Thursday, April 11, 2019

बुंदेलखंड में आज भी कमी है सुरक्षित मातृत्व की - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह - नवभारत में प्रकाशित

Dr (Miss) Sharad Singh
आज "नवभारत" में राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस (11 अप्रैल) पर विशेष लेख "बुंदेलखंड में आज भी कमी है सुरक्षित मातृत्व की " प्रकशित हुआ है। इसे आप भी पढ़िए 🙏

❤️ हार्दिक धन्यवाद #नवभारत ❤️

राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस (11 अप्रैल) पर विशेष :
   बुंदेलखंड में आज भी कमी है सुरक्षित मातृत्व की
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह                     
       मातृत्व स्त्री-जीवन को ही नहीं वरन् समूचे समाज को पूर्णता प्रदान करता है। मातृत्व संतति को सुनिश्चित करता है और संतति से ही समाज की संरचना पीढ़ी-दर-पीढ़ी अगे बढ़ती है। किन्तु विडम्बना यह है कि हमारी सामाजिक व्यवस्था में जहां एक ओर मातृत्व का भरपूर स्वागत किया जाता है, खुशियां मनाई जाती हैं, वहीं गर्भवती के उचित आहार-पोषण के प्रति लापरवाही बरती जाती है। प्रत्येक गर्भवती के आहार-पोषण की आवश्यकता अलग-अलग होती है और यह चिकित्सकीय जांच द्वारा ही पता लगाया जा सकता है। जहां तक गर्भवती की जांच का प्रश्न है तो आज भी बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचल में शिक्षा की कमी, पारम्परिक अंधविश्वासों एवं मान्यताओं के चलते गर्भवती की जांच कराने में कोताही बरती जाती है। ऐसी ही समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सुरक्षित मातृत्व के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से भारत सरकार ने प्रति वर्ष कस्तूरबा गांधी की जयंती पर अर्थात् 11 अप्रैल को राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस मनाने की घोषणा सन् 2003 में की थी। तब से हर साल देश में राष्ट्रीय राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस मातृत्व दिवस मनाया जाता है।
Dr (Miss) Sharad Singh's article on Condition of Safe Motherhood in Bundelkhand published in Navbharat , बुंदेलखंड में आज भी कमी है सुरक्षित मातृत्व की - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह - नवभारत में प्रकाशित
        बुंदेलखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी शिक्षा की कमी और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता के प्रति लापरवाही को बोलबाला है। यद्यपि प्रदेश यारकार की ओर से समय-समय पर जननी सुरक्षा योजना जैसी योजनाएं लागू की गईं और इन योजनाओं के बारे में ग्रामीणजन को जानकारी देने का अभियान भी चलाया गया। फिर भी अनेक परिवार ऐसे हैं जिनकी रूचि इस बात पर टिकी रहती है कि गर्भस्थ शिशु लड़का है या लड़की? सरकारी पाबंदी के कारण अतः ऐसे लोगों की रुचि जननी को सरकार की ओर से मिलने वाली राशि में सिमट कर रह जाती है। भले ही उचित पोषण के अभाव में मां और शिशु दोनों की जान ख़तरे में रहती है। इसी मसले का दूसरा पक्ष यह भी है कि स्वयं गर्भवती महिलाओं को पता नहीं होता है कि अपने पोषण जरूरतों की पूर्ति तथा भ्रूण के विकास के लिए उनके शरीर को अतिरिक्त आयरन और फोलिक एसिड की आवश्यकता होती है। प्राप्त सरकारी आंकड़ों के अनुसार सन् 2018 में किए गए एक सर्वे में बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचलों में लगभग 46.8 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में खून की कमी पाई गई थी। इन हालातों के चलते बुंदेलखंड के जिलों में गर्भवती महिलाओं में एनीमिया का प्रतिशत सबसे अधिक पाया गया है। प्रसवपूर्व चिकित्सकीय जांच को लेकर इन ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी जागरूकता की कमी है।
स्वास्थ्य विभाग ने सन् 2012 में मातृत्व एवं शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के लिए मदर एंड चाइल्ड ट्रैकिंग सिस्टम नामक एक महत्वाकांक्षी योजना शुरू की थी। इसके तहत गर्भवती माताओं व उनके नवजात शिशु का पंजीकरण किया जाता है, ताकि उन्हें लंबे समय तक स्वास्थ्य सेवाएं दी जा सकें । आशा या एएनएम द्वारा जमीनी स्तर पर गर्भवती महिला एवं उनके शिशु की हेल्थ हिस्ट्री दर्ज की जाती है, जो स्वास्थ्य सुविधाओं को न सिर्फ बेहतर बनाने में बल्कि, लाभार्थी को भी स्वास्थ्य योजनाओं के प्रति जागरूक करने में मदद करती है। मार्च 2013 से फरवरी 2014 माह तक प्रदेश स्तर पर एकत्रित एमसीटीएस की रिपोर्ट के आधार पर रैंक तैयार की गई। इसमें बुंदेलखंड के उत्तर प्रदेशीय अंचल की स्थिति काफी खराब पाई गई थी। प्रदेश के 75 जनपद के परफार्मेंस में प्रसूता पंजीकरण में झांसी जनपद का स्थान 50 वां एवं नवजात शिशु पंजीकरण में 35 वां स्थान था।

    प्रसव के दौरान होने वाली मृत्यु के सबसे प्रमुख कारण हैं-अशिक्षा और गरीबी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार आर्थिक रूप से कमजोर तबके की हर पांच मिनट में एक गर्भवती महिला प्रसवकाल के दौरान मौत के मुंह में चली जाती है। स्त्री के गर्भवती होने पर हर घर में बधाईयां गाई जाती हैं चाहे वह अमीर हो या गरीब। सरकार ने श्रमिक गर्भवतियों के लिए अनेक नियम-कानून बनाए हैं लेकिन उसका लाभ उन्हें कितना मिल पाता है इसमें कागजी और ज़मीनी आंकड़ों में बहुत अन्तर है। लगभग 52 प्रतिशत महिलाएं अपने स्वास्थ्य की चिन्ता किए बिना गर्भधारण करती हैं क्योंकि उन्हें गर्भधारण का निर्णय करने का अधिकार नहीं होता है। परिवार के अभिलाषाएं और पति की इच्छा उन्हें इस बात का अधिकार ही नहीं देती हैं कि उन्हें गर्भ धारण करना चाहिए या नहीं? अथवा उन्हें कब और कितने अंतराल में गर्भधारण करना चाहिए? ग्रामीण क्षेत्रों में और शहरी क्षेत्रों की झुग्गी-झोपड़ी बस्तियों में लगभग 70 प्रतिशत महिलाएं घरों में अप्रशिक्षित दाइयों से प्रसव कराती हैं। यह भी उनकी इच्छा और अनिच्छा की सीमा से परे होता है। उन्हें यह तय करने का अधिकार नहीं होता है कि वे कहां और किससे प्रसव कराएं? अर्थात् एक गर्भवती का गर्भधारण से ले कर प्रसव तक की यात्रा उसकी इच्छा की सहभागिता से परे तय होती है। इसी दुर्भाग्य के चलते प्रतिवर्ष लगभग एक लाख महिलाएं प्रसवकाल में अथवा इससे पूर्व प्रसव संबंधी परेशानियों के कारण अपने प्राण गवां देती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रसव के दौरान गर्भवती की मृत्यु का 24.8 प्रतिशत कारण हैमरेज, 14.9 प्रतिशत कारण संक्रमण और 12.9 प्रतिशत कारण एक्लैंपसिया है। मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड में ‘जननी एक्सप्रेस’ के द्वारा गर्भवती को अस्पताल पहुंचाए जाने की मुफ़्त सुविधा राज्य सरकार की ओर से मुहैया कराई जा रही है किन्तु जागरूकता की कमी के कारण परिवार यह तय नहीं कर पाता है कि गर्भवती को अस्पताल कब पहुंचाया जाए? ‘जननी एक्सप्रेस’ बुलाने में भी इतनी देर कर दी जाती है कि या तो वाहन में ही प्रसव की स्थिति निर्मित हो जाती है या फिर गर्भवती की हालत गंभीर होने लगती है। ऐसी दशा में सुरक्षित मातृत्व अभियान को पूरी ईमानदारी से और पूरी गंभीरता से चलाया जाना जरूरी है। 

 परिवार खुश होता है कि उनकी बहू उनके परिवार को संतान देने वाली है, पति प्रसन्न होता है कि उसकी पत्नी उसे पिता का दर्जा दिलाने वाली है किन्तु इन खुशियों के बीच गर्भवती की सही देखभाल, स्वास्थ्य-सुरक्षा तथा उसकी इच्छा-अनिच्छा की इस तरह अनदेखी कर दी जाती है कि दुष्परिणाम गर्भवती की मृत्यु के रूप में सामने आता है। जबकि एक गर्भवती का दायित्व सरकार या कानून से कहीं अधिक परिवार पर होता है, इस बात को परिवार और समाज को समझना ही होगा।     
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( नवभारत, 11.04.2019 )
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Wednesday, April 10, 2019

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चर्चा प्लस ... अपने भीतर की दुर्गा को पहचाने स्त्रियां - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...
अपने भीतर की दुर्गा को पहचाने स्त्रियां
- डॉ. शरद सिंह
नवरात्रि... वे नौ दिन जब देवी दुर्गा के नौ रूपों की अनुष्ठानपूर्वक स्तुति की जाती है... देवी दुर्गा जो स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं, असुरों का विनाश करने की क्षमता रखती हैं... स्त्रियों द्वारा पूरे अनुष्ठान के साथ मनया जाता है यह नौ दिवसीय पर्व। फिर भी आज स्त्री प्रताड़ित है। क्योंकि उसे अपने भीतर की दुर्गाशक्ति का पता ही नहीं है। देवी दुर्गा जिस स्त्री-साहस का प्रतीक हैं उस साहस को अपने भीतर जगाना होगा प्रत्येक स्त्री को, तभी सही अर्थ में सार्थक होगा नवरात्रि का अनुष्ठान।

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मनाः।।
 
Charcha Plus Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily News Paper चर्चा प्लस ... अपने भीतर की दुर्गा को पहचाने स्त्रियां - डॉ. शरद सिंह
 नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ रूपों की उपासना करते समय जिस स्त्रीशक्ति का बोध होता है वह अपने आप में प्रेरणादायक है। विडम्बना यह कि इन रूपों में निहित शक्तियों को सिर्फ़ धार्मिक दृष्टि से देखा और ग्रहण किया जाता है। इसलिए तो स्त्रियां शक्ति की पूजा तो करती हैं मगर अपने भीतर की शक्ति को पहचान नहीं पाती हैं। समाचारपत्रों में आए दिन स्त्री के विरुद्ध किए गए जघन्य अपराधों के समाचारों भरे रहते हैं। कभी दहेज हत्या तो कभी। समाज में आती जा रही चारित्रिक गिरावट को देख कर सभी को दुख होता है। लेकिन सिर्फ़ शोक करने या रोने से समस्या का समाधान नहीं निकलता। देवी दुर्गा का दैवीय चरित्र हमें यही सिखाता है कि अपराधियों को दण्डित करने के लिए स्वयं के साहस को हथियार बनाना पड़ता है। दुर्गा के नौ रूपों की नौ कथाओं की यदि व्यवहारिक व्याख्या की जाए तो प्रत्येक कथा का सार यही मिलता है कि स्त्री में वह क्षमता है कि वह अपनी रक्षा तो कर ही सकती है बल्कि पूरे समाज की रक्षा कर सकती है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार दुर्गा के नौ रूपों की नौ कथाएं इस प्रकार हैं-
महाकाली - कथा के अनुसार विष्णु जी के कानों के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो राक्षसों की उत्पत्ति हुई। मधु और कैटभ, ब्रह्मा को देख उन्हें अपना भोजन बनाने के लिए दौड़े। ब्रह्मा जी ने भयग्रस्त हो कर विष्णु जी स्तुति करने लगे। ब्रह्माजी की स्तुति से विष्णु भगवान की आंख खुल गई और उनके नेत्रों में वास करने वाली महामाया वहां से लोप हो गई। विष्णु जी के जागते ही मधु-कैटभ उनसे युद्ध करने लगे। यह युद्ध पांच हजार वर्षों तक चला था। अंत में महामाया ने महाकाली का रुप धारण किया और दोनों राक्षसों की बुद्धि को बदल दिया। ऐसा होने पर दोनों असुर भगवान विष्णु से कहने लगे कि हम तुम्हारे युद्ध कौशल से बहुत प्रसन्न है। तुम जो चाहो वह वर मांग सकते हो। भगवान विष्णु बोले कि यदि तुम कुछ देना ही चाहते हो तो यह वर दो कि असुरों का नाश हो जाए। उन दोनों ने तथास्तु कहा और उन महाबली दैत्यों का नाश हो गया।
महालक्ष्मी - दैत्य महिषासुर ने अपने बल से सभी राजाओं को परास्त कर पृथ्वी और पाताल लोक पर अपना अधिकार कर लिया था। अब वह स्वर्ग पर अधिकार चाहता था। उसने देवताओं पर आक्रमण कर दी। देवताओं ने अपनी रक्षा के लिए भगवान विष्णु तथा शिवजी से प्रार्थना की। उनकी प्रार्थना सुनकर दोनों के शरीर से एक तेज पुंज निकला और उसने महालक्ष्मी का रुप धारण किया। इन महालक्ष्मी ने महिषासुर का अंत किया और देवताओं को दैत्यों के कष्ट से मुक्ति दिलाई।
चामुण्डा देवी - शुम्भ व निशुम्भ नामक दो असुरों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। देवताओं ने भगवान विष्णु को याद किया और उनसे प्रार्थना की। उनकी इस प्रार्थना और अनुनय से विष्णु भगवान के शरीर से एक ज्योति प्रकट हुई जो चामुण्डा के नाम से प्रसिद्ध हुई। देखने में वह बहुत सुंदर थी और उनकी सुंदरता देख कर शुम्भ-निशुम्भ ने सुग्रीव नाम के अपने एक दूत को देवी के पास भेजा कि वह उन दोनों में से किसी एक को अपने वर के रुप में स्वीकार कर ले। देवी ने उस दूत को कहा कि उन दोनों में से जो उन्हें युद्ध में परास्त करेगा उसी से वह विवाह करेगी। दूत के मुंह से यह समाचार सुनकर उन दोनो दैत्यों ने पहले युद्ध के लिए अपने सेनापति धूम्राक्ष को भेजा जो अपनी सेना समेत मारा गया। उसके बाद चण्ड-मुण्ड को भेजा गया जो देवी के हाथों मारे गए। उसके बाद रक्तबीज लड़ने आया। रक्तबीज की एक विशेषता यह थी कि उसके शरीर से खून की जो भी बूंद धरती पर गिरती उससे एक वीर पैदा हो जाता था। देवी ने उसके खून को खप्पर में भरकर पी लिया। इस तरह से रक्तबीज का भी अंत हो गया। अब अंत में शुम्भ-निशुम्भ लड़ने आ गए और वह भी देवी के हाथों मारे गए।
योगमाया - जब कंस ने देवकी और वासुदेव के छः पुत्रों को मार दिया तब सातवें गर्भ के रुप में शेषनाग के अवतार बलराम जी आए और रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित होकर प्रकट हुए। उसके बाद आठवें गर्भ में श्रीकृष्ण भगवान प्रकट हुए। उसी समय गोकुल में यशोदा जी के गर्भ से योगमाया का जन्म हुआ। वासुदेव जी कृष्ण को वहां छोड़कर योगमाया को वहां से ले आए। कंस को जब आठवें बच्चे के जन्म का पता चला तो वह योगमाया को पटककर मारने लगा लेकिन योगमाया उसके हाथों से छिटकर आकाश में चली गई और उसने देवी का रुप धारण कर लिया। आगे चलकर इसी योगमाया ने कृष्ण के हाथों योगविद्या और महाविद्या बनकर कंस का संहार किया।
रक्तदंतिका - बहुत समय पहले की बात है वैप्रचिति नाम के असुर ने पृथ्वी व देवलोक में अपने कुकर्मों से आतंक मचा के रखा था। उसने सभी का जीना दूभर कर दिया था। देवताओं और पृथ्वीवासियों की पुकार से देवी दुर्गा ने रक्तदन्तिका नाम से अवतार लिया। देवी ने वैप्रचिति और अन्य असुरों का रक्तपान कर के मानमर्दन कर दिया। देवी के रक्तपान करने उनका नाम रक्तदन्तिका पड़ गया।
शाकुम्भरी देवी - प्राचीन समय में एक बार पृथ्वी पर सौ वर्षों तक बारिश ना होने से भयंकर सूखा पड़ गया। चारों ओर सूखा ही सूखा था और वनस्पति भी सूख गई थी जिससे सभी ओर हाहाकार मच गया। सूखे से निपटने के लिए ऋषि-मुनियों ने वर्षा के लिए भगवती देवी की उपासना की। उनकी स्तुति से मां जगदम्बा ने शाकुम्भरी के नाम से पृथ्वी पर स्त्री रुप में अवतार लिया। उनकी कृपा हुई और पृथ्वी पर बारिश पड़ी। मां की कृपा से सभी वनस्पतियों और जीव-जंतुओं को जीवन दान मिला।
श्रीदुर्गा देवी - प्राचीन समय में दुर्गम नाम का एक राक्षस हुआ जिसके प्रकोप से पृथ्वी, पाताल और देवलोक में हड़कम्प मच गया। इस विपत्ति से निपटने के लिए भगवान की शक्ति दुर्गा ने अवतार लिया। देवी दुर्गा ने दुर्गम राक्षस का संहार किया और पृथ्वी लोक के साथ देवलोक व पाताललोक को विपत्ति से मुक्ति दिलाई। दुर्गम राक्षस का वध करने के कारण ही तीनों लोकों में इनका नाम देवी दुर्गा पड़ा।
भ्रामरी - प्राचीन समय में अरुण नाम के राक्षस की इतनी हिम्मत बढ़ गई कि वह देवलोक में रहने वाली देव-पत्नियों के सतीत्व को नष्ट करने का कुप्रयास करने लगा। अपने सतीत्व को बचाने के लिए देव पत्नियों ने भौरों का रुप धारण कर लिया। वह सब देवी दुर्गा से अपने सतीत्व को बचाने के लिए प्रार्थना करने लगी। देव-पत्नियों को दुखी देख मां दुर्गा ने भ्रामरी का रुप धारण किया और अरुण राक्षस के संहार के साथ उसकी सेना को भी नष्ट कर दिया।
चण्डिका - एक बार पृथ्वी पर चण्ड-मुण्ड नाम के दो राक्षस पैदा हुए। इन दोनों राक्षसों ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया। इससे दुखी होकर देवताओं ने मातृ शक्ति देवी का स्मरण किया। देवताओं की स्तुति से प्रसन्न होकर देवी ने चण्ड-मुण्ड राक्षसों का विनाश करने के लिए चण्डिका के रुप में अवतार लिया।
जब हम देवी के इन साहसी चरित्रों की कथा का पाठ करते हैं, इन्हें सुनते हैं, इन पर आस्था रखते हैं तो फिर इनसे साहस की शिक्षा क्यों नहीं ले पाते हैं? महिलाओं के प्रति अपराधों की बढ़ती दर को देखते हुए यदि इन चरित्रों के साहस को महिलाएं अपने जीवन में उतार लें तो वे अपने भीतर की याक्ति रूपी दुर्गा को पहचान सकेंगी। यदि स्त्रियों के हित में अपनी शक्ति को पहचान कर अपराधों का प्रतिकार किया जाए तो यह मां दुर्गा की सच्ची स्तुति होगी।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 10.04.2018)
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Wednesday, April 3, 2019

चर्चा प्लस ... वादों की लहरों पर चुनाव की नैया - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
चर्चा प्लस ...                    
  वादों की लहरों पर चुनाव की नैया     
      - डॉ. शरद सिंह
       गर्मी का मौसम आते ही जल स्रोतों का जलस्तर भले ही गिर जाए लेकिन चुनाव आते ही वादों की नदी लबालब भर जाती है और उसकी लहरें हिलोरें लेने लगती हैं। इन्हीं लहरों पर चुनावी नैया तैराने का भरपूर प्रयास किया जाता है। जैसा कि लोकसभा चुनावों से पहले इन दिनों देखा जा सकता है। वैसे मतदान की लहर किसकी नाव डुबाएगी और किसकी पार पहुंचाएगी, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। अभी तो वादों की झमाझम का दौर है।
Charcha Plus Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily News Paper  चर्चा प्लस ...वादों की लहरों पर चुनाव की नैया - डॉ. शरद सिंह
        लोकतंत्र में असली चुनाव बाहुबल से नहीं बल्कि बुद्धिबल से लड़े जाते हैं। इसीलिए बुद्धिबल अपनी इच्छाओं को साधने के लिए पहले बाहुबल को अपना सेवक बनाता है और फिर उससे अपने अनुसार काम कराता है। ऊपर से देखने में भले ही बुद्धिबल और बाहुबल एक-दूसरे के पूरक दिखें किन्तु पलड़ा भारी रहता है बुद्धिबल का ही। तभी तो कई बार छोटा दिखने वाला राजनीतिक दल बड़े राजनीतिक दल को पटखनी दे देता है। यूं भी इलेक्ट्रानिक मीडिया ने तमाम बंधनों के बावजूद आम नागरिक को जागरूक बना दिया है। वह राजनेताओं द्वारा किए जा रहे हर वादे को विश्लेषण के साथ अपने सामने पाती है और फिर उस पर स्वयं चिंतन-मनन करती है। यही कारण है कि अधिक हवा-हवाई वादों पर बवाल मचते देर नहीं लगती है। आज लगभग अस्सी प्रतिशत आम नागरिक वादों की तह तक जाने का प्रयास करता है। यह सच्चाई नेता भी समझते हैं, वे अब इस तरह के वादे करते हैं जो आम नागरिक के दिलों को छू सके तथा उन्हें विश्वास दिला सके।
लोक सभा चुनाव 2019 के मैदान में उतरे हुए छोटे राजनीतिक दलों की बात छोड़ दी जाए तो दो दल खुल्लमखुल्ला आमने-सामने खड़े नज़र आते हैं। एक कांग्रेस (आई) और दूसरी भारतीय जनता पार्टी। यद्यपि दोनों टिके रहने को प्रादेशिक दलों का सहारा लेते जा रहे हैं। सवाल यह है कि ये दोनों दल स्थानीय समस्याओं को समझ पा रहे हैं या नहीं। सबसे बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है इन्हें अपने उम्मीवार चुनने में। किसको खड़ा करें, किसको नहीं? जिसे टिकट नहीं मिलती है, वह दूसरे दल का रास्ता पकड़ लेता है। कहीं टिकट न मिलने का गुस्सा तो कहीं पैराशूट उम्मीदवार के प्रति नाराज़गी। रूठों को मनाने का दौर और दूसरे दलों के लोगों को फोड़ कर अपनी ओर मिलाने का दौर। इन सबके बीच चुनावी वादों की बरसात। ऐसी बरसात कि आम नागरिक की सोचने-समझने की क्षमता ही उसमें बह जाए और वह बुद्धिहीन की तरह जा कर बटन दबा आए। मगर आज की चतुर पब्लिक सब जानती है, उसकी आंखें भी खुली हुई हैं और कान भी। वह अपने विवेक से किस तरह काम लेती है यह इतिहास के पन्नों को देख कर भली-भांति जाना और समझा जा सकता है। जिस परिवार नियोजन की नीति ने कांग्रेस आई की कुर्सी छीन ली थी, सन् 1977 में जनता पार्टी ने उसी परिवार नियोजन कार्यक्रम को त्यागने के संबंध में वादा कर चुनाव में जीत हासिल की थी। सन् 1980 में इंदिरा गांधी ने कार्य-कुशल सरकार के वादे के आधार पर विजय प्राप्त की थी और 1984 में राजीव गांधी ने जवाहरलाल नेहरू और श्रीमती गांधी के आदर्शो पर निर्मित एक साफ छवि वाली सरकार देने के वायदे पर भारी मतों से विजयश्री प्राप्ति की थी। लेकिन सन् 1989 में बोफोर्स तोप सौदे की दलाली की हवा ने राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार के कुर्सी छुड़ा दी और विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने । फिर, 1999 में कांग्रेस और तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने और गिराने के बाद स्थिर सरकार देने के वादे के साथ ‘‘राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन‘’ ने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में आम चुनाव जीता। ये वादे ही थे जो राजनीति में हार-जीत सुनिश्चित करते रहे।
        सन् 2014 में भजपा द्वारा किए गए वादों के बारे में आरजेडी नेता तेजस्वी यादव का कहना है कि 2019 में नए वादों की बात करने से पहले नरेन्द्र मोदी जी देश को बताएं कि उन्होंने 5 साल में अपने 2014 के घोषणापत्र में किए गए किन-किन वादों को पूरा किया है? आज उन मुद्दों पर बात करने से क्यों कतरा रहे हैं? उन भारी-भरकम आसमानी वादों, योजनाओं और घोषणाओं का क्या हुआ? बहरहाल, आम नागरिक भी जानता है कि विश्व पटल पर भारत का नाम भले ही जगमगाया हो लेकिन विदेशों में जमा कालाधन वापस देश में लाने का वादा पूरा नहीं हुआ, उल्टे नोटबंदी ने घरेलू महिलाओं की रसोईघर के डब्बों में छिपा कर की गई बचत को भी बाहर निकलवा दिया। नोटबंदी के साल भर बाद भी घर के किसी बैग, किसी कपड़े, किसी किताब में दबे हुए पांच सौ के नोट ने अचानक बरामद हो कर जो सदमा पहुंचाया है, उसे भुला पाना आसान नहीं है। फिर भी भाजपा के नए वादों की ओर आम नागरिक उत्सुकता से देख रहा है।
         इन दिनों कांग्रेस अपने प्रभाव को फिर से जगाने के लिए प्रभावी वादे किए जा रही है। राहुल गांधी ने स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में बजट बढ़ाने का वादा किया है। उन्होंने कहा है कि करीब 22 लाख सरकारी नौकरी की रिक्तियां हैं, जिन्हें उनकी पार्टी के सत्ता में आने पर अगले साल 31 मार्च तक भरा जाएगा। पार्टी इस बार किसानों के लिए कर्जमाफी की घोषणा करने के साथ ही स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के मुताबिक, न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने का वादा किया है। कांग्रेस के अन्य वादों में सबके लिए स्वास्थ्य सेवा का अधिकार, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग के बेघर लोगों को जमीन का अधिकार, पदोन्नति में आरक्षण के लिए संविधान में संशोधन करना और महिला आरक्षण विधेयक को पारित करना आदि शामिल हैं। जीडीपी का 6 प्रतिशत पैसा शिक्षा पर लगाने का वादा है। साथ ही असली जीएसटी लाने का वादा है।
कांग्रेस का यह भी वादा किया है कि अगर कांग्रेस पार्टी सत्ता में वापस आती है तो न्यूनतम आय योजना के तहत 20 प्रतिशत सबसे गरीब भारतीय परिवारों के खाते में हर साल 72,000 रुपये जमा किए जाएंगे। इस संबंध में कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला कहना है कि यह योजना महिला केंद्रित है। यह धनराशि सीधे घरों की महिलाओं के बैंक खाते में जमा की जाएगी। महिलाओं के पक्ष में एक और वादा कि लोकसभा-विधानसभा चुनाव में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू किया जाएगा। साथ ही केंद्र सरकार की नौकरियों में भी महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का लाभ मिलेगा।
कांग्रेस ने जहां जमीनी मुद्दों को अपने वादों में पिरोया है वहीं भाजपा के हाथ से मंदिर का मुद्दा लगभग फिसल चुका है। उसे आमनागरिक की वेदना और संवेदना को जीतने वाले वादे ढूंढने में पसीना बहाना पड़ रहा है। वादे पूरे न कर पाने पर कांग्रेस से सत्ता छिनी थी अब वादे पूरे न कर पाने पर भाजपा को खाली हाथ न रह जाना पड़े।
भाजपा ने फरवरी 2019 को चुनावी वादे तय करने के लिए एक लोकतांत्रिक तरीके की घोषणा की थी। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और गृह मंत्री राजनाथ सिंह ‘भारत के मन की बात, मोदी के साथ’ अभियान शुरू किया था। एक महीने तक चलने वाले इस अभियान में विभिन्न माध्यमों से देश की जनता से दस करोड़ सुझाव मांगने का लक्ष्य रखा गया था। बीजेपी के राज्यसभा सदस्य और मीडिया प्रभारी अनिल बलूनी ने तब कहा था कि अगले पांच साल में राष्ट्र निर्माण का एजेंडा तय करने लिए यह सहकारी प्रयास होगा। यह प्रत्येक भारतीय को भारत ढालने के अभियान में शामिल करने का प्रयास है। योजना प्रभावी थी लेकिन इसका संचालन प्रभावी ढंग से हो नहीं सका। फिर भी भाजपा अपने वादों के साथ डटी हुई है जिसमें सवर्णों को आरक्षण जैसे मुद्दे भी हैं।
     यह विडम्बना ही है कि प्रत्येक आमचुनाव के पहले किए गए वादे आजादी के बाद से अब तक लगभग जैसे के तैसे हैं। वही बेरोजगारी हटाने, गरीबी उन्मूलन, किसानों की स्थिति में सुधार आदि के वादे। यदि जीतने वाले राजनीतिक दलों ने सत्ता मिलने के बाद अपने वादों को पूरा किया होता तो आज भी वही बुनियादी जरूरतों को पूरा करने से जुड़े वादे दोहराए नहीं जाते। अब यह आम नागरिक पर निर्भर है कि वह किसके वादों को आजमाना चाहेगी और किसे सत्ता-सुख दिलाएगी। गर्मी का मौसम आते ही जल स्रोतों का जलस्तर भले ही गिर जाए लेकिन चुनाव आते ही वादों की नदी लबालब भर जाती है और उसकी लहरें हिलोरें लेने लगती हैं। इन्हीं लहरों पर चुनावी नैया तैराने का भरपूर प्रयास किया जाता है। जैसा कि लोकसभा चुनावों से पहले इन दिनों देखा जा सकता है। वैसे मतदान की लहर किसकी नाव डुबाएगी और किसकी पार पहुंचाएगी, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। अभी तो वादों की झमाझम का दौर है। इस दौर में स्व. दुष्यंत कुमार का यह शायरी याद आ रही है-
          ख़ुदा नहीं न सही, आदमी का ख़्वाब सही,
          कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये।
          वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
          मैं बेक़रार हूं  आवाज़ में असर के लिए।     
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Friday, March 29, 2019

कोमल कंधों पर भारी बोझ - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह Published in Navbharat

Dr (Miss) Sharad Singh
आज 29.03.2019 को नवभारत में प्रकाशित स्कूल बैग के भारी बोझ के मुद्दे पर मेरा लेख....इसे आप भी पढ़िए ! हार्दिक धन्यवाद नवभारत

कोमल कंधों पर भारी बोझ
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
एक बच्चा सुबह उठता है। जल्दी-जल्दी तैयार होता है कि कहीं स्कूलबस न छूट जाए। जैसे-तैसे मुंह में नाश्ता भरता है और नश्ता गले से पेट तक पहुंचने से पहले 8-10 किलो का बस्ता उठा कर दौड़ पड़ता है घर से स्कूलबस-स्टॉप की ओर। घर से बस तक की यह दूरी पचास मीटर से कहीं कम तो ज्यादा भी होती है। स्कूलबस आने तक बस्ता बच्चे के कोमल कंधों पर लदा रहता है। कंधे थक जाते हैं तो पीठ पर वज़न अधिक महसूस होता है जिसे साधने के लिए कमर अपने-आप झुकने लगती है। जबकि स्वास्थ्य के नियम कहते हैं कि शरीर हमेशा सही पाश्चर में होना चाहिए। चिकित्सक तो यहां तक कहते हैं कि कक्षा 1 से 2 के बच्चों को मात्र 1 किलो तक तो कक्षा 8 से ऊपर कक्षा में पढ़नेवाले बच्चों को 5 किलो वजन तक का ही बस्ता होना चाहिए। भारी बैग के चलते बच्चों की रीढ़ की हड्डी को नुकसान, फेफड़ों की समस्या होने की संभावनाएं होती है। और सांस लेने में दिक्कत जैसे कई समस्याओँ उठानी पड़ सकती है। 


Navbharat - Komal Kandhon pr Bhari Bojha - Dr Sharad Singh, 29.03.2019

बच्चों के बस्ते के बढ़ते वज़न को नियंत्रित करने के लिए आज से लगभग 27 साल पहले वर्ष 1992 में प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई थी। कमेटी ने बच्चों के बस्ते के बढ़ते बोझ और उनके कमजोर कंधों का गंभीरता से अध्ययन किया। इसके बाद यशपाल कमेटी ने जुलाई 1993 में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में होमवर्क से लेकर स्कूल बैग तक के लिए कई सुधार सुझाए गए थे। जिनका भरपूर स्वागत भी हुआ लेकिन अफ़सोस कि सुधार ईमानदारी से अमल में नहीं लाया गया। उस समय यह राय भी दी गई थी कि नर्सरी कक्षाओं में दाखिले के लिए होने वाले टेस्ट व इंटरव्यू बंद होने चाहिए। आज छोटे-छोटे बच्चे होमवर्क के आतंक में दबे पड़े हैं, जबकि यशपाल समिति की सलाह थी कि प्राइमरी क्लासों में बच्चों को गृहकार्य इतना दिया जाना चाहिए कि वे अपने घर के माहौल में नई बात खोजें और उन्हीं बातों को विस्तार से समझें। मिडिल व उससे ऊपर की कक्षाओं में होमवर्क जहां जरूरी हो, वहां भी पाठय़ पुस्तक से नहीं हो। पर आज तो होमवर्क का मतलब ही पाठय़ पुस्तक के सवाल-जवाबों को कापी पर उतारना या उसे रटना रह गया है। कक्षा में 40 बच्चों पर एक टीचर, विशेष रूप से प्राइमरी में 30 बच्चों पर एक टीचर होने की सिफारिश खुद सरकारी स्कूलों में भी लागू नहीं हो पाई है।
यशपाल कमेटी के लगभग 14 साल बाद वर्ष 2006 में केंद्र सरकार ने क़ानून बनाकर बच्चों के स्कूल का वज़न तय किया, लेकिन यह क़ानून भी लागू नहीं हो सका। जबकि अस्थिरोग विशेषज्ञों ने भी इसके पक्ष में अपनी राय देते हुए बस्ते के भारी बोझ के खतरों से आगाह करते हुए कहा चेताया था कि-‘‘भारी बस्ते ढोने से बच्चे की रीढ़ की हड्डी पर तो असर होता है ही, उनका पोश्चर भी ग़लत हो जाता है।’’ बच्चों की हड्डी मुलायम होती है। ऐसे में ज़्यादा वज़न से उन्हें गर्दन, कंधे और कमर दर्द की शिकायत हो जाती है। कई बार हड्डी चोटिल भी हो सकती है। भारी बैग उठाकर चलने से बच्चे आगे की ओर झुक जाते हैं जिससे बॉडी पॉश्चर पर असर पड़ता है। क्षमता से अधिक वज़न उठाने से बच्चों में कमज़ोरी और थकान रहने लगती है।’’
इसके बाद स्कूली बच्चों की पीठ से बस्ते का बोझ कम करने के लिए केंद्र सरकार ने निर्देश जारी किया। इसमें साफ तौर पर कहा गया कि किस कक्षा के बच्चों के बैग का वजन कितना होना चाहिए। इसी आधार पर केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने इस संबंध में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश जारी किए। इसमें राज्य सरकारों व केंद्र शासित प्रदेशों से कहा गया कि वे स्कूलों में विभिन्न विषयों की पढ़ाई और स्कूल बैग के वजन को लेकर भारत सरकार के निर्देशों के अनुसार नियम बनाएं। इसमें कहा गया कि पहली से दूसरी कक्षा के छात्रों के बैग का वजन डेढ़ किग्रा से अधिक नहीं होना चाहिए। इसी तरह तीसरी से 5वीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के बैग का वजन 2-3 किग्रा, छठी से 7वीं के बच्चों के बैग का वजन 4 किग्रा, 8वीं तथा 9वीं के छात्रों के बस्ते का वजन साढ़े चार किग्रा और 10वीं के छात्र के बस्ते का वजन 5 किलोग्राम होना चाहिए। उल्लेखनीय है कि चिल्ड्रन्स स्कूल बैग एक्ट, 2006 के तहत बच्चों के स्कूल बैग का वजन उनके शरीर के कुल वजन के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। मगर सवाल वहीं है कि यह वज़न भी शारीरिक रूप से मजबूत बच्चे के लिए सही हो सकता है, कमजोर बच्चे के लिए नहीं। एक सर्वे के अनुसार, दिमाग़ से तेज लेकिन शरीर से कमजोर बच्चे सिर्फ़ बस्ते के बोझ के दबाव से पढ़ाई में पिछड़ने लगते हैं। ध्यान देने की बात है कि बच्चे के वजन के दस प्रतिशत का निर्धारण हर बच्चे के लिए अलग-अलग नहीं किया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर एक औसत मानक हर बच्चे के लिए उपयुक्त भी नहीं हो सकता है।
इस समस्या का एक पक्ष और भी है। मंहगें प्राईवेट स्कूलों में बच्चों को डिज़िटल पुस्तकें और स्कूल में लॉकर्स भी उपलब्ध कराए जाते हैं जिससे वे बोझमुक्त रह सकें। लेकिन सामान्य स्कूलों में यह सुविधा बच्चों को नहीं मिल पाती है। ग्रामीण बच्चे जो बिजली की लुकाछिपी से जूझते रहते हैं वे डिज़िटल किताबों की सुविधा का लाभ ठीक से उठा भी नहीं सकते हैं। जिन बच्चों को स्कूलबस नसीब हो जाती है वे तो फिर भी खुशनसीब हैं लेकिन जिन बच्चों को पीठ पर बस्ते का भारी बोझ लाद कर चार-पांच कि.मी. या उससे भी अधिक की दूरी तय करनी पड़ती है या फिर रस्सी बांध कर बनाए गए पुलों से हो कर गुज़रना पड़ता है, उन पर उनके वज़न के दस प्रतिशत बोझ को लागू करना भला कैसे न्यायसंगत हो सकता है? वस्तुतः हमारे देश में शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता का अभाव है और अभाव है बच्चों की सेहत की सुरक्षा का। इलेक्ट्रॉनिक क्रांति के बावजूद आज भी करोड़ों बच्चे बस्ते का भारी बोझ उठाने को विवश है। आज भी देश में अनेक स्कूल ऐसे हैं जहां बच्चों के कंधों पर बस्ते का भारी बोझ तो है मगर बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है। शिक्षा नीति और शिक्षा योजनाओं के व्यवहारिक निर्माण और उसके अनुपालन की अभी भी कमी है। जबकि देश के हर बच्चे तक डिज़िटल पढ़ाई की सुविधा पहुंचा कर इस समस्या का हल निकल सकता है।
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( नवभारत, 29.03.2019 )

Thursday, March 28, 2019

चर्चा प्लस ... नाज़ुक कंधों पर भारी बोझ : बच्चों को स्कॉलर बनाना है या हम्माल ? - डॉ. शरद सिंह


चर्चा प्लस ... नाज़ुक कंधों पर भारी बोझ : बच्चों को स्कॉलर बनाना है या हम्माल ?     
- डॉ. शरद सिंह
स्कूलों में बच्चों की भर्ती का समय सिर पर आते ही उसका दबाव हर माता-पिता के चेहरे पर देखा जा सकता हैं। भर्ती के बाद बच्चों के पीठ पर लदने वाले बस्ते के वज़न को देख कर घबराहट होती हैं। नन्हें बच्चों के नाज़ुक कंधों पर बस्ते का भारी बोझ देख कर समझ में नहीं आता है कि हम बच्चों को स्कॉलर बनाने के लिए स्कूल भेज रहे हैं या हम्माल (बोझा ढोने वाला) बनाने के लिए तैयार कर रहे हैं। आखिर हमारे शिक्षानीति निर्माता कब उतारेंगे इस बोझ को बच्चों के कोमल कंधों से?   
चर्चा प्लस ... नाज़ुक कंधों पर भारी बोझ : बच्चों को स्कॉलर बनाना है या हम्माल ? - डॉ शरद सिंह
          एक चौंकाने वाली किन्तु ऐतिहासिक घटना, अगस्त 2016, महाराष्ट्र के चंद्रपुर कस्बे के कक्षा 7 वीं में पढ़नेवाले दो बच्चे, उम्र लगभग 12 साल, प्रेस क्लब पहुंचे और उन्होंने कहा कि वे अख़बारवालों से बात करना चाहते है। उनका आशय बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करने से था। उनकी यह मांग सुन कर प्रेसक्लब में बैठे पत्रकार चकित रह गए। उन्होंने दोनों बच्चों के लिए आनन-फानन में प्रेस कॉन्फ्रेंस की व्यवस्था करा दी। दोनों बच्चों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारी बस्तों की समस्या पर चर्चा की। बच्चों ने कहा कि हर रोज उन्हें अपने बैग में रख कर 18-20 किताबें स्कूल ले जानी पड़ती हैं। जिससे बस्ते का वजन लगभग 7-8 किलो हो जाता है। वे थक जाते हैं और ढंग से पढ़ाई नहीं कर पाते हैं। उनके कंधे और कमर में दर्द रहने लगा है।  अपनी पीड़ा बयान करते हुए उन बच्चों ने चेतावनी भी दी कि यदि बस्ते हल्के नहीं किए जाते तो बच्चे अनशन करेंगे। दो बच्चों की इस बच्चों की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने हंगामा मचा दिया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को अपने संज्ञान में लेते हुए महाराष्ट्र सरकार को आदेश दिया कि बच्चों के बैग के वजन को हल्का किया जाए। महाराष्ट्र सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश को स्वीकार तो किया किन्तु इसका समुचित पालन नहीं करा पाई। गैरजरूरी मामले की भांति बच्चों के बस्ते के वजन का मामला प्रत्येक राज्य सरकारों द्वारा बहुत जल्दी ठंडे बस्ते में सरका दिया जाता है।
एक ऑटोवाला या मज़दूर भी यह सपना देखने का अधिकार रखता है कि उसके बच्चे किसी अच्छे अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ें और बड़े हो कर किसी अच्छे पद पर काम करें। वह अपनी पूरी जान लड़ा देता है बच्चों की फीस भरने और उनकी कापी-किताब, यूनीफॉर्म सहित उन तमाम खर्चों को पूरा करने के लिए जो अच्छे प्राईवेट स्कूल में पढ़ने के लिए जरूरी होते हैं। बस, नहीं संवार पाता है तो अपने बच्चे की सेहत। वह उसे उतना पौष्टिक भोजन नहीं दे पाता है जितना कि उसके दो से ले कर आठ-दस किलो तक के बस्ते को ढोन के लिए जरूरी है। इकहरे बदन का सींकिया-सा बच्चा और उसके कंधों पर दस किलो का वज़न जिसमें पानी की बोतल भी शामिल है। उस बच्चे को देख कर समझ में नहीं आता है कि हम बच्चों को स्कॉलर बनाने के लिए स्कूल भेज रहे हैं या हम्माल (बोझा ढोने वाला) बनाने के लिए तैयार कर रहे हैं। हिन्दी माध्यम या सरकारी स्कूलों की दशा तो और भी बदतर रहती है। वहां बच्चों के कोमल कंधों पर लदे हुए बस्ते के इस बोझ को देखने वाला और भी कोई नहीं होता है। उस पर ऐसे स्कूलों में प्रायः कमज़ोर तबके के बच्चे पढ़ने जाते हैं जिन्हें पर्याप्त पौष्टिक भोजन नहीं मिलता है। शारीरिक दृष्टि से कमजोर बच्चों को भी तन्दुरुस्त बच्चों जितना बस्ते करा वज़न ढोना पड़ता है। जो उनकी सेहत को और अधिक नुकसान पहुंचाता है। पौष्टिक भोजन के नाम पर कई स्कूलों में मिड-डे मील की दुहाई दी जाती है। तो क्या बच्चों को इसीलिए मिड-डे मील दिया जाता है ताकि वे बसते का बोझा ढो सकें।  
चिकित्सकों के अनुसार कक्षा 1 से 2 के बच्चों को महज 1 किलो, कक्षा 3 से 4 में पढ़नेवाले बच्चों को 2 किलो, कक्षा 5 से 7 में पढ़नेवाले बच्चों को 4 किलो और कक्षा 8 से ऊपर कक्षा में पढ़नेवाले बच्चों को 5 किलो तक का ही बैग का वज़न होना चाहिए। भारी बैग के चलते बच्चों की रीढ़ की हड्डी को नुकसान, फेफड़ों की समस्या होने की संभावनाएं होती है। और सांस लेने में  दिक्कत जैसे कई समस्याओँ उठानी पड़ सकती है। मगर सवाल वहीं है कि यह वज़न भी शारीरिक रूप से मजबूत बच्चे के लिए सही हो सकता है, कमजोर बच्चे के लिए नहीं। एक सर्वे के अनुसार, दिमाग़ से तेज लेकिन शरीर से कमजोर बच्चे सिर्फ़ बस्ते के बोझ के दबाव से पढ़ाई में पिछड़ने लगते हैं।
आज से लगभग 27 साल पहले वर्ष 1992 में प्रो. यशपाल की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई थी। कमेटी ने बच्चों के बस्ते के बढ़ते बोझ और उनके कमजोर कंधों का गंभीरता से अध्ययन किया। इसके बाद यशपाल कमेटी ने जुलाई 1993 में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में होमवर्क से लेकर स्कूल बैग तक के लिए कई सुधार सुझाए गए थे। जिनका भरपूर स्वागत भी हुआ लेकिन अफ़सोस कि सुधार ईमानदारी से अमल में नहीं लाया गया। उस समय यह राय भी दी गई थी कि नर्सरी कक्षाओं में दाखिले के लिए होने वाले टेस्ट व इंटरव्यू बंद होने चाहिए। आज छोटे-छोटे बच्चे होमवर्क के आतंक में दबे पड़े हैं, जबकि यशपाल समिति की सलाह थी कि प्राइमरी क्लासों में बच्चों को गृहकार्य इतना दिया जाना चाहिए कि वे अपने घर के माहौल में नई बात खोजें और उन्हीं बातों को विस्तार से समझें। मिडिल व उससे ऊपर की कक्षाओं में होमवर्क जहां जरूरी हो, वहां भी पाठय़ पुस्तक से नहीं हो। पर आज तो होमवर्क का मतलब ही पाठय़ पुस्तक के सवाल-जवाबों को कापी पर उतारना या उसे रटना रह गया है। कक्षा में 40 बच्चों पर एक टीचर, विशेष रूप से प्राइमरी में 30 बच्चों पर एक टीचर होने की सिफारिश खुद सरकारी स्कूलों में भी लागू नहीं हो पाई है।
यशपाल कमेटी के लगभग 14 साल बाद वर्ष 2006 में केंद्र सरकार ने क़ानून बनाकर बच्चों के स्कूल का वज़न तय किया, लेकिन यह क़ानून भी लागू नहीं हो सका। जबकि अस्थिरोग विशेषज्ञों ने भी इसके पक्ष में अपनी राय देते हुए बस्ते के भारी बोझ के खतरों से आगाह करते हुए कहा चेताया था कि-‘‘भारी बस्ते ढोने से बच्चे की रीढ़ की हड्डी पर तो असर होता है ही, उनका पोश्चर भी ग़लत हो जाता है।’’ बच्चों की हड्डी मुलायम होती है। ऐसे में ज़्यादा वज़न से उन्हें गर्दन, कंधे और कमर दर्द की शिकायत हो जाती है. कई बार हड्डी चोटिल भी हो सकती है। भारी बैग उठाकर चलने से बच्चे आगे की ओर झुक जाते हैं जिससे बॉडी पोश्चर पर असर पड़ता है। क्षमता से अधिक वज़न उठाने से बच्चों में कमज़ोरी और थकान रहने लगती है।’’
इसके बाद स्कूली बच्चों के पीठ से बस्ते का बोझ कम करने के लिए केंद्र सरकार ने निर्देश जारी किया। इसमें साफ तौर पर कहा गया कि किस कक्षा के बच्चों के बैग का वजन कितना होना चाहिए। वैसे स्कूलों में बच्चों के पीठ पर बस्ते का बोझ हमेशा एक बड़ा मुद्दा रहा है। अभिभावकों ने जहां इसे लेकर चिंता जताई, वहीं डॉक्टरों ने भी बच्चों की सेहत की दृष्टि से इसे सही नहीं बताया। बस्ते के बोझ को कम करने को लेकर समय-समय पर संबंधित विभागों की ओर से निर्देश भी जारी होते रहे हैं। कुछ महीने पहले मद्रास हाई कोर्ट ने बच्चों के पीठ से बस्ते का बोझ कम करने और पहली तथा दूसरी कक्षा तक के बच्चों को होमवर्क नहीं देने के निर्देश दिए थे, जो देशभर में चर्चा का विषय बन गई थी। अब केंद्र सरकार ने इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी किए। इसी आधार पर केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने इस संबंध में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश जारी किए। इसमें राज्य सरकारों व केंद्र शासित प्रदेशों से कहा गया कि वे स्कूलों में विभिन्न विषयों की पढ़ाई और स्कूल बैग के वजन को लेकर भारत सरकार के निर्देशों के अनुसार नियम बनाएं। इसमें कहा गया कि पहली से दूसरी कक्षा के छात्रों के बैग का वजन डेढ़ किग्रा से अधिक नहीं होना चाहिए। इसी तरह तीसरी से 5वीं कक्षा तक के विद्यार्थियों के बैग का वजन 2-3 किग्रा, छठी से 7वीं के बच्चों के बैग का वजन 4 किग्रा, 8वीं तथा 9वीं के छात्रों के बस्ते का वजन साढ़े चार किग्रा और 10वीं के छात्र के बस्ते का वजन 5 किलोग्राम होना चाहिए। उल्लेखनीय है कि चिल्ड्रन्स स्कूल बैग एक्ट, 2006 के तहत बच्चों के स्कूल बैग का वजन उनके शरीर के कुल वजन के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। ध्यान देने की बात है कि बच्चे के वजन के दस प्रतिशत का निर्धारण हर बच्चे के लिए अलग-अलग नहीं किया जा सकता है। वहीं दूसरी ओर एक औसत मानक हर बच्चे के लिए उपयुक्त भी नहीं हो सकता है।
इस समस्या का एक पक्ष और भी है। मंहगें प्राईवेट स्कूलों में बच्चों को डिज़िटल पुस्तकें और स्कूल में लॉकर्स भी उपलब्ध कराए जाते हैं जिससे वे बोझमुक्त रह सकें। लेकिन सामान्य स्कूलों में यह सुविधा बच्चों को नहीं मिल पाती है। ग्रामीण बच्चे जो बिजली की लुकाछिपी से जूझते रहते हैं वे डिज़िटल किताबों की सुविधा का लाभ ठीक से उठा भी नहीं सकते हैं। जिन बच्चों को स्कूलबस नसीब हो जाती है वे तो फिर भी खुशनसीब हैं लेकिन जिन बच्चों को पीठ पर बस्ते का भारी बोझ लाद कर चार-पांच कि.मी. या उससे भी अधिक की दूरी तय करनी पड़ती है या फिर रस्सी बांध कर बनाए गए पुलों से हो कर गुज़रना पड़ता है, उन पर उनके वज़न के दस प्रतिशत बोझ को लागू करना भला कैसे न्यायसंगत हो सकता है?
कुलमिला कर यही तस्वीर बनती है कि हमारे देश में शिक्षा व्यवस्था में एकरूपता का अभाव है और अभाव है बच्चों की सेहत की सुरक्षा का। इलेक्ट्रॉनिक क्रांति के बावजूद आज भी करोड़ों बच्चे बस्ते का भारी बोझ उठाने को विवश है। शिक्षा नीति और शिक्षा योजनाओं के व्यवहारिक निर्माण और उसके अनुपालन की अभी भी कमी है। देश के हर बच्चे तक डिज़िटल पढ़ाई की सुविधा पहुंचाने से ही इस समस्या का हल निकल सकता है जिसके लिए सरकार द्वारा ईमानदार पहल और कड़ाई से पालन कराने की दृढ़इच्छाशक्ति की दरकार है।        
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 27.03.2018)
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