Saturday, April 11, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | मोसम बदलो, बे बदले मनो आप अपनो ख्याल राखियो | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट

मोसम बदलो, बे बदले मनो आप अपनो ख्याल राखियो

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

    मोसम फेर के गरम होन लगो आए। घाम मूंड़ चटकान लगो आए। सो, तनक सावधानी तो राखने परहे ने तो तबीयत खराब होबे में देर न लगहे। सेअत कैसे सई राखी जाए ऊके बारे में घाघ औ भड्डरी ने भौतई नोंने उपाय बताए हैं। ऊमें से कछू तो हमने पिछली हप्ता बताई रई, आज सोई कछू बताहें, मनो पैले उनकी बतकाव कर लई जाए जोन बदल गए। आईजी मैडम सो रिटायर हो के चली गई, सो लगो के बड़ी कुर्सी पे कोनऊं मैडम ने रैहें तो सूनो लगहे। मनो अब जी जुड़ाओ के कलेक्टर मैडम इते आ रईं। बाकी अबे लौं जो कलेक्टर साब रए उनखों ले के पब्लिक बड़़ी कनफुजिआत रई। मने पब्लिक खों खुदई पता न परत्ती के बा कलेक्टर साब से खुस आए के खफा आए? मनो बे अपनी समझ की डबिया अबे बी खोले से डरा रए के कऊं बे फेर के लौट ने आएं। अब ईको का मतलब आए बा आप ओरें अटकलें लगाइयो। हम तो अब कर रए सेअत की बतकाव।
भुनसारे खटिया से उठि के पिये तुरतै पानी।
ऊके घर मा वैद ना आवे बात घाघ के जानी।।
मने जो संकारे से उठ के सबसे पैले पानी पीयत आए बा कभऊं बीमार नईं परत आए औ ऊके घरे कभऊं बैद मने डाक्टर नई आत आएं। मनो आज के जमाना में डाक्टर ऊंसईं घरे नईं आत आए। औ कऊं आबे को भूले से मान गओ तो तगड़ी फीस ले लेत आए। जेई से सेअत के लाने एक कहनात औ गांठ बांध लेओ-
जेठ मास जो दिन में सोए।
ऊको जर असाढ़े  रोए।।
सो, सई टेम पे सोओ, सही टेम पे उठो करे औ धूप-गरमी से अपनो बचाव करियो, सो सब ठीक रैहे। राम-राम !
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Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Thursday, April 9, 2026

बतकाव बिन्ना की | जो पगला प्रेमी घांईं काए खों लरत फिर रओ? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की | जो पगला प्रेमी घांईं काए खों लरत फिर रओ? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की  
जो पगला प्रेमी घांईं काए खों लरत फिर रओ?  
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
   ‘‘भौजी मोए जे समझ नई पर रई के जे हो का रओ?’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘काए के बारे में कै रईं?’’ भौजी ने पूछी।
‘‘जेई, जे ट्रम्प पूरोई पगला गओ का?’’ मैंने कई।
‘‘अब का करो ऊ पगला ने?’’ भौजी ने ऐसे ढंग से पूछी मनो बे अपनी गली के कौनऊं पगला के बारे में पूछ रई होंए। इत्ती फजीयत तो ई दुनिया में कभऊं कोनऊं प्रेसीडेंट की ने भई हुइए।
‘‘ने पूछो के का करो। बा कै रओ आए के ईरानी सभ्यता को बा पूरोई मिटा दैहे। भला जा कोन सी बात भई? तुमें कोनऊं परधानमंत्री औ प्रेसीडेंट से तकलीफ होए तो ऊको मिटाबे की कओ, उते की पब्लिक ने तुमाओ का बिगारो के तुम उते के बच्चा, बूढ़ा, लुगाइयां, सबई खों मार डारबे की कै रए। अरे जो तुम पूरी सभ्यता मिटाहो तो ईको मतलब कहाओ के तुम उते के दूद पीते बच्चा खों लौं छोड़बो नईं चात हो। कित्ती घटिया बात आए जो।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘बात तो सई आए तुमाई। मनो मोए एक बात लगत आए।’’ भौजी कछू सोचती सी बोलीं। 
‘‘का लगत आए?’’ मैंने पूछी।
‘‘मोए लगत आए के जा ट्रम्प खों ईरान से कछू पर्सनल खुन्नस आए।’’ भौजी ने कई।
‘‘का मतलब?’’ मैंने पूछी।
‘‘मतलब जे के ट्रम्प कोनऊं ईरानी लुगाई के पांछू पड़ो रओ हुइए। मनो ऊने ट्रम्प खों घास ने डारी हुइए। तभई से ट्रम्प के जी में लगो रओ हुइए के जे ईरानियन खों छोरने नइयां। इनें पूरोई मिटा देबी। जेई से तो बा पर्सनल दुस्मनी सी भांज रओ आए।’’ भौजी ने कई।
‘‘अई गजब! जे तो मैंने सोचई ने रई। जे बी हो सकत आए। ने तो ऐसी कोन-सी खेती काट लई ईरान ने बा ट्रम्प की के बा अपने देस वारन की बी नई सुन रओ औ पिलो परो आए ईरान के पांछू।’’ मोए भौजी की बात में दम दिखानी।
ने तो आपई ओरें सोचो के ऐसी का बात हो गई के बा पूरी ईरानी सभ्यता को मिटाबे की कैन लगो। ऐसो तो कोनऊं ने ना करी। कछू तो पर्सनल ऐंगल हुइए। औ जो ऊको तेल के कुआ चाउंने तो ऊको बोई तेल के कुआ में डुबो दओ चाइए। 
‘‘देख तो भौजी, ऊके मारे अपने इते बेरोजगारी बढ़ रई।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘हऔ, कल हम औ तुमाए भैयाजी संझा को तिगड्डा लौं गए रए। उते हमाओ चाट खाबे को जी करो। हम ओरन को खास चाट वारो ठेला आए। हम तो उतई चाट खात आएं। मनो बा उते ने दिखानो। सो हमने उते दूसरे ठिलिया वारो से ऊके बारे में पूछी सो बोलो के ऊको गैस को सिलेंडर ने मिल रओ हतो सो ऊको अपनी ठिलिया बंद करनी परी। हम ओंरे सोई दो-चार दिनां औ चलाबी, फेर हम ओरन खों सोई दुकान बढ़ानी परहे। काए से के जो गैस ने मिलहे तो काए में चाट समोसा बनाहें? सो मैंने पूछी के बा गओ कां? तो बा दूसरे वारे ने बताई के बा अपने गांव खों चलो गओ आए। मैंने पूछी के बा उते का करहे? सो बा बोलो के का करहे? कछू नईं। उते कछू काम ने मिलत्तो सो बा इते भग के आओ रओ औ अब इते से फेर उते जा के का मिल जाहे? मनो इत्तोई आए के इते घर को किराओ देन परत्तो, बा ने देने परहे। औ उते बाप-मताई एक रोटी में आधी ऊको औ ऊके लरका बच्चा को ख्वा दैहें। रामधई बिन्ना! ऊकी बात सुन के मोए फुरूरी-सी आ गई औ कोरोना वारे दिन याद आन लगे। ऐसई परेसानी ऊ टेम पे आई रई। बस, इत्तोई आए के ऊ टेम पे सब कछू एकदम से होत चलो गओ रओ औ अब ई टेम पे अपन देखत जा रए औ समझत जा रए। मनो कर कछू नईं सकत।’’ भौजी बोलीं।
‘‘सई कई भौजी। अबे ऊ टेम के दुख सो भूले नइयां औ जे पापी ने सब खों हैरान करबो सुरू कर दओ। ईको कभऊं कोऊं माफ ने करहे।’’ मैंने कई।
‘‘बाकी जे सबरे मीडिया वारे का कर रए? जे काए नईं पतो लगा रए के बा को आए जोन के ठुकराबे पे जा पगला रओ।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, ऐसे तो मीडिया सबई में अपनी नाक घुसात फिरत आए।’’ कैत भए मोए हंसी आ गई। जा बात मोए कोनऊं फिल्मी स्टोरी घांईं लगी। इत्ते में भैयाजी आ गए। बे बजरिया गए रए सब्जी लेबे खों।
‘‘का बतकाव चल रई?’’ आतई सात भैयाजी ने हम दोई से पूछी।
‘‘भौजी ने बड़े पते की बात बताई।’’ मैंने कई।
‘‘का बात?’’ भैयाजी ने पूछी। 
‘‘बात जे के बा ट्रम्प की कोऊ लवस्टोरी रई हुइए जोन में ऊको लिप्ट ने मिली, सो बा पगलाओ सो ईरान के पांछू परो आए।’’ मैंने बताई।
‘‘तुमाई भौजी बी! जां ने पौंचे रवि, उते पौंचे तुमाई भौजी।’’ भैया हंसत भए बोले। फेर कैन लगे के ई लड़ाई ने तो सगरी दुनिया के देसन अर्थब्यबस्था हला दई आए। अभई हमने देखी के सब्जी के दाम बढ़ गए आएं। जो हमने पूछी सो बे सब्जी वारे कैन लगे के डीजल, पेट््रोल सई से ने मिले तो सबई कछू मैंगो होन लगत आए। बात ऊकी सई हती।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हमने तो आपसे कई रई के एक फतकुली औ एक सेम की बेलें लगा लेओ, मनो अपने सुनी नईं ने तो अबे अपने घरे की मुप्त की सब्जी मिल रई होती।’’ भौजी ने सोई मोका ताक के अपनी बात कै डारी।
‘‘तुमें खाली सब्जी की परी? औ का-का उगा लैहो? जे फसल कटबे को टेम आए। औ आजकाल कटाई, थराई सबई कछू गाड़ियन से होत आए। बो का कहाऊत आएं, हार्वेस्टर! एक तो बा किराए में लेन परत आएं औ बे सोई डीजल-मीजल से चलत आएं। सो उनके दाम बी तो बढ़े हुइएं।’’ भैया जी बोले।
‘‘हऔ, औ ऊपरे से जो पानी गिरन लगत आए। दूबरे औ दो असाढ़।’’ भौजी बोलीं।
‘‘सई में भौजी। अपने इते सब कछू कित्तो ठीक चल रओ हतो, मनो ई पगला के मारे सब बिगरो जा रओ। अखीर आपई सोचो के जो उते इत्ता मिसाईलें घल रईं सो का ऊको पूरी धरती पे असर ने परत हुइए? ओजोन परत में ऊंसई छिद्दा भए डरे, ऊपे से जे सब का पलूशन ने फैला रए हुइएं?’’ मैंने कई।
‘‘जा बात बी तुमने सई कई बिन्ना।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जे सब बी तो सोचबे वारी बात आए भैयाजी! जोन टेम पे कोन ऊं लड़ाई छिड़त आए तो पैले दोई तरफी के मारे गए सेना वारे गिने जात आएं, फेर पब्लिक वारे गिने जात आएं। मनो पसु-पक्षियन की तो कोन ऊं की परी नई रैत आए। न जाने किते कुत्ता, बिल्ली, पंछी, कीरा-पतूला सबई कछू तो मारे जात आएं। इत्तेई नईं, पेड़ पौधा सोई जल-बर जात आएं, सो उनको को गिनत आए? कोन ऊं बी लड़ाई लड़त आएं मानुस, मनो मरत आए सबई कछू। फेर बी कोनऊं ईके बारे में नईं सोचत आए।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ बिन्ना! जो इत्ते सोचत तो लरतई काए खों? अपन पढ़त नइयां का के महाभारत भई इंची भर जमीन ने देने परे ईके लाने, मनो दोई तरफी के न जाने कितेक लोग मरे। औ बा खांडव बन वारी घटना। उते सोई सबरे पसु-पक्षी जल के मर गए रए। तुमई ने एक लेख लिखो रओ के दूसरे विश्व युद्ध में कित्ते कुत्ता, बिल्ली मारे गए रए।’’ भैयाजी बोले।
‘बा तो हमने हिल्डा कीन की ‘द ग्रेट कैट एंड डाॅग मैसेकर’ किताब पढ़ी रई, सो हमें पता परी रई के द्वितीय विश्व युद्ध होतई साथ सात लाख कुत्ता औ बिल्ली मारे गए रए।’’ मैंने कई।     
‘‘जेई से तो हम सोचत आएं के अब जा लड़ाई खतम होन चाइए। भौत हो गई।’’ भैयाजी बोले।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के जा लड़ाई से कोऊ को का मिलहे? जो प्रेमी पगला घांईं काए खों लरत फिर रओ?  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, April 8, 2026

चर्चा प्लस | हमारे हाथों में है हमारे जलवायु का भविष्य | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
हमारे हाथों में है हमारे जलवायु का भविष्य          
- डाॅ (सुश्री) शरद 
सिंह                                                                  
   आज दुनिया जिन सबसे बड़ी समस्याओं का सामना कर रही है, उनमें से एक प्लास्टिक कचरे की समस्या है। इस प्लास्टिक कचरे का एक बड़ा हिस्सा हमारे घरों से ही निकलता है। यह न केवल प्रदूषण फैलाता है, बल्कि नालियों को भी जाम कर देता है, जिससे बाढ़ जैसी गंभीर स्थितियाँ पैदा हो जाती हैं। यह आवारा जानवरों की जान ले लेता है, और इससे निकलने वाला जहरीला धुआँ इंसानों के लिए भी जानलेवा साबित हो सकता है। जलवायु परिवर्तन के लिए कौन जिम्मेदार हैकृमैं, आप, वह (पुरुष), वह (स्त्री) या वे? हम एक-दूसरे पर दोष डालकर बच नहीं सकते, क्योंकि जलवायु हम सभी की साझा संपत्ति हैय इसलिए इसे सही बनाए रखने की जिम्मेदारी भी हम सभी की है। जलवायु परिवर्तन हर इंसान और सभी जीवित प्राणियों के लिए सबसे बड़ा खतरा है। अब हमें यह तय करना होगा कि क्या हम इस धरती पर अन्य जीवित तत्वों के साथ मिलकर रहना चाहते हैं, या फिर इस धरती से जीवन को ही मिटा देना चाहते हैं। एक बार सोचिए, क्योंकि यह कोई विज्ञान-कथा (साईफाई) नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई है। यह सच है कि हम प्लास्टिक का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद नहीं कर सकते, लेकिन हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि इस समस्या से निपटने के लिए हम क्या कर सकते हैं?

जलवायु क्या है? आसान शब्दों में कहें तो, जलवायु किसी खास इलाके में मौसम का लंबे समय तक चलने वाला पैटर्न है। मौसम हर घंटे, हर दिन, हर महीने या यहाँ तक कि हर साल बदल सकता है। किसी इलाके के मौसम के पैटर्न, जिन्हें आम तौर पर कम से कम 30 सालों तक ट्रैक किया जाता है, उस इलाके की जलवायु माने जाते हैं। अगर पूरी धरती का मौसम बदल रहा हैकृजिसे हम जलवायु परिवर्तन कहते हैंकृतो इसका मतलब है कि पिछले तीस सालों में हमने इतनी गलतियाँ और लापरवाही की है कि मौसम में बदलाव सिर्फ किसी एक इलाके में ही नहीं, बल्कि पूरी धरती पर देखा जा रहा है। और भी साफ शब्दों में कहें तो, आज जो जलवायु परिवर्तन हो रहा है, उसके लिए हम और सिर्फ हम ही जिम्मेदार हैं।

जरा सोचिए कि किसी दिन हमारे पास साँस लेने के लिए साफ हवा, पीने के लिए साफ पानी और खाने के लिए साफ खाना न होय धरती और महासागरों की गर्म सतहों से लावा फूट रहा होय और समुद्र का जलस्तर बढ़ने की वजह से धरती का जमीनी हिस्सा पानी में डूब गया हो। तो फिर हम क्या करेंगे? हम अपनी जान कैसे बचाएँगे? यह कोई साइंस-फिक्शन कहानी नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई है। यह हमारे भविष्य के जीवन का वह नजारा है, जिसकी पटकथा हम खुद ही लिख रहे हैं।
हमारी जलवायु हमारी गतिविधियों पर निर्भर करती है। अगर आज वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, तो इसकी एकमात्र वजह यह है कि हमने अपनी फैक्ट्रियों से निकलने वाली जहरीली गैसों पर रोक नहीं लगाई। हमने ऐसे वाहनों का इस्तेमाल किया, जिनसे सालों तक जहरीला धुआँ निकलता रहा। हम उन जंगलों को काटते रहे, जिनके पेड़ हवा को साफ करते थे। अगर आज जल प्रदूषण बढ़ रहा है, तो इसकी वजह यह है कि हमने अपनी गंदी नालियों के पानी को तालाबों और नदियों के साफ पानी में मिलने दिया। हमने फैक्ट्रियों से निकलने वाले जहरीले कचरे और गंदे पानी को नदियों में मिलने दिया। हमने नदियों से रेत का अवैध खनन करके उनके प्राकृतिक बहाव को बिगाड़ दिया। हमने जमीन में ऐसे जहरीले पदार्थ डाले कि ट्यूबवेल का जमीन के नीचे का पानी भी दूषित होने लगा। पानी बचाने के बजाय, हमने उसे बर्बाद किया। हमने इतनी ज्यादा बर्बादी की कि आज कई जगहों पर पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। अगर जमीन की बात करें, तो हमने जमीन को भी कहाँ बख्शा है? हमने सालों तक अपने खेतों में जहरीले रासायनिक खाद और कीटनाशक डालकर मिट्टी की उर्वरता को कम कर दिया है। जमीन को प्रदूषित करने में प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरे का भी बहुत बड़ा हाथ है। हमने बहुत अधिक औद्योगिक और वैज्ञानिक प्रगति की है, लेकिन हमने कचरा निपटान की मूलभूत आवश्यकता पर ध्यान नहीं दिया है।
प्लास्टिक कचरा, या प्लास्टिक प्रदूषण, श्पृथ्वी के पर्यावरण में प्लास्टिक की चीजों (प्लास्टिक की बोतलें और भी बहुत कुछ) का जमाव है, जो वन्यजीवों, वन्यजीवों के रहने की जगहों और इंसानों पर बुरा असर डालता है। प्लास्टिक प्रदूषण रहने की जगहों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं को बदल सकता है, जिससे इकोसिस्टम की जलवायु परिवर्तन के हिसाब से ढलने की क्षमता कम हो जाती हैय इसका सीधा असर लाखों लोगों की रोजी-रोटी, खाने के उत्पादन की क्षमता और सामाजिक भलाई पर पड़ता है। यह देखा गया है कि प्लास्टिक कचरे को ठिकाने लगाना एक गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि इसे इकट्ठा करने और अलग करने का सिस्टम ठीक नहीं है। जितना प्लास्टिक बनता है, उसका सिर्फ 60ः ही रीसायकल हो पाता हैय बाकी 9400 टन प्लास्टिक पर्यावरण में ही पड़ा रहता है, जिससे जमीन, हवा और पानी प्रदूषित होते हैं।
हरे रंग के कूड़ेदान गीले और बायोडिग्रेडेबल कचरे के लिए होते हैं, जिसमें रसोई का कचरा, जैसे सब्जियों और फलों के छिलके शामिल हैं। नीले कूड़ेदान प्लास्टिक के रैपर और नॉन-बायोडिग्रेडेबल कचरे को ठिकाने लगाने के लिए होते हैं। प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना बहुत जरूरी है, क्योंकि इससे प्रदूषण रुकता है और जीवाश्म ईंधन की खपत की माँग कम होती हैय साथ ही, प्राकृतिक संसाधन और ऊर्जा भी बचती है। इससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी कम होता है, जो जलवायु परिवर्तन में योगदान दे रही हैं। प्लास्टिक प्रदूषण रहने की जगहों और प्राकृतिक प्रक्रियाओं को बदल सकता है, जिससे इकोसिस्टम की जलवायु परिवर्तन के हिसाब से ढलने की क्षमता कम हो जाती हैय इसका सीधा असर लाखों लोगों की रोजी-रोटी, खाने के उत्पादन की क्षमता और सामाजिक भलाई पर पड़ता है।
प्लास्टिक पर्यावरण को पाँच तरीकों से नुकसान पहुँचाता है। पहला, यह रासायनिक प्रदूषण पैदा करता है। प्लास्टिक प्रदूषण के माध्यम से भी पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है। प्लास्टिक मूल रूप से तेल और गैस से बनता है। इन गैर-नवीकरणीय संसाधनों की खुदाई से बेंजीन, टोल्यूनि, एथिलबेंजीन, जाइलीन, कार्बन मोनोऑक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड, ओजोन, सल्फर डाइऑक्साइड और कई अन्य जैसे हानिकारक रसायन उत्पन्न होते हैं। दूसरा, यह माइक्रो-प्लास्टिक बनाता है। माइक्रो-प्लास्टिक अब लगभग हर जगह पाए जाते हैं। ये छोटे कण जलमार्गों, मिट्टी, पौधों, जानवरों और मनुष्यों को प्रदूषित करते हैं। माइक्रो-प्लास्टिक के प्रभावों का अभी नया अध्ययन किया जा रहा है। यह देखा गया है कि माइक्रो-प्लास्टिक मिट्टी की गुणवत्ता, उसमें रहने वाले सूक्ष्मजीवों और अपघटन के लिए जिम्मेदार छोटे कीड़ों को प्रभावित करते हैं। माइक्रो-प्लास्टिक बड़े जानवरों को भी कई तरीकों से प्रभावित करते हैं, जैसे उनके क्छ। को नुकसान पहुँचाना, उनकी वृद्धि को रोकना, प्रजनन अंगों को क्षति पहुँचाना और भी बहुत कुछ।
तीसरा, प्लास्टिक कचरा ऐसे अपशिष्ट के रूप में जमा होता रहता है जो अपने आप विघटित नहीं होता। चैथा, जब यह प्लास्टिक कचरा सीवेज प्रणाली तक पहुँचता है, तो उसे जाम कर देता है। कुछ साल पहले मुंबई में आई बाढ़ का एक मुख्य कारण प्लास्टिक कचरे से जाम हुई सीवेज प्रणाली ही थी।
चौथा, कूड़ेदान में फेंके जाने के बाद, हमारे देश में आवारा जानवर अन्य खाद्य पदार्थों के साथ प्लास्टिक कचरा भी खा लेते हैं। प्लास्टिक की थैलियाँ खाने से गायों की मौत की घटनाएँ भी सामने आती हैं। प्लास्टिक की थैलियाँ पचती नहीं हैं और उनकी आँतों में फँसकर उनके लिए जानलेवा साबित होती हैं।
पाँचवाँ, दुनिया के कई देश अवैध रूप से प्लास्टिक कचरा समुद्र में फेंक देते हैं। समुद्री दुनिया में बड़ी संख्या में कोरल रीफ (मूंगा चट्टानें) क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। प्लास्टिक कचरा समुद्री जीवन को भारी नुकसान पहुँचाता है। इस कारण समुद्री तट भी प्रदूषित हो जाते हैं।
देखा जाए तो प्लास्टिक कचरे से पानी, जमीन और हवाकृसभी को नुकसान पहुँचता है। इसीलिए, प्लास्टिक कचरे से बचने का सबसे अच्छा तरीका है प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना। लेकिन यह भी सच है कि प्लास्टिक की उपयोगिता हमारे जीवन में इस तरह एक जरूरत बन गई है कि हम इसे पूरी तरह से छोड़ नहीं सकते। इसलिए, यह जरूरी है कि हम अपने इस्तेमाल किए हुए प्लास्टिक कचरे को सही तरीके से संभालना सीखें। तभी हम प्लास्टिक कचरे के बुरे प्रभावों से बच पाएँगे। हाँ, हमें अपने घरों के प्लास्टिक कचरे को अलग रखना चाहिए और उसे नीले रंग के कूड़ेदान में डालना चाहिए, जो इसी काम के लिए बनाया गया है। इससे प्लास्टिक कचरे का निपटारा करने वालों को आसानी होगी और हम प्लास्टिक कचरे के हानिकारक प्रभावों से बच पाएँगे। यह छोटा सा कदम हमें एक बड़े खतरे से बचा सकता है।
नदियों की तरह, हमने समुद्रों और महासागरों को प्रदूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। जिसके कारण समुद्रों और महासागरों में रहने वाली कई महत्वपूर्ण प्रजातियाँ खतरे में पड़ गई हैं। महासागर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से निकलने वाली अधिकांश अतिरिक्त गर्मी को सोख लेते हैं, जिससे महासागरों का तापमान बढ़ रहा है। महासागरों के बढ़ते तापमान का समुद्री प्रजातियों और पारिस्थितिक तंत्रों पर बुरा असर पड़ता है। बढ़ते तापमान के कारण कोरल ब्लीचिंग होती है और समुद्री मछलियों तथा स्तनधारियों के प्रजनन स्थलों को नुकसान पहुँचता है। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में दुनिया ने अपने लगभग 14 प्रतिशत कोरल रीफ (मूंगा चट्टानें) खो दिए हैं। शोध में बताया गया है कि महासागरों का अम्लीकरण, समुद्र के बढ़ते तापमान और अत्यधिक मछली पकड़ना, प्रदूषण, अनियंत्रित पर्यटन तथा खराब तटीय प्रबंधन जैसे स्थानीय दबाव, कोरल पारिस्थितिक तंत्रों के लिए मिलकर एक बड़ा खतरा पैदा कर रहे हैं।
इस समय हमारे सामने सबसे बड़ा खतरा ग्लोबल वार्मिंग है। ओजोन परत पृथ्वी को सूर्य से निकलने वाले विकिरण से बचाती है और पृथ्वी के तापमान को संतुलित रखती हैय प्रदूषण के कारण इसे पहुँचने वाले नुकसान से ओजोन परत कमजोर हो रही है और पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। इसका परिणाम ग्लेशियरों का पिघलना और मौसम में बढ़ती अनिश्चितता है, जिसे हम अभी अपनी आँखों से देख रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के कारण झीलों के जल स्तर में कमी आई है, समुद्र का जल स्तर बढ़ा है, और नदियों तथा वर्षा के पैटर्न में बदलाव आया हैय साथ ही, इसने प्लवक (चसंदाजवद) से लेकर स्तनधारियों तक, सभी जलीय जीवों पर नकारात्मक प्रभाव डालना शुरू कर दिया है। पिछले 30 वर्षों में क्रिल (छोटे समुद्री जीव) की संख्या में औसतन 80ः की कमी आई है। कोरल ब्लीचिंग (मूंगा विरंजन) में भी भारी वृद्धि हुई है। हमारे देश के जल क्षेत्र में पाई जाने वाली हिंद महासागर मूल की मछलियों की संख्या अब तक 30 तक पहुँच चुकी है। समुद्री कछुओं के प्रजनन क्षेत्र सिकुड़ गए हैं, क्योंकि समुद्र का जल स्तर बढ़ने के कारण उनके तटीय आवास नष्ट हो रहे हैं। समुद्री बर्फ के पिघलने या कम होने के कारण, कई समुद्री स्तनधारियों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। हाल ही में विकसित किए गए गणितीय कंप्यूटर मॉडलों के अनुसार, यह अनुमान लगाया गया है कि यदि  कार्बन  की सांद्रता (घनत्व) दोगुनी हो जाती है, तो वैश्विक तापमान में 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो जाएगी। जलवायु की इस बुरी स्थिति के लिए हम सभी जिम्मेदार हैंकृहम सभी का अर्थ है, हम सभी मनुष्य। एक-दूसरे पर दोषारोपण करके हम अपनी बेगुनाही साबित नहीं कर सकते। लेकिन हम अपनी उन गतिविधियों में सुधार अवश्य कर सकते हैं, जो जलवायु पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रही हैं। हमारी गतिविधियों के कारण जलवायु में आ रही गिरावट यह साबित करती है कि हमारी जलवायु का भविष्य हमारे ही हाथों में है अब यह पूरी तरह हम पर निर्भर करता है कि हम इसे संवारते हैं या बिगाड़ते हैं।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 08.04.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, April 7, 2026

पुस्तक समीक्षा | पुरानी किताबों की भी प्रासंगिकता होती है जैसे ‘तिल के फूल तिली के दाने’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
पुरानी किताबों की भी प्रासंगिकता होती है जैसे ‘तिल के फूल तिली के दाने’
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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बाल गीत संग्रह - तिल के फूल तिली के दाने
कवि - रमेशदत्त दुबे
प्रकाशक - प्रमाण कम्प्यूटर्स, कटरा बाज़ार, सागर
मूल्य - 25/- 
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      रचनाकार पुराना हो जाता है। कालकवलित हो जाता है। वह अपनी अर्थवत्ता भी खो सकता है। किन्तु, उसका सृजन कभी अपना महत्व नहीं खोता है। पुरातन साहित्य की श्रेणी में गिना जाने वाला पंचतंत्र, जातक कथाएं, सिंहासन बत्तीसी, अरब की कहानियां, नाविक सिंदबाद की यात्राएं आदि आज भी उतनी ही रोचक लगती हैं जितनी उस समय के बाल श्रोताओं, पाठकों एवं उनके बड़ों को लगती रही होंगी। उनमें मौजूद शिक्षा आज भी प्रासंगिक है। पुरातन साहित्य अपने सृजन की तिथि के आधार पर पुरातन की श्रेणी में भले ही गिना जाए किन्तु उसकी अर्थवत्ता कभी पुरानी नहीं पड़ती है। जी हां, पुरानी किताबों की भी अर्थवत्ता होती है जैसे ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’। यह बाल गीत संग्रह है। इसके रचयिता रमेशदत्त दुबे अब स्वर्गीय हो चुके हैं किन्तु उनकी अन्य कृतियों की भांति उनके बाल गीतों का यह संग्रह आज भी जब हाथों में आता है तो इसका महत्व स्वतः जागृत हो जाता है। फिर कई वर्षों से आधुनिक बाल साहित्य की कमी को शिद्दत से महसूस किया जा रहा है, विशेषरूप से हिन्दी में। अंग्रेजी में राईम्स के रूप में आयातित बाल काव्य अथवा उन पर आधारित देसी अंग्रेजी बाल काव्य तो उपलब्ध होता रहा है किन्तु हिन्दी का बाल साहित्य सिकुड़ता गया। इसका एक कारण यह है कि आज अधिकांश बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ रहे हैं और दूसरा कारण कि बहुत-सी बाल पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हो गया। बाल साहित्य से संस्कारित करने वानी पत्रिकाएं जैसे नंदन, पराग आदि ने कम से कम दो पीढ़ियों को बाल साहित्य से जोड़े रखा था किन्तु अब उस स्तर की पत्रिकाएं नहीं के बराबर हैं। 

रमेश दत्त दुबे सागर शहर के एक ऐसे साहित्यकार हुए जिन्होंने फक्कड़पन से जीवन व्यतीत करते हुए महत्वपूर्ण साहित्य रचा। उन्होंने उपन्यास, कहानियां, कविताएं एवं लेख भी लिखे। ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’ बाल गीत संग्रह है जिसमें उनके 27 गीत संग्रहीत हैं। इन गीतों की विशेषता यह है कि इनमें मनोरंजन के साथ शिक्षा एवं सांस्कृतिक मूल्य समाहित हैं। इनमें से कुछ गीतों की ध्वनि खेल गीत की है जो बालमन को ऊर्जा का संचार करने में सक्षम हैं। यूं तो मैंने इस संग्रह को उनके जीवनकाल में पढ़ा था किन्तु विगत दिनों मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के अंतर्गत बाल साहित्य अकादमी द्वारा बाल साहित्य पर शहर में चर्चा संगोष्ठी के दौरान रमेशदत्त दुबे जी के सुपुत्र ने इस बाल गीत संग्रह की प्रतियां आयोजन में वितरित कीं, जिससे एक बार फिर यह पुस्तक दृष्टि से गुज़री। एक बार फिर संग्रह की कविताओं को पढ़ने का सुअवसर मिला। वस्तुतः होता क्या है कि हम अपने जीवन में इतने व्यस्त होते जाते हैं कि पुस्तक का स्वरूप और नाम तो स्मृति में रहता है किन्तु कई बार उसका कलेवर धुंधला पड़ता जाता है। पुस्तक भी अन्य नवीन पुस्तकों के नीचे दबती चली जाती है। किन्तु जब कभी वह पुस्तक पुनः सामने आती है तो उसके स्वरूप और नाम की स्मृति के साथ उसका कलेवर भी पुनः ताज़ा हो जाता है। तब हमें लगता है कि यह तो अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है तथा इसकी प्रासंगिकता आज भी ज्यों की त्यों है। इसका कारण यह है कि इसके गीतों को समय की नब्ज़ पर उंगली रख कर लिखा गया है।

        इस संग्रह का प्रथम गीत है ‘‘मुनिया’’। यह गीत उस परिस्थिति पर आधारित है जिसमें माता-पिता दोनों कामकाजी हैं और नन्हीं मुनिया जैसी बेटी घर में अकेली अपनी कल्पनाओं के अनुरुप खेल रचाा कर मन लगा रही है। इस गीत को पढ़ कर जहां बड़े एकाकी बालमन की दशा को समझ सकते हैं वहीं बच्चे अपना समय खेल-खेल में व्यतीत करने का गुर सीख सकते हैं। इस गीत की कुछ पंक्तियां देखिए -
मुनिया ने देखा, आज पापा नहीं हैं 
मुनिया ने पाया, आज माँ भी नहीं हैं
मुनिया ने पाया, घर बिल्कुल सूना छुआ 
उसने वह सब, मना जिसको छूना
औरत की फोटो में मूंछें लगाई 
राजा की फोटो में पूंछें लगाई
कहा उसने वह सब, जो था उसको कहना 
सुना उसने सब कुछ, जो था उसको सुनना
गाना भी गाया, नची, कूदी-फांदी 
गुड्डा और गुड़िया की, कर डाली शादी
छोटी सी मुनिया को बहुत सा काम है 
दिन हो या रात, चैन न आराम है
़़़़़़़हाथी-घोड़ा-पालकी
हाथी, घोडा, पालकी 
बातें हैं उस काल की 
मोटर, साइकिल, प्लेन की 
बातें हैं इस काल की
बच्चों की कल्पना में आज शेर, भालू से कहीं अधिक मोटर, साइकिल, प्लेन कौंधते हैं। यही टीवी आदि के चलित दृश्यों में उनकी नन्हीं आखों के आगे होते हैं तथा यही खिलौनों के रूप में उन्हें मिलते हैं। अतः गुड़िया के विवाह जैसे पारंपरिक खेल के साथ आधुनिक वस्तुओं को जोड़ कर गीत लिखने से गीत की समसामयिकता बढ़ गई है। 
संग्रह में ‘‘कहानी’’ शीर्ष से भी एक गीत है जिसमें छोटी-छोटी तुकबंदी और सहज शब्दों के साथ मनोरंजन है। यह गीत सहज ही बच्चों की जुबान पर चढ़ जाने का गुण रखता है। गीत का एक अंश-
आमोती - दामोती रानी
अंधी भूरी कहे कहानी
एक कहानी दादी कहती
एक कहानी नानी
एक कहानी हरबोलों की, 
खूब लड़ी मरदानी
अमोती-दामौती रानी

बुंदेलखंड का एक पुराना खेल गीत है जो आज भी सुदूर ग्रामीण अंचलों में गाया जाता है, जहां पारंपरिक ग्रामीण खेल खेले जाते हैं। यह खेल गीत है ‘‘पो संपा भई पो संपा’’। यह गीत संवादनात्मक है। एक बच्चा उसे प्रश्न के रूप में गाता है तो शेष बच्चे उसका उत्तर देते हैं। इस पारंपरिक गीत को आधार बना कर राजा-रानी के स्थान पर रेलगाड़ी और रेलमपेल जैसे उपमान रखे गए हैं जिससे यह बच्चों के लिए अधिक दृश्यात्मक हो जाता है। उदाहरण देखिए- 
पो संपा भई पो संपा 
पो संपा ने क्या किया ?
पो संपा ने रेल बनाई 
रेल बनाकर खूब चलाई 
अब तो रेल में जाना पड़ेगा 
लटके, बैठे, खड़े-खड़े 
साथ चलेंगे पेड़ खड़े 
छुक-छुक करती चलती 
रेल डिब्बों में है रेलमपेल 

संग्रह का शीर्षक गीत ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’ प्रकृति और जीवों से मिलाता है। इस गीत का अपना अलग ही सौंदर्य है तथा अलग ही रसात्मकता है। 
तिल के फूल, तिली के दाने 
खिलते फूल लगे मुरझाने 
सूरज घबराया-घबराया 
चिड़ियों ने गाना न गाया
बिल्ली बोली-न खेलूंगी 
चुहिया बोली-न दौडूंगी 
घोड़ा बैठ गया था थककर 
मछली बैठी जल में छुपकर 
चिडियों ने गाना न गाया
शेर न था बिल्कुल गुर्राया 
- अर्थात एक नन्हा-सा तिल का फूल यदि मुरझा जाए तो पूरी प्रकृति और जीव-जन्तु उदास हो जाते हैं। इसलिए फूलों और पौधों की देखभाल करना चाहिए, उन्हें मुाझाने नहीं देना चाहिए। यही तो वह शिक्षा है जो खेल-खेल में, पांव के पंजो पर बिठा कर झूला झूलाते हुए, गीत गाते हुए एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को दे दी जाती थी। आज माता-पिता भौतिकता की दौड़ में इस तरह उलझ गए हैं कि उन्हें न तो स्वयं इस प्रकार के गीत याद हैं और न वे स्वयं गीत रच पाते हैं। वे अपने बच्चों को डिजिटल मीडिया के हवाले छोड़ कर उनके प्राकृतिक बचपन की आकांक्षा करते हैं जो पूरी तरह संभव नहीं है। दरअसल इस प्रकार के गीत ही है जो पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच संवेदना, आत्मीयता एवं ज्ञान के तार जोड़ते हैं। इसीलिए स्वर्गीय रमेशदत्त दुबे जी का यह बाल गीत संग्रह ‘‘तिल के फूल, तिली के दाने’’ आज भी गहरी अर्थवत्ता रखता है। आज के युवा माता-पिता को स्वयं ऐसे गीत पढ़ने चाहिए तथा अपने बच्चों को स्वयं सुनाने चाहिए। इस दृष्टि से यह पुस्तक सदा प्रासंगिक बनी रहेगी।  
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Monday, April 6, 2026

डॉ (सुश्री) शरद सिंह "नारी शक्ति सम्मान 2026" से पत्रिका द्वारा सम्मानित

साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए मुझे "नारी शक्ति सम्मान 2026" से कल दोपहर (05.04.26 को) सम्मानित किया गया....खुरई विधानसभा के विधायक एवं पूर्व मंत्री भाई भूपेंद्र सिंह तथा विवेकानंद विश्वविद्यालय के कुलपति भाई अनिल तिवारी जी के कर कमलों से सम्मान प्राप्त करना सुखद लगा... अवसर था 
राजस्थान पत्रिका के सागर संस्करण पत्रिका द्वारा  विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाली महिलाओं को "पत्रिका नारी शक्ति सम्मान 2026" से सम्मानित किया गया... पत्रिका सागर संस्करण के संपादक नितिन त्रिपाठी जी पत्रिका परिवार के श्री उदय गौतम जी, श्रीमती रेशु जैन जी आदि सभी का हार्दिक आभार 🌹🙏🌹
होटल दीपाली के क्रिस्टल हॉल में आयोजित इस सम्मान कार्यक्रम के दौरान अपनी बहनों से सुखद भेंट भी हुई।

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Saturday, April 4, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | बड़े पते की आएं जे कहनातें, इनें छुड्डा में गठियां लेओ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
बड़े पते की आएं जे कहनातें, इनें छुड्डा में गठियां लेओ
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

  मार्च को मईना लगत साथ ऐसी गरमी परन लगी रई मनो मई को मईना आ गओ होए। कछू नई तो पूरो मईना तपो। बस, अखीर-अखीर में नाएं-माएं पानी गिरन लगो। बा जोन मोसम बिभाग वारे कैत आएं ने के गरज के संगे छींटें परहें, सो, ऐसोई कछू होन लगो। ई टाईप से मोसम बदले में तबीयत सोई बिगरन लगत आए। ऊंसई देखो जाए तो मार्च औ अप्रेल को मईना चैत औ बैसाख कहाउत आएं, जोन के लाने घाघ औ भड्डरी ने खींब पते की कहनातें कईं आएं। जेसे चैत के लाने उन्ने खाबे-पीबे को सई हिसाब बताओ आए के का खाओ चाइए औ का नईं खाओ चाइए - 
चैते गुड़, बैसाखे तेल, 
जेठे महुआ, आषाढ़े बेल 
- मने चैत में गुड़, बैसाख में तलो-फुलो, जेठ के मईना में महुआ औ असाढ़ मईना में बेल नईं खाओ चाइए। जेई के संगे घाघ कैत आएं के का खाओ चाइए जोन से सेअत सही रए-
चैत मास में नीम सेवती,
बैसाखहि में खाय बासमती
- मने चैत में नीम की नईं-नईं पत्तियां खाए से औ बैसाख में बासमती घांई बिना मांड़ को भात खाए से सेअत अच्छी रैत आए।
     बाकी घाघ औ भड्डरी ने मोसम के लाने सोई कओ आए के-
चैत मास दसमी खड़ा, जो कहुं कोरा जाइ।
चौमासे भर बादरा, भली-भां‍ति बरसाइ।।
- मने चैत मईना के शुक्ल पक्ष की दशमी को जो बदरा ने छाएं तो पूरे चौमासे झमाझम पानी बरसत आए।  मनो उतई जो-
जब बरखा चित्रा में होय
सगरी खेती जावै खोय
- मने जो चित्रा नक्षत्र में पानी बरस गओ तो समझो सगरी खेती चौपट। सो, इन कहनातों को फिजूल ने मानियो, जे सेअत ठीक राखबे औ मोसम की दसा समझबे को गुर बताउतीं आएं। अगली दफा कछू औ कहनातें बताबी,जो लौं इनें छुड्डा में गठियां लेओ। राम-राम !
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Thursday, April 2, 2026

बतकाव बिन्ना की | जे चिल्लम-चिल्ली कभऊं बंद हुइए के नईं | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
जे चिल्लम-चिल्ली कभऊं बंद हुइए के नईं ? 
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
    मैं और भौजी बैठी बतकाव कर रई हतीं, इत्ते में भैयाजी आ पौंचे औ उनके संगे खाना पकाबे की गैस को सिलेंडर वारो हतो।
‘‘अई गजब! आपने तो मैदान मार लओ, भैयाजी! ई टेम पे सिलेंडर को जुगाड़ सबसे बड़ो जुगाड़ आए।’’ मैंने भैयाजी की तारीफ करी।
‘‘ने कछूं, तुम तो ऊंसईं भाव दे रईं।’’ भैयाजी मुस्कात भए बोले।
‘‘नईं। हम सांची कै रए। ई टेम पे जबे सिलेंडरन की मारा-मारी चल रई, ऐसे में भरो सिलेंडर घरे ले आने से बड़ों कोनऊं काम नईं।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘अरे, जोन तुम समझ रईं, बा कछू नईं आए। जे सिलेंडर वारे भैया तो हमें दोरे के चार कदम उते पे मिल गए। सो हम ओरे संगे चले आए। मनो हमने दो दिनां पैले नंबर लिखाओ रओ औ जा गैस खुदई से हमाए इते आ गई आए। मनो मारा-मारी हुइए, लेकन हमाई ई ऐजेंसी में तो नइयां। ने तो जे भैया कां से चले आउते सिलेंडर पौंचाबे के लाने?’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, हमाए इते ऐसो कछू नइयां। अबे तो मुतके सिलेंडर गोडाउन में आएं। बाकी जो कोनऊं जे चाए के बिना नंबर लिखाए ऊको सिलेंडर मिल जाए सो बा नईं हो रओ।’’ बा सिलेंडर वारो अपने माथा से पसीना पोंछत भओ बोलो। 
‘‘ने पूछो भैया, बड़ी गदर मची आए। जो टीवी पे, ने तो माबाईल पे देख लेओ तो ऐसो लगत आए के मानों लड़ाई इतई छिड़ी जा रई।’’ बा सिलेंडर वारे से भौजी बोलीं।
‘‘अरे बे पगला हरें। बे तो ऐसे बखानत आएं जैसे बे ईरान वारों के गोदी में बैठे होंए के ट्र्म्प के पलकां पे डरे होंए। मनो दोई उनई से पूछ-पूछ के मिसाइलें छोड़ रए हों।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, कलई सो हम मोबाईल पे देख रए हते एक जने कै रआ हतो के ईरान ने घनों दोंदरा दे रखो आए औ घंटा भर बाद बोई आदमी कैत मिलो के अमेरिका ने ईरान खों माटी में मिलाबे की ठान रखी आए। मोए तो समझ नईं परत के बा कोन की तरफी आए?’’ बा गैस सिलेंडर वारो जात-जात बोलो। 
‘‘जे आजकाल के चैनल वारे कोनऊं के सगे नोंई। इने तो अपनी टीआरपी बढ़ाबे की परी रैत आए। फेर ऊके लाने कछू बी अल्ल-गल्ल बकने होए सो बकत रैत आएं। जरूरी बात पे उनको मों खोलत नईं बनत।’’भैयाजी बोले।
‘‘अरे, भैयाजी! मोए जरूरी बात पे बोलबे पे से याद आई के अबे मैं बा जलसेवा के उद्घाटन में गई रई।’’ मैंने कई।
‘‘कोन सी जल सेवा?’’ भैयाजी ने टोंकत भए पूछी।
‘‘अरे बोई जोन हरेक साल श्रीराम सेवा समिति वारे करत आएं। सागर के रेलवे स्टेशन पे सबरे यात्रियन खों मुफत में ठंडो पानी पिलाबे को पुन्न काम। बा ऊके अध्यक्ष मोरे लोहरे भैया डाॅ विनोद तिवारी आएं। बे सोई सांझ-संकारे एक करत रैत आएं। सो, उते का भओ के उद्घाटन के लाने आए हते समाजवादी चिन्तक दादा रघु ठाकुर जू औ भैया रमाकांत यादव जू जोन पिछड़ावर्ग आयोग वारे ठैरे। सो रमाकांत यादव भैया ने अपने भाषन में बड़ी पते की बात कई। बे बोले के जे जो रुपैया को चलन बंद करत जा रए ऊके लाने कछू करो चाइए। मोए उनकी जा बात भौतई पुसाई। काए से जोन को डिजिटल रुपैया से काम करत बनत आए उनके लाने तो कछू नईं, कोनऊं परेसानी नोंई, बाकी जोन खों ढंग से मोबाईल चलाउत नईं बनत, ने तो ऊके लिंगे सस्तो सो बटन वारो मोबाईल आए, बा बिचारो का करहे? जो कोऊ नईं सोचत। सबखों ईरान औ अमेरिका की लड़ाई की ऐसी परी के मनो बे दोई इतई तिगड्डा पे लड़ रए होएं।’’ मैंने कई।
‘‘सई कई उन्ने। जा बाकई भौत बड़ी वारी समस्या आए। पर कोनऊं खों ऊकी परी नईयां।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, औ तनक औ करबे की चली तो बे बाई, का नांव ऊको?? अरे हऔ बा फिलम वारी बाई, बा राहुल गांधी के लाने कछू ने कछू बकन लगत आए। जीसें फालतू के बातकाव चलत रए औ काम की बात ने होने पाए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘अरे, बा सब पब्लिक को ध्यान भटकाबे को काम चलत रए। पब्लिक फजूल की गिरगिटर करत रएं, काम की बात सोंचे बी नईं। मनो बा तो पब्लिक बी अब समझन लगी आए, लेकन जा लड़ाई खों ले के जा कमी, बा कमी की कैबे में का रखो? जित्तों को संकट नोंई, उत्ते को दोंदरा देत फिर रए। जा सई आए के तनक चौकन्ने रओ, फिजूलखर्ची ने करो सो कछू फरक नईं परने।’’ मैंने कई।   
‘‘हम तो कैत आएं के जे जो जित्ते टीवी पे कांव-कांव करबे वारे चैनल आएं, सब खो बंद कर दओ जाए। कम से कम तब तक के लाने जब तक जे जो लड़ाई चल रई।’’ भौजी बोलीं। 
‘‘अब का कओ जाए भौजी! आजकाल कछू औरई दिमाग चल रओ लोगन को। अब आपई देख लेओ के एक फिलम आई ‘धुरंधर’। मोए बा तनकऊ ने पुसाई काए से के ऊमें भर-भर के गालियां हतीं। मनो भौत से लोगन खों बा भौतई पुसाई। सबने ऊकी खूबई तारीफ करी। उतई एक फिलम औ आई ‘‘केरला स्टोरी’’। बा हती तारीफ करबे जोग, मनो ऊपे बोले में लोग डरात दिखे। जबके ‘केरला स्टोरी’ में लव जिहाद को कच्चो चिट्ठा रओ। ऊपे भौतई कम बात करी लोगन ने। सो, आजकाल कछू कैबो मुस्किल आए के कोन का चा रओ?’’ मैंने कई।
‘‘सो तो सई कई!’’भैयाजी बोले।
‘‘औ तनक जे देखो के राशन की दुकान पे राशन लेत समै उंगलियन को निसान लेबे को नियम कर दओ, मनो बोट डालत समै काए नईं फिगर प्रिंट लेत आएं? ईसे एकऊ गलत बोट ने पड़ पाहे। काए सई कई के नईं?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘कई तो सई तुमने, मनो तुमाई को सुन रओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अरे तुम ओरें कां की ले के बैठ गए? हम तो सिरफ इत्तई कै रए हते के जे लड़ाई खों ले के बेफालतू की चिल्लम-चिल्ली ने करी जाए। काए से ईसे डर सो फैलत आए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘तुम जे डर की कै रईं? औ बा जोन जो सीरियल में दिखा रए बसीकरण औ चुड़ैल को साया सो बो का आए? ऊको काए नई रोको जात आए? जोन जो पढ़े-लिखे आएं बे सोई ई सब के बारे में सोचन लगे अब तो। अभईं कल मोए मास्साब जी मिले सो कैन लगे के उनके मोड़ा खों कोनऊं ने नजर लगा दई आए जोन से बा बीमार डरो आए। सो हमने उनसे गई के आप तो पढ़े लिखे आओ, आप सो ऐसो ने बोलो। कछू गलत खा पी लओ हुइए आपके बालक ने सो ऊकी तबीयत बिगर गई। सो जे तो हाल आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘सो, जेई तो हम कै रए के जोन जे चिंचियात रैत आएं औ अंधबिस्वास फैला रए, इन ओरन पे पाबंदी लगो चाइए।’’ भौजी बोलीं। 
भौजी कै तो सई रई हतीं, मनो उनकी कोऊ सुन ले सो अच्छो, ने तो टीवी चैनल वारे अपनी टीआरपी की चकिया में ऐसई पीसत रैंहें। कैबे खों प्राईम टाईम औ कऊं किले को भूत के बारे में बताहें तो कहूं कोनऊं चमत्कार के बारे में।  
बाकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के फिजूल की चिल्लम-चिल्ली करबे वारे चैनलों पे रोक लगने चाइए के नईं?  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, April 1, 2026

चर्चा प्लस | राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस : हनुमान जन्मोत्सव विशेष:   
राम दूत अतुलित बल धामा, अंजनि पुत्र पवनसुत नामा
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह 
                                                       

                           
     हनुमान देवत्व का वानर रूप हैं जो मनुष्य के भीतर आत्मबल का संचार करते हैं तथा उन्हें संकट से उबरने में सहायता करते हैं। हनुमान जी का हिंदू धर्म और संस्कृति में अत्यंत उच्च और पवित्र स्थान है। उन्हें शक्ति, भक्ति, ज्ञान, और निःस्वार्थ सेवा का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। वे भगवान शिव के रुद्रावतार और भगवान श्री राम के सबसे अनन्य भक्त हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष चैत्र पूर्णिमा 1 अप्रैल को सुबह 7 बजकर 6 मिनट से लेकर 2 अप्रैल को सुबह 7 बजकर 41 मिनट तक रहने वाली है अतः उदया तिथि के चलते हनुमान जन्मोत्सव का त्योहार 2 अप्रैल दिन गुरुवार को रखा जाएगा। हनुमान जी को ‘संकटमोचन’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है दुखों और कष्टों को दूर करने वाला। मान्यता है कि उनकी पूजा से जीवन की हर तरह की बाधा दूर होती है और व्यक्ति को निडरता प्राप्त होती है। वे नकारात्मक ऊर्जा, भूत-प्रेत और भय से रक्षा करते हैं अर्थात वे आत्मबल का विकास करते हैं।

भगवान हनुमान, जिन्हें अंजनेय, पवनपुत्र, केसरीनंदन और राम भक्त हनुमान के रूप में जाना जाता है, हिंदू धर्म में अटूट भक्ति, अपार शक्ति और अद्वितीय सेवा भावना के प्रतीक हैं। हनुमान जी को भगवान शिव का रुद्रावतार माना जाता है। उनके जन्म की कथा का उल्लेख शिव पुराण, वाल्मीकि रामायण और अन्य पुराणों में मिलता है। हर साल चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को हनुमान जन्मोत्सव मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं में इसी दिन बजरंगबली के जन्म का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि हनुमान सात चिरंजीवियों में से एक हैं और रुद्र के 11वें अवतार हैं। भगवान श्री हरि विष्णु जी ने धरती पर धर्म स्थापना के लिए जब रामावतार लिया तो हनुमान उनके सहायक बनकर बजरंगबली के रूप में धरती पर आए थे।
शिव पुराण के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लेने का निश्चय किया, तब भगवान शिव ने भी उनके साथ पृथ्वी पर अवतार लेने का संकल्प लिया। भगवान शिव ने अपनी शक्ति से वानरराज केसरी और माता अंजना के घर पुत्र रूप में जन्म लिया। माता अंजना को यह वरदान था कि उनके पुत्र को पवन देव का विशेष आशीर्वाद मिलेगा, इसलिए हनुमान जी को पवनपुत्र कहा जाता है। शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता, अध्याय 37) में वर्णन है-“भगवान शंकर ने अपने अंश से रुद्र रूप में वानर स्वरूप में जन्म लिया। माता अंजना ने कठिन तपस्या कर शिव को प्रसन्न किया, तब महादेव ने रुद्रांश के रूप में जन्म लेकर हनुमान स्वरूप धारण किया।”
यह जन्मकथा इस प्रकार है कि समुद्रमंथन के बाद जब भगवान शिव ने भगवान विष्णु का मोहिनी रूप देखने को कहा था जो उन्होंने समुद्र मंथन के दौरान देवताओं और असुरों को दिखाया था। उनकी बात का मान रखते हुए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर लिया। भगवान विष्णु का आकर्षक रूप देखकर शिवजी आकर्षित होकर कामातुर हो गए और उन्होंने अपना वीर्य गिरा दिया। जिसे पवनदेव ने शिवजी के वानर राजा केसरी की पत्नी अंजना के गर्भ में प्रविष्ट कर दिया। इस तरह माता अंजना के गर्भ से वानर रूप में हनुमानजी का जन्म हुआ। उन्हें शिव का 11वां रूद्र अवतार माना जाता है।
वाल्मीकि रामायण में भी हनुमान जी के जन्म की कथा विस्तार से मिलती है- माता अंजना, एक अप्सरा थीं, जो ऋषि के श्राप से  राजा कुंजर की इच्छानुसार रूप धारण करने वाली पुत्री  के रूप में  कपि योनि में जन्मी थीं। एक दिन जब वे मानवी स्त्री का रूप धारण कर के एक पर्वत शिखर पर विचार रही थी द्य तब उन्होंने पीले रंग की साड़ी पहन रखी थी जिसे वायुदेवता ने धीरे से हर लिया और काम से मोहित होकर उन्होंने अंजना का अव्यक्त रूप से आलिंगन कर लिया। पतिव्रता होने के कारण अंजना तुरंत ही समझ गई और बोली “कौन मेरे इस पतिव्रत का नाश करना चाहता है?“ तब पवन देव ने उत्तर दिया कि “मैं तुम्हारे पतिव्रत का नाश नहीं कर रहा हूँ। मैंने मानसिक संकल्प से तुम्हारे साथ समागम किया है जिससे तुम्हे बल पराक्रम से संपन्न एवं बुद्धिमान पुत्र प्राप्त होगा।”
फिर एक दिन पवन देव के आशीर्वाद से उनके गर्भ से हनुमान जी का जन्म हुआ। जन्म के बाद, हनुमान जी को असीमशक्ति, वेग और बल प्राप्त हुआ। वाल्मीकि रामायण (किष्किंधा कांड, सर्ग 66, श्लोक 8 -20 ) में वर्णन है- “वानरराज केसरी की पत्नी अंजना ने पुत्ररत्न को जन्म दिया, जो महाबली, महातेजस्वी और अत्यंत बुद्धिमान था। पवन देव की कृपा से जन्म लेने के कारण उसे ‘पवनपुत्र’ कहा गया।”
एक और कथा है हनुमान जी के जन्म की- एक बार की बात है अयोध्या के राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करवाया। यज्ञ पूरा होने के बाद राजा दशरथ ने प्रसाद रूपी खीर को अपनी तीनों रानियों कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी को बांट दिया। तभी वहां एक कौवा आया और खीर का एक भाग लेकर उड़ गया। उड़ता हुआ वह उस जगह पहुंच गया, जहां अंजनी पुत्र प्राप्ति के लिए शिवजी की आराधना कर रही थीं। यह सब शिव और वायुदेव के इशारे पर हो रहा था।
अंजनी ने देखा कि कौवा खीर लेकर आया है। अंजनी को लगा कि यह शिवजी की कृपा है। उन्होंने खीर को पी लिया और इसी प्रसाद से उन्होंने एक बलवान पुत्र को जन्म दिया। यह पुत्र पवनदेव का था। अंजनी के पति वानर राज केसरी थे। इसलिए अंजनी के पुत्र को पवनपुत्र और केसरी नंदन दोनों नामों से जाना गया।
हनुमान जी के जन्म की कथा एक और रूप में भी मिलती है। इस कथा के अनुसार शिव जी के उस वरदान से जो उन्होंने राजा केसरी और माता अंजना को दिया था. दरअसल एक बार राजा केसरी और माता अंजना ने शिव जी की कठिन तपस्या की, जब दोनों की तपस्या से भगवान प्रसन्न हो गए तो उन्होंने माता अंजना और केसरी से वरदान मांगने को कहा. जिस पर माता अंजना ने कहा कि -‘‘हे भोलेनाथ, हमें एक ऐसे पुत्र का वरदान दीजिए जो बल में रुद्र, गति में वायु और बुद्धि में गणपति के समान तेजस्वी  हो।’’ माता के वचनों से खुश होकर शिव जी माता को वरदान दिया और अपनी रौद्र शक्ति को पवन देव के रूप में यज्ञ कुंड में समाहित किया और उत्पन्न शक्ति को माता अंजना के गर्भ में स्थापित कर दिया। जिस वजह से हनुमान जी का एक नाम पवनपुत्र भी हुआ। शिव शंकर की कृपा से अंजना गर्भवती हो गईं और चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि दिन मंगलवार को भगवान रूद्र के 11वें अवतार के रूप में हनुमान जी का जन्म हुआ। हनुमान जी जन्म से ही बल, बुद्धि और विद्या में निपुण हैं।
बजरंग बली का नाम हनुमान कैसे पड़ा?
बजरंग बली जब छोटे थे तब उन्हें बहुत भूख लगती थी। एक बार उन्होंने अपनी मां अंजनी से खाने के लिए मांगा। अंजनी तब कुछ काम कर रही थीं। इसलिए उन्होंने अपने पुत्र से कहा कि बाहर जाओ और फल खा लो। जितने भी पके हुए फल हैं, वो खाने योग्य हैं। बजरंग बली भूख से व्याकुल हो रहे थे। वे बाहर गए और फल खाने लगे। तभी उन्हें आसमान में उन्हें चमकता हुआ सूरज दिखाई दिया। बजरंग बली को लगा कि यह भी एक फल है। उन्होंने अपनी शक्ति से लंबी छलांग लगाकर सूर्य के पास पहुंच गए और उसे अपने मुंह में रख लिया। बजरंग बली की इस हरकत से धरती पर अंधेरा छा गया। इंद्रलोक तक हाहाकार मच गया। तब सभी देव इंद्र के पास गए और कहा कि एक वानर ने सूर्यदेव को अपने मुंह में रख लिया है। सभी देवों ने इंद्रदेव से इस समस्या का हल निकालने की विनती की। तब इंद्रदेव आए। उन्होंने वज्र लहराया और बजरंग बली की ठोड़ी पर प्रहार कर दिया। बजरंग बली बेहोश होकर गिर पड़े। उनके जबड़े पर चोट लग गई। इंद्र के इस कदम से पवन देव नाराज हो गए। तब इंद्र ने हनुमान को फिर से होश में लाए। ठोड़ी को हनु भी कहते हैं। मान का अर्थ विरूपित होता है। इस तरह बजरंग बली का नाम हनुमान पड़ गया।
अतुलित बल धामा क्यों कहा गया?
हनुमान जी का बल असीम, अतुलनीय और अपरिमित है, जिसे शब्दों में नहीं मापा जा सकता। पौराणिक कथाओं के अनुसार, 10,000 इंद्रों का बल हनुमान जी के शरीर के एक रोम (बाल) में निहित है। वे ‘‘अतुलितबलधामा’’ (अतुलनीय बल के धाम) कहे जाते हैं, जिनकी एक दहाड़ से तीनों लोक काँप उठते हैं। हनुमान चालीसा की दूसरी चैपाई में हनुमान जी को श्अतुलित बल धामाश् कहा गया है, जिसका अर्थ है - ‘‘अतुलनीय (जिसकी तुलना न की जा सके) शक्ति के निवास स्थान’’। उन्हें यह उपाधि इसलिए दी गई है क्योंकि वे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से असीम शक्ति के स्वामी हैं।
इसके पीछे के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं कि उन्हें बचपन में ही कई देवताओं से वरदान प्राप्त थे। इंद्र ने उन्हें वज्र के समान शरीर का, अग्नि ने निर्भयता का, और पवन देव ने वायु के समान वेग का आशीर्वाद दिया था। असीम शारीरिक शक्तिरू उन्होंने समुद्र को लांघकर लंका जाना, संजीवनी बूटी के लिए पूरा पर्वत उठा लाना, और युद्ध में राक्षसराज रावण की सेना को धूल चटाने जैसे कार्य किए, जो साधारण बल से परे हैं। वे ‘‘रामदूत’’ हैं और उनका मानना है कि उनका बल उनका अपना नहीं, बल्कि उनके हृदय में निवास करने वाले प्रभु राम का है। वे बलशाली होने के साथ-साथ अत्यंत विनम्र और अहंकार शून्य हैं। वे ज्ञानियों में अग्रणी हैं और उन्हें अष्ट सिद्धि और नौ निधि का वरदान प्राप्त है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, वे भगवान शिव के 11वें रुद्रावतार हैं, जो स्वयं शक्ति का रूप हैं।
हनुमान को संकटमोचन क्यों कहा गया?
चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा।।
संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
अंतकाल रघुवरपुर जाई, जहां जन्म हरिभक्त कहाई।।
और देवता चित्त ना धरई, हनुमत सेई सर्व सुख करई।।
संकटमोचन के नाम से क्यों जाना जाता है?
जब रावण ने श्रीराम की पत्नी सीता माता का हरण किया था तो हनुमान ने ही उन्हें ढूंढ़कर अपने स्वामी श्रीराम को उनका पता बताया था। हनुमानजी हे श्रीराम का दूत बनकर रावण के पास गए थे और जब रावण ने उन्हें पकड़ लिया था तो वो अपनी बहादुरी से लंका में आग लगाकर बच निकलें थे। उन्होंने भगवान राम के वनवास काल में उनके मार्ग में आने वाली समस्त बाधाओं और संकटों को दूर कर अपनी सच्ची भक्ति का प्रमाण दिया था। हनुमानजी ने श्रीराम की रावण से युद्ध करने और लंका पर आक्रमण करने में बहुत सहायता की थी। सीता माता अपने रामजी के लिए हनुमानजी की स्वामी भक्ति और प्रेम को देखकर प्रसन्न हो उठी थीं और उन्होंने बजरंगबली को अमरता का वरदान दिया। अजर-अमर का वरदान पाकर बजरंगबली हनुमान निस्वार्थ भाव से अपने भक्तो की रक्षा करके उन्हें सभी संकटो से बचते हैं और इसलिए उन्हें संकट मोचन महाबली हनुमान के नाम से जाना जाता हैं।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै,महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरै सब पीरा । जपत निरन्तर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 01.04.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, March 31, 2026

पुस्तक समीक्षा | दादू का पिटारा : बालमन के लिए एक जरूरी सृजन | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
दादू का पिटारा : बालमन के लिए एक जरूरी सृजन
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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बाल कहानी संग्रह - दादू का पिटारा
लेखक - गोकुल सोनी
प्रकाशक - इंद्रा पब्लिशिंग हाउस, ई-5/21,अरेरा कॉलोनी, हबीबगंज पुलिस स्टेशन रोड, भोपाल 462016
मूल्य -199/-
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    बाल कहानियों का प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में बहुत महत्व होता है। बचपन में सुनी हुई कहानियां व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक होती हैं। ये मात्र मनोरंजन नहीं, वरन जीवन से जुड़ी शिक्षाओं का अनौपचारिक माध्यम होती हैं। बाल कहानियाँ बच्चों के सर्वांगीण विकास में एक आधारभूत भूमिका निभाती हैं। ये न केवल मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि ज्ञान, नैतिकता और भाषा सीखने का सबसे प्रभावी माध्यम भी हैं। बचपन में कहानी सुनाना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बच्चों को व्यस्त रखता है, भाषा के विकास को बढ़ावा देता है और उनकी कल्पनाशीलता को बढ़ाता है। कहानियों के माध्यम से बच्चे अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं, नई दुनिया और विचारों से परिचित हो सकते हैं और सीखने के प्रति रुचि विकसित कर सकते हैं। कहानियाँ बच्चों की कल्पना शक्ति  और तर्कशक्ति को बढ़ाती हैं। यह उन्हें नए विचारों और रचनात्मक तरीके से सोचने के लिए प्रेरित करती हैं। कहानियाँ सुनने या पढ़ने से बच्चों के शब्दकोश  में वृद्धि होती है और उनकी भाषा शैली बेहतर होती है। यह उनमें सुनने, बोलने, पढ़ने और लिखने  के कौशल को विकसित करती हैं। अधिकांश बाल कहानियाँ, विशेष रूप से पंचतंत्र की कहानियाँ, ईमानदारी, दया, साहस, और मित्रता जैसे नैतिक गुण सिखाती हैं। भावनात्मक और सामाजिक समझरू कहानियों के पात्रों के माध्यम से बच्चे भावनाओं (जैसे खुशी, दुख, डर, सहानुभूति) को समझते हैं। यह उन्हें सामाजिक परिस्थितियों को समझने और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने में मदद करती हैं। पौराणिक और लोककथाएँ बच्चों को अपनी संस्कृति, इतिहास और परंपराओं से परिचित कराती हैं। कहानी सुनना बच्चों में ध्यान केंद्रित करने  की क्षमता बढ़ाता है और उनके मन में जिज्ञासा पैदा करता है।यह बच्चों के लिए मनोरंजक होने के साथ-साथ तनावमुक्त होने का एक स्वस्थ साधन भी है। बाल कहानियाँ बच्चों को आदर्श नागरिक बनने, उनके व्यक्तित्व को निखारने और उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
कई बार संवाद में यह सामने आता है कि एक तो बाल साहित्य को हमंशा हाशिए पर खड़ा रखा गया, उस पर बाल साहित्य के स्वरूप को ही कई साहित्यकार समझ नहीं पाते हैं। जबकि हमारे देश में प्राचीनकाल से बाल साहित्य रचा जा रहा है। विष्णु शर्मा ने चार उद्दंड राजकुमारों को शिक्षित करने तथा जीवन की नीतियों का ज्ञान देने के लिए वे कहानियां सुनाईं जिनके पात्र पशु, पक्षी थे। हम उन कहानियों के संग्रह को ‘‘पंचतंत्र’’ के नाम से जानते हैं। प्रश्न आता है सबसे नवीनतम टैक्नोलाजिकल स्थिति का, जिसे हम ‘‘एआई’’ यानी आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस के नाम से जान रहे हैं। उसने तूफान की तरह बड़ी तरंगे उठानी शुरू कर दी हैं। कहा तो ये जाता है कि इन दिनों कई किताबें भी एआई के द्वारा लिखी जा रही हैं। क्या यह छल बाल साहित्य के मर्म को समझ सकेगा? जबकि बाल साहित्य से अपेक्षा की जाती है कि वह टेक्नाॅलाजी के साथ परिवर्तित होते युग में बच्चों के लिए मानवीय मूल्यों, राष्ट्रीय मूल्यों और आदर्श पूर्ण मूल्यों को बनाए रखे। यह एक चुनौती है। शासकीय इकाइयां मात्र सहायता कर सकती हैं, अन्यथा इस चुनौती से स्वयं साहित्यकारों को निपटना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि वे साहित्य सृजन करने में एआई के छल का सहारा न लें, वर्तमान बाल मनोविज्ञान को समझें और पारंपरिक मूल्यों व संस्कारों को आधुनिक प्रवृतियों के साथ इस प्रकार समायोजित करें कि वह बच्चों को मनोरंजन और शिक्षा एक साथ मिल सके तथा उनमें पुस्तक पढ़ने के प्रति रुचि जाग सके।
कथाकार गोकुल सोनी ने पांपरिक कलेवर की कथाओं को बड़ी रोचकता से आधुनिक वैज्ञानिकता से जोड़ दिया है जिससे वे ज्ञानवर्द्धन तथा समसामयिकता की शर्तों को अच्छी तरह से पूरा करती हैं। इस संदर्भ में “आश्वति” के अंतर्गत मनीष गुप्ता, निदेशक, इंद्रा पब्लिशिंग हाउस, भोपाल ने संग्रह की विशेषताओं को बखूबी रेखांकित किया है। उन्होंने लिखा है कि “श्री गोकुल सोनी साहित्य जगत में एक जाना पहचाना नाम है। मैं उनके सदैव कुछ नया सोचने और कुछ नया करते रहने की विलक्षण क्षमता का कायल हूं। वे चाहे व्यंग्य लिखें, गीत, कविता, लघुकथा या कहानी लिखें उसमें रोचकता और पठनीयता तो होती ही है, उनके विषय अक्सर ऐसे होते हैं जो दूसरों की दृष्टि से छूट गए होते हैं। प्रस्तुत पुस्तक ष्दादू का पिटाराष् जिसको ‘जादू का पिटारा’ भी कहें तो अतिशयोक्ति न होगी, क्योंकि इस बाल कहानी संग्रह की कहानियों में जहां आज के समय की नवीनतम टेक्नालॉजी से खेल खेल में परिचित कराती कहानियां, जैसे ड्रोन, साइबर फ्रॉड, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, के सिद्धांतों पर आधारित जादू की कहानियां हैं तो वहीं मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कैसे बढ़ाएं, बीमारियों से बचाव कैसे करें, हमारा स्वस्थ आहार कैसा हो, ग्रामीण परिवेश, संस्कृति, तीज त्यौहार, भी हैं। छोटे बच्चों की मन को लुभाने वाली शैतानियां हैं, तो किशोर वय के बच्चों को ऐसी कहानियां भी हैं जो उनको अपने कैरियर को चुनने में मार्गदर्शक सिद्ध होंगी।”

संग्रह में कुल 24 कहानियां हैं जिनमें अन्वय और जूते, अन्वय मंदिर में, अर्जुन और केंचुआ, मकर संक्रांति, चलें गांव की ओर, ज्न्म दिन, गुलेल, ड्र्ोन दीदी, गुमशुदा तारे, लालच की सजा, सावधानी हटी दुर्घटना घटी जैसी विविधतापूर्ण कहानियां हैं। “ग्राम्य-जीवन-परिदृश्य की कहानियाँ वैज्ञानिक सोच के साथ” शीर्षक से महेश सक्सेना निदेशक,बाल कल्याण एवम बाल साहित्य शोध केंद्र,भोपाल ने लिखा है कि “यूँ साधारण से दिखने वाले श्री गोकुल सोनी मध्यप्रदेश के प्रतिभावान, प्रभावशाली, साहित्यिक प्रतिभा के असाधारण व्यक्ति है। वे एक कवि, लेखक, लोकभाषा बुन्देली के अध्येता, कथाकार, पैनी लघुकथा के सर्जक तो हैं ही, लेकिन एक उत्कृष्ट व्यंग्यकार तथा समीक्षक की उनकी विशिष्ट पहचान है। प्रायः वे छोटे-बड़े आयोजनों में किसी भी विधा की पुस्तक पर समीक्षात्मक आलेख पढ़ते हुये नजर आते हैं। उनके हर समीक्षात्मक आलेख से रचना और रचनाकार का कद बढ़ता है तथा समुचित मार्गदर्शन भी मिलता है।”

  डॉ. विकास दवे, निदेशक, साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश शासन, भोपाल ने संग्रह की कहानियों को “बालमन से सरोकार रखती, चिंतन से उपजी कहानियां” कहते हुए लिखा है कि “इस पुस्तक की सबसे अच्छी बात है, रचनाओं का बालमन से सरोकार। उस पर ‘सोने पर सुहागा’ यह कि वे आत्यंतिक मानवीय चिंतन प्रक्रिया से उपजी हैं। ये इस पुस्तक की दो सशक्त भुजाएं हैं। गोकुल जी लंबे समय से लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। विविध विधाओं में लेखन करते हैं। आपके परिश्रम की यह सुंदर परिणीति बाल साहित्य विधा में प्रथम प्रयास है जो अप्रतिम बन पड़ेगी इसमें कोई संशय नहीं।”

    गोकुल सोनी ने अपने इस बाल कहानी संग्रह के स्वरुप में आने के परिप्रेक्ष्य में लिखा है कि “बच्चों के लिए कहानियां और कविताएं में काफी समय से लिखता आ रहा हूं, कुछ प्रकाशित भी हुई हैं परंतु ऐसा कभी कभार ही होता था। सदैव मुझे भ्रातावत स्नेह देने वाले आदरणीय श्री महेश सक्सेना जी ने मुझसे पिछले वर्ष एक आग्रह किया कि सोनी जी, जब आप प्रत्येक विधा में लिखते हैं तो बाल साहित्य की भी कोई पुस्तक आपकी आना चाहिए। मैंने उनके आग्रह को आदेश मानते हुए उनसे वायदा किया कि मेरा पूर्ण प्रयास होगा कि एक वर्ष में कम से कम एक बाल साहित्य की पुस्तक आपको अवश्य भेंट करूँगा। उसी प्रेमाग्रह का परिणाम है यह बाल कहानी की पुस्तक। इन कहानियों के विषयों का अनुमोदन भी उनसे कराया और उनका मूल्यवान मार्गदर्शन पाकर ही मैंने ये कहानियां लिखी। सरल सहज व्यक्तित्व के धनी, आत्मीय प्रेम से परिपूर्ण, बाल साहित्य के निष्णात विद्वान श्री महेश सक्सेना जी का मार्गदर्शन पाकर मैं ही नहीं, अनेकों बाल साहित्यकार पुष्पित और पल्लवित हुए हैं। मेरे लिए दूसरे मार्गदर्शक की भूमिका का निर्वाह किया मेरे आत्मीय अनुज डा. विकास दवे जी ने। ‘बालवीर’ जैसी प्रतिष्ठित बाल-पत्रिका का बतीस वर्षों तक संपादन करने वाले डा. विकास दवे जी का अनुभव संसार भी बहुत समृद्ध है।”
गोकुल सोनी ने जहां ‘‘अन्वय के जूते’’ में प्रिय लगने वाला कोई भी सामान उठा लेने की बालमनोवृति को सामने रखा है तो वहीं ‘‘अर्जुन और केंचुआ’’ में मिट्टी की उर्वरता के लिए केंचुओं के महत्व को बड़े सरल ढंग से समझाया है। ‘‘ड्रोन दीदी’’ में कृषि कार्य एवं कृषि को हुए प्रकृतिक नुकसान के आलन में ड्रोन की भूमिका को कथात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। अर्थात कहानी की कहानी और ज्ञान का ज्ञान। ‘‘गुमशुदा तारे’’ में जुगनुओं के बारे में बताया गया है। वहीं, ‘‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’’ में साइबर अपराधों और डिजिटल अरेस्ट के बारे में बताया गया है। यद्यपि यह कहानी भाई दृष्टि से तथा विषय के अनुसार बालमन से अधिक युवाओं तथा प्रौढों के लिए अधिक सटीक बैठती है किन्तु अन्य सभी कहानियां भाषाई स्तर पर बच्चों के लिए शिक्षाप्रद कहानियां हैं। इस प्रकार की कहानियां अधिक से अधिक लिखी जानी चाहिए। विशेषरूप से बालकथानकों को आधुनिक परिवेश से जोड़ कर बच्चों में कहानियों के प्रति रूचि जगाई जा सकती है। इस दृष्टि से गोकुल  सोनी का बाल कहानी संग्रह ‘‘दादू का पिटारा’’ एक उत्तम कृति है।
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Saturday, March 28, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | अब झटका जोर से लगहे, बिजली वारे अगले महिना से झटका देबे वारे आएं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
अब झटका जोर से लगहे, बिजली वारे अगले महिना से झटका देबे वारे आएं
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
     ई साल सबरे त्योहार  जल्दी- जल्दी कढ़ गए सो गर्मी को मौसम सोई तनक जल्दी आ गओ। ऊको बी लगो हुइए के पेड़-मेंड़ सो कटत जा रए सो अपन सोई मार्च के मइना से अपनो दम दिखान लगें। जो बात होए दम दिखाबे की तो बिजली के झटका से बड़ो दम तो कोनऊं को हो नई सकत। नईं-नईं, बा वारो झटका नोईं जो बिजली के तार छूबे से लगत आए। हम बा वारे झटका की कै रए जोन बिजली के बिल को छूबे से लगत आए। हऔ बिजली विभाग वारे अगली माह से जोर को झटका देबे वारे आएं। टैरिफ सो बढ़ाई रए आएं औ ऊपे से जे सोई तै कहानो के जोन ने संझा बिरियां छै से दस बजे लौं बिजली से चलत वारीं बड़ी चीजें चलाईं उने अच्छे पइसा घलहें। 
     चलो मान लओ के तेल वारे देसन में चल रई लड़ाई के चलत भए डीजल, पेटरोल पे कोनऊं संकट आ सकत आए, मनो जे बिजली वारे काए दाम बढ़ा रए। चलो जे बी मान लई के गरमी खपत बढ़बे के कारन दाम बढ़ा रए। सो का बरसात सुरू होबे पे टैरिफ कम कर देहें? रामधई! ऐसो कभऊं नईं होत के रुपइया भरे बढ़ाए गए दाम पूरे रुपइया घटे होंए। भौत करी तो आठ पईसा ने तो दस पईसा घटा के खुनखुना पकरा दओ जात आए। सो, अगली मईना से जोर को झटका खाबे को तैयार रहियो औ पसीना पोंछत रहियो। जो हो सके तो ठिलिया से ले के बरफ को गोला खात रहियो। ईसे कूलर, पंखा चलाबे की जरूरत ने परहे। जै राम जी की!
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Thank you Patrika 🙏
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Thursday, March 26, 2026

बतकाव बिन्ना की | जरूरत आए ‘‘माई’’ को मतलब समझबे की | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
जरूरत आए ‘‘माई’’ को मतलब समझबे की
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘जो कोनऊं त्योहर चलत आएं तो समै को पतो नईं परत। आज प्रथमा, सो काल दुतिया औ परों तृतिया औ जेई तरां से सप्तमें औ आठें सोई गुजर जात आएं। मनो दिन को सोई पतो नई परत के कैसे गुजर जात आए।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘हऔ बिन्ना! ऐसई करत-करत जिनगी गुजर जात आए।’’ भौजी तनस सोंसत सी बोलीं।
‘‘ऐसी काए कै रईं? ई दफा तो चैत की नवरातें बी पैले पर गईं औ बीच में तनक पानी सोई गिर गओ सो ठंडक बनी रई। नें तो जो कभऊं अप्रैल में नवरातें परत आएं तो धूप तपन लगत आए औ उपास राखबे में सोई परेसानी होत है। ई दफे तो मंदिर-दिवाला गए में गोड़े बी नईं जरे। जोन दिनां मैं ज्वाला देवी के मंदिर गई रई ऊ दिनां उतई पानी परसन लगो रओ। भौतई अच्छो सो मौसम हो गओ रओ। बाकी फसल के लाने जरूर चिंता भई रई काए से के रसता में देखी रई के फसल कट के खेतन में सूखबे खों धरी हती औ कऊं-कऊं तो खड़ी हती। मने कटाई बी नईं भई रई।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘जा सब तो ठीक आए बिन्ना मनो जे देखो के अपने इते नौ-नौ दिन लौं देवी माई की पूजा होत आए। सबरे लुगवा सोई माई की पूजा करत आएं, उपास रखत आएं। कोऊ-कोऊ तो नौ दिनां चप्पलें नईं पैनत, दाढ़ी नईं कटात औ धरती पे सोऊत आएं। मनो माई खों प्रसन्न करबे के लाने खूब-खूब जतन करत आएं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, जे तो आप सांची कै रईं। मनो लुगाइयां सोई नौ दिनां उपवास राखत आएं। कोऊ फलाहारी करत आएं तो कोऊ निरजला लौं रैत आएं। माई को खुस को नईं करबेा चात आए? सबई चात आएं के माई की किरपा उनपे बनी रए।’’ मैंने कई।
‘‘जेई तो बात आए बिन्ना, के एक तरफी तो सब चात आएं के माई की किरपा उनपे बनी रए औ दूसरी तरफी बे मरई को मतलब नईं समझत आएं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘का मतलब आपको? तनक खुल के बोलो आप।’’ मैंने कई।
‘‘हम का खुल के बोलें? सब कछू तो आंगू में खुलो डरो।’’ भौजी बोलीं।
‘‘मनो मोए समझ नईं पर रई के आप का कैबो चा रईं? सो तनक जे सोई बताओ के जे आप काए के बारे में कै रईं?’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘अरे, मोए तो रै-रै के बोई खयाल परत आए के बा बिचारी खों कैसो लगो हुइए जब ऊके घरवारे ने ई ऊको मारो औ गाड़ी में बार दऔ।’’भौजी बोलीं।
‘‘कऊं आप बा डाक्टर वारी घटना की तो नईं कै रईं?’’मैंने भौजी से पूछी।
‘‘हऔ, ओई की बात कर रई। कैसो राकस डाक्टर रओ ऊ?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ बा घटना के बारे में मैंने सोई पढ़ी रई औ मोए बी बुरौ लगो रऔ।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘नईं, तुमई सोचो बिन्ना के जो का मतलब भओ? एक तरफी तो सबई जने माई की पूजा करत आएं। औ कओ बी जात आए के जां लुगाई की इज्जत होत आए उते देवता रैत आएं। औ इते तो लुगाइयन की इज्जत का, जान को ठौर नइयां। अरे तुमें नईं पुसा रई तो छोड़ो। छोर-छुट्टी करा लेओ औ दूसरी राख लेओ। जे का के तुमे अब नई पुसा रई सो तुमने ऊको मार के ठिकाने लगा दओ। का बा इंसान नोंई? कोनऊं सामान आए का के बोर हो गए सो तोड़-ताड़ के कूडा में मेंक दओ, ने तो बार दओ। बा जोन डाक्टर ने अपनी लुगाई खों कार में बार दओ, अबे तो पतो परहे के मार के बारो के बारत समै बा जिन्दा हती?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ भौजी! कोन टाईप के होत आएं जे ओरें जो कोऊ खों ऐसे मारबे को करेजा रखत आएं। इते ब्लड टेटस्ट के लाने जाओ तो खून नईं देखो जात आए। मैं तो अपनों मों दूसरी तरफी फेर लेत आओं। बा तो भौतई बुरौ करो बा नीच आदमी ने। ऊको तो डाक्टर कैबे में डाक्टरन को अपमान होत आए।’’ मैंने कई।
‘‘एक बोई का? अखबार उठा के देख लेओ, मुतकी खबरे मिल जैहें ई टाईप की। कऊं दहेज के लाने मार डारत आएं तो कऊं इज्जत लूट के बार देत आएं तो कऊं खाली दूसरी लाबे के चक्कर में निपटा देत आएं। मनो लुगाई ने भई कोनऊं बेजान चीज हो गई के मन भर गओ तो तोड़-मोड़ के मेंक दओ। ऊपे दम भरत आएं माई की पूजा की। अरे, जोन समाज में ऐसे लुगवा रैत होंए ऊपे माई काए खों प्रसन्न हुइएं?’’ भौजी तनक गुस्सा सी करत भई बोलीं। मनो उनकी बात सांची हती।
‘‘आप सई कै रईं भौजी, जो माई खों समझबे को दम भरत आएं उने लुगाई की जान की बी इज्जत करो चाइए। हमें तो जे देख के लगत आए के अपने ई समाज में धरम खों समझबे वारे कित्ते आएं औ धरम के नांव पे ठेकेदारी करबे वारे कित्ते आए? अब आपई देखो के ज्यादा से ज्यादा व्रत त्योहार अपन ओरन मने लुगाइन के करे से चल रए। या तक के मैंने देखी आए के कई मंदिरन में मंगल के मंगल सुंदरकांड को पाठ करो जात आए, बा बी लुगाइयां करत आएं। कम से कम बजरंगबली के लाने तो लुगवों खों टेम निकारने चाइए। पैले जोई होत्तो, मंगलवार खों लुगवा हरें मंदर में भजन गाउत्ते और बजरंबली की पूजा करत्ते। अब उने मोबाईल पे टिपियाबे से फुरसत नइयां।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘औ का, जेई से तो जे सब कांड होन लगे। औरन बी मोबाईल पे बा न्यूज देख-सुन लई औ अगली पोस्ट पे बढ़ गए। कोन खों परी के ऊके विरोध में कछू हल्ला-गुल्ला करें। जितनी बहस फिलम पे होत आए उत्ती तो ई टाईप की घटना पे लौं नई होत। औ ईके लाने अपन लुगाइयां सोई जिम्मेवार कहाईं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘बा कैसे?’’ मैंने पूछी।
‘‘बा ऐसे के अपन माई के नौ रूपों की पूजा तो करत आएं मनो उनके घांईं बनबे की सोचत बी नइयां। तनक अपने भीतरे जो माई को भाव ले आवें सो कोन की हिम्मत के अपन खों कछू कर सके। बोलो सई कई के नईं?’’ भौजी ने मोसे पूछी।
‘‘बिलकुल सई कै रई आप। का आए के डरने या घबड़ाने का नईं, हिम्मत से मुकाबला करबे की जरूरत आए। जो कोनऊं बदमाशी करे सो ऊको इूंसई-ठूंसा मारो फेर देखो माई कैसे साथ देत आएं।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘जेई लाने ई दफा सो हमने माई से जेई मांगो के सगरे लुगवा औ लुगाइयन खों बुद्धी दे माई औ लुगाइयन खों तनक बुद्धी के संगे शक्ति देंवें के बे जो खतरा देखें तो बुद्धी से काम लेवें। पैले खुद सामना करें औ जो लगे के मदद की जरूरत आए तो संकोच ने करें औ सबई से मदद मांगे। कुट-पिट के बाथरूम में अपट परी कैबे से काम ने चलहे। इसे बुरै इंसानों के हौसले बढ़त आएं। काए सई कई के नईं?’’ भौजी बोलीं।
‘‘बिलकुल सई भौजी। जब तक सबरे जे ने समझहें के माई को मतलब का आए तब तक खाली पूजा करे से कछू ने मिलहे। सबई खों माई को मतलब समझबे की जरूरत आए।’’ मैंने कई।  
आकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के आप ओरें माई को मतलब कित्तो समझत हो?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, March 25, 2026

चर्चा प्लस | स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं माता दुर्गा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चाप्लस 
स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं माता दुर्गा
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह                            
   नवरात्रि...नौ दिन देवी दुर्गा के नौ रूपों की स्तुति... दुर्गा जो स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं, असुरों का विनाश करने की  क्षमता रखती हैं... किन्तु इस बात पर विश्वास करना ही र्प्याप्त है क्या? सिर्फ़ सोचने या मानने से नहीं बल्कि करने से कोई भी कार्य पूरा होता है। इसलिए यदि आज स्त्री प्रताड़ित है, अपराधों का शिकार हो रही है तो उसे अपनी शक्ति को पहचानते हुए स्वयं दुर्गा की शक्ति में ढलना होगा। डट कर समाना करना होगा स्त्रीजाति के विरुद्ध की समस्त बुराइयों का और स्त्री का सम्मान करना सीखना होगा समस्त पुरुषों को, तभी नवरात्रि का अनुष्ठान सार्थक होगा।


या देवि सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
मां दुर्गा की उपासना करते समय जिस स्त्रीशक्ति का बोध होता है वह उपासना के बाद स्मरण क्यों नहीं रहता? न स्त्रियों को और न पुरुषों को। समाचारपत्रों में आए दिन स्त्री के विरुद्ध किए गए जघन्य अपराधों के समाचारों भरे रहते हैं। कभी तेजाब कांड तो कभी दहेज हत्या तो कभी बलात्कार और बलात्कार के बाद नृशंसतापूर्वक हत्या। ये घटनाएं हरेक पाठक के दिल-दिमाग़ को झकझोरती हैं। बहुत बुरा लगता है ऐसे समाचारों को पढ़ कर। समाज में आती जा रही चारित्रिक गिरावट को देख कर अत्यंत दुख भी होता है लेकिन सिर्फ़ शोक प्रकट करने या रोने से समस्या का समाधान नहीं निकलता है। देवी दुर्गा का दैवीय चरित्र हमें यही सिखाता है कि अपराधियों को दण्डित करने के लिए स्वयं के साहस को हथियार बनाना पड़ता है। जिस महिषासुर को देवता भी नहीं मार पा रहे थे उसे देवी दुर्गा ने मार कर देवताओं को भी प्रताड़ना से बचाया।

नवरात्रि के दौरान लगभग हर हिन्दू स्त्री अपनी क्षमता के अनुसार दुर्गा के स्मरण में व्रत, उपवास पूजा-पाठ करती है। अनेक महिला निर्जलाव्रत भी रखती हैं। पुरुष भी पीछे नहीं रहते हैं। वे भी पूरे समर्पणभाव से मां दुर्गा की स्तुति करते हैं। नौ दिन तक चप्पल-जूते न पहनना, दाढ़ी नहीं बनाना आदि जैसे सकल्पों का निर्वाह करते हैं। लेकिन वहीं जब किसी स्त्री को प्रताड़ित किए जाने का मामला समाने आता है तो अधिकांश स्त्री-पुरुष तटस्थ भाव अपना लेते हैं। उस समय गोया यह भूल जाते हैं कि आदि शक्ति दुर्गा के चरित्र से शिक्षा ले कर अपनी शक्ति को भी तो पहचानना जरूरी है।
किसी भी प्रकार की प्रताड़ना या हिंसा का स्त्रीसमाज पर शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक दुष्प्रभाव पड़ता है। इसके कारण महिलाओं के काम तथा निर्णय लेने की क्षमता पर प्रभाव पड़ता है। परिवार में आपसी रिश्तों और आसपड़ौस के साथ रिश्तों व बच्चों पर भी इस हिंसा का सीधा दुष्प्रकभाव देखा जा सकता है। इससे स्त्रियों की सार्वजनिक भागीदारी में बाधा पड़ती है और वे स्वयं को अबला समझने लगती हैं। जबकि इसके विपरीत मां दुर्गा का चरित्र उन्हें दृढ़ और सबल होने का संदेश देता है।

हिन्दुओं के शाक्त साम्प्रदाय में भगवती दुर्गा को ही दुनिया की पराशक्ति और सर्वोच्च देवता माना जाता है। उल्लेखनीय है कि शाक्त साम्प्रदाय ईश्वर को देवी के रूप में मानता है। वेदों में तो दुर्गा का व्यापाक उल्लेख है। उपनिषद में देवी दुर्गा को “उमा हैमवती“ अर्थात् हिमालय की पुत्री कहा गया है। वहीं पुराणों में दुर्गा को आदिशक्ति माना गया है। वैसे दुर्गा शिव की अर्द्धांगिनी पार्वती का एक रूप हैं, जिसकी उत्पत्ति राक्षसों का नाश करने के लिये देवताओं की प्रार्थना पर पार्वती ने धारण किया था देवी दुर्गा के और भी कई रूपों की कल्पना की गई है। दुर्गा सप्तशती में दुर्गा के कई रूप भी बताए गए है, जैसे- ब्राह्मणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नरसिंही, ऐन्द्री, शिवदूती, भीमादेवी, भ्रामरी, शाकम्भरी, आदिशक्ति, रक्तदन्तिका।

दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं, जिसमें 700 श्लोकों में देवी-चरित्र का वर्णन है। मुख्य रूप से ये तीन चरित्र हैं, प्रथम चरित्र (प्रथम अध्याय), मध्यम चरित्र (2-4 अध्याय) और उत्तम चरित्र (5-13 अध्याय)। प्रथम चरित्र की देवी महाकाली, मध्यम चरित्र की देवी महालक्ष्मी और उत्तम चरित्र की देवी महासरस्वती मानी गई है। यहां दृष्टव्य है कि महाकाली की स्तुति मात्र एक अध्याय में, महालक्ष्मी की स्तुति तीन अध्यायों में और महासरस्वती की स्तुति नौ अध्यायों में वर्णित है, जो सरस्वती की वरिष्ठता, काली (शक्ति) और लक्ष्मी (धन) से अधिक सिद्ध करती है। मां दुर्गा के तीनों चरित्रों से संबंधित तीन रोचक कहानियां भी हैं-
प्रथम चरित्र - बहुत पहले सुरथ नाम के राजा राज्य करते थे। शत्रुओं और दुष्ट मंत्रियों के कारण उनका राज्य, कोष सब कुछ हाथ से निकल गया। वह निराश होकर वन से चले गए, जहां समाधि नामक एक वैश्य से उनकी भेंट हुई। उनकी भेंट मेधा नामक ऋषि के आश्रम में हुई। इन दोनों व्यक्तियों ने ऋषि से पूछा कि यद्यपि हम दोनों के साथ अपने लोगों (पुत्र, मंत्रियों आदि) ने दुर्व्यवहार किया है फिर भी उनकी ओर हमारा मन लगा रहता है। मुनिवर, क्या कारण है कि ज्ञानी व्यक्तियों को भी मोह होता है। ऋषि ने कहा कि यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, भगवान विष्णु की योगनिद्रा ज्ञानी पुरुषों के चित्त को भी बलपूर्वक खींचकर मोहयुक्त कर देती है, वहीं भगवती भक्तों को वर देती है और ’परमा’ अर्थात ब्रह्म ज्ञानस्वरूपा मुनि ने कहा, ’नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिद ततम्’ अर्थात वह देवी नित्या है और उसी में सारा विश्व व्याप्त है। प्रलय के पश्चात भगवान विष्णु योगनिद्रा में निमग्न थे तब उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो असुर उत्पन्न हुए। उन्होंने ब्रह्माजी को आहार बनाना चाहा। ब्रह्माजी उनसे बचने के लिए योगनिद्रा की स्तुति करने लगे। तब देवी योगनिद्रा उन दोनों असुरों का संहार किया।

मध्यम चरित्र - इस चरित्र में मेधा नामक ऋषि ने राजा सुरथ और समाधि वैश्य के प्रति मोहजनित कामोपासना द्वारा अर्जित फलोपभोग के निराकरण के लिए निष्काम उपासना का उपदेश दिया है। प्राचीनकाल में महिषासुर सभी देवताओं को हराकर स्वयं इन्द्र बन गया और सभी देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया। वे सभी देवता- ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के पास सहायतार्थ गए। उनकी करुण कहानी सुनकर विष्णु और शंकर के मुख से तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार का तेज अन्य देवताओं के शरीर से भी निकला। यह सब एक होकर देवी रूप में परिणित हुआ। इस देवी ने महिषासुर और उनकी सेना का नाश किया। देवताओं ने अपना अभीष्ट प्राप्त कर, देवी से वर मांगा। ’जब-जब हम लोगों पर विपत्तियां आएं, तब-तब आप हमें आपदाओं से विमुक्त करें और जो मनुष्य आपके इस चरित्र को प्रेमपूर्वक पढ़ें या सुनें वे संपूर्ण सुख और ऐश्वर्यों से संपन्न हों।’ महिषासुर को मार कर देवी ‘महिषासुरमर्दिनी’ कहलाईं।

उत्तम चरित्र - उत्तम चरित्र में परानिष्ठा ज्ञान के बाधक आत्म-मोहन, अहंकार आदि के निराकरण का वर्णन है। पूर्व काल में शुंभ और निशुंभ नामक दो असुर हुए। उन्होंने इन्द्र आदि देवताओं पर आधिपत्य कर लिया। बार-बार होते इस अत्याचार के निराकरण के लिए देवता दुर्गा देवी की प्रार्थना हिमालय पर्वत पर जाकर करने लगे। देवी प्रकट हुई और उन्होंने देवताओं से उनकी प्रार्थना करने का कारण पूछा। कारण जानकर देवी ने परम सुंदरी ’अंबिका’ रूप धारण किया। इस सुंदरी को शुंभ-निशुंभ के सेवकों चंड और मुंड ने देखा। इन सेवकों से शुंभ-निशुंभ को सुंदरी के बारे में जानकारी मिली और उन्होंने सुग्रीव नामक असुर को अंबिका को लाने के लिए भेजा। देवी ने सुग्रीव से कहा, ’जो व्यक्ति युद्ध में मुझ पर विजय प्राप्त करेगा, उसी से मैं विवाह करूंगी।’ दूत के द्वारा अपने स्वामी की शक्ति का बार-बार वर्णन करने पर देवी उस असुर के साथ नहीं गई। तब शुंभ-निशुंभ ने सुंदरी को बलपूर्वक खींचकर लाने के लिए धूम्रलोचन नामक असुर को आदेश दिया। धूम्रलोचन देवी के हुंकार मात्र से भस्म हो गया। फिर चंड-मुंड दोनों एक बड़ी सेना लेकर आए तो देवी ने असुर की सेना का विनाश किया और चंड-मुंड का शीश काट दिया, जिसके कारण देवी का नाम ’चामुंडा’ पड़ा। असुर सेना का विनाश करने के बाद देवी ने शुंभ-निशुंभ को संदेश भेजा कि वे देवताओं को उनके छीने अधिकार दे दें और पाताल में जाकर रहें, परंतु शुंभ-निशुंभ मारे गए। रक्तबीज की विशेषता थी कि उसके शरीर से रक्त की जितनी बूंदें पृथ्वी पर गिरती थीं, उतने ही रक्तबीज फिर से उत्पन्न हो जाते थे। देवी ने अपने मुख का विस्तार करके रक्तबीज के शरीर का रक्त को अपने मुख में ले लिया और असुर का सिर काट डाला। इसके पश्चात शुंभ और निशुंभ भी मारे गए और तब देवताओं ने स्तुति की-
सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरी विनाशम्।।

हमें यह विचार करना ही होगा कि पूजा-अर्चना द्वारा हम देवी के इन चरित्रों का आह्वान करते हैं तो फिर देवी के इन चरित्रों से प्रेरणा ले कर उन लोगों पर शिकंजा क्यों नहीं कस पाते हैं जो असुरों जैसे कर्म करते हैं? क्या हम इन प्रेरक कथाओं के मर्म को समझ नहीं पाते हैं अथवा समझना ही नहीं चाहते हैं? बहरहाल, एक और रोचक कथा है- राजा सुरथ और समाधि वैश्य दोनों ने देवी की आराधना की। देवी की कृपा से सुरथ को उनका खोया राज्य और वैश्य का मनोरथ पूर्ण हुआ। उसी प्रकार जो व्यक्ति भगवती की आराधना करते हैं उनका मनोरथ पूर्ण होता है। ऐसी मान्यता है कि दुर्गा सप्तशती के केवल 100 बार पाठ करने से सर्वार्थ सिद्धि प्राप्त होती है। इस मान्यता को व्यवहारिकता में ढालते हुए यदि स्त्रियों के हित में अपनी शक्ति को पहचान कर अपराधों का प्रतिकार किया जाए तो यह मां दुर्गा की सच्ची स्तुति होगी।         
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(दैनिक, सागर दिनकर में 25.03.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, March 24, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | होंए जालपा चाए ज्वाला माई,परन न देवें दुख की छांई | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
होंए जालपा चाए ज्वाला माई,परन न देवें दुख की छांई
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
चैत की नवरातें आतई साथ पूरे सागरे में देवी मैया के जयकारे गूंजने लगत आएं। चाए दीनदुखी होंएं, चाए सुखी मानुस, सबई माता के दोरे पे माथा टेकबे के लाने निकर परत आएं। कोऊ रानगिर वारी हरसिद्धि माई के लिंगे जात आए तो कोऊ बाघराज वारी हरसिद्धि माई के इते। ऊंसई अपने सागरे में माई के दरबार चारों खूंट में आए। जेई लाने तो भगतें गाई जात आएं के-
होंए जालपा चाए ज्वाला माई। परन ना देवें दुख की छांई ।।
   सागर से खुरई जात में जरुआखेड़ा से जलंधर के लाने रोड  कटत आए। आप जोन जलंधर पौंचे सो मनो ज्वाला देवी के दरबार के दोरे पे पौंच गए। उते ऊंची पहरिया पे माई को मंदिर आए। जो छिड़ियां चढ़ के ऊपरे ज्वालामाई के दरबार में पौंचो तो भौतई अच्छो लगत आए, काए से उते से चारो तरफी पहरियां दिखात आएं। बे पहरियां बी अबे जंगल वारी आएं। ज्वालामाई की सौं, उते भौतई नोनों लगत आए। ऐसो लगत आए के उते सजीवन माता उतर आई होंए।
   मनो होत का आए के जां सब साफ-सुथरो होय, लोग बी नोने जी से कऊं पौंचें तो उते देवी मैया को वास सो फील होत आए। माता सो माता आएं, बे अपने बच्चन खों चाए दो लपाड़े लगा लेवें मनो कभऊं साथ नईं छोरत आएं। मनों अपन ऐसो काम काए खरें के माई अपन खो थपड़िआएं। कैबे को मतलब जे के जो अपन अपने पूरे सागरे खों साफ-सुथरो औ अच्छो राखें तो हरसिद्धि माई, जालपा माई औ ज्वाला माई सबई की किरपा अपने सहर पे बनी रैहे।  सो, बोलो जै माई की!    
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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पुस्तक समीक्षा | बुंदेली की मिठास में डूबा काव्य संग्रह ‘‘बुंदेली बानी’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
बुंदेली की मिठास में डूबा काव्य संग्रह ‘‘बुंदेली बानी’’
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - बुंदेली बानी
कवयित्री - डॉ. कुंकुम गुप्ता
प्रकाशक-संदर्भ प्रकाशन,भोपाल
मूल्य -200/- 
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प्रत्येक बोली कि अपनी विशेषता और अपनी मिठास होती है। बुंदेली बोली भी इसी तरह से अपने क्षेत्रीय मिठास लिए हुए हैं जो सुनने और पढ़ने वाले के मन को सहज ही स्पर्श करती है। बोलियां जहां एक ओर संस्कृति की संवाहक होती हैं वही निज गौरव और आत्मीयता का भी बोध कराती हैं। डॉ कुंकुम गुप्ता ने बुंदेली बोली की मिठास को अपनी कविताओं में प्रस्तुत करते हुए बुंदेली संस्कृति को भी सहेजा है। उनके काव्य संग्रह का नाम है “बुंदेली बानी”। 
“बुंदेली बानी” में कुल 51 कविताएं हैं, जिनमें संस्कृतिस सामाजिकता, प्रकृति, राष्ट्रीयता तथा आध्यात्मिकता के साथ ही हास्य और प्रेम के संवेग भी समाहित हैं। हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं वर्तमान में प्राचार्य, पं. दीनदयाल उपाध्याय शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय सागर (म.प्र.) प्रो. सरोज गुप्ता ने संग्रह की प्रस्तावना लिखते हुए डॉ. कुंकुम गुप्ता की रचना धर्मिता के साथ उनका संक्षिप्त परिचय भी प्रस्तुत किया है। डॉ सरोज गुप्ता के शब्दों में- “डॉ कुंकुम गुप्ता साहित्य जगत में बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न रचनाकार हैं। साहित्य की विभिन्न विधाओं कविता, कहानी, निबन्ध, समीक्षा, संस्मरण, बाल साहित्य आदि में लेखनी चलाने के साथ नित नूतन प्रयोग करने की कला में दक्ष हैं। आपकी रचनाओं में बुन्देलखण्ड की माटी की सौंधी महक, सहजता, सरलता, उदारता, भावों में सम्प्रेषणीयता के साथ जन्मभूमि के प्रति समर्पण, बुन्देली और बुन्देली संस्कृति से जुड़ाव दृष्टव्य है। आप राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त परिवार में जन्मीं, बखरी में दद्दा जी, बापू जी के प्यार दुलार के साथ बचपन में अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों से सहज संपर्क से उनके साहित्यिक संस्कारों को आत्मसात करते हुए न सिर्फ अपनी रचनाधर्मिता को जीवन्त बनाये हुए हैं वरन् अपनी रचनाओं के माध्यम से हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि कर रही हैं। डॉ. कुंकुम गुप्ता समाज की गतिविधियों, लोक व्यवहारों का यथार्थ पूरी ईमानदारी के साथ प्रस्तुत करती हैं।”
डॉ. कुंकुम गुप्ता सौभाग्यशाली हैं कि वे राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त की वंशज हैं। साहित्य प्रेम उनकी धमनियों में प्रवाहित होना स्वाभाविक है। डाॅ कुंकुम गुप्ता लेखिका संघ मध्यप्रदेश की प्रांतीय अध्यक्ष हैं। वे अन्य महिला रचनाकारों को अपनी संस्था के अंतर्गत निरंतर प्रोत्साहित करती रहती हैं। अपनी रचनाशीलता के बारे में डॉ. कुंकुम गुप्ता ने “आत्मकथ्य” में लिखा है- “मेरा बचपन झाँसी जिले के चिरगाँव में बीता इसलिए बुंदेली परिवेश, पर्वों, लोकगीतों, परम्पराओं आदि से लगाव रहा है। भोपाल आकर जब साहित्यकारों से बुंदेली, निमाड़ी, मालवी आदि में कविताएँ सुनीं तो मेरे मन में भी यह जिज्ञासा जागृत हुई कि मैं भी बुंदेली में रचनाएँ लिखूँ। मध्यप्रदेश लेखक संघ की लोक भाषा गोष्ठी में भी कविता सुनाने का अवसर मिला तो कुछ आत्मविश्वास जागा और हिन्दी लेखिका संघ में भी बुंदेली में कविताओं को पढ़ा जिसको सराहना मिली इससे मेरा उत्साहवर्धन हुआ।”
बोलियों की यह विशेषता होती है कि हर दस कोस में बोली के कुछ शब्द बदल जाते हैं। जैसे बुंदेलखंड में पन्ना की तरफ बेटियों को “बिन्ना” कहा जाता है जबकि ललितपुर, झांसी के तरफ उन्हें “बिन्नू” कहकर पुकारा जाता है इसीलिए कुंकुम गुप्ता जी की प्रथम कविता का शीर्षक है “बिन्नू काए रिसानी”। इस कविता में कवयित्री ने बालिका शिक्षा सहित बालिका के अधिकारों की बात बहुत सहजता से उठाई है। बानगी देखिए-
बिन्नू काय रिसानी हमसें, 
बिन्नू काय रिसानी 
बैठीं हो काय मों लटकायें, 
भर आँखन में पानी।

रोज तो तुम गैया बछियन की 
साफ-सफाई करततीं
फिर कुअलन पै पानी भरवे
सखियन संग निकरततीं
आज कछु न कर रही बिन्नू 
अब लौं करी न सानी 
बिन्नू काय रिसानी हमसें, बिन्नू काय रिसानी।

दादा भौत देख लई हमने 
बातें बड़ी तुम्हाई 
कहत कछु और करत कछु 
फिर पीछें देत सफाई
सबकी बिटियाँ आगें पढ़ रहीं 
तुमने बात न मानी 
बिन्नू काय रिसानी हमसें, बिन्नू काय रिसानी।
     जब बिन्नू अर्थात बेटियों की बात चलेगी तो सखियों की चर्चा भी होना स्वाभाविक है। बेटियों का संसार अपनी सखियों के संग से ही आरम्भ होता है। ‘‘गुइयाँ’’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां देखिए जिनमें सेहत की बातों के संग सखियों का विमर्श भी मौजूद है- 
ऐसी काय बैठी मोरी गुइयां
बैठी उदास औ लटकी मुंइयां
कछू न पूछौ हाल सखी री 
देर रात कैं खा लई घुइयाँ।
आज परहेज करौ थोड़ो सो 
लौकी बनाओ चाँय तुरइयाँ।
हरी सब्जिन को स्वाद न भावैं 
अबै उमर तो है लड़कैंया।
वादी की चीजें हमें भाउतीं 
सो गुस्सा होंय हमारे सइयाँ।
आज से सेहत कौ ख्याल करलो 
तन को दुख कोउ बाँटत नइया।
      वृद्धावस्था जीवन का एक शाश्वत सत्य है। किन्तु सामाजिक परिवर्तनों के कारण अनेक लोगों के लिए वृद्धावस्था कष्टप्रद साबित होने लगी है। इसका मूल कारण है कि युवा अपने बड़ों से विरत होने लगे हैं और वृद्धाश्रम पनपने लगे हैं। दूसरी ओर वे माता-पिता भी जो धनअर्जन करने की लिप्सा में पहले स्वयं को व्यस्त कर लेते हैं फिर बच्चों को अपने से दूर भेज देते हैं उन्हें भी कवयित्री ने चेताया है। वस्तुतः डाॅ. कुंकुम गुप्ता की ‘‘बुढ़ापा’’ कविता हर व्यक्ति को जीवन के सत्य का स्मरण कराती है-
बुढ़ापौ सबको आने है 
एक दिना मर जाने है।
जानत तो है जौ सब कोऊ 
फिर भी सीना ताने है।
कैसेउ प्रीत लगा लो सबसें 
बाद में रोने गाने है।
साठ साल के बाद सबई कौ 
जानै कबै बुलउआ आने है।
ताले कुची लगा लो कित्ती 
बनाओ कितेक तहखाने है।
जिनसे छिपा के जोड़ी माया 
उनई खौं सब हथियाने है।
   संग्रह में एक बहुत ही ‘स्वादिष्ट’ कविता भी है क्योंकि इसमें बुंदेलखंड के पारंपरिक व्यंजनों का विवरण दिया गया है। कविता की पंक्तियां कुछ इस प्रकार हैं-
बुंदेली व्यंजन की कर लैवें बात 
स्वाद इनकौ सबखौं भौतई सुहात 
बैगन का भर्ता और मौन दई गकइयाँ 
सब मिल कैं खावें पड़ौसी और गुंड्याँ 
आम की चटनी स्वाद है बढ़ात।
चूरमा के लड्डू दाल बाटी को स्वाद 
शुद्ध घी की खुशबू और बढ़िया पुलाव 
ऊपर से मठा पियो जल्दी पचात ।
समूदी रोटी खौं देख जिया डोले 
बरा मगौरा पापड़ मिश्री सी घोलें 
खीचला कचरियां कालोनी में मिलात।
      यह विशेषता है बोलियों में सृजन की कि जब कोई रचनाकार अपनी बोली में रचना करता है तो वह अपनी परंपराओं, संस्कृति, रीति-रिवाजों एवं माटी की सुगंध को उसमें पिरोना नहीं भूलता है। डाॅ कुंकुम गुप्ता ने भी अपनी बुंदेली कविताओं में समसामयिक समस्याओं पर कलम चलाते हुए बुंदेली मिठास को भरपूर संजोया है। इस तरह के काव्य संग्रह बहुतायत आने चाहिए क्योंकि यही बुंदेलखंड की संस्कृति को भविष्य तक पहुंचाने में सहायक होंगे। डाॅ. कुंकुम गुप्ता का यह बुंदेली काव्य संग्रह ‘‘बुंदेली बानी’’ इतनी सहज बुंदेली में है कि सुगमता से सभी को समझ में आ सकता है तथा हर क्षेत्र का पाठक इन कविताओं से जुड़ सकता है।      
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