पुस्तक समीक्षा
बोलियों के बहनापे को सुदृढ़ करने वाला अव्यावसायिक त्रैमासिक "बघेली अंजोर"
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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त्रैमासिक (अव्यवसायिक)- बघेली अंजोर
संपादक - डॉ राम गरीब पाण्डेय ‘विकल’
प्रकाशक - बोली विकास मंच, गीतायन, प्लाट नं. 685/19, वाटर फिल्टर प्लांट के सामने, तुलसीनगर नौढ़िया, सीधी (म.प्र.) - 486661
मूल्य - 60/- (वार्षिक रु.280/-)
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‘‘बघेली अंजोर’’ बघेली एवं समीपवर्ती बोलियों के साहित्य-संस्कृति की पूर्णतः अव्यावसायिक त्रैमासिक पत्रिका जिसके प्रधान सम्पादक हैं डॉ. राम गरीब पाण्डेय श्विकलश्। उप सम्पादक गीता शुक्ला श्गीतश् तथा सह सम्पादक रामलाल मिश्र, शिवी शुक्ला हैं। बोलियों के विकास के लिए प्रतिबद्ध या पत्रिका प्रमुख पांच बोलियां को साथ लेकर चल रही है - बघेली, अवधी, बुन्देली, छत्तीसगढ़ी एवं भोजपुरी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सीधी जिले के महत्वाकांक्षी विद्वान डॉ. राम गरीब पाण्डेय श्विकल’ इस पत्रिका को एक मिशन की तरह आरंभ कर चुके हैं। समीक्ष्य अंक “बघेली अंजोर” का तीसरा अंक है। आज के डिजिटल युग में जब किसी भी प्रकार की पत्रिका प्रकाशित करना एक चुनौती भरा काम है ऐसे कठिन दौर में बोलियो के लिए समर्पित त्रैमासिक प्रकाशित करने का बीड़ा उठाना अपने आप में प्रशंसनीय कार्य है।
विभिन्न बोलियां के लिए जो संपादन सहयोग दे रहे हैं वे हैं- बघेली में भृगुनाथ पाण्डेय श्भ्रमरश् (रीवा), अवधी में राम प्रसाद शुक्ल (प्रयागराज), भोजपुरी में प्रकाश उदय (वाराणसी), बुन्देली में डॉ. सरोज गुप्ता (सागर) तथा छत्तीसगढ़ी में डॉ. विनोद कुमार वर्मा (बिलासपुर)।
भारत में भाषाई विविधता पर भारी संकट मंडरा रहा है, एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 780 भाषाओं में से 400 के करीब भाषाएँ विलुप्त होने की कगार पर हैं। वैश्वीकरण, शहरीकरण और रोजगार के लिए अंग्रेजी भाषाओं के दबाव के कारण मातृभाषाएं दम तोड़ रही हैं, जिससे सांस्कृतिक और भावनात्मक धरोहर नष्ट हो रही है। भाषा विज्ञानयों के अनुमान के अनुसार अरुणाचल प्रदेश और असम में लगभग 60 जनजातीय भाषाएं 2050 तक खत्म हो सकती हैं। नई पीढ़ी पारंपरिक भाषाओं की जगह प्रमुख भाषाएँ सीख रही है, जिससे भाषा का हस्तांतरण थमता जा रहा है। बोलियों के साथ-साथ मुहावरे, लोकगीत और पारंपरिक ज्ञान भी लुप्त हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में बोलियां को बचाना उन्हें संरक्षित एवं संबंधित करना अत्यंत आवश्यक है इस दिशा में “बघेली अंजोर” अपना दायित्व निभाती दिखाई दे रही है।
यहां प्रश्न यह भी उठना है कि अपनी भाषा या अपनी बोली को प्रमुखता दिलाने के लिए किसी तरह की हठधर्मिता या हिंसा का प्रदर्शन किया जाना क्या उचित है? जैसा कि विगत कुछ ऐसे में महाराष्ट्र में कई बार देखा गया है। ”भाषा परिवार” शब्द इसीलिए प्रयुक्त होता है कि अनेक भाषाएं एक साथ सम्मान पूर्वक उपस्थित रहें, विकास करें जैसे मानव परिवार में सभी सदस्य मिलकर रहते हैं और जब सभी मिलकर रहते हैं तभी परिवार समृद्धि शैली हो पता है और सभी सदस्यों का समुचित विकास हो पता है ठीक यही स्थिति भाषाओं और बोलियों की है ।
डॉ. राम गरीब पाण्डेय ‘विकल’ ने अपने संपादकीय में ‘‘कहब जरूरी है - मामकाः पाण्डवाश्चैव’’ शीर्षक से बघेली में बहुत सही लिखा है कि- “बोली-भाखा क लै के, अबै कुछ समय पहिले महारास्ट्र म बहुत बड़ा हंगामा होइ ग रहा। बिल्लाधारी बहुत दिनन से जड़ान बइठ रहें। बाताबरन म गरमी ले आबै के खातिर, उँ मराठी के समरथन म अइसन दहेंचाल मचाइन, के सगले देस म, सगली दुनिया म धू-धू होय लागि। उँ लिनकर विरोध किहिन, जिनका मारिन-पीटिन, जिनका महारास्ट्र से निकारै के एजेंडा चलाइन, इया बिसरि गें, के महारास्ट्र (बम्बई) के विकास के पहिया खींचे म इनहिन के हाँथ है। इहै मेर कुछ अति उत्साही बिल्लाधारी आपन नाव लिखावै, छपावै के खातिर कहीं न कहीं इया मेर के कसरत करत मिलिन जात है। इया देस म बाइस भासा बोली जाती है। उनहुन के सबके अलग-अलग अनेकन बोली-लोकभासा हई। इया बाति पर बहुत गम्भीरता से सोवै के जरूरति है, के हर बोली-भाखा एक दुसरे क साथ ले के जब चलति है, तब उआ भारत देस के भासा बनति है। कुछ खुराफाती बिल्लाधारी अठमीं अनुसूची के छुरघुरी छाँड़ि के आगी लगाबै के कोसिस लगातार करत रहत हैं औ बिल्ला के मोह म, कुछ जने इया घुरछुरी से बिना सोचे-समझे अपनेन घरे म आगी लगाबै खातिर तयार मिलि जात हैं। उनहीं इया बाति के सुधि नहीं रहै, के सब क साथ ले के चलब, हमरे संस्कृति के पहिचान आय। ष्सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत।। (वृहदारण्यक और तैत्तिरीय उपनिषद) हमरे देस के, हमरे संस्कृति केर सूत्र बाक्य आय।”
जनवरी-मार्च 2026 के इस अंक में जो आलेख दिए गए हैं, वे हैं- भाईलाल शर्मा का “बघेली गद्य-साहित्यरू दशा और दिशा”, डॉ. शंकर लाल शर्मा का “ब्रज की होलीः विविध रूप-रंग”, डॉ. बिहारीलाल साहू “छत्तीसगढ़ की जनभाषा”, प्रिंस कुमार सेन का आलेख “सभ्यता की विकास-यात्राः नदियों से सड़कों तक”।
विविध बोलियां में कहानी के अंतर्गत शिवपाल तिवारी की बघेली कहानी “अकरथी”, डॉ. रश्मिशील शुक्ला की अवधी कहानी “मन के जीते जीत”, वन्दना अवस्थी दुबे की बुंदेली कहानी “बड़ी हो गयीं ममता जी”, डॉ. विनोद कुमार वर्मा की छत्तीसगढ़ी कहानी “लँगड़ा कोन”, डॉ. दिनेश पाण्डेय की भोजपुरी कहानी “बरगद लोक” है। यह सभी कहानियां अपने-अपने बोली क्षेत्र की संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
लघुकथाओं के अंतर्गत बघेली में कृष्ण मणि मिश्र की “परबचन” अवधी में भारतेन्दु मिश्र की “कनबतिया”, बुंदेली में डॉ. शरद सिंह की “लुगाइयन की आजादी”, छत्तीसगढ़ी में चोवाराम वर्मा ‘बादल’ की “तुलसी चउरा के दिया” तथा बघेली में शंकर सिंह श्दर्शनश् की लघुकथा “गरे के पट्टा” है।
इस अंक में कहानियों और लघुकथाओं के साथ ही रामप्रसाद शुक्ल का अवधी व्यंग्य “हमार सिच्छा- प्रायमरी” तथा बलभद्र का भोजपुरी संस्मरण “जो सुमिरत सिधि होय” प्रकाशित है।
“पुरिखन के कोठार से” के अंतर्गत डॉ. विष्णुदेव तिवारी छत्तीसगढ़ी कथा “पइयाँ परत ही चन्दा-सुरुज के” दी गई है। इसके अतिरिक्त पुस्तक समीक्षा एवं पांचों बोलियों के विविध गीत भी इस अंक में समाहित हैं, जिससे यह अंक समग्रता समेटे हुए है। गीतों में परदेसी न आये - गीता शुक्ला ‘गीत’ (बघेली), दुइ बूँद आँसु - विनय विक्रम सिंह ‘मनकही’ (अवधी), आज विदा भई मुनियां की - डॉ कृष्ण कुमार नेमा ‘निर्झर’ (बुंदेली), सुरता आथे - धनराज साहू (छत्तीसगढ़ी), माथे अंचरा जोगवलीं - डॉ कमलेश राय (भोजपुरी।
ग़ज़लों में विनय मिश्र ‘प्रांजल’ (बघेली), डॉ. अशोक ‘अज्ञानी’ (अवधी), पूरनचन्द्र गुप्ता (बुन्देली), शिव ‘निश्चिन्त’ (छत्तीसगढ़ी) सुभाष पाण्डेय ‘संगीत’ (भोजपुरी) गजलें हैं।
शिव ‘निश्चिन्त’ की छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल के ये कुछ शेर देखिए-
जियत आदमी देख जिन होगे भइया।
सुमत के ये रद्दा कठिन होगे भइया।
कुँवारा हे भिंदोल अब ले बिचारा, ये मेचका के कबछिन लगिन होगे भइया।
जे टूरी के नयना मया बान छोड़िस, त टूरा के मन ह हरिन होगे भइया।
इसी तरह कुछ शेर सुभाष पाण्डेय ‘संगीत’ की भोजपुरी के -
आजु पहिले पहिल, कुछ नफा हो गइल।
नैन मिलते, दरद सब दफा हो गइल।
न सुनाई सुनाई बताईं रहीं मनगुमे, जिंदगी के, इहे फलसफा हो गइल।
जान के जान से, जान जुड़ि के रहे, आशिकी में, इहे तोहफा हो गइल।
प्रीत के आँखि पर, जबसे चश्मा चढ़ल, जे रहे बेवफा, बावफा हो गइल।
ये ग़ज़लें अन्य भाषाओं की ग़ज़लों से कहीं भी काम नहीं ठहरती हैं। इनमें वही संवाद और रवानी है जो हिंदी उर्दू की ग़ज़लों में रहती है।
इस प्रकार “बघेली अंजोरा” का यह अंक पांचों बोलियों - बघेली, अवधी, बुन्देली, छत्तीसगढ़ी एवं भोजपुरी की प्रतिनिधि रचनाओं का सुंदर पिटारा है, जिसमें पांचों भौगोलिक क्षेत्रों की सोंधी मिट्टी की महक समाई हुई है जिसे उनके शब्दों के द्वारा अनुभव किया जा सकता है। यूं भी क्षेत्रीय बोलियां किसी क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक पहचान, समृद्ध परंपराओं और लोक-संस्कृति की संवाहक होती हैं। ये न केवल आपसी संवाद को सहज और आत्मीय बनाती हैं, बल्कि स्थानीय ज्ञान, साहित्य, और इतिहास को पीढ़ियों तक संरक्षित रखती हैं। सामाजिक एकता, अस्मिता और भाषाई विविधता के लिए इनका महत्व अत्यंत व्यापक है। इस अंक में संगीत सभी रचनाएं अपनी अपनी बोलियां से न केवल परिचय कराने में सक्षम है बल्कि दूसरी बोली बोलने वाले पाठक के लिए भी एक नई बोली से जुड़ने का अवसर प्रदान करती हैं। जब एक ही ज़िल्द में विभिन्न बोलियों की रचनाएं संग्रहित रहेंगी तो स्वाभाविक है कि अपनी बोली की रचना को पढ़ने के उपरांत दूसरी बोली की रचना पर भी ध्यान जाएगा तथा उसे पढ़ने और समझने का मन स्वाभाविक रूप से करेगा। यह कोई बलात प्रयास नहीं है अपितु सहज आग्रह है, जो रचना स्वयं ही करती है।
किसी भी बोली की अपनी एक जातीय पहचान होती है। यह जातीय पहचान ही उस बोली को अन्य बोलियों से अलग कर के स्वतंत्र अस्तित्व का स्वामी बनाती है। प्रत्येक बोली की अपनी एक भूमि होती है जिसमें वह पलती, बढ़ती और विकसित होती है। इस जातीय पहचान को बनाए रखना साझा दायित्व होता है। बोलियों के हित में “बघेली अंजोर” का संपादन एवं प्रकाशन करने हेतु इसके प्रधान संपादक डॉ. राम गरीब पाण्डेय ‘विकल’ बधाई के पात्र हैं। इस पत्रिका को पढ़कर उनके इस प्रयास को समर्थन दिया जाना चाहिए।
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