Thursday, April 18, 2024

बतकाव बिन्ना की | इते तो सबई खतरों के खिलाड़ी बने जा रए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
इते तो सबई खतरों के खिलाड़ी बने  जा रए  
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       हमने देखी के भैयाजी अपने मोबाईल पे कछू जुटे भए हते। इत्ते मगत हते बे के मोरे पौंचबे की उनें खबरई ने भई। मैंने खटर-पटर करी। फेर बी उनको मोबाईल से ध्यान ने हटो। मोए तनक अचरज भई सो मैंने मेज पे धरो स्टील को गिलास तनक धीरे से लुढ़का दओ। बा लुढ़क के मेज से नीचे ‘ठन्न’ से गिरो। सो भैयाजी को ध्यान भंग भओ औ बे खिसिया के बोल परे, ‘‘काय बरतन काय पटक-फोड़ रईं? तुम हमें चैन से कछू ने करन दैहो।’’
‘‘साॅरी भैयाजी!’’ मैंने हाथ जोड़ के कई। सो भैयाजी चौंक परे। बे समझे हते के भौजी ने गिलास पटको आए, उनको मोपे ध्यान नई गओ हतो।
‘‘तुम कबे आईं बिन्ना?’’ उन्ने हड़बड़ा के पूछी।
‘‘अबई आई। औ आतई मोरो हाथ गिलास से टकरा गओ, सो बा नैंचे गिर गओ। अच्छो रओ के ऊंमें पानी नईं रओ, ने तो अबई बगर जातो। भौजी औ परेशान होतीं।’’ मैंने अपनी सफाई दई। बाकी मोय पतो रओ के मैं झूठी सफाई दे रई। गिलास तो मैंने जान के गिराई हती।
‘‘अरे, तुमाई भौजी कछू परेशान ने होतीं, उने तो हमें परेशान करबे से फुर्सत नइयां।’’ भैयाजी हंस के बोले। बाकी उन्ने अपनों मोबाईल बंद ने करो हतो, बस, तनक मोसे छुपा के टेढ़ो कर लओ रओ। अब कोनऊं बात छुपाई जाए तो ऊको जानबे के लाने प्रान कढ़न लगत आएं। सो, मोय भी कुलबुलाहट होन लगी के भैयाजी ऐसो का देख रए हते अपने मोबाईल पे कि गिलास गिरबे को ठनाके पे बी उन्हें जे समझ ने आई के गिलास कोन ने पटको?
‘‘भैयाजी का देख रए हते? कोनऊं रील आए का?’’ मैंने भैयाजी से पूछई लई। काय से के आजकाल रील के नांव की वीडियो क्लिप्स को बड़ो चलन आए। कोनऊं नाच की रैत आए, तो कोनऊं गाबे की, तो कोनऊं हंसी मजाक़ की। हर उमर के लोग अपनी रील बनाउत रैत आएं। हमें शंका भई कि भैयाजी कोनऊं रील देखबे में मगन रै हुइएं।
‘‘नईं रील नई देख रए हते। बस, ऊंसई।’’ भैयाजी ने टालबे को प्रयास करो।
‘‘जे न बताहें तुमें, हम बता रए इनके करम, के जे का रए हते।’’ भौजी भीतरे से बाहरे हम ओरन के पास आ ठाड़ी भईं। उन्ने हम ओरन की बतकाव सुन लई रई।
‘‘का कर रए हते जे?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘खतरों के खिलाड़ी बने जा रए जे। घर के काम गए चूला में, इने तो जुआ, सट्टा घांईं खेल खेलने आए।’’ भौजी बमकत भईं बोलीं।
‘‘अरे तुम तो और दे रईं। हम जुआ-सट्टा नोईं खेल रए।’’ भैयाजी हड़बड़ात भए बोले।
‘‘सो का खेल रए? तनक बताओ अपनी बिन्ना खों। जे तै कर हें के जो जे तुम खेल रए, बा का आए।’’ भौजी ने फेर के भैयाजी खों हड़काओ।
‘‘अरे कछू नईं, हम तनक बा गेम खेल रए हते। तुमने सोई उनके विज्ञापन देखे हुइएं। अच्छे बड़े-बड़े खिलाड़ी ऊकी तारीफें करत आएं। ऊमें जीतबो पक्को रैत आए।’’ भैयाजी मिमियात से बोले।
‘‘सो, आपने कछू जीतो?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘हऔ, पैलीदार दस रुपइया जीत गए सो पिल परे बोई खेल में। हम बता रए, रामधई, अपने हजार-खांड जब लों जे ने मिटा लैहें इनको सहूरी थोड़ई परने।’’ भौजी फटकारत भईं बोलीं।
‘‘कोन टाईप को खेल आए जो? मैंने विज्ञापन तो मनो देखे आएं, पर मोय कछू समझ में ने आई। औ मोय जे सब में परत में डर सोई लगत आए। कऊं ऐसो ने होय के जो है, बा सोई मिट जाए।’’ मैंने कई।
‘‘जेई तो हम इने समझात आएं। पर जे तो कैन लगत आएं के हम तो दस-दस रुपैया को खेल रए। कोन ज्यादा लगा रए। मनो लत लग जैहे तो फेर तो तुम हजार के बी खेलन लगहो। काय है के नईं?’’ भौजी बोलीं।
‘‘सई कई भौजी आपने। बा विज्ञापनों में जा बात कई सोई कई जात आए के सम्हल के खेलियो, ईकी लत लग सकत आए।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ तो, जा हिदायत सोई इत्ते जल्दी में बोली जात आए के कैबे को हो जाए के हमने तो हिदायत दई हती, औ कोनऊं खों समझई में ने आए।’’ भौजी बोलीं। फेर कछू सोचत भई कैन लगीं के,‘‘बिन्ना, हमें जे नईं समझ में आउत आए के जोन जे किरकेट पे सट्टा लगवाउत आएं उने तो पुलिस पकर लेत आए, मनो जे किरकेट के बडे-बड़े खिलाड़ी जे पैसाईसा लगाबे वारे खेल खेलबे खों कैत आएं तो उने कछू नई कओ जात? औ बिन्ना, जे सोचो के जे ओरें खुद तो अच्छो वारो खेल खेलत आएं औ पब्लिक खों पईसा लगाबे वारे मोबाईल वारे खेल खेलबे खों उकसात रैत आएं। भला जा का बात भई?’’
‘‘काय से उनको विज्ञापन के पइसा मिलत आएं।’’ मैंने कई।
‘‘इत्तो तो मिलत आए किरकेट खेलबे में। लाखों को बोलियां लगत आएं उन ओरन के लाने औ संगे अच्छे वारे विज्ञापन सोई मिलत आएं। फेर जे ओरें ई टाईप के विज्ञापन काय करत आएं?’’ भौजी पूछन लगीं।
‘‘अब अपन ओरें का कैं? बड़े लोगन की बड़ी बातें।’’ मैंने सोई टालबे को प्रयास करो।
‘‘नईं, मने ऐसो करो नईं जाओ चाइए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘ऐसो आए भौजी, के जब उने खुदई नईं कछू लग रओ औ ने सरकारें ऐसे खेलन खों रोक रई तो कोऊ औ का कर सकत आए?’’ मैंने कई।
‘‘अरे सरकारों की ने कओ! उने तो कलारी नईं दिखात के कां पेे ठेका दे दओ। सड़क के ई तरफी मंदिर तो ऊ तरफी कलारी। सामने बैंक, बाजू में खिलाड़ियन को खेल को मैदान, पासई में स्कूलें औ चल रई कलारी। बा तो बे दारूखोंरों की ईमानदारी कई जाए के कछू गड़बड़ नईं करत।’’ भौजी बोलीं।
‘‘बे का गड़बड़ करहें। कछू डोलत-डोलत अपने घरे चले जात आएं, तो कछू उतई रोड के किनारे डरे रैत आएं।’’ अब के भैयाजी बोले। फेेर बतान लगे के,‘‘एक दिनां हम कटरा बाजार से आ रए हते। एक पैचान वारे मिल गए तो तनक देर हो गई रई। फेर बी मनो रात के नौ बजे रए हुइएं। उते खेल परिसर की बाजू वारी कलारी से दो लड़का निकरे। उन्ने मोटर सायकिल उठाई औ लहरात भए चलान लगे। हमें समझ में आ गई के जे तो कऊं ने कऊं एक्सीडेंट करई के रुकहें। सो हमने अपनी गाड़ी धीमी कर के उनके पांछू राखी। बे पीली कोठी की घटिया लौं पौंचें औ उनको बैलेंस बिगरो, सो दोई गिरे उतई औ उनकी मोटरसायकिल रपट के फिंकाई, बा तो जे कओ के कोनऊं खों घली नईं, नईं तो बा तो निपटई जातो। हम औ दो-चार जने औ रुक गए। एक ने पास जा के देखी औ बोलो के इने हाथ ने लगाओ दोई टुन्न आएं। कऊं मर-मुरा गए तो सल्ल बींध जैहे। तभई कोऊ ने 100 नंबर पे डायल कर दओ, सो उतई सिविल लाईन से दो पुलिस वारे आ गए। सो हम उते से कढ़ आए। मनो जे तो उते को रोज को नाटक आए।’’
‘‘उनको नाटक तो आपने बड़े अच्छे से सुना दओ, औ अपने नाटक के बारे में का कर रए?’’ भौजी भैयाजी के खेल खों भूली ने हतीं।
‘‘अच्छा, अब बस बी करो। अब ने खेलबी।’’ भैयाजी हथियार डारत भए बोले।
‘‘सच्ची?’’ भौजी ने पूछी।
‘‘रामधई!’’ भैयाजी ने तुरतईं कसम खा लई।
‘‘ठीक! सो बिन्ना ऐसो करो, के तुमसे तो बनत आए, तुम इनके मोबाईल से बा खेल वारो एप्प डिलीट कर देओ। हमें इनकी बातन पे भरोसो नईयां।’’ भौजी भैयाजी को मोबाईल मोय पकरात भई बोलीं।
भैयाजी ने सोई चुपचाप मोबाईल को लाॅक खोल दओ। मैंने एप्प डिलीट कर दओ। ऊ टेम पे भैयाजी को मों देखतई बन रओ हतो। मनों जी पे पथरा रख के डिलीट करा रए होंए।
जे टाईप के खेल के तो मनो आजकाल सबई खतरों के खिलाड़ी बने जा रए। जोखिम की उने कोई फिकर नइयां। मनो भौजी जैसीं सबई लुगाइयां हड़कान लगें तो जे सबरे खिलाड़ी एकई दिनां में खेलबो भूल जाएं। बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
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Wednesday, April 17, 2024

रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएं - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

ॐ आपदामप हर्तारम दातारं सर्व सम्पदाम, लोकाभिरामं श्री रामं भूयो भूयो नामाम्यहम 
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चर्चा प्लस | बाज़ार की राहों में हमारे भटकते सरोकार और हमारा उपभोक्ता संस्करण | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
बाज़ार की राहों में हमारे भटकते सरोकार और हमारा उपभोक्ता संस्करण
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      यदि गंभीरता से सर्वे किया जाए तो 98 प्रतिशत लोग अपने जीवन से असंतुष्ट मिलेंगे। इनमें कई ऐसे लोग भी होंगे जिनके पास सुख-सुविधा के पर्याप्त सामान हैं। फिर भी वे अपने जीवन में किसी न किसी वस्तु की कमी से दुखी हैं। यदि एक है तो दो चाहिए, यदि दो है तो तीन चाहिए। यह हर तबके की विडम्बना है कि जो आर्थिक रूप से कमजोर तबका है, वह कम से कम मध्यमवर्ग तक अपनी पहुंच बनाना चाहता है। मध्यमवर्ग उच्चवर्ग के खांचे में स्वयं को फिट देखना चाहता है और उच्चवर्ग उसे चांद पर प्लाट लेना भी कम महसूस होता है। यह बाज़ार की गुलामी नहीं तो और क्या है? पर इसमें दोष बाज़ार का नहीं।  
    अकबर इलाहाबादी का यह प्रसिद्ध शेर आज निरर्थक हो चला है कि -
दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं
बाजार से   गुजरा  हूं   ख़रीददार नहीं हूं

     आज जो बाजार से नहीं भी गुज़र रहा है वह भी ऑनलाईन शाॅपिंग के जरिए बाज़ार का तलबगार ही नहीं बल्कि मुरीद बन गया है। आज के इंसान ने बाज़ार को अपनी ‘लाईफ लाईन’’ में शामिल कर लिया है।
पिछले दिनों कई साल बाद मेरी एक पुरानी परिचित मिली। उसे देख कर मुझे बहुत खुशी हुई। सोने के ज़ेवर और कीमती साड़ी से सजी हुई। एक विवाह समारोह में हुई भी यह भेंट थी। अतः उसका इस तरह ‘‘शोआफ’’ करते हुए अपने कीमती गहने, कपड़ों का प्रदर्शन करना स्वाभाविक था। मेरा ध्यान शायद इस ओर जाता भी नहीं यदि उसने अपने मन की ग्रंथि मेरे सामने न खोली होती। उसका मुझसे पहला प्रश्न था कि ‘‘तुम आजकल क्या कर रही हो?’’ मैंने भी उत्तर दिया कि ‘‘हमेशा की तरह लिखाई-पढ़ाई।’’ मेरी बात सुन कर उसने दुख प्रकट किया कि ‘‘उफ! इतनी डिग्रियां ले कर भी तुमने कोई जाॅब नहीं किया। ऐसा क्यों किया तुमने अपने साथ?’’ यह सहानुभूति थी या ताना, मैं समझ नहीं सकी। मैं सोचने लगी कि ऐसा क्या किया मैंने अपने साथ? मैं लिखते-पढ़ते अपना जीवन बिताना चाहती थी, सो बिता रही हूं। मेरी ज़िन्दगी ने तो मुझसे कोई शिकायत नहीं की। फिर मैंने उससे पूछा कि ‘‘और तुम्हारा क्या चल रहा है?’’ तो वह बताने लगी कि ‘‘बेटा डाॅक्टर हो गया है। बेटी ने कम्प्यूटर टेक्नाॅलाॅजी में कोर्स किया है और वह अगले महीने विदेश जा रही है। शायद वहीं बस जाए। बेटा भी विदेश में सेटल होने का जुगाड़ लगा रहा है।’’ इस पर मैंने उससे पूछा कि फिर तुम दोनों भी बच्चों के पास चले जाओगे या यहीं भारत में रहोगे?’’ तो वह बोली, नहीं जब तक हाथ-पांव चलेंगे तब तक हम यहीं काम करेंगे। हमने प्लान कर रखा है। रिटायरमेंट के बाद मैं प्राइवेट काॅलेज में जाॅब करूंगी और तुम्हारे जीजाजी को अभी से ऑफर मिल रहे हैं प्राइवेट कंपनियों से।’’ उसने शान से कहा। इस पर मैंने उससे कहा। ‘‘क्या करोगे तुम दोनों रिटायरमेंट के बाद नौकरी कर के? अरे, अब दूसरी पारी में अपनी लाईफ जीना। जिम्मेदारियां भी निपट चुकी हैं।’’ वह मेरी नासमझी पर हंस कर बोली,‘‘जब हम कमा सकते हैं तो क्यों न कमाएं? एक और एसयूवी लेने की भी सोच रहे हैं।’’

  बस, इससे अधिक हमारी बात नहीं हुई। शादी समारोह की गहमागहमी में हम दोनों अलग-अलग व्यस्त हो गए। लेकिन उसकी बातें मेरे मन को कई दिन तक कुरेदती रहीं। एक प्रश्न जो बार-बार मेरे मन में कौंध रहा था, वह ये था कि लोग जीने के लिए पैसे कमाने में जुटे हैं या पैसे कमाने के लिए जी रहे हैं? बाज़ार ने हमारी संतोषी प्रवृत्ति को बड़ी चतुराई से ‘डिलीट’ कर दिया है। आज अपने घर में किसी को भी पुराना कुछ नहीं चाहिए। न पुरानी टीवी, न पुराना प्रिज, न पुरानी कार और कोई सामान। हर दो साल में कंपनियां चार नए जेनरेशन बाजार में उतार देती है और उपभोक्ताओं में ललक जाग उठती है उन्हें लेने के लिए। बाजार अपनी सोची-समझी योजना के अनुरूप हर माध्यम से जम कर विज्ञापन करता है और इस बात को दिमाग में बिठा देता है कि यदि घर में नया सामान नहीं है तो जीवन का कोई स्टेटस नहीं है। इसका एक छोटा-सा नमूना हर घर में देखा जा सकता है कि हर मां कहती है कि ‘‘हमारे बच्चे तो पास्ता, नूडल्स खाए बिना मानते ही नहीं हैं। हमें पता है कि यह अच्छा नहीं है लेकिन बच्चे जिद करते हैं, तो क्या करें?’’ यह मां की लाचारी है या बच्चों का बालहठ है या फिर बाज़ार की मानसिक जकड़, इसे सभी समझते हैं किन्तु स्वीकार नहीं कर पाते हैं।

जो दूकान खोल कर बैठा है, वह तो अपना सामान बेचने का हर तरीका अपनाएगा ही। इसमें वह दोषी कैसे हुआ? वस्तुतः दोष उपभोक्ता का है जिसने अपनी आवश्यकताओं की सीमा को इतना लचीला बना लिया है कि वह अपनी वास्तविक आवश्यकताएं ही भूलता जा रहा है। हमने अपने आप को उपभोक्ता संस्करण में ढाल लिया है। आज मध्यमवर्गीय परिवार की स्थिति यह है कि लगभग हर तीसरे-चौथे घर में दुपहिया के साथ कम से कम एक चैपहिया होना जरूरी है। भले ही वह रोज न चले, भले ही उसे रखने का खर्चा वहन करना भारी पड़े लेकिन स्टेटस दिखाने के लिए एक फोरव्हीलर घर के सामने खड़ी होना जरूरी है। यह एक कटु सत्य है कि हम एक ओर कितनी भी बातें कर लें पर्यावरण और डीजल-पेट्रोल बचाने की लेकिन हम खुद ही उस पर अमल नहीं करते हैं। क्या हमारे नेतागण या उच्चाधिकारी सप्ताह में एक भी दिन सायकिल से या पैदल कार्यालय जाते हैं? नहीं! सेहत बनाने के लिए वे जिम जाना या पर्सनल ट्रेनर रखना पसंद करते हैं क्यों कि यह उनके ‘‘स्टेटस’’ को ‘‘सूट’’ करता है। हम अनुकरण के आदी हैं। यदि देश के सबसे बड़े व्यवसायी की बेटी के विवाह में ढाई अरब रुपए खर्च हो रहे हों तो हमारे घर की बेटी के विवाह में कम से कम ढाई करोड़ रुपए तो खर्च होने ही चाहिए । लोग देखें और ईष्र्या से अपनी दांतों तले उंगली दबा लें तब हमें सुकून मिलता है। प्रीवेडिंग शूट से ले कर विवाह का हर चरण बाज़ार के हवाले है। अब लोग विवाह में खुशी से नहीं नाचते हैं बल्कि खुशी दिखाने और अपने नृत्यकौशल दिखाने के लिए बाकायदे डांस ट्रेनिंग लेते हैं। क्या इसके लिए भी बाज़ार दोषी है? नहीं! देखा जाए तो बाज़ार अपना काम बेहतर ढंग से कर रहा है। उसे लोगों की जेबों से पैसे निकलवाने हैं और अपने प्रोडेक्ट बेचने के लिए उपभोक्ता से जम कर पैसे कमवाने हैं, सो बाज़ार अपना यह काम पूरी कुशलता से कर रहा है। यदि व्यक्ति अपने मन की शांति भौतिक वस्तुओं में ढूंढ रहा है तो इसमें बाज़ार का क्या दोष?

हमारा उपभोक्तावादी मानस सीमित या छोटी वस्तुओं में नहीं रमता है। गाड़ियों की भरमार के कारण शहर में सड़कों पर जगह की कमी होने लगी है। फिर भी हमें बड़ी से बड़ी एसयूवी चाहिए। महानगरों की कई लेयर वाली सड़कें भी समस्या का हल नहीं निकाल पा रही हैं। छोटे शहरों में तो जाम लगना आम बात है। घरों में गेराज बनवाने के बारे में कोई सोचता ही नहीं क्योंकि इसके लिए घर के सामने की सड़क तो है। बच्चों के खेल के मैदान पार्किंग लाॅट में बदलते जा रहे हैं। यह हमारी उपभोक्तावादी मानसिकता की ही देन है। सबसे बड़ी बात कि जिसके पास जितना है, वह उससे संतुष्ट नहीं है। उसे और चाहिए, और चाहिए, और चाहिए। यह ‘‘और और और’’ की ललक व्यक्ति को उस गधे के समान दौड़ाती रहती है जिसकी पीठ पर छड़ी बांध कर इस प्रकार उसकी आंखों के सामने गाजर लटका दी गई हो कि वह उसे मिले भी नहीं लेकिन निकट दिखाई देती रहे और वह उसे पाने की ललक में दौड़ता चला जाए।

   हमारे देश में, हमारी संस्कृति में हमेशा तप, त्याग, और संतोष की पैरवी की गई। लेकिन आज वह सब मिथ्या लगने लगती है जब माता के जगराते की तामझाम की होड़ दिखाई देती है। माता के जगराते में भी यह नहीं प्रतीत होता है कि माता को प्रसन्न करने के लिए सारी चेष्टाएं की जा रही हैं, बल्कि साफतौर पर यह सामने रहता है कि अपनी आर्थिक क्षमता का प्रदर्शन करने के लिए जगराता आयोजित किया गया है। चाहे  धार्मिक अनुष्ठान हों, सामाजिक रीत-रिवाज़ हों या फिर दैनिक जीवन की गतिविधियां सभी कुछ बाज़ारोन्मुख हो गया है। आज घरों में सिलाई मशीनें न के बाराबर रह गई हैं। घर के सिले कपड़े कोई नहीं पहनना चाहता है और न कोई घर पर सिलाई करना चाहता है। पहली पसंद होती है ब्रांडेड कपड़े। भले ही ब्रांड के डुप्लीकेट या काॅपी ही क्यों ने हो लेकिन ब्रांड की निशानी उन कपड़ों पर चस्पां होनी चाहिए। भले ही ब्रांड के नाम पर रिब्ड या कट जीन्स की चिथड़ानुमा पोशाक ही क्यों न हो, पर ब्रांडेड होनी चाहिए। ब्रांड बाजार के प्रतीक है, बाज़ार की सत्ता हैं और हम बाज़ार के गुलाम। इसलिए ब्रांड के नाम पर हमें सब ग्राह्य है। आजकल ब्रांड विवाह की कुंडली मिलान की तरह स्टेटस मिलान करता है। इन दिनों एक विज्ञापन बहुत प्रचलित है जिसमें एक कैफे में एक युवक-युवती अलग-अलग द्वार से एक साथ प्रवेश करते हैं, एक ही मेज की ओर बढ़ते हैं। पहले वे एक-दूसरे को देख कर उपेक्षा दर्शाते हैं और फिर दूसरे ही पल एक-दूसरे के पैरों में ब्रांडेड जूते देख कर मित्र बन जाते हैं। यानी ब्रांड ने उनके स्टेटस के जरिए छत्तीस के छत्तीस गुणों के मिलान का मंत्र फूंक दिया। बाजार यहां भी दोषी नहीं है। उसे तो अपने जूते बेचने हैं। लेकिन इस विज्ञापन को देख कर यदि कोई जूतों में स्टेटस मिलान करने लगे तो यह उसकी मानसिकता का दोष है। क्योंकि हर सुनहरी चीज सोना नहीं होती। व्यक्ति को परखने के बजाए वस्तु को परखने की आदत ने ही हमें बाज़ार का मानसिक गुलाम बना दिया है और आज हमारे जीवन के सारे सरोकार बाज़ार की गलियों में भटकते रहते हैं।

      बात अकबर इलाहाबादी के शेर से शुरू की थी, तो अब अपने एक शेर से ही विराम दे रही हूं जिसमें ‘‘मुनहसिर’’ शब्द का अर्थ है ‘‘निर्भर’’। शेर अर्ज़ है-
बाज़ार तो  बाज़ार है  खुल-खिल  के रहेगा,
बिकना है या टिकना है, तुम पर है मुनहसिर।     
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Tuesday, April 16, 2024

पुस्तक समीक्षा | प्रेम की उष्मा से भीगी ग़ज़लें | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 16.04.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई डॉ शिवनारायण जी के ग़ज़ल संग्रह  "झील में चांद" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा     
प्रेम की उष्मा से भीगी ग़ज़लें
 - समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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ग़ज़ल संग्रह  - झील में चांद
कवि        - शिवनारायण
प्रकाशक    - संजना प्रकाशन, डी-70/4, अंकुर इंक्लेव, करावल नगर, दिल्ली-110090
मूल्य       - 150/- (पेपरबैक)
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हिन्दी साहित्य जगत में शिवनारायण एक जाना-माना हैं। वे अपनी पत्रिका ‘‘नईधारा’’ के विगत कई वर्षों से सतत संपादन के लिए जाने जाते हैं। वे अपने विचारपूर्ण लेखों एवं चिंतनपूर्ण कविताओं के लिए प्रसिद्ध हैं किन्तु उनका प्रथम ग़ज़ल संग्रह ‘‘झील में चांद’’ का प्रकाशन उनके सभी जानने वालों के लिए चौंकाने वाला क़दम रहा। शिवनारायण के मानस में ग़ज़ल भी आकार लेती रहती है यह तथ्य प्रकट होना रोचक रहा। एक उत्सुकता के साथ हिन्दी साहित्य जगत ने इस ग़ज़ल संग्रह का स्वागत किया। जिस प्रकार का नास्टैल्जिक रोमांस का भाव देता संग्रह का नाम हैं, संग्रह की ग़ज़लों में प्रेम के स्वरूप का उतना ही अधिक विस्तारित है। प्रेम प्रकृति से, प्रेम मनुष्यत्व से और प्रेम प्रिय से - प्रेम ये तीनों रूप संग्रह की ग़ज़लों में मुखरित हुए हैं।
रामदरश मिश्र ने संग्रह के ‘‘अभिमत’’ में लिखा है कि ‘‘झील में चाँद - हिन्दी के विशिष्ट कवि और आलोचक डॉ. शिवनारायण का गजल-संग्रह है। उनकी कविताओं से मेरा अच्छा-खासा परिचय रहा है। उन्हें पढ़ता रहा हूँ। उनकी कविताओं में अपने समय की चेतना और संवेदना के साथ-साथ सामान्य जन की पीड़ा होती है। वास्तव में शिवनारायण संवेदना और प्रतिरोध के कवि हैं। मैं उनकी कविताओं का प्रशंसक रहा हूँ। मैं उनके गजलकार रूप से परिचित नहीं था। इस संग्रह ने उनके गजलकार रूप का परिचय दे दिया। मैं इन गजलों से गुजरता गया और विभिन्न शेरों में व्यक्त बाहर-भीतर के यथार्थ से रू-ब-रू होता गया।’’
इसी प्रकार लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने ‘‘गजलगोई जारी रहेगी’’ की आशा करते हुए अपना अभिमत दिया है कि ‘‘गजल के कारवाँ को आगे ले जाने वालें में इधर एक दमदार नाम शिवनारायण का और जुड़ गया है। शिवनारायण के नाम, साहित्य में उनके व्यापक योगदान तथा उनकी विपुल उपलब्धियों से साहित्य प्रेमी सुपरिचित हैं ही, अब गजल की दुनिया में उनकी दस्तक हर्ष का विषय है। गजल का जादू कम से कम शब्दों में कोई बड़ी बात, कोई गहरी बात आसानी से कह देने में है और यह शिवनारायण के पास भी है।’’
हिन्दी ग़ज़ल के पैरोकार  अनिरुद्ध सिन्हा ने शिवनारायण की ग़ज़लों पर ‘‘बूंदें जो गंगाजल बन जाती हैं’’ शीर्षक से अपना अभिमत दिया है कि- ‘‘गजल के लिए वस्तु-स्थिति का वर्णन करना या उसको प्रतिबिम्बित करना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु गजल-लेखन की अत्यंत मौलिक तकनीक और विधियाँ जो वर्षों के कठोर श्रम के बाद ही प्राप्त होती हैं, मसलन तुक, छंद, अनुप्रास, शैली-भेद आदि, इन सबको गजलों में साधना भी आवश्यक होता है। शायद इसी कारण शिवनारायण ने अपनी गजल पुस्तक को लाने में देर की। गजलों की दुनिया में देर से सही, पर हर तरह से दुरुस्त होकर ही उन्होंने अपने कदम रखे हैं। "झील में चाँद" की गजलों से गुजरते हुए पाठक महसूस करेंगे कि शिवनारायण बहुत ही सहज किन्तु सधे अंदाज में अपनी बात कहते हुए प्रेम, दर्शन और सामयिक यथार्थ की दुनिया से रुबरु कराते हैं। हिन्दी के ख्यात कवि-समालोचक होने के कारण अपने समय को देखने की इनके पास एक विशेष दृष्टि है, जिस कारण इनके कथन की कहन-भंगिमा में संश्लिष्ट सौंदर्य प्रभावी तरीके से सम्प्रेषित हो सम्मोहित करते हैं। पहली नजर में इनकी गजलों के शेर सहज-सरल जान पड़ेंगे, किन्तु पाठ के दोहराव में उनसे जाने कितने-कितने अर्थ झाँकने लगते हैं।’’

यूं तो हिन्दी साहित्य में काव्य विधाओं की कमी नहीं है, दोहा, रोला, सोरठा, चैपाई, घनाक्षरी आदि बहुसंख्यक छांदासिक विधाएं हैं। छंदमुक्त काव्य विधा भी हिन्दी में लोकप्रिय है। फिर भी हिन्दी काव्य में ग़ज़ल विधा को पर्याप्त स्थान मिला है। अमीर खुसरों से अंगड़ाइयां लेती हिन्दी ग़ज़ल ने दुष्यंत कुमार तक आ कर अपना एक सुनिश्चित स्थान पा लिया। हिन्दी में ग़ज़ल ने अरबी, फारसी में प्रचलित बहर की नियमावली को अपने अनुरुप परिवर्तित किया और उसके विषयों को भी विविध सोपान दिए। हिन्दी में कही गई ग़ज़लों में जीवन की खांटी सच्चाई और खुरदुरेपन ने खूब जगह पाई किन्तु उसने अपनी मूल प्रकृति अर्थात् प्रेम का साथ भी कभी नहीं छोड़ा। संस्कृतनिष्ठ शुद्ध हिन्दी में ग़ज़लें कहने वाले स्व. कवि चंद्रसेन ‘‘विराट’’ ने भी प्रेम की ग़ज़लें कहीं और ‘‘एक पत्थर तो उछालो यारो’’ का संकेत देने वाले यथार्थवादी शायर दुष्यंत कुमार ने भी ‘‘मैं किसी पुल-सा थरथराता हूं’’ का प्रेमासिक्त अनुभव अपनी ग़ज़ल में पिरोया। अर्थात् जिसमें संवेदनाएं हैं, वह भला प्रेम की भावना से विमुख कैसे हो सकता है। साहित्यकार एवं संपादक शिवनारायण का भी देर से ही सही ग़ज़ल की दुनिया में प्रविष्ट होना स्वाभाविक है। ‘‘झील में चाँद’’ संग्रह की पहली ग़ज़ल के चंद शेर देखिए-
हवा के साथ मिल कर गा रहा है
प्रणय संवाद का फल पा रहा है
उसी के हाथ होंगे फूल सारे
महक का कारवाँ जो आ रहा है
छुपा है प्रेम की यादों में जादू
सजा कर ख्वाब कोई ला रहा है

प्रेम का यह स्वरूप एक अलग ही आकार ले लेता है जब ‘‘मूडस्विंग’’ करने जैसा भाव ला कर वे मां के प्रेम का स्मरण करने लगते हैं। ये शेर बानगी हैं-
ख्यालों में जो आया है
हाँ, वह मां का साया है
संबंधों के चक्रव्यूह से
लिपटी हर की माया है
उस जग से ही माँग रहे
जिसको समझ न पाया है
मुश्किल की पगडंडी पर
शिथिल पड़ी यह काया है
हँसते हँसते ‘‘शिव’’ अक्सर
इसने धोखा खाया है!
किसी-किसी ग़ज़ल में शिवनाराण वर्तमान के असुरक्षित माहौल को ले कर चिन्तित दिखाई देते हैं और उस प्रेमी के मनोभाव को व्यक्त करते हैं जो अपने प्रिय के लिए ‘‘डीप प्रोटेक्टिव’’ है। उनके ये शेर इस ‘प्रोटेक्टिवनेस’’ को बाखूबी बयां करते हैं-
वक्त की यह नाजुकी समझा करें
हो के तन्हा घर से मत निकला करें
हमने देखा है हवाओं का जुनून
इन हवाओं से नहीं सौदा करें

प्रेम को ले कर कवि का दृष्टिकोण स्पष्ट है। वह प्रेम को वह तत्व मानता है जिससे जीवन आसान हो जाता है। इसीलिए वह प्रेम मिलने की आकांक्षा रखता हैं यहां उसके प्रेम की संकल्पना संकुचित नहीं है, उसे दोस्ती वाले प्रेम की महत्ता भी पता है। प्रेम की भावना का यह विस्तार अपने-आप में समग्रता समेटे हुए है। यह ग़ज़ल उदाहरण है-  
कुछ मुहब्बत मिले कुछ खुशी चाहिए
जिन्दगी अब नहीं बेबसी चाहिए
प्यार का एक किस्सा ही काफी लगे
दोस्तों से नहीं दिल्लगी चाहिए
सिर्फ बातें बना कर न भरमाइये
शायरी के लिए शायरी चाहिए
लूट हत्या डकैती बहुत हो गई
प्यार की अब कोई तो सदी चाहिए
तुम अँधेरे में हो तुमको पहचानें क्या
देखने के लिए रोशनी चाहिए
‘‘शिव’’ खताओं का इल्जाम लेता नहीं
दोस्त हो तो मुझे दोस्ती चाहिए !

प्रकृति और प्रेम के तादात्म्य से जो वैचारिक एवं भावनात्मक सुरम्यता जन्म लेती है, वह इस संग्रह की ग़ज़लों में देखी जा सकती है। संग्रह की शीर्षक पंक्ति वाली ग़ज़ल में अभिव्यक्ति की कोमलता बहुत सुंदर ढंग से रची-बसी है-
फूल जैसा ही वो सँवर जाए
बनके खुशबू कहीं बिखर जाए
जख्म इतना बढ़ा दो सीने में
मौत भी जिन्दगी से डर जाए
क्या भरोसा करें उसी पर हम
साथ देने से जो मुकर जाए
तुम उसी वक्त ही चले आना
चाँद जब झील में उतर जाए

वस्तुतः जो कहना जानता है, वह किसी भी विधा में कह सकता है। वहीं, यह भी सच है कि किसी भी विधा के प्रथम संग्रह में किसी चमत्कारिक अभिव्यक्ति की बहुत अधिक आशा हमेशा नहीं की जानी चाहिए, फिर भी शिवनारायण ने अपने इस प्रथम ग़ज़ल संग्रह में अपनी जिन ग़ज़लों को सहेजा है, वे उनकी ग़ज़लगोई के प्रति आश्वस्त करती हैं। लहज़ा सादा है किन्तु शब्दों में गहराई है, जीवन के अनुभवों का निचोड़ है और साथ ही खूबसूरत प्रभाव है। संग्रह पठनीय है। अनेक शेर ऐसे हैं जो पहली बार पढ़ते ही मन में जगह बना लेते हैं।       
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Sunday, April 14, 2024

लेख | सागर की निर्भीक पत्रकारिता के आधार स्तम्भों में से एक थे : स्व. भोलाराम भारतीय | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

🚩'नयादौर' के संपादक भाई काशीराम रैकवार जी के विशेष आग्रह पर भाई स्व. भोलाराम भारती जी पर मेरे द्वारा लिखा गया लेख आज 'नया दौर', 'आचरण', 'सागर दिनकर' तथा 'दी लीला टाइम्स' में प्रकाशित हुआ है। 🚩
🌹हार्दिक आभार भाई काशीराम रैकवार जी🙏
🌹हार्दिक आभार आचरण 🙏
🌹हार्दिक आभार सागर दिनकर 🙏
हार्दिक आभार दी लीला टाइम्स 🙏---     -----------------------------------
लेख
सागर की निर्भीक पत्रकारिता के आधार स्तम्भों में से एक थे : स्व. भोलाराम भारतीय  
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                       
          पत्रकारिता को समाज का चौथा स्तम्भ माना गया है क्योंकि पत्रकार हमेशा समाज के हित में सोचता है, लिखता है, आवाज़ उठाता है। स्व. भोलाराम भारतीय सागर नगर के एक ऐसे ही जुझारू पत्रकार थे जिन्होंने हमेशा समाज और शहर के हित में आवाज़ उठाई। वे सागर को समस्यामुक्त एवं विकसित शहर के रूप में देखना चाहते थे। वे राजनीति को भी स्वच्छ देखना चाहते थे। उन्होंने अपने लम्बे पत्रकारिता जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव देखे किन्तु एक आधार स्तम्भ की भांति अपनी कलम के साथ डटे रहे। उन्होंने जो लिखा पूरी तार्किकता के साथ लिखा।    

    सबसे पहले कुछ संस्मरणात्मक बातें... सन् 1980 के लगभग भोलाराम भारतीय जी से परिचय हुआ था। वे ‘‘गौरदर्शन’’ साप्ताहिक का प्रकाशन कर रहे थे जिसके लिए पोस्टकार्ड द्वारा उन्होंने मेरी और वर्षा दीदी की रचनाएं मंगाई थीं। यह एक औपचारिक परिचय था। संयोगवश कुछ अरसे बाद अपनी मां डाॅ. विद्यावती ‘‘मालविका’’ जी के साथ मेरा सागर आना हुआ। भाई भोलाराम भारतीय जी से भेंट हुई और फिर इतवारी टौरी स्थित उनके निवास पर भाभीजी से भी परिचय हुआ। इसके बाद संपर्क निरंतर बना रहा। सन 1988 में सागर में आ कर बस जाने के बाद सतत पारिवारिक संबंध बना रहा। जब वर्षा दीदी का तीसरा ग़ज़ल संग्रह ‘‘हम जहां पर हैं’’ प्रकाशित हुआ तो नगर के वरिष्ठ साहित्यकारों जैसे डाॅ. आर.डी.मिश्र जी, पद्मश्री डाॅ लक्ष्मी नारायण दुबे जी आदि ने कहा कि इस ग़ज़ल संग्रह का लोकार्पण होना चाहिए। उस समय ‘‘श्यामलम संस्था’’ जैसी कोई संस्था शहर में विद्यमान नहीं थी और श्यामलम अध्यक्ष उमाकांत मिश्र जी भी सरकारी सेवा में किसी अन्य शहर में थे। मैं और वर्षा दीदी तय नहीं कर पा रहे थे कि आयोजन कैसे और कहां किया जाए? जब हम लोगों ने भाई भोलाराम भारतीय से इस समस्या पर विचार विमार्श किया तो वे तत्काल बोल उठे,‘‘मेरे घर में बड़ा हाॅल है, वहीं से लोकार्पण कार्यक्रम कर लेते हैं।’’
      उन दिनों भाई भोलाराम भारतीय जी का शंकरगढ़ क्षेत्र में अपना निवास निर्मित हुआ था। हम लोगों के घर से अधिक दूर भी नहीं था। कुछ ही देर में पूरी रूपरेखा तैयार हो गई। छोटा-सा सादा आमंत्रणपत्र छपवाना तय हुआ। जिसे छपवाने की जिम्मेदारी भी उन्होंने ली। 13 जून 1993 को लोकार्पण के अवसर पर भाई भोलाराम भारतीय जी के निवास पर हाॅल में दरी बिछी हुई थी। धीरे-धीरे सभी अतिथियों का आगमन हुआ। पद्मश्री डाॅ. लक्ष्मीनारायण दुबे, डाॅ. आर.डी. मिश्र, डाॅ. सुरेश आचार्य, चिकित्सक डाॅ. एन.पी.शर्मा, पत्रकार रामशंकर तिवारी, कवि माधव शुक्ल मनोज, कवि दिनकर राव दिनकर, कवि दादा निर्मल चंद निर्मल, कवि ऋषभ समैया ‘जलज’, ‘‘आचारण’’ संपादक एवं विधायक सुनील जैन, ‘‘आचरण’’ की प्रबंध संपादक निधि जैन सहित साहित्य एवं पत्रकारिता क्षेत्र के अनेक लोग पधारे। साथ ही मेरी मां डाॅ. विद्यावती ‘‘मालविका’’, मामा कमल सिंह चौहान तथा भाई भोलाराम भारतीय जी के परिजन उपस्थित थे। पूरा कार्यक्रम बहुत अच्छे ढंग से सम्पन्न हुआ। यह सब भाई भोलाराम भारतीय जी के सहयोग के बिना संभव नहीं था। उन्होंने आयोजन की पूरी जिम्मेदारी इस तरह से निभाई जैसे उनका अपना आयोजन हो। इस संस्मरण को सामने रखने का उद्देश्य मात्र यही है कि जो लोग उन्हें नहीं जान पाए वे भी उनके प्रभाव एवं उनकी सहृदयता को जाने और समझें।    
     भाई भोलाराम भारतीय जी को मैंने जब भी देखा, उत्साह एवं ऊर्जा से भरा हुआ ही देखा। वे आयु में मुझसे बहुत बड़े थे किन्तु हम लोगों के बीच व्यवस्था, राजनीति आदि पर जोरदार बहसें होती थीं। मैंने उनकी बातों में अव्यवस्था के प्रति हमेशा आक्रोश देखा। लाखा बंजारा झील के लिए वे बड़ी पीड़ा के साथ कहते थे कि ‘‘ये लोग इस तालाब को मिटा कर ही मानेंगे। किसी को परवाह नहीं है। जबकि ये हमारे शहर की पहचान है।’’ इस संबंध में उन्होंने एक लेख भी लिखा था जिसका शीर्षक उनके आक्रोश को बखूबी व्यक्त करता था। लेख का शीर्षक था-‘‘तालाब के प्रति निर्वाचित राजनैतिक नेतृत्व की आपराधिक उदासीनता’’।
वे नगर एवं क्षेत्र के उन नेताओं से भी क्षुब्ध रहते थे जो सक्षम होते हुए भी क्षेत्र के विकास की अवहेलना करते थे। वे बातों-बातों में कटाक्ष करते थे कि ‘‘इन्हें तो नेता कहलाने का भी कोई हक नहीं हैं। नेता वो कहलाता है जो नेतृत्व करे, ये तो बस, अपना घर भरना जानते हैं।’’ वे ऐसे नेताओं को अपनी कलम के द्वारा ललकारते रहते थे। 14 मई 2002 को उनका एक लेख प्रकाशित हुआ था-‘‘बौने कद के जनप्रतिनिधियों से कराहती सागर की जनता’’। इस लेख में उन्होंने लिखा था-‘‘सागर जिले की उद्योग विहीनता, बेरोजगारी बढ़ती गरीबी आदि के विरूद्ध सांसद व विधायकों ने लोकसभा व विधानसभा में एक भी मुखर अभिव्यक्ति भाजपाई सांसद व विधायक ने नहीं की है। कारण बहुत साफ है कि बोने कद के लोग जब पद पर पहुंच जाते हैं तो अपने कद के अनुसार रोजमर्रा के छोटेमोटे कार्यों को जनता व अखबारों में जिंदा रहना चाहते हैं। जबकि पद के अनुरूप केंद्रीय व राज्य योजनाओं से सागर के विकास व जनसुविधाओं को बढ़ाने के प्रयास व संघर्ष करना चाहिए। इसके लिए राजनैतिक दक्षता जनता में निष्ठा एवं राजनैतिक हित से उठकर समग्र विकास की मंशा आवश्यक होती है। जिसकी संकीर्णतावादी विचारधारा का भाजपा के अंदर काफी अभाव है। सागर जिले का एकमात्र बीड़ी उद्योग अपनी संकट गृस्तता से अपनी आखरी सांसे गिन रहा है। परंतु सांसद द्वारा इस सवाल पर एक भी दिन संसद में कोई सजग पहल नहीं की है। इस राजनैतिक नेतृत्व के बौने व्यक्तित्व का प्रमाण है कि देश में सबसे अधिक बीड़ी मजदूर सागर जिले में हैं। और सबसे ज्यादा कल्याणकोष साग्र जिले से केंद्र शासन को जाता है। परंतु बीडी मजदूरों को तीस व पचास विस्तार वाले केंद्र अस्पताल मैंगलूर (कर्नाटक) केरल, बारांगल (आंध्रप्रदेश) में खुल गए हैं। परंतु सागर जिले में नहीं है क्योकि इन प्रदेशों में प्रतिनिधित्व करने वाले राजनैतिक नेतृत्व पद के अनुरूप स्तर के व्यक्तित्व के नेता हैं।’’ 
        भोलाराम भारतीय जी किसी राजनीकि दल नहीं अपितु जनता के पक्ष में खड़े रहते थे। बात चाहे किसी भी दल की हो, उन्हें जो बात अनुचित लगती थी वे बिना किसी संकोच के उसे विवेचनात्मक ढंग से सामने रख देते थे। 21 जुलाई 2011 को उनका एक लेख प्रकाशित हुआ था जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि नारेबाजी से भ्रष्टाचार कभी नहीं हट सकता है, इसके लिए नीतिगत परिर्वतन आवश्यक है। ‘‘भ्रष्टाचार से मुकाबला: नारों से नहीं नीति परिवर्तन से संभव’’ शीर्षक से लिखे अपने लेख में उन्होंने लिखा था कि-‘‘दुभाग्यपूर्ण है कि मंत्रीमंडल में 90 प्रतिशत मंत्री जेल में हों यह कांग्रेस व प्रजातंत्र के लिए शर्म की बात है। बाबा रामदेव और अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ शंखनाद व प्रयास सराहनीय है किन्तु उनकी ‘एप्रोच’ चिन्हित भ्रष्टाचारियों को ‘एक्सपोज’ करना है, भ्रष्टाचार से निजात मांगना नहीं है। क्योंकि जिन नीतियों एवं रास्तों से भ्रष्टाचार जन्म लेता है वह उनकी समझ से बाहर है। प्रथमतः मौजूदा चुनाव प्रणाली एवं प्रकिया से राजनैतिक भ्रष्टाचार जन्म लेता है। विधायक या सांसद का चुनाव जीतने के लिए करोड़ों, अरबों रूपये खर्च करके एवं जिनसे पैसा लेकर संसद में पहुँच रहे हैं उनकी सेवा एवं हित रक्षा उनका कर्तव्य बन जाता है और यहाँ से नौकरशाही धनाढ्य तबका एवं राजनीति की काकस की कोख से भ्रष्टाचार जन्म लेता है। इसके लिए आवश्यक है कि तमाम कानूनी उपायों के साथ साथ मौजूदा चुनाव प्रणाली एवं निर्वाचन अधिनियम तथा निर्वाचन नियमावली में महत्वपूर्ण संशोधन करके अनुपातिक चुनाव व्यवस्था एवं खर्च की सीमा घटाए जाने तथा अपराध पृष्ठभूमि के लोगों की चुनावी भूमि से वर्जना जैसे उपायों से तात्कालिक भ्रष्टाचार की कोख से प्रारंभिक नसबंदी संभव हो सकती है।’’ 
नवोदित एवं युवा पत्रकारों को भोलाराम भारतीय जी के लेखों को पढ़ना चाहिए, समझना चाहिए तभी वे पत्रकारिता के सही तेवर को जान सकेंगे। दैनिक ‘‘आचरण’’ में प्रकाशित उनके लेख सन 2011 में प्रकाशक भुवनेश्वर प्रसाद केशरवानी ने संग्रह के रूप में प्रकाशित किया। इस पुस्तक का नाम है-‘‘ खून टपकेगा तो जम जाएगा’’। पूर्व विधायक सुनील जैन के अप्रत्यक्ष सहयोग से प्रकाशित इस संग्रह को भारतीय जी ने निःशुल्क रखते हुए मूल्य के आगे लिखा-‘‘आपका प्रेम एवं सहयोग’’। 
09 जून 1942 को जन्मे भोलाराम भारतीय ने अपने लेखन की शुरुआत कविता से की थी। उन्होंने देश के कई बड़े मंचों पर भी काव्यपाठ किया। फिर उन्हें 1963 में पत्रकारिता रास आ गई। साप्ताहिक चेतना भोपाल, बिग्रेडियर उज्जैन, मुक्ति बोध करेली, बैंक्टेश्वर समाचार मुंबई, साप्ताहिक आगामी कल आदि समाचारपत्रों से होते हुए भोपाल से प्रकाशित दैनिक मध्यदेश का प्रतिनिधित्व किया। इसी बीच सागर से प्रकाशित ‘‘दैनिक राही’’ में सह-संपादक का कार्य किया तथा बाद में नईदुनिया इंदौर, नवभारत जबलपुर के संवाददाता रहे। कुछ दिनों के लिए नवभारत में संपादकीय में कार्य किया। तत्पश्चात सागर से ही नवभारत भोपाल एवं एम.पी. क्रानीकल का कार्य संभाला। 14 जनवरी 1971 को सागर में उन्होंने अपने स्वयं के समाचारपत्र ‘‘साप्ताहिक गौर दर्शन’’ का प्रकाशन आरम्भ किया। चार-चार अखबारों का एक साथ प्रतिनिधत्व करने के कारण लोग उन्हें ‘‘फोर मेन’’ कहने लगे थे। धीरे-धीरे सभी अखबारों को छोड़कर सिर्फ नई दुनिया इन्दौर से 1999 तक सम्बद्ध रहे। बीच में दैनिक नई दुनिया भोपाल को भी सेवायें प्रदान कीं। नई दुनिया को छोड़ने के बाद सागर से प्रकाशित दैनिक ‘‘आचरण’’ से जुड गए। जहां वे अपने अंतिम समय तक कार्यरत रहे। साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्हें कई पुरस्कारों एवं सम्मानों से सम्मानित किया गया। 
       एक बार मैंने भाई भोलाराम भारतीय जी से पूछा था कि आपने अपने अखबार का नाम ‘‘गौर दर्शन’’ क्यों रखा, ‘‘सागर दर्शन’’ भी रख सकते थे?’’ तो उनका उत्तर था,‘‘मैं डाॅ गौर के जीवन दर्शन पर चलना चाहता हूं। जैसे उन्होंने अपनी सुख-सुविधाओं के बदले अपने क्षेत्र की भलाई के बारे में सोचा और यहां विश्वविद्यालय बनवा दिया, मैं भी अपने क्षेत्र के विकास के लिए अपनी क्षमता के अनुसार सबकुछ करना चाहता हूं।’’    
          वस्तुतः भाई भोलाराम भारतीय सागर की पत्रकारिता के आधार स्तम्भों में से एक थे। सागर में आज जो पत्रकारिता की फसल लहलहा रही है, उसकी उर्वर जमीन तैयार करने वालों में उनकी अहम भूमिका थी। 14 अप्रैल 2015 को सागर की निर्भीक पत्रकारिता के आधार स्तम्भों में से एक भाई भोलाराम भारतीय जी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया किन्तु उनके विचार सदैव जीवित रहेंगे। यह प्रसन्नता का विषय है कि उनके दत्तक पुत्र सुनील भारतीय प्रति वर्ष ‘‘पुण्य स्मरण’’ आयोजन द्वारा उनके विचारों को प्रतिध्वनित करते रहते हैं। 
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Saturday, April 13, 2024

टॉपिक एक्सपर्ट | पत्रिका | बूंदें परी नईं के खुल गईं पोलें | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली में
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टाॅपिक एक्सपर्ट
बूंदें परी नईं के खुल गईं पोलें
    - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
     जे दो-चार दिनां अपने शहर में तनक सो पानी बरसो औ दिखा गई सड़कन की बुरई दसा। ऊंसईं चैत मास के बदरा गरजत ज्यादा आएं, बरसत कम आंए। जे बेरा बदरा घड़घड़ात हैं, सो ऐसो लगत आए के आसमान टूटो पड़ रओ होय। बड़ी-बड़ी बूंदें सोई तड़ातड़ घलत आएं। मनो, साउन-भादों घांई नईं रैत। मने कैबे को मतलब जे के अधकचरी-सी बारिश भई औ अधकचरी सड़कन की पोलें खुल गईं। लाखा बंजारा तला की तीन तरफी, मने कारीडोर खों छोड़ के चिकनी माटी को गिलावो मच गओ। बा माटी औ कऊं की नोईं, बेई तला की आए। कब से सबरे कै रये हते के बा माटी की धूरा से परेसानी होत है, ईकी सफाई करत जाओ। मनो, कछु ढंग से करबे में को जाने कोन के खेत कट जात आएं। उते देख लेओ, दो मईना से ऊपरे भए जा रये औ तीन मढ़िया की पूरी सड़क ने खोल पाए। तला कब लौं गहरो हुइए, ईको पतई नईयां। उते लाखा बंजारा की स्टेचू मों बंधी ठाड़ी। 
    खैर, जेई सोच समझ लेते के माटी डरी सड़कन पे, जो पानी बरसो तो का हुइए? उते दो चका वारे फिसल-फिसल के हाथ-गोड़े तुड़ा रये। यां तक के पैदल चलबे वारे सोई रपट रये। मने कोनऊं स्लीपर चप्पलें पैन्ह के अस्पतालें रोड पे निकरो तो रामधई जानियो के ऊको रपटबो तै कहानो। जा रओ हुइए मरीज खों देखबे, औ कऔ के खुदई की भरती होबे की नौबत आ जाए। 
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Friday, April 12, 2024

शून्यकाल | बुंदेली संस्कृति एव स्त्री-स्वाभिमान के चितेरे कथाकार डाॅ. नर्मदा प्रसाद गुप्त | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम ...
शून्यकाल
बुंदेली संस्कृति एव स्त्री-स्वाभिमान के चितेरे कथाकार डाॅ. नर्मदा प्रसाद गुप्त
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
          बुंदेलखंड साहित्य सर्जकों का धनी रहा है। अतीत के पन्नों से ले कर वर्तमान के रचनाकर्म तक सतत धारा प्रवाहमान है। बुंदेलखंड में एक ऐसे साहित्यकार हुए जो बुंदेली साहित्य, संस्कृृति एवं इतिहास के संरक्षक के रूप में तो ख्यातिलब्ध रहे किन्तु एक कथाकार के रूप में अपेक्षाकृत उनकी चर्चा कम ही हुई। जबकि उनकी कहानियां  और उपन्यास बुंदेली संस्कृति एवं स्त्री-स्वाभिमान की रोचक शब्दांकन प्रस्तुत करते हैं। जी हां, मैं चर्चा कर रही हूं कथाकार डाॅ. नर्मदा प्रसाद गुप्त जी की जिन्होंने ‘‘बुंदेलखंड का साहित्यिक इतिहास’’ लिखा।

   बुंदेली संस्कृति को लेखबद्ध कर संजोने में जो नाम सबसे पहले लिया जाता है, वह स्व. नर्मदा प्रसाद गुप्त जी का नाम है। 01 जनवरी, 1931 को जन्मे नर्मदा प्रसाद गुप्त ने हिंदी और अंग्रेजी में एम.ए. करने के बाद ‘‘बुंदेलखंड का मध्ययुगीन काव्य: एक ऐतिहासिक अनुशीलन’’ विषय में पी.एचडी. की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने लगभग 10 वर्ष अंग्रेजी और 25 वर्ष तक हिंदी के अध्यापन का दायित्व निभाया। सन् 1958 ई. से वे साहित्य के क्षेत्र में प्रवेश करते चले गए। उन्होंने अपना सृजन कार्य कविता और कहानी से प्रारम्भ किया। उनकी लगभग 35 कहानियां विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। सन् 1962 में ‘‘आल्हा’’ नामक ऐतिहासिक उपन्यास लिखा। डाॅ. गुप्त ने हिन्दी साहित्य, लोकसाहित्य तथा लोककला पर अनेक शोधात्मक लेख लिखे। उन्होंने प्रथम बार लोकगीतों और लोकगाथाओं के पाठ का सम्पादन कर उन्हें संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। उनके द्वारा संपादित सबसे चर्चित पुस्तक रही ‘‘बुन्देलखंड का साहित्यिक इतिहास’’। उन्होंने ‘‘मामुलिया’’ त्रैमासिक पत्रिका का सम्पादन किया तथा बुन्देलखंड साहित्य अकादमी की स्थापना की। उन्हें अनेक सम्मानों से समय-समय पर सम्मानित किया गया। 
डाॅ. नर्मदा प्रसाद गुप्त की कहानियों में भी बुंदेलखंड की गरिमा और नारी अस्मिता के प्रति उनका सकारात्मक आह्वान स्पष्ट दिखाई देता है। इस लेख में मैं उनकी कुछ कहानियों पर संक्षिप्त चर्चा करने जा रही हूं जिनसे सभी को उनकी कहानियों के मूल स्वर से परिचित होने का अवसर मिलेगा। कहानियों की चर्चा आरम्भ करने से पूर्व यह बात मैं करना आवश्यक समझती हूं कि इन कहानियों में बुंदेलखंड का इतिहास, वर्तमान तथा स्त्री के प्रति सामाजिक वैचारिकी को दृढ़तापूर्वक रेखांकित किया गया है। इससे सुगमता से समझा जा सकता है कि डाॅ नर्मदा प्रसाद गुप्त बुंदेली संस्कृति के मात्र गौरव-गायक नहीं थे, वरन वे बुंदेली समाज में आए उसे कलुष को भी मिटना चाहते थे जिनके कारण लगभग हर काल में स्त्रियों को अवहेलना और प्रताड़ना सहनी पड़ी। 
सबसे पहले उस कहानी की चर्चा करने जा रही हूं जिसका नाम है ‘‘लाखा पातुर’’। बुंदेलखंड में ‘‘पातुर’’ नृत्यांगनाओं अर्थात नाचनेवालियों को कहा जाता है। इन स्त्रियों के प्रति पुरुषप्रधान सामाजिक दृष्टिकोण संतुलित नहीं रहता है। ये स्त्रि़यां कलानिपुण होते हुए भी समाज के लांछन का निशाना बनी रहती हैं। ‘‘लाखा पातुर’’ कहानी में कथाकार नर्मदा प्रसाद गुप्त ने राजाशाही के समय की एक ऐसी नृत्यांगना की कथा बुनी है जिसे एक प्रस्तर मूर्तिकार से प्रेम हो जाता है। इसी के समानांतर वर्तमान परिवेश का कथाप्रसंग भी चलता है जिसमें कथानायक एक चित्रकार है और उसे चित्रकला के लिए सम्मानस्वरूप मुख्यमंत्री से बीस हज़ार रुपए मिलते हैं। अर्थात् समानान्तर दो कालखंड किन्तु स्त्री के प्रति सोच लगभग एक जैसी, भले ही वह व्यक्ति कलानिष्णात है। जिस कलाकार से संवेदना की अपेक्षा की जाती है वह एक स्त्री की अपेक्षा पत्थर को निर्दोष मानता है। यह कथाकार की स्त्री-अस्मिता के प्रति संवेदना का सशक्त आह्वान है जो वस्तुस्थिति जता कर समाज को लज्जित कर, परमार्जित करना चाहता है।
दूसरी कहानी है- ‘‘एक और दुर्गावती’’। यह सती प्रथा की दूषित परंपरा का स्मरण कराते हुए पुरुषों द्वारा स्त्री की अनचाही उपेक्षा की कथा प्रस्तुत करती है। एक प्रोफेसर जो अतीत को खंगालने में इतना अधिक व्यस्त हो गया कि अपने वर्तमान में मौजूद अपनी पत्नी की आशाओं एवं आकांक्षाओं को ही भुला बैठा। ठीक वैसे ही जैसे पुराने समय में युद्धोन्मादी राजा अपनी रानियों के जीवन तक को भुला कर उनसे जौहर की आशा रखते थे। इस जौहर प्रथा को इतने महिमा मंडित रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा कि यह दूषित परंपरा सदियों तक चलती रही। इस कथा में प्रोफेसर अपने असिस्टेंट बलराम और प्रहलाद के साथ एक किले की छानबीन करते समय जौहर की घटना के साक्ष्य ढूंढने लगता है। उस समय कुछ संवाद उभर कर एक दृश्य रचते हैं। यह एक छोटा-सा दृश्य कथानक के समूचे स्वरूप की महत्वपूर्ण कड़ी के समान है-
बलराम ने अफसोस-सा जाहिर करते हुए कहा- ‘‘सर, जौहर के बाद कोई नहीं बचा और किला उजड़ गया। आज तक न जाने कितने राजा आए, पर कोई भी आबाद नहीं रह सका। लोग कहते हैं कि सती का शाप लगा है इस किले को।’’
प्रहलाद बारूदखाने की गहराई का अंदाजा लगा रहे थे और प्रोफेसर उसमें डूबने लगे थे। शाप...आखिर शाप तो उनके घर को भी लगा है। सविता उनसे ऊबकर हृदयेश का आसरा चाहती है। उसने तलाक की अरजी दे दी है। कारण कुछ नहीं, केवल इतना कि उसके पति किताबों, गुफाओं, लेखों सबके चक्कर में उसकी देखभाल नहीं कर पाते। पति का प्यार नहीं दे पाते। वह अपने ही घर में ऐसे रहती रही है, जैसे उसकी शादी न हुई हो। आज तक पत्नी की जिंदगी को तरसती रही। पत्नी की जिन्दगी....। सविता की धुंधली-सी छाया उस बारूदखाने में डोलने लगी और प्राफेसर अचानक फुसफुसा पडे-सविता...!
प्रोफेसर की आवाज सुनकर प्रहलाद ने कहा था- सर, चलें। सविता जी इंतजार कर रही होगी।
कहानी के इस अंश से स्पष्ट हो जाता है कि कथाकार ने अतीत की स्त्री के अस्तित्व के समापन और वर्तमान की स्त्री के अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष को दर्शाने के लिए जौहर की प्रथा को एक रूपक के रूप में प्रयोग किया है। यहां सहसा सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की ‘‘रोज’’ कहानी याद आ जाती है जिसमें कथानायिका अपने अत्यंत व्यस्त रहने वाले चिकित्सक पति के साथ एक नीरस जीवन व्यतीत करने को विवश है, किन्तु उसमें साहस नहीं है कि वह अपने पति को इस बात से आगाह कर सके अथवा उससे मुक्ति ले सके। किन्तु ‘‘एक और दुर्गावती’’ में प्रोफेसर की पत्नी तलाक की अर्जी दे कर अपने महत्व की घोषणा कर देती है और इस पर प्रोफेसर को भी अपनी भूल का अहसास हो पाता है।
तीसरी कहानी है-‘‘ठांड़ी जरै मथुरावाली’’। इस कहानी में सामाजिक परिवेश है, स्त्री है, पारिवारिक संबंध हैं, प्रेम संबंध हैं और लोकगीत के रूप में लोक संस्कृति भी है। जब संबंधों में उलझने पैदा होने लगें तो बुद्धि भी छटपटा कर रह जाती है। यह समझना कठिन हो जाता है कि जो कदम उठाया जा रहा है, वह सही है या नहीं? कथा का यह छोटा-सा यह अंश देखिए- 
‘‘नहीं, मुझे आज ही पहुंचना है। प्रेमा आंखों में गीलापन लिए फर्श की तरफ देखती रही। वह भी पैर के नाखून से लिखने लगा था। गोविन्द कुछ रोष में जाने लगे कि उसने द्वार तक उनको भेज दिया और नमस्कार कहकर अपने कमरे में आ बैठा। सोचने लगा कि विष-लता अब खूब लहलहा उठी है, आगे क्या होगा। मां पीछे लौटना नहीं चाहती और बाबूजी को मालूम नहीं कि कथा अपने आप बढ़ती जा रही है। गोविन्द जाने क्या-क्या कह गए, लेकिन मां बड़े संयम से सुनती रही प्रेमा ने बहुत साहस दिखाया। मुमकिन है कि उसके शब्द मां के लिए मरहम का काम करे और समस्या हल हो जाए।’’
डाॅ नर्मदा प्रसाद गुप्त ने ओरछा की सुप्रसिद्ध नर्तकी पर कहानी लिखी है-‘‘प्रवीणराय’’। एक ऐसी नृत्यांगना जो इतिहास में स्त्री के साहस और बुद्धिकौशल की प्रतीक के रूप में दर्ज़ है। प्रवीणराय को राजनीति की शतरंज की बिसात पर एक प्यादे की भांति चलाने का प्रयास किया गया किन्तु वह एक विजयी रानी की तरह अकबर के दरबार से ओरछा लौटी, वह भी अकबर को मुंहतोड़ जवाब दे कर। लेकिन अकबर के दरबार तक पहुंचने के पहले उसे अपनी क्रोध पर किस तरह काबू में करना पड़ा इसका विवरण भी कथाकार डाॅ. गुप्त ने इस कहानी में दिया है। 
डाॅ नर्मदा प्रसाद गुप्त द्वारा लिखी गई अन्य कहानियों में जैसे ‘‘चौपड़’’, ‘‘पैजना के कंकरा’’ आदि में बुंदेली जीवन के अतीत और वर्तमान का तुलनात्मक दृश्य इतने मंजे हुए ढंग से प्रस्तुत किया गया है कि कथाकार की कथालेखन की सिद्धहस्तता में तनिक भी संदेह नहीं रह जाता है। डाॅ. गुप्त की कहानियां जिस प्रकार बुंदेली संस्कृति, समाज, राजनीति आदि के परिवेश को धरोहर के रूप में संजोती हैं, ठीक उसी प्रकार से डाॅ. गुप्त की कहानियों को संजोए रखने की महती आवश्यकता है। क्योंकि ये कहानियां महज कथारस की कहानियां नहीं है वरन नारी स्वाभिमान एवं बुंदेली संस्कृति के चितेरे कथाकार द्वारा लिखी गईं ऐतिहासिक एवं सामाजिक मूल्यों की कहानियां हैं। दुख की बात है कि गुप्त जी की कहानियों के आधार पर एक कथाकार के रूप में उनका वैसा समुचित मूल्यांकन नहीं किया गया, जैसा कि समालोचकों द्वारा किया जाना चाहिए था। 
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