Thursday, January 22, 2026

चर्चा प्लस | बाज़ारवाद को कोसते और कर्तव्यों की ब्रांडिंग करते हम | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 

बाज़ारवाद को कोसते और कर्तव्यों की ब्रांडिंग करते हम

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

      यदि राज्य एक ब्रांड है, बेटी बचाओ एक ब्रांड है, स्वच्छता मिशन एक ब्रांड है, शौचालय का उपयोग एक ब्रांड है, निर्मलजल एक ब्रांड है और अतुल्य भारत अभियान एक ब्रांड है तो हम अपने युवाओं से राष्ट्रप्रेम की आशा रखें अथवा बाज़ारवाद की? हमने अपने सुरक्षा बलों को भी ब्रांड बना दिया और उनके लिए ब्रांड एम्बेसडर भी अनुबंधित कर लिए गए। जैसे- सीआरपीएफ की ब्रांड एम्बेसडर है पी. वी. सिन्धु तो बीएसएफ के ब्रांड एम्बेसडर है विराट कोहली रहे हैं। यदि राष्ट्र और मानवता के प्रति भावनाएं एवं कत्र्तव्य भी ब्रांड बन कर प्रचारित होने का समय हमने ओढ़ लिया है जो भारतीय विचार संस्कृति के मानक पर यह ब्रांडिंग कहां सही बैठती है, यह विचारणीय है। फिर बाज़ारवाद को क्यों कोसना?   .

     हम आज ब्रांडिग के समय में जी रहे हैं। हमारे शौच की व्यवस्था से ले कर राज्य, कत्र्तव्य और संवेदनाओं की भी ब्रांंिडग होने लगी है। ब्रांड क्या है? ब्रांड उत्पाद वस्तु की बाजार में एक विशेष पहचान होती है जो उत्पाद की क्वालिटी को सुनिश्चित करती है, उसके प्रति उपभोक्ताओं में विश्वास पैदा करती है। क्यों कि उत्पाद की बिक्री की दशा ही उत्पादक कंपनी के नफे-नुकसान की निर्णायक बनती है। कंपनियां अपने ब्रांड को बेचने के लिए और अपने ब्रांड के प्रति ध्यान आकर्षित करने के लिए ‘ब्रांड एम्बेसडर’ अनुबंधित करती हैं। यह एक पूर्णरुपेण बाज़ारवादी आर्थिक प्रक्रिया है। कमाल की बात यह है कि ब्रांडिग हमारे जीवन में गहराई तक जड़ें जमाता जा रहा है। इसी लिए नागरिक कत्र्तव्यों, संवेदनाओं एवं दायित्वों की भी ब्रांडिंग की जाने लगी है, गोया ये सब भी उत्पाद वस्तु हों।


आजकल राज्यों के भी ब्रांड एम्बेसडर होते हैं। जबकि राज्य एक ऐसा भू भाग होता है जहां भाषा एवं संस्कृति के आधार पर नागरिकों का समूह निवास करता है। - यह एक अत्यंत सीधी-सादी  परिभाषा है। यूं तो राजनीतिशास्त्रियों ने एवं समाजवेत्ताओं ने राज्य की अपने-अपने ढंग से अलग-अलग परिभाषाएं दी है। ये परिभाषाएं विभिन्न सिद्धांतों पर आधारित हैं। राज्य उस संगठित इकाई को कहते हैं जो एक शासन के अधीन हो। राज्य संप्रभुतासम्पन्न हो सकते हैं। जैसे भारत के प्रदेशों को ’राज्य’ कहते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार राज्य की उत्पत्ति का एकमात्र कारण शक्ति है। इसके अलावा युद्ध को राज्य की उत्पत्ति का कारण यह सिद्धांत मानता है जैसा कि वाल्टेयर ने कहा है प्रथम राजा एक भाग्यशाली योद्धा था। इस सिद्धांत के अनुसार शक्ति राज्य की उत्पत्ति का एकमात्र आधार है शक्ति का आशय भौतिक और सैनिक शक्ति से है। प्रभुत्व की लालसा और आक्रमकता मानव स्वभाव का अनिवार्य घटक है। प्रत्येक राज्य में अल्पसंख्यक शक्तिशाली शासन करते हैं और बहुसंख्यक शक्तिहीन अनुकरण करते हैं। वर्तमान राज्यों का अस्तित्व शक्ति पर ही केंद्रित है। 

राज्य को परिभाषित करते सामाजिक समझौता सिद्धांत को मानने वालों में थाॅमस हाब्स, जॉन लॉक, जीन जैक, रूसो आदि का प्रमुख योगदान रहा। इन विचारकों के अनुसार आदिम अवस्था को छोड़कर नागरिकों ने विभिन्न समझौते किए और समझौतों के परिणाम स्वरुप राज्य की उत्पत्ति हुई। वहीं विकासवादी सिद्धांत मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय प्रमाणों पर आधारित है। इसके अनुसार राज्य न    कृत्रिम संस्था है, न ही देवीय संस्था है। यह सामाजिक जीवन का धीरे-धीरे किया गया विकास है इसके अनुसार राज्य के विकास में कई तत्व जैसे कि रक्त संबंध धर्म शक्ति राजनीतिक चेतना आर्थिक आधार का योगदान है पर आज सबके हित साधन के रूप में विकसित हुआ। ऐसा राज्य क्या कोई उत्पाद वस्तु हो सकता है? जिसके विकास के लिए ब्रांडिंग की जाए?

शौचालय, और स्वच्छता की ब्राडिंग किया जाना और इसके लिए ब्रांड एम्बेसडर्स को अनुबंधित किया जाना बाजारवाद का ही एक नया रूप है। बाज़ारवाद वह मत या विचारधारा जिसमें जीवन से संबंधित हर वस्तु का मूल्यांकन केवल व्यक्तिगत लाभ या मुनाफ़े की दृष्टि से ही किया किया जाता है; मुनाफ़ा केंद्रित तंत्र को स्थापित करने वाली विचारधारा; हर वस्तु या विचार को उत्पाद समझकर बिकाऊ बना देने की विचारधारा। बाजारवाद में व्यक्ति उपभोक्ता बनकर रह जाता है, पैसे के लिए पागल बन बैठता है, बाजारवाद समाज को भी नियंत्रण में कर लेता है, सामाजिक मूल्य टूट जाते हैं। बाजारवाद एक सांस्कृतिक पैकेज होता है। जो उपभोक्ता टॉयलेट पेपर इस्तेमाल करता है, वह एयर कंडीशनर में ही सोना पसन्द करता है, एसी कोच में यात्रा करता है और बोतलबंद पानी साथ लेकर चलता है। इस संस्कृति के चलते लौह उत्खनन से लेकर बिजली, कांच और ट्रांसपोर्ट की जरूरत पड़ती है। यूरोप और अमेरिका में लाखों लोग केवल टॉयलेट पेपर के उद्योग में रोजगार पाते हैं। यह सच है कि बाजारवाद परंपरागत सामाजिक मूल्यों को भी तोड़ता है।


जीवनस्तर में परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। प्रत्येक व्यक्ति भौतिक सुखों के पीछे भागता है। उसकी इसी प्रवृत्ति को बाज़ार अपना हथियार बनाता है। यदि बाजार का स्वच्छता से नुकसान हो रहा है तो वह स्वच्छता को क्यों बढ़ने देगा? पीने का पानी गंदा मिलेगा तो इंसान वाटर प्यूरी फायर लेगा, हवा प्रदूषित मिलेगी तो वह एयर प्यूरी फायर लेगा। इस तरह प्यूरी फायर्स का बाज़ार फलेगा-फूलेगा। इस बाजार में बेशक नौकरियां भी मिलेंगी लेकिन बदले में प्रदूषित वातावरण बना रहेगा और सेहत पर निरंतर चोट करता रहेगा तो इसका खामियाजा भी तो हमें ही भुगतना होगा। 


स्वच्छता बनाए रखना एक नागरिक कत्र्तव्य है और एक इंसानी पहचान है। यदि इसके लिए भी ब्रांडिंग की जरूरत पड़े तो वह कत्र्तव्य या पहचान कहां रह जाता है? वह तो एक उत्पाद वस्तु है और जिसके पास धन है वह उसे प्राप्त कर सकता है, जिसके पास धन की कमी है वह स्वच्छता मिशन के बड़े-बड़े होर्डिंग्स के नीचे भी सोने-बैठने की जगह हासिल नहीं कर पाता है। 


भ्रूण हत्या एवं बेटी बचाओ का सीधा संबंध हमारी मानवीयता एवं संवेदनशीलता से है। यह भावना हमारे भीतर स्वतः जागनी चाहिए अथवा सरकार जो इन अभियानों की दिशा में प्रोत्साहनकारी कार्य करती है उन्हें संचालित होते रहना चाहिए। जब बात आती है इन विषयों के ब्रांड एम्बेसडर्स की तो फिर प्रश्न उइता है कि क्या बेटियां उपभोक्ता उत्पाद वस्तु हैं या फिर भ्रूण की सुरक्षा के प्रति हमारी संवेदनाएं महज विज्ञापन हैं। आज जो देश में आए दिन आपराधिक घटनाएं बढ़ रही हैं तथा संवेदना का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है, उसका सबसे बड़ा कारण यही है कि जाने-अनजाने हमारी तमाम कोमल संवेदनाएं बाजार के हाथों गिरवी होती जा रही हैं।


बात उत्पादन की बिक्री की हो तो उचित है किन्तु बाजार से हो कर गुजरने वाले कत्र्तव्यों में दिखावा अधिक होगा और सच्चाई कम। ब्रांड एम्बेसडर अनुबंधित करने के पीछे यही धारणा काम करती है कि जितना बड़ा अभिनेता या लोकप्रिय ब्रांड एम्बेसडर होगा उतना ही कम्पनी को आय कमाने में मदद मिलती है क्योंकि लोग वो सामान खरीदते है। अमूमन जितना बड़ा ब्रांड होता है उतना ही महंगा या उतना ही लोकप्रिय व्यक्ति ब्रांड एम्बेसडर बनाया जाता है क्योंकि बड़ा ब्रांड अधिक पैसे दे सकता है जबकि छोटा ब्रांड कम और ऐसा इसलिए क्योंकि कोई भी व्यक्ति जो ब्रांड का प्रतिनिधित्व करता है, उसकी फीस करोड़ों में होती है। एक तो अगर जनता उस व्यक्ति को अगर रोल मॉडल मानती है तो ऐसे में लोगो के दिलों में जगह बनाना आसान हो जाता है। 


सड़क सुरक्षा अभियान के ब्रांड एम्बेसडर है अक्षय कुमार, फिट इंडिया अभियान के ब्रांड एम्बेसडर कौन रहे हैं सोनू सूद, पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास के ब्रांड एम्बेसडर मैरीकॉम, असम राज्य के ब्रांड एम्बेसडर रही हैं हिमा दास, अरुणाचल प्रदेश राज्य के ब्रांड एम्बेसडर जॉन अब्राहम, हरियाणा (योग और आयुर्वेद) के ब्रांड एम्बेसडर रहे बाबा रामदेव, तेलंगाना राज्य के ब्रांड एम्बेसडर सानिया मिर्जा और महेश बाबू। इसी प्रकार सिक्किम राज्य के ब्रांड एम्बेसडर ए. आर. रहमान, गुड्स एण्ड सर्विस टैक्स (जीएसटी) के ब्रांड एम्बेसडर  अमिताभ बच्चन, हरियाणा के स्वास्थ्य कार्यक्रम के ब्रांड एम्बेसडर गौरी शोरान, स्वच्छ आदत, स्वच्छ भारत के ब्रांड एम्बेसडर काजोल, स्वच्छ आंध्र मिशन के ब्रांड एम्बेसडर पी. वी. सिंधु, स्वच्छ भारत मिशन की ब्रांड एम्बेसडर शिल्पा शेट्टी, स्वच्छ भारत मिशन उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड के ब्रांड एम्बेसडर अक्षय कुमार, भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट (वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट) की ब्रांड एम्बेसडर दीया मिर्जा, असम राज्य पर्यटन की ब्रांड एम्बेसडर प्रियंका चोपड़ा, स्किल इंडिया अभियान की भी ब्रांड एम्बेसडर है प्रियंका चोपड़ा, ‘माँ’ अभियान की ब्रांड एम्बेसडर माधुरी दीक्षित, हेपेटाइटिस-बी उन्मूलन के ब्रांड एम्बेसडर अमिताभ बच्चन, अतुल्य भारत अभियान के ब्रांड एम्बेसडर है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भारत के पशुपालन बोर्ड के ब्रांड एम्बेसडर है अभिनेता रजनीकांत, किसान चैनल के ब्रांड एम्बेसडर है अमिताभ बच्चन, स्वच्छ साथी कार्यक्रम की ब्रांड एम्बेसडर  दीया मिर्जा, निर्मल भारत अभियान की ब्रांड एम्बेसडर विद्या बालन, डिजिटल भारत की ब्रांड एम्बेसडर कृति तिवारी, उत्तर प्रदेश के समाजवादी किसान बीमा योजना के ब्रांड एम्बेसडर रहे अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दकी।

ब्रांडिग का क्रम यही थम जाता तो भी गनीमत था। गोया हमने अपने सुरक्षा बलों को भी ब्रांड बना दिया और उनके लिए ब्रांड एम्बेसडर भी अनुबंधित कर लिए गए। जैसे- सीआरपीएफ की ब्रांड एम्बेसडर पी. वी. सिन्धु और बीएसएफ के ब्रांड एम्बेसडर विराट कोहली। यदि हमने सुरक्षा बलों के लिए सिर्फ एम्बेसडर यानी राजदूत रखा होता तो बात थी लेकिन हमने तो ‘‘ब्रांड’’ एम्बेसडर रखा।

यदि राज्य एक ब्रांड है, बेटी बचाओ एक ब्रांड है, स्वच्छता मिशन एक ब्रांड है, शौचालय का उपयोग एक ब्रांड है, निर्मलजल एक ब्रांड है और अतुल्य भारत अभियान एक ब्रांड है तो हम अपने युवाओं से राष्ट्रप्रेम की आशा रखें अथवा बाज़ारवाद की? यदि राष्ट्र और मानवता के प्रति भावनाएं एवं कत्र्तव्य भी ब्रांड बन कर प्रचारित होने का समय हमने ओढ़ लिया है जो भारतीय विचार संस्कृति के मानक पर यह ब्रांडिंग कहां सही बैठती है, यह विचारणीय है और फिर क्यों कोसते हैं बाज़ारवाद को जिसका बुनियादी आधार ही ब्रांडिंग होता है। हमें सोचना चाहिए अपने इस दोहरेपन के बारे में। 

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(दैनिक, सागर दिनकर में 22.01.2026 को प्रकाशित)  

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बतकाव बिन्ना की | एक ने कई औ सैंकड़न ने दोहराई | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की | एक ने कई औ सैंकड़न ने दोहराई | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की  
   एक ने कई औ सैंकड़न ने दोहराई
  - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

‘‘बिन्ना कछू पूछें?’’ भैयाजी ने तनक गंभीर होत भए कई। 
मोए धड़का सो लगो के जे ऐसो काए कै रए? मोसे कछू मिस्टेक हो गई का, जो भैयाजी ऐसी पूछ रए? का भओ हुइए?
‘‘हऔ भैयाजी पूछो!’’ मैंने डरात-डरात कई।
‘‘जो बताओ के मुतके जने बुरई बात पकर के काए बैठ जात आएं?’’ भैयाजी ने पूछी।
जा सुन के मोरो मूंड़़ चकरा गओ। काए से के मोए लग रओ हतो के भैयाजी कछू मोरे बारे में पूछबे वारे आएं। पर बे तो मुतके जने की बात कर रए। बाकी जे मुतके जने की बतकाव कऊं मोरे बारे में तो नोंईं? का हो सकत आए? औ फिकर भई।
‘‘भैयाजी मोए समझ ने पर रई के आप पूछो का चा रए? काए मोसे कछू गलती हो गई का?’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘अरे नईं! हम तुमाई नईं कै रए। हम तो दीन-दुनिया की कए रै।’’ भैयाजी ने कई। जा सुन के मोए तनक सहूरी भई। भैयाजी लगाई-बुझाई वारों पे कान देबे वारे नोंई, पर कनकुतरों की का, कछू बी कोनऊ के बारे में कान भरत रैत आएं।
‘‘सो बताओ आप काए के बारे में कै रए?’’ मैंने पूछी।
‘‘हम जा कै रए के लोग बड़े-बड़े लोगन की कथा सुनबे जात आएं। पर उनकी नोनी बात पे कोनऊं बतकाव नईं करी जात आए। है के नईं?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘हऔ जा तो आए। बात तो करत आएं बाकी ज्यादा नईं।’’ मैंने कई।
‘‘ज्यादा नईं? हम तो कै रए के ऊके सामने तो उत्तो बी नईं जित्तो जो बे कछू गलत बोल जाएं तो बे ट्रोल कर दए जात आएं। बे बी इंसान आएं, गलती उनसे बी हो सकत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ! जा तो आए। पर पब्लिक उनको भगवान घांई मानन लगत आए। मोए लगत के जेई से उने बुरौ लगत आए।’’ मैंने कई।
‘‘पब्लिक खों तो कम, ट्रोलर हरों को ज्यादा मजो आत आत आए। और बाकी अकल के अंधरा हरें उनको दोहरान लगत आएं। जे ई पे मोए गुस्सा आत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘लेकन आप इत्तो काए सोच रए? जा तो दुनिया आए। इते सबई तरां के लोग रैत आएं।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘बा तो ठीक आए, बाकी हमें जा सोच के पीरा होत आए के लोग गलत बातन पे कित्तो ज्यादा जुट जात आएं। मनो उने गलत बात ई अच्छी लगत होए।’’ भैयाजी बोले।
बात तो उनकी सई हती। कोऊ चाए सई कए, चाए गलत मनो ट्रोलर हरों को तो ट्रोल करबे में मजो आउत आए, चाए ऊको रिजल्ट कैसो बी रए। सई कई जाए तो जा बी एक तरां की पगलेटपना आए। अच्छी अंग्रेजी में कई जाए तो साइको पना। बे को आ कोऊं खों जज करबे वारे? मनो बे अपने को ऐसई मानत आएं। सो भैयाजी जो कै रए, बे गलत नोईं कै रए। को जाने का होत जा रओ के लोग बुरौ देख के ऊकी जुगाली करबे में ज्यादा जुटे रैत आएं, अच्दी बातन के जांगा।
‘‘भैयाजी, जे टेम ई ऐसो चल रओ। को तो एक जमाना में रामलीला होत्ती, फेर आरकेस्ट््रा चलो, औ अब बा बी घटिया सो होन लगो। मने पैले बच्चा हरें बी रामलीला में राम औ लछमन खों देखत्ते तो उनई के जैसे बनो चात्ते। अब बे ‘लाॅलीपाॅप-लाॅलीपाॅप’ देखत आएं तो ऊंसई कूल्हा मटकात फिरत आएं। का कओ जाए।’’ मैंने कई।
‘‘सई में, आजकाल जे कै-सुने के संत हरें कछू के कछू बकत रैत आएं औ दूसरे उनकी बेई बातें दोहरात आएं। उने बा सब याद नई रैत जो उन्ने अच्छी-अच्छी बातें करी हतीं। औ आजकाल तो मनो फैशन सो चल रओ के लुगाइन के बारे में अंटशंट बको औ नांव कमा लेओ। काए से उनके लाने बदनामी में बी नामी होत आए।’’ भैयाजी बोले। 
‘‘सई कै रए आप भैयाजी! जेई पे से मोए बा किसां याद आ गई के एक देस में एक राजा हतो। ऊको एक दिनां लगो के महल से बायरे ज के पतो करो जाए के ऊकी परजा ऊको कित्तो जानत आए। सो ऊने भेस बदरो औ अपने मंत्री को संग ले के संझा खों निकर परो। फिरत-फिरत रात को दूसरो पहर हो गओ मनो ऊको कोनऊ ऐसो ने मिलो जीको अपने राजा के बारे में ज्यादा पतो होय। जा जान के राजा बड़ो दुखी भओ। ऊने मंत्री से पूछी के का करो जाए? सो मंत्राी बोलो के महराज ऐसो करो जाए के आपकी बड़ी-बड़ी फोटुएं बनबा के हरेक गली-चौराए पे लगवा दई जाए। ईसे सबई आपखों रोज-रोज देखहें औ चीनने लगहें। राजा को मंत्री को जो आइडिया भौतई नोनो लगो। ऊने दूसरई दिन अपनी मुतकी फोटुएं बनवाई और अपने राज के सबरे चैराए पे टंगवा दईं। पैले दिनां तो सबने देखी औ ऊके बारे में बतकाव करी, मनो दूसरे दिनां बे अपने-अपने काम में लग गए। फेर को आ पूछ रओ तो राजा की फोटुअन को? राजा फेर एक दिनां ऊंसई भेस बदर के निकरो। ऊने देखो के कोनऊं ऊके बारे में बतकाव नईं कर रओ। सो ऊको बड़ो दुख भओ। ऊने फेर के मंत्री से कई के कछू करो के जीसें परजा हमाई बात करे। ईपे मंत्री बोलो के जो हो तो सकत आए, बाकी आप खों ईके लाने राजी होने हुइए। राजा बोलो के हमें कोनऊं परेसानी नईं, तुम तो जो समझ परे सो करो। ईपे मंत्री ने का करो के दूसरे दिन ऊने राजा की दूसरी फोटुएं बनवाईं औ ऊके संगे धमकी वारी कछू बुरई बातें लिखवा दईं। ऊके बाद तो पूरी परजा में हल्ला मच गओ। ऊके दस दिनां बाद राजा फेर के पता करबे निकरो। बा जां बी गओ परजा ऊकोई गरियात मिली। राजा को जा सब देख के अचरज भओ। तब मंत्री ने राजा को समझाओ के लोग बुरई बातन पे ज्यादा बतकाव करत आएं औ ज्यादा याद रखत आएं जेई लाने ऊको राजा जू खों खलनायक बना के सामने करो। राजा ने जा देखों-सुनो तो बा दंग रै गओ। ऊको अपनी परजा से जा उमींद ने हती। ऊको पतो ने हतो के बुराई की लम्बी दुम होत आए जो जो कुल्ल दिनां तक हलत रैत आए।’’ मैंने भैयाजी खों किसां सुनाई।
‘‘बिलकुल सई किसां आए। पैले ऐसो रओ के ने रओ बाकी आजकाल तो जेई चल रओ।’’ भैयाजी बोले। हम दोई फिकर करत बैठे रए।  
मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। जे जरूर सोच के देखियों के हमें हमें अच्छी बातें दोहराओ चाइए के बुरई बातें?  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Tuesday, January 20, 2026

पुस्तक समीक्षा | तन्हाईयों के स्वर को शब्दों में पिरोतीं बेहतरीन ग़ज़लें | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
तन्हाईयों के स्वर को शब्दों में पिरोतीं बेहतरीन ग़ज़लें
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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गजल संग्रह - तन्हाईयाँ आवाज देती हैं
शायर      - विनीत मोहन फ़िक्र सागरी
प्रकाशक  - के.बी.एस. प्रकाशन दिल्ली, 111 ए.जी-एफ, आनन्द पर्वत, इंडस्ट्रियल एरिया, दिल्ली-110005
मूल्य - 200/- पेपर बैक, 300/- हार्डबाउंड
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विनीत मोहन औदिच्य उर्दू शाइरी में जिनका तख़ल्लुस “फ़िक्र सागरी” है, एक बेहतरीन अनुवादक और उम्दा सॉनेटियर हैं। इन्होंने पाब्लो नेरूदा के सॉनेट्स का अनुवाद किया है। स्वयं भी सॉनेट्स लिखते हैं तथा विभिन्न समाचारपत्रों, पत्रिकाओं व वेबसाइट्स में रचनाओं का सतत प्रकाशन होता रहता है। 10 फरवरी, 1961 करहल, मैंनपुरी, उ.प्र. में जन्में तथा वर्तमान में सागर, मध्यप्रदेश में निवासरत विनीत मोहन औदिच्य की ग़ज़लों से पहले मैंने उनके द्वारा अनूदित सॉनेट्स तथा उनके मौलिक सॉनेट पढ़े थे। उसी दौरान मुझे विनीत मोहन औदिच्य  उर्फ फ़िक्र सागरी की ग़ज़लों को पढ़ने का भी अवसर मिला और उनकी बहुमुखी प्रतिभा से मेरा परिचय हुआ। गुजराती भाषी विनीत मोहन औदिच्य को अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं पर सामान अधिकार है। वर्तमान में वे शासकीय महाविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य व भाषा का अध्यापन कार्य कर रहे हैं। अब तक उनके काव्यात्मक अनुवाद सहित 11 काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनके कृतित्व के लिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर की कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।
‘‘तन्हाईयाँ आवाज देतीं हैं’’ ग़ज़ल संग्रह की ग़ज़लों का आकलन आरम्भ किया जाए उस ग़ज़ल से जिससे संग्रह का नामकरण हुआ है। यद्यपि यह संग्रह की कुल 105 ग़ज़लों में 42 वीं ग़ज़ल है। इस ग़ज़ल में रूमानियत का वह पहलू है जिससे लगभग हर व्यक्ति को अपने जीवन में कभी न कभी हो कर गुज़रना पड़ता है। इस ग़ज़ल में विछोह का वह स्वर है जो अपने किसी भी प्रिय से बिछड़ जाने के दुख को प्रतिध्वनित करता है। ग़ज़ल के कुछ शेर देखें -
सुरों में  गूंजतीं  शहनाइयाँ आवाज देती हैं
मुझे बागों में अब अमराइयाँ आवाज देती हैं
चहकता था मुहब्बत से जो सुहबत में कभी तेरी
मुझे उस घर की अब तन्हाइयाँ आवाज देती हैं
हुए पागल-दीवाने हम कहाँ था होश इतना भी
न जाना इश्क की रुसवाइयाँ आवाज देतीं हैं
अभी भी उन पुरानी यादों की छत से मुझे अक्सर
तेरी शोखी  भरी  अंगड़ाइयाँ आवाज देतीं हैं

यूं भी यह अकेलेपन को जीने के दौरान स्मृतियों एवं आत्मसंवाद का वे पल होते हैं जब ऐसा प्रतीत होता है कि तनहाई ही साथी बन कर बात कर रही है, आवाज़ दे रही है। इस ग़ज़ल संग्रह की ग़ज़लों पर ज़दीद और ‘‘रिवायती ख़़यालात से सजी ग़ज़लों का मज़्मुआ’’ शीर्षक से वरिष्ठ शाइर प्रो. डॉ. गजाधर सागर ने लिखा है कि  - ‘‘तन्हाईयाँ आवाज़ देतीं हैं’। मेरे दिल को छू गए हैं। संग्रह का शीर्षक ‘‘तन्हाइयाँ आवाज देतीं हैं’’ यह दर्शाता है कि सिर्फ भीड़, बातचीत, शोर अथवा तबादला-ए-ख़यालात में ही आवाज़ नहीं गूँजती है वरन् तन्हाईयों, ख़ामोशियों और अकेलेपन में भी आवाज़ सुनाई देती है बस उसे सुनने की ताब सुनने वालों में होना चाहिए।’’

इसी संग्रह की भूमिका में चर्चित शाइर देवेन्द्र माँझी ने ‘‘अनेक विषय-वस्तुओं के फूल खिले हैं ‘तन्हाईयाँ आवाज देती हैं’ के गजल-उद्यान में” के रूप में लिखा है कि - “सुप्रसिद्ध कवि विनीत मोहन औदिच्य की ग़ज़लों का ऐसा संग्रह है, जिसके अश्आर प्रेम-रस की गंगा तो बहाते ही हैं, साथ ही साथ सामाजिक-राजनीतिक और धार्मिक पहलुओं पर भी अपनी पैनी नजर गड़ाए रखते हैं। शब्दों का किसी बहर विशेष में जमावड़ा कर देने भर से ग़ज़ल नहीं हो जाती, जिसके लिए कोमल और चमत्कारिक लहजे की भी आवश्यकता होती है-इस बात को कवि श्री औदिच्य जी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं, तभी उन्होंने अपने रचना-धर्मिता के सफ़र में शब्दों को बहुत देखभाल कर और ठोंक-बजाकर अपना हमसफर बनाया है।’’

वहीं, “शाइर की कलम से” में अपनी बात करते हुए फ़िक्र सागरी लिखते हैं कि- “ख़ुशबू-ए-सुखन, कारवाँ-ए-सुखन, कारवाँ-ए-ग़ज़ल, अंदाज़-ए-सुखन व अंदाज़-ए- ग़ज़ल के बाद, तन्हाईयाँ आवाज़ देतीं हैं मेरा छठवाँ ग़ज़ल मज़्मुआ है जो शाया होने जा रहा है। अपनी इन ग़ज़लों में मैंने अपनी ज़िन्दगी के मुख़्तलिफ रंगों के अहसासात को शामिल किया है। उन्यान चाहे जो हो, मुहब्बत, ज़दीदी, रवायती समाजी, सियासी, इंसानियत के ख़िलाफ नाइंसाफ़ी या ज़ुल्म, ऐसी कोशिश की गई है कि ज़िन्दगी का कोई भी पहलू नहीं छूटे।”

बेशक़ शाइर फ़िक्र सागरी ने ज़िन्दगी के हर पहलू को समेटने का प्रयास किया है फिर भी प्रेम की कोमल भावनाएं उभर कर प्रभावी ढंग से सामने आई हैं जिनमें मिलन की मधुरता भी है और वियोग की पीड़ा भी। इश्क़ में क्या हाल होता है इसकी बानगी में देखिए संग्रह की एक ग़ज़ल के कुछ शेर-
हुस्न की बेशुमार चाहत में
दिल लुटाते रहे शराफ्त में।
इश्क में दर्द कम नहीं होता
मर्ज़ बढ़ने लगा है उल्फत में।
हाल सुनता कहाँ है वो मेरा
जान अब आ पड़ी है आफत में।

मोहब्बत में परस्पर मिल कर दुख-सुख बांटने और एक-दूसरे की भावनाओं को समझने का तीव्र आग्रह निहित होता है। इस स्थिति को शाइर ने बड़ी ख़ूबसूरती से बयान किया है-
ज़ीस्त के हर गम को भी साझा करे
मुझसे मिलने का भी वो वादा करे।
चैन ही मिलता नहीं है अब मुझे
कौन है जो दर्द को आधा करे
हों भले जज़्बात दिल के अर्श पर
बात तो तब है बयां सादा करे
छोड़कर दामन चला अब किसलिए
कुर्ब में वो बैठ कर चर्चा करे

फ़िक्र सागरी व्यष्टि की बात करते-करते बड़े स्वाभाविक ढंग से समष्टि की बात करने का महारत रखते हैं। वर्तमान दशा में मरती संवेदनाएं एवं गिरते चरित्र को बखूबी रेखांकित किया है शाइर ने। उदाहरण के लिए उनके ये शेर देखें-
वो सदा अपने ही किरदार से भारी निकला
उसके पैरों के तले रेत से पानी निकला।
इस मुहब्बत के जो अल्फाज़ कई खोजे तो
सनसनीखेज इबारत में मआनी निकला।
फलसफा ज़ीस्त का जो हमको सुनाने आया
वो भी बंदर को लिए एक मदारी निकला।
भीड़ भगवान के मंदिर में बड़ी देखी तो
भोग की चाह में अंदर से शराबी निकला।

    इंसानों में अवसरवादिता इस तरह पैंठ गई है कि हर दूसरा इंसान इंसानियत खो कर दूसरे का अधिकार छीनने को उतारू हो उठता है। यही कारण है कि हर इंसान परस्पर एक-दूसरे से डरने लगा है।
जाने ये कैसा जमाने का असर लगता है
आज इंसान को इंसान से डर लगता है।
मेरी फितरत ही नहीं शोर-शराबा करना
दर्द होता है मगर जख़्म जिधर लगता है।

इसी हालात को और अधिक बयां करते हुए फ़िक्र सागरी ये शेर कहते हैं कि -
ये ताज़ा ख़ौफ़ का मंज़र वही है
चुभा जो पीठ में खंज़र वही है
नहीं कुछ बोलता मुँह से कभी जो
वो कड़वा सच न बोले डर वही है

      अगर माहौल बिगड़ता है तो उसकी जिम्मेदारी से सियासत को बरी नहीं किया जा सकता है। इसी कटु यथार्थ पर शाइर ने कहा है-‘‘चुनी अंधों ने हो सरकार पहले तो नहीं देखी / तनी हो जुल्म की तलवार पहले तो नहीं देखी।’’ सारी अव्यवस्थाओं के पीछे भी झांक कर देखते हुए फ़िक्र सागरी उनका कारण तलाशते हैं और उन्हें कारण मिलता भी है कि -‘‘रात दिन जुल्मों को सहता आदमी / है मयस्सर कब यहाँ सबको खुशी। / बेटियों की लुट रही इज़्जत मगर / छा रही सारे जहाँ में ख़ामुशी।’’ सो, जब ऐसा वातावरण होगा तो मोहब्बत रुस्वा और बदहाल तो होगी ही।

विनीत मोहन औदिच्य ‘‘फ़िक्र सागरी’’ का यह ग़ज़ल संग्रह ‘‘तन्हाईयां आवाज़ देती हैं’’ में प्रेम की निज भावनाओं से ले कर जीवन के विभिन्न स्तरों पर छाई दुरावस्था की बात करती ग़ज़लें हैं। चूंकि एकांत विचार मंथन एवं भावों के आकलन का अवसर देता है इसलिए तन्हाई के स्वर को पिरोते हुए फ़िक्र सागरी ने बेहतरीन ग़ज़लें पाठकों के लिए दी हैं। उर्दू ज़मीन की इन ग़ज़लों को देवनागरी लिपि में सहजता से पढ़ा जा सकता है और इन्हें ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए। खा़लिस उर्दू के कठिन शब्दों के होते हुए भी ग़ज़लों के मर्म को समझना आसान है क्यों कि इन्हें इस सहजता से कहा गया है कि उन शब्दों का भावार्थ सुगमता से समझा जा सकता है।
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Saturday, January 17, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | जबरा मारे औ रोन न दए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
जबरा मारे औ रोन न दए
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
        कछू कहनात जिनगी में ऐसी फिट बैठत हैं के मानो ओई के लाने बनी होएं। जो ज्ञान मिलो हमें ऊ दिनां जबें हम मकरोनिया तिगड्डा पे कछू काम के लाने गए रए। का भओ के। जां हम ठाड़े हते उतई बाजू में मेडिकल स्टोर हती। एक आदमी अपनी फटफटिया पे आओ औ हड़बड़ात भओ फटफटिया ठाड़ी कर के दवाई लेबे दूकान पे चलो गओ। आजकाल ऊंसई खांसी, सर्दी, बुखार को महौल चल रओ सो दूकानपे भारी भीर हती। उते बा आदमी भीर में घुसो औ इते टिरेफिक वारे गाड़ियन के चका में तारो डार के आगे बढ़ गए। जो लौं बा आदमी दवा ले के अपनी फटफटिया के लिंगे पौंचो तो जा देख के सनाका खा गओ के ऊकी गाड़ी के चका में बड़ो सो तारो डरो। अब बा छटपटान लगो के ऊको दवाई लेके तुरतईं घरे पौंचने। काए से ऊको मोड़ा खींबई बीमार हतो, जीको सुजी लगने ती। कछू जने ने पता करो के बे टिरेफिक वारी गाड़ी तो तारो डारत भई दूसरे चौराए पे जा पौंची है सो जा सुन के बा आदमी औ घबड़ानों। इत्ते में एक स्कूटी वारो उते आओ। ऊको दया आई। बा भाग के गओ औ टिरेफिक गाड़ी से तारो खोलबे वारे को अपने पांछू बिठा के लाओ। तब कऊं बा आदमी दवाई ले के जा पाओ। 
   अब आप कैहो के बे टिरेफिक वारे अपनी ड्यूटी कर रए हते। हऔ! बाकी जा तब सई ठैरतो जबे मकरोनिया पे कोनऊं ढंग को पार्किंग जोन होतो औ गाड़ी जोन के बायरे रैती। मने एक तो सई से पार्किंग जोन नईं, ऊपरे से चका में तारो औ चालान। सो, भओ न के जबरा मारे औ रोन न दे।
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Friday, January 16, 2026

शून्यकाल | आज फिर आवश्यकता है ‘ढाई आखर’ को समझने की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल | आज फिर आवश्यकता है ‘ढाई आखर’ को समझने की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
शून्यकाल 
आज फिर आवश्यकता है ‘ढाई आखर’ को समझने की
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
                                                                                      साहित्य में प्रेम का स्वरूप बड़े सुंदर ढंग से परिभाषित किया गया है। अलौकिक प्रेम की बात करे तो ‘प्रेम गली अति सांकरी, जामें दो न समाय’ के माध्यम से अहं और ईश्वर दोनों का एक साथ प्रेम होना असंभव बताया गया है। वहीं लौकिक प्रेम में सादगी पर बल दिया जाता रहा है। लेकिन दोनों का आशय एक ही है। वैसे तेजी से बदलती जीवनशैली में कुछ घटनाओं को देख, सुन कर लगता है कि मानो समाज में प्रेम की भावना कम होती जा रही है। क्या सचमुच? या फिर प्रेम के प्रति समझ कम हो रही है?

    सूफ़ी संत रूमी से जुड़ा एक किस्सा है कि शिष्य ने अपने गुरु का द्वार खटखटाया। 
‘बाहर कौन है?’ गुरु ने पूछा।
‘मैं।’ शिष्य ने उत्तर दिया।
‘इस घर में मैं और तू एक साथ नहीं रह सकते।’ भीतर से गुरू की आवाज आई। 
दुखी होकर शिष्य जंगल में तप करने चला गया। साल भर बाद वह फिर लौटा। द्वार पर दस्तक दी। 
‘कौन है?’ फिर वही प्रश्न किया गुरु ने।
‘आप ही हैं।’ इस बार शिष्य ने जवाब दिया और द्वार खुल गया। 
संत रूमी कहते हैं- ‘प्रेम के मकान में सब एक-सी आत्माएं रहती हैं। बस प्रवेश करने से पहले मैं का चोला उतारना पड़ता है।’
यह ‘मैं’ का चोला यदि न उतारा जाए और दो के अस्तित्व को प्रेम में मिल कर एक न बनने दिया जाए तो प्रेम में विद्रूपता आए बिना नहीं रहती है। इसीलिए कबीर ने भी कहा है- ‘‘प्रेम गली अति सांकरी, जामें दो न समाय।
‘प्रेम’ एक जादुई शब्द है। कोई कहता है कि प्रेम एक अनभूति है तो कोई इसे भावनाओं का पाखण्ड मानता है। जितने मन, उतनी धारणाएं। मन में प्रेम का संचार होते ही एक ऐसा केन्द्र बिन्दु मिल जाता है जिस पर सारा ध्यान केन्द्रित हो कर रह जाता है। सोते-जागते, उठते-बैठते अपने प्रेम की उपस्थिति से बड़ी कोई उपस्थिति नहीं होती, अपने प्रेम से बढ़ कर कोई अनुभूति नहीं होती और अपने प्रेम से बढ़ कर कोई मूल्यवान वस्तु नहीं होती। निःसंदेह प्रेम एक निराकार भावना है किन्तु देह में प्रवेश करते ही यह आकार लेने लगती है। एक ऐसा आकार जिसमें स्त्री मात्र स्त्री हो जाती है और पुरुष मात्र पुरुष, फिर भी एकात्मा।
प्रश्न उठता है कि पृथ्वी गोल है इसलिए दो विपरीत ध्रुव टिके हुए हैं अथवा दो विपरीत ध्रुव़ों के होने से पृथ्वी अस्तित्व में है? ठीक इसी तरह प्रश्न जागता है कि प्रेम का अस्तित्व देह से है या देह का अस्तित्व प्रेम से? कोई भी व्यक्ति अपनी देह को उसी समय निहारता है जब वह किसी के प्रेम में पड़ता है अथवा प्रेम में पड़ने का इच्छुक हो उठता है। वह अपनी देह का आकलन करने लगता और उसे सजाने-संवारने लगता है। या फिर प्रेम के वशीभूत वह अपनी या पराई देह पर ध्यान देता है। प्रेम में पड़ कर पक्षी भी अपने परों को संवारने लगते हैं। बड़ी उलझी हुई भावना है प्रेम। इस भावना को लौकिक और अलौकिक के खेमे में बांट कर देखने से सामाजिक दबाव कम होता हुआ अनुभव होता है। इसीलिए कबीर बड़ी सहजत से ये कह पाते हैंकि -
‘पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, हुआ न पंडित कोय। 
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।।’

प्रेम कोई पोथी तो नहीं जिसे पढ़ा जा सके, फिर प्रेम को कैसे पढ़ा जा सकता है? यदि प्रेम को पढ़ा नहीं जा सकता, बूझा नहीं जा सकता तो समझा कैसे जाएगा? तो क्या प्रेम सोचने का भी अवसर देता है? कहा तो यही जाता है कि प्रेम सोच-समझ कर नहीं किया जाता है। यदि सोच-समझ को प्रेम के साथ जोड़ दिया जाए तो लाभ-हानि का गणित भी साथ-साथ चलने लगता है। बहरहाल सच्चाई तो यही है कि प्रेम बदले में प्रेम ही चाहता है और इस प्रेम में कोई छोटा या बड़ा हो ही नहीं सकता है। जहां छोटे या बड़े की बात आती है, वहीं प्रेम का धागा चटकने लगता है। ‘‘रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाए।’’ प्रेम सरलता, सहजता और स्निग्धता चाहता है, अहम की गांठ नहीं। इसीलिए जब प्रेम किसी सामाजिक संबंध में ढल जाता है तो प्रेम करने वाले दो व्यक्तियों का पद स्वतः तय हो जाता है।

हजारी प्रसाद द्विवेद्वी लिखते हैं कि ‘‘प्रेम से जीवन को अलौकिक सौंदर्य प्राप्त होता है। प्रेम से जीवन पवित्र और सार्थक हो जाता है। प्रेम जीवन की संपूर्णता है।’ 

आचार्य रामचंद्र शुक्ल मानते थे कि ‘‘प्रेेम एक  संजीवनी शक्ति है। संसार के हर दुर्लभ कार्य को करने के लिए यह प्यार संबल प्रदान करता है। आत्मविश्वास बढ़ाता है। यह असीम होता है। इसका केंद्र तो होता है लेकिन परिधि नहीं होती।’’ 

क्या सचमुच परिधि नहीं होती प्रेम की? यदि प्रेम की परिधि नहीं होती है तो सामाजिक संबंधों में बंधते ही प्रेम सीमित क्यों होने लगता है?

प्रेमचंद ने लिखा है कि ‘‘मोहब्बत रूह की खुराक है। यह वह अमृतबूंद है, जो मरे हुए भावों को ज़िन्दा करती है। यह ज़िन्दगी की सबसे पाक, सबसे ऊंची, सबसे मुबारक़ बरक़त है।’’

प्रेम की परिभाषा बहुत कठिन है क्योंकि इसका सम्बन्ध अक्सर आसक्ति (वासना) से जोड़ दिया जाता है जो कि बिल्कुल अलग चीज है। जबकि प्रेम का अर्थ, एक साथ महसूस की जाने वाली उन सभी भावनाओं से जुड़ा है, जो मजबूत लगाव, सम्मान, घनिष्ठता, आकर्षण और मोह से सम्बन्धित हैं। प्रेम होने पर परवाह करने और सुरक्षा प्रदान करने की गहरी भावना व्यक्ति के मन में सदैव बनी रहती है। प्रेम वह अहसास है जो लम्बे समय तक साथ देता है और एक लहर की तरह आकर चला नहीं जाता। इसके विपरीत आसक्ति में व्यक्ति  पर प्रबल इच्छाएं या लगाव की भावनाएं हावी हो जाती हैं। यह एक अविवेकी भावना है जिसका कोई आधार नहीं होता और यह थोड़े समय के लिए ही कायम रहती है लेकिन यह बहुत सघन, तीव्र होती है अक्सर जुनून की तरह होती है। प्रेम वह अनुभूति है, जिससे मन-मस्तिष्क में कोमल भावनाएं जागती हैं, नई ऊर्जा मिलती है व जीवन में मीठी यादों की ताजगी का समावेश हो जाता है।  

प्रेम का मार्ग कठिन होता है। प्रेम मार्ग में अनेक बाधाएं होती हैं। मीरा को भी विषपान करना पड़ा था। तभी तो  जिगर मुरादाबादी कहते हैं-
ये इश्क़ नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है। 
प्रेम बलपूर्वक नहीं पाया जा सकता। दो व्यक्तियों में से कोई एक यह सोचे कि चूंकि मैं फलां से प्रेम करता हूं तो फलां को भी मुझसे प्रेम करना चाहिए, तो यह सबसे बड़ी भूल है। प्रेम कोई ‘एक्सचेंज़ ऑफर’ जैसा व्यवहार नहीं है कि आपने कुछ दिया है तो उसके बदले आप कुछ पाने के अधिकारी बन गए। यदि आपका प्रेम पात्र भी आपसे प्रेम करता होगा तो वह स्वतः प्रेरणा से प्रेम के बदले प्रेम देगा, अन्यथा आपको कुछ नहीं मिलेगा। बलात् पाने की चाह कामवासना हो सकती है प्रेम नहीं। वहीं, दो प्रेमियों के बीच कामवासना प्रेम का अंश हो सकती है सम्पूर्ण प्रेम नहीं। यदि प्रेम स्वयं ही अपूर्ण है तो वह प्रसन्नता, आह्ल्लाद कैसे देगा? वह दुख देगा, खिझाएगा और निरन्तर हठधर्मी बनाता चला जाएगा। प्रेम की इसी विचित्रता को रसखान ने इन शब्दों में लिखा है -
प्रेम रूप दर्पण अहे, रचै अजूबो खेल।
या में अपनो रूप कछु, लखि परिहै अनमेल।। 
आज के इस आधुनिक युग में भले ही लोग कहें कि प्रेम के मायने बदल गए हैं, लेकिन सच यही है कि सच्चे प्रेम का स्वरूप बदला नहीं है, वह जैसा सूर, कबीर और रसखान के समय था वैसा ही आज भी है, बस जरूरत है इसे समझने और याद रखने की। 
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Thursday, January 15, 2026

चर्चा प्लस | दो पीढ़ियों की परस्पर दूरियां मिटाती है मकर संक्रांति | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस | दो पीढ़ियों की परस्पर दूरियां मिटाती है मकर संक्रांति | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर 

चर्चा प्लस

दो पीढ़ियों की परस्पर दूरियां मिटाती है मकर संक्रांति
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
         मकर संक्रांति तिल-गुड़, स्नान और पतंग का त्यौहार है। यूं तो सूर्य के धनु से मकर राशि में प्रवेश को उत्तरायण माना जाता है और सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश के संक्रांतिकाल को मकर संक्रांति के पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह मात्र धार्मिक पर्व नहीं वरन् एक सामाजिक पर्व है और इसमें निहित है संदेश दो पीढ़ियों के बीच निकटता लाने का। यह संदेश आज के परिवेश में बेहद महत्वपूर्ण है जब आज परिवार बिखर रहे हैं, वृद्धाश्रम खुलते जा रहे हैं और बड़ों ओर बच्चों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं जेनेरेशन गेप के नाम पर। मकर संक्रांति में पिता-पुत्र के पारस्परिक मेल की रोचक कथा भी मौजूद है जिसे जानना और समझना जरूरी है।

        सूर्य पर आधारित मकर संक्रांति का भारतीय संस्कृति में बहुत महत्व माना गया है। वेद और पुराणों में भी इस दिन का विशेष उल्लेख मिलता है। मकर संक्रांति खगोलीय घटना है, जिससे जड़ और चेतन की दशा और दिशा तय होती है। सूर्य के धनु से मकर राशि में प्रवेश को उत्तरायण माना जाता है। वर्ष को दो भागों में बांटा गया है। पहला उत्तरायण और दूसरा दक्षिणायन। उक्त दो अयन को मिलाकर एक वर्ष होता है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करने की दिशा बदलते हुए थोड़ा उत्तर की ओर बढ़ता जाता है, इसलिए इस काल को उत्तरायण कहते हैं। सूर्य है तो जीवन है। इसीलिए, सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना वैदिक ज्योतिष के अनुसार काफी महत्वपूर्ण घटना है। सूर्यदेव जिस दिन धनु से मकर राशि में पहुंचते हैं उसे मकर संक्रांति का दिन कहते हैं। सूर्य के मकर राशि में आते ही मलमास समाप्त हो जाता है। इसी दिन से ही देवताओं का दिन शुरू होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है।  दक्षियायन देवताओं के लिए रात्रि का समय होता है। ठीक इसी समय से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायन हो जाता है। मकर संक्रांति को उत्तरायण भी कहते हैं, क्योंकि इस दिन से सूर्यदेव उत्तर दिशा की ओर बढ़ना शुरू कर देते हैं। इस दिशा परिवर्तन के समय को ही मकर संक्रांति कहते हैं।
       मकर संक्रांति समूचे भारत में मनाया जाता है, चाहे इसका नाम प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग हो और इसे मनाने के तरीके भी भिन्न हों, किंतु यह बहुत ही महत्व का पर्व है। मकर संक्रांति को गुजरात में उत्तरायण, पंजाब में लोहड़ी पर्व, गढ़वाल में खिचड़ी संक्रांति और केरल में पोंगल के नाम से मनाया जाता है। वहीं सिंधी लोग इस त्योहार को तिरमौरी कहते हैं। इस अवसर पर गुजरात समेत कई राज्यों में पतंगें भी उड़ाई जाती है। इस समय से दिन बड़े और रात छोटी होने के साथ ही मौसम ठंडी से गर्मी की तरफ बढ़ने लगता है। मकर संक्रांति की विभिन्न परंपराओं में स्नान, दान का विशेष महत्व है, किन्तु इसके अलावा इसदिन पारंपरिक खिचड़ी और तिल के उपयोग से पकवान बनाने की भी मान्यता है। देश के हर कोने में अलग अलग तरीके से खिचड़ी और तिल के व्यंजन पकाए जाते हैं। इन्हें मकर संक्रांति के दिन बनाया जाता है और भगवान को भोग लगाने के बाद अगले दिन सूर्य उदय के पश्चात ही ग्रहण किया जाता है।                                                   
      किन्तु मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी क्यों बनाई जाती है? इसदिन तिल के प्रयोग से तरह तरह के पकवान क्यों तैयार किए जाते हैं? इसके पीछे का कारण क्या है? आइए इनके पीछे छिपी पौराणिक कहानियों के बारे में जानते हैं।
कथा एक - श्रीमद्भागवत एवं देवी पुराण में दर्ज एक कथा के अनुसार शनि देव का हमेशा से ही अपने पिता सूर्य देव से वैर था। एक दिन सूर्य देव ने शनि और उसकी माता छाया को अपनी पहली पत्नी संज्ञा के पुत्र यमराज से भेद भाव करते हुए देख लिया। इससे नाराज होकर उन्होंने अपने जीवन से छाया और शनि को निकालने का कठोर फैसला लिया। इससे नाराज होकर शनि और छाया ने सूर्य को कुष्ठ रोग हो जाने का शाप दिया और वहां से चले गए। पिता को कुष्ठ रोग से परेशान होते देख यमराज ने तपस्या की। आखिरकार सूर्य देव कुष्ठ रोग से मुक्त हुए। किन्तु उनके मन में अभी भी शनी देव को लेकर क्रोध था। क्रोधित अवस्था में ही वे शनि देव के घर (कुंभ राशि में) गए और उसे जलाकर काला कर दिया। इसके बाद शनि और उनकी माता छाया को कष्ट भोगना पड़ा।
    अपनी सौतेली मां और शनिदेव को दुख में देखकर यमराज ने उनकी मदद की। सूर्य देव को दोबारा उनसे मिलने भेजा। इस बार जब सूर्य देव वहां पहुंचे तो शनि देव ने काले तिल से उनकी पूजा की। चूंकि घर में सब कुछ जल चुका था, इसलिए शनि देव के पास केवल तिल ही थे। शनि की पूजा से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने शनिदेव को वरदान दिया और कहा कि तुम्हारे दूसरे घर ‘मकर’ में आने पर तुम्हारा घर धन-धान्य से भर जाएगा। इसी कारण से मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव की तिल से पूजा की जाती है और अगले दिन तिल का सेवन किया जाता है।
कथा दो - एक अन्य कथा के अनुसार शनिदेव का जन्म महर्षि कश्यप के अभिभावकत्व में कश्यप यज्ञ से हुआ। छाया शिव की भक्तिन थी। जब शनिदेव छाया के गर्भ में थे तो छाया ने भगवान शिव की इतनी कठोर तपस्या कि वे खाने-पीने की सुध तक उन्हें न रही। भूख-प्यास, धूप-गर्मी सहने के कारण उसका प्रभाव छाया के गर्भ में पल रहे शनि पर भी पड़ा और उनका रंग काला हो गया। जब शनिदेव का जन्म हुआ तो रंग को देखकर सूर्यदेव ने छाया पर संदेह किया और उन्हें अपमानित करते हुए कह दिया कि यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता। मां के तप की शक्ति शनिदेव में भी आ गई थी उन्होंने क्रोधित होकर अपने पिता सूर्यदेव को देखा तो सूर्यदेव बिल्कुल काले हो गये, उनके घोड़ों की चाल रुक गई। परेशान होकर सूर्यदेव को भगवान शिव की शरण लेनी पड़ी और शिव ने उनको उनकी गलती का अहसास कराया। सूर्यदेव ने अपनी गलती के लिये क्षमा याचना की जिसके बाद उन्हें फिर से अपना असली रूप वापस मिला।
तीसरी कथा - यह कथा प्रायः कथावाचकों द्वारा सुनाई जाती है। एक समय जब पृथ्वीलोक पर बब्रुवाहन नामक एक राजा हुआ करता था। उसके राज्य में किसी चीज की कमी नहीं थी। इसी राज्य में एक हरिदास नामक ब्राह्मण भी निवास करता था। जिसका विवाह गुणवती से हुआ था जो कि बहुत ही धर्मवती एवं पतिव्रता महिला थी। गुणवती ने अपना पूरा जीवन सभी देवी देवताओं की उपासना में लगा दिया और वह सभी प्रकार के व्रत करती थी और दान धर्म भी किया करती थी। इसके अलावा अतिथि सेवा को वह अपना धर्म मानती थी। ऐसे ही ईश्वर की उपासना करते हुए वह वृद्ध हो गयी। जब उसकी मृत्यु हुई तो धर्मराज के दूत उसे अपने साथ धर्मराजपुर ले गए। यमलोक में एक सुन्दर सिंहासन पर यम धर्मराज विराजमान थे और उनके पास ही चित्रगुप्त भी बैठे थे। चित्रगुप्त जब धर्मराज को प्राणियों का लेखा जोखा सुना रहे थे तभी यमदूत गुणवती को लेकर पहुंचे। गुणवती ने यमराज से पूछा कि प्रभु मुझसे क्या भूल हुई है? धर्मराज ने कहा कि हे गुणवती, तुमने सभी देवी-देवताओं के व्रत किए हैं, उपासना की है लेकिन कभी भी तुमने मेरे नाम से कुछ पूजा या पाठ या दान नहीं किया। तुमसे ही तो तुम्हारी संताने यह सब सीखेंगी अतः इन अच्छे संस्कारों स्वयं भी पालना था तथा अपने बच्चों को भी सिखाना था।
       धर्मराज ने बताया कि जिस दिन सूर्य देव उत्तरायण में प्रवेश करते हैं यानि मकर संक्रांति के दिन मेरी पूजा शुरू करनी चाहिए साथ ही मेरी पूजा करने वाले व्यक्ति को धर्म के इन दस नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए- धैर्य रखना, अपने मन को वश में रखना और सभी को क्षमा करना, किसी प्रकार का दुष्कर्म नहीं करना, मानसिक और शारीरिक शुद्धि का ध्यान रखना, अपनी इन्द्रियों को वश में रखना, बुरे विचारों को अपने मन में न लाना, पूजा, पाठ और दान पुण्य करना, व्रत करना और व्रत की कहानी सुनना, सच बोलना और सभी से अच्छा व सच्चा व्यवहार करना, क्रोध न करना। इसके बाद मेरी एक मूर्ति बनाकर विधि विधान से प्राण प्रतिष्ठा करवाकर हवन पूजन करें और साथ ही चित्रगुप्त की भी पूजा करें। और काले तिल के लड्डू का भोग लगाना। मकर संक्रांति आते ही गुणवती और उसके पति ने ये व्रत शुरू कर दिया। इसी व्रत के प्रभाव से उनपर धर्मराज की कृपा हुई और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। गुणवती की संतानों ने भी उसका अनुकरण किया।
      चौथी कथा - इस कथा का एक रूप और कथावाचकों द्वारा सुनाया जाता है जिसमें पुत्रों द्वारा माता गुणवती एवं पिता की अवहेलना का प्रकरण है। इस कथा के अनुसार अपने पांच पुत्रों द्वारा घर से निकाल दिए जाने के बाद गुणवती और उसके पति ने व्यथित हो कर अपनी इहलीला समाप्त करने का कदम उठाया। दोनों ने पहाड़ की चोटी से खाई में गिर कर अपने प्राण दे दिए। यमदूत उनके प्राणों को अर्थात आत्मा को यमराज के पास ले कर पहुंचे। यमराज ने चित्रगुप्त से कहा कि इन दोनों के कर्मों का लेखाजोखा बताओ। तब चित्रगुप्त ने अपना बहीखाता देखा और कहा कि इन्हें से अभी मरना ही नहीं चाहिए था। ये सदकर्मी हैं किन्तु अपने पुत्रों की अवहेलना और प्रताड़ना से त्रस्त हो कर आत्महत्या कर बैठे हैं। इस पर यमराज ने यमदूतों से कहा कि जाओ इन आत्माओं को इनके शरीर में वापस छोड़ आओ और बदले में इनके पांचों पुत्रों के प्राण ले आओ। यह सुन कर गुणवती और उसके पति की आत्मा त्राहि-त्राहि कर उठी। उन्होंने कहा कि ऐसा मत करिए। वे जैसे भी हैं हमारे पुत्र हैं। उनके बदले हमारे जीवित रहने का भी क्या अर्थ है? उन्हें जीने दीजिए। तब यमराज ने कहा कि ठीक है तुम दोनों के कहने पर मैं उन्हें छोड़ दूंगा लेकिन पहले उनको सबक सिखा दूं। फिर यमराज ने गुणवती के पांचों पुत्रों के प्राणों को अपने पास मंगा लिया। पांचों की आत्माएं यमराज के सामने रोने लगीं। उनसे कहने लगीं कि आप अभी हमें मत मारिए क्योंकि अभी हमारे बच्चे बहुत छोटे हैं, उन्हें हमारी जरूरत है। तब यमराज ने कहा कि एक शर्त पर मैं तुम पांचों के प्राण वापस कर सकता हूं यदि तुम लोग अपने माता-पिता को सम्मान के साथ अपने पास रखो। पांचों ने यमराज की शर्त मान ली और अपने माता-पिता की आत्माओं के साथ अपने-अपने शरीर में लौट गए। चूंकि तब तक प्राणहीन शरीर मैले हो चुके थे अतः उन्होंने अपने-अपने शरीरों को तिल का उबटन लगा कर साफ किया। फिर ताकत के लिए तिल और गुड़ का सेवन किया। इसके बाद गुणवती अपने पति और पांचों पुत्रों के साथ प्रसन्नतापूर्वक रहने लगी। चूंकि उसी दिन सूर्य उत्तरायण हुआ था अतः उसी दिन से तिल-गुड़ कि त्योहार की परंपरा पड़ गई।     
        ये कथाएं इस बात का संदेश देती हैं कि माता, पिता और पुत्र में भूल चाहे जिससे भी हुई हो, उन्हें परस्पर मिल कर, एक दूसरे से बातचीत कर के मसले को सुलझा लेना चाहिए। यह संदेश आज के परिवेश में बेहद महत्वपूर्ण है जब आज परिवार बिखर रहे हैं, वृद्धाश्रम खुलते जा रहे हैं और बड़ों ओर बच्चों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं जेनेरेशन गेप के नाम पर। मिल-बैठ कर परस्पर दुख-सुख जानने का चलन परिवारों से खत्म होता जा रहा है, जिसके लिए मकर संक्रांति में पिता-पुत्र के पारस्परिक मेल की रोचक कथाओं को जानना और समझना जरूरी है। बुंदेलखंड में तो यह मान्यता भी है कि मकर संक्रांति पर जब कोई पिता अपने पुत्र से मिलने जाते है, तो उनके बीच के मतभेद दूर हो जाते हैं।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 15.01.2026 को प्रकाशित) 
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बतकाव बिन्ना की | जो सकरायत के लड़ुआ ने खाओ तो का खाओ | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की | जो सकरायत के लड़ुआ ने खाओ तो का खाओ | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की      
     
जो सकरायत के लड़ुआ ने खाओ तो का खाओ?          
                      
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

         दो दिनां हो गए, जबै भैयाजी के दोरे से कढ़ो सो कभऊं तिली भुंजबे की सुगंध मिली तो कभऊं आटो भुनबे की। मोय समझ में आ गई के भौजी सकरायत के लाने लड़ुआ बना रईं। भौतई अच्छो लड़ुआ बनाउत आएं भौजी। गुड़-मोमफली की पट्टी सोई बड़ी नोनी बनाउत आएं। मैंने सोची के बे बेचारी अकेली लड़ुआ बांध रई हुइएं, सो चलो तनक उनको हाथ बंटा दओ जाए। काए से के लड़ुआ खाबे के लाने सो मोय उनईं के इते जाने, सो लड़ुआ बंधाबे के लाने सोई जाबो चाइए, ऐसी मोय लगी। सो मैं भौजी के इते पौंची। उते जा के जे देख के मोय भौतई अच्छो लगो के भैयाजी सोई उनको हाथ बंटा रए हते। भौजी ने जो मोमफली भूंज के धरी हतीं, उने भैयाजी सूपा पे से फटकारत जा रए हते, जोन से मोमफली के छिलका अलग हो जाएं। 
‘‘राम-राम भौजी! मोय सोई कछू काम बताओ।’’ मैंने भौजी से कई। 
‘‘कछू नईं बिन्ना, सब बनत जा रए।’’ भौजी बोलीं। 
मोय जे देख के सोई बड़ो मजो आओ के बे आंगन में लकड़िया वारे चूला पे जे सब काम कर रईं हतीं। ने तो आजकाल तो सबई जनीं गैस के चूला पे बनाउती हैं, मनो अगर बनाने होय तो! ने तो इत्ते माॅल खुल गए, के उते हर त्योहार पे सब कछू मिल जात आए। मनो उनमें घर के बने को स्वाद कां मिलने? 
सो मैं सोई चूला के बाजू से बैठ गई औ हाथ तापन लगी। ऊंसई दो-चार दिनां से डगर-मगर हो रओ। कभऊं ठंड बढ़ जात आए, तो कभऊं गरमी। मनो चूला में हाथ तापे में भौतई अच्छो लगत आए। 
‘‘चलो जो लो तुमाए भैया मोंमफली साफ़ कर रए, तब लौं चाय बना लई जाए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हौ, अच्छो अदरक डारियो!’’ भैयाजी बोल परे।
‘‘हौ, जैसे आपखों मिली जा रई? इते दो कप बन रई। एक हमाए लाने औ एक बिन्ना के लाने।’’ भौजी आंखें दिखात भईं भैयाजी से बोलीं।
मोय जे सुन के अचरज भओ। काए से के इते आ के मोय लग नई रओ हतो के भैयाजी और भौजी के बीच कोनऊं रार चल रई हुइए।
‘‘का हो गओ भौजी? भैयाजी से काय खफा हो?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘इनई से पूछो! हम हम जो कहें इने कोन मानने। हमाओ कहो मानबे में तो जे छोटे हो जैहें।’’ भौजी भैयाजी खों फटकारत भई बोलीं।
‘‘का हो गओ भैयाजी? हमाई भौजी खों काय नाराज कर दओ?’’ अब की बेर मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अब का कहें बिन्ना! तुमाई भौजी को न जाने कां-कां की सूझत आए। इन्ने आज भुनसारे अखबार में न्यूज पढ़ लई के इते मेला भरने, उते मेला भरने। तभईं से जे हमाए पांछू परीं के हमें मेला ले चलो। अब तुमई बताओ के उते भीर में जा के जे का करहें?’’ भैयाजी बोले।
‘‘ आप दोई बात गलत बोल रए। एक तो के संकरायत में मेला नईं ले जा रए जबके सकरात के टेम पे जेई लाने मेला भरत आएं के सब जने उते पौंचे। घूमें-फिरें, तनक छुट्टी मनाएं औ आप हो के मेला ले जाबे से मना कर रए। दूसरी बात जे के मेला की भीर को डर दिखा रए? अरे, मेला में भीर ने हुइए तो कां हुइए? सो जे दोनों बातें गलत ठैरीं। आप तो भौजी खों मेला घुमाबे खों ले जाओ। उते इनके लाने चुरियां औ घड़िया-घुल्ला खरीद दइयो।’’ मैंने भैयाजी खों समझाओ।
‘‘गजबई हो तुम दोई! जैसी भौजी, उंसई नंदरानी। जे नई बनत के तुम अपनी भौजी खों हमाई तरफी से समझाओ के मेला घूमबे ने जाओ।’’ भैयाजी मों बनात भए बोले।
‘‘हमाई बिन्ना पे गुस्सा ने दिखाओ! ने तो हम आपके लाने ऐसो लड़ुआ बनाबी के जो आपके मूंड़ पे मारो जाए तो आपको मूंड़ई फूट जाए।’’ भौजी ने भैयाजी खों धमकाओ औ मोय उनकी धमकी सुन के हंसी आ गई। 
उनकी बात सुन के मोए एक पुरानी किसां याद आ गई। भओ का के ऊ टेम पे मोसे तिली के लड़ुआ बनात नईं बनत्ते। मनो मोए शौक भौत हतो के तिल के लड़ुआ बनाए जाएं। ऊ टेम पे ने तो मोबाईल हतो औ ने इंटर नेट। सो मैंने एक अखबार में पढ़ के तिली के लड़ुआ बनाबे की सोची। अच्छो तिल भूनों। ऊमें तनक घी सोई डार दओ। फेर चासनी बनाई और चासनी में तिल डार के लड़ुआ बांध लए। ऊमें जित्ते तार की चासनी बनाबे को लिखी थी बा मोसे ने बनी। काए से मोए बा समझई में ने आई हती।
कछू तो लड़ुआ बांध दए ते औ बची भई चासनी एक बसी में फैला दई। जब मोरी जिज्जी कालेज से लौटीं तो बे लड़ुआ देख के भौतई खुस भईं। उन्ने जैसई एक लड़ुआ अपने दांतन तरे दबाओ, ऊसई वापस धर दओ। 
‘‘काए? खा काय नई रईं? अच्छो नईं बनों?’’मैंने उनसे पूछीै
‘‘अच्छो तो बनो, मनो हम तनक लुढ़िया ले आएं काए से इनको कुचर-फोर के खाने परहे।’’ जिज्जी मुस्काईं।
मोए उनकी बात बुरई लगीे। इत्ते में उते हम ओरन को पलो भओ बिलौटा आ गओ। मैंने सोची के जब जिज्जी लड़ुआ में मीनमेक निकार रईं तो बसी को सीरा का खाहें? सो मैंने बा बसी ऊ बिलौटा के मों के पास धर दई। ऊ बिलौटा ने बसी सूंघी औ मों बना के उते से चलो गओ। मोए ऊ पे बी भौतई गुस्सा आई। 
फेर मैंने खुदई एक लड़ुआ उठाओ औ अपने दांतन से काटबो चाहो, सो लगो के दांतई ने बायरे आ जाएं। सो मोए समझ में आ गई के जिज्जी लुढ़िया से फोरबे के लाने काए कै रई हतीं। रामधई! बे लड़ुआ ऐसे बने हते के जो कोनऊं के मूंड़ पे फेंक के मारो तो कओ ऊको मूंड़ फूट जाए, मनो लड़ुआ ने फूटे। फेर मैंने बसी के सीरा पे उंगरिया फेरी तो लगो के कोनऊं कांच पे फेर रई होऊं। बा सीरा बसी में ऐसो चिपको के गरम पानी से बी ने निकरो। अखीर में बा बसी फोड़ के मेंकने परी। 
कैबो को मतलब जो आए के तिल के लड़ुआ बनाबो कोनऊं हंसी खेल नोंई। जो चासनी बिगर जाए तो बा तिल के लड़ुआ की जांगा किरकिट की बाॅल बन जात आए। बल्ला से मारो तो छक्काई लगहे। सो, भौजी ने भैयाजी खों डराबे को अच्छो तरीका ढूंढो।
भैयाजी सोई डरा गए। औ कैन लगे,‘‘तुम तो अच्छेई लड़ुआ बनाओ! हम तुम्हें अबई लेवा ले चल रए मेला घुमाबे।’’
भैयाजी खों हथियार डारत देख मोए औ भौजी दोई खों हंसी आ गई।   
मनो भौजी ने तोप के गोला घांईं लड़ुआ ने बनाए। उन्ने नरम-नरम बनाए। औ मैंने सोई दबा के खाए। दबा के मने मुतके खाए। काए से के जो सकरायत के लड़ुआ ने खाओ तो का खाओ?    
मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम! औ हैप्पी सकरायत! 
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Tuesday, January 13, 2026

पुस्तक समीक्षा | गहन संवेदनाओं रेखांकन है हरजिंदर सिंह सेठी की कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
गहन संवेदनाओं रेखांकन है हरजिंदर सिंह सेठी की कविताओं में 
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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कविता संग्रह - मेरी धरती के लोग 
कवि            - हरजिंदर सिंह सेठी
प्रकाशक  - न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, सी-515, बुद्ध नगर, इंद्रपुरी, नई दिल्ली-110012
मूल्य       - 250/-
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हरजिंदर सिंह सेठी एक चिरपरिचित नाम हैं, पाठकों के लिए भी और मेरे लिए भी। इनके विविधतापूर्ण लेखन ने एक बड़ा पाठक वर्ग अपने लिए पाया है। 22 जुलाई 1947 को गाजियाबाद में जन्मे हरजिंदर सिंह सेठी  वर्तमान में मुंबई में निवासरत हैं। इनकी शिक्षा तथा इनका कार्यक्षेत्र भी मुंबई ही रहा है। जीवन से गहरा जमीनी जुड़ाव रखते हैं। इनकी अभी इस कविता संग्रह के पूर्व छः पुस्तकें प्रकाशित हुईं - गुरु तेग बहादुर एक युग व्यक्तित्व (जीवनी), यह चुप रहने का समय नहीं (कविता संग्रह), सौ सवाल सौ जवाब (इतिहास), कुछ किताबें कुछ लोग (समीक्षा संस्मरण), नामदेव वाणी: व्याख्या विवेचन (अध्ययन) तथा बादशाह दरवेश (जीवन गाथा)। इनमें से सेठी जी ने अपनी प्रथम पुस्तक "गुरु तेग बहादुर एक युग व्यक्तित्व" मेरी माता जी डाॅ विद्यावती ‘मालविका’’ जी को डाक द्वारा भेंट की थी। उसी दौरान मैंने सेठी जी की पुस्तक पढ़ कर गुरु तेगबहादुर जी के बारे में विस्तार से ज्ञान प्राप्त किया। तदोपरांत मेरी दीदी डाॅ वर्षा सिंह जी का भी सेठी जी से संक्षिप्त पत्र संवाद रहा। अब जब अपनी नवीनतम पुस्तक उन्होंने मुझे प्रेषित की तो मुझे लगा कि मैं एक पारिवारिक परंपरा को जी रही हूं। किसी परिचित की पुस्तक समीक्षार्थ हाथों में होना धर्मसंकट खड़ा करता है किन्तु जब मैंने हरजिंदर सिंह सेठी का यह नवीनतम काव्य संग्रह पढ़ा तो मेरे सारे संकट स्वतः कट गए। इस काव्य संग्रह की समस्त कविताएं इतनी सशक्त एवं संवादनात्मक हैं कि वे स्वयं अपनी प्रकृति से परिचित कराती हैं तथा निष्पक्षता से प्रशंसा करने के लिए बाध्य करती हैं।
‘‘मेरी धरती के लोग’’ नाम है हरजिंदर सिंह सेठी के नवीनतम काव्य संग्रह का। इसका मुखपृष्ठ ही बहुत कुछ बयान कर जाता है जिसमें पूरी ताकत से एक मालवाहक रिक्शा खींचता हुए रिक्शाचालक की तस्वीर है। ये या इन जैसे मेहनककश भी तो हमारी धरती के लोग हैं। किन्तु हममें से अधिकांश देख कर नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। उनकी दृष्टि में ये बुनियादी लोग नहीं वरन ‘छोटे लोग’ हैं जिनसे कोई वास्ता रखना गोया गुनाह है। ऐसे ही मनुष्यों की तथा उनके परिवेश की कविताएं हैं ‘‘मेरी धरती के लोग’’ में। इस संदर्भ में कवि ने अपने संग्रह की पहली कविता ‘‘सूरज उगने तक’’ में ही अपने कवित्व का ध्येय स्पष्ट कर दिया है, कुछ पंक्तियां देखिए-
मेरे पास कहने के लिए 
अपना तो कुछ भी नहीं।
वही लिखता हूं 
00000000
मैं तो हूं सिर्फ अनुवादक 
उनकी भावनाओं का। 
कठिन समय से गुजरती 
उनकी जिंदगी की क्रूरताओं को
रूपांतरित करता हूं अपने शब्दों में।

एक कप चाय और एक बड़ापाव खा कर अथवा एक कप चाय के साथ आधा प्लेट पोहा खा कर घंटों पैडल रिक्शा चलाना, हम्माली करते हुए अपने कंधों और पीठ पर सैंकड़ों किलो बोझा ढोना क्या आसान है? फिर भी लोग उनसे मोल-भाव करने से नहीं हिचकते हैं। एक हम्माल से जो पांच रुपए वे कम कराते हैं उनसे उनके लिए चबा का थूक देने वाला शायद एक पान भी न आए किन्तु उसी पांच रुपए से वह मेहनतकश एक कप कट चाय पी कर कई किलो बोझा और ढो सकता है। गरीबी सपने तो देती है किन्तु उन सपनों को पूरा करने की क्षमता सोख लेती है। इस मार्मिक सत्य को अपनी कविता ‘‘ढाबे में पहाड़’’ में बड़ी स्पष्टता से सेठी जी ने वर्णित किया है-
भाई की उंगली पकड़े 
छोटे-छोटे पैर रखता 
पहाड़ से नीचे उतर आया है/बीर सिंह।
बीर सिंह रहेगा 
दिल्ली के किसी होटल या ढाबे में 
फर्श पर लगायेगा झाडू,/मांजेगा बर्तन 
चाय का गिलास रखेगा टेबल पर 
ग्राहक के सामने। 

      विकास अथवा प्रगति के क्या मायने होने चाहिए? क्या यही कि शहर फैलते जाएं, उनमें चमचमाती सड़कें पसरती जाएं और गरीबों को बदनुमा दाग मान कर पीछे, बहुत पीछे धकिया दिया जाए, जहां से वे दिखाई भी न दे सकें और फिर देश को खुशहाल मान लिया जाए। यह खरी सच्चाई अपने पूरे खुरदेरेपन के साथ उतर आई है सेठी जी की कविता ‘‘स्मार्ट सिटी’’ में। एक अंश कविता का-
यहां से दिखेगी 
एक खुशहाल और उन्नत देश की तस्वीर।
यहां से नहीं दिखेंगी 
टीन टप्पर वाली झुग्गी झोंपड़ियां 
कीचड़, बदबू और कूड़े के ढेर वाली बस्तियां, 
अंधेरी गलियां, टूटे फूटे रास्ते। 
बिजली और पेयजल के लिए 
तरसते लोग। 

    सच को ढांक कर ढोंग भले ही किया जा सके किन्तु सच को देर तक छिपाए नहीं रखा जा सकता है। फिर भी साहित्य का एक हिस्सा आज मानो लकवाग्रस्त हो गया है। उसने सच बयानी से अपना नात तोड़ लिया है। ऐसे पंगु साहित्य के एक-एक शब्द साहित्य की वास्तविक आत्मा को आहत करते हैं। जैसे ‘‘कविता आजकल’’ में हरजिंदर सिंह सेठी लिखते हैं-
आजकल बहुत उदास है 
कविता क्रांति की भाषा बोलने वाली 
एक दम शांत चुप है। 
क्षीण पड़ गया है, प्रतिरोध का स्वर
लड़खड़ा रहे हैं, उसके सारे शब्द 
निरीह से जाकर बैठ गए हैं 
दाहिने कोने में 
जहां जिंदगी सहम गई है।

      निःसंदेह जब समाज को दर्पण दिखाने वाला, लड़खड़ाने वाले को सहारा देने वाला साहित्य लाचारी का कंबल ओढ़ लेता है तो ज़िन्दगी सहम जाती है तथा अव्यवस्थाएं सिर उठाने लगती हैं। जब व्यवस्थाएं चरमराती हैं तो हमारी अपनी बेटियां भी सुरक्षित नहीं रहती हैं। ‘‘कब तक’’ शीर्षक से सेठी जी प्रश्न करते हैं कि-
कब तक भय के माहौल में 
जिएंगी लड़कियां। 
कब तक चुप्पी ओढ़कर 
बैठे रहेंगे हम लोग 
कब तक बने रहेंगे गूंगे 
कब तक जलाते रहेंगे मोमबतियां।

      मोमबत्तियां जलाने का प्रतीक उस लाचारी को दर्शाता है जहां हम सकल पीड़ा से दुखी तो हैं, अपने दुख का प्रदर्शन भी कर रहे हैं किन्तु पुरजोर प्रतिकार करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। दरअसल यह संवेदनाओं में आती जा रही कमी का प्रत्यक्ष उदाहरण है। ऐसा ही एक उाहरण है जब किसी की मृत्यु को भुनाने का प्रयास किया जाता है। यह संवेदनाओं की अकाल मृत्यु नहीं तो और क्या है। ‘‘एक कवि की मौत पर’’ कविता इसका खांटी बयान करती है-
मैंने कवि की मृत्यु पर 
गहरा दुःख व्यक्त किया 
और अखबार में खबर छपवाई।
मैंने उसकी उपलब्धियों पर 
पत्रिकाओं में लेख लिखे 
और ढेर सा पारिश्रमिक पाया।

कुल 60 कविताओं में संग्रह की अंतिम कविता है ‘‘मेरी धरती के लोग’’। यह कविता इस संग्रह की सभी कविताओं का मानो निचोड़ प्रस्तुत करती है तथा उनकी उपस्थिति का स्मरण कराती है जिन्हें सामने देखते हुए भी अनदेखा कर दिया जाता है-‘‘मुझे अच्छे लगते हैं-/यह बशीरा/जो रिक्शा चलाता है/यह अन्ना/जो ठेला खींचता है/यह गोपालन/जो भाजी बेचती है,/यह सरबतिया/जो खोमचा लगाती है/यह सोहन सिंह/जो टैक्सी चलाता है।

हरजिदर सिंह सेठी की कविताएं पाठकों की आत्मा से संवाद करने में सक्षम हैं। इन्हें पढ़ने वाला ठिठक कर सोचेगा और उनकी ओर कम से कम एक बार अवश्य दृष्टिपात करेगा जिन्हें वह देख कर भी नहीं देखता है। इस लिहाज़ से हरजिंदर सिंह सेठी के इस काव्य संग्रह ‘‘मेरी धरती के लोग’’ की हर कविताएं अवश्य पढ़ी जानी चाहिए। 
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Saturday, January 10, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | डियर कुत्ता जू आपको मूड कैसो है? | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टॉपिक एक्सपर्ट | डियर कुत्ता जू आपको मूड कैसो है? | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
टाॅपिक एक्सपर्ट
डियर कुत्ता जू आपको मूड कैसो है?
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

सुप्रीमकोर्ट के माननीय हरें भौत बुद्धिमान ठैरे, तभईं तो सबरे न्याय के लाने उनपे भरोसो करत आएं। ई दारे बी उन्ने भौतई सई कई। कोन मामला में? सो, ई टेम पे सबसे बड़ो मामलो सामने ठाड़ो आवारा कुत्तन को। देखो जाए तो जे नेशनल इश्यू बन गओ आए। एक तरफी कुत्ता प्रेमी औ दूसरी तरफी आवारा कुत्तन से छुटकारो चाउने वारे। आवारा कुत्तन के साईड वारे लोगन की तरफी से कपिल सिब्बल जू ने सुप्रीमकोर्ट में कई के जो कुत्तन के संगे सहूरी से पेश आओ जाए तो बे न काटहे। ईपे सुप्रीमकोर्ट के माननीय जज हरों ने कई के कोई कोऊ खों पतो नहीं रैत के कुत्ता को मूड का आए औ कबे काट ले। सुप्रीम कोर्ट ने जे सोई कई के स्कूलें होंए चाए अस्पतालें होंए औ चाए अदालत को कंपाउंड होए, उते आवारा कुत्तन खों काए फिरो चाइए? औ ऐसी जांगा से उने हटाबे में कोनऊं खों काए आब्जेक्शन भओ चाइए?
    आवारा कुत्तन खों जो मामलो आए जो सुप्रीम कोर्ट में चल रओ। सो, अपन ओरें डिसीजन होबे लौं का करें? जे बात हमने अपने एक पैचान वारे वकील से पूंछी सो, बे बोले के तब तक जो आवारा कुत्ता सामने परे तो ऊंसे तुरतईं पूछियो के ‘‘डियर कुत्ता जू आपको मूड कैसो है? आप हमें काटहो तो नईं? जो ऊको मूड ठीक हुइए तो न काटहे औ जो ऊको मूड खराब हुइए तो सुजी लगाबे वारे खों ढूंढियो।’’  जा उन्ने ठिठोली में नोंई, पूरी गंभीरता से कई रई। सो, डिसीजन आबे तक तनक बच के रहियो आवारा कुत्तन से। संगे जा सोई सोचियो के जोन देस में कुत्ता रोड पे आवारा नईं फिरत का उते के लोग कुत्ता खों चाउने वारे नईं होत?
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Thank you Patrika 🙏
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Friday, January 9, 2026

शून्यकाल | बढ़ता जलवायु परिवर्तन, घटते वन्यजीव और हमारे प्रयास | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

शून्यकाल
बढ़ता जलवायु परिवर्तन, घटते वन्यजीव और हमारे प्रयास
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

चाहे हम इसके लिए कटते जंगलों को दोष दें या बढ़ते शहरों को, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि हमारी गलतियों और लापरवाही की वजह से मौसम तेज़ी से बदल रहा है और इस बदलाव का असर वन्यजीवों पर पड़ा है। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन बढ़ रहा है, वन्यजीव कम होते जा रहे हैं। जिसके डरावने आंकड़े अब हमारे सामने आ रहे हैं। इसलिए अब हमारे पास एकमात्र विकल्प यही है कि हम जलवायु को सुधारें और वन्यजीवों को बचाएं, अभी नहीं तो कभी नहीं। याद रखें कि चीते पहले भारत में भी पाए जाते थे लेकिन अत्यधिक शिकार और आवास विनाश के कारण उन्हें 1947 में आखिरी बार देखा गया और 1952 में भारत से आधिकारिक तौर पर विलुप्त घोषित किया गया।
हमने कहानियाँ पढ़ी हैं
शेरों, भालुओं और सियार की
अपने बचपन में,
हमने उन्हें शहर के चिड़ियाघरों में देखा है।
बहुत से जानवरों को देखा है
जो अब खत्म हो चुके हैं, उनकी तस्वीरों में।
क्या यह बायोलॉजिकल विरोधाभास नहीं है कि-
एक तरफ हमारे वैज्ञानिक
इस धरती पर
डायनासोर को वापस लाना चाहते हैं,
जबकि हम
मौजूद शेर, बाघ, तेंदुए
और काले हिरणों को बचाने में नाकाम रहे हैं।
तो कैसा होगा
हमारे भविष्य का वन्यजीवन
मौत से खाली
या जीवन से भरा?

यह सिर्फ़ मेरी कविता नहीं, बल्कि मेरा ध्यान भटकाने वाली बात है। क्योंकि जलवायु परिवर्तन कई जंगली प्रजातियों के अस्तित्व के लिए एक गंभीर खतरा बनकर उभरा है, जिसके कारण जंगली जानवरों की कई प्रजातियों की संख्या कम हो रही है और कुछ विलुप्त होने की कगार पर पहुँच गई हैं। हालाँकि, जलवायु परिवर्तन पक्षियों और स्तनधारियों दोनों के माइग्रेशन पैटर्न को बाधित कर सकता है और महत्वपूर्ण आवास को सिकोड़ सकता है। धीमी प्रजनन दर भी प्राइमेट्स और हाथियों को ग्लोबल वार्मिंग के प्रति संवेदनशील बनाती है। जलवायु परिवर्तन ने वन्यजीवों के लिए कई खतरे पैदा किए हैं। बढ़ते तापमान से कई प्रजातियों के जीवित रहने की दर कम हो जाती है, जिससे भोजन की कमी, कम सफल प्रजनन और स्थानीय वन्यजीवों के लिए पर्यावरण में हस्तक्षेप होता है। नेचर क्लाइमेट चेंज जर्नल में प्रकाशित रिसर्च में अनुमान लगाया गया है कि इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर की खतरे में पड़ी प्रजातियों की रेड लिस्ट में शामिल 47 प्रतिशत स्तनधारी और 23 प्रतिशत पक्षी जलवायु परिवर्तन से नकारात्मक रूप से प्रभावित हुए हैं। ऑस्ट्रेलिया, इटली और ब्रिटेन के शोधकर्ताओं की एक टीम ने 130 अध्ययनों का अध्ययन किया, जिसमें यह दस्तावेज़ किया गया था कि कोई प्रजाति जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हुई है या नहीं। यह 1990 और 2015 के बीच प्रकाशित हुआ था, जिसका मतलब है कि यह पुराना डेटा है, लेकिन आज के लिए चेतावनी देने के लिए काफी है।
मानवजनित या प्राकृतिक परिस्थितियाँ वन्यजीवों को इंसानों पर हमला करने के लिए मजबूर करती हैं। जब जंगल बहुतायत में थे, तो इंसान और वन्यजीव दोनों अपनी-अपनी सीमाओं में सुरक्षित रहते थे, लेकिन समय बदला और आबादी भी बढ़ी, तो जंगलों का अंधाधुंध विनाश शुरू हो गया। इसके परिणामस्वरूप इंसानों और वन्यजीवों के बीच कभी न खत्म होने वाले संघर्षों की एक श्रृंखला शुरू हो गई। इंसान अपनी कई ज़रूरतों को पूरा करने के लिए जंगलों का शोषण कर रहा है, जिसके कारण इंसानों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष की घटनाएँ सामने आ रही हैं। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन ने भी वन्यजीवों को प्रभावित किया है या यह कहना गलत नहीं होगा कि जलवायु परिवर्तन का सबसे ज़्यादा असर वन्यजीवों पर पड़ा है। वन्यजीवों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण, उनका प्राकृतिक आवास नष्ट हो जाता है, जिसके कारण वन्यजीव मानव बस्तियों में चले जाते हैं और इससे इंसानों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष बढ़ जाता है। कोरोना काल के लॉकडाउन के दौरान, मुंबई के गोरेगांव इलाके में एक रिहायशी कॉलोनी की सुबह एक तेंदुआ बेखौफ घूमता हुआ देखा गया। तेंदुआ बिल्डिंग के पार्किंग एरिया के पास बेखौफ घूम रहा था। दरअसल, सुबह-सुबह सड़कों पर ज़्यादा लोग नहीं होते हैं। ऐसे में तेंदुआ बहुत आराम से घूमता हुआ देखा गया। यह अकेली घटना नहीं थी। ऐसी कई घटनाएँ सामने आती रहती हैं जब खूंखार जंगली जानवर इंसानी बस्तियों में घुस जाते हैं। तेंदुओं का इंसानी बस्तियों में घूमना आम बात नहीं है। जंगली जानवर इंसानों से दूर रहना पसंद करते हैं। असल में, जंगली जानवरों के अपने इलाके से बाहर निकलने के कारण भी वही हैं जो जलवायु में तेज़ी से बदलाव ला रहे हैं। इसका मतलब है जंगलों की बड़े पैमाने पर कटाई और वन्यजीवों के रहने की जगह का सिकुड़ना। अपने छोटे से इलाके में पर्याप्त खाना और घूमने की जगह न मिलने के कारण, जंगली जानवर इंसानी बस्तियों की तरफ आने लगते हैं। जहाँ का माहौल अशांत और प्रदूषित होता है, वह उन्हें मानसिक रूप से आक्रामक बना देता है। इस तरह, जंगली जानवरों के व्यवहार में बदलाव कभी-कभी उनकी जान को खतरे में डाल देता है।
पूरी दुनिया की तरह भारत में भी जंगली जानवरों पर संकट गहराता जा रहा है। उदाहरण के लिए, राजस्थान का रेगिस्तानी इलाका सदियों से सूखा रहा है, लेकिन अब यहां बाढ़ की वजह से जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। बाढ़ के कारण पश्चिमी इलाकों में कई ऐसे इलाके हैं, जहां पहले बड़ी संख्या में काले हिरण पाए जाते थे। आज वे इलाके बाढ़ की वजह से दलदली हो गए हैं। इस वजह से काले हिरणों को इधर-उधर घूमने में दिक्कत होने लगी है। और कई इन दलदली इलाकों में फंसकर मर जाते हैं। इतना ही नहीं, पहले इन इलाकों में गर्मियां सूखी होती थीं और आज स्थिति यह है कि इन इलाकों में बहुत ज़्यादा नमी है। यह मौसम काले हिरणों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता है। हिरणों की संख्या में कमी इस बात का काफी संकेत है कि जलवायु परिवर्तन के कारण यहां के पर्यावरण में तेज़ी से बदलाव आया है। वन विभाग के 2022 के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, 2002 की वन्यजीव जनगणना की तुलना में पश्चिमी राजस्थान के सभी पांच जिलों में उनकी संख्या आधी भी नहीं रह गई । दो दशक पहले तक यहां 4,237 काले हिरण पाए जाते थे, लेकिन इस साल की जनगणना के अनुसार, इस इलाके में सिर्फ़ 2,346 हिरण बचे हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि हिरणों की संख्या में कमी का एक बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन है।

चीते पहले भारत में पाए जाते थे और उनका एक लंबा इतिहास है, लेकिन अत्यधिक शिकार और आवास विनाश के कारण उन्हें 1947 में आखिरी बार देखा गया और 1952 में भारत से आधिकारिक तौर पर विलुप्त घोषित कर दिया गया था। इसलिए, जब हम अपनी वाइल्डलाइफ को बेहतर बनाने के लिए विदेशों से चीते जैसे जंगली जानवर लाए हैं, तो उसी समय हमें उन कारणों को खत्म करने पर भी ध्यान देना होगा जिनकी वजह से क्लाइमेट बदल रहा है और जंगली जानवरों की ज़िंदगी खतरे में पड़ रही है।
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Thursday, January 8, 2026

बतकाव बिन्ना की | देख तो बिन्ना, जे को जाने का-का हो रओ | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की    
       
देख तो बिन्ना, जे को जाने का-का हो रओ                             
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह


‘‘संकारे से अखबार में इन्दोर की खबरें पढ़-पढ़ के दिमाक खराब सो हो रओ तो। इंसान पानी पियत आए जिन्दा रैबे खों औ उते पानी पी के जाने जा रईं। कोन सोच सकत्तो के प्रदेस की सबसे साफ-सुथरी कहाबे वारी सिटी में सबसे गंदो पानी पिलाओ जा रओ। अपन ओरों की होय तो कछू समझ में आए के इते तो ऊंसई पानी की सल्ल मची रैत आए औ संगे गंदगी सोई फैली रैत आए। मनो उते देखो का से का भओ जा रओ। सई में देखो तो बिन्ना को जाने का-का हो रओ। जा सब सुन-सुन के जी डरात आए।’’ भौजी ने कई।
‘‘कै तो आप सई रईं मनो ऐसो कोनऊं सिटी में कोनऊं के संगे ने होए सो अच्छो। काए से अपनों को खोबे की पीरा का होत आए बा कोरोना ने मुतके जनों खों समझा दई आए। मैंने सोई झूली आए।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘जेई से तो हम कै रए के, ईके बाद बी इत्ती बड़ी लापरवाई करी गई। अरे अब तो सबई खों जीवन को मोल समझो चाइए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, बाकी अपने इते बी अब पानी की टंकियन पे ध्यान दओ गओ आए। कई ठों टंकियन में गिलावो औ गंदगी मिली।’’ भैयाजी बोले।
‘‘जेई तो मोए समझ में नई आत आए के परसासन कोनऊं बड़ी घटना होबे को इंतजार काए करत रैत आए? अब इन्दोर में जब गंदे पानी पीबे से मौतें होन लगीं तो सबरे शहर के परसासन वारे जा उठे, औ ईके पैले पल्ली ओढ़ के सो रए हते। ऐसईं जब कोनऊं रोड पे मुतके एक्सीडेंट हो जात आएं तब परसासन खों लगत आए के चल के उते एक ठइयां बोर्ड ठाड़ो कर दओ जाए के इते खतरा आए। अरे, पैले लगा देते तो का जातो?’’ मैंने कई।
‘‘अरे, सो अबई देख लेओ! ठंडी परन लगी हती औ संकारे से कोहरा सो सोई छान लगो रओ मनो स्कूल को टेम ने बदलो जा रओ हतो। जब अखबार वारन ने लिखो तो तब टेम बदरवे की सुद आई। जे तो कओ के बच्चा हरें बीमार ने परे, ने तो बड़ी सल्ल बींदती।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अरे, चाए आबारा कुत्तन को झुण्ड फिरत रए चाए सांड बीच सड़क पे लड़त रएं, को ध्यान दे रओ। औ हमें तो लगत आए के सांड़ पकरबे वारे सोई एक मोहल्ला के सांड पकर के दूसरे मोहल्ला में छोर आउत आएं। जीसें देखत में नओ सांड़ रए औ ऊकी ब्यावस्था बी ने करने परे। परसासन वारों को तो बस मों चलाबो आउत आए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘औ इत्तोई नोंई, ऊपे नेता हरें फिजूल की बतकाव करन लगे, बा बी पत्रकारन से।’’ मैंने कई।
‘‘बा तो ई लाने बिन्ना के असली मुद्दा पांछू रै जाए औ खबरों में तू-तू, मैं-मैं चलत रए। के उन्ने ऐसी काए कई, के उन्ने ऐसी काए ने कई? बा जो मर गए औ जोन मरत जा रए उनके लाने का हो रओ जा पे कोनऊं बात ने चले।’’ भैयाजी बोले।
‘‘का कओ जाए बिन्ना, पूरी दुनिया में घिनौच-सी मची। जोन खों तनक पावर मिल गओ बोई गर्रान लगत आए औ दोंदरा देन लगे आए। अब ट्रम्प खोंई देख लेओ। इत्तो बड़ो देस को राष्ट्रपति आए, सो तनक अपनो बड़प्पन दिखातो। कोनऊ सई रास्तो पकरतो। मगर नईं, ऊको तो अपनी दादागिरी दिखाने। सो, वेनेजुएला पे चढ़ बैठो। अब तुम कोन होत आओ दूसरे देस के मामलन में टांग अड़ाबे वारे? उनखों खुदई निपटन-सुलझन देओ। पर नईं, उने तो अपनी गर्राहट दिखाने।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अरे ऊ दिनां जब जा खबर छपी रई तो मिसराइन मोसे कै रई हती के कऊं ऐसो ने होए के कोऊ दिनां जो ट्रम्प इते अपने देस में घुस आए इते सब कछू नेहरू जी के जमाने से बिगरो परो, सो हम इको सुदारबे आ गए। सो हमने मिसराइन से कई के जो भारत आए, कोनऊं वेनेजुएला नोंई, के मों उठाए चले आए। इते थपड़िया दओ जैहे। सो तुम ने डरो’’ भौजी बोलीं।
‘‘कओ थपड़ियाबे के संगे कछू सयाने उनकी तारीफ में इत्ती कबिताएं पढ़न लगें के बे खुसी में फूल-फूल के खुदई फट जाए। अपने इते चमचोईं करबे वारों की कमी नोईं। कोऊ कै भर देवे के हमाई चमचोईं करो हम तुमें बड़ो सो पुरस्कार देवा दैहें, सो बे कओ चमचोईं के पूरो रिकार्ड तोड़ डारें।’’ मैंने हंस के कई।
‘‘सई कै रईं बिन्ना! बाकी पैले बी तो ऐसई होत्तो। कछू ऐसे जने हरेक राजा के दरबार में पाए जात्ते। बे राजा साब की बड़वारी करत्ते औ कऊं राजकवि बन जात्ते, तो कऊं जगीरें पा जात्ते। बाकी बड़वारी करे में कोनऊं गलत नोंई, जो बड़वारी करे जोग होय सो करो, ने तो उनकी गलतियां बताओ। ईसे बे खुद खों सुदार सकें।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बिन्ना हमने तो पानी उबाल के औ छान के पीनों सुरू कर दओ आए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘आप सो आरो लेबे वारी हतीं?’’ मैंने पूछी।
‘‘हओ सोची तो रई, बाकी हमने तुमाओ एक लेख पढ़ लओ रओ जीमें तुमने लिखो रओ के आरो लगाए से मुतको पानी बेकार चलो जात आए सो हमने बिचार बदल दओ रओ। अबे पैले पीबे के पानी में तनक फिटकरी चला देत्ते, मनो जब से इन्दोर वारी खबर सुनी तब से उबाल के औ छान के पियन लगे। तुम सोई उबाल रईं के नईं?’’ भौजी ने मोसे पूछी।
‘‘अबे तो नईं। खाली छान के पी रई। उबलो पानी इठैलो सो लगत आए। पियो कोन जात आए!’’ मैंने कई।
‘‘अरे, कैसऊं लगे बिन्ना, जान आए तो जहान आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘आप ओरें इत्तो ने डराओ, अपने इते इत्ती दसा नईं बिगरी। औ अब तो इते सोई परसासन सात कुआं झांक रई।’’ मैंने कई।
‘‘जे भुलाए में ने रओ, बिन्ना! उते इन्दोर में कोन ने सोची हुइए के पानी इत्तो बुरओ कर दैहे। सो तनक सम्हर के चलबे में ई भलाई आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, बात तो आप सांची कै रए। मैं सोई पानी उबाल लओ करहों।’’ मैंने कई।
‘‘ऊंसई इत्ती ठंडी पर रई के ईमें उबलो भओ कुनकुनो पानी पियो चाइए।’’ भौजी बोलीं।  
जेई पे से फेर जड़कारे की बतकाव चल निकरी।   
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़िया हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। औ सोचो के का करो जाए के इन्दोर वारी घटना औ कऊं ने घटे। परसासन खों जगाए राखबे के लाने अपन को का करने परहे ई के बारे में तनक सोचियो। 
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, January 7, 2026

पुस्तक समीक्षा | ज़बरदस्त रोमांचक है अभिमन्यु सिरीज़ का नया थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आज समाज

"आज समाज" दैनिक में आज पुस्तक समीक्षा - "ज़बरदस्त रोमांचक है अभिमन्यु सिरीज़ का नया थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ - समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह

हार्दिक आभार "आज समाज" 🙏
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चर्चा प्लस | वैदिक युगीन लोग जानते थे हवा, पानी और जंगल की शुद्धता-महत्व | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस
वैदिक युगीन लोग जानते थे हवा, पानी और जंगल की शुद्धता-महत्व
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

     पर्यावरण असंतुलन एवं विभिन्न प्रकार के प्रदूषण ऐसी समस्या है जिससे आज दुनिया का हर देश जूझ रहा है। इस समस्या को हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्ष पहले वैदिक युग में ही न केवल समझ लिया था अपितु समस्या का हल भी अपने जीवन में आत्मसात कर लिया था इसीलिए उन्हें कभी भी पर्यावरण असंतुलन जैसी समस्या से नहीं जूझना पड़ा। वे इस तथ्य को जान चुके थे कि इस पृथ्वी पर स्थित प्रत्येक वस्तु चाहे वह जड़ हो या चेतन, प्राकृतिक तत्वों से मिल कर बनी है। मनुष्य का शरीर भी पंच-तत्व से मिल कर बना हुआ है अत: मानव जीवन के लिए प्राकृतिक पदार्थों का उनके मूल एवं विशुद्ध रूप में बने रहना अत्यंत आवश्यक है। पर्यावरण का सीधा संबंध प्रकृति से है, जहां समस्त जीवधारी प्राणियों और निर्जीव पदार्थों में सदा एक दूसरे पर निर्भरता और समन्वय की स्थिति रही है। प्रकृति में सजीव और निर्जीव पदार्थ होते हैं जो एक दूसरे के पूरक बन कर प्रकृति की समस्त क्रियाओं का संचालन, संवहन एवं संचरण करते हैं। इन्हीं सजीव एवं निर्जीव पदार्थों का परस्पर पूरक संबंध पर्यावरण का निर्माण करते है।


      पृथ्वी पर और उसके चारो ओर व्याप्त वायुमण्डल तथा सभी प्रकार के जैन अजैव तत्वों में परस्पर सामंजस्य रहता है। यही सामन्जस्य पर्यावरण को जन्म देता है। भारत में प्राचीनकाल से ही इस तथ्य को भली भांति समझ लिया गया था। प्राचीन भारतीय ग्रंथों जैसे वेद, उपनिषद, पुराण आदि में पर्यावरण के विविध तत्वों पर अत्यंत सूक्ष्मता से न केवल प्रकाश डाला गया है अपितु उन्हें स्तुत्य भी माना गया है। वस्तुतरू जब हम किसी व्यक्ति के प्रति आभार का अनुभव करते हैं, स्वयं को उसका ऋणी मानते है अथवा उसकी उपस्थिति प्राणदायिनी के रूप में अत्यंत आवश्यक मानते है तब हम उसे देवत्व के योग्य मान कर उसकी पूजा करने लगते है तथा यही कामना करते हैं कि उसका अस्तित्व सदा बना रहे तथा हम उससे लाभान्वित होते रहे। इस प्रकार की पारणा के मे मूल में धार्मिकता नहीं अपितु उसके महल को स्वीकार करने की भावना निहित होती है। हमारे प्राचीन ऋषी मुनियों ने प्रकृति एवं पर्यावरण के महत्व को न केवल समझा बल्कि प्रकृति एवं पर्यावरण के तत्वों को पूजनीय माना । वेदों में स्वस्थ एवं संतुलित पर्यावरण की प्रार्थना भी की गई है।

हमारे ऋषि-मुनियों को पर्यावरणतंत्र का समुचित ज्ञान था। उन्होंने जड़ जगत अर्थात् पृथ्वी, नदिया, पर्वत, पठार आदि तथा चेतन जगत अर्थात् मानव, पशु, पक्षी, जलचर, वन आदि के पारस्परिक सामंजस्य को भी समझा तथा इस सामंजस्य को पर्यावरण के लिए आवश्यक निरूपित किया। वे यह भी समझ गए थे कि जड़ एवं चेतन तत्वों में से किसी की भी क्षति होने से प्रकृति का संतुलन बिगड़ सकता है और इसीलिए उन्होंने प्रत्येक तत्व के प्रति आदर भावना को प्रतिपादित किया जिससे मानव किसी श्री तत्व को पति पहचाने में संकोच करे। धीरे-धीरे हम प्राचीन मूल्यों को भूलते गए और इसी का प्रतिफ ल है कि आज हमें पर्यावरण के असंतुलन के संकट से जूझना पड़ रहा है। उदाहरण के लिए यह स्मरण किया जा सकता है कि जब तक वन का स्वरूप हमारे मन-मस्तिष्क में एक देवता के रूप में स्थापित था तब तक हमने वनों की अंधाधुंध कटाई नहीं की थी लेकिन जैसे-जैसे हमने वनों को देवता मानना छोड़ दिया वैसे- वैसे वन हमें मात्र उपभोग की वस्तु दिखने लगे और हमने अंधाधुंध कटाई शुरू कर दी। वेदों में प्रकृति और पर्यावरण के संबंध में विस्तृत जानकारी मिलती है। ऋग्वेद को प्रकृति विज्ञान की प्रथम पुस्तक माना गया है। इसमें मनुष्य एवं प्रकृति के अंतर्सम्बन्धों के बारे में भी बताया गया है। यजुर्वेद में पर्यावरण को शुद्ध एवं संतुलित रखने के बारे में उल्लेख किया गया है। वेदों में पर्यावरण क आकार अत्यंत व्यापक है। पर्यावरण के महत्तर स्वरूप पर वेदों में पूरे-पूरे सूक्त रचे गए हैं। पृथ्वी सूक्त भी एक ऐसा ही सूक्त जिसमें पृथ्वी की महत्ता के साथ-साथ उसके प्रति अगाध निष्ठा एवं विश्वास को निरूपित किया गया है-
ऋषियों के अनुसार प्राकृतिक तत्वों से ही मानव इस जीवन को तथा श्रेष्ठता को प्राप्त करता है।

अतो देवा अवन्तुना यतो विष्णुर्विचक्रमे पृथिव्याः सप्त द्याममिः।। ( 16/6/22 ऋग्वेद)

अर्थात जगदीश्वर ने जिन सात तत्व अर्थात पृथ्वी, जल, अगि, वायु, विराट, परमाणु और प्रकृति से चराचर जगत् का निर्माण किया है, वे ही तत्व हमारी रक्षा करते रहें।
त्रिरश्विना सिन्धुमिरू सप्तमात मिखय आहावाखेचा हविष्कृताम् ।
तिखः पृथिवीपरि प्रवादियो कुमिति।।  5/8/34, ऋग्वेद)

अर्थात् मनुष्यों को चाहिए कि वायु के छेदन, आकर्षण और वृष्टि कराने वाले गुणों से नदी बहती तथा हवन किया हुआ द्रव्य दुर्गान्ध आदि दोषों का निवारण कर सबको दुखों से रहित कर सुखों को सिद्ध करता है। इसके बिना कोई भी प्राणि जी नहीं सकता है अतः इसकी शुद्धि के लिए यशरूपी कर्म नित्य ही करना चाहिए।

वैदिक ऋषियों ने प्रकृति से शिक्षा ग्रहण करने का उपदेश दिया क्योंकि प्रकृति के सभी तत्व परस्पर पूरक के रूप में पाए जाते है -
ते जझिरे दिन ऋष्वास उक्षणों रूद्रस्य मर्या असुरा अरपसः ।
पावकासः शुचयः सूर्यो इव सत्वानो न द्रप्सिना घोरवर्पसः । (6/2/54/ ऋग्वेद)

- अर्थात् मनुष्यों के लिए उचित है कि जो रुद्रस्य जीव व प्राण के संबंधी पवन, प्रकाश से उत्पन्न होते हैं, जो सूर्य की किरणों के समान ज्ञान के हेतु संचन एवं पवित्र करने वाले हैं जिनमें सत्व एवं शुद्ध गुण है जो असुर नहीं है उन्हीं के साथ विद्या जैसे उत्तम गुणों को ग्रहण करें ।

वायु शुद्धता - सजीव संसार की रक्षा के लिए वायु स्वच्छता को प्राथमिकता दी जाती थी। ऋषियों ने यह भी माना कि प्राणवायु (ऑक्सिजन) के अभाव में एक पल भी जीवित रहना संभव नहीं है इसीलिए ईश्वर ने जब सृष्टि की रचना की तो पृथ्वी के चारो ओर वायु का संचरण किया। वेदों में स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि शुद्ध वायु हमारे प्राणों की रक्षा करती है तथा पेड़-पौधे वायु को शुद्ध रखते हैं।
विश्वेदेवा देवेषु देवाः
पथो अनतु मध्वा घृतेन।। (27/12/यजुर्वेद )

सवितसर वसमता भणमनि व्युष्टिषु क्षपः
कण्वासस्त्वा सुतसोमाय इन्द्यते हव्यवाहं स्वध्वर ।1 (28/8/44/ऋग्वेद)
इस श्लोक में कहा गया है कि मनुष्यों को चाहिए कि वायु एवं वृष्टि को शुद्ध करने वाले यश का प्रकाश करके अपने कार्यों को सिद्ध करें।

जलशुद्धि - पर्यावरण का दूसरा महत्वपूर्ण तत्व है पानी। वेदों में जल के संबंध में विस्तृत जानकारी मिलती है। वैदिक काल में जल को शुद्ध रखने पर विशेष ध्यान दिया जाता था। जल को दिव्य देवता माना जाता था । ऋग्वेद में आहान किया गया है कि जल को शुद्ध रहने दो क्योंकि शुद्ध जल मृत्यु से रक्षा करता है। स्वच्छ जल औषधि के समान होता है अतरू स्वच्छ जल मनुष्य को निरोग रखता है। यह आयुवर्द्धक एवं अमृत के समान है। यह प्राणों को रक्षक है।
शं नो देवीरभिष्य आयो भवन्तु पीयते ।
शंयोरभि खवन्तु नः।। (10/9/4/ऋग्वेद)

ऋग्वेद में यह भी प्रार्थना की गई है कि स्वच्छ जल जो कि जीवनदायी एवं बलदायी है, हमारे वर्तमान को मिले, भविष्य को भी मिले और हमारे लिए सब प्रकार से सुख और स्वास्थ्य प्रदान करने वाला हो । वैदिकयुग के ऋषि कुशल जल चिकित्सक भी थे। वे शुद्ध जल के प्रयोग से एदर, नेत्र और शक्ति संबंधी चिकित्सा किया करते थे। सौंदर्यवर्धन के लिए भी जलचिकित्सा का उल्लेख मिलता है। आपो भद्रा वृतमिदाप आयो विवत्साप इत्ताः ।
आदित्पश्यसम्युत वा शृणोम्या मा घोषो गच्छिति वाङ्ग मासाम् ।
मन्ये भेजानो अमृतस्य तर्हि हिरण्यवर्णा अतृप यदा वः ।। (3/13/6/अथर्ववेद)

ऋषियों ने जल को पाचन हेतु तीव्र रस, प्राण, कांति, बल, पौरुष, अमरत्व प्रदान करने वाला प्रमुख तत्व कहा तथा इसकी रक्षा करने एवं इसे शुद्ध रखने का आह्वान किया। वनसंपदा एवं तत्व रक्षा रू वन एवं वनसंपदा तथा समस्त प्रकार के जड़ तत्वों के संबंध में वेदों में रक्षा एवं शुद्धता का आह्वान किया गया है। ऋषियों ने पृथ्वी को माता का स्थान दे कर उसकी सेवा एवं रक्षा की भावना को सुनिश्चित किया। उन्होंने ने कहा कि पृथ्वी हमारी माता है और हम इसकी सन्तान है। जो भी प्राणधारी इस पृथ्वी पर है वह पृथ्वी की संतान है। यह पृथ्वी हमें फल, औषधि, अन्न एवं जल प्रदान करती है अतरू इस पृथ्वी के सभी तत्वों को संरक्षण देना हमारा कर्तव्य है ।
सारांशतः यह कहा जा सकता है कि वेदों में पर्यावरण एवं प्रकृति के संबंध में विस्तृत ज्ञान निहित है साथ ही निहित है वे समाधान भी जिन्हें अपना कर पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से निजात पाया जा सकता है। यदि हम आज के भौतिकवादी युग की कृत्रिमता को त्याग का प्रकृति के मौलिक स्वरूप पर ध्यान दें तथा उसे उचित संरक्षण प्रदान करें एवं अपनी जीवनचर्या में वेदों में निर्देशित संयम को आत्मसात करें तो हम निश्चित हो कर प्रदूषणमुक्त भविष्य की कल्पना कर सकते है। अतः जितनी आवश्यकता वेदो को संरक्षित करने तथा ज्ञान के प्राचीन स्रोत को संरक्षित करने की है उतनी ही आवश्यकता वेदों में दिए गए पर्यावरण संबंधी आचरण को जीवन में उतारने की है।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 07 .01.2025 को प्रकाशित) 
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Tuesday, January 6, 2026

पुस्तक समीक्षा | ज़बर्दस्त रोमांचक है मुकेश भारद्वाज के अभिमन्यु सिरीज़ का नया थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा | ज़बर्दस्त रोमांचक है मुकेश भारद्वाज के अभिमन्यु सिरीज़ का नया थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा  

ज़बर्दस्त रोमांचक है मुकेश भारद्वाज के अभिमन्यु सिरीज़ का नया थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ 

- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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उपन्यास     - राज़महल 
लेखक       - मुकेश भारद्वाज
प्रकाशक     - वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
मूल्य       - 395/-
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‘‘जनसत्ता’’ के कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज अपने काॅलम ‘‘बेबाक बोल’’ के लिए तो चर्चित हैं ही किन्तु जब उन्होंने थ्रिलर उपन्यास लिखना शुरू किया तो अपने पहले उपन्यास ‘‘मेरे बाद’’ ने ही तहलका मचा दिया। हिन्दी जगत में रोमांचक जासूसी उपन्यासों को ले कर एक शून्यता का अनुभव हो रहा था, उस शून्यता को मुकेश भारद्वाज ने अपने उपन्यास ‘‘मेरे बाद’’ से भर दिया। उपन्यास का मुख्य पात्र अभिमन्यु पाठकों के मन-मस्तिष्क पर छा गया। इसका परिणाम यह हुआ कि एक साल बाद ही दूसरा जासूसी उपन्यास ‘‘बेगुनाह’’ और फिर तीसरा उपन्यास ‘‘नक्काश’’ पाठकों के हाथों में आ गया। यदि पाठक पसंद करें तो लेखक भी उत्साहित होता है। जिस तरह कभी विनोद-हमीद, सुनील और मेजर बलवंत के लिए पाठकों में जुनून पाया जाता था, ठीक उसी तरह ‘‘अभिमन्यु’’ के लिए भी पाठकों में जुनून जाग उठा है। वे अभिमन्यु के किरदार से स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। वे उसके साथ-साथ चल कर हर मिस्ट्री को सुलझाना चाहते हैं। बल्कि कई बार तो पाठक अपने प्रिय पात्र को भी मात दे कर आगे बढ़ जाना चाहता है और उससे पहले हत्या की गुत्थी सुलझा लेना चाहता है। यह वस्तुतः उस पात्र से जुड़ा यथार्थबोध होता है जो पाठकों को उकसाता है। थ्रिलर के मंजे हुए लेखक अपने पात्र और पाठकों के इस रिश्ते को भली-भांति समझते हैं और इसी सूत्र को पकड़ कर कथानक को आगे बढ़ाते हैं जिससे पाठकों को कभी अपना प्रिय पात्र यानी उपन्यास का हीरो आगे लगे तो कभी वे स्वयं को उससे आगे महसूस करें। यह ताना-बाना उपन्यास को सफलता के शिखर पर पहुंचा देता है। 
अभिमन्यु सिरीज़ का नवीनतम उपन्यास है ‘‘राज़महल’’। जी हां, राजा-रानी वाला कोरा सियासी ‘‘राजमहल’’ नहीं, वरन  ‘‘राज़महल’’ जिसमें राज़ ही राज़ हैं यानी ढेर सारा सस्पेंस। थ्रिलर उपन्यासों की मुख्य विशेषता ही होती है पाठकों के चेतन-अवचेतन में रोमांच, शंका और सतत उद्वेलन को जगाना। रहस्य-रोमांच  उपन्यासों के विपरीत, रोमांचकारी यानी थ्रिलर उपन्यास मात्र पूर्व घटित अपराध को सुलझाने पर केंद्रित नहीं होते हैं, वरन वे समय सीमा के भीतर भविष्य में होने वाले अपराध को रोकने का संघर्ष भी दिखाते हैं। थ्रिलर उपन्यासों की सबसे प्रमुख विशेषता होती है रोमांच और गति। थ्रिल यानी रोमांच तभी पैदा होता है जब पाठकों को आने वाले खतरे और परिणाम के बारे में अनिश्चितता का एहसास हो और उनकी उत्सुकता बनी रहे कि अब क्या होने जा रहा है? इसके साथ ही कथानक की गति भी इसे रोमांचक बनाती है। इसे दूसरे शब्दों में कहा जाए तो भरपूर एक्शन। ताकि पाठक एक बार पढ़ना शुरू करे उसे पूरा पढ़ कर ही थमें। इतना ही नहीं थमने के बाद भी वह अपने मानस में मुख्य पात्र के साथ कई-कई दिन तक घटनाओं का विश्लेषण करता रहे। यही प्रक्रिया उस सिरीज के अगले उपन्यास के लिए पाठक का मानस तैयार कर देती है। एक व्याकुलता जगा देती है कि इस सिरीज का अगला उपन्यास कब आएगा? फिर जब नया उपन्यास आता है तो उसकी उत्सुकता चरम पर पहुंच जाती है। 

मुकेश भरद्वाज ने अभिमन्यु के रूप में पाठकों को एक ऐसा पात्र दिया है जो कभी जेम्सबांड की तरह बिंदास एवं दिलफेंक है तो कभी शारलाक होम्स की तरह गंभीर, कभी सुनील की तरह दिल्ली की छाप लिए हुए तो कभी एक अनूठा अद्वितीय चरित्र जो देश के किसी भी हिस्से के पाठक को अपना-सा लगेगा। ‘‘राज़महल’’ उपन्यास में भी अभिमन्यु अपने पूरे किरदार के साथ उपस्थित है। इसीलिए आर्म डीलर निहाल सिंह की दूकान पर जब बला की खूबसूरत टाटा घोष से उसकी मुलाकात होती है तो वह टाटा से दोस्ती करने में एक पल की देर नहीं करता है। यह कोई रोमांटिक भेंट नहीं थी। टाटा घोष उस दूकान पर रिवाल्वर खरीदने आई थी। वह खरीदती भी है। यहीं से सस्पेंस शुरू हो जाता है कि एक सुंदर स्त्री किस पर गोली चलाने जा रही है? और क्यों? 
दूकानदार निहाल सिंह के रूप में पंजाबी बोली का तड़का आरम्भ से ही गुदगुदाता है। कुछ पन्नों की यात्रा के बाद मधुमालिनी और सुदक्षदीप सिंह की कहानी से गुज़रना होता है। सुदक्षदीप सिंह का कुत्सित कर्म और शिकार बनती है मधुमालिनी। कई बार एक अपनराध दूसरे अपराध की जमीन तैयार कर देता है। न्याय के नाम पर ही सही। ऐसे बिन्दु पर यह तय करना कठिन हो जाता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित? पाठक का मानस उस पर एक चित्त हो कर विक्टिम यानी पीड़ित के पक्ष में डट कर खड़ा हो जाता है। सुदक्षदीप सिंह की रहस्यमयी मौत पाठक के मन को राहत तो देती है किन्तु उत्सुकता भी जगाती है कि उसे इस अंजाम तक किसने पहुंचाया? 

चाहे सत्या सुहानी हो, सबीना या सनम हो, उपन्यास के सभी पात्र अपनी-अपनी भूमिका में खरे उतरते हुए कथानक को जिस प्रकार गति देते हैं वह पाठकों को बांधे रखने के लिए पर्याप्त है। थ्रिलर लेखक अकसर कथानक में अप्रत्याशित मोड़ और भ्रामक संकेत दे कर तनाव और आश्चर्य बनाए रखते हैं। पाठक इन टूल्स से कुछ समय के लिए गुमराह हो जाता है और उलझ कर रह जाता है। यूं भी थ्रिलर उपन्यास का नायक प्रथमदृष्ट्या एक साधारण व्यक्ति होता है जिसे खतरे का आंशिक अनुभव तो होता है फिर भी वह स्वयं को असाधारण और जानलेवा स्थिति में फंसने से रोक नहीं पाता है। उसकी यह ‘डेयरिंग’ ही उसे पाठकों का प्रिय बना देती है। जैसे पाठक अभिमन्यु से जुड़ाव महसूस करते हैं और उसकी सुरक्षा और सफलता को ले कर चिंतित होने लगते हैं। भ्रम को सच के बोध में बदल कर लेखक अपने पात्र को पाठकों के मन-मस्तिष्क में उतार देता है, बड़ी चतुराई से उनका सहगामी बना देता है। एक थ्रिलर की मूल विशेषता है कि वह भय और समाधान की इच्छा जैसी मूलभूत मानवीय प्रवृत्तियों को जगा कर वास्तविकता से एक गहन, एड्रेनालाईन- युक्त संसार रचता है जिसमें परम उत्तेजना के पल पाठक को स्वयं एक जासूस बनने को विवश कर देते हैं। इसी बिन्दु पर लेखक की लेखकीय क्षमता की परीक्षा भी होती है। अभिमन्यु के किरदार का पाठको के मन पर छा जाना इस बात का सबूत है कि मुकेश भरद्वाज थ्रिलर लेखन के टूल्स से खेलने में माहिर हैं। वे जानते हैं कि कहां अभिमन्यु को चुस्त-चालाक दिखाना है और कहां उसे एक लापरवाह खिलंदड़ा रखना है।  
 
पाठकों को क्राइम और थ्रिलर फिक्शन पसंद क्यों आता है? क्योंकि यह उन्हें जीवन के घटनाक्रमों के अनजान हिस्सों को अनुभव करने का मौका देता है। वे अपनी जगह बैठे-बैठे जीवन के उन खतरनाक मोड़ों पर पहुंच सकते हैं जहां अपराधी पनपते हैं। वे अपराध के घिनौने रूपों से साक्षात्कार कर सकते हैं। वे स्वयं को अपराध रोकने वाले के पक्ष में खड़ा होते अनुभव कर सकते हैं। थ्रिलर सस्पेंस, एक्साइटमेंट और उत्सुकता पैदा करता है, जो दर्शकों को क्राइम, रहस्य, जासूसी या मनोवैज्ञानिक तनाव वाली हाई-स्टेक कहानियों के साथ मानसिक यात्रा करता है, जिसमें अक्सर तेज गति, अप्रत्याशित मोड़ और नायक समय या खतरे के खिलाफ दौड़ते हैं। इसमें लेखक सस्पेंस और उत्सुकता रूप जानकारी को नियंत्रित करके और अपरिहार्य घटनाओं में देरी करके तनाव पैदा करता है। हाई स्टेक्स रूप अक्सर जानलेवा स्थितियों, खतरे या मनोवैज्ञानिक यातना स्वाभाविक रूप से शामिल होती है। जटिलतम परिस्थितियों में नायक आमतौर पर भारी बाधाओं का सामना करता है, अक्सर अकेला होता है, एक खलनायक या टिक-टिक करती घड़ी के विरुद्ध काम करता है।

थ्रिलर की एक खूबी यह भी होती है कि उनमें से किसी एक को अंतिम रूप से ‘‘सबसे अच्छा’’ ठहराया नहीं जा सकता है लेकिन लेखकीय क्षमता किसी भी थ्रिलर को सर्वाधिक पाठक उपलब्ध करा कर उसे ‘बेस्ट सेलर’ बना देती है। जैसे कुछ प्रसिद्ध आधुनिक वास्तुशिल्प उपन्यासों में द साइलेंट पेशेंट (एलेक्स माइकलाइड्स), द हाउसमेड (फ्रीडा मैकफैडेन), द गर्ल ऑन द ट्रेन (पाउला हॉकिन्स), द ग्रैबेड मिस्टर रिपल (पेट्रीसिया हाईस्मिथ), और डी ऑफ द जैकल (फ्रेडरिक फोर्सिथ) शामिल हैं, जो अपने वैज्ञानिक गहराई, स्ट्रेनल फ्लेक्स और स्ट्रेंथ सैस्पेंस के लिए जाने जाते हैं। इसी क्रम में यदि हिन्दी थ्रिलर उपन्यास को देखें तो ‘‘राज़महल’’ पूरी तरह खरा उतरता है।
‘‘राज़महल" का  कवर पेज ही इस किताब के कंटेंट को पढ़ने के लिए उत्सुकता जगाता है। मध्य में पीठ पीछे पिस्तौल छिपाए खड़ा आदमी, उसके इर्दगिर्द मदिरा, रुपए, एक ओर एक पिस्तौलधारी जो दबे पांव अपने शिकार की ओर बढ़ रहा है, दूसरी ओर मात्र एक पिस्तौल जिसके साथ उंगलियों की मज़बूत पकड़ तो दिख रही है किन्तु उसे थामने वाला गोपन में है, कुछ लैंडमार्क जो घटनाओं के स्थान की ओर संकेत करते हैं। 

  किसी भी थ्रिलर उपन्यास के बारे में समीक्षात्मक लिखना कठिन होता है क्योंकि आप उसके कथानक को छू भी नहीं सकते हैं क्योंकि किसी भी तरह से भेद खोल कर लेखक की मेहनत पर पानी नहीं फेर सकते हैं। लेकिन बतौर समीक्षक यह दावा किया जा सकता है कि इसे पढ़ा जाए अथवा नहीं? या फिर लेखक ने कथानक के साथ न्याय किया है या नहीं? तो बेझिझक यह दावा किया जा सकता है कि मुकेश भारद्वाज का नवीनतम थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ उन सभी पाठको को अवश्य पढ़ना चाहिए जिनकी रहस्य और रोमांच में गहरी रुचि है। लेखक ने अपनी पूरी लेखकीय क्षमता को काम लाते हुए इतने प्रभावी ढंग से उपन्यास का ताना-बाना बुना है कि इसके मुख्य पात्र अभिमन्यु के साथ पाठक भी स्वयं को एक जासूस की भांति महसूस करेगा। महल से निकला राज़ किस तरह एक पूरा राज़महल खड़ा कर सकता है, यह भी अनुभव होगा पाठकों को। इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि पाठक इसे पढ़ने के बाद अभिमन्यु सिरीज के अगले उपन्यास के लिए लेखक पर दबाव डालने लगें। यही इस उपन्यास की लोकप्रियता एवं सफलता का मानक है।
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