमेशा ऐसे ही रहता हूं। राजा ने पूछा कि तुम मेरे साथ मेरे राजमहल चलोगे क्या? मैं तुम्हें वहां सारी सुख-सुविधाएं दूंगा। सांजियो बोला, नहीं! मैं यहीं ठीक हूं मुझे कोई सुख-सुविधाएं नहीं चाहिए। यहां मेरी झोपड़ी है, मेरी मचान है, मेरे बादल हैं, मेरे कंदमूल फल हैं। मैं इन्हीं में खुश हूं, मुझे और कुछ नहीं चाहिए। सांजियो का उत्तर सुन कर राजा समझ गया कि वह जिसे ढूंढ रहा था वह यही व्यक्ति है। तब राजा गिफाद ने सांजियो से पूछा कि क्या वह राजकुमार की खुशी लौटाने के लिए अपना कोई सामान दे सकता है? सांजियो मस्ती से बोला कि आप जो चाहे ले लीजिए। राजा ने कहा मुझे तुम्हारी क़मीज़ चाहिए! और यह कहते हुए राजा ने सांजियो की क़मीज़ उतारने के लिए हाथ बढ़ाया तो देखा कि यह क्या? सांजियो के बदन पर तो क़मीज़ थी ही नहीं। वह तो पेड़ की छाल और पत्ते अपने शरीर पर लपेटे हुए था। यह देख कर राजा की आंखें खुल गईं कि खुशी कपड़ों या भौतिक वस्तुओं से नहीं मिलती है। यदि व्यक्ति संतुष्ट है तो वह फटेहाल हो कर भी खुश रह सकता है। राजा ने तय किया कि वह राजकुमार जोनाश को सांजियो के पास ला कर मिलाएगा ताकि राजकुमार खुशी की वास्तविकता से परिचित हो सके।

आज भी राजकुमार जोनाश और सांजियो जैसे लोग मौजूद हैं। पर दुख की बात यह है कि जोनाश जैसे असंतुष्टों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही और सांजियो जैसे लोगों की संख्या कम होती जा रही है। उच्चवर्ग ‘‘पेजथ्री’’ पर चमकने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है। मध्यमवर्गीय न तो स्वयं खुश रहता है और न अपने बच्चों को खुश रहना सिखा पाता है। ‘कटआफॅ’ के स्लाटर हाउस में ‘कटते’ बच्चों की निराशा, दुख और परेशानियां देखने के बजाए उन पर अपने सपने थोपता रहता है। निम्नवर्ग जो आमतौर पर अपनी फटेहाली में भी खुश रहना जानता था, उसे बाजार की चकाचैंध ने भ्रमित कर के अपराध के रास्ते में धकेल दिया है। आज हर व्यक्ति वह चाहे किसी भी तबके का हो, सब कुछ पा लेना चाहता है और इसी चाहत में अपनी सारी खुशी बरबाद कर देता है।
मसला मात्र इतना ही रहता है कि उसे जो मिल गया वो मुझे क्यों नहीं मिला? यही बेचैनी इंसान को परेशान करती रहती है और उससे एक कप चाय की रिश्वत से ले कर करोड़ों के घोटाले करवा डालती है। सब कुछ पा लेने की अंतहीन इच्छा में दूसरे की क़मीज़ अपनी क़मीज़ से हमेशा अधिक चमकदार दिखाई देती है और तब हीनभावना जाग उठती है। हीनभावना से ग्रस्त व्यक्ति न तो अपनी क़मीज़ चमकाने का प्रयास करता है और न ही अपनी क़मीज़ में संतुष्ट रहता है, बल्कि वह दूसरे की क़मीज़ गंदा करने पर तुल जाता है। आमजन जब खुद इसी झगड़े में फंसा रहता है तो कोई और उसके दुख-सुख का ध्यान क्यों रखे? चुनाव आया तो चुन कर भेज दिया और फिर उलझ गए एक-दूसरे की क़मीज़ की सफ़ेदी देखने में। यानी सारा खेल एक अदद क़मीज़ की सफेदी का है। वरना सच तो ये हैं बकौल नजीर अकबराबादी -
टुक हिर्स-ओ-हवा को छोड़ मियां मत देस बिदेस फिरे मारा
क़ज़्ज़ाक़ अजल  का  लूटे है  दिन रात  बजा कर नक़्क़ारा
क्या  बधिया भैंसा, बैल, शुतुर, क्या गू में  पल्ला  सर-भारा
क्या  गेहूं, चावल,  मोठ, मटर,  क्या आग धुआं और अंगारा
सब  ठाठ  पड़ा  रह  जावेगा  जब  लाद  चलेगा  बंजारा
   
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