Wednesday, February 11, 2026

चर्चा प्लस | पुण्यतिथि पर विशेष | पं. दीनदयाल उपाध्याय की चुनावी रणनीति का पहला उसूल था - “वोट फार पर्सन, नाट फार द पर्स” | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
पुण्यतिथि पर विशेष 

पं. दीनदयाल उपाध्याय की चुनावी रणनीति का पहला उसूल था - “वोट फार पर्सन, नाट फार द पर्स”

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पं. दीनदयाल उपाध्याय जनसंघ में एक ऐसे व्यक्ति थे जिन पर संघ अगाध विश्वास करता था। पं. दीनदयाल ने भी अपना सर्वस्व संघ के विचारों के पोषण एवं विस्तार के लिए अर्पित कर दिया था। उनकी संदेहास्पद परिस्थितियों में हुई मृत्यु पर अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में कहा था-‘‘ वे संसद के सदस्य नहीं थे लेकिन भारतीय जनसंघ के जितने सदस्य इस सदन में और दूसरे सदन में बैठे हैं उनकी विजय का, जनसंघ को बनाने का, बढ़ाने का यदि किसी एक व्यक्ति को श्रेय जाता है तो वह श्री उपाध्याय जी को है। देखने में सीधे-सादे लेकिन मौलिक विचारक, कुशल संगठनकर्ता, दूरदर्शी नेता, सबको साथ ले कर चलने का जो गुण उन्होंने अपने जीवन में प्रकट किया, वह नई पीढ़ी के लिए मार्गदर्शन का कार्य करेगा।’’ 
     वह समय था जब एक ओर डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की असामयिक संदेहास्पद मृत्यु और दूसरी ओर जनसंघ में अंतरकलह - ये दोनों कारण दीनदयाल जी को चिन्ता में डालने लगे थे। जनसंघ के अध्यक्ष पं. मौलिचन्द्र शर्मा से कार्यकर्ता रुष्ट होने लगे थे। जनसंघ के केन्द्रीय अधिकारी एकनाथ राणाडे के कारण भी संघ में असंतोष बढ़ने लगा था। इनके अतिरिक्त विभिन्न रजवाड़ों को जनसंघ से जोड़ने वाले वसंतराव ओक भी इस अंतरकलह के शिकार हुए और उन्हें जनसंघ छोड़ना पड़ा। 
एक समय ऐसा आया कि लगने लगा जैसे जनसंघ पूरी तरह टूट कर बिखर जाएगा। कलह से भ्रमित कार्यकर्ताओं ने भी संघ को छोड़ना शुरू कर दिया था। ऐसा लग रहा था कि राष्ट्रीय राजनैतिक दल का दर्जा पा लेने वाला जनसंघ जैसे नेतृत्वविहीन हो गया हो। ऐसी विकट परिस्थिति में डाॅ. रघुवीर ने जनसंघ की अध्यक्षता सम्हाल ली। दुर्भाग्यवश सन् 1962 में एक दुर्घटना में उनका निधन हो गया। इसके साथ ही एक बार फिर जनसंघ में नेतृत्व का संकट गहरा गया। लेकिन दीनदयाल जी किसी भी परिस्थिति में जनसंघ का पराभव नहीं देख सकते थे। उन्होंने डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आशाओं के अनुरूप संगठनकर्ता के रूप में सक्रिय राजनीति में भाग लेना तय किया। संघ के अन्य पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता भी उनके इस निर्णय से उत्साहित हो उठे। जनसंघ में मानों पुनः आशा की लहर दौड़ गई। किन्तु जनसंघ अंतर्कलह से पूरी तरह उबरा नहीं था, जिसका परिणाम शीघ्र ही सामने आया।

जौनपुर उपचुनाव  

दीनदयालजी जनसंघ की राजनीतिक प्रतिष्ठा को बचाने के लिए कृतसंकल्प थे किन्तु वे स्वयं एक राजनेता के रूप में चुनाव लड़ कर पद प्राप्त नहीं करना चाहते थे। सन् 1963 में लोकसभा के उपचुनाव हुए। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ने दीनदयाल जी से आग्रह किया कि वे जौनपुर से चुनाव लड़ें। दीनदयाल जी चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे किन्तु वे गुरूजी अर्थात् माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर का आग्रह भी टाल नहीं सकते थे। 
भाऊराव देवरस ने दीनदयाल जी से संबंधित अपने एक संस्मरण में लिखा है कि ‘‘हमारे तीस वर्ष के सहचर्य में उनके मन के विरुद्ध मैंने केवल एक ही बात की और वह थी उन्हें जौनपुर से लोकसभा के लिए चुनाव लड़ने को विवश करना।  सन्  1962 के लोकसभा चुनाव में वाजपेयी के हारने के कारण जनसंघ की दृष्टि से लोकसभा में एक प्रकार की रिक्तता उत्पन्न हो गई थी। उसे भरने के लिए सबकी सम्मति थी कि पण्डित जी चुनाव लड़ें। लेकिन पण्डित जी इसके लिए अपनी सहमति नहीं दे रहे थे। उनका कहना था कि मैं स्वयंसेवक और प्रचारक हूं। चुनाव लड़ना मेरे लिए उचित नहीं होगा। प्रचारक भी चुनाव लड़ते हैं, ऐसी गलत परिपाटी इससे पड़ जाएगी और भविष्य में संगठन पर इसका विपरीत असर पड़ेगा। हम सभी सहयोगियों ने एक मत से उन्हें चुनाव लड़ने के लिए कहा, तब कहीं वे माने।’’
अंततः दीनदयाल जी ने जौनपुर से नामांकन भर दिया और चुनाव की तैयारी करने लगे।  यद्यपि एक दिन उन्होंने अवसर पा कर अपने मन की बात गुरूजी से कह डाली थी कि ‘‘आपने मुझे किस झमेले में डाल दिया। मुझे प्रचारक का काम ही करने दें।’’
इस पर गोलवलकर गुरूजी ने उन्हें समझाया था कि ‘‘तुम्हारे अतिरिक्त इस झमेले में किसको डालें। संगठन के कार्य पर जिसके मन में इतनी अविचल श्रद्धा और निष्ठा है वही उस झमेले में रह कर कीचड़ में भी कीचड़ से अस्पृश्य रहता हुआ सुचारु रूप से वहां की सफाई कर सकेगा।’’
जौनपुर में जनसंघ के कार्यकर्ता जातिवादी समीकरण का सहारा लेना चाहते थे। जाधवराव देशमुख के अनुसार कार्यकर्ताओं ने दीनदयाल जी से निवेदन किया कि ‘‘कांग्रेस ठाकुरवाद चला रही है तो हम ब्राह्मणवाद चला दें। इसमें क्या हानि है? चुनाव-युद्ध में सभी कुछ क्षम्य होता है न!’’
यह सुन कर दीनदयाल जी क्रोधित हो उठे। वे कार्यकर्त्ताओं को डांटते हुए बोले-‘‘सिद्धांत की बलि चढ़ा कर जातिवाद के सहारे मिलने वाली विजय, सच पूछो तो, पराजय से भी बुरी है।’’
उनकी यह बात सुन कर वहां सन्नाटा छा गया। इस पर दीनदयाल जी ने संयत होते हुए शांत स्वर में समझाया -‘‘भाईयों! राजनीतिक दल के जीवन में एक उपचुनाव कोई विशेष महत्व नहीं रखता, किन्तु एक चुनाव में जीतने के लिए हमने यदि जातिवाद का सहारा लिया तो वह भूत सदा के लिए हम पर सवार हो जाएगा और फिर कांग्रेस और जनसंघ में कोई अंतर नहीं रहेगा।’’
दीनदयाल जी का कहना था कि राजनीति में विचारधारा, सिद्धांत, नीति और कार्यक्रमों में सुन्दर ताल-मेल चाहिए, टकराव या विरोधाभास नहीं। वे कार्यकर्ताओं के ही नहीं, अपितु जन-सामान्य के राजनीतिक प्रशिक्षण पर भी बल देते थे। वे मतपत्र को कागज का टुकड़ा न मानकर अपना अधिकार-पत्र मानने को कहते थे। इस संबंध में उनका सिद्धांत स्पष्ट था जिसे वे तीन बिन्दुओं के रूप में कार्यकर्त्ताओं एवं आमजन के समक्ष रखते थे -
1. वोट फार पर्सन, नाट फार द पर्स 
2. वोट फार पार्टी, नाट फार पर्सन 
3. वोट फार आइडियोलोजी, नाट फार पार्टी
जब चुनाव का परिणाम घोषित हुआ तो स्पष्ट हो गया कि जनसंघ में अंतर्कलह समाप्त नहीं हुआ था। जौनपुर में संघ के कुछ कार्यकर्ता ऐसे थे जो दीनदयाल जी की ‘आइडियोलोजी’ के समर्थन में नहीं थे और आरम्भ से ही चाहते थे कि दीनदयाल जी वहां से चुनाव न लड़ें। उन कार्यकर्ताओं ने दीनदयाल जी के चुनाव अभियान को सहयोग देने के बदले उनका विरोध किया था। इसका मतदाताओं के मन पर बुरा असर पड़ा और दीनदयाल जी चुनाव हार गए। किन्तु उनकी संघ के प्रति तत्परता एवं निष्ठा का देश के अन्य कार्यकर्ताओं पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। स्वयं दीनदयाल जी को इस बात का संतोष था कि भले ही वे उपचुनाव हार गए किन्तु उन्होंने अपने और संघ के सिद्धांतों को जातिवादी समीकरण की भेंट नहीं चढ़ाया। 
चुनाव में पराजय के बाद दीनदयाल जी के व्यवहार के बारे में भाऊराव देवरस ने अपने एक संस्मरण में लिखा कि ‘‘चुनाव में हारने के दूसरे दिन ही वे (दीनदयाल जी) काशी के संघ वर्ग में पहुंच गए। वहां उनका आचरण देख कर हम सभी लोग आश्चर्य पड़ गए कि इतने बड़े चुनाव में हारने वाले क्या ये ही दीनदयाल जी हैं? उनका अत्यंत सहज और शांत आचरण देख कर मैं स्वयं दंग रह गया था।’’
     चुनाव में पराजित होने के बाद पत्रकारवार्ता में एक सम्वाददाता ने उनसे प्रश्न किया कि ‘‘देश में जब कांग्रेसविरोधी वातावरण है तो आप चुनाव कैसे हार गए?’’ इस पर दीनदयाल जी ने विनम्रतापूर्वक बिना किसी संकोच के कहा कि ‘‘स्पष्ट बताऊं, मेरे विरुद्ध खड़ा कांग्रेस का प्रत्याशी एक सच्चा कार्यकर्ता है। उसने अपने क्षेत्र में पर्याप्त काम किया है, इसीलिए लोगों ने उसे अधिक मत दिए।’’
       गोलवलकर गुरूजी ने एक बार दीनदयाल जी के संबंध में कहा था ‘‘बिलकुल नींव के पत्थर से प्रारम्भ कर जनसंघ के कार्य को इतना नाम और इतना रूप देने का श्रेय यदि किसी एक व्यक्ति को देना हो तो वह दीनदयाल जी को ही देना होगा।’’
 
जनसंघ के अध्यक्ष घोषित

सरसंघ चालक गोलवलकर गुरूजी को दीनदयाल जी की क्षमता पर पूरा भरोसा था, इसीलिए दल की ओर से उन्हें सबसे बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई। सन् 1967 में जनसंघ का चौदहवां अधिवेशन कालीकट में हुआ। दल के सभी पदाधिकारियों ने एकमत से निर्णय लेते हुए दीनदयाल जी को जनसंघ का अध्यक्ष घोषित किया।
दीनदयाल जी के जनसंघ के अध्यक्ष बनने से भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हुआ। जिस जनसंघ को डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक सुदृढ़ राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में देखना चाहते थे वह जनसंघ अब वास्तव में सुदृढ़ता प्राप्त करने वाला था। दीनदयाल जी के संगठनात्मक कौशल का लाभ जनसंघ को मिलने वाला था। दीनदयाल जी के द्वारा जनसंघ का अध्यक्ष पद स्वीकार करने से भारतीय राजनीति में पड़ने वाले प्रभाव पर शिकागो विश्वविद्यालय के लिए ‘‘जनसंघ आइडियोलाॅजी एण्ड ऑरगेनाइजेशन इन पार्टी बिहेवियर’’ विषय पर किए गए अपने शोध में वाल्टर कोरफिट्ज़ एण्डरसन ने लिखा है कि ‘‘पण्डित दीनदयाल जी के सन् 1967 में जनसंघ का अध्यक्ष पद स्वीकार करने का यही अर्थ था कि दल की संगठनात्मक नींव डालने का काम पूरा हो गया है और राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रबल प्रतिस्पर्धी के नाते सत्ता की प्रतियोगिता में उतरने का उसका संकल्प है।’’
यही तथ्य वाल्टर कोरफिट्ज़ एण्डरसन एवं श्रीधर डी. दामले की पुस्तक ‘‘द ब्रदरहुड इन सेफराॅन: द राष्ट्रीय सेवक संघ एण्ड हिन्दू रीवाइवलिज़्म’’ (वेस्ट व्यू प्रेस, आई एस बी एन: 0-8133-7358-1) में सन् 1987 के संस्करण में प्रकाश में आया।
जनसंघ का अध्यक्ष बनने के बाद दीनदयाल उपाध्याय का ध्यान इस ओर गया कि जनसंघ की छवि एक हिन्दू सम्प्रदायवादी संस्था के रूप में मानी जा रही है। वे अपने दल को किसी सम्प्रदायवादी शक्ति नहीं वरन् देशभक्ति की शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहते थे। चुनावी रणनीति में भी उन्होंने स्वच्छ संकल्पना की और उसी पर अमल किया। उनके चुनावी आदर्श आज पथप्रदर्शक साबित हो सकते हैं और राजनीतिक स्वच्छता स्थापित कर सकते हैं, यदि कोई आदर्शों को आत्मसात करने का साहस करे।
(राष्ट्रवादी व्यक्तित्व श्रृंखला के अंतर्गत सामायिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित मेरी जीवनी-पुस्तक ‘‘दीनदयाल उपाध्याय’’ पर आधारित।)                
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(दैनिक, सागर दिनकर में 11.02.2026 को प्रकाशित)  
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Tuesday, February 10, 2026

पुस्तक समीक्षा | व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी जन-स्मृतियां रचता है | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा | व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी जन-स्मृतियां रचता है | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरणपुस्तक समीक्षा

व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी जन-स्मृतियां रचता है

- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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स्मारिका  - महेन्द्र फुसकेले स्मरण अंक
संपादक   - मुकेश तिवारी
प्रकाशक  - प्रगतिशील लेखक संघ सागर इकाई
मूल्य - उल्लेख नहीं।
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यदि स्व. महेंद्र फुसकेले जी के व्यक्तित्व की व्याख्या की जाए तो भगवद्गीता (12.13-14) का यह श्लोक सटीक बैठता है कि-
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च,
निर्ममो निरहंकारः समदुखसुखः क्षमी।। 
- अर्थात जो सभी प्राणियों से द्वेष नहीं करता, दयालु है, अहंकार रहित है और सुख-दुख में समान रहता है, वही वास्तव में सुसंस्कृत है। महेंद्र फुसकेले जी में सकल मानवता के प्रति दया, ममता, करुणा, धैर्य आदि सभी गुण थे। इस पर भी सबसे बड़ा गुण उनमें था सत्य की पक्षधरता का। प्रोफेशन से वे अधिवक्ता थे। श्रमिकों के प्रबल समर्थक थे तथा स्त्रियों के अधिकार एवं स्वतंत्रता के मुखर हिमायती थे। ऐसे ही व्यक्तित्व पर केन्द्रित स्मारिका का कोई औचित्य होता है।
महेंद्र फुसकेले जी के निधन (1फरवरी 2021) के उपरांत से प्रगतिशील लेखक संघ के सौजन्य से प्रतिवर्ष एक स्मारिका का प्रकाशन किया जा रहा है। महेन्द्र फुसकेले जी का व्यक्तित्व बहुमुखी प्रतिभा का धनी रहा। उन्होंने उपन्यास के माध्यम से स्त्री जीवन को जितनी सूक्ष्मता से सामने रखा, उतनी ही बारीकी से कविताओं के द्वारा स्त्री की दशा को अभिव्यक्ति दी। ‘‘आचरण’’ के इसी काॅलम के अंतर्गत स्व. डाॅ. वर्षा सिंह ने लिखा था कि ‘‘हर दौर में मानवीय सरोकारों में स्त्री की पीड़ा प्रत्येक साहित्यकार संवेदनशीलता एवं सृजन का केन्द्र रही है। सन् 1934 को जन्मे, सकल मानवता के प्रति चिंतनशील साहित्यकार एवं उपन्यासकार महेन्द्र फुसकेले ने जब कविताओं का सृजन किया तो उन कविताओं में अपनी संपूर्णता के साथ स्त्री की उपस्थिति स्वाभाविक थी। ‘तेंदू के पत्ता में देवता’, ‘मैं तो ऊंसई अतर में भींजी’, ‘कच्ची ईंट बाबुल देरी न दइओ’ नामक अपने उपन्यासों में स्त्री पक्ष को जिस गम्भीरता से प्रस्तुत किया है, वही गम्भीरता उनकी कविताओं में भी दृष्टिगत होती है। कविता संग्रह ‘स्त्री तेरे हजार नाम ठहरे’ उनके काव्यात्मक स्त्री विमर्श का एक महत्वपूर्ण पक्ष उजागर करता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो उपन्यासकार फुसकेले स्त्री की पीड़ा, संघर्ष और महत्ता को भावात्मक रूप से व्यक्त करने के लिए कविता का मार्ग चुनते हैं। .... महेन्द्र फुसकेले की कविताओं में स्त्री पर विमर्श नारा बन कर नहीं अपितु सहज प्रवाह बन कर बहता है। उनकी कविताओं में स्त्री चिंतन बहुत ही व्यावहारिक और सुंदर ढ़ंग से प्रकट हुआ है।’’
इस वर्ष की स्मारिका और अधिक विशिष्ट है क्योंकि इसमें महेंद्र फुसकेले जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के साथ ही वरिष्ठ साहित्यकार नामवर सिंह और श्री लाल शुक्ल की जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में उनका भी स्मरण किया गया है तथा प्रेमचंद एवं कबीर के साहित्य पर भी लेख सहेजे गए हैं। कबीर वे कवि थे जिनके सामाजिक सरोकार अत्यंत विस्तृत थे। उनकी साखियां आज भी बेजोड़ हैं। साथ ही, उनकी ललकार की क्षमता का आज भी कोई सानी नहीं है। जहां तक प्रेमचंद का प्रश्न है तो वे हिन्दी साहित्य के वे बिन्दु थे जहां से हिन्दी कथा साहित्य ने सच्चे अर्थ में आधुनिक कथानक में प्रवेश किया तथा उस तबके से नाता जोड़ा जिसकी ओर साहित्यकारों की कलम का ध्यान कम ही जाता था।
श्रीलाल शुक्ल की पहचान उनकी स्पष्टवादिता से रही। उन्हें कालजयी बनाया उनकी रचना ‘‘राग दरबारी’’ ने। ‘‘राग दरबारी’’ हिंदी साहित्य की एक अत्यंत प्रसिद्ध व्यंग्यात्मक रचना है, जिसे श्रीलाल शुक्ल ने 1968 में लिखा था। यह उपन्यास भारत के ग्रामीण और अर्द्धदृशहरी जीवन की राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक गिरावट का आईना है। इसकी भाषा सहज, प्रवाहमयी और तीखे व्यंग्य से परिपूर्ण है। वहीं, नामवर सिंह हिंदी साहित्यिक आलोचना के प्रकाश स्तंभ माने जाते हैं। वह प्रगतिवादी आलोचक होने के साथ-साथ नए आलोचकों में भी अपना अग्रणी स्थान रखते हैं। उन्होंने आधुनिक हिंदी साहित्य में आलोचना, संपादन, शोध, व्याख्यान और अनुवाद के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसी कारण उन्हें हिंदी साहित्य में आलोचना के ‘रचना पुरुष’ के नाम से भी जाना जाता है। हिंदी साहित्य और आलोचना को समृद्ध करने वाले नामवर सिंह को उनकी पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ के लिए वर्ष 1971 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था।
चाहे कबीर या प्रेमचंद हों, नामवर सिंह या श्रीलाल शुक्ल हों या फिर महेंद्र फुसकेले जी हों, इनका स्मरण इनके गम और कृतित्व के आधार पर ही किया जाता है, वस्तुतः व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी स्मृतियां रचता है तथा उसे कालजयी बनता है। जब व्यक्ति निज की चिंता को हाशिए पर रखकर सकल मानवता तथा विशेष रूप से उन लोगों के बारे में मनन चिंतन करता है जिन्हें समाज ने ही गौण बना दिया है तथा उनकी सदा उपेक्षा की है, तब चिंतन करने वाला व्यक्ति का व्यक्तित्व स्वतः विस्तार लेने लगता है। प्रगतिशील लेखक संघ सागर इकाई की इस स्मारिका में प्रस्तुत गद्य एवं पद्य सामग्री को पढ़कर इस तथ्य का प्रमाण हासिल किया जा सकता है। स्मारिका में महेंद्र फुसकेले जी पर पंद्रह लेख हैं- एडवोकेट के.के. सिलाकारी ने फुसकेले जीक्ष के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है “सागर के महान व्यक्तित्व श्री महेन्द्र फुसकेले”, गांधीवादी चिंतक रघु ठाकुर का लेख है  “मार्क्सवाद के प्रति सारा जीवन प्रतिबद्ध रहे कामरेड”, एडवोकेट अरविंद श्रीवास्तव ने लिखा है “कामरेड फुसकेले राजनैतिक घटनाक्रम से”। इनके साथ ही एडवोकेट ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने “श्रद्धांजलि: एक कम्युनिस्ट योद्धा”, वीरेंद्र प्रधान ने “नव लेखकों के प्रेरणास्रोत महेंद्र फुसकेले”, डॉ. मनोज श्रीवास्तव ने “स्मृतियां जो धरोहर हैं”, प्रो. एन.के. जैन ने “संघर्षशील व्यक्तित्व के धनी-फुसकेले जी”, एडवोकेट राजेश पाण्डेय ने “सत्यता के प्रतीक श्री महेंद्र फुसकेले जी” संजय गुप्ता ने “यादगार पल”, डॉ. बहादुर सिंह परमार ने “फुसकेले जी थे सर्वहारा वर्ग के मसीहा”, शैलेंद्र शैली ने “हमारे आदर्श और प्रेरक कॉमरेड”, डॉ राजेंद्र पटोरिया ने “सिद्धान्तवादी श्री महेन्द्र फुसकेले जी”, कामरेड चंद्रकुमार ने “स्मृति दिवस”, देवेंद्र सिंघई ने “बहुमुखी प्रतिभा संपन्न श्री फुसकेले जी” तथा अजित कुमार जैन ने “कॉमरेड महेन्द्र कुमार फुसकेले” अपने लेख के रूप में महेंद्र फुसकेले जी का स्मरण किया है।
नामवर सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण करते हुए जो लेख स्मारिका में प्रकाशित किए गए हैं वे हैं - “नामवरसिंह: एक साथी, एक आलोचक”(नमृता फुसकेले), “नामवर जी को मैंने देखा है” (टीकाराम त्रिपाठी)। श्रीलाल शुक्ल जी पर केन्द्रित लेख है डॉ. नमृता फुसकेले का “श्रीलाल शुक्ल जन्म शताब्दी स्मरण”।
कबीर पर लेख हैं - “मोकूँ रोए सोई जन, जो सबद विवेकी होए” (कैलाश तिवारी ‘विकल’), “कबीर के कथित स्त्री-विरोधी दोहों का सच” (डॉ सुश्री शरद सिंह), “कबीर और वर्तमान में उनकी बढ़ती प्रासंगिकता” (सतीशचंद्र पाण्डे), “क्रान्तिकारी कवि कबीर” (टीकाराम त्रिपाठी), “कबीर का दर्शन” (पेट्रिस फुसकेले)  तथा “कबीर और किसान” (कैलाश तिवारी ‘विकल’) तथा  कबीर: एक दृष्टि निक्षेप (पी.आर. मलैया)।
प्रेमचंद पर लेख इस प्रकार हैं- “प्रेमचंद की दृष्टि में प्रेम वाया - प्रेम की वेदी’’ (डॉ सुश्री शरद सिंह), “प्रेमचंद के साहित्य में मानव प्रेम एवं राष्ट्रधर्म” (डॉ. महेंद्र खरे), “प्रेमचंद वर्तमान परिदृश्य और साहित्य में प्रासंगिक है” (एडवोकेट पेट्रिस फुसकेले), “प्रेमचंद कल आज और कल”(कैलाश तिवारी ‘विकल’)।
इन सामग्रियों के अतिरिक्त दोहे, गजल, संस्मरण, कहानी, चौकड़िया, गीत, अठवाई आदि अन्य गद्य-पद्य रचनाएं समाहित हैं।
महेंद्र फुसकेले जी की जयंती पर प्रकाशित इस स्मारिका की विशेषता यह है कि इसका प्रकाशन व्यय मुख्य रूप से  फुसकेले परिवार तथा प्रगतिशील लेखक संघ की सागर इकाई के कुछ सदस्य मिलकर वहन करते हैं। स्मारिका का मुद्रण निमिष आर्ट एंड पब्लिकेशन ने किया है जो कि नयनाभिराम है। कव्हर के अंतिम भीतरी पृष्ठ पर प्रगति लेखक संघ की सागर इकाई की गतिविधियों की तस्वीरें प्रकाशित की गई हैं। कलेवर की दृष्टि से यह स्मारिका प्रकाशित कर प्रगतिशील लेखक संघ की सागर इकाई ने एक नया प्रतिमान गढ़ा है तथा एक पठनीय एवं संग्रहणीय स्मारिका प्रकाशित की है।
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Saturday, February 7, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | ने कोनऊं खों फिकर, ने कोनऊं खों परी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

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ने कोनऊं खों फिकर, ने कोनऊं खों परी
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
   आप ओरें सोच रए हुइयो के हम कोन की कै रए औ का कै रए? सो, ऐसो आए के हम अपनी ब्यथा कै रए, जो आप ओरन की सोई ब्यथा आए मनो आप ओरन खोंं ऊ तरफी ध्यानई ने जात आए। इत्ते सहूरी वारी पब्लिक औ कऊं ने हुइए जित्ती अपने ई सागर में आए। जो हम झूठी कै रए होए सो बताव हमें। हम आप ओरन खों अकेली दो रोडन पे लिवाऊत चल रए। पैली रोड आए राधा तिगड्डा से पुरानी अलंकार टॉकीज लौं की रोड। आप सोच रए हुइयो के हमने जामा मस्जिद से अम्बेडकर तिराहा की काए नईं कई? बोई रोड के इत्ते से टुकड़ा की काय कई? सो भैया, बा टुकड़ाई तो फंदा बनो डरो। बा टुकड़ा रेलपुल के नैंचे से निकरत आए। उते की रोड नाला पे बनी आए। उते बरसात में पानी भर जात्तो सो ऊके निस्तार के लाने रोड पे जाले लगा दए गए। मनो आज जे दसा आए के कोऊ जाला रोड ऊपर निकर आओ है, सो कछू रोड में नैंचें धंस गए आएं। इत्तोई नोईं एक जाला पे फथरा धरें हैं, औ बा एक तरफी से टूटो धरो है। जो कोनऊं भारी गाड़ी ऊपे से गुजरी सो बा जाला को हो जाहे राम नाम सत्त औ गाड़ी नाला में लटकी दिखाहे। 
  दूसरी रोड आए मकरोनिया से सिविल लेन की जी पे शंकरगढ़ के नजीक एक पानी की लेन को गढ़ा आए। बा बरहमेस बनो रैत आए। ऊके लिंगे से निकरो ऊको घेर के निकरने परत आए। एक तो वन-वे रोड  ऊपे घेर के निकरने में औ सकरौंदो हो जात है। मने इन दोई रोडन में एक्सीडेंट के फुल चांस। दोई में खूब भीर गुजरत आए, मनो ऐसो लगत आए के चाए परसासन होए चाए पब्लिक ने कोनऊं खों फिकर,  ने कोनऊं खों परी। सई कई न? सोंस के बताइयो!
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Thursday, February 5, 2026

डॉ (सुश्री) शरद सिंह कर्क रेखा पर

बहुत कुछ कहती हैं रेखाएं 
ज़िन्दगी   पढ़ती  हैं रेखाएं
कभी  टुकड़े  करती हैं  ये
कभी खुद जुड़ती हैं रेखाएं 
          - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
एक बार फिर कर्क रेखा पर मैं, सांची के निकट... 🚩
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Lines speak volumes
Lines read life
Sometimes they break into pieces
Sometimes the lines join together on their own
- Dr. (Ms.) Sharad Singh.
Once again on the Tropic of Cancer, near Sanchi... 🚩

बतकाव बिन्ना की | रामधई, बे गाकरें औ भरता कभऊं ने बिसरहें | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की | रामधई, बे गाकरें औ भरता कभऊं ने बिसरहें | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की  
रामधई, बे गाकरें औ भरता कभऊं ने बिसरहें
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
     आज संकारे से भौजी को फोन आओ के गांकरें बना रए, आ जाओ। दुफारी को इतई जीमियो। काय से भौजी खों पतो के मोए गांकरें भौतई पुसात आएं। जो पिसी के आटा की होए तो कोनऊं नईं, बाकी जुंडी औ बाजरे के आटा की होए तो औरई मजा आ जात आए। भौजी को न्योतो सुन के मोए लगो के बे अकेली कां लौं बनाहें, सो मैंने सोई उनके इते पैलई पौंचने की सोच लई औ झट्टई तैयार हो के उनके इते जा पौंची।
‘‘चलो भौजी मैं सोई हाथ बंटा दे हौं।’’ मैंने कई।
‘‘अरे कछू नईं हम तो अकेले बना लेते। बाकी जो अब तुम आ गई हो सो जा भंटा को भरता बनाओ, ज्यों लौं हम गाकरों के लाने आटा गूंथ लेत आएं। अपने भैयाजी खो सोई टेर लेओ। इतई गरमा-गरम बनात जाबी औ जीमत जाबी।’’ भौजी बोलीं।
मैंने भैयाजी खों टेर लगाई। बे सोई सपर-खोंर के भगवान खों अगरबत्ती लागा-लुगू के तैयार हते। मनो मोए गरमा-गरम गाकरों से कछू पुरानी यादें आ गईं।
‘‘भौजी, कछू कर लओ जाए पर मोए बा गाकरें आ लौं ने बिसरीं जोन की सुगंध मोए पन्ना में मिलत्ती।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘अच्छा, उते तुमाए इते गाकरें बनो करत रई हुइएं।’’ भौजी गाकर की लोई अपनी गदेली पे थपियात भईं बोलीं।
‘‘नईं, घरे वारी नोंईं। उते का हतो के मोरे घर के इते रओ छत्रसाल पार्क औ छत्रसाल पार्क के सामने रओ बड़ो सो मैदान। बाकी अब बा मैदान नईं बचो, लेकन ऊ टेम पे रओ। उते इतवार की बजरिया भरत्ती। भौतई बड़ी वारी। दूर-दूर से किसान हरें अपनो नाज बैलगाड़ी में भर के दो दिनां पैले से आ जात्ते। उतई एक बड़ो सो कुआ रओ। ओई कुआ के पानी से बे सपरत्ते, ओई को पानी पियत्ते, ओई पानी से खाना बनाउत्ते और बोई कुआ के पानी अपने बैलन खों पियाउत्ते। उतई कुआ के दोई तरफी बे अपनो डेरा डारत्ते। उनके संगे उनके घर की लुगाइयां ने आउत्तीं। खाली मरद हरें आउत्ते। बेई कंडा बार के दोई टेम अपने लाने गांकरें सेंकत्ते और भरता बनाउत्ते। ऊ तरफी से कढ़ो तो इत्ती नोनी सुगंध मिलत्ती के का कई जाए। पेट चाए टनटना के भरो होए, मनो लगत्तो के एकाद गाकर खाबे खों मिल जाए।’’ मैंने बताई।
‘‘फेर कभऊं खाबे खो मिली के नईं?’’ भैयाजी ने पूछी। 
‘‘मिली ना! बा कई जात आए ने के जां चाह उते राह, सो मोरो जुगाड़ बी बन गओ। भओ का के ऊ टेम पे मोरे कमल मामा जू पन्ना में हते। आप ओरें तो जानत आओ के बे बतकाव करे में उस्ताद हते। उन्ने एक किसान से दोस्ती गांठ लई। फेर एक दिनां ऊसे कई के मोरी भांजी खों तुमाए हाथ की गांकरे खाने। बा किसान भौतई खुस भओ औ ऊने मोए बड़े लाड़ से भरता औ टमाटर की चटनी के संगे गाकड़े खवाईं। औ आपके लाने बता दूं के उनके लिंगे सिल-बट्टा तो रैत नई हतो सो बे टमाटर खों कंडा में भून के हाथ से मसक-मसक के चटनी बनाऊत्ते। ऊमें हरी धनां सोई डरी रैत्ती। ऊंसी गांकरें मैंने फेर कभऊं कऊं ने खांईं। ऊको स्वादई कछू औ रैत्तो। जो आज के हिसाब से तनक सयानेपन से कई जाए तो ऊमें सई की माटी की सुगंध रैत्ती।’’ मैंने बताई।
‘‘होत आए। ऐसो सई में होत आए। हमें सोई याद पर रई के लरकपन में जब हम फुआ के इते जात्ते तो उनके इते उल्टे तवा पे रोटी सेंकी जात्तीं। मनो बोई पिसी को आटा लेकन हाथ से थपिया के उल्टो तवा पे सेंकी गई रोटियन को स्वादई कछू दूसरो रैत्तो। उते से लौट के जब अम्मा के हाथ की सीदे तवा की रोटी जीमत्ते तो बा स्वाद न मिलत्तो। हम अम्मा से कैत्ते के फुआ घांई रोटियां काए नईं बनाऊंत, तो बे हम ओरन खों डांट के कैत्तीं के उते जा के उल्टे तवा की रोटियां जीम-जीम के तुम ओरन को दिमाग उलट गओ आए। जो हम बना रए, खाने होए सो बई खाओ ने तो जाओ अपनी फुआ के घरे। अब फुआ के घरे जा के बरहमेस तो रै नईं सकत्ते, सो मों दाब के अम्मा की बनाई रोटियां खान लगत्ते।’’ भैयाजी ने हंसत भए बताई।
‘‘ऊको कल्ला कओ जात आए। बा मिट्टी को होत आए। बाकी कोनऊं के लिंगे कल्ला ने होए तो बा तवा उल्टो कर के बी रोटियां सेक लेत आए।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ तो ऐसई तो हमाए संगे रओ के हमें लकड़ी के चूला की रोटियां नोंनी लगत्तीं। फेर जब घरे गैस चूला आ गओ सो ऊपे सिकीं रोटियां हमाए गले से ने उतरत्ती। ऊ टेम पे हमाए बाबू कओ करत्ते के गैस चूला को बनो खाना मनो अच्छो तो नईं लगत, पर एक दिनां ऐसो आहे के चूला के लाने लकड़ियां ने मिलहें औ हमें जेई पे पको खाना खाने परहे। फेर भओ बी बोई। आज देख लेओ, चाए भरता बनाने होए चाए गाकरें बनाने होंए, गैस चूला पे बनत आए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘गैस चूला भर नोईं भौजी, अबतो माइक्रोवेव ओवन में बनत आए। मैं सोई भरता को भंटा ओवन में भूनत हौं। औ संगे बाटी बनाने होए तो ओवन में बनत आएं बाटियां।’’ मैंने कई।
‘‘मनो ऊको स्वाद ऊंसो सो नईं रैत जैसे कंडा में सिंकी बाटियन को होत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अब तुम ओरन ने इत्ती बतकाव कर लई गाकरों औ बाटियन की के मोरो जी कर रओ के कऊं बायरे चलें औ उतई गाकरें बना के खाएं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘सई कई भौजी। घूमें फिरे से मन अच्छो रैत आए। कछू हवा-पानी बदलो चाइए। जेई घरे पिड़े-पिड़े बोरियत सी होन लगत आए। चलो ने कछू पिलान बनाओ जाए।’’मैंने तुरतईं कई। काय से के मैं तो मनो जनम से घुमक्कड़ ठैरी। मोए घूमबो-फिरबो भौतई पुसात आए। 
‘‘हऔ, शिवरातें सोई आ रई। शिवरातों पे चलो जाए कऊं। जटाशंकर कैसो रैहे?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ चल तो सकत आएं मनो जटा शंकर में भारी भीर उमरहे, सो कऊं देहात के मेला वारे मंदिर में चलो जाए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, आपने सई कई। मेला की भीर से मोए याद आ गई के एक दार मैं मोरी दीदी  औ एक भैयाजी पन्ना में चैमुखनाथ के मेला गए। उते भौतई भीर हती। सो मैंने दीदी को हात पकर लओ औ भैयाजू ने दीदी को हात पकर लओ, के हम ओरे कऊं बिछर ने जाएं। उते भीर इत्ती के बीच में लुगााइयों को झुंड सो आओ औ बा चक्कर में भैयाजू से दीदी को हात छूट गओ। थेड़ी देर चलत-चलत दीदी की हंसी फूट परी। मैंने पूछी के का भओ? सो बे बोलीं के देखो भैयाजू कोन को हात पकरे जा रए। मैंने देखी, बे सई में एक देहातन बिन्ना को हात पकरे चले जा रए हते औ बा बिन्ना बी गजब की कहानी, जो बा उनके संगे चलत जा रई हती। फेर हम ओरें तनक तेजी से आगे बढ़े औ भैयाजू खों टोंका मारो सो उन्ने देखो के बे तो दीदी की जांगा कोऊं औ को हात पकरे जा रए हते। उन्ने तुरतईं हात छोड़ो। फेर बे सोई देर तक हंसत रए। सो जो भारी भीर होए तो कछू बी हो सकत आए। अपन तो कम भीर वारी जांगा पे चलहें।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ तो पक्को रओ। जा शिवरातें में अपने खों कऊं ने कऊं बायरे चलने।’’ भौजी बोलीं। औ उन्ने थाली परसबे को इसारा करो, सो मैंने थाली परसी सुरू करी। थारी में भंटा को भरता, आम को अथान, मूरी औ टमाटर की चटनी के संगे तनक सो नोन रखो। गिलासन में पानी भरो। तब लौं भौजी गांकरें सेंकन लगीं। कछू-कछू ओई टाईप की सुगंध रई जैसी पन्ना की बजरिया में बा किसानों के बनाबे पे लगत्ती, मनो वैसी ने हती। ऊकी बातई कछू औ हती। 
असल में होत का आए के जमीन से जुरो जो कछू होत आए बा ज्यादई अच्छो लगत आए। काए से के बा अपनी असल जिनगी से जुरी होत आएं। सो बे चीजें कैसे भुलाई जा सकत आएं। औ भूलबो बी नई चाउने। सो, हम ओरे जेई सब बतकाव करत भए जीतन लगे। 
बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। कभऊं-कभऊं आप ओरें बी अपने पांछू की जिनगी खों याद कर लओ करे। ईसे बड़ो सुख मिलत आए। सई मानो!  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, February 4, 2026

चर्चा प्लस | उम्र कोई बाधा नहीं, यह दिखा दिया ग्रैमी अवार्ड जीत कर नोबेल पुरस्कार विजेता आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस


उम्र कोई बाधा नहीं, यह दिखा दिया ग्रैमी अवार्ड जीत कर नोबेल पुरस्कार विजेता आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने


- डॉ (सुश्री) शरद सिंह


         संगीत के लिए दिया जाने वाला विश्व का प्रतिष्ठित ग्रैमी अवार्ड तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा को दिया गया है, उनके एल्बम ‘‘मेडिटेशंस’’ के लिए। यह ग्रैमी अवार्ड के इतिहास में पहली बार है कि एक आध्यात्मिक गुरु को ग्रैमी अवार्ड दिया गया है। यह दलाईलामा की विलक्षण प्रतिभा है कि उनके संगीत ने प्रोफेशनल्स को पीछे छोड़ दिया और स्थापित कर दिया कि आध्यात्म के लिए संगीत सर्वाधिक उपयुक्त माध्यम है। बेशक़ इससे चीन बौखला गया है किन्तु समूचा विश्व दलाई लामा के मानवीय विचारों पक्ष में खड़ा है। जिसका ताज़ा उदाहरण है उन्हें ग्रैमी अवार्ड दिया जाना। इसी के साथ 90 वर्षीय परम पावन दलाई लामा ने यह दिखा दिया है कि उत्साह के साथ जीने के लिए उम्र कोई बाधा नहीं होती है।


लॉस एंजेलिस में आयोजित 68वें ग्रैमी अवॉर्ड्स में इतिहास रचते हुए 90 वर्ष की आयु में दलाई लामा ने अपना पहला ग्रैमी पुरस्कार जीता। तिब्बती आध्यात्मिक गुरु को उनका यह सम्मान स्पोकन-वर्ड एल्बम ‘‘मेडीटेशंस” के लिए मिला, जिसने वैश्विक लोकप्रिय संस्कृति और आध्यात्मिक दर्शन के बीच एक दुर्लभ संगम प्रस्तुत किया। यह उपलब्धि अपनी अनोखापन के साथ-साथ अपने संदेश के कारण भी दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी है। दलाई लामा ने इस सम्मान को व्यक्तिगत उपलब्धि मानने के बजाय मानवता की साझा जिम्मेदारी की स्वीकृति बताया, जिससे यह पुरस्कार केवल एक कला-सम्मान न होकर करुणा, शांति और वैश्विक नैतिक चेतना का प्रतीक बन गया।
तेनजिन ग्यात्सो, चैदहवें दलाई लामा तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष और आध्यात्मिक गुरू हैं। उनका जन्म 6 जुलाई 1935 को उत्तर-पूर्वी तिब्बत के ताकस्तेर क्षेत्र में रहने वाले ये ओमान परिवार में हुआ था। दो वर्ष की अवस्था में बालक ल्हामो धोण्डुप की पहचान 13 वें दलाई लामा थुबटेन ग्यात्सो के अवतार के रूप में की गई। ‘‘दलाई लामा’’ उपाधि का अर्थ होता है ज्ञान का महासागर। दलाई लामा अर्थात वह व्यक्ति जिसने करूणा, अवलोकेतेश्वर के बुद्ध के गुणों के साक्षात रूप पाया हो। बोधिसत्व ऐसे ज्ञानी लोग होते हैं जिन्होंने मानवता की रक्षा के लिए पुनर्जन्म लेने का निर्णय लिया हो। उन्हें सम्मान से परमपावन भी कहा जाता है।
दलाई लामा की मुख्य आत्मकथा ‘‘फ्रीडम इन एग्जाइल: द ऑटोबायोग्राफी ऑफ द दलाई लामा’’ है, जो 1991 में प्रकाशित हुई थी। हिंदी में यह पुस्तक ‘‘मेरा देश निकाला’’ के नाम से उपलब्ध है। इसमें उन्होंने अपने शुरुआती जीवन, तिब्बत पर चीनी कब्जे और 1959 में भारत में निर्वासित जीवन की शुरुआत का वर्णन किया है। ये दोनों पुस्तकें दलाई लामा के जीवन संघर्ष एवं उनके जीवन के विविध आयामों से परिचित कराती है। यूंकि ये दोनों पुस्तकें मैंने स्वयं पढ़ी हैं अतः मैं यह दावे के साथ यहां लिख सकती हूं कि एक आध्यात्मिक गुरू का कठिनतम जीवन आध्यात्म के मार्ग से गुज़र कर किस तरह सहज, सरल एवं शांत बन गया, इन दोनों पुस्तकों को पढ़ कर जाना जा सकता है। दलाई लामा का जीवन प्रेरणादाई है। कोई भी व्यक्ति अथाह दुखों एवं पीड़ाओं में भी अपने चित्त को शांत बना कर कैसे बालसुभ्लभ प्रवृत्तियों को अपने भीतर बचाए रख सकता है, यह दलाई लामा के अब तक के जीवन के बारे में जान कर सीखा जा सकता है।  
90 वर्षीय दलाई लामा को यह सम्मान ‘‘मेडिटेशन: द रिफ्लेक्शन्स ऑफ हिस होलीनेस द दलाई लामा’’ के लिए उन्हें मिला। उन्हें बेस्ट ऑडियोबुक, नरेशन और स्टोरीटेलिंग रिकॉर्डिंग की कैटेगरी में यह अवॉर्ड दिया गया। यह अवॉर्ड ग्रैमी के प्री-टेलीकास्ट समारोह के दौरान घोषित किया गया, जिसे यूट्यूब पर लाइव-स्ट्रीम भी किया गया था। इस ऐलान के साथ ही यह पल इतिहास में दर्ज हो गया, क्योंकि यह पहली बार था जब किसी विश्व-प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु को इस श्रेणी में ग्रैमी अवॉर्ड से नवाजा गया। ‘मेडिटेशनरू द रिफ्लेक्शन्स ऑफ हिस होलीनेस द दलाई लामा’ एक अनोखा ऑडियो प्रोजेक्ट है, जिसमें बोले गए मेडिटेशन, दलाई लामा की शिक्षाएं और संगीत का खूबसूरत संयोजन देखने को मिलता है। इस एल्बम का संगीत हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत से प्रेरित है, जो श्रोता को शांति, आत्मनिरीक्षण और संतुलन की अनुभूति कराता है। यह प्रोजेक्ट न केवल आध्यात्मिक साधना का माध्यम है, बल्कि आधुनिक दुनिया में मानसिक शांति की तलाश कर रहे लोगों के लिए एक सशक्त संदेश भी देता है।
दलाई लामा ने कहा कि ‘‘ग्रैमी अवॉर्ड को व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि साझा सार्वभौमिक जिम्मेदारी की पहचान मानता हूं। मैं इस अवार्ड को सकल मानवता के पक्ष में विनम्रता के साथ स्वीकार करता हूं। मेरा मानना है कि शांति, दया, हमारे पर्यावरण की देखभाल और इंसानियत की एकता की समझ सभी आठ अरब मनुष्यों की सामूहिक भलाई के लिए आवश्यक है। मैं आभारी हूं कि यह ग्रैमी अवार्ड इन संदेशों को और अधिक लोगों तक पहुंचाने में सहायक होगा।’’
दलाई लामा का यह पहला ग्रैमी पुरस्कार है, लेकिन दशकों से उन्हें विश्व स्तर पर अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित जाता रहा है। सन 1989 में उन्हें अहिंसा और शांति के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया था। इसके अतिरिक्त उन्हें टेम्पलटन प्राइज, लिबर्टी मेडल और दुनिया भर के विश्वविद्यालयों से कई मानद डॉक्टरेट उपाधियां भी मिल चुकी हैं। ये सभी सम्मान दर्शाते हैं कि दलाई लामा का प्रभाव केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक शांति, नैतिकता और शिक्षा जैसे व्यापक क्षेत्रों तक फैला हुआ है।
चीन दलाई लामा को शांति का नोबल पुरस्कार दिए जाने पर भी बौखलाया था और अब ग्रैमी अवार्ड दिए जाने पर भी तिलमिला उठा है। यद्यपि दलाई लामाम यह भली भांति समझते हैं कि चीन के आमजन इसमें शामिल नहीं हैं, वे विवश हैं। दलाई लामा का कहना है कि ‘‘एक शरणार्थी के रूप में हम तिब्बती लोग भारत के लोगों के प्रति हमेशा कृतज्ञता महसूस करते हैं, न केवल इसलिए कि भारत ने तिब्बतियों की इस पीढ़ी को सहायता और शरण दिया है, बल्कि इसलिए भी कई पीढ़ियों से तिब्बती लोगों ने इस देश से पथप्रकाश और बुधमित्ता प्राप्त की है। इसलिए हम हमेशा भारत के प्रति आभारी रहते हैं। यदि सांस्कृतिक नजरिए से देखा जाए तो हम भारतीय संस्कृति के अनुयायी हैं। हम चीनी लोगों या चीनी नेताओं के विरुद्ध नहीं हैं आखिर वे भी एक मनुष्य के रूप में हमारे भाई-बहन हैं। यदि उन्हें खुद निर्णय लेने की स्वतंत्रता होती तो वे खुद को इस प्रकार की विनाशक गतिविधि में नहीं लगाते या ऐसा कोई काम नहीं करते जिससे उनकी बदनामी होती हो। मैं उनके लिए करूणा की भावना रखता हूं।’’
परमपावन दलाई लामा ने अपनी मठवासी शिक्षा छह वर्ष की अवस्था में प्रारंभ की। वर्ष 1949 में तिब्बत पर चीन के हमले के बाद परमपावन दलाई लामा से कहा गया कि वह पूर्ण राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में ले लें। 1954 में वह माओ जेडांग, डेंग जियोपिंग जैसे कई चीनी नेताओं से बातचीत करने के लिए बीजिंग भी गए। लेकिन आखिरकार वर्ष 1959 में ल्हासा में चीनी सेनाओं द्वारा तिब्बती राष्ट्रीय आंदोलन को बेरहमी से कुचले जाने के बाद वह निर्वासन में जाने को मजबूर हो गए। इसके बाद से ही वह उत्तर भारत के शहर धर्मशाला में रह रहे हैं जो केंद्रीय तिब्बती प्रशासन का मुख्यालय है। तिब्बत पर चीन के हमले के बाद परमपावन दलाई लामा ने संयुक्त राष्ट्र से तिब्बत मुद्दे को सुलझाने की अपील की। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा इस संबंध में 1959, 1961 और 1965 में तीन प्रस्ताव पारित किए गए।
सन 1963 में परमपावन दलाई लामा ने तिब्बत के लिए एक लोकतांत्रिक संविधान का प्रारूप प्रस्तुत किया। मई 1990 में तक ही दलाई लामा द्वारा किए गए मूलभूत सुधारों को एक वास्तविक लोकतांत्रिक सरकार के रूप में वास्तविक स्वरूप प्रदान किया जा सका। इस वर्ष अब तक परमपावन द्वारा नियुक्त होने वाले तिब्बती मंत्रिमंडलय काशग और दसवीं संसद को भंग कर दिया गया और नए चुनाव करवाए गए। निर्वासित ग्यारहवीं तिब्बती संसद के सदस्यों का चुनाव भारत व दुनिया के 33 देशों में रहने वाले तिब्बतियों के एक व्यक्ति एक मत के आधार पर हुआ। धर्मशाला में केंद्रीय निर्वासित तिब्बती संसद में अध्यक्ष व उपाध्यक्ष सहित कुल 46 सदस्य हैं।
सन 1987 में दलाई लामा ने तिब्बत की खराब होती स्थिति का शांतिपूर्ण हल तलाशने की दिशा में पहला कदम उठाते हुए पांच सूत्रीय शांति योजना प्रस्तुत की थी। उन्होंने यह विचार रखा था कि तिब्बत को एक अभयारण्य-एशिया के हृदय स्थल में स्थित एक शांति क्षेत्र में बदला जा सकता है जहां सभी सचेतन प्राणी शांति से रह सकें और जहां पर्यावरण की रक्षा की जाए। लेकिन चीन परमपावन दलाई लामा द्वारा रखे गए विभिन्न शांति प्रस्तावों पर कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया देने में नाकाम रहा। 21 सितंबर, 1987 को अमेरिकी कांग्रेस के सदस्यों को सम्बोधित करते हुए परमपावन दलाई लामा ने पांच बिन्दुओं की शांति योजना रखी थी। यह पांच सूत्रीय शांति योजना थी कि समूचे तिब्बत को शांति क्षेत्र में परिवर्तित किया जाए। चीन उस जनसंख्या स्थानान्तरण नीति का परित्याग करे जिसके द्वारा तिब्बती लोगों के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो रहा है। तिब्बती लोगों के बुनियादी मानवाधिकार और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का सम्मान किया जाए। तिब्बत के प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण व पुनरूद्धार किया जाए और तिब्बत को नाभिकीय हथियारों के निर्माण व नाभिकीय कचरे के निस्तारण स्थल के रूप में उपयोग करने की चीन की नीति पर रोक लगे। तिब्बत की भविष्य की स्थिति और तिब्बत व चीनी लोगों के सम्बंधो के बारे में गंभीर बातचीत शुरू की जाए।
शांति, अहिंसा और हर सचेतन प्राणी की खुशी के लिए काम करना दलाई लामा के जीवन का बुनियादी सिधांत है। वह वैश्विक पर्यावरणीय समस्याओं पर भी चिंता प्रकट करते रहते हैं।  दलाई लामा ने 52 से अधिक देशों का दौरा किया है और कई प्रमुख देशों के राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों और शासकों से मिले हैं। उन्होंने कई धर्म के प्रमुखों और कई प्रमुख वैज्ञानिकों से मुलाकात की है। दलाई लामा के शांति संदेश, अहिंसा, अंतर धार्मिक मेलमिलाप, सार्वभौमिक उत्तरदायित्व और करूणा के विचारों को मान्यता के रूप में अब तक उनको 60 मानद डॉक्टरेट, पुरस्कार, सम्मान आदि प्राप्त हुए हैं। दलाई लामा ने 50 से अधिक पुस्तकें लिखीं हैं। उनका संदेश है प्यार, करूणा और क्षमाशीलता।
दलाई लामा को ग्रैमी अवार्ड दिया जाना आध्यात्मिक संगीत की वैश्विक मान्यता पर भी मुहर लगाता है। नवीनतम इलेक्ट्रॉनिक गजेट्स के प्रति रुझान रखने वाले दलाई लामा के भीतर गहन चिंतनशील आध्यात्मिक गुरु के साथ बाल सुलभ जिज्ञासु व्यक्ति भी मौजूद है जो उनके व्यक्तित्व को विलक्षण बनाता है तथा उनका व्यक्तित्व सभी के लिए अनुकरणीय है। जिस आयु को लोग उम्र का अंतिम पड़ाव मानते हैं, उसे एक नई शुरुआत की भांति सार्थक बना देने की उनकी कला को समर्पित है ग्रैमी अवार्ड ।                -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 04.02.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, February 3, 2026

पुस्तक समीक्षा | बोलियों के बहनापे को सुदृढ़ करने वाला अव्यावसायिक त्रैमासिक "बघेली अंजोर" | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
बोलियों के बहनापे को सुदृढ़ करने वाला अव्यावसायिक त्रैमासिक "बघेली अंजोर"
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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त्रैमासिक (अव्यवसायिक)- बघेली अंजोर
संपादक - डॉ राम गरीब पाण्डेय ‘विकल’
प्रकाशक  - बोली विकास मंच, गीतायन, प्लाट नं. 685/19, वाटर फिल्टर प्लांट के सामने, तुलसीनगर नौढ़िया, सीधी (म.प्र.) - 486661
मूल्य - 60/- (वार्षिक रु.280/-)
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‘‘बघेली अंजोर’’ बघेली एवं समीपवर्ती बोलियों के साहित्य-संस्कृति की पूर्णतः अव्यावसायिक त्रैमासिक पत्रिका जिसके प्रधान सम्पादक हैं डॉ. राम गरीब पाण्डेय श्विकलश्।  उप सम्पादक गीता शुक्ला श्गीतश् तथा सह सम्पादक रामलाल मिश्र, शिवी शुक्ला हैं। बोलियों के विकास के लिए प्रतिबद्ध या पत्रिका प्रमुख पांच बोलियां को साथ लेकर चल रही है - बघेली, अवधी, बुन्देली, छत्तीसगढ़ी एवं भोजपुरी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सीधी जिले के महत्वाकांक्षी विद्वान डॉ. राम गरीब पाण्डेय श्विकल’ इस पत्रिका को एक मिशन की तरह आरंभ कर चुके हैं। समीक्ष्य अंक “बघेली अंजोर” का तीसरा अंक है। आज के डिजिटल युग में जब किसी भी प्रकार की पत्रिका प्रकाशित करना एक चुनौती भरा काम है ऐसे कठिन दौर में बोलियो के लिए समर्पित त्रैमासिक प्रकाशित करने का बीड़ा उठाना अपने आप में प्रशंसनीय कार्य है।

      विभिन्न बोलियां के लिए जो संपादन सहयोग दे रहे हैं वे हैं- बघेली में भृगुनाथ पाण्डेय श्भ्रमरश् (रीवा), अवधी में राम प्रसाद शुक्ल (प्रयागराज), भोजपुरी में प्रकाश उदय (वाराणसी), बुन्देली में डॉ. सरोज गुप्ता (सागर) तथा छत्तीसगढ़ी में डॉ. विनोद कुमार वर्मा (बिलासपुर)।
भारत में भाषाई विविधता पर भारी संकट मंडरा रहा है, एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 780 भाषाओं में से 400 के करीब भाषाएँ विलुप्त होने की कगार पर हैं। वैश्वीकरण, शहरीकरण और रोजगार के लिए अंग्रेजी भाषाओं के दबाव के कारण मातृभाषाएं दम तोड़ रही हैं, जिससे सांस्कृतिक और भावनात्मक धरोहर नष्ट हो रही है। भाषा विज्ञानयों के अनुमान के अनुसार अरुणाचल प्रदेश और असम में लगभग 60 जनजातीय भाषाएं 2050 तक खत्म हो सकती हैं। नई पीढ़ी पारंपरिक भाषाओं की जगह प्रमुख भाषाएँ सीख रही है, जिससे भाषा का हस्तांतरण थमता जा रहा है। बोलियों के साथ-साथ मुहावरे, लोकगीत और पारंपरिक ज्ञान भी लुप्त हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में बोलियां को बचाना उन्हें संरक्षित एवं संबंधित करना अत्यंत आवश्यक है इस दिशा में “बघेली अंजोर” अपना दायित्व निभाती दिखाई दे रही है।
यहां प्रश्न यह भी उठना है कि अपनी भाषा या अपनी बोली को प्रमुखता दिलाने के लिए किसी तरह की हठधर्मिता या हिंसा का प्रदर्शन किया जाना क्या उचित है? जैसा कि विगत कुछ ऐसे में महाराष्ट्र में कई बार देखा गया है। ”भाषा परिवार” शब्द इसीलिए प्रयुक्त होता है कि अनेक भाषाएं एक साथ सम्मान पूर्वक उपस्थित रहें, विकास करें जैसे मानव परिवार में सभी सदस्य मिलकर रहते हैं और जब सभी मिलकर रहते हैं तभी परिवार समृद्धि शैली हो पता है और सभी सदस्यों का समुचित विकास हो पता है ठीक यही स्थिति भाषाओं और बोलियों की है ।

        डॉ. राम गरीब पाण्डेय ‘विकल’ ने अपने संपादकीय में ‘‘कहब जरूरी है - मामकाः पाण्डवाश्चैव’’ शीर्षक से बघेली में बहुत सही लिखा है कि- “बोली-भाखा क लै के, अबै कुछ समय पहिले महारास्ट्र म बहुत बड़ा हंगामा होइ ग रहा। बिल्लाधारी बहुत दिनन से जड़ान बइठ रहें। बाताबरन म गरमी ले आबै के खातिर, उँ मराठी के समरथन म अइसन दहेंचाल मचाइन, के सगले देस म, सगली दुनिया म धू-धू होय लागि। उँ लिनकर विरोध किहिन, जिनका मारिन-पीटिन, जिनका महारास्ट्र से निकारै के एजेंडा चलाइन, इया बिसरि गें, के महारास्ट्र (बम्बई) के विकास के पहिया खींचे म इनहिन के हाँथ है। इहै मेर कुछ अति उत्साही बिल्लाधारी आपन नाव लिखावै, छपावै के खातिर कहीं न कहीं इया मेर के कसरत करत मिलिन जात है। इया देस म बाइस भासा बोली जाती है। उनहुन के सबके अलग-अलग अनेकन बोली-लोकभासा हई। इया बाति पर बहुत गम्भीरता से सोवै के जरूरति है, के हर बोली-भाखा एक दुसरे क साथ ले के जब चलति है, तब उआ भारत देस के भासा बनति है। कुछ खुराफाती बिल्लाधारी अठमीं अनुसूची के छुरघुरी छाँड़ि के आगी लगाबै के कोसिस लगातार करत रहत हैं औ बिल्ला के मोह म, कुछ जने इया घुरछुरी से बिना सोचे-समझे अपनेन घरे म आगी लगाबै खातिर तयार मिलि जात हैं। उनहीं इया बाति के सुधि नहीं रहै, के सब क साथ ले के चलब, हमरे संस्कृति के पहिचान आय। ष्सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत।। (वृहदारण्यक और तैत्तिरीय उपनिषद) हमरे देस के, हमरे संस्कृति केर सूत्र बाक्य आय।”
जनवरी-मार्च 2026 के इस अंक में जो आलेख दिए गए हैं, वे हैं- भाईलाल शर्मा का “बघेली गद्य-साहित्यरू दशा और दिशा”,   डॉ. शंकर लाल शर्मा का “ब्रज की होलीः विविध रूप-रंग”, डॉ. बिहारीलाल साहू “छत्तीसगढ़ की जनभाषा”, प्रिंस कुमार सेन का आलेख “सभ्यता की विकास-यात्राः नदियों से सड़कों तक”।

      विविध बोलियां में कहानी के अंतर्गत शिवपाल तिवारी की बघेली कहानी “अकरथी”, डॉ. रश्मिशील शुक्ला की अवधी कहानी “मन के जीते जीत”, वन्दना अवस्थी दुबे की बुंदेली कहानी “बड़ी हो गयीं ममता जी”, डॉ. विनोद कुमार वर्मा की छत्तीसगढ़ी कहानी “लँगड़ा कोन”, डॉ. दिनेश पाण्डेय की भोजपुरी कहानी “बरगद लोक” है। यह सभी कहानियां अपने-अपने बोली क्षेत्र की संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
लघुकथाओं के अंतर्गत बघेली में कृष्ण मणि मिश्र की “परबचन” अवधी में भारतेन्दु मिश्र की “कनबतिया”, बुंदेली में डॉ. शरद सिंह की “लुगाइयन की आजादी”, छत्तीसगढ़ी में चोवाराम वर्मा ‘बादल’ की “तुलसी चउरा के दिया” तथा बघेली में शंकर सिंह श्दर्शनश् की लघुकथा “गरे के पट्टा” है।
     इस अंक में कहानियों और लघुकथाओं के साथ ही रामप्रसाद शुक्ल का अवधी व्यंग्य “हमार सिच्छा- प्रायमरी” तथा बलभद्र का भोजपुरी संस्मरण “जो सुमिरत सिधि होय” प्रकाशित है।
“पुरिखन के कोठार से” के अंतर्गत डॉ. विष्णुदेव तिवारी छत्तीसगढ़ी कथा “पइयाँ परत ही चन्दा-सुरुज के” दी गई है। इसके अतिरिक्त पुस्तक समीक्षा एवं पांचों बोलियों के विविध गीत भी इस अंक में समाहित हैं, जिससे यह अंक समग्रता समेटे हुए है। गीतों में परदेसी न आये - गीता शुक्ला ‘गीत’ (बघेली), दुइ बूँद आँसु - विनय विक्रम सिंह ‘मनकही’ (अवधी), आज विदा भई मुनियां की - डॉ कृष्ण कुमार नेमा ‘निर्झर’ (बुंदेली), सुरता आथे - धनराज साहू (छत्तीसगढ़ी), माथे अंचरा जोगवलीं - डॉ कमलेश राय (भोजपुरी।
ग़ज़लों में विनय मिश्र ‘प्रांजल’ (बघेली), डॉ. अशोक ‘अज्ञानी’ (अवधी), पूरनचन्द्र गुप्ता (बुन्देली), शिव ‘निश्चिन्त’ (छत्तीसगढ़ी) सुभाष पाण्डेय ‘संगीत’ (भोजपुरी) गजलें हैं।
शिव ‘निश्चिन्त’ की छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के ये कुछ शेर देखिए-

जियत आदमी देख जिन होगे भइया।
सुमत के ये रद्दा कठिन होगे भइया।
कुँवारा हे भिंदोल अब ले बिचारा, ये मेचका के कबछिन लगिन होगे भइया।
जे टूरी के नयना मया बान छोड़िस, त टूरा के मन ह हरिन होगे भइया।

इसी तरह कुछ शेर सुभाष पाण्डेय ‘संगीत’ की भोजपुरी के -
आजु पहिले पहिल, कुछ नफा हो गइल।
नैन मिलते, दरद सब दफा हो गइल।
न सुनाई सुनाई बताईं रहीं मनगुमे, जिंदगी के, इहे फलसफा हो गइल।
जान के जान से, जान जुड़ि के रहे, आशिकी में, इहे तोहफा हो गइल।
प्रीत के आँखि पर, जबसे चश्मा चढ़ल, जे रहे बेवफा, बावफा हो गइल।
    
ये ग़ज़लें अन्य भाषाओं की ग़ज़लों से कहीं भी काम नहीं ठहरती हैं। इनमें वही संवाद और रवानी है जो हिंदी उर्दू की ग़ज़लों में रहती है।

इस प्रकार “बघेली अंजोरा” का यह अंक पांचों बोलियों - बघेली, अवधी, बुन्देली, छत्तीसगढ़ी एवं भोजपुरी की प्रतिनिधि रचनाओं का सुंदर पिटारा है, जिसमें पांचों भौगोलिक क्षेत्रों की सोंधी मिट्टी की महक समाई हुई है जिसे उनके शब्दों के द्वारा अनुभव किया जा सकता है। यूं भी क्षेत्रीय बोलियां किसी क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक पहचान, समृद्ध परंपराओं और लोक-संस्कृति की संवाहक होती हैं। ये न केवल आपसी संवाद को सहज और आत्मीय बनाती हैं, बल्कि स्थानीय ज्ञान, साहित्य, और इतिहास को पीढ़ियों तक संरक्षित रखती हैं। सामाजिक एकता, अस्मिता और भाषाई विविधता के लिए इनका महत्व अत्यंत व्यापक है। इस अंक में संगीत सभी रचनाएं अपनी अपनी बोलियां से न केवल परिचय कराने में सक्षम है बल्कि दूसरी बोली बोलने वाले पाठक के लिए भी एक नई बोली से जुड़ने का अवसर प्रदान करती हैं। जब एक ही ज़िल्द में विभिन्न बोलियों की रचनाएं संग्रहित रहेंगी तो स्वाभाविक है कि अपनी बोली की रचना को पढ़ने के उपरांत दूसरी बोली की रचना पर भी ध्यान जाएगा तथा उसे पढ़ने और समझने का मन स्वाभाविक रूप से करेगा। यह कोई बलात प्रयास नहीं है अपितु सहज आग्रह है, जो रचना स्वयं ही करती है।
किसी भी बोली की अपनी एक जातीय पहचान होती है। यह जातीय पहचान ही उस बोली को अन्य बोलियों से अलग कर के स्वतंत्र अस्तित्व का स्वामी बनाती है।  प्रत्येक बोली की अपनी एक भूमि होती है जिसमें वह पलती, बढ़ती और विकसित होती है। इस जातीय पहचान को बनाए रखना साझा दायित्व होता है। बोलियों के हित में  “बघेली अंजोर” का संपादन एवं प्रकाशन करने हेतु इसके प्रधान संपादक डॉ. राम गरीब पाण्डेय ‘विकल’ बधाई के पात्र हैं। इस पत्रिका को पढ़कर उनके इस प्रयास को समर्थन दिया जाना चाहिए।
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Saturday, January 31, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | रहिमन छिड़ियां राखिए, बिन छिड़ियां सब सून | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
रहिमन छिड़ियां राखिए, बिन छिड़ियां सब सूनन
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
जिनगी में छिड़ियां भौतई जरूरी आए। जो छिड़ियां ने होंए तो तरक्की नईं करी जा सकत। कओ जात आए के मेनत की छिड़ियां से आदमी कऊं के कऊं पौंच सकत आए। मनो जे किताबी बातन से ज्यादा प्रैक्टिकल वारी बातन पे आ जाओ चाइए। काए से हमाओ आज लौं तक को एक्सपियरेंस जो रओ के चाए कित्तौ छिड़ियां चढ़ जाओ, चाए कित्तई तरक्की कर लेओ, मनो जो घरे एक ठइयां छिड़ियां ने होए तो आप अपने छत को पंखा ठीक नईं करा सकत औ ने ट्यूब लाईट बदरवा सकत। जो हमाई कई झूठी लगे तो तनक बा टेम याद कर लइयो जबें आपने पंखा या एसी सुधरवाबे खों, नें तो छत पे लगो बलब बदरवावे खों कोनऊं मिस्त्री भैया खों बुलाओ होए औ ऊने आतई संगे सबसे पैले जेई ने पूछो होए के छिड़ियां कां धरी? मनो हर घर में छिड़ियां भओ चाइए। औ अपनी मजबूरी के अपन मों खोल के नईं कै सकत के भैया छिड़ियां संगे लाने रई। आपखों पता हती के ऊपरे चढ़ने पड़हे। बाकी होत का आए के अपन पड़ोसियन के इते भगत फिरत आएं छिड़ियां की भिखमंगी करबे के लाने। बरयाबर के एकाद के इते मिलत आए। सो पैले ऊकी बड़ियाई सुनो, फेर छिड़ियां उठवा के अपने घरे ल्याओ तो मिस्त्री भैया की कई सुनो के “ज्यों लौं छिड़ियां आई उत्ते टेम में तो पूरो काम हो गओ होतो, हमें अबे मुतकी जांगा जाने।”
     अब जे ने बोल पाऊंत आएं के भैया जू मिस्त्री आप आओ के हम? छिड़ियां आपखों रखो चाइए के हमें? सो, हर दइयां ऊ टेम पे जेई सोचत आएं के एक छिड़ियां ले लई जाए। फेर लगत आए के कोन रोज लगत आए? कां राखबी? वईं जब मिस्त्री भैया आके ठेन करत आएं तो रहीम जू से माफी संगे जोई लगत आए के - ‘रहिमन छिड़ियां राखिए, बिन छिड़ियां सब सून।’
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Thursday, January 29, 2026

बतकाव बिन्ना की | भैया हरों, ऊपर वारे से डरो तनक | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की | भैया हरों, ऊपर वारे से डरो तनक | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की  
 भैया हरों, ऊपर वारे से डरो तनक
  - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

आज मोरो मूड भौतई खराब चल रओ। सो आज कोनऊं के संगे बतकाव करे को जी नई चा रओ। अब आप आरें पूछहो के काय भैयाजी के संगे बी बतकाव नई करने? 
हऔ उनके संगे बी नई करने। बाकी आप ओरें चाओ तो आप ओरन के संगे डायरेक्ट बतकाव कर लई जाए। काए से के जोन के कारन मेरो जी दुखा रओ ऊपे कोनऊं से कोऊं डिबेट नई करने मोए। ई टाॅपिक को पक्ष तो हो सकत आए मनो विपक्ष हरगिज नइयां। जो ईपे उल्टो बोले, मैं तो ऊको इंसान को दुस्मन कऊं। मनो, भैयाजी औ भौजी बी कभऊं ईके बारे मे उल्टो ने बोलहें, मोए पतो आए। 
‘‘का बर्राया रईं बिन्ना? कल संकारे से तुमने अपनी सकल ने दिखाई। हमें लगो के तुम कछू पढ़बे, लिखबे में लगी हुइयो। फेर पूरो दिन कढ़ गओ, तुमाओ पतो ने परो। संझा लौं ने आईं। आज बी संकारे से तुमाई बाट देखत देखत हम ओरे थक गए, सो तुमाई भौजी ने कई के जा के देखो के बिन्ना काय ने आईं? काय का हो गओ? बे ने आईं, ने फोन करो। ने सोसल मिडिया पे कोनऊं पोस्ट डारी। हमें फिकर सी होन लगी। सब ठीक तो आए ना?’’ भैयाजी मोरे घर में घुसत साथ गोलियन से सवाल दागन लगे।
‘‘कछू नईं, सब ठीक आए।’’ मैंने कई। मैं समझ गई के अब आप ओरन से सूदी बात ने हो सकहे, काय से के भैयाजी बतकाव करे बिगैर ने जाहें।
‘‘का सोचन लगीं? का हो गओ?’’ भैयाजी बोले। फेर बोले, ‘‘देखों बिन्ना, कभऊं खुद को अकेली ने समझियो। हम ओरें आएं ने तुमाए लाने। औ सई कई जाए तो हम ओरन को बी जी तुमई से लगो रैत आए। तुमसे दो बतकाव कर लेओ तो जी सो हल्को हो जात आए।’’ 
‘‘आप ओरन की कोनऊं बात नोंई।’’ मैंने कई।
‘‘सो का बात हो गई?’’ भैयाजी ने फेर के पूछी।
‘‘भैयाजी, जा सोच के जी दुखात आए के आजकाल लोग कित्ते पथरा घांईं भए जा रए।’’ मैंने कई।
‘‘सो तो आए, पर भओ का?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘आपने सोई पढ़ो हुइए। बाकी ऊकी वीडियो क्लिप सोई एक ने मोए फार्वड करी। बा देख के ऐसो लगो के जे अपनो देस को सीन आए के कोनऊं औ देस को? इत्ते निठुर तो कभऊं नईं रए अपने इते।’’ मैंने कई।
‘‘कोन की बात कर रईं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘बा ऊ गरीब गुरबा की। जोन अपने ई सागर में ई अपनी बेमार लुगाई खों हाथ ठेला पे ले के अस्पतालें जाने के लाने सड़कन पे भगत रओ औ संगे मदद के लाने गुहार बी लगात रओ। कइयों ने ऊकी ई दसा की रीलें बनाईं मनो ऊकी मदद करबे की ने सोची। जेई-जेई में ऊकी लुगाई रस्ता में ई चल बसी। ऊ गरीब खाों तो कछु समझ ने पर रई हती के बा का करे? बा तो जा ठीक रओ के ऐ पार्षद जू खों खबर लगी औ बे तुरतईं ऊके लिंगे पौंचे औ उन्ने ऊ आदमी खों सम्हारो। संगे ऊकी लुगाई को किरया-करम बी कराओ। ने तो जोन के पास लुगाई खों आटो से अस्पतालें ले जाबे को पइसा ने हते, बा अपनी लुगाई को किरया-करम कां से करतो?’’ मैंने भैयाजी खों बताई।
‘‘अरे, जे हमें खबर ने लगी? हमाए इते बी तो एक अखबार आऊत आए मनो ऊमें जे खबर ने हती।’’ भैयाजी अचरज करत भए बोले।
‘‘नईं कछू अखबार वालन ने तो जा खबर छापी रई औ एक के तो संपादक जू ने स्पेसल संपादकीय सोई लिखी रई। उन्ने तो नेता हरों खों धिक्कारो बी रओ के फीता काटबे औ फोटू खिचाबे से फुरसत होय तो उने पता परे के उनके शहर में का हो रओ औ का दसा आए। पर आप सई कए रए, कछू ने ई खबर को ढापो बी नईं, काय से खबर छापबे के लाने ऊ गरीब से पइसा थोड़े मिलने हते।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ, चाए नेता होएं चाए बड़े अधिकारी होंए, सबकी एकई दसा आए। नेता हरों खों अपनी जयकारे लगवाबे से फुरसत नइयां औ अधिकारियां खों नेताओं के आंगू-पीछूं दुम हिलाबे से फूरसत नइयां। काय से उने पतो आए के नेता खुस रैहें तो उने मलाई खाबे वारी सीट मिलहे ने तो कऊं लूप लाइन में बिसुरत परो रैने परहे। बाकी जे जो घटी घटना तुम बता रईं, जे कोनऊं आज को भर घटो नईं कहो जा सकत। काए से के तुमने सायद ने देखी हुइए, मनो हमने एक फिलम देखी हती ऊमें जां तेक दिलीप कुमार रओ जो अपनी लुगाई खों अस्पतालें ले जाबे को फड़फड़ात रैत आए, पर कोनऊं ऊकी मदद नई करत। ऊपे से सड़क पे लगो जाम बी नईं खुलत। सो ऐसी बुरई दसा पैले बी होत रई, बाकी बा पैले बड़े शहरन में होत्ती औ अब सागर जैसे छोटे शहरन में होन लगी।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जा तो सई कई आपने भैयाजी, बाकी अपनी पब्लिक बी कोनऊं कम नोईं। जीको पेट भरो कहानों ऊको कोनऊं की फिकर नोईं। दूसरो चाए जिए के मरे। ऊको जे नई लगत के जोन ऊ गरीब पे गुजरी, कभऊं कोनऊं टाईप से उनपे सोई गुजर सकत आए। उने तो रील बनाबे से फुरसत नोईं। मोए तो ऐसी रील बनाबे वारों से नफरत सी होन लगी। कोनऊं की लाचारी खों देख के ऊकी मदद करबे के जांगा अपनो लाईक, कमेंट बटोरबे के लाने मरे जा रए। का कई जाए ऐसे लोगन खों।’’ मैंने कई। मोरो जी कर रओ तो के उन ओरन खों दुनिया भरे की गारियां दे डारी जाए।
‘‘जा तो सई आए बिन्ना। कभऊं-कभऊं हम देखत आएं ने के एक मरो सो मोड़ा खों पचासेक लोग मार रए, कूट रए औ ऊको बचाबे के बदले बा पूरे सीन की रीलें बना के सोसल मिडिया पे डारी जा रई। कछू कांड तो जेई के लाने होत रैत आएं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ भैयाजी! बड़े बुरए दिन आ गए। पैले तो सबरे एक-दूसरे की मदद के लाने ठाड़े रैत्ते, अब तो उने मोबाईल से फुर्सत नोंईं। बे बोई की सबरी बातन खों सच मान के चलत रैत आएं।’’ मैंने कई।
‘‘अरे, अब हम तुमें का बताएं। पर की साल हमाएं संगे भौत बड़ो वारो मजाक सो हो गओै रऔ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘का हो गओ रओ?’’ मैंने पूछी।
‘‘का भओ के पर की साल जब हमें मलेरिया भओ रओ सो हम बिस्तरा पे डरे-डरे अपनी पुरानी फोटुअन खों अपने सोसल मिडिया पे डारत रैत्ते। हमाए एक दोस्त ऊपे कमेंट करत रैत्ते। जब हम ठीक हो गए औ एक दिन बजरिया गए तो उते हमाए बेई दोस्त हमें मिले। हमने ऊसे कई के काय, हम इत्ते बिमार रए औ तुम हमें देखबे, मिलबे लौं नईं आए? सो ऊने कई के तुम कां बिमार रए? तुम तो इते उते फिर रए हते और अपनी फोटू खींच-खींच के उार रए हते। हमें काय बना रए? ऊकी बात सुन के हमें भौतई गुस्सा आई। हमने ऊसे कई के तुमाई नास पिटे, हम इत्ते बिमार रए, तब तो तुमसे बनो नईं के हमें आ के देख लेते। औ रई बा फोटुअन की सो हम तो बा पुरानी फोटुएं टाईम पास के लाने पोस्ट करत रए। सोसल मीडिया पे देख के जो तुम चलहो तो फेर तो हो गई दुनियादारी। ऊंसे बायरे निकर के सांची की दुनिया सोई देख लओ करो। मनो ऊपे डरी फोटू देख के ऊने मान लओ के हमाए संगे सब ठीक आए। मनो जो हम बिमार परें सो हमें बीमारी की हालत की फोटू डार के मुनादी कराओ चाहिए के हम बीमार आएं। तब उने लगहे के ईके लाने ‘गेटवैल सून’ को एक ठइयां कमेंट डार देओ। सो, जे तो दसा होत जा रईै।’’ भैयाजी ने कई।
‘‘जेई तो मैं सोच रई भैयाजी के लोग कित्ती स्वारथपना में जी रए। दूसरन की फिकर कोनऊं खों नइयां। बा तो कओ के सौ में दस जने ऊ पार्षद घाईं अबे बी आएं, ने तो जाने का हुइए ई समाज को। माए तो जेई जी करत आए के ऐसे लोगन से कओं के भैया हरों, ऊपर वारे से डराओ तनक!’’ मैंने कई।
‘‘हऔ!’’ भैयाजी ने हामी में मुंडी हलाई।          
मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। जे जरूर सोच के सोचियों के जे दसा हमें कां लौं ले जाहे? 
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, January 28, 2026

चर्चा प्लस | अपराध की पहली सीढ़ी घर से ही शुरू होती है | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
अपराध की पहली सीढ़ी घर से ही शुरू होती है 
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                      
     समाज में अपराध कब नहीं थे? हमेशा थे। किन्तु अब दिनों-दिन अपराध की जघन्यता बढ़ती जा रही है। कोई इंटरनेट को दोष देता है तो कोई पहनावे को, तो कोई वर्तमान वातावरण और संगत को। क्या अतीत में पहनावों में परिवर्तन नहीं हुए? या फिर आपसी संपर्क नहीं रहा? अतीत तो युद्धों के भयावह वातावरण से ग्रस्त था। बलशाली अतीत में भी अपराध करते थे क्योंकि उन्हें लगता था कि वे अपराध कर के बच जाएंगे। बलशाली आज भी अपराध करते हैं और लंबे समय तक बचे भी रहते हैं। लेकिन जो चिंताजनक अंतर आया है वह ये कि अब मध्यम और निम्न मध्यमवर्ग में भी अपराधी मानसिकता जड़ें जमाती जा रही है। सच्चाई यही है कि अपराधी मानसिकता घर से ही शुरू होती है।    
एक भीली लोककथा है- एक युवक था जोे राजा के महल में चोरी करने घुसा और पहरेदारों द्वारा बंदी बना लिया गया। न्यायाधीश ने इसे जघन्य अपराध माना। उसने कहा कि जो युवक राजा के महल में चोरी कर सकता है, वह कोई भी बड़ा अपराध कर सकता है, इसलिए इसे सार्वजनिक स्थल पर मृत्युदंड दिया जाए। इससे अन्य अपराधियों को भी सबक मिलेगा। नगर के चैक पर उस युवक को फांसी की सजा दी जानी थी। तयशुदा दिन उसे चैक पर लाया गया। उस युवक की मां का रो-रो कर बुरा हाल था। वह युवक अपनी मां की इकलौती संतान था। युवक के मरने के बाद मां अकेली रह जाने वाली थी। मां ने न्यायाधीश के पैर पकड़े लेकिन न्यायाधीश टस से मस न हुआ। तब वह रोती हुई अपने बेटे को अंतिम बार देखने उसके निकट पहुंची। मां ने दहाड़ें मारते हुए कहा,‘‘बेटा मैं तुम्हें बचा नहीं पा रही हूं। मुझे माफ कर दो।’’
मां की बात सुन कर युवक ने कहा,‘‘हां मां, तुम मुझे बचा नहीं पा रही हो। यदि तुमने मुझे उस दिन एक झापड़ लगा कर रोक दिया होता जिस दिन मैंने पहली चोरी की थी, तो आज मुझे इस तरह मरना नहीं पड़ता।’’ 
बेटे की बात सुन कर मां अवाक रह गई। वह अपने बेटे की ओर ताकने लगी।
‘‘मां, मैं सच कह रहा हूं। जब मैं मिठाई की दूकान से एक लड्डू चुरा कर लाया था तब तुमने मुझे डांटने के बजाए मेरी पीठ ठोंक कर शाबाशी दी थी। इसके बाद मेरा साहस बढ़ता गया और तुम्हारी शाबाशियां भी बढ़ती गईं। मैं चोरियां करता रहा और तुम मुझे बचाती रहीं। इसी का परिणाम हुआ कि मेरा साहस इतना बढ़ गया कि मैं राजमहल में चोरी करने पहुंच गया। जो आज तुम मुझे बचा नहीं पा रही हो तो अब इसमें रोना कैसा, क्योंकि बचाने वाला समय तो वर्षों पहले निकल गया है।’’
मां को बेटे की बात सुन कर अपनी गलती का अहसास हुआ। लेकिन अब उस गलती को सुधारा नहीं जा सकता था। अब उसे अपने बेटे के बिना जीना था और वह भी एक गहरे पछतावे के साथ। 
यह तो है एक सीधी-सादी आदिवासी लोककथा लेकिन इसमें जो संदेश मौजूद है वह आज के उन माता-पिता को भी सबक देता है जो अपने बच्चों की ढिठाई को अनदेखा करते रहते हैं। कल और आज में अंतर बहुत तगड़ा है। कल यानी विगत में बच्चे अपने माता-पिता और अभिभावक का कहना मानते थे। उन्हें पलट कर जवाब नहीं देते थे। बेज़ा ज़िद नहीं करते थे। अपनी बात मनवाने के लिए घर के सामानों की तोड़-फोड़ नहीं करते थे। मगर अब ये सारे विघ्वंसक लक्षण 70 से 80 प्रतिशत बच्चों में देखे जा सकते हैं। गोद में पल रहा शिशु नहीं जानता कि मोबाईल क्या है? किन्तु एक रोशनी चाली चमकती हुई वस्तु के प्रति उसका सहज आकर्षण उसे मोबाइल पाने के लिए उकसाता है। माता-पिता यह देख कर निहाल हो जाते हैं कि उनका अबोध शिशु अभी से मोबाइल मांग रहा है। वे उसे मोबाइल पकड़ा देते हैं। वहीं शिशु जब थोड़ा बड़ा होता है तो उसे लगता है कि वह जिद कर के अपनी मनचाही वस्तु पा सकता है। वह उसमें सफल भी हो जाता है। उसके भीतर एक ज़िद और ढिठाई पनपने लगती है। 
कुछ समय पहले मेरे घर मेरे एक परिचित अपने बेटे की दो संतानों यानी अपने पोेते-पोती को ले कर आए। दोनों बच्चे बहुत छोटे थे। पोता तीन साल का रहा होगा तो पोती पांच साल की। वे लोग आ कर ड्राइंगरूम में बैठे। मैंने मुस्कुरा कर पड़े प्यार से दोनों बच्चों से उनके नाम पूछे। मेरा इतना पूछना ही मुझ पर भारी पड़ गया। मुझे खुद से बात करता पा कर वे दोनों बच्चे दूसरे ही पल बेख़ौफ़ हो गए और मेरे घर के ड्राइंगरूम की और नास्ते की जो दुर्दशा उन्होंने की, वह शब्दातीत है। उनके जाने के बाद उनके लिए एक ही विशेषण मेरे दिमाग में आया, वह था ‘‘सुनामी’’। मैंने सोचा कि उन दोनों नासमझ बच्चों के इस तरह उद्दंड होने के पीछे क्या कारण हो सकता है? तो सबसे पहले मुझे उनके माता-पिता ही दोषी नज़र आए। इसी के साथ मुझे अपना बचपन भी याद आया। मेरी मां ने मुझे और मेरी दीदी को हमेशा समझाया कि दूसरे के घर जा कर शांत बैठना चाहिए। बिना पूछे दूसरे के सामानों को हाथ नहीं लगाना चाहिए। जब तक मैं इशारा न करूं तब तक नास्ते की प्लेट की ओर हाथ भी नहीं बढ़ाना। ये सारे सबक हम दोनों बहनों ने गांठ बांध रखे थे। जब दूसरे लोग हमारे व्यवहार को देख कर मां से कहते कि ‘‘आप की बच्चियां कितनी सुशील हैं, शांत हैं।’’ तो मां ही नहीं, हम लोग भी खुशी से भर जाते। इस तरह हमें लगभग अबोध अवस्था से ही प्रशंसा पाने वाले व्यवहार करने की आदत डाली गई। 
पर आज स्थितियां बिलकुल उलट हैं। मेरी एक युवा परिचित अपने बेटे की तारीफ करते हुए कहा करती है कि ‘‘इसके हाथ से तो कोई चीज सही-सलामत बचती ही नहीं है। नया से नया खिलौना चार दिन में तोड़-ताड़ कर एक कोने में फेंक देता है। मेरा जिद्दी बच्चा!’’ उसका यह लाड़ भरा स्वर अनजाने में उसके बेटे को और जिद्दी बनाता जा रहा है। वह जान गया है कि वह तोड़-फोड़ कर के नई चीजें हासिल कर सकता है। 
बच्चे तो घर की फुलवारी के वे खूबसूरत फूल होते हैं जिन्हें अच्छाई के खाद-पानी से पालना-पोसना जरूरी है। आज अवयस्क अपराध की दर आश्चर्यजनक रूप से बढ़ रही है। क्या यह भयावह नहीं है कि अवयस्क चार स्कूली बच्चे अपने से छोटी क्लास में पढने वाली एक नन्हीं बच्ची के साथ अनैतिक कार्य करते हैं और फिर उसे मार कर नहर में फेंक देते हैं। यह रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना कोई आम घटना नहीं है लेकिन इससे मिलती-जुलती घटनाएं अब प्रकाश में आने लगी हैं जब नाबालिग युवकों ने नाबालिग बच्चे या बच्ची के साथ अनैतिक कार्य किया। मामले की तह में जाने पर हर बार यही कारण सामने आया कि वे अवयस्क अपराधी इंटरनेट पर आपत्तिजनक दृश्य देख कर अपराध के लिए प्रेरित हुए। अब सोचने की बात है कि वे नाबालिग अपराधी मोबाइल या इंटरनेट साथ ले कर तो पैदा नहीं हुए होंगे। माता-पिता ने ही वह सुविधा उन्हें उपलब्ध कराई होगी। यह कह कर माता-पिता अपनी जिम्मेदारी से नहीं मुकर सकते हैं कि वे नहीं जानते थे कि उनके बच्चे इंटरनेट पर क्या देख रहे हैं? यदि माता-पिता बच्चों को मोबाइल सौंप रहे हैं तो यह उनकी ड्यूटी है कि वे इस बात का ध्यान रखें कि बच्चे किन साईट्स पर सर्फिंग कर रहे हैं। बच्चों को अच्छी और बुरी साईट्स के बारे में खुल कर समझाएं। बच्चों के दोस्त बन कर उनकी माॅनीटरिंग करें। क्योंकि जो बुराई बचपन में बच्चों के दिमाग में घर कर लेती है, उनके बड़े होने के साथ वह भीतर ही भीतर बढ़ती जाती है। पहली चोरी या पहली गलत हरकत पर ही उन्हें टोंकना और डांटना ज़रूरी है, अन्यथा सिर से पानी गुज़रने के बाद कुछ नहीं किया जा सकता है। 
अपराध मनोविज्ञानी अपराध के मुख्य कारण मानते हैं- भावनात्मक अस्थिरता, हीनता की भावना तथा पारिवारिक वातावरण। चाहे कुण्ठा हो, हीन भावना हो अथवा उग्रता हो, अधिकतर मनोविज्ञानी यही मानते हैं कि यह प्रवृतियां हर मनुष्य के भीतर पाई जाती हैं। जिस मनुष्य में ये प्रवृतियां जितनी अधिक प्रभावी रहती हैं, वह उतने बड़े अपराध करता है। 
सन् 1991 में एन्थोनी हाॅपकिंस अभिनीत हाॅलीवुड की एक फिल्म आई थी जिसका नाम था ‘‘द साइलेंस आफॅ द लैंब्स’’। यह फिल्म लेखक थाॅमस हैरिस के उपन्यास ‘‘द साइलेंस आफॅ द लैंब्स’’ पर आधारित थी। इस फिल्म को पूरी दुनिया में बड़ी सराहना मिली तथा इसे प्रमुख पांच श्रेणियों के लिए अकादमी अवार्ड दिया गया।  अपराधकथा पर आधारित फिल्मों में इसे सबसे प्रभावशाली फिल्म मना गया। एन्थोनी हाॅपकिंस ने इस फिल्म में एक पूर्व मनोचिकित्सक एवं नरभक्षी अपराधी डाॅ. हैनिबल लैक्टर की भूमिका निभाई थी। एफबीआई का एक प्रशिक्षु अधिकारी एक अन्य सीरियल किलर को पकड़ने के लिए डाॅ. हैनिबल लैक्टर से लगातार बातचीत करता है ताकि वह सीरियल किलर की मानसिकता को भांप कर उसके अगले कदम का पता लगा सके तथा उसे अगला अपराध करने से रोक सके। यह माना जाता है कि थाॅमस हैरिस का उपन्यास ‘‘द साइलेंस आफॅ द लैंब्स’’ अमरीकी इतिहास के दो सबसे कुख्यात सीरियल किलर से प्रभावित था जिनमें से एक था थियोडोर टेड बंडी। दूसरा था डाॅ. अल्फ्रेडो बल्ली ट्रविनो। इस फिल्म में यही बताया गया था कि जब अपराधी मानसिकता जटिल हो जाती है तो उसे सामान्य सोच वाला व्यक्ति समझ नहीं पाता है। यह मानसिक जटिलता विशेष परिस्थितियों में पनपती है और विशेष माहौल में ही बढ़ती है। इसलिए बेहतर है कि बचपन से ही बच्चों को एक ऐसा स्वस्थ माहौल दिया जाए जिसमें वे दूसरे को दुख, कष्ट अथवा हानि पहुंचाने के बारे में कभी न सोचें। यह परिवार और समाज के ऊपर है कि वह अपराधयुक्त वातावरण चाहता है अथवा अपराध मुक्त वातावरण। अच्छे बच्चे भी इसी समाज में रहते हैं और बुरे बच्चे भी। अच्छे बच्चे बड़े हो कर अच्छे नागरिक बनते हैं और बुरे बच्चे बड़े हो कर बड़े अपराधी बन जाते हैं।
अवयस्क अपराधियों के लिए जुवेनाईल कोर्ट होता है तथा उन्हें सजा भुगतने के लिए बाल सुधारगृह भेजा जाता है। लेकिन यदि परिवार में ही बच्चों पर ध्यान दिया जाए तो उनके बाल अपराधी बनने की नौबत ही न आए। आजकल यह नौबत इसलिए भी आने लगी है क्योंकि माता-पिता दोनों कामकाजी होते हैं। परिवार विकेन्द्रित होता है। आया अथवा केयरटेकर के जिम्मे बच्चों की परवरिश होती है। एक आया को उतने अधिकार नहीं रहते हैं जितने एक मां, दादा या नानी को होते हैं। या फिर एक पिता, दादा या नाना को अधिकार होते हैं। संयुक्त परिवार में बच्चों को एक अनुशासित माहौल अपने-आप मिल जाता है जबकि एकल परिवार में बच्चों को अनुशासित रखने माता-पिता का दायित्व बढ़ जाता है। कुछ परेंट्स तो इस दायित्व को साध लेते हैं किन्तु अधिकांश लापरवाह होते चले जाते हैं। उन्हें पता ही नहीं चल पाता है कि उनकी संतान अपराध की ओर कब मुड़ गई। 
आज जब अपराध चारो ओर से बच्चों को अपने शिकंजे में कसने को तैयार बैठा है ऐसे में माता-पिता, अभिभावकों एवं शिक्षकों को भी चौकन्ना रहना जरूरी है। उनका चौकन्नापन बच्चे को अपराध से दूर रख सकता है। मनोविज्ञानी कहते हैं कि बच्चों की छोटी-छोटी गलतियों पर भी ध्यान दें। यदि वे बार-बार उस गलती को दोहरा रहे हैं तो उन्हें अनदेखा कर के प्रोत्साहित न करें, बल्कि उन्हें सही रास्ता दिखाएं। भले ही इसके लिए उन्हें कड़ाई से डांटना ही क्यों न पड़े। आज की एक डांट उन्हें कल के बड़े अपराध से बचा सकती है।                
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(दैनिक, सागर दिनकर में 28.01.2026 को प्रकाशित)  
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Sunday, January 25, 2026

शून्यकाल | हमारा भी दायित्व है अपने गणतंत्र के अनुरूप बनना | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल
हमारा भी दायित्व है अपने गणतंत्र के अनुरूप बनना
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       .हम भारत के लोग...’ हमने अपनी आकांक्षाओं, आशाओं एवं विश्वास के साथ संविधान की संरचना को स्वीकार किया और सच्चे गणतंत्र की राह में आगे बढ़ने की शपथ ली। हमने तो हमेशा अपने गणतंत्र से अनेकानेक आशाएं रखीं लेकिन क्या कभी सोचा कि हमने उन आशाओं का क्या किया जो हमारे गणतंत्र को हमसे रही होंगी? क्या हम गणतंत्र की आशाओं पर खरे उतरे हैं या फिर हमने अपने गणतंत्र को अपना निजीतंत्र बनाते जा रहे हैं। अपनी वैश्विक छवि के साथ-साथ सबसे नीचे की पंक्ति के नागरिकों के जीवन-स्तर को ध्यान में रखते हुए इस संदर्भ में कभी-कभी हमे आत्मावलोकन भी करना चाहिए।
    
    एक लम्बी परतंत्रता के बाद स्वतंत्रता किसी भी कीमत पर मिले स्वीकार्य थी। कीमत भी हमने चुकाई। भारतीय भू-भाग का बंटवारा हुआ। अमानवीयता का तांडव देखना पड़ा। उसके बाद ग़रीबी, बदहाली, शरणार्थियों का सैलाब, बेरोज़गारी और सांप्रदायिक तनाव ने स्वतंत्रता की खुशी को कई-कई बार हताहत किया। फिर भी स्वतंत्रता विजयी रही और हमने अपना संविधान गढ़ा तथा उसे स्वयं पर लागू किया। इसके  पहले संविधान सभा के सामने चुनौती थी कि नए गणतंत्र का निर्माण ऐसे हो कि देश में फैली भाषाई, धार्मिक, जातीय, सांस्कृतिक विविधता को आत्मसात किया जा सके और लोगों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक दृष्टि से न्याय सुनिश्चित किया जा सके। एक ऐसा गणतंत्र जिसमें नागरिकों को बराबरी का दजर्र मिले। जिसमें शासन की शक्ति किसी एक राजा अथवा अधिनायक के पास न हो कर जनता और उसके चुने प्रतिनिधियों के हाथ में हो।

      गणतंत्र के साथ सुनहरी आशाएं जागीं। देश तरक्की करेगा तो हम भी तरक्की करेंगे। या फिर इसके उलट कि हम तरक्की करेंगे तो देश भी तरक्की करेगा। लेकिन इस ‘हम भारत के लोग’ में से ‘हम’ पर ‘मैं’ का प्रभाव बढ़ता गया और ‘मैं’ ने ‘हम’ को निर्बल बना दिया। कभी-कभी उन्मादी भी। हमने अपनी परम्पराओं को सहेजा संवारा और उनसे सबक लिया। समयानुसार सड़ी-गली परम्पराओं को काट कर फेंका भी लेकिन उन्माद की अवस्था में पहुंचते ही हम सत्य, अहिंसा और परमार्थ के समीकरण को भुला कर हिंसक व्यवहार करने लगते हैं। जीव मात्र के प्रति उदार विचार की परम्परा के पोषक हम यदि जलीकट्टू का समर्थन करने लगते हैं तो वहीं हमारा ‘अहिंसा परमोधर्म’ का आह्वान टूटने लगता है। हमने अपने संविधान में अहिंसा को र्प्याप्त जगह दी है। परमोधर्म को भी उच्च स्थान दिया है फिर हिंसा को अपनी गौरवमयी परम्परा कहते हुए संविधान की धाराओं को कैसे सुरक्षित रख सकते हैं?

    9 दिसम्बर 1946 को हुई संविधान सभा की पहली बैठक में विभिन्न जातियों, धर्मों, आर्थिक, राजनीतिक विचारों के लोग शामिल थे और सामाजिक आधार को फैलाने की कोशिश की गई थी ताकि भारत अपने आप में जिस तरह से अद्वितीय विविधता को समेटे है उसी के अनुरूप नए गणतंत्र का निर्माण हो सके। भारतीय संविधान में नैतिकता और राजनीतिक परिपक्वता को आधार बनाया गया। लेकिन समूचे देश में महिलाओं साथ बढ़ते दुर्व्यवहार को देखते हुए यह लगने लगता है कि हमारे तंत्र से अब नैतिकता का लोप होने लगा है। गोया भारतीय स्त्री बर्बरयुग के किसी नए संस्करण को जी रही हो। भारत इस समय मानव तस्करी का वैश्विक मार्ग बन चुका है। यह बर्बरता भी हमारे संवैधानिक उसूलों का सिर झुकाने को र्प्याप्त है।
गणतांत्रिक भारत में देश की विविधता और जटिलता को एक राजनीतिक व्यवस्था के रूप में अपनाया गया और ऐसा करते समय विभिन्न क्षेत्रों में बहुलतावाद का सम्मान किया गया। राजनीतिक क्षेत्र में लोकतंत्र, सांस्कृतिक क्षेत्र में संघीय ढांचे और धार्मिक मामलों में धर्मनिरपेक्षता के सहारे एक नए गणतंत्र के मायनों को स्पष्ट किया गया। गणतंत्र के गठन के बाद से ही नीति निर्धारकों की प्राथमिकता देश के संघीय ढांचे को बनाए रखना थी।

यह सच है कि कोई भी तंत्र हो उसकी अपनी व्यक्तिगत समस्याएं होती हैं। लेकिन गणतंत्र की परिकल्पना मैं संवैधानिक समस्याओं के लिए कई रास्ते खुले रखे गए। संशोधनों के द्वारा संवैधानिक ढांचे में लचीलापन भी बनाए रखा गया। फिर भी प्रत्येक नए चुनाव में चाहे वह लोकसभा का हो या विधान सभा का या फिर किसी पंचायत अथवा निगम का, गरिमा के सीमाएं चटकती मिली हैं। गणतंत्रता के क्या है मायने आज हमारे देश में। इतने लम्बे अरसे में कितने नियमों का ईमानदारी से हमने निर्वाह किया है और कितने ऐसे संवैधानिक नियम है जिनको हमने संविधान के पन्नों पर लिख कर भुला दिया है। हमारा देश भारतवर्ष एक जनतांत्रिक देश है। जहां जनता के द्वारा चुने गये प्रतिनिधियों द्वारा ही देश की शासन व्यवस्था चलायी जाती है। गणतंत्र दिवस हमारे देश के इतिहास का वो दिन है, जिस दिन संविधान पूर्णरुपेण लागू किया गया था। देश की समस्त गतिविधियां इन संवैधानिक नियमों के आधार पर ही सुचारु ढंग से संचालित होती है। संविधान हमे जीने के तौर तरीके सीखाता है। एक सभ्य और कर्मठ राष्ट्र के सपने को साकार करता है हमारा संविधान। देश की गणतंत्रत को बनाये रखने हेतु प्रशासन के साथ साथ जनता का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। संविधान के नियम सबों के लिए बराबर होते है। वो किसी भी प्रकार के जातिभेद या वर्चस्व की भावना से ऊपर होता है। फिर भी भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और विभिन्न प्रकार के संकट आज भी मुंहबाए खड़े हैं। अगर हम सिर्फ अपनी उन्नति के बारे में सोचते है तो ये हमारी संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है। हमे अपने देश और समाज के विषय में भी सोचने की जरूरत है। हमें ऐसे कार्यों की ओर स्वयं को अग्रसर करना है, जिनमें स्वयं के साथ सम्पूर्ण राष्ट्र की प्रगति भी सम्मिलित हो। जैसे हमारा संविधान हमें अपने अधिकारों और कर्तव्यों की समझ देता है। वैसे ही हमें भी देश के प्रति अपनी भावना परिलक्षित करनी चाहिए। युवावर्ग जो कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति और उसके भविष्य का एकमात्र कार्यवाहक होता है।युवाओं की सहनशीलता, कर्तव्यपरायणता और कर्मठता ही राष्ट्र की अखण्डता रुपी महल के लिए ईंट का कार्य करते है। एक एक ईंट मिलकर ही एक विशाल महल का निर्माण करता है। आज जबकि हम इक्कीसवी सदी में कदम रख चुके है। तकनीक के साथ साथ लोगों की मानसिकता भी अब बदल चुकी है। ऐसे समय में गणतंत्र दिवस को सिर्फ एक राष्ट्रीय दिवस अथवा एक दिन का उत्सव मान कर, टीवी के छोटे पर्दे पर झांकियां देख कर, नेताओं के भाषण सुन कर भुला देना और दूसरे दिन से यह भी याद न रखना कि हमारा कोई संविधान भी है, हमारा कोई गणतंत्र भी है जिसके प्रति हम उत्तरदायी हैं, यह हमारी नासमझी ही नहीं अपराध भी है।

हमारे गणतंत्र का दूसरा महत्वपूर्ण अंग तंत्र है। लेकिन आजकल ऐसा लगता है जैसे तंत्र अनियंत्रित होता जा रहा है। उसे अपनी मनमानी करने से रोकने का दायित्व जिनका है कहीं कहीं तो वे खुद ही भ्रष्टाचार की मिसाल निकल आते हैं। तंत्र के इस कथन की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि आज के दौर में सत्ता दल का राजनैतिक हस्तक्षेप प्रशासनिक अमले पर इतना अधिक रहता हैं कि वे चाहकर भी निष्पक्ष और निर्भीक होकर काम नहीं कर सकते हैं। कोई भी जनप्रतिनिधि जब एक बार अपने राजनैतिक हित साधने के लिये तंत्र का उपयोग कर लेता हैं तो फिर गणतंत्र के मूल्यों में गिरावट आने लगती है। आर्थिक मुद्रास्फीति से कहीं अधिक घातक होती है नैतिकता की स्फीति।किसी भी समस्या को हल करने के लिये गण को तंत्र का साथ देने और तंत्र को त्वरित निराकरण के प्रयास करने आवश्यक होते हैं। आज महंगाई सबसे बड़ी समस्या हैं। हालांकि विश्व स्तरीय आर्थिक मंदी, अंर्तराष्ट्रीय बाजार की उथल पुथल, नोटबंदी के बाद की आर्थिक स्थिति ने देश को भी हिला कर रख दिया है। लेकिन इतना कह देने मात्र से सरकार के कर्तव्यो की इतिश्री नहीं हो जाती है। और ना ही केन्द्र और राज्य सरकार एक दूसरे पर दोषारोपण़ करके बच सकतीं है। गण चुस्त और दुरुस्त रहें तथा तंत्र पूरी मुस्तैदी से देश के विकास और आम आदमी की खुशहाली के लिये संकल्पित हो, तभी देश एक बार फिर अपने स्वर्णिम मुकाम पर पहुंच सकेगा।
आज हम चारों ओर देख रहे हैं की बहुत सारे सरकारी कर्मचारी उन लोगों से घूस ले रहे हैं रिश्वत ले रहे हैं। क्या यही हम हमारे देश के प्रति कर्तव्य निभा रहे हैं । इसमें जिम्मेदार सिर्फ वह सरकारी आदमी नहीं है जिम्मेदार आम आदमी भी है रिश्वत लेने वाला और देने वाला भी जिम्मेदार है और रिश्वत देने वाला भी उतना ही जिम्मेदार है क्योंकि लोग अपना कर्तव्य भूल जाते हैं डॉक्टर, इंजीनियर या किसी भी विभाग के सरकारी कर्मचारी इस दूषित व्यवहार को अपनाते हैं और पूरे देश को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। विकास के पहिए ऐसे आचरण से ही बाधित हो जाते हैं। प्रश्न यह है कि सुरक्षा मामलों में भी भ्रष्टाचार के दाग़ जब उभर कर सामने आने लगे हैं तो यह मान ही लेना चाहिए कि हम अपने संवैधानिक उसूलों से भटक गए हैं। यदि स्वतंत्रता के दशकों बाद भी हम खुले में शौचमुक्त देश बनाने के लिए संघर्ष करते दिखाई दे रहे हैं तो विश्व के सक्षम राष्ट्रों से किस आधार पर अपनी तुलना कर सकते हैं? बहरहाल अब समय आ गया है कि हमें खुद को धोखा देने से रोकना होगा और सही मायने में खुद के लिए तय करना होगा कि हम अपने गणतंत्र के अनुरूप एक सही तथा अच्छे नागरिक कैसे साबित हो सकते हैं।
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Saturday, January 24, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | गरब करो संविधान सभा के मेंबर रए अपने गौर बब्बा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टॉपिक एक्सपर्ट | गरब करो संविधान सभा के मेंबर रए अपने गौर बब्बा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
टाॅपिक एक्सपर्ट
गरब करो संविधान सभा के मेंबर रए अपने गौर बब्बा
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
         26 जनवरी आत-आत हमें गणतंत्र दिवस मनाबे को जी करन लगत है। अब हर कोऊ अपने घरे अपनो तिरंगा लगा सकत आए। कित्तो अच्छो लगत आए न जे सोंस के, के अपन आजाद आएं, अपनो एक संविधान आए। अपनो गणतंत्र दुनिया को सबसे बड़ो गणतंत्र आए। आजादी के पैले 9 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा की पैली बैठक भई रई। मनो 26 जनवरी 1950 को अपनो जो संविधान लागू भओ। जेई से अपन 26 जनवरी खों गणतंत्र दिवस मनाऊंत आएं। 
     औ अपन सागर वारों के लाने गरब करबे की बात जे आए के डॉ हरीसिंह गौर जू मने अपने ‘गौर बब्बा’ संविधान सभा के 84 मेंबरन में खास मेंबर रए। बे सेंट्रल प्रोविंस एंड बेरार से संविधान सभा के मेंबर चुने गए रए।  बे ड्राफ्टिंग कमेटी में भले नईं रए मनो बे ड्राफ्टिंग के लाने रखे जाबे वारे प्रस्तावन पे बहस करबे वारी कमेटी में रए औ उन्ने मुतके जरूरी मुद्दन पे बहस करी, जीसे अच्छो संविधान बन सको। ‘हम भारत के लोग’ से सुरू होबे वारे अपने संविधान में  प्रस्तावना के संगे 470 से ज्यादा अनुच्छेद आएं औ 25 भाग के संगे 12 अनुसूचियां आएं। सो, पैली बात तो जे के हमें अपने गणतंत्र पे गरब करो चाइए, काए से के ईमें अपने गौर बब्बा को बी योगदान रओ। दूसरो ई लाने के अपनो गणतंत्र दुनिया को सबसे बड़ो गणतंत्र आए। ऐसो गणतंत्र जीमें सबई जात, धरम औ करम के इंसा एक बरोबर माने गए आएं। सो, बकरियां घांईं “मैं-मैं” करबे की जांगा हमें सोई अपने सागर की भलाई औ विकास के लाने सोचबो चाइए के ‘हम सागर के लोग’ औ मिलजुल के काम करो चाइए।  सो, सबई मिल के संगे बोलियो- “अपने गणतंत्र की जै!” “गौर बब्बा की जै!”
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Thursday, January 22, 2026

चर्चा प्लस | बाज़ारवाद को कोसते और कर्तव्यों की ब्रांडिंग करते हम | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 

बाज़ारवाद को कोसते और कर्तव्यों की ब्रांडिंग करते हम

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

      यदि राज्य एक ब्रांड है, बेटी बचाओ एक ब्रांड है, स्वच्छता मिशन एक ब्रांड है, शौचालय का उपयोग एक ब्रांड है, निर्मलजल एक ब्रांड है और अतुल्य भारत अभियान एक ब्रांड है तो हम अपने युवाओं से राष्ट्रप्रेम की आशा रखें अथवा बाज़ारवाद की? हमने अपने सुरक्षा बलों को भी ब्रांड बना दिया और उनके लिए ब्रांड एम्बेसडर भी अनुबंधित कर लिए गए। जैसे- सीआरपीएफ की ब्रांड एम्बेसडर है पी. वी. सिन्धु तो बीएसएफ के ब्रांड एम्बेसडर है विराट कोहली रहे हैं। यदि राष्ट्र और मानवता के प्रति भावनाएं एवं कत्र्तव्य भी ब्रांड बन कर प्रचारित होने का समय हमने ओढ़ लिया है जो भारतीय विचार संस्कृति के मानक पर यह ब्रांडिंग कहां सही बैठती है, यह विचारणीय है। फिर बाज़ारवाद को क्यों कोसना?   .

     हम आज ब्रांडिग के समय में जी रहे हैं। हमारे शौच की व्यवस्था से ले कर राज्य, कत्र्तव्य और संवेदनाओं की भी ब्रांंिडग होने लगी है। ब्रांड क्या है? ब्रांड उत्पाद वस्तु की बाजार में एक विशेष पहचान होती है जो उत्पाद की क्वालिटी को सुनिश्चित करती है, उसके प्रति उपभोक्ताओं में विश्वास पैदा करती है। क्यों कि उत्पाद की बिक्री की दशा ही उत्पादक कंपनी के नफे-नुकसान की निर्णायक बनती है। कंपनियां अपने ब्रांड को बेचने के लिए और अपने ब्रांड के प्रति ध्यान आकर्षित करने के लिए ‘ब्रांड एम्बेसडर’ अनुबंधित करती हैं। यह एक पूर्णरुपेण बाज़ारवादी आर्थिक प्रक्रिया है। कमाल की बात यह है कि ब्रांडिग हमारे जीवन में गहराई तक जड़ें जमाता जा रहा है। इसी लिए नागरिक कत्र्तव्यों, संवेदनाओं एवं दायित्वों की भी ब्रांडिंग की जाने लगी है, गोया ये सब भी उत्पाद वस्तु हों।


आजकल राज्यों के भी ब्रांड एम्बेसडर होते हैं। जबकि राज्य एक ऐसा भू भाग होता है जहां भाषा एवं संस्कृति के आधार पर नागरिकों का समूह निवास करता है। - यह एक अत्यंत सीधी-सादी  परिभाषा है। यूं तो राजनीतिशास्त्रियों ने एवं समाजवेत्ताओं ने राज्य की अपने-अपने ढंग से अलग-अलग परिभाषाएं दी है। ये परिभाषाएं विभिन्न सिद्धांतों पर आधारित हैं। राज्य उस संगठित इकाई को कहते हैं जो एक शासन के अधीन हो। राज्य संप्रभुतासम्पन्न हो सकते हैं। जैसे भारत के प्रदेशों को ’राज्य’ कहते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार राज्य की उत्पत्ति का एकमात्र कारण शक्ति है। इसके अलावा युद्ध को राज्य की उत्पत्ति का कारण यह सिद्धांत मानता है जैसा कि वाल्टेयर ने कहा है प्रथम राजा एक भाग्यशाली योद्धा था। इस सिद्धांत के अनुसार शक्ति राज्य की उत्पत्ति का एकमात्र आधार है शक्ति का आशय भौतिक और सैनिक शक्ति से है। प्रभुत्व की लालसा और आक्रमकता मानव स्वभाव का अनिवार्य घटक है। प्रत्येक राज्य में अल्पसंख्यक शक्तिशाली शासन करते हैं और बहुसंख्यक शक्तिहीन अनुकरण करते हैं। वर्तमान राज्यों का अस्तित्व शक्ति पर ही केंद्रित है। 

राज्य को परिभाषित करते सामाजिक समझौता सिद्धांत को मानने वालों में थाॅमस हाब्स, जॉन लॉक, जीन जैक, रूसो आदि का प्रमुख योगदान रहा। इन विचारकों के अनुसार आदिम अवस्था को छोड़कर नागरिकों ने विभिन्न समझौते किए और समझौतों के परिणाम स्वरुप राज्य की उत्पत्ति हुई। वहीं विकासवादी सिद्धांत मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय प्रमाणों पर आधारित है। इसके अनुसार राज्य न    कृत्रिम संस्था है, न ही देवीय संस्था है। यह सामाजिक जीवन का धीरे-धीरे किया गया विकास है इसके अनुसार राज्य के विकास में कई तत्व जैसे कि रक्त संबंध धर्म शक्ति राजनीतिक चेतना आर्थिक आधार का योगदान है पर आज सबके हित साधन के रूप में विकसित हुआ। ऐसा राज्य क्या कोई उत्पाद वस्तु हो सकता है? जिसके विकास के लिए ब्रांडिंग की जाए?

शौचालय, और स्वच्छता की ब्राडिंग किया जाना और इसके लिए ब्रांड एम्बेसडर्स को अनुबंधित किया जाना बाजारवाद का ही एक नया रूप है। बाज़ारवाद वह मत या विचारधारा जिसमें जीवन से संबंधित हर वस्तु का मूल्यांकन केवल व्यक्तिगत लाभ या मुनाफ़े की दृष्टि से ही किया किया जाता है; मुनाफ़ा केंद्रित तंत्र को स्थापित करने वाली विचारधारा; हर वस्तु या विचार को उत्पाद समझकर बिकाऊ बना देने की विचारधारा। बाजारवाद में व्यक्ति उपभोक्ता बनकर रह जाता है, पैसे के लिए पागल बन बैठता है, बाजारवाद समाज को भी नियंत्रण में कर लेता है, सामाजिक मूल्य टूट जाते हैं। बाजारवाद एक सांस्कृतिक पैकेज होता है। जो उपभोक्ता टॉयलेट पेपर इस्तेमाल करता है, वह एयर कंडीशनर में ही सोना पसन्द करता है, एसी कोच में यात्रा करता है और बोतलबंद पानी साथ लेकर चलता है। इस संस्कृति के चलते लौह उत्खनन से लेकर बिजली, कांच और ट्रांसपोर्ट की जरूरत पड़ती है। यूरोप और अमेरिका में लाखों लोग केवल टॉयलेट पेपर के उद्योग में रोजगार पाते हैं। यह सच है कि बाजारवाद परंपरागत सामाजिक मूल्यों को भी तोड़ता है।


जीवनस्तर में परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। प्रत्येक व्यक्ति भौतिक सुखों के पीछे भागता है। उसकी इसी प्रवृत्ति को बाज़ार अपना हथियार बनाता है। यदि बाजार का स्वच्छता से नुकसान हो रहा है तो वह स्वच्छता को क्यों बढ़ने देगा? पीने का पानी गंदा मिलेगा तो इंसान वाटर प्यूरी फायर लेगा, हवा प्रदूषित मिलेगी तो वह एयर प्यूरी फायर लेगा। इस तरह प्यूरी फायर्स का बाज़ार फलेगा-फूलेगा। इस बाजार में बेशक नौकरियां भी मिलेंगी लेकिन बदले में प्रदूषित वातावरण बना रहेगा और सेहत पर निरंतर चोट करता रहेगा तो इसका खामियाजा भी तो हमें ही भुगतना होगा। 


स्वच्छता बनाए रखना एक नागरिक कत्र्तव्य है और एक इंसानी पहचान है। यदि इसके लिए भी ब्रांडिंग की जरूरत पड़े तो वह कत्र्तव्य या पहचान कहां रह जाता है? वह तो एक उत्पाद वस्तु है और जिसके पास धन है वह उसे प्राप्त कर सकता है, जिसके पास धन की कमी है वह स्वच्छता मिशन के बड़े-बड़े होर्डिंग्स के नीचे भी सोने-बैठने की जगह हासिल नहीं कर पाता है। 


भ्रूण हत्या एवं बेटी बचाओ का सीधा संबंध हमारी मानवीयता एवं संवेदनशीलता से है। यह भावना हमारे भीतर स्वतः जागनी चाहिए अथवा सरकार जो इन अभियानों की दिशा में प्रोत्साहनकारी कार्य करती है उन्हें संचालित होते रहना चाहिए। जब बात आती है इन विषयों के ब्रांड एम्बेसडर्स की तो फिर प्रश्न उइता है कि क्या बेटियां उपभोक्ता उत्पाद वस्तु हैं या फिर भ्रूण की सुरक्षा के प्रति हमारी संवेदनाएं महज विज्ञापन हैं। आज जो देश में आए दिन आपराधिक घटनाएं बढ़ रही हैं तथा संवेदना का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है, उसका सबसे बड़ा कारण यही है कि जाने-अनजाने हमारी तमाम कोमल संवेदनाएं बाजार के हाथों गिरवी होती जा रही हैं।


बात उत्पादन की बिक्री की हो तो उचित है किन्तु बाजार से हो कर गुजरने वाले कत्र्तव्यों में दिखावा अधिक होगा और सच्चाई कम। ब्रांड एम्बेसडर अनुबंधित करने के पीछे यही धारणा काम करती है कि जितना बड़ा अभिनेता या लोकप्रिय ब्रांड एम्बेसडर होगा उतना ही कम्पनी को आय कमाने में मदद मिलती है क्योंकि लोग वो सामान खरीदते है। अमूमन जितना बड़ा ब्रांड होता है उतना ही महंगा या उतना ही लोकप्रिय व्यक्ति ब्रांड एम्बेसडर बनाया जाता है क्योंकि बड़ा ब्रांड अधिक पैसे दे सकता है जबकि छोटा ब्रांड कम और ऐसा इसलिए क्योंकि कोई भी व्यक्ति जो ब्रांड का प्रतिनिधित्व करता है, उसकी फीस करोड़ों में होती है। एक तो अगर जनता उस व्यक्ति को अगर रोल मॉडल मानती है तो ऐसे में लोगो के दिलों में जगह बनाना आसान हो जाता है। 


सड़क सुरक्षा अभियान के ब्रांड एम्बेसडर है अक्षय कुमार, फिट इंडिया अभियान के ब्रांड एम्बेसडर कौन रहे हैं सोनू सूद, पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास के ब्रांड एम्बेसडर मैरीकॉम, असम राज्य के ब्रांड एम्बेसडर रही हैं हिमा दास, अरुणाचल प्रदेश राज्य के ब्रांड एम्बेसडर जॉन अब्राहम, हरियाणा (योग और आयुर्वेद) के ब्रांड एम्बेसडर रहे बाबा रामदेव, तेलंगाना राज्य के ब्रांड एम्बेसडर सानिया मिर्जा और महेश बाबू। इसी प्रकार सिक्किम राज्य के ब्रांड एम्बेसडर ए. आर. रहमान, गुड्स एण्ड सर्विस टैक्स (जीएसटी) के ब्रांड एम्बेसडर  अमिताभ बच्चन, हरियाणा के स्वास्थ्य कार्यक्रम के ब्रांड एम्बेसडर गौरी शोरान, स्वच्छ आदत, स्वच्छ भारत के ब्रांड एम्बेसडर काजोल, स्वच्छ आंध्र मिशन के ब्रांड एम्बेसडर पी. वी. सिंधु, स्वच्छ भारत मिशन की ब्रांड एम्बेसडर शिल्पा शेट्टी, स्वच्छ भारत मिशन उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड के ब्रांड एम्बेसडर अक्षय कुमार, भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट (वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट) की ब्रांड एम्बेसडर दीया मिर्जा, असम राज्य पर्यटन की ब्रांड एम्बेसडर प्रियंका चोपड़ा, स्किल इंडिया अभियान की भी ब्रांड एम्बेसडर है प्रियंका चोपड़ा, ‘माँ’ अभियान की ब्रांड एम्बेसडर माधुरी दीक्षित, हेपेटाइटिस-बी उन्मूलन के ब्रांड एम्बेसडर अमिताभ बच्चन, अतुल्य भारत अभियान के ब्रांड एम्बेसडर है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भारत के पशुपालन बोर्ड के ब्रांड एम्बेसडर है अभिनेता रजनीकांत, किसान चैनल के ब्रांड एम्बेसडर है अमिताभ बच्चन, स्वच्छ साथी कार्यक्रम की ब्रांड एम्बेसडर  दीया मिर्जा, निर्मल भारत अभियान की ब्रांड एम्बेसडर विद्या बालन, डिजिटल भारत की ब्रांड एम्बेसडर कृति तिवारी, उत्तर प्रदेश के समाजवादी किसान बीमा योजना के ब्रांड एम्बेसडर रहे अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दकी।

ब्रांडिग का क्रम यही थम जाता तो भी गनीमत था। गोया हमने अपने सुरक्षा बलों को भी ब्रांड बना दिया और उनके लिए ब्रांड एम्बेसडर भी अनुबंधित कर लिए गए। जैसे- सीआरपीएफ की ब्रांड एम्बेसडर पी. वी. सिन्धु और बीएसएफ के ब्रांड एम्बेसडर विराट कोहली। यदि हमने सुरक्षा बलों के लिए सिर्फ एम्बेसडर यानी राजदूत रखा होता तो बात थी लेकिन हमने तो ‘‘ब्रांड’’ एम्बेसडर रखा।

यदि राज्य एक ब्रांड है, बेटी बचाओ एक ब्रांड है, स्वच्छता मिशन एक ब्रांड है, शौचालय का उपयोग एक ब्रांड है, निर्मलजल एक ब्रांड है और अतुल्य भारत अभियान एक ब्रांड है तो हम अपने युवाओं से राष्ट्रप्रेम की आशा रखें अथवा बाज़ारवाद की? यदि राष्ट्र और मानवता के प्रति भावनाएं एवं कत्र्तव्य भी ब्रांड बन कर प्रचारित होने का समय हमने ओढ़ लिया है जो भारतीय विचार संस्कृति के मानक पर यह ब्रांडिंग कहां सही बैठती है, यह विचारणीय है और फिर क्यों कोसते हैं बाज़ारवाद को जिसका बुनियादी आधार ही ब्रांडिंग होता है। हमें सोचना चाहिए अपने इस दोहरेपन के बारे में। 

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(दैनिक, सागर दिनकर में 22.01.2026 को प्रकाशित)  

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