Thursday, February 19, 2026

बतकाव बिन्ना की | दुनिया कैसी? मोए जैसी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की | दुनिया कैसी?  मोए जैसी | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की       
दुनिया कैसी?  मोए जैसी !
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

   ‘‘भैयाजी, आज भुनसारे मोरी नींद खुली, तभईं से मोए एक किसां याद आ रई। कओ तो सुना दई जाए।’’ मैंने भैयाजी से पूछी। मोए पतो के भैयाजी कभऊं मोय मनो ने करहें, चाए मैं उने किसां सुनाऊं चाए गारी गाऊं।
‘‘हऔ सुनाओ!’’ जैसी मैंने सोची रई, भैयाजी ने तुरतईं ‘हौ’ बोल दओ।
‘‘भैयाजी ऐसो आए के हिन्दी में कही जात के साउन के अंधरा खों सबई कछू हरीरो-हरीरो दिखात आए। सो, जेई टाईप की किसां बुंदेली में सोई कही जात आए। सुनो किसां!’’ मैंने कई।
‘‘हऔ तो सुनाओ अब। का भूमिकई बांधत रैहो?’’ भैयाजी चिड़कात भए बोले।
‘‘का भओ भैयाजी के एक हतो भगुंता नाई। ऊकी बड़े-बड़े घरों में पौंच हती। काए से के भगुंता हाथ-पांव की मालिश करबे में अव्वल हतो। एक दिना भगुंता को दूर-दराज को नातेदार गुजर गओ। ऊ मरबे के पैले भगुंता के लाने सोने की दो मोहरें छोड़ गओ। इके पैले भगुंता के पास एकऊ मोहरें ने हतीं, सो दो-दो मोहरें पा के ऊकी बांछें खिल गईं। पर इके संगे ऊको फिकर भई के जे मोहरन खों लुका के राखने परहे। ने तो कऊं कोनऊं छिना ने ले। कऊं कोनऊ चोर चुरा ने ले जाए। भगुंता ने सोची के घर की किवरिया खो कौन भरोसो, जा तो एकई लात की आए। इसे तो मोहरन खों संगे राखने में भलाई कहानी। सो, मोहरें राखने के लाने भगुंता को कोऊ जागां ने सूझी सो ऊने एक डबिया लई, ऊमें दोई मोहरे राखी औ डबिया खों अफ्नी मालिस की पेटी में धर लई।
‘‘अब ठीक आए। अब मोरी मोहरन खों कोनऊ हाथ ने लगा पैहे।’’ भगुंता ने सोची। काए से के पेटी तो बरहमेस ऊके संगई बनी रैत्ती। अब तो भगुंता अपनी पेटी खों औरई अपने कलेजे से चिपटाए रहन लगो।
एक दिना भगुंता सरपंच की मालिश कर रओ हतो। दोई जनों में कछू-कछू बतकाव सोई चल रई हती। सरपंच ने भगुंता से पूछी-‘‘काए रें, भगुंता। तोये तो पतो हुइये के गांव में का चल रओ?’’
‘‘आप मालक की किरपा! सब ठीकई चल रओ।’’ भगुंता बोलो।
‘‘कोनऊ खों कोई तकलीफ-परेसानी तो नइयां?’’ सरपंच ने पूछी।
‘‘तकलीफ परेसानी काए की? अपने तो गांव में भिखमंगा सोई सोने की दो-दो मोहरे राखत आएं।’’ भगुंता ऐंड़ के बोलो।
सरपंच ताड़ गओ के दाल में कछु कारो आए। सरपंचने जा खबर तो सुन रखी हती के भगुंता खों अपने नातेदार के मरबे पे दो मोहरे मिली रईं। हो न हो, जा भगुंता ऊ मोहरन के लाने कै रओ। फेर सरपंच ने सोची के, बा मोहरे जा अफ्नी जेई पेटी में राखत हुइए, तर्भइं तो जा पेटी कलेजे से चिपटाए फिरत आए।
‘‘जारे, भगुंता! जा के भीतरे से तनक बिजना तो उठा ला। तनक गरमी सी लग रई।’’ सरपंच ने भगुंता से कई औ ऊको उते से टरका के, ऊकी पेटी थथोल डारी। सरपंच के हाथ बा डबिया लग गई जा में भगुंता ने मोहरे रखी हतीं। सरपंच ने सोची के जा भगुंता बड़ो ऐंड रओ आए, जा के लाने भगुंता खो सबक सिखाओ जाए। औ सरपंच ने डबिया से मोहरे निकार लई। तब लो मगुंता भीतरे से बिजना उठा लाओ। भगुंता समझई ने पाओ के ऊके पाछूं सरपंच ने ऊकी मोहरे निकार लई आएं।
सरपंच के इते से लौट के भगुंता ने अपनी पेटी जांची। ऊने डबिया में से मोहरे नदारत पाई। ऊको जी धक से रै गओ। ऊने पूरो घर छान मारो, मोहरें कहूं ने मिली। ऊने सोची के पेटी खोलत-करत में मोहरे कहू गैल में हेरा गई हुइएं। बा जे तो सोचई ने सकत्तो के सरपंच ऊकी मोहरे निकार सकत आए।
ऊ दिनां से भगुंता उदास रैन लगो।
ऊकी उदासी देख के एक दिनां सरपंच ने ऊसे पूछी- ‘‘काए रे भगुंता! तोये तो पतो हुइए के गांव में का चल रओ?’’
‘‘रामधई, बड़ो बुरओ चल रओ आए। मालक की किरपा नई रई, मालक रूठे कहाने। ’’ भगुंता ने मों लटका के कई।
‘‘काए? ऐसो का हो गओ? कौन-सी विपदा आन परी? अपने तो गांव में भिखमंगा सोई सोने की दो-दो मोहरें राखत आए।’’ सरपंच ने पूछी।
‘‘हजूर, अब कहां धरीं दो मोहरें।’’ भगुंता खिसियानो सो बोलो।
‘‘काए? तुमई तो कहत्ते के अपने गांव में भिखमंगा सोई सोने की दो-दो मोहरें राखत आएं।’’ सरपंच ने चुटकी लई।
‘‘अरे हजूर, ने पूछो। मोय तो कछु समझई में नई आत। जब लो मोरे ऐंगर दो मोहरे रईं सो मोये सबई के ऐगर मोहरें दिखात रईं। अब मोरी मोहरे हिरा गई सो मोये लगत आए के ई गांव में सबई के सब कंगला हो गएं। सो मोसेे से कछू ने पूछो, हजूर!’’ भगुंता की आंखन से टप-टप अंसुआं झरन लगे।
जा देख के सरपंच को जी पसीज गओ।
‘‘वाह रे भगुंता। तेरी तो बोई किसां ठैरी के दुनिया कैसी, मोए जैसी। जो मैं दुखी, सो दुनिया दुखी। जो मैं खुशी तो दुनिया खुशी। अरे मूरख, जे दुनिया खों अफ्नो घाई ने देखो कर। तू, तू आए औ दुनिया, दुनिया आए। सबई की अपनी खुशी औ अपने दुक्ख होए आएं। समझ परी कछू?’’ सरपंच ने भगुंता से कई और ऊकी सोने की दोई मोहरें ऊकी गदेली पे धर दईं।
भगुंता अपनी मोहरें देख के भौतई खुश हो गओ। बाकी ऊको समझ ने परी के सरपंच के लिंगे ऊकी मोंहरें कां से आई। पर ऊको ईसे का? कऊं से आई होय? मिल तो गईं। फेर सरपंच से पूछो बी नई जा सकत्तो।
ऊको खुश देख के सरपंच ने फेर ऊसे पूछी-‘‘काए भगुंता, अब गांव को का हाल-चाल आए?’’
‘‘मालिक की किरपा! अब सब ठीक हो गओ।’’ भगुंता पैले घाई चहक के बोलो।
‘‘सो अब कोनऊ खों कोऊ तकलीफ-परेसानी नइयां?’’ सरपंच ने फेर के पूछी।
‘‘काए की परेसानी, अपने गांव में भिखमंगा सोई सोने की दो-दो मोहरे राखत आए।’’ भगुंता पैलई घांईं बोलो।
जा सुन के सरपंच ने अपनो मूंड़ पीट लओ। औ मनई मन सोचन लगो के जे भगुंता तो मोहरन को अंधरा आए। जा नईं सुधर सकत।
‘‘सो भैयाजी, जा हती किसां।’’ किसां खतम करत भई मैंने कई।
‘‘हऔ, नोनी किसां हती। जा सो बई बात भई के दुनिया कैसी? मोय जैसी!’’ भैयाजी हंस के बोले।
‘‘हऔ भैयाजी! जेई तो सोचबे की बात आए के जब लों कछू पार्टी वारे जेई सोचत रैहें के दुनिया उनई के जैसी आए, तबलौं बे कभऊं ने जीते पाहें। अबे बी टेम आए के बे अपनी सोच बदल लेंवें, ने तो राम नाम सत्त हो जैहे।’’ मैंने कई।
‘‘ठीक कई बिन्ना!’’ भैयाजी ने मोरी बात की समर्थन कीे।
आप ओरें सोई सोचियो, जो मैंने झूठ कई होय! बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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चर्चा प्लस | यदि अपने सपने सच करना है तो पहले सपने देखिए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस       
यदि अपने सपने सच करना है तो पहले सपने देखिए
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                   ‘‘यदि अपने सपने सच करना है तो पहले सपने देखिए!’’ यही तो कहा था ‘मिसाइल मैन’ के नाम से विख्यात वैज्ञानिक, पूर्व राष्ट्रपति डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम ने। उन्होंने यह सिर्फ़ कहा नहीं बल्कि इसे अपने स्वयं के जीवन पर चरितार्थ कर के दिखाया। उन्होंने ने देश के लिए बहुत कुछ करने का सपना देखा। फिर अपनी पूरी शक्ति लगा दी उस सपने को सच करने में। तभी तो अखबार बेचने वाला एक हाॅकर लड़का एक दिन भारत के लिए मिसाइल बना सका और उसने राष्ट्रपति बन कर देश का गौरव बढ़ाया। यह लड़का और कोई नहीं स्वयं डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम थे।

हमारा देश एक ऐसा लोकतांत्रिक देश है जहां सब कुछ संभव है। इस देश में चाय बेचने वाला एक लड़का बड़ा हो कर प्रधानमंत्री बन सकता है, आदिवासी जीवन के रूप में मुख्यधारा से कट कर जीवन जीने को विवश बालिका राष्ट्रपति बन सकती है, इसी प्रकार अपने स्कूल की फीस भरने के लिए अख़बार बेचने वाला एक लड़का पहले उच्चकोटि का वैज्ञानिक और फिर देश राष्ट्रपति बन सकता है।इन तीनों उदाहरणों में दो स्थितियां एक समान हैं- एक तो संघर्षमय अतिसामान्य जीवन से शुरुआत और दूसरी दृढ़ इच्छाशक्ति। हमारे देश के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम एक ऐसे ही व्यक्तित्व थे जिन्होंने ज़मीन से आरम्भ किया और आसमान तक जा पहुंचे। देश के 11वें राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने भारत को सशक्त बनाने का सपना देखा और उस सपने को पूरा करने के लिए देश में ही मिसाइल निर्माण की शुरुआत की। इसीलिए उन्हें ‘‘मिसाईल मैन’’ भी कहा जाता है।

पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के पिता जैनुलाब्दीन नाविक थे। वह पढ़े-लिखे नहीं थे, न ही ज्यादा पैसे वाले थे। लेकिन वह नियम के बहुत पक्के थे। वह मछुआरों को नाव किराए पर दिया करते थे। डॉ. कलाम ने अपनी शुरुआती शिक्षा जारी रखने के लिए हाॅकर के रूप में अखबार बांटने काम किया था। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का पूरा नाम अवुल पकिर जैनुल्लाब्दीन अब्दुल कलाम था। उनका जन्म 15 अक्तूबर, 1931 को तमिलनाडु राज्य के रामेश्वरम् जिले के धनुषकोड़ी गांव में हुआ था। कलाम एक बहुत बड़े परिवार के सदस्य थे, जिसमें पांच भाई और पांच बहन थी। कलाम ने अपनी आरम्भिक शिक्षा रामेश्वरम् में पूरी की, सेंट जोसेफ कॉलेज से ग्रेजुएशन की डिग्री ली। वे पायलेट बनना चाहते थे किन्तु किन्हीं कारणवश वे अपनी यह इच्छा पूरी नहीं कर सके। तब उन्होंने अपनी इच्छा के मार्ग को दूसरी ओर मोड़ दिया लेकिन यह मार्ग भी उन्हें आसमान की ओर ले जाता था। उन्होंने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की।
डाॅ. कलाम बेहद सादगी से जीवन जीने वाले व्यक्ति थे। अनुशासन में रहना और दैनिक रूप से पढ़ना इनकी दिनचर्या में था। अपने गुरु से उन्होंने सीखा था कि यदि आप किसी भी चीज को पाना चाहते है तो अपनी इच्छा तीव्र रखनी होगी। डाॅ. कलाम विलासिता और दिखावे से दूर रहते थे। एक बार राष्ट्रपति भवन में उनके परिजन रहने के लिए आए, जहां उनका स्वागत उन्होंने बहुत अच्छे से किया। परिजन 9 दिन तक राष्ट्रपति भवन में रहे, जिसका खर्च साढ़े तीन लाख रुपए हुआ। यह बिल उन्होंने अपनी जेब से भरा।
सन् 1962 में वे अंतरिक्ष विभाग से जुड़ गए जहां उन्हें विक्रम साराभाई, सतीश धवन और ब्रह्म प्रकाश जैसे महान हस्तियों का सान्निध्य प्राप्त हुआ। 1980 में पूर्ण रूप से भारत में निर्मित उपग्रह रोहिणी का प्रक्षेपण किया, जो सफल रहा। अब्दुल कलाम विभिन्न सरकारों में विज्ञान सलाहकार और रक्षा सलाहकार के पद पर रहे। डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन में रहते हुए इन्होंने ‘पृथ्वी’ और ‘अग्नि’ जैसी मिसाइल का निर्माण कराया। उन्होंने राजस्थान में हुए दूसरे परमाणु परीक्षण (शक्ति-2) को सफल बनाया।
डाॅ. कलाम बच्चों से बहुत प्रेम करते थे और वे बच्चों को जीवन में विज्ञान के महत्व के बारे में समझाया करते थे। वे कहते थे कि -‘‘विज्ञान जब विशेष ज्ञान है तो हमें उसकी विशेषताओं को समझना चाहिए और उससे लाभ उठाना चाहिए।’’
जब सन् 2002 में उन्होंने राष्ट्रपति पद का भार ग्रहण किया उसके बाद भी राष्ट्रपति-भवन के दरवाज़े सदा आमजन के लिए खुले रहे। युवा और बच्चे उन्हें पत्र लिख कर उनसे जीवन और विज्ञान संबंधी प्रश्न पूछा करते थे। उन पत्रों का जबाव वे स्वयं अपने हाथों से लिखकर देते थे।
डाॅ. कलाम अविवाहित थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन देशसेवा को समर्पित कर दिया था। उनका जीवन एक महानायक की तरह था। उन्होंने 30 से अधिक पुस्तकें लिखीं जिनमें ‘‘विंग्स ऑफ फायर’’, ‘‘इंडिया 2020’’, ‘‘इग्नाइटेड मांइड’’, ‘‘माय जर्नी’’ बहुचर्चित और प्रेरक रहीं। अब्दुल कलाम को 48 यूनिवर्सिटी और इंस्टीट्यूशन द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई थी। डाॅ. अब्दुल कलाम ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम’’ की विचारधरा को मानते थे। वे मानते थे कि यह धरती ही एक मात्र उपग्रह है, जहां जीवन संभव है। मानव जाति को इसकी रक्षा और संरक्षण का दायित्व निभाना ही होगा। हमारा समाज और हमारी शासन प्रणाली अब पहले से कहीं अधिक संजीदा है क्योंकि मामूली सी देरी से भी अपूर्णीय क्षति हो सकती है। भारत रत्न डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम प्रकृति के संरक्षण के प्रति सजग थे। वे इसे पृथ्वी के सुरक्षित भविष्य के जिए जरूरी मानते थे।  27 जुलाई, 2015 को शिलांग में, भारतीय प्रबंधन संस्थान में ‘क्रिएटिंग ए लिवेबल प्लैनेट अर्थ’ (पृथ्वी को रहने योग्य ग्रह बनाना) विषय पर अपने व्याख्यान में उन्होंने विकास की जद्दोजहद में पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र को हो रहे नुक्सान के प्रति आगाह किया था। उन्होंने प्रकृति को बचाने के लिए भावी कार्ययोजना की रूपरेखा भी सामने रखी थी। डा. कलाम ने सबसे पहले 2 नवम्बर, 2012 को चीन में में भी अपने व्याख्यान के द्वारा इस ओर ध्यानाकर्षण किया था कि धरती को रहने योग्य बनाए रखना कितना जरूरी है।  उन्होंने कहा था कि मानव जाति को अपने सभी संघर्षों को परे धकेल कर पूरी दुनिया के नागरिकों के लिए शांति और खुशहाली का सांझा लक्ष्य रखना होगा। हमें एक रमणीक पृथ्वी के लिए वैश्विक दृष्टि विकसित करनी होगी। मानव जाति के लिए इससे अधिक कल्याणकारी कुछ नहीं हो सकता। वर्ष 1996 में डॉक्टर कलाम टेक्नोलॉजी इन्फॉर्मेशन, फोरकास्टिंग एंड एसेसमेंट काउंसिल (टिफैक) के अध्यक्ष थे और 1996-97 में उन्हीं की अध्यक्षता में ‘‘विजन 2020’’ डॉक्यूमेंट तैयार किया गया था। इसी के आधार पर संगठन ने सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी जिसमें कहा गया था कि साल 2020 तक भारत को क्या हुछ हासिल करने का लक्ष्य रखना चाहिए। डॉ. कलाम ने सरकार को सलाह दी थी कि देश के विकास के तकनीक, विज्ञान, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक क्षेत्र में सरकार को क्या करना चाहिए और इसमें आम नागरिक को क्या भूमिका निभानी चाहिए। इस किताब पर काम करने के लिए डॉ. अब्दुल कलाम और उनके सहयोगी वाईएस राजन ने दर्जनों जानकारों के इंटरव्यू किए और लाखों पन्नों के दस्तावेज पढ़े. ये किताब ‘‘इंडिया 2020: ए विजन फॉर न्यू मिलेनियम’’ नाम से प्रकाशित हुई थी।
यूं तो ‘टिफैक’ की रिपोर्ट विज्ञान और तकनीक पर केंद्रित थी, लेकिन डाॅ. कलाम ने इसमें जोर दे कर कहा है कि विकास की राह में समाज के सभी वर्गों को शामिल किया जाना चाहिए। वे बुनियादी बातों से विकास की चर्चा शुरू करने में विश्वास रखते थे। डॉ. कलाम के अनुसार, ‘‘भारत में हर साल दो करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं। इस सभी बच्चों का क्या भविष्य होगा? जीवन में उनका लक्ष्य क्या होगा? क्या हमें उनके भविष्य के लिए कुछ कदम उठाने चाहिए या फिर हमें उन्हें उनके नसीब के सहारे छोड़ अभिजात्य वर्ग के फायदे के लिए ही काम करना चाहिए?’’
डॉ. कलाम ने इसमें सवाल उठाया था कि - ‘‘बाजार में मांग के अनुसार स्ट्रेटेजी, और कंपीटीशन का दौर जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए क्या हम उन्हें उनके हाल पर छोड़ देंगे या फिर आने वाले दो दशकों में उनके लिए कुछ खास योजना तैयार करेंगे।’’ साल 1998 में लिखी गई इस किताब में डॉक्टर अब्दुल कलाम कहा कि- ‘‘सैंकड़ों एक्सपर्ट से बात कर के और कई रिपोर्टें पढ़ने के बाद मैं ये समझ पाया हूं कि हमारा देश साल 2020 तक विकसित देशों की सूची में शामिल हो सकता है।’’ उन्होंनेे कहा था कि, ‘‘तब भारत के लोग गरीब नहीं रहेंगे, वो लोग तरक्की के लिए अधिक कुशलता से काम करेंगे और हमारी शिक्षा व्यवस्था भी और बेहतर होगी। ये सपना नहीं बल्कि हम सभी लोगों के लिए एक लक्ष्य होना चाहिए।’’
डॉ. कलाम का कहना था कि देश के लक्ष्य हासिल करने के बाद रुकना नहीं चाहिए बल्कि और बेहतरी के लिए सतत प्रयास करते रहना चाहिए। उनका कहना था, ‘‘हमेशा के लिए हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि कैसे हम लोगों की जिंदगियों को बेहतर बनाने की कोशिश करते रहें. वो केवल युवा हैं जिनमें ज्ञान और कौशल तो है ही। साथ ही कुछ हासिल करने का जज््बा भी है, उन्हें आगे नए लक्ष्यों की तरफ बढ़ना चाहिए। देश उस मुकाम तक पहुंचे इसके लिए हमें एक दूसरे की मदद करनी होगी और लक्ष्य के रास्ते से बिना डगमगाए हमें ये सुनिश्चित करना होगा ताकि बदलाव का असर हर व्यक्ति तक पहुंचे।’’
वे युवाओं से कहते थे कि ‘‘ये कभी मत सोचो कि आप अकेले अपने देश के लिए कुछ नहीं कर सकते, आप जिस भी क्षेत्र में काम कर रहे हों आप अपनी योग्यता बढ़ाएं। सभी के प्रयासों से ही भारत विकसित देश बन सकता है।’’
27 जुलाई 2015 को ‘‘अग्नि मिसाइल’’ को उड़ान देने वाले मशहूर वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम जैसे विलक्षण व्यक्तित्व ने इस नश्वर संसार से विदा ले ली। शिलांग आईआईएम में लेक्चर देते हुए उन्हें दिल का दौरा पड़ा। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, किन्तु तब तक देर हो चुकी थी। 83 वर्ष की आयु में डाॅ. कलाम ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं किन्तु देश को भविष्य के सपनों का रास्ता दिखा गए। डाॅ. अब्दुल कलाम उन चुनिंदा लोगों में से रहे हैं जिन्हें सभी सर्वोच्च पुरस्कार मिले। सन् 1981 में पद्म भूषण, 1990 में पद्म विभूषण, 1997 में भारत रत्न से उन्हें सम्मानित किया गया था। वे एक सच्चे पथ-प्रदर्शक थे।             
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(दैनिक, सागर दिनकर में 19.02.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, February 17, 2026

पुस्तक समीक्षा | कहन के नए सलीकों की ग़ज़लें हैं “लम्हों की तपिश” में | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
कहन के नए सलीकों की ग़ज़लें हैं “लम्हों की तपिश” में
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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ग़ज़ल संग्रह- लम्हों की तपिश
कवि - अमन मुसाफ़िर
प्रकाशक - नीरज बुक सेन्टर 109-ए, पटपड़गंज गाँव, दिल्ली-110091
मूल्य - 250/-
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20 जुलाई 1999 को उत्तर प्रदेश की बरेली के बहरोली में जन्मे मात्र 27 वर्ष के अमन कुमार उर्फ़ अमन मुसाफ़िर की ग़ज़लों में जो गहराई और नयापन है वह उन्हें ग़ज़लकारों की आम पंक्ति से अलग खड़ा करता है।
अमन मुसाफ़िर ने बी. एससी. (ऑनर्स) भौतिकी (किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्व विद्यालय) से, एम.ए. हिन्दी (इग्नू), डिप्लोमा इन ट्रांसलेशन (अंग्रेजी-हिंदी), एकल विषय (संस्कृत) में द्विवर्षीय प्रमाणपत्र हासिल किया है। नेट-जेआरएफ (हिन्दी) उत्तीर्ण पीएचडी (हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय) से।
    उनका एक ग़ज़ल संग्रह 'हवा में आग' इसके पूर्व प्रकाशित हो चुका है। राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में अनेक शोध-पत्र प्रकाशित हुए हैं।
   अमन मुसाफ़िर अपनी अभिव्यक्ति को लेकर पूर्णतया आश्वस्त हैं। जब कोई शहर अपनी शायरी को लेकर स्वयं पर भरोसा करता है तो उसकी शायरी अधिक मुखर और संवादी साबित होती है।  “अपनी बात” में वे अपने  इस नए ग़ज़ल संग्रह की ग़ज़लों के बारे में लिखते हैं कि “शायरी जब महफ़िलों की वाहवाही से निकलकर सड़क के सन्नाटों और रसोइयों के धुएँ तक पहुँचती है तब वह सिर्फ़ 'शायरी' नहीं रहती, वह समय का 'दस्तावेज़' बन जाती है। 'हवा में आग' के बाद मेरे दूसरे ग़ज़ल-संग्रह 'लम्हों की तपिश' को पाठकों के हाथों में सौंपते हुए मुझे कुछ वैसी ही अनुभूति हो रही है जैसे कोई अपने 'जले हुए पलों' की राख और 'सुलगते हुए ख़्वाबों' की चिंगारी किसी अपने के हवाले कर रहा हो।
इस संग्रह का नाम 'लम्हों की तपिश' अनायास नहीं है। जीवन साल या महीनों में नहीं बल्कि उन गिने-चुने लम्हों में जिया जाता है जो हमारे ज़हन पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं। कभी वह छाप प्रेम के किसी बेहद नाजुक पल की 'गुनगुनी तपिश' होती है तो कभी व्यवस्था के ख़िलाफ़ उपजे आक्रोश की 'झुलसा देने वाली आँच'। यह किताब इन्हीं दोनों छोरों के बीच तनी हुई एक रस्सी है जिस पर एक शायर नंगे पाँव चल रहा है।”
     अर्थात शायर को फता है कि वह क्या लिख रहा है और क्यों लिख रहा है। अपनी अभिव्यक्ति को लेकर उसके मन में किसी तरह का भी संशय नहीं है।
     अमन मुसाफ़िर ने यह भी लिखा है कि “मैंने कोशिश की है कि मेरी ग़ज़लें झूठी तसल्लियों का झुनझुना न बनें। इसीलिए जहाँ एक ओर मैंने लिखा है कि "पत्थर को मत पूजो अब, पत्थर को औज़ार करो", वहीं दूसरी ओर मैंने उस मानवीय पीड़ा को भी जगह दी है जहाँ इंसान "भीड़ में चलकर भी तन्हा" रह जाता है। यह संग्रह उस आदमी की आवाज़ है जो प्रेम में टूटकर भी जुड़ना जानता है और जो सिस्टम से टूटकर भी लड़ना जानता है।”
      'लम्हों की तपिश' में कुल 110 ग़ज़लें हैं। इन ग़ज़लों में आमजीवन से उठाए गए बिम्ब हैं जो चौंकाते हैं गुदगुदाते हैं और मन के साथ-साथ विचारों को भी आंदोलित कर देते हैं। इसका उदाहरण संग्रह की पहली गजल में ही देखिए की किस खूबी से शायर पेड़, पौधे, फूल और पंछी की बात करते-करते दाल, चावल, साग रोटी तक जा पहुंचता है-
पेड़ पौधे फूल पंछी पत्तियों की बात कर
दाल चावल साग रोटी सब्ज़ियों की बात कर

आदमी की भूख ने बर्बाद कितने कर दिए
जंगलों को खा गयीं हैं कुर्सियों की बात कर

अब पुनः बरसात में बह जाएगी यह झोपड़ी
गर्मियाँ तो काट लेंगे सर्दियों की बात कर

धीरे-धीरे आग नफ़रत की जला देगी इन्हें
हस्तियाँ आधार इसका पीढ़ियों की बात कर
    अमन मुसाफ़िर अपनी ग़ज़लों में उस हुनर के साथ खेलते हैं जिसमें कहां जाता है कि एक ग़ज़ल का हर शेर अपने आप में मुक़म्मल होता है और दूसरा शेर बिल्कुल ही अलग मिजाज़ का हो सकता है। उदाहरण के लिए एक गजल के यह कुछ शेर देखिए-
जब सबने लगाया ही था आवास में बिस्तर
हिस्से में मेरे आया है फिर घास में बिस्तर

तकिया भी लिपट रो रहा दर्दों में हो शामिल
आकर ये सिमट बैठा मेरे पास में बिस्तर

बिस्तर को बताया कि वो आयेंगे दोबारा
शरमा रहा इस प्यार के एहसास में बिस्तर
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अमन मुसाफ़िर किसी एक बिंदु पर नहीं टिकते हैं। उनकी दृष्टि का संसार विस्तृत है। वे अंतर्मन से बाहिर्संसार तक निरंतर अवलोकन करते हैं और फिर ग़ज़ल कहते हैं। तीखी चोट करने वाली यह उनकी ग़ज़ल, इसके कुछ  शेर देखिए-
दिन में फ़सलें रात को भूख उगाता है
सब कहते वह भारत-भाग्य विधाता है

उसके चेहरे की ख़ामोशी है रोती जब मज़दूरी करके वापस आता है

'धनिया' दिन भर बैठी रहती है भूखी
'होरी' अपनों से ही धोखा खाता है
       नए छत के बिंबो को चुना और उन्हें अपनी गजलों में पिरोना अमन मुसाफिर के लिए मनु बहुत सहज कार्य है वह इतनी सहजता से नूतन बिंदुओं का प्रयोग करते हैं कि उन्हें पढ़कर यही लगता है कि इससे बढ़कर सटीक और कोई बम हो ही नहीं सकता था जैसे अपनी एक ग़ज़ल में उन्होंने “यादों का राशन” का बड़ी खूबसूरती से प्रयोग किया है। इसी गजल में “प्रमोशन” शब्द का भी बेहतरीन प्रयोग है -
मूर्छित एक ख़्वाब जीवन चाहता है
आपकी साँसों की धड़कन चाहता है

भूख से रोता हुआ मेरा हृदय ये
आपकी यादों का राशन चाहता है

तन को दफ़्तर में रखो मंजूर लेकिन
मन हमारा अब प्रमोशन चाहता है
    इस डिजिटल युग में सबसे बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है सोशल मीडिया में युवाओं का डूबे रहना। सोशल मीडिया में उलझे युवाओं के जीवन का दिलचस्प विश्लेषण किया है अमन मुसाफ़िर ने अपनी इस ग़ज़ल में-
वो गिन रहा कमेंट बचा ये ही काम है
डिजिटल सदी का एक यही तो पयाम है

प्रोफ़ाइलों में साथ दिलों में नहीं हैं साथ
एक दूसरे के प्यार का कोई न दाम है

स्क्रीन पर ही कटते हुए जाए जिंदगी
मिलती नहीं है फुर्सतें कैसी ये शाम है

मत खोज प्यार के ख़तों को रोज़-रोज़ तू
इनबॉक्स में जो आ गया वो ही इनाम है
      सच का साथ देना शायर को ज़रूरी लगता है। बल्कि वे पूरी निडरता के साथ अपनी अभिव्यक्ति के पक्ष में खड़े होते हैं, ठीक शायर अदम गोंडवी की तरह -
बात कड़वी है मगर स्वीकार है
ये ग़ज़ल मेरी नया हथियार है

सिर्फ लफ़्ज़ों का नहीं यह खेल अब
शेर में देखो 'अदम' की धार है।

देश को मिल कर यहाँ सब लूटते
चोर ही अब देश की सरकार है।

झूठ को ही सच बताता है सदा
बिक चुका पूरा यहाँ अखबार है।

आदमी की अब नहीं क़ीमत बची
हर तरफ़ बस झूठ का व्यापार है।
     दरअसल, कहन के नए सलीकों की ग़ज़लें हैं “लम्हों की तपिश” में। इस संग्रह की ग़ज़लें युवा शायर अमन मुसाफ़िर को साहित्य की दुनिया में विशेष स्थान दिलाने की पूरी संभावना व्यक्त करती हैं। संग्रह की ग़ज़लें अक्षरशः पठनीय हैं तथा चिंतन मनन के योग्य हैं।
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Sunday, February 15, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | राजा हिमांचल के दमाद भोले दूला बने | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
राजा हिमांचल के दमाद भोले दूला बने
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
    लेओ आ गई शिवरातें। अपने बुंदेलखंड में शिवरातों को ऐसी धूम मचत आए, ऐसी धूम मचत आए के ने पूछो। सगरे शिव मंदरन में संकारे से भीर लगन लगत आए।  भीर काए ने परे अखीर शिवरातें में शिव औ पारबती को ब्याओ होत आए। शिव मने सबको भलो करबे वारे औ पारबती माता सो ऊंसईं ठैरीं ई जगत की जननी मने मताई। सो,  ई जगत की भलाई लाने जो ई जगत के पालनहार औ जगत की मताई को को ब्याओ होए तो खुसी तो मनाई जाहे। मनो जे सोचबे की बात आए के अपनी संस्कृति में शिव घांईं देवता सादगी के उदारण आएं। बे हिमांचल राजा के दमाद इएं मनो बे कोनऊं मैंगो कपड़ा नईं पैंनत, बे तो एक ठइयां बघम्मर लपेटे रैत आएं। गले मे सोना-चांदी की माला की जांगा एक ठइयां नागदेव पैने रैत आएं। मोटर-कार की जांगा बैलवा पे चढ़ के चलत आएं। मनो छवि ऐसी नोंनी के उने पाने के लाने पारबती जू ने तप करी। ऐसे देव  देवी को ब्याओ होए  मानुस ब्याओ को गानों ने गाऐं ऐसो कैसे हो सकत? अपने बुंदेलखंड में मुतके लोकगीत आएं जीमें शिव  पारबती के ब्याओ को सजीब वर्नन आए। जैसे एक गीत आए- “बन्ना जे देखे पेलऊ पेल, बैल पे झूमत आवे जू,
शंकर महादेव को ब्याव, भूतन की बारात आवे जू।”
     एक औ गीत आए जीमें गौरा जी को शिव जी के  ब्याहबे आबे की बात करी गई आए-
"हरे बांस मंडप छाए, गौरा जी को शिव जी बिहाने आए,
सेहरा में सांप विराजे, मुख पे भसम रमाए,
गौरा जी को शिव जी बिहाने आए..."
     औ जोन ने भोला की बरात देख लई ऊको इठलाबो देखतई बनत आए,-
"में तो देख आई, हे में तो देख आई,
लगन भोले की बारात, में तो देख आई,
अजब बारात है, अजब दूल्हा है..."
सो जे आए अपने इते की शिवरातों के मजे। सो, सबई जने हिलमिल के मंदर जइओ, शिव-पारबती के ब्याओ में शामिल हुइयो औ सबई के कल्यान की सोचियो।
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______________________😊
Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Thursday, February 12, 2026

बतकाव बिन्ना की | काय, आज कौन सो डे आए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की | काय, आज कौन सो डे आए | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की  
काय, आज कौन सो डे आए?
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

‘‘काए आज कौन सो दिन आए?’’ भैया जी ने भौजी से पूछी।
‘‘आज? आज बृहस्तपत वार आए, मनो गुरुवार। काए, जा काए पूछ रए?’’ भौजी ने पूछी।
‘‘औ कौन सो दिन आए?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘आज 12 तारीख आए।’’ भौजी फेर के बोलीं।
‘‘अरे, हम तारीख नईं पूछ रए, हम दिन पूछ रए के आज कौन सो दिन आए, मने कौन सो डे आए?’’भैयाजी बोले।
‘‘आज दसमीं तिथि आए। काए काल कछू की पूजा कराने है का?’’ भौजी ने फेर के पूछी।
‘‘हमने तुमसे तिथि नोंई पूछी। हम तुमसे जा पूछ रए के आज कोन सो डे आए?’’ भैयाजी ने कई।
‘‘हऔ, तुम तो ऐसे कै रए जैसे हमें डे को मतलब नईं पतो। डे मने दिन औ दिन मने तिथि। हमने आपके लाने पूरो तो बता दओ के आज गुरुवार, दसमीं तिथि आए औ कलेंडर के हिसाब से 12 तारीख आए। को जाने औ का पूछ रए हो आप?’’ भौजी झुंझलात भई बोलीं।
जा सब देख के मोए हंसी आन लगी। काए से के मोए समझ में आ गई हती के भैयाजी भौजी से का पूछबो चा रए। मैंने देखी की इते भौजी झुंझलान लगी हतीं औ उते भैयाजी बोर फील करन लगे हते सो मैंने दोई की मदद करबे की सोची।
‘‘भौजी, भैयाजी तिथि नोंई पूछ रए।’’ मैंने कई।
‘‘सो, जे का पूछ रए? हमें तो कछू समझ ने आ रई।’’ भौजी बोलीं।
‘‘जे बैलेंटाईन वारे डे के बारे में पूछ रए। के आज कोन सो डे आए?’’मैंने भौजी खों समझाई।
‘‘हैं? जे इनको का सूझ रई? अपन खों का लेने बैलेंटाईन से? औ वा बी ई उम्मर में?’’ भौजी कछू चकित भईं फेर झेंपत सी बोलीं।
‘‘सो ऊमें का भौजी? आप ओरें काए नईं मना सकत बैलेंटाईन? ऊमें का खराबी आए?’’ मैंने सोई जान के भौजी से पूछी।
‘‘नईं, मने खराबी तो कछू नईं। मनों कछू बी अच्छे से मनाओ जाए तो अच्छो है, लेकन जो आजकल मोड़ा-मोड़ी बैलेंटाईन के नांव पे अत्ते करन लगत आएं बा गलत आए।’’ भौजी ने बड़े पते की बात करी।
‘‘सई कई भौजी। कोनऊं को गुलाब को फूल भेंट करबे में कोनऊं खराबी नोंई, गर जो आपके मन में मैल ने होए।’’ मैंने भौजी को समर्थन करो।
‘‘तो का आज गुलाब मने रोज़ डे आए का?’’ भौजी ने पूछी औ भैयाजी के हातन की तरफी देखन लगीं के बे कऊं गुलाब ले के तो नईं आए?
‘‘हमाओ गुलाब कां आए?’’ भैयाजी के हातन में गुलाब को फूल ने देख के भौजी ने उनसे पूछी।
‘‘आज गुलाब डे नोंईं। बा तो 7 फरवरी को हतो, जब हमने तुमाई चुटिया में गुलाब खोंसो रओ।’’ भैयाजी शरमात भए बोले।
‘‘अरे, सो ऊ दिनां काए नईं बताओ हमें? खैर, सो आज का आए?’’ भौजी ने पूछी।
‘‘आज तो हग डे आए।’’ भैयाजी चुटकी सी लेत भए बोले।
‘‘का कई?’’ भौजी ने फेर के पूछी।
‘‘हमने कई आज हग डे आए, मने गले लगबे को दिन।’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
‘‘कछू तो शरम खाओ। बिन्ना के आंगू हमसे ऐसो बोल रए।’’ भौजी झेंपत भईं बोलीं।
‘‘अरे, सो हम कछू गलत थोड़ेई कै रए। गले तो ईद, दिवारी पे बी मिलो जात आए। अबईं तुमई कै रई हतीं के जो मन में कछू गलत बात ने होए तो कछू में कछू दोस नईं आए। औ अब तुमईं मों बना रईं। मने तुमाए मन में कछू गलत वारे खयाल आए।’’ भैयाजी ने भौजी खों चुटकी लई।
‘‘हऔ, हमें पतो, हम तो ऊंसई कै रए हते।’’ भौजी अपनी बात सम्हारत भईं बोलीं।
‘‘तुमें तो याद बी ने हुइए के कोन सो दिन का कहाउत आए?’’ भैयाजी बोले।
‘‘काए नईं याद, हमें सोमवार से ले के इतवार तक सबई दिन याद आएं। कौ तो सुनाएं, सोम, मंगल, बुध....।’’ भौजी गिनान लगीं के भैयाजी ने टोंको।
‘‘बस-बस, जे वारे दिन नईं पूछ रए। हम तो बैलेंटाइन वारे दिन पूछ रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हमें का पतो? औ काए याद राखें, कोन सी हमें बा दिन कोनऊं पूजा करने, के उपवास राखने?’’ भौजी बोलीं।
‘‘बात तो तुमाई सही आए मनो, पतो तो होने चाइए के रोज डे से बैलेंटाइन शुरू होत आए। फेर प्रपोज डे, चाॅकलेट डे, टेडी डे, प्रामिस डे, हग डे, किस डे औ अखीर में होत आए बैलेंटाइन डे।’’ भैया जी ने भौजी खों बताई।
‘‘अरे, अरे, जेई तो सल्ल आए के किस डे पे सबरे खुल्लम खुल्ला... जेई से तो जा सब हमें नईं पुसात।’’ भौजी मों बनात भईं बोलीं।
‘‘हऔ, अकेले में करो चाइए।’’ भैयाजी हंसत भए बोले।
‘‘सो जो कैसो त्योहर कहाओ जोन को अकेले में मनाओ जाए? ईंसे तो अपने त्योहार नोंने के अबईं शिवरातें पे सबईं मंदिर जाहें उते शिव औ पार्वती जू के ब्याओ में सामिल हूंहे।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ भौजी, आप सई कै रईं। अपने इते के त्योहर ई टाईप के बनाए गए आएं जोन खों सब मिल के धूम-धाम से मना सकत आएं। ने कोऊ खों लट्ठ घुमाबे की जरूरत औ ने कोनऊं गलत हरकत। सब कछू अच्छो-अच्छो सो रैत आए। मैंने तो सोई ई बेर बड़े शिवजी लौं जाबे की सोस रईं।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ तो अपन ओरें संगे चलबी। हम ओरें बी जेई बहाने दरसन कर आबी।’’ भौजी बोलीें।
‘‘जे ठीक रैहे। हम सोई सोस रए हते के ई बेर कऊं दरसन के लाने जाओ चाइए। बरमान में तो बड़ी भीर परहे। सो इतई ठीक रैहे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘चलो तो जा पक्की रई। अपन ओरें बड़े शिवजी लौं चलहें। बाकी भैयाजी अब मोए जाबे की परमीसन देओ ताके आप अपनो हग डे कंटीन्यू कर सको।’’ मैंने भैयाजी खों टोंट मारी।
‘‘अरे, राम को नांव लेओ! हमें का करने हग डे को? तुमाई भौजी तो बरहमेस की हमाई आएं। इनें का एकई दिनां गले लगा के अफर जाहें का?’’ भैयाजी सोई हंसत भए बोले।
‘‘आप सोई कछू बी बके जा रए। कोनऊं हग-फग नईं होने। आप चलो औ अपनों काम करो।’’ भौजी झेंपत भईं भैयाजी खों झिड़कन लगीं।
‘‘सई में, मोए अब इते से चलो जाओ चाइए।’’ कैत भई मैं उठ खड़ी भई।
‘‘अरे, तुमें कऊं नईं जाने। हम नईं मानत जे सब। तुम तो इतई बैठो।’’ भौजी ने मोरो हात पकर के मोए बिठा लओ।
‘‘हम सोई कां मानत आएं, हम तो तुमाई भौजी सेे ऊंसई ठिठोली कर रए हते। ने तो हमें तो ई नांव से कछू औ सूझन लगत आए।’’ भैयाजी ठठा के हंसन लगे।
‘‘छी! आप औ!’’ भौजी मों दाब के हंसन लगीं।
रामधई! कछू बी कई जाए मनो अपने देस के त्योहार सई में त्येाहार घांई लगत आएं। जीमें खीब मजो आत आए। सबरे त्योहारन को कोऊ ने कोऊ मोसम औ प्रकृति से कछू ने कछू ताल्लुक रैत आए। अपने जे सबरे त्योहार बी तो आपस में हिल मिल के रैबो सिखात आएं। मोए तो सोई अपने त्योहार ज्यादई अच्छे लगत आएं। बाकी जोन खों जोन पुसाए, मोए का।
मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। जे सोचियों जरूर के अपने त्योहार दुनिया में सबसे नोंने आएं के नईं? 
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, February 11, 2026

चर्चा प्लस | पुण्यतिथि पर विशेष | पं. दीनदयाल उपाध्याय की चुनावी रणनीति का पहला उसूल था - “वोट फार पर्सन, नाट फार द पर्स” | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
पुण्यतिथि पर विशेष 

पं. दीनदयाल उपाध्याय की चुनावी रणनीति का पहला उसूल था - “वोट फार पर्सन, नाट फार द पर्स”

- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पं. दीनदयाल उपाध्याय जनसंघ में एक ऐसे व्यक्ति थे जिन पर संघ अगाध विश्वास करता था। पं. दीनदयाल ने भी अपना सर्वस्व संघ के विचारों के पोषण एवं विस्तार के लिए अर्पित कर दिया था। उनकी संदेहास्पद परिस्थितियों में हुई मृत्यु पर अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में कहा था-‘‘ वे संसद के सदस्य नहीं थे लेकिन भारतीय जनसंघ के जितने सदस्य इस सदन में और दूसरे सदन में बैठे हैं उनकी विजय का, जनसंघ को बनाने का, बढ़ाने का यदि किसी एक व्यक्ति को श्रेय जाता है तो वह श्री उपाध्याय जी को है। देखने में सीधे-सादे लेकिन मौलिक विचारक, कुशल संगठनकर्ता, दूरदर्शी नेता, सबको साथ ले कर चलने का जो गुण उन्होंने अपने जीवन में प्रकट किया, वह नई पीढ़ी के लिए मार्गदर्शन का कार्य करेगा।’’ 
     वह समय था जब एक ओर डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की असामयिक संदेहास्पद मृत्यु और दूसरी ओर जनसंघ में अंतरकलह - ये दोनों कारण दीनदयाल जी को चिन्ता में डालने लगे थे। जनसंघ के अध्यक्ष पं. मौलिचन्द्र शर्मा से कार्यकर्ता रुष्ट होने लगे थे। जनसंघ के केन्द्रीय अधिकारी एकनाथ राणाडे के कारण भी संघ में असंतोष बढ़ने लगा था। इनके अतिरिक्त विभिन्न रजवाड़ों को जनसंघ से जोड़ने वाले वसंतराव ओक भी इस अंतरकलह के शिकार हुए और उन्हें जनसंघ छोड़ना पड़ा। 
एक समय ऐसा आया कि लगने लगा जैसे जनसंघ पूरी तरह टूट कर बिखर जाएगा। कलह से भ्रमित कार्यकर्ताओं ने भी संघ को छोड़ना शुरू कर दिया था। ऐसा लग रहा था कि राष्ट्रीय राजनैतिक दल का दर्जा पा लेने वाला जनसंघ जैसे नेतृत्वविहीन हो गया हो। ऐसी विकट परिस्थिति में डाॅ. रघुवीर ने जनसंघ की अध्यक्षता सम्हाल ली। दुर्भाग्यवश सन् 1962 में एक दुर्घटना में उनका निधन हो गया। इसके साथ ही एक बार फिर जनसंघ में नेतृत्व का संकट गहरा गया। लेकिन दीनदयाल जी किसी भी परिस्थिति में जनसंघ का पराभव नहीं देख सकते थे। उन्होंने डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की आशाओं के अनुरूप संगठनकर्ता के रूप में सक्रिय राजनीति में भाग लेना तय किया। संघ के अन्य पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता भी उनके इस निर्णय से उत्साहित हो उठे। जनसंघ में मानों पुनः आशा की लहर दौड़ गई। किन्तु जनसंघ अंतर्कलह से पूरी तरह उबरा नहीं था, जिसका परिणाम शीघ्र ही सामने आया।

जौनपुर उपचुनाव  

दीनदयालजी जनसंघ की राजनीतिक प्रतिष्ठा को बचाने के लिए कृतसंकल्प थे किन्तु वे स्वयं एक राजनेता के रूप में चुनाव लड़ कर पद प्राप्त नहीं करना चाहते थे। सन् 1963 में लोकसभा के उपचुनाव हुए। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघ चालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ने दीनदयाल जी से आग्रह किया कि वे जौनपुर से चुनाव लड़ें। दीनदयाल जी चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे किन्तु वे गुरूजी अर्थात् माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर का आग्रह भी टाल नहीं सकते थे। 
भाऊराव देवरस ने दीनदयाल जी से संबंधित अपने एक संस्मरण में लिखा है कि ‘‘हमारे तीस वर्ष के सहचर्य में उनके मन के विरुद्ध मैंने केवल एक ही बात की और वह थी उन्हें जौनपुर से लोकसभा के लिए चुनाव लड़ने को विवश करना।  सन्  1962 के लोकसभा चुनाव में वाजपेयी के हारने के कारण जनसंघ की दृष्टि से लोकसभा में एक प्रकार की रिक्तता उत्पन्न हो गई थी। उसे भरने के लिए सबकी सम्मति थी कि पण्डित जी चुनाव लड़ें। लेकिन पण्डित जी इसके लिए अपनी सहमति नहीं दे रहे थे। उनका कहना था कि मैं स्वयंसेवक और प्रचारक हूं। चुनाव लड़ना मेरे लिए उचित नहीं होगा। प्रचारक भी चुनाव लड़ते हैं, ऐसी गलत परिपाटी इससे पड़ जाएगी और भविष्य में संगठन पर इसका विपरीत असर पड़ेगा। हम सभी सहयोगियों ने एक मत से उन्हें चुनाव लड़ने के लिए कहा, तब कहीं वे माने।’’
अंततः दीनदयाल जी ने जौनपुर से नामांकन भर दिया और चुनाव की तैयारी करने लगे।  यद्यपि एक दिन उन्होंने अवसर पा कर अपने मन की बात गुरूजी से कह डाली थी कि ‘‘आपने मुझे किस झमेले में डाल दिया। मुझे प्रचारक का काम ही करने दें।’’
इस पर गोलवलकर गुरूजी ने उन्हें समझाया था कि ‘‘तुम्हारे अतिरिक्त इस झमेले में किसको डालें। संगठन के कार्य पर जिसके मन में इतनी अविचल श्रद्धा और निष्ठा है वही उस झमेले में रह कर कीचड़ में भी कीचड़ से अस्पृश्य रहता हुआ सुचारु रूप से वहां की सफाई कर सकेगा।’’
जौनपुर में जनसंघ के कार्यकर्ता जातिवादी समीकरण का सहारा लेना चाहते थे। जाधवराव देशमुख के अनुसार कार्यकर्ताओं ने दीनदयाल जी से निवेदन किया कि ‘‘कांग्रेस ठाकुरवाद चला रही है तो हम ब्राह्मणवाद चला दें। इसमें क्या हानि है? चुनाव-युद्ध में सभी कुछ क्षम्य होता है न!’’
यह सुन कर दीनदयाल जी क्रोधित हो उठे। वे कार्यकर्त्ताओं को डांटते हुए बोले-‘‘सिद्धांत की बलि चढ़ा कर जातिवाद के सहारे मिलने वाली विजय, सच पूछो तो, पराजय से भी बुरी है।’’
उनकी यह बात सुन कर वहां सन्नाटा छा गया। इस पर दीनदयाल जी ने संयत होते हुए शांत स्वर में समझाया -‘‘भाईयों! राजनीतिक दल के जीवन में एक उपचुनाव कोई विशेष महत्व नहीं रखता, किन्तु एक चुनाव में जीतने के लिए हमने यदि जातिवाद का सहारा लिया तो वह भूत सदा के लिए हम पर सवार हो जाएगा और फिर कांग्रेस और जनसंघ में कोई अंतर नहीं रहेगा।’’
दीनदयाल जी का कहना था कि राजनीति में विचारधारा, सिद्धांत, नीति और कार्यक्रमों में सुन्दर ताल-मेल चाहिए, टकराव या विरोधाभास नहीं। वे कार्यकर्ताओं के ही नहीं, अपितु जन-सामान्य के राजनीतिक प्रशिक्षण पर भी बल देते थे। वे मतपत्र को कागज का टुकड़ा न मानकर अपना अधिकार-पत्र मानने को कहते थे। इस संबंध में उनका सिद्धांत स्पष्ट था जिसे वे तीन बिन्दुओं के रूप में कार्यकर्त्ताओं एवं आमजन के समक्ष रखते थे -
1. वोट फार पर्सन, नाट फार द पर्स 
2. वोट फार पार्टी, नाट फार पर्सन 
3. वोट फार आइडियोलोजी, नाट फार पार्टी
जब चुनाव का परिणाम घोषित हुआ तो स्पष्ट हो गया कि जनसंघ में अंतर्कलह समाप्त नहीं हुआ था। जौनपुर में संघ के कुछ कार्यकर्ता ऐसे थे जो दीनदयाल जी की ‘आइडियोलोजी’ के समर्थन में नहीं थे और आरम्भ से ही चाहते थे कि दीनदयाल जी वहां से चुनाव न लड़ें। उन कार्यकर्ताओं ने दीनदयाल जी के चुनाव अभियान को सहयोग देने के बदले उनका विरोध किया था। इसका मतदाताओं के मन पर बुरा असर पड़ा और दीनदयाल जी चुनाव हार गए। किन्तु उनकी संघ के प्रति तत्परता एवं निष्ठा का देश के अन्य कार्यकर्ताओं पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। स्वयं दीनदयाल जी को इस बात का संतोष था कि भले ही वे उपचुनाव हार गए किन्तु उन्होंने अपने और संघ के सिद्धांतों को जातिवादी समीकरण की भेंट नहीं चढ़ाया। 
चुनाव में पराजय के बाद दीनदयाल जी के व्यवहार के बारे में भाऊराव देवरस ने अपने एक संस्मरण में लिखा कि ‘‘चुनाव में हारने के दूसरे दिन ही वे (दीनदयाल जी) काशी के संघ वर्ग में पहुंच गए। वहां उनका आचरण देख कर हम सभी लोग आश्चर्य पड़ गए कि इतने बड़े चुनाव में हारने वाले क्या ये ही दीनदयाल जी हैं? उनका अत्यंत सहज और शांत आचरण देख कर मैं स्वयं दंग रह गया था।’’
     चुनाव में पराजित होने के बाद पत्रकारवार्ता में एक सम्वाददाता ने उनसे प्रश्न किया कि ‘‘देश में जब कांग्रेसविरोधी वातावरण है तो आप चुनाव कैसे हार गए?’’ इस पर दीनदयाल जी ने विनम्रतापूर्वक बिना किसी संकोच के कहा कि ‘‘स्पष्ट बताऊं, मेरे विरुद्ध खड़ा कांग्रेस का प्रत्याशी एक सच्चा कार्यकर्ता है। उसने अपने क्षेत्र में पर्याप्त काम किया है, इसीलिए लोगों ने उसे अधिक मत दिए।’’
       गोलवलकर गुरूजी ने एक बार दीनदयाल जी के संबंध में कहा था ‘‘बिलकुल नींव के पत्थर से प्रारम्भ कर जनसंघ के कार्य को इतना नाम और इतना रूप देने का श्रेय यदि किसी एक व्यक्ति को देना हो तो वह दीनदयाल जी को ही देना होगा।’’
 
जनसंघ के अध्यक्ष घोषित

सरसंघ चालक गोलवलकर गुरूजी को दीनदयाल जी की क्षमता पर पूरा भरोसा था, इसीलिए दल की ओर से उन्हें सबसे बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई। सन् 1967 में जनसंघ का चौदहवां अधिवेशन कालीकट में हुआ। दल के सभी पदाधिकारियों ने एकमत से निर्णय लेते हुए दीनदयाल जी को जनसंघ का अध्यक्ष घोषित किया।
दीनदयाल जी के जनसंघ के अध्यक्ष बनने से भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हुआ। जिस जनसंघ को डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक सुदृढ़ राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में देखना चाहते थे वह जनसंघ अब वास्तव में सुदृढ़ता प्राप्त करने वाला था। दीनदयाल जी के संगठनात्मक कौशल का लाभ जनसंघ को मिलने वाला था। दीनदयाल जी के द्वारा जनसंघ का अध्यक्ष पद स्वीकार करने से भारतीय राजनीति में पड़ने वाले प्रभाव पर शिकागो विश्वविद्यालय के लिए ‘‘जनसंघ आइडियोलाॅजी एण्ड ऑरगेनाइजेशन इन पार्टी बिहेवियर’’ विषय पर किए गए अपने शोध में वाल्टर कोरफिट्ज़ एण्डरसन ने लिखा है कि ‘‘पण्डित दीनदयाल जी के सन् 1967 में जनसंघ का अध्यक्ष पद स्वीकार करने का यही अर्थ था कि दल की संगठनात्मक नींव डालने का काम पूरा हो गया है और राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रबल प्रतिस्पर्धी के नाते सत्ता की प्रतियोगिता में उतरने का उसका संकल्प है।’’
यही तथ्य वाल्टर कोरफिट्ज़ एण्डरसन एवं श्रीधर डी. दामले की पुस्तक ‘‘द ब्रदरहुड इन सेफराॅन: द राष्ट्रीय सेवक संघ एण्ड हिन्दू रीवाइवलिज़्म’’ (वेस्ट व्यू प्रेस, आई एस बी एन: 0-8133-7358-1) में सन् 1987 के संस्करण में प्रकाश में आया।
जनसंघ का अध्यक्ष बनने के बाद दीनदयाल उपाध्याय का ध्यान इस ओर गया कि जनसंघ की छवि एक हिन्दू सम्प्रदायवादी संस्था के रूप में मानी जा रही है। वे अपने दल को किसी सम्प्रदायवादी शक्ति नहीं वरन् देशभक्ति की शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहते थे। चुनावी रणनीति में भी उन्होंने स्वच्छ संकल्पना की और उसी पर अमल किया। उनके चुनावी आदर्श आज पथप्रदर्शक साबित हो सकते हैं और राजनीतिक स्वच्छता स्थापित कर सकते हैं, यदि कोई आदर्शों को आत्मसात करने का साहस करे।
(राष्ट्रवादी व्यक्तित्व श्रृंखला के अंतर्गत सामायिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित मेरी जीवनी-पुस्तक ‘‘दीनदयाल उपाध्याय’’ पर आधारित।)                
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(दैनिक, सागर दिनकर में 11.02.2026 को प्रकाशित)  
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Tuesday, February 10, 2026

पुस्तक समीक्षा | व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी जन-स्मृतियां रचता है | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा | व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी जन-स्मृतियां रचता है | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरणपुस्तक समीक्षा

व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी जन-स्मृतियां रचता है

- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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स्मारिका  - महेन्द्र फुसकेले स्मरण अंक
संपादक   - मुकेश तिवारी
प्रकाशक  - प्रगतिशील लेखक संघ सागर इकाई
मूल्य - उल्लेख नहीं।
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यदि स्व. महेंद्र फुसकेले जी के व्यक्तित्व की व्याख्या की जाए तो भगवद्गीता (12.13-14) का यह श्लोक सटीक बैठता है कि-
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च,
निर्ममो निरहंकारः समदुखसुखः क्षमी।। 
- अर्थात जो सभी प्राणियों से द्वेष नहीं करता, दयालु है, अहंकार रहित है और सुख-दुख में समान रहता है, वही वास्तव में सुसंस्कृत है। महेंद्र फुसकेले जी में सकल मानवता के प्रति दया, ममता, करुणा, धैर्य आदि सभी गुण थे। इस पर भी सबसे बड़ा गुण उनमें था सत्य की पक्षधरता का। प्रोफेशन से वे अधिवक्ता थे। श्रमिकों के प्रबल समर्थक थे तथा स्त्रियों के अधिकार एवं स्वतंत्रता के मुखर हिमायती थे। ऐसे ही व्यक्तित्व पर केन्द्रित स्मारिका का कोई औचित्य होता है।
महेंद्र फुसकेले जी के निधन (1फरवरी 2021) के उपरांत से प्रगतिशील लेखक संघ के सौजन्य से प्रतिवर्ष एक स्मारिका का प्रकाशन किया जा रहा है। महेन्द्र फुसकेले जी का व्यक्तित्व बहुमुखी प्रतिभा का धनी रहा। उन्होंने उपन्यास के माध्यम से स्त्री जीवन को जितनी सूक्ष्मता से सामने रखा, उतनी ही बारीकी से कविताओं के द्वारा स्त्री की दशा को अभिव्यक्ति दी। ‘‘आचरण’’ के इसी काॅलम के अंतर्गत स्व. डाॅ. वर्षा सिंह ने लिखा था कि ‘‘हर दौर में मानवीय सरोकारों में स्त्री की पीड़ा प्रत्येक साहित्यकार संवेदनशीलता एवं सृजन का केन्द्र रही है। सन् 1934 को जन्मे, सकल मानवता के प्रति चिंतनशील साहित्यकार एवं उपन्यासकार महेन्द्र फुसकेले ने जब कविताओं का सृजन किया तो उन कविताओं में अपनी संपूर्णता के साथ स्त्री की उपस्थिति स्वाभाविक थी। ‘तेंदू के पत्ता में देवता’, ‘मैं तो ऊंसई अतर में भींजी’, ‘कच्ची ईंट बाबुल देरी न दइओ’ नामक अपने उपन्यासों में स्त्री पक्ष को जिस गम्भीरता से प्रस्तुत किया है, वही गम्भीरता उनकी कविताओं में भी दृष्टिगत होती है। कविता संग्रह ‘स्त्री तेरे हजार नाम ठहरे’ उनके काव्यात्मक स्त्री विमर्श का एक महत्वपूर्ण पक्ष उजागर करता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो उपन्यासकार फुसकेले स्त्री की पीड़ा, संघर्ष और महत्ता को भावात्मक रूप से व्यक्त करने के लिए कविता का मार्ग चुनते हैं। .... महेन्द्र फुसकेले की कविताओं में स्त्री पर विमर्श नारा बन कर नहीं अपितु सहज प्रवाह बन कर बहता है। उनकी कविताओं में स्त्री चिंतन बहुत ही व्यावहारिक और सुंदर ढ़ंग से प्रकट हुआ है।’’
इस वर्ष की स्मारिका और अधिक विशिष्ट है क्योंकि इसमें महेंद्र फुसकेले जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के साथ ही वरिष्ठ साहित्यकार नामवर सिंह और श्री लाल शुक्ल की जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में उनका भी स्मरण किया गया है तथा प्रेमचंद एवं कबीर के साहित्य पर भी लेख सहेजे गए हैं। कबीर वे कवि थे जिनके सामाजिक सरोकार अत्यंत विस्तृत थे। उनकी साखियां आज भी बेजोड़ हैं। साथ ही, उनकी ललकार की क्षमता का आज भी कोई सानी नहीं है। जहां तक प्रेमचंद का प्रश्न है तो वे हिन्दी साहित्य के वे बिन्दु थे जहां से हिन्दी कथा साहित्य ने सच्चे अर्थ में आधुनिक कथानक में प्रवेश किया तथा उस तबके से नाता जोड़ा जिसकी ओर साहित्यकारों की कलम का ध्यान कम ही जाता था।
श्रीलाल शुक्ल की पहचान उनकी स्पष्टवादिता से रही। उन्हें कालजयी बनाया उनकी रचना ‘‘राग दरबारी’’ ने। ‘‘राग दरबारी’’ हिंदी साहित्य की एक अत्यंत प्रसिद्ध व्यंग्यात्मक रचना है, जिसे श्रीलाल शुक्ल ने 1968 में लिखा था। यह उपन्यास भारत के ग्रामीण और अर्द्धदृशहरी जीवन की राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक गिरावट का आईना है। इसकी भाषा सहज, प्रवाहमयी और तीखे व्यंग्य से परिपूर्ण है। वहीं, नामवर सिंह हिंदी साहित्यिक आलोचना के प्रकाश स्तंभ माने जाते हैं। वह प्रगतिवादी आलोचक होने के साथ-साथ नए आलोचकों में भी अपना अग्रणी स्थान रखते हैं। उन्होंने आधुनिक हिंदी साहित्य में आलोचना, संपादन, शोध, व्याख्यान और अनुवाद के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसी कारण उन्हें हिंदी साहित्य में आलोचना के ‘रचना पुरुष’ के नाम से भी जाना जाता है। हिंदी साहित्य और आलोचना को समृद्ध करने वाले नामवर सिंह को उनकी पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ के लिए वर्ष 1971 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था।
चाहे कबीर या प्रेमचंद हों, नामवर सिंह या श्रीलाल शुक्ल हों या फिर महेंद्र फुसकेले जी हों, इनका स्मरण इनके गम और कृतित्व के आधार पर ही किया जाता है, वस्तुतः व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी स्मृतियां रचता है तथा उसे कालजयी बनता है। जब व्यक्ति निज की चिंता को हाशिए पर रखकर सकल मानवता तथा विशेष रूप से उन लोगों के बारे में मनन चिंतन करता है जिन्हें समाज ने ही गौण बना दिया है तथा उनकी सदा उपेक्षा की है, तब चिंतन करने वाला व्यक्ति का व्यक्तित्व स्वतः विस्तार लेने लगता है। प्रगतिशील लेखक संघ सागर इकाई की इस स्मारिका में प्रस्तुत गद्य एवं पद्य सामग्री को पढ़कर इस तथ्य का प्रमाण हासिल किया जा सकता है। स्मारिका में महेंद्र फुसकेले जी पर पंद्रह लेख हैं- एडवोकेट के.के. सिलाकारी ने फुसकेले जीक्ष के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है “सागर के महान व्यक्तित्व श्री महेन्द्र फुसकेले”, गांधीवादी चिंतक रघु ठाकुर का लेख है  “मार्क्सवाद के प्रति सारा जीवन प्रतिबद्ध रहे कामरेड”, एडवोकेट अरविंद श्रीवास्तव ने लिखा है “कामरेड फुसकेले राजनैतिक घटनाक्रम से”। इनके साथ ही एडवोकेट ओमप्रकाश श्रीवास्तव ने “श्रद्धांजलि: एक कम्युनिस्ट योद्धा”, वीरेंद्र प्रधान ने “नव लेखकों के प्रेरणास्रोत महेंद्र फुसकेले”, डॉ. मनोज श्रीवास्तव ने “स्मृतियां जो धरोहर हैं”, प्रो. एन.के. जैन ने “संघर्षशील व्यक्तित्व के धनी-फुसकेले जी”, एडवोकेट राजेश पाण्डेय ने “सत्यता के प्रतीक श्री महेंद्र फुसकेले जी” संजय गुप्ता ने “यादगार पल”, डॉ. बहादुर सिंह परमार ने “फुसकेले जी थे सर्वहारा वर्ग के मसीहा”, शैलेंद्र शैली ने “हमारे आदर्श और प्रेरक कॉमरेड”, डॉ राजेंद्र पटोरिया ने “सिद्धान्तवादी श्री महेन्द्र फुसकेले जी”, कामरेड चंद्रकुमार ने “स्मृति दिवस”, देवेंद्र सिंघई ने “बहुमुखी प्रतिभा संपन्न श्री फुसकेले जी” तथा अजित कुमार जैन ने “कॉमरेड महेन्द्र कुमार फुसकेले” अपने लेख के रूप में महेंद्र फुसकेले जी का स्मरण किया है।
नामवर सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण करते हुए जो लेख स्मारिका में प्रकाशित किए गए हैं वे हैं - “नामवरसिंह: एक साथी, एक आलोचक”(नमृता फुसकेले), “नामवर जी को मैंने देखा है” (टीकाराम त्रिपाठी)। श्रीलाल शुक्ल जी पर केन्द्रित लेख है डॉ. नमृता फुसकेले का “श्रीलाल शुक्ल जन्म शताब्दी स्मरण”।
कबीर पर लेख हैं - “मोकूँ रोए सोई जन, जो सबद विवेकी होए” (कैलाश तिवारी ‘विकल’), “कबीर के कथित स्त्री-विरोधी दोहों का सच” (डॉ सुश्री शरद सिंह), “कबीर और वर्तमान में उनकी बढ़ती प्रासंगिकता” (सतीशचंद्र पाण्डे), “क्रान्तिकारी कवि कबीर” (टीकाराम त्रिपाठी), “कबीर का दर्शन” (पेट्रिस फुसकेले)  तथा “कबीर और किसान” (कैलाश तिवारी ‘विकल’) तथा  कबीर: एक दृष्टि निक्षेप (पी.आर. मलैया)।
प्रेमचंद पर लेख इस प्रकार हैं- “प्रेमचंद की दृष्टि में प्रेम वाया - प्रेम की वेदी’’ (डॉ सुश्री शरद सिंह), “प्रेमचंद के साहित्य में मानव प्रेम एवं राष्ट्रधर्म” (डॉ. महेंद्र खरे), “प्रेमचंद वर्तमान परिदृश्य और साहित्य में प्रासंगिक है” (एडवोकेट पेट्रिस फुसकेले), “प्रेमचंद कल आज और कल”(कैलाश तिवारी ‘विकल’)।
इन सामग्रियों के अतिरिक्त दोहे, गजल, संस्मरण, कहानी, चौकड़िया, गीत, अठवाई आदि अन्य गद्य-पद्य रचनाएं समाहित हैं।
महेंद्र फुसकेले जी की जयंती पर प्रकाशित इस स्मारिका की विशेषता यह है कि इसका प्रकाशन व्यय मुख्य रूप से  फुसकेले परिवार तथा प्रगतिशील लेखक संघ की सागर इकाई के कुछ सदस्य मिलकर वहन करते हैं। स्मारिका का मुद्रण निमिष आर्ट एंड पब्लिकेशन ने किया है जो कि नयनाभिराम है। कव्हर के अंतिम भीतरी पृष्ठ पर प्रगति लेखक संघ की सागर इकाई की गतिविधियों की तस्वीरें प्रकाशित की गई हैं। कलेवर की दृष्टि से यह स्मारिका प्रकाशित कर प्रगतिशील लेखक संघ की सागर इकाई ने एक नया प्रतिमान गढ़ा है तथा एक पठनीय एवं संग्रहणीय स्मारिका प्रकाशित की है।
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Saturday, February 7, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | ने कोनऊं खों फिकर, ने कोनऊं खों परी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टॉपिक एक्सपर्ट | ने कोनऊं खों फिकर, ने कोनऊं खों परी | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
टाॅपिक एक्सपर्ट
ने कोनऊं खों फिकर, ने कोनऊं खों परी
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
   आप ओरें सोच रए हुइयो के हम कोन की कै रए औ का कै रए? सो, ऐसो आए के हम अपनी ब्यथा कै रए, जो आप ओरन की सोई ब्यथा आए मनो आप ओरन खोंं ऊ तरफी ध्यानई ने जात आए। इत्ते सहूरी वारी पब्लिक औ कऊं ने हुइए जित्ती अपने ई सागर में आए। जो हम झूठी कै रए होए सो बताव हमें। हम आप ओरन खों अकेली दो रोडन पे लिवाऊत चल रए। पैली रोड आए राधा तिगड्डा से पुरानी अलंकार टॉकीज लौं की रोड। आप सोच रए हुइयो के हमने जामा मस्जिद से अम्बेडकर तिराहा की काए नईं कई? बोई रोड के इत्ते से टुकड़ा की काय कई? सो भैया, बा टुकड़ाई तो फंदा बनो डरो। बा टुकड़ा रेलपुल के नैंचे से निकरत आए। उते की रोड नाला पे बनी आए। उते बरसात में पानी भर जात्तो सो ऊके निस्तार के लाने रोड पे जाले लगा दए गए। मनो आज जे दसा आए के कोऊ जाला रोड ऊपर निकर आओ है, सो कछू रोड में नैंचें धंस गए आएं। इत्तोई नोईं एक जाला पे फथरा धरें हैं, औ बा एक तरफी से टूटो धरो है। जो कोनऊं भारी गाड़ी ऊपे से गुजरी सो बा जाला को हो जाहे राम नाम सत्त औ गाड़ी नाला में लटकी दिखाहे। 
  दूसरी रोड आए मकरोनिया से सिविल लेन की जी पे शंकरगढ़ के नजीक एक पानी की लेन को गढ़ा आए। बा बरहमेस बनो रैत आए। ऊके लिंगे से निकरो ऊको घेर के निकरने परत आए। एक तो वन-वे रोड  ऊपे घेर के निकरने में औ सकरौंदो हो जात है। मने इन दोई रोडन में एक्सीडेंट के फुल चांस। दोई में खूब भीर गुजरत आए, मनो ऐसो लगत आए के चाए परसासन होए चाए पब्लिक ने कोनऊं खों फिकर,  ने कोनऊं खों परी। सई कई न? सोंस के बताइयो!
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Thursday, February 5, 2026

डॉ (सुश्री) शरद सिंह कर्क रेखा पर

बहुत कुछ कहती हैं रेखाएं 
ज़िन्दगी   पढ़ती  हैं रेखाएं
कभी  टुकड़े  करती हैं  ये
कभी खुद जुड़ती हैं रेखाएं 
          - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
एक बार फिर कर्क रेखा पर मैं, सांची के निकट... 🚩
#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #कर्करेखा #tropicofcancer
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Lines speak volumes
Lines read life
Sometimes they break into pieces
Sometimes the lines join together on their own
- Dr. (Ms.) Sharad Singh.
Once again on the Tropic of Cancer, near Sanchi... 🚩

बतकाव बिन्ना की | रामधई, बे गाकरें औ भरता कभऊं ने बिसरहें | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की | रामधई, बे गाकरें औ भरता कभऊं ने बिसरहें | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की  
रामधई, बे गाकरें औ भरता कभऊं ने बिसरहें
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
     आज संकारे से भौजी को फोन आओ के गांकरें बना रए, आ जाओ। दुफारी को इतई जीमियो। काय से भौजी खों पतो के मोए गांकरें भौतई पुसात आएं। जो पिसी के आटा की होए तो कोनऊं नईं, बाकी जुंडी औ बाजरे के आटा की होए तो औरई मजा आ जात आए। भौजी को न्योतो सुन के मोए लगो के बे अकेली कां लौं बनाहें, सो मैंने सोई उनके इते पैलई पौंचने की सोच लई औ झट्टई तैयार हो के उनके इते जा पौंची।
‘‘चलो भौजी मैं सोई हाथ बंटा दे हौं।’’ मैंने कई।
‘‘अरे कछू नईं हम तो अकेले बना लेते। बाकी जो अब तुम आ गई हो सो जा भंटा को भरता बनाओ, ज्यों लौं हम गाकरों के लाने आटा गूंथ लेत आएं। अपने भैयाजी खो सोई टेर लेओ। इतई गरमा-गरम बनात जाबी औ जीमत जाबी।’’ भौजी बोलीं।
मैंने भैयाजी खों टेर लगाई। बे सोई सपर-खोंर के भगवान खों अगरबत्ती लागा-लुगू के तैयार हते। मनो मोए गरमा-गरम गाकरों से कछू पुरानी यादें आ गईं।
‘‘भौजी, कछू कर लओ जाए पर मोए बा गाकरें आ लौं ने बिसरीं जोन की सुगंध मोए पन्ना में मिलत्ती।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘अच्छा, उते तुमाए इते गाकरें बनो करत रई हुइएं।’’ भौजी गाकर की लोई अपनी गदेली पे थपियात भईं बोलीं।
‘‘नईं, घरे वारी नोंईं। उते का हतो के मोरे घर के इते रओ छत्रसाल पार्क औ छत्रसाल पार्क के सामने रओ बड़ो सो मैदान। बाकी अब बा मैदान नईं बचो, लेकन ऊ टेम पे रओ। उते इतवार की बजरिया भरत्ती। भौतई बड़ी वारी। दूर-दूर से किसान हरें अपनो नाज बैलगाड़ी में भर के दो दिनां पैले से आ जात्ते। उतई एक बड़ो सो कुआ रओ। ओई कुआ के पानी से बे सपरत्ते, ओई को पानी पियत्ते, ओई पानी से खाना बनाउत्ते और बोई कुआ के पानी अपने बैलन खों पियाउत्ते। उतई कुआ के दोई तरफी बे अपनो डेरा डारत्ते। उनके संगे उनके घर की लुगाइयां ने आउत्तीं। खाली मरद हरें आउत्ते। बेई कंडा बार के दोई टेम अपने लाने गांकरें सेंकत्ते और भरता बनाउत्ते। ऊ तरफी से कढ़ो तो इत्ती नोनी सुगंध मिलत्ती के का कई जाए। पेट चाए टनटना के भरो होए, मनो लगत्तो के एकाद गाकर खाबे खों मिल जाए।’’ मैंने बताई।
‘‘फेर कभऊं खाबे खो मिली के नईं?’’ भैयाजी ने पूछी। 
‘‘मिली ना! बा कई जात आए ने के जां चाह उते राह, सो मोरो जुगाड़ बी बन गओ। भओ का के ऊ टेम पे मोरे कमल मामा जू पन्ना में हते। आप ओरें तो जानत आओ के बे बतकाव करे में उस्ताद हते। उन्ने एक किसान से दोस्ती गांठ लई। फेर एक दिनां ऊसे कई के मोरी भांजी खों तुमाए हाथ की गांकरे खाने। बा किसान भौतई खुस भओ औ ऊने मोए बड़े लाड़ से भरता औ टमाटर की चटनी के संगे गाकड़े खवाईं। औ आपके लाने बता दूं के उनके लिंगे सिल-बट्टा तो रैत नई हतो सो बे टमाटर खों कंडा में भून के हाथ से मसक-मसक के चटनी बनाऊत्ते। ऊमें हरी धनां सोई डरी रैत्ती। ऊंसी गांकरें मैंने फेर कभऊं कऊं ने खांईं। ऊको स्वादई कछू औ रैत्तो। जो आज के हिसाब से तनक सयानेपन से कई जाए तो ऊमें सई की माटी की सुगंध रैत्ती।’’ मैंने बताई।
‘‘होत आए। ऐसो सई में होत आए। हमें सोई याद पर रई के लरकपन में जब हम फुआ के इते जात्ते तो उनके इते उल्टे तवा पे रोटी सेंकी जात्तीं। मनो बोई पिसी को आटा लेकन हाथ से थपिया के उल्टो तवा पे सेंकी गई रोटियन को स्वादई कछू दूसरो रैत्तो। उते से लौट के जब अम्मा के हाथ की सीदे तवा की रोटी जीमत्ते तो बा स्वाद न मिलत्तो। हम अम्मा से कैत्ते के फुआ घांई रोटियां काए नईं बनाऊंत, तो बे हम ओरन खों डांट के कैत्तीं के उते जा के उल्टे तवा की रोटियां जीम-जीम के तुम ओरन को दिमाग उलट गओ आए। जो हम बना रए, खाने होए सो बई खाओ ने तो जाओ अपनी फुआ के घरे। अब फुआ के घरे जा के बरहमेस तो रै नईं सकत्ते, सो मों दाब के अम्मा की बनाई रोटियां खान लगत्ते।’’ भैयाजी ने हंसत भए बताई।
‘‘ऊको कल्ला कओ जात आए। बा मिट्टी को होत आए। बाकी कोनऊं के लिंगे कल्ला ने होए तो बा तवा उल्टो कर के बी रोटियां सेक लेत आए।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ तो ऐसई तो हमाए संगे रओ के हमें लकड़ी के चूला की रोटियां नोंनी लगत्तीं। फेर जब घरे गैस चूला आ गओ सो ऊपे सिकीं रोटियां हमाए गले से ने उतरत्ती। ऊ टेम पे हमाए बाबू कओ करत्ते के गैस चूला को बनो खाना मनो अच्छो तो नईं लगत, पर एक दिनां ऐसो आहे के चूला के लाने लकड़ियां ने मिलहें औ हमें जेई पे पको खाना खाने परहे। फेर भओ बी बोई। आज देख लेओ, चाए भरता बनाने होए चाए गाकरें बनाने होंए, गैस चूला पे बनत आए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘गैस चूला भर नोईं भौजी, अबतो माइक्रोवेव ओवन में बनत आए। मैं सोई भरता को भंटा ओवन में भूनत हौं। औ संगे बाटी बनाने होए तो ओवन में बनत आएं बाटियां।’’ मैंने कई।
‘‘मनो ऊको स्वाद ऊंसो सो नईं रैत जैसे कंडा में सिंकी बाटियन को होत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अब तुम ओरन ने इत्ती बतकाव कर लई गाकरों औ बाटियन की के मोरो जी कर रओ के कऊं बायरे चलें औ उतई गाकरें बना के खाएं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘सई कई भौजी। घूमें फिरे से मन अच्छो रैत आए। कछू हवा-पानी बदलो चाइए। जेई घरे पिड़े-पिड़े बोरियत सी होन लगत आए। चलो ने कछू पिलान बनाओ जाए।’’मैंने तुरतईं कई। काय से के मैं तो मनो जनम से घुमक्कड़ ठैरी। मोए घूमबो-फिरबो भौतई पुसात आए। 
‘‘हऔ, शिवरातें सोई आ रई। शिवरातों पे चलो जाए कऊं। जटाशंकर कैसो रैहे?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ चल तो सकत आएं मनो जटा शंकर में भारी भीर उमरहे, सो कऊं देहात के मेला वारे मंदिर में चलो जाए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, आपने सई कई। मेला की भीर से मोए याद आ गई के एक दार मैं मोरी दीदी  औ एक भैयाजी पन्ना में चैमुखनाथ के मेला गए। उते भौतई भीर हती। सो मैंने दीदी को हात पकर लओ औ भैयाजू ने दीदी को हात पकर लओ, के हम ओरे कऊं बिछर ने जाएं। उते भीर इत्ती के बीच में लुगााइयों को झुंड सो आओ औ बा चक्कर में भैयाजू से दीदी को हात छूट गओ। थेड़ी देर चलत-चलत दीदी की हंसी फूट परी। मैंने पूछी के का भओ? सो बे बोलीं के देखो भैयाजू कोन को हात पकरे जा रए। मैंने देखी, बे सई में एक देहातन बिन्ना को हात पकरे चले जा रए हते औ बा बिन्ना बी गजब की कहानी, जो बा उनके संगे चलत जा रई हती। फेर हम ओरें तनक तेजी से आगे बढ़े औ भैयाजू खों टोंका मारो सो उन्ने देखो के बे तो दीदी की जांगा कोऊं औ को हात पकरे जा रए हते। उन्ने तुरतईं हात छोड़ो। फेर बे सोई देर तक हंसत रए। सो जो भारी भीर होए तो कछू बी हो सकत आए। अपन तो कम भीर वारी जांगा पे चलहें।’’ मैंने कई।
‘‘हऔ तो पक्को रओ। जा शिवरातें में अपने खों कऊं ने कऊं बायरे चलने।’’ भौजी बोलीं। औ उन्ने थाली परसबे को इसारा करो, सो मैंने थाली परसी सुरू करी। थारी में भंटा को भरता, आम को अथान, मूरी औ टमाटर की चटनी के संगे तनक सो नोन रखो। गिलासन में पानी भरो। तब लौं भौजी गांकरें सेंकन लगीं। कछू-कछू ओई टाईप की सुगंध रई जैसी पन्ना की बजरिया में बा किसानों के बनाबे पे लगत्ती, मनो वैसी ने हती। ऊकी बातई कछू औ हती। 
असल में होत का आए के जमीन से जुरो जो कछू होत आए बा ज्यादई अच्छो लगत आए। काए से के बा अपनी असल जिनगी से जुरी होत आएं। सो बे चीजें कैसे भुलाई जा सकत आएं। औ भूलबो बी नई चाउने। सो, हम ओरे जेई सब बतकाव करत भए जीतन लगे। 
बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। कभऊं-कभऊं आप ओरें बी अपने पांछू की जिनगी खों याद कर लओ करे। ईसे बड़ो सुख मिलत आए। सई मानो!  
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, February 4, 2026

चर्चा प्लस | उम्र कोई बाधा नहीं, यह दिखा दिया ग्रैमी अवार्ड जीत कर नोबेल पुरस्कार विजेता आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस


उम्र कोई बाधा नहीं, यह दिखा दिया ग्रैमी अवार्ड जीत कर नोबेल पुरस्कार विजेता आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा ने


- डॉ (सुश्री) शरद सिंह


         संगीत के लिए दिया जाने वाला विश्व का प्रतिष्ठित ग्रैमी अवार्ड तिब्बती आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा को दिया गया है, उनके एल्बम ‘‘मेडिटेशंस’’ के लिए। यह ग्रैमी अवार्ड के इतिहास में पहली बार है कि एक आध्यात्मिक गुरु को ग्रैमी अवार्ड दिया गया है। यह दलाईलामा की विलक्षण प्रतिभा है कि उनके संगीत ने प्रोफेशनल्स को पीछे छोड़ दिया और स्थापित कर दिया कि आध्यात्म के लिए संगीत सर्वाधिक उपयुक्त माध्यम है। बेशक़ इससे चीन बौखला गया है किन्तु समूचा विश्व दलाई लामा के मानवीय विचारों पक्ष में खड़ा है। जिसका ताज़ा उदाहरण है उन्हें ग्रैमी अवार्ड दिया जाना। इसी के साथ 90 वर्षीय परम पावन दलाई लामा ने यह दिखा दिया है कि उत्साह के साथ जीने के लिए उम्र कोई बाधा नहीं होती है।


लॉस एंजेलिस में आयोजित 68वें ग्रैमी अवॉर्ड्स में इतिहास रचते हुए 90 वर्ष की आयु में दलाई लामा ने अपना पहला ग्रैमी पुरस्कार जीता। तिब्बती आध्यात्मिक गुरु को उनका यह सम्मान स्पोकन-वर्ड एल्बम ‘‘मेडीटेशंस” के लिए मिला, जिसने वैश्विक लोकप्रिय संस्कृति और आध्यात्मिक दर्शन के बीच एक दुर्लभ संगम प्रस्तुत किया। यह उपलब्धि अपनी अनोखापन के साथ-साथ अपने संदेश के कारण भी दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी है। दलाई लामा ने इस सम्मान को व्यक्तिगत उपलब्धि मानने के बजाय मानवता की साझा जिम्मेदारी की स्वीकृति बताया, जिससे यह पुरस्कार केवल एक कला-सम्मान न होकर करुणा, शांति और वैश्विक नैतिक चेतना का प्रतीक बन गया।
तेनजिन ग्यात्सो, चैदहवें दलाई लामा तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष और आध्यात्मिक गुरू हैं। उनका जन्म 6 जुलाई 1935 को उत्तर-पूर्वी तिब्बत के ताकस्तेर क्षेत्र में रहने वाले ये ओमान परिवार में हुआ था। दो वर्ष की अवस्था में बालक ल्हामो धोण्डुप की पहचान 13 वें दलाई लामा थुबटेन ग्यात्सो के अवतार के रूप में की गई। ‘‘दलाई लामा’’ उपाधि का अर्थ होता है ज्ञान का महासागर। दलाई लामा अर्थात वह व्यक्ति जिसने करूणा, अवलोकेतेश्वर के बुद्ध के गुणों के साक्षात रूप पाया हो। बोधिसत्व ऐसे ज्ञानी लोग होते हैं जिन्होंने मानवता की रक्षा के लिए पुनर्जन्म लेने का निर्णय लिया हो। उन्हें सम्मान से परमपावन भी कहा जाता है।
दलाई लामा की मुख्य आत्मकथा ‘‘फ्रीडम इन एग्जाइल: द ऑटोबायोग्राफी ऑफ द दलाई लामा’’ है, जो 1991 में प्रकाशित हुई थी। हिंदी में यह पुस्तक ‘‘मेरा देश निकाला’’ के नाम से उपलब्ध है। इसमें उन्होंने अपने शुरुआती जीवन, तिब्बत पर चीनी कब्जे और 1959 में भारत में निर्वासित जीवन की शुरुआत का वर्णन किया है। ये दोनों पुस्तकें दलाई लामा के जीवन संघर्ष एवं उनके जीवन के विविध आयामों से परिचित कराती है। यूंकि ये दोनों पुस्तकें मैंने स्वयं पढ़ी हैं अतः मैं यह दावे के साथ यहां लिख सकती हूं कि एक आध्यात्मिक गुरू का कठिनतम जीवन आध्यात्म के मार्ग से गुज़र कर किस तरह सहज, सरल एवं शांत बन गया, इन दोनों पुस्तकों को पढ़ कर जाना जा सकता है। दलाई लामा का जीवन प्रेरणादाई है। कोई भी व्यक्ति अथाह दुखों एवं पीड़ाओं में भी अपने चित्त को शांत बना कर कैसे बालसुभ्लभ प्रवृत्तियों को अपने भीतर बचाए रख सकता है, यह दलाई लामा के अब तक के जीवन के बारे में जान कर सीखा जा सकता है।  
90 वर्षीय दलाई लामा को यह सम्मान ‘‘मेडिटेशन: द रिफ्लेक्शन्स ऑफ हिस होलीनेस द दलाई लामा’’ के लिए उन्हें मिला। उन्हें बेस्ट ऑडियोबुक, नरेशन और स्टोरीटेलिंग रिकॉर्डिंग की कैटेगरी में यह अवॉर्ड दिया गया। यह अवॉर्ड ग्रैमी के प्री-टेलीकास्ट समारोह के दौरान घोषित किया गया, जिसे यूट्यूब पर लाइव-स्ट्रीम भी किया गया था। इस ऐलान के साथ ही यह पल इतिहास में दर्ज हो गया, क्योंकि यह पहली बार था जब किसी विश्व-प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु को इस श्रेणी में ग्रैमी अवॉर्ड से नवाजा गया। ‘मेडिटेशनरू द रिफ्लेक्शन्स ऑफ हिस होलीनेस द दलाई लामा’ एक अनोखा ऑडियो प्रोजेक्ट है, जिसमें बोले गए मेडिटेशन, दलाई लामा की शिक्षाएं और संगीत का खूबसूरत संयोजन देखने को मिलता है। इस एल्बम का संगीत हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत से प्रेरित है, जो श्रोता को शांति, आत्मनिरीक्षण और संतुलन की अनुभूति कराता है। यह प्रोजेक्ट न केवल आध्यात्मिक साधना का माध्यम है, बल्कि आधुनिक दुनिया में मानसिक शांति की तलाश कर रहे लोगों के लिए एक सशक्त संदेश भी देता है।
दलाई लामा ने कहा कि ‘‘ग्रैमी अवॉर्ड को व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि साझा सार्वभौमिक जिम्मेदारी की पहचान मानता हूं। मैं इस अवार्ड को सकल मानवता के पक्ष में विनम्रता के साथ स्वीकार करता हूं। मेरा मानना है कि शांति, दया, हमारे पर्यावरण की देखभाल और इंसानियत की एकता की समझ सभी आठ अरब मनुष्यों की सामूहिक भलाई के लिए आवश्यक है। मैं आभारी हूं कि यह ग्रैमी अवार्ड इन संदेशों को और अधिक लोगों तक पहुंचाने में सहायक होगा।’’
दलाई लामा का यह पहला ग्रैमी पुरस्कार है, लेकिन दशकों से उन्हें विश्व स्तर पर अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित जाता रहा है। सन 1989 में उन्हें अहिंसा और शांति के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया था। इसके अतिरिक्त उन्हें टेम्पलटन प्राइज, लिबर्टी मेडल और दुनिया भर के विश्वविद्यालयों से कई मानद डॉक्टरेट उपाधियां भी मिल चुकी हैं। ये सभी सम्मान दर्शाते हैं कि दलाई लामा का प्रभाव केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक शांति, नैतिकता और शिक्षा जैसे व्यापक क्षेत्रों तक फैला हुआ है।
चीन दलाई लामा को शांति का नोबल पुरस्कार दिए जाने पर भी बौखलाया था और अब ग्रैमी अवार्ड दिए जाने पर भी तिलमिला उठा है। यद्यपि दलाई लामाम यह भली भांति समझते हैं कि चीन के आमजन इसमें शामिल नहीं हैं, वे विवश हैं। दलाई लामा का कहना है कि ‘‘एक शरणार्थी के रूप में हम तिब्बती लोग भारत के लोगों के प्रति हमेशा कृतज्ञता महसूस करते हैं, न केवल इसलिए कि भारत ने तिब्बतियों की इस पीढ़ी को सहायता और शरण दिया है, बल्कि इसलिए भी कई पीढ़ियों से तिब्बती लोगों ने इस देश से पथप्रकाश और बुधमित्ता प्राप्त की है। इसलिए हम हमेशा भारत के प्रति आभारी रहते हैं। यदि सांस्कृतिक नजरिए से देखा जाए तो हम भारतीय संस्कृति के अनुयायी हैं। हम चीनी लोगों या चीनी नेताओं के विरुद्ध नहीं हैं आखिर वे भी एक मनुष्य के रूप में हमारे भाई-बहन हैं। यदि उन्हें खुद निर्णय लेने की स्वतंत्रता होती तो वे खुद को इस प्रकार की विनाशक गतिविधि में नहीं लगाते या ऐसा कोई काम नहीं करते जिससे उनकी बदनामी होती हो। मैं उनके लिए करूणा की भावना रखता हूं।’’
परमपावन दलाई लामा ने अपनी मठवासी शिक्षा छह वर्ष की अवस्था में प्रारंभ की। वर्ष 1949 में तिब्बत पर चीन के हमले के बाद परमपावन दलाई लामा से कहा गया कि वह पूर्ण राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में ले लें। 1954 में वह माओ जेडांग, डेंग जियोपिंग जैसे कई चीनी नेताओं से बातचीत करने के लिए बीजिंग भी गए। लेकिन आखिरकार वर्ष 1959 में ल्हासा में चीनी सेनाओं द्वारा तिब्बती राष्ट्रीय आंदोलन को बेरहमी से कुचले जाने के बाद वह निर्वासन में जाने को मजबूर हो गए। इसके बाद से ही वह उत्तर भारत के शहर धर्मशाला में रह रहे हैं जो केंद्रीय तिब्बती प्रशासन का मुख्यालय है। तिब्बत पर चीन के हमले के बाद परमपावन दलाई लामा ने संयुक्त राष्ट्र से तिब्बत मुद्दे को सुलझाने की अपील की। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा इस संबंध में 1959, 1961 और 1965 में तीन प्रस्ताव पारित किए गए।
सन 1963 में परमपावन दलाई लामा ने तिब्बत के लिए एक लोकतांत्रिक संविधान का प्रारूप प्रस्तुत किया। मई 1990 में तक ही दलाई लामा द्वारा किए गए मूलभूत सुधारों को एक वास्तविक लोकतांत्रिक सरकार के रूप में वास्तविक स्वरूप प्रदान किया जा सका। इस वर्ष अब तक परमपावन द्वारा नियुक्त होने वाले तिब्बती मंत्रिमंडलय काशग और दसवीं संसद को भंग कर दिया गया और नए चुनाव करवाए गए। निर्वासित ग्यारहवीं तिब्बती संसद के सदस्यों का चुनाव भारत व दुनिया के 33 देशों में रहने वाले तिब्बतियों के एक व्यक्ति एक मत के आधार पर हुआ। धर्मशाला में केंद्रीय निर्वासित तिब्बती संसद में अध्यक्ष व उपाध्यक्ष सहित कुल 46 सदस्य हैं।
सन 1987 में दलाई लामा ने तिब्बत की खराब होती स्थिति का शांतिपूर्ण हल तलाशने की दिशा में पहला कदम उठाते हुए पांच सूत्रीय शांति योजना प्रस्तुत की थी। उन्होंने यह विचार रखा था कि तिब्बत को एक अभयारण्य-एशिया के हृदय स्थल में स्थित एक शांति क्षेत्र में बदला जा सकता है जहां सभी सचेतन प्राणी शांति से रह सकें और जहां पर्यावरण की रक्षा की जाए। लेकिन चीन परमपावन दलाई लामा द्वारा रखे गए विभिन्न शांति प्रस्तावों पर कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया देने में नाकाम रहा। 21 सितंबर, 1987 को अमेरिकी कांग्रेस के सदस्यों को सम्बोधित करते हुए परमपावन दलाई लामा ने पांच बिन्दुओं की शांति योजना रखी थी। यह पांच सूत्रीय शांति योजना थी कि समूचे तिब्बत को शांति क्षेत्र में परिवर्तित किया जाए। चीन उस जनसंख्या स्थानान्तरण नीति का परित्याग करे जिसके द्वारा तिब्बती लोगों के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो रहा है। तिब्बती लोगों के बुनियादी मानवाधिकार और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का सम्मान किया जाए। तिब्बत के प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण व पुनरूद्धार किया जाए और तिब्बत को नाभिकीय हथियारों के निर्माण व नाभिकीय कचरे के निस्तारण स्थल के रूप में उपयोग करने की चीन की नीति पर रोक लगे। तिब्बत की भविष्य की स्थिति और तिब्बत व चीनी लोगों के सम्बंधो के बारे में गंभीर बातचीत शुरू की जाए।
शांति, अहिंसा और हर सचेतन प्राणी की खुशी के लिए काम करना दलाई लामा के जीवन का बुनियादी सिधांत है। वह वैश्विक पर्यावरणीय समस्याओं पर भी चिंता प्रकट करते रहते हैं।  दलाई लामा ने 52 से अधिक देशों का दौरा किया है और कई प्रमुख देशों के राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों और शासकों से मिले हैं। उन्होंने कई धर्म के प्रमुखों और कई प्रमुख वैज्ञानिकों से मुलाकात की है। दलाई लामा के शांति संदेश, अहिंसा, अंतर धार्मिक मेलमिलाप, सार्वभौमिक उत्तरदायित्व और करूणा के विचारों को मान्यता के रूप में अब तक उनको 60 मानद डॉक्टरेट, पुरस्कार, सम्मान आदि प्राप्त हुए हैं। दलाई लामा ने 50 से अधिक पुस्तकें लिखीं हैं। उनका संदेश है प्यार, करूणा और क्षमाशीलता।
दलाई लामा को ग्रैमी अवार्ड दिया जाना आध्यात्मिक संगीत की वैश्विक मान्यता पर भी मुहर लगाता है। नवीनतम इलेक्ट्रॉनिक गजेट्स के प्रति रुझान रखने वाले दलाई लामा के भीतर गहन चिंतनशील आध्यात्मिक गुरु के साथ बाल सुलभ जिज्ञासु व्यक्ति भी मौजूद है जो उनके व्यक्तित्व को विलक्षण बनाता है तथा उनका व्यक्तित्व सभी के लिए अनुकरणीय है। जिस आयु को लोग उम्र का अंतिम पड़ाव मानते हैं, उसे एक नई शुरुआत की भांति सार्थक बना देने की उनकी कला को समर्पित है ग्रैमी अवार्ड ।                -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 04.02.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, February 3, 2026

पुस्तक समीक्षा | बोलियों के बहनापे को सुदृढ़ करने वाला अव्यावसायिक त्रैमासिक "बघेली अंजोर" | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
बोलियों के बहनापे को सुदृढ़ करने वाला अव्यावसायिक त्रैमासिक "बघेली अंजोर"
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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त्रैमासिक (अव्यवसायिक)- बघेली अंजोर
संपादक - डॉ राम गरीब पाण्डेय ‘विकल’
प्रकाशक  - बोली विकास मंच, गीतायन, प्लाट नं. 685/19, वाटर फिल्टर प्लांट के सामने, तुलसीनगर नौढ़िया, सीधी (म.प्र.) - 486661
मूल्य - 60/- (वार्षिक रु.280/-)
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‘‘बघेली अंजोर’’ बघेली एवं समीपवर्ती बोलियों के साहित्य-संस्कृति की पूर्णतः अव्यावसायिक त्रैमासिक पत्रिका जिसके प्रधान सम्पादक हैं डॉ. राम गरीब पाण्डेय श्विकलश्।  उप सम्पादक गीता शुक्ला श्गीतश् तथा सह सम्पादक रामलाल मिश्र, शिवी शुक्ला हैं। बोलियों के विकास के लिए प्रतिबद्ध या पत्रिका प्रमुख पांच बोलियां को साथ लेकर चल रही है - बघेली, अवधी, बुन्देली, छत्तीसगढ़ी एवं भोजपुरी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सीधी जिले के महत्वाकांक्षी विद्वान डॉ. राम गरीब पाण्डेय श्विकल’ इस पत्रिका को एक मिशन की तरह आरंभ कर चुके हैं। समीक्ष्य अंक “बघेली अंजोर” का तीसरा अंक है। आज के डिजिटल युग में जब किसी भी प्रकार की पत्रिका प्रकाशित करना एक चुनौती भरा काम है ऐसे कठिन दौर में बोलियो के लिए समर्पित त्रैमासिक प्रकाशित करने का बीड़ा उठाना अपने आप में प्रशंसनीय कार्य है।

      विभिन्न बोलियां के लिए जो संपादन सहयोग दे रहे हैं वे हैं- बघेली में भृगुनाथ पाण्डेय श्भ्रमरश् (रीवा), अवधी में राम प्रसाद शुक्ल (प्रयागराज), भोजपुरी में प्रकाश उदय (वाराणसी), बुन्देली में डॉ. सरोज गुप्ता (सागर) तथा छत्तीसगढ़ी में डॉ. विनोद कुमार वर्मा (बिलासपुर)।
भारत में भाषाई विविधता पर भारी संकट मंडरा रहा है, एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 780 भाषाओं में से 400 के करीब भाषाएँ विलुप्त होने की कगार पर हैं। वैश्वीकरण, शहरीकरण और रोजगार के लिए अंग्रेजी भाषाओं के दबाव के कारण मातृभाषाएं दम तोड़ रही हैं, जिससे सांस्कृतिक और भावनात्मक धरोहर नष्ट हो रही है। भाषा विज्ञानयों के अनुमान के अनुसार अरुणाचल प्रदेश और असम में लगभग 60 जनजातीय भाषाएं 2050 तक खत्म हो सकती हैं। नई पीढ़ी पारंपरिक भाषाओं की जगह प्रमुख भाषाएँ सीख रही है, जिससे भाषा का हस्तांतरण थमता जा रहा है। बोलियों के साथ-साथ मुहावरे, लोकगीत और पारंपरिक ज्ञान भी लुप्त हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में बोलियां को बचाना उन्हें संरक्षित एवं संबंधित करना अत्यंत आवश्यक है इस दिशा में “बघेली अंजोर” अपना दायित्व निभाती दिखाई दे रही है।
यहां प्रश्न यह भी उठना है कि अपनी भाषा या अपनी बोली को प्रमुखता दिलाने के लिए किसी तरह की हठधर्मिता या हिंसा का प्रदर्शन किया जाना क्या उचित है? जैसा कि विगत कुछ ऐसे में महाराष्ट्र में कई बार देखा गया है। ”भाषा परिवार” शब्द इसीलिए प्रयुक्त होता है कि अनेक भाषाएं एक साथ सम्मान पूर्वक उपस्थित रहें, विकास करें जैसे मानव परिवार में सभी सदस्य मिलकर रहते हैं और जब सभी मिलकर रहते हैं तभी परिवार समृद्धि शैली हो पता है और सभी सदस्यों का समुचित विकास हो पता है ठीक यही स्थिति भाषाओं और बोलियों की है ।

        डॉ. राम गरीब पाण्डेय ‘विकल’ ने अपने संपादकीय में ‘‘कहब जरूरी है - मामकाः पाण्डवाश्चैव’’ शीर्षक से बघेली में बहुत सही लिखा है कि- “बोली-भाखा क लै के, अबै कुछ समय पहिले महारास्ट्र म बहुत बड़ा हंगामा होइ ग रहा। बिल्लाधारी बहुत दिनन से जड़ान बइठ रहें। बाताबरन म गरमी ले आबै के खातिर, उँ मराठी के समरथन म अइसन दहेंचाल मचाइन, के सगले देस म, सगली दुनिया म धू-धू होय लागि। उँ लिनकर विरोध किहिन, जिनका मारिन-पीटिन, जिनका महारास्ट्र से निकारै के एजेंडा चलाइन, इया बिसरि गें, के महारास्ट्र (बम्बई) के विकास के पहिया खींचे म इनहिन के हाँथ है। इहै मेर कुछ अति उत्साही बिल्लाधारी आपन नाव लिखावै, छपावै के खातिर कहीं न कहीं इया मेर के कसरत करत मिलिन जात है। इया देस म बाइस भासा बोली जाती है। उनहुन के सबके अलग-अलग अनेकन बोली-लोकभासा हई। इया बाति पर बहुत गम्भीरता से सोवै के जरूरति है, के हर बोली-भाखा एक दुसरे क साथ ले के जब चलति है, तब उआ भारत देस के भासा बनति है। कुछ खुराफाती बिल्लाधारी अठमीं अनुसूची के छुरघुरी छाँड़ि के आगी लगाबै के कोसिस लगातार करत रहत हैं औ बिल्ला के मोह म, कुछ जने इया घुरछुरी से बिना सोचे-समझे अपनेन घरे म आगी लगाबै खातिर तयार मिलि जात हैं। उनहीं इया बाति के सुधि नहीं रहै, के सब क साथ ले के चलब, हमरे संस्कृति के पहिचान आय। ष्सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत।। (वृहदारण्यक और तैत्तिरीय उपनिषद) हमरे देस के, हमरे संस्कृति केर सूत्र बाक्य आय।”
जनवरी-मार्च 2026 के इस अंक में जो आलेख दिए गए हैं, वे हैं- भाईलाल शर्मा का “बघेली गद्य-साहित्यरू दशा और दिशा”,   डॉ. शंकर लाल शर्मा का “ब्रज की होलीः विविध रूप-रंग”, डॉ. बिहारीलाल साहू “छत्तीसगढ़ की जनभाषा”, प्रिंस कुमार सेन का आलेख “सभ्यता की विकास-यात्राः नदियों से सड़कों तक”।

      विविध बोलियां में कहानी के अंतर्गत शिवपाल तिवारी की बघेली कहानी “अकरथी”, डॉ. रश्मिशील शुक्ला की अवधी कहानी “मन के जीते जीत”, वन्दना अवस्थी दुबे की बुंदेली कहानी “बड़ी हो गयीं ममता जी”, डॉ. विनोद कुमार वर्मा की छत्तीसगढ़ी कहानी “लँगड़ा कोन”, डॉ. दिनेश पाण्डेय की भोजपुरी कहानी “बरगद लोक” है। यह सभी कहानियां अपने-अपने बोली क्षेत्र की संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
लघुकथाओं के अंतर्गत बघेली में कृष्ण मणि मिश्र की “परबचन” अवधी में भारतेन्दु मिश्र की “कनबतिया”, बुंदेली में डॉ. शरद सिंह की “लुगाइयन की आजादी”, छत्तीसगढ़ी में चोवाराम वर्मा ‘बादल’ की “तुलसी चउरा के दिया” तथा बघेली में शंकर सिंह श्दर्शनश् की लघुकथा “गरे के पट्टा” है।
     इस अंक में कहानियों और लघुकथाओं के साथ ही रामप्रसाद शुक्ल का अवधी व्यंग्य “हमार सिच्छा- प्रायमरी” तथा बलभद्र का भोजपुरी संस्मरण “जो सुमिरत सिधि होय” प्रकाशित है।
“पुरिखन के कोठार से” के अंतर्गत डॉ. विष्णुदेव तिवारी छत्तीसगढ़ी कथा “पइयाँ परत ही चन्दा-सुरुज के” दी गई है। इसके अतिरिक्त पुस्तक समीक्षा एवं पांचों बोलियों के विविध गीत भी इस अंक में समाहित हैं, जिससे यह अंक समग्रता समेटे हुए है। गीतों में परदेसी न आये - गीता शुक्ला ‘गीत’ (बघेली), दुइ बूँद आँसु - विनय विक्रम सिंह ‘मनकही’ (अवधी), आज विदा भई मुनियां की - डॉ कृष्ण कुमार नेमा ‘निर्झर’ (बुंदेली), सुरता आथे - धनराज साहू (छत्तीसगढ़ी), माथे अंचरा जोगवलीं - डॉ कमलेश राय (भोजपुरी।
ग़ज़लों में विनय मिश्र ‘प्रांजल’ (बघेली), डॉ. अशोक ‘अज्ञानी’ (अवधी), पूरनचन्द्र गुप्ता (बुन्देली), शिव ‘निश्चिन्त’ (छत्तीसगढ़ी) सुभाष पाण्डेय ‘संगीत’ (भोजपुरी) गजलें हैं।
शिव ‘निश्चिन्त’ की छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के ये कुछ शेर देखिए-

जियत आदमी देख जिन होगे भइया।
सुमत के ये रद्दा कठिन होगे भइया।
कुँवारा हे भिंदोल अब ले बिचारा, ये मेचका के कबछिन लगिन होगे भइया।
जे टूरी के नयना मया बान छोड़िस, त टूरा के मन ह हरिन होगे भइया।

इसी तरह कुछ शेर सुभाष पाण्डेय ‘संगीत’ की भोजपुरी के -
आजु पहिले पहिल, कुछ नफा हो गइल।
नैन मिलते, दरद सब दफा हो गइल।
न सुनाई सुनाई बताईं रहीं मनगुमे, जिंदगी के, इहे फलसफा हो गइल।
जान के जान से, जान जुड़ि के रहे, आशिकी में, इहे तोहफा हो गइल।
प्रीत के आँखि पर, जबसे चश्मा चढ़ल, जे रहे बेवफा, बावफा हो गइल।
    
ये ग़ज़लें अन्य भाषाओं की ग़ज़लों से कहीं भी काम नहीं ठहरती हैं। इनमें वही संवाद और रवानी है जो हिंदी उर्दू की ग़ज़लों में रहती है।

इस प्रकार “बघेली अंजोरा” का यह अंक पांचों बोलियों - बघेली, अवधी, बुन्देली, छत्तीसगढ़ी एवं भोजपुरी की प्रतिनिधि रचनाओं का सुंदर पिटारा है, जिसमें पांचों भौगोलिक क्षेत्रों की सोंधी मिट्टी की महक समाई हुई है जिसे उनके शब्दों के द्वारा अनुभव किया जा सकता है। यूं भी क्षेत्रीय बोलियां किसी क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक पहचान, समृद्ध परंपराओं और लोक-संस्कृति की संवाहक होती हैं। ये न केवल आपसी संवाद को सहज और आत्मीय बनाती हैं, बल्कि स्थानीय ज्ञान, साहित्य, और इतिहास को पीढ़ियों तक संरक्षित रखती हैं। सामाजिक एकता, अस्मिता और भाषाई विविधता के लिए इनका महत्व अत्यंत व्यापक है। इस अंक में संगीत सभी रचनाएं अपनी अपनी बोलियां से न केवल परिचय कराने में सक्षम है बल्कि दूसरी बोली बोलने वाले पाठक के लिए भी एक नई बोली से जुड़ने का अवसर प्रदान करती हैं। जब एक ही ज़िल्द में विभिन्न बोलियों की रचनाएं संग्रहित रहेंगी तो स्वाभाविक है कि अपनी बोली की रचना को पढ़ने के उपरांत दूसरी बोली की रचना पर भी ध्यान जाएगा तथा उसे पढ़ने और समझने का मन स्वाभाविक रूप से करेगा। यह कोई बलात प्रयास नहीं है अपितु सहज आग्रह है, जो रचना स्वयं ही करती है।
किसी भी बोली की अपनी एक जातीय पहचान होती है। यह जातीय पहचान ही उस बोली को अन्य बोलियों से अलग कर के स्वतंत्र अस्तित्व का स्वामी बनाती है।  प्रत्येक बोली की अपनी एक भूमि होती है जिसमें वह पलती, बढ़ती और विकसित होती है। इस जातीय पहचान को बनाए रखना साझा दायित्व होता है। बोलियों के हित में  “बघेली अंजोर” का संपादन एवं प्रकाशन करने हेतु इसके प्रधान संपादक डॉ. राम गरीब पाण्डेय ‘विकल’ बधाई के पात्र हैं। इस पत्रिका को पढ़कर उनके इस प्रयास को समर्थन दिया जाना चाहिए।
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