Wednesday, April 6, 2022

चर्चा प्लस | 6 अप्रैल का काला दिवस और दांडी मार्च | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
6 अप्रैल का काला दिवस और दांडी मार्च 
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
       भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेज सरकार ने भांति-भांति के कानून देश की जनता पर लादने का प्रयास किया था क्योंकि अंग्रेज सरकार जानती थी कि आर्थिक चोट सबसे गंभीर होती है। रोलेट एक्ट भी ऐसा ही एक कानून था। जिसका सत्याग्रहियों द्वारा 6 अग्रैल को ‘‘काला दिवस’’ मना कर पुरज़ोर विरोध किया गया। इस काले दिवस ने न केवल भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष को एक नई दिशा दी बल्कि समूची दुनिया को अन्याय के विरोध का एक नया तरीका सिखा दिया।  
इन दिनों, हम भारतवासी अपनी ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ मना रहे हैं। यह महोत्सव उन सभी की स्मृतियों को समर्पित है, जिन्होंने देश को स्वतंत्रता दिलाने में अपना योगदान दिया। साथ ही, देश को एक स्वतंत्र देश के रूप में नवीन व्यवस्थाएं दीं। हमारे देश के प्रधान मंत्री, श्री नरेंद्र मोदी जी ने 12 मार्च, 2021 को साबरमती आश्रम, अहमदाबाद से ‘दांडी मार्च’ को हरी झंडी दिखाकर आज़ादी के अमृत महोत्सव का उद्घाटन किया था। यह समारोह स्वतंत्रता की हमारी 75 वीं वर्षगांठ से 75 सप्ताह पहले शुरू हुआ और 15 अगस्त, 2023 को समाप्त होगा। किन्तु इसी दांडी मार्च में 6 अप्रैल की तारीख को सत्याग्रहियों द्वारा ‘काला दिवस’ (ब्लैक डे) घोषित किया गया था।
जिस रोलेट एक्ट के बारे में हम अपनी इतिहास की किताबों में पढ़ते हैं वह रोलेट एक्ट भारत में उभर रहे राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने के लिए बनाया गया कानून था। यह कानून सन् 1919 में सर सिडनी रोलेट की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशों के आधार पर बनाया गया था। इसीलिए इसका नाम पड़ा रोलेट एक्ट। इस कानून के लागू होने से भारत स्थित अंग्रेज सरकार को यह अधिकार प्राप्त हो गया था कि किसी भी भारतीय को बिना मुकदमा चलाए तथा बिना सुनवाई के जेल में बंद कर सकती थी। इस कानून के अंतर्गत अपराधी ठहराए जाने वाले व्यक्ति को उसके विरुद्ध मुकदमा दर्ज करने वाले का नाम जानने का अधिकार भी समाप्त कर दिया गया। इस तानाशाहीपूर्ण कानून के लागू होते ही समूचे देश में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। इस कानून के विरोध में हड़तालें, प्रदर्शन और जुलूस का आयोजन किया जाने लगा।
महात्मा गांधी भी नागरिक अधिकारों का हनन करने वाले इस एक्ट के विरोध में आ खड़े हुए। 24 फरवरी, 1919 को महात्मा गांधी ने रोलेट एक्ट के विरोध में सत्याग्रह प्रारम्भ करने की घोषणा की। सत्याग्रह शपथ-पत्र पर महात्मा गांधी ने सर्वप्रथम हस्ताक्षर किए। वे इस नागरिकों की स्वतंत्रता, न्याय एवं मौलिक अधिकारों के हनन करने वाले कानून के विरुद्ध थे।
इसी तरह भारत में नमक उत्पादन और वितरण परे अंग्रेजों का एकाधिकार था। कानूनों के माध्यम से, भारतीयों को स्वतंत्र रूप से नमक बनाने या बेचने पर रोक लगा रखी थी, और इसके कारण भारतीयों को नमक महंगा खरीदना पड़ता था। नमक पर भारी रूप से कर लगाया जाता था, जिसे अक्सर आयात किया जाता था। इसने बहुत से भारतीयों को प्रभावित किया, जो लोग गरीब थे,वो इसे खरीदने की क्षमता नहीं रखते थे।
30 मार्च, 1919 की तिथि पूरे देश में एक साथ हड़ताल के लिए तय की गयी। बाद में किन्हीं कारणवश यह तिथि बदल कर 6 अप्रैल, 1919 कर दी गयी। सभी लोगों को तिथि परिवर्तन की समय पर सूचना नहीं मिल पाने के कारण कुछ स्थानों पर 30 मार्च को भी विरोध प्रदर्शन किए गये।
6 अप्रैल, 1919 को रोलेट एक्ट के विरोध में ‘काला दिवस’ मनाया गया। उस दिन वल्लभ भाई के नेतृत्व में अहमदाबाद में एक विशाल जुलूस निकाला गया। उन्होंने एक विशाल जनसभा को भी सम्बोधित किया। उन्होंने अपने भाषण में रोलेट एक्ट को अमानवीय ठहराया और इसे वापस लिए जाने की सरकार से मांग की। 6 अप्रैल की सुबह, गांधी और उनके अनुयायियों ने मिलकर समुद्र के किनारे पर नमक को मुट्ठी भर उठाया, इस प्रकार तकनीकी रूप से “उत्पादन” नमक और कानून तोड़ दिया, और गांधीजी ने सभी देश वासियों को नमक बनाने की आज्ञा दी। इसी दिन वल्लभ भाई ने महात्मा गांधी की सरकार द्वारा जब्त की गयी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज और सर्वोदय’ को सार्वजनिक रूप से विक्रय के लिए जनता के समक्ष रखा। यह भी सरकार के विरोध का एक तरीका था।
दूसरे दिन सरकार से अनुमति लिए बिना ‘सर्वोदय पत्रिका’ का गुजराती में प्रकाशन आरम्भ कर दिया।
उन्हीं दिनों दिल्ली में हिन्दू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे। चारों ओर आतंक व्याप्त हो गया। लोग परस्पर एक-दूसरे को मारने-काटने पर उतारू हो रहे थे। जब महात्मा गांधी को यह समाचार मिला तो वे चिन्तित हो उठे। उन्होंने वल्लभ भाई को विचार-विमर्श के लिए बुलाया।
‘‘वल्लभ, तुमने सुना कि दिल्ली में लोग किस प्रकार एक-दूसरे को मार-काट रहे हैं?’’ महात्मा गांधी ने वल्लभ भाई से पूछा।
‘‘जी हां, मैंने भी सुना।’’ वल्लभ भाई ने कहा।
‘‘नहीं, ऐसा नहीं होना चाहिए!’’ महात्मा गांधी विह्नल होकर बोल उठे।
‘‘हां, यह त्रासद है। लोगों को स्वयं पर नियंत्रण रखना चाहिए।’’ वल्लभ भाई दुखी स्वर में बोले।
‘‘हां, हिंसा का मार्ग हमें कहीं नहीं ले जाता है, सिवा अपनों के रक्तपात के।’’ महात्मा गांधी विचारपूर्ण स्वर में बोले।
‘‘मैं लोगों को समझाने का प्रयास कर रहा हूं।’’ वल्लभ भाई पटेल ने कहा।
‘‘मुझे जाना होगा उन्हें रोकने।’’ महात्मा गांधी ने गम्भीर स्वर में कहा।
‘‘क्या आपका वहां जाना सुरक्षित होगा?’’ वल्लभ भाई चिन्तित होते हुए बोले।
‘‘सुरक्षित हो या न हो, जहां मेरे अपने लोग एक-दूसरे का गला काट रहे हों, वहां मैं जरूर जाऊंगा ताकि उन्हें ऐसा करने से रोक सकूं।’’ महात्मा गांधी ने कहा।
‘‘अपने स्थान पर आप मुझे दिल्ली जाने दीजिए। मेरी अपेक्षा आपकी सुरक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है।’’ वल्लभ भाई ने आग्रह किया।
‘‘नहीं, तुम्हें, यहीं अहमदाबाद में ही रुकना होगा। यहां भी स्थिति बिगड़ सकती है।’’ महात्मा गांधी ने कहा।
‘‘जैसा आप कहें।’’ वल्लभ भाई ने महात्मा गांधी के आग्रह को स्वीकार करते हुए कहा।
इसके बाद दूसरे दिन महात्मा गांधी दिल्ली के लिए चल पड़े। सरकार जानती थी कि यदि महात्मा गांधी दिल्ली पहुंच जाएंगे तो उनके समर्थक भी दिल्ली की ओर रुख करेंगे। रोलेट एक्ट की ओर से ध्यान हटाने में दंगे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। अतः सरकार ने महात्मा गांधी को दिल्ली पहुंचने से पहले ही गिरफ्तार कर लिया।
महात्मा गांधी को बंदी बनाए जाने की सूचना जैसे ही अहमदाबाद पहुंची, वहां दंगे भड़क उठे।
10 अप्रैल, 1919 को अहमदाबाद में भीषण दंगे हुए। महात्मा गांधी और वल्लभ भाई दोनों जानते थे कि इन दंगों के पीछे अंग्रेज सरकार का हाथ है। वल्लभ भाई यह भी जानते थे कि इन दंगों के समाचारों से महात्मा गांधी को अपार कष्ट होगा। इसीलिए वल्लभ भाई अपने साथी डाॅ. कानूनगो के साथ दंगे शांत कराने निकल पड़े। वे नहीं चाहते थे कि दंगों में लोग हताहत होते रहें और उनके रक्त की नदियां बहती रहें। यदि ऐसा होता रहता तो महात्मा गांधी को बहुत दुःख पहुंचता।
वल्लभ भाई पटेल ने अपने प्राणों की चिन्ता किए बिना दंगाइयों के बीच पहुंचकर उन्हें समझाया और शांत करने का अथक प्रयास किया। इसके विपरीत सरकार ने वल्लभ भाई और डाॅ. कानूनगो को ही दंगे भड़काने का दोषी ठहराया।
सत्याग्रह शपथ-पत्र पर हस्ताक्षर करने के कारण वल्लभ भाई को नोटिस दिया गया, ‘‘क्यों न आपके वकालत करने पर रोक लगा दी जाए।’’
सर चिमनलाल सीतलवाड़ वल्लभ भाई की ओर से न्यायालय में उपस्थित हुए। उनकी पैरवी पर न्यायालय ने वल्लभ भाई को चेतावनी देकर क्षमा कर दिया। सरकार के इस नाटक की परवाह न करते हुए वल्लभ भाई ने अहमदाबाद दंगे में पकड़े गए अभियुक्तों की ओर से न्यायालय में पैरवी की। वह अंतिम अवसर था जब वल्लभ भाई वकीलों वाला काला लबादा पहनकर न्यायालय में उपस्थित हुए थे। उन्होंने दंगे के तथाकथित अभियुक्तों की सफलतापूर्वक पैरवी की।
दांडी मार्च, जिसे नमक मार्च और दांडी सत्याग्रह के नाम से भी जाना जाता है, मोहनदास करमचंद गांधी के नेतृत्व में एक अहिंसक सविनय अवज्ञा आंदोलन था। इसे 12 मार्च, 1930 से 6 अप्रैल, 1930 तक ब्रिटिश नमक एकाधिकार के खिलाफ कर प्रतिरोध और अहिंसक विरोध के प्रत्यक्ष कार्रवाई अभियान के रूप में चलाया गया। गांधीजी ने 12 मार्च को साबरमती से अरब सागर तक दांडी के तटीय शहर तक 78 अनुयायियों के साथ 241 मील की यात्रा की गई, इस यात्रा का उद्देश्य गांधी और उनके समर्थकों द्वारा समुद्र के जल से नमक बनाकर ब्रिटिश नीति की अवहेलना करना था। यह आंदोलन दुनिया के इतिहास में अपने आप में एक अनूठा आंदोलन था। इस आंदोलन ने विरोध का एक नया तरीका दुनिया के सामने रखा और ‘काला दिवस’ को इतिहास के पृष्ठ पर सदा के लिए अंकित कर दिया।
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(06.04.2022)
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Tuesday, April 5, 2022

पुस्तक समीक्षा | 18 समीक्षाएं गोया 18 आख्यान | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


प्रस्तुत है आज 05.04.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखिका डॉ सुजाता मिश्र के समीक्षा संग्रह "18 समीक्षाएं" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
18 समीक्षाएं गोया 18 आख्यान
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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समीक्षा संग्रह - 18 समीक्षाएं
लेखिका     - डाॅ. सुजाता मिश्र
प्रकाशक    - अमन प्रकाशन, डाॅ. पन्नालाल साहित्याचार्य मार्ग, जवाहरगंज वार्ड, सागर (म.प्र.)
मूल्य      - 200 रुपए
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हिन्दी साहित्य के प्रख्यात आलोचक डाॅ नामवर सिंह कहते थे कि ‘‘आलोचना अथवा समीक्षा करते समय कृति के कलेवर पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, कृतिकार के ओहदे पर नहीं।’’ बड़ी मार्के की बात है ये। रचना सृजित करने वाला व्यक्ति किसी भी जाति, धर्म, वर्ग अथवा आर्थिक स्थिति का हो सकता है, महत्व उसका नहीं अपितु उसके लेखकीयकर्म का होता है। कई बार समीक्षक आवश्यकता से अधिक कठोर हो कर पुस्तक की समीक्षा करते हैं, इस बात को भूल कर कि जो उनकी दृष्टि में अनुपयोगी है, उसका महत्व किसी और की दृष्टि में उपयोगी हो सकता है। प्रत्येक नवोदित लेखक एक कोमलतापूर्ण सलाह, उचित मार्गनिर्देशन तथा प्रोत्साहन का भी अधिकारी होता है। नवोदित लेखकों में से ही तो श्रेष्ठ और वरिष्ठ लेखक सामने आते हैं। 
नुक्ताचीं खूब करो, याद रहे ये लेकिन
चांद में दाग, तो सूरज में तपन होती है।
इस जहां में नहीं होता है मुकम्मल कोई
फूल के साथ भी कांटों की चुभन होती है।
- मेरे विचार से यही वह बुनियादी बात है जिसे एक समीक्षक को हमेशा याद रखना चाहिए। उसे याद रखना चाहिए कि वह कोई अंतिम जज नहीं है की पुस्तक पर अपनी समीक्षा रूपी निर्णय सुना कर अपनी कलम तोड़ दे। किसी भी कृति का असली निर्णयाक, असली समीक्षक उसका पाठक वर्ग होता है। समीक्षक तो पुस्तक और पाठक के बीच एक सेतु का कार्य करता है। बस विशेषता यही होती है कि उसमें समीक्षक अपनी निजी टिप्पणी भी शामिल करने की छूट रखता है। यह सारी चर्चा इसलिए समीचीन है कि युवा लेखिका डाॅ सुजाता मिश्र की प्रथम कृति ‘‘18 समीक्षाएं’’ समीक्ष्य पुस्तक के रूप में मेरे सामने है। बड़े जतन से डिज़ाइन किया गया कव्हर पुस्तक के कलेवर की कलात्मक झलक देता है। क्योंकि कव्हर में अंकित ‘‘18’’ के अंक में उन सभी 18 पुस्तकों के नाम हैं जिनकी समीक्षाएं इस पुस्तक में निहित हैं। सादगी भरा किन्तु आकर्षक कव्हर और पुस्तक के भीतर मौज़ूद हैं वे अठारह समीक्षाएं जो डाॅ. सुजाता मिश्र ने की हैं। यह उनकी पहली पुस्तक है और पहली पुस्तक समीक्षाओं की पुस्तक होना सुजाता की साहित्यिक दृष्टि, अपेक्षाएं एवं आग्रह से परिचय कराने के लिए पर्याप्त है। वस्तुतः डाॅ सुजाता ने अपनी मौलिक दृष्टि से समीक्षाएं की हैं। उन्होंने अपना दृष्टिकोण अपनी इस पुस्तक के प्राक्कथन में इन शब्दों में स्पष्ट किया है कि - ‘‘आमतौर पर पुस्तकीय ज्ञान और व्यावहारिक ज्ञान को पृथक-पृथक करके देखा जाता है, लेकिन साहित्य की विद्यार्थी रहते हुए अभी तक मैंने जो कुछ पढ़ा समझा (साहित्य और साहित्येत्तर) है, अपने आसपास के समाज को जितना देखा-जाना है, उसके आधार पर मुझे लगता है कि पुस्तकीय ज्ञान और व्यावहारिक ज्ञान एक दूसरे के पूरक हैं। पुस्तकीय ज्ञान के बिना सामाजिक व्यवहार की समझ विकसित नहीं हो सकती है। आज के इस सिमटते समाज में जहां रिश्ते-नाते विलुप्त से होते जा रहे हैं, बौद्धिक और व्यक्तित्व विकास के लिए अध्ययन आवश्यक शर्त हो जाती है। जितना ज़्यादा हम पढ़ते जाते हैं उतना ही ज़्यादा हम सीखते जाते हैं इतिहास को, राजनीति को, समाज को, व्यक्ति को, तमाम सांसारिक रिश्तों को और सबसे ज्यादा खुद को। जो किताबें हमारे मन को छूती हैं, चेतना को जगाती हैं, वही किताबें हमारे व्यक्तित्व का, हमारे जीवन मूल्यों का निर्माण भी करती हैं। किताबें हमारे अंतर्मन को मांजती हैं, शायद इसीलिए किताबों को सबसे अच्छा मित्र कहा जाता है। लेकिन क्या केवल अच्छी पुस्तकों को पढ़ना ही पर्याप्त है? नहीं! ज़रूरी है कि कुछ भी हमने पढ़ा हो उस पर चिंतन करें, उसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं पर सोचें जो सीखा उसे अपने भीतर उतार लें और अनावश्यक छोड़ दें।’’
डॉ सुजाता आगे लिखती हैं कि ‘‘यह पुस्तक एक प्रयास है मेरी अब तक की चुनिंदा समीक्षाओं को संकलित करने का। इस संग्रह में मैंने उन 18 पुस्तकों को चुना है जिन्होंने बतौर समीक्षक मुझे प्रभावित किया साथ ही मुझे कुछ नया सीखने के लिए प्रेरित किया।’’
डॉ. सुजाता ने जिन 18 पुस्तकों को समीक्षा के लिए चुना और उनकी समीक्षा की, वे हैं- है प्रो एसएल भैरप्पा की ‘‘आवरण’’, आशुतोष राणा की ‘‘रामराज्य’’, मीनाक्षी नटराजन की ‘‘अपने-अपने कुरुक्षेत्र’’, डॉ मनोहर अगनानी की ‘‘अंदर का स्कूल’’, श्री भगवान सिंह की ‘‘गांव मेरा देश’’, सूर्यनाथ सिंह की ‘‘नींद क्यों रात भर नहीं आती’’, अरुणेंद्र नाथ वर्मा की ‘‘जो घर फूंके आपना’’, ओम भारती की ‘‘स्वागत अभिमन्यु’’, नीलिमा चैहान एवं अशोक कुमार पांडे की ‘‘बेदाद ए इश्क रुदाद ए शादी’’, राजकुमार तिवारी की ‘‘कुमुद पंचर वाली’’, अग्नि शेखर की ‘‘जलता हुआ पुल’’, आनंद कुमार शर्मा की ‘‘कभी यह सोचता हूं मैं’’ अशोक मिज़ाज बद्र की ‘‘किसी किसी पर गजल मेहरबान होती है’’ तथा ‘‘अशोक मिजाज की चुनिंदा गजलें’’, डॉ मनीषचंद्र झा की ‘‘गीतगीता’’, वीरेंद्र प्रधान की ‘‘कुछ कदम का फासला’’, डॉ प्रतिभा सिंह परमार राठौर की ‘‘शब्द ध्वज विशेषांक’’, चंचला दवे की ‘‘गुलमोहर’’ एवं डॉ वर्षा सिंह की ‘‘ग़ज़ल जब बात करती है’’। यह सभी पुस्तकें विविध विधाओं की हैं। इनमें उपन्यास भी हंै और काव्य संग्रह भी हैं, कहानी संग्रह भी है और ग़ज़ल संग्रह भी हैं। इनमें से अधिकांश पुस्तकें मेरी नज़रों से गुज़री है। मैंने उन्हें पढ़ा है। कुछ की मैंने भी समीक्षा की है तो कुछ की भूमिका लिखी है, कुछ के लोकार्पण की मैं सहभागी बनी हूं। जैसे सूर्यनाथ सिंह की पुस्तक ‘‘नींद क्यों रात भर नहीं आती’’ का विश्व पुस्तक मेले में जब लोकार्पण किया गया था तो उसमें मैत्रेई पुष्पा, गोपेश्वर सिंह, प्रेम जन्मेजय, महेश दर्पण, वीरेन्द्र यादव के साथ मैं भी सहभागी थी। सूर्यनाथ सिंह एक संज़ीदा लेखक हैं और उनकी यह पुस्तक विशेष अर्थवत्ता पूर्ण है। मीनाक्षी नटराजन कि ‘‘अपने-अपने कुरुक्षेत्र’’ महाभारत महाकाव्य पर आधारित है, जबकि ओम भारती की पुस्तक ‘‘स्वागत अभिमन्यु’’ कथा संवाद करती है। डॉ मनोहर अगनानी की पुस्तक ‘‘अंदर का स्कूल’’ एक संस्मरणात्मक पुस्तक है जिसकी भूमिका लिखने का मुझे अवसर प्राप्त हुआ और जिसके कारण इस पुस्तक का मैंने प्रकाशन पूर्व ही गहराई से अध्ययन किया था। इसी प्रकार राजकुमार तिवारी की ‘‘कुमुद पंचरवाली’’ एक उपन्यास है जो स्त्री विमर्श का आग्रह करता है। आनंद कुमार शर्मा की पुस्तक ‘‘कभी सोचता हूं मैं’’ कविता संग्रह है तो अशोक मिज़ाज की पुस्तकें ‘‘किसी किसी पर ग़ज़ल मेहरबान होती है’’ और ‘‘...चुनिंदा गजलें’’ गजलों के संग्रह हैं। ‘‘गीतगीता’’ श्रीमद्भगवद्गीता का सरल भाषा में काव्यानुवाद अनुवाद है, वहीं ‘‘कुछ कदम का फासला’’ वीरेंद्र प्रधान का काव्य संग्रह है। ‘‘गुलमोहर’’ चंचला दवे का काव्य संग्रह है तो ‘‘ग़ज़ल जब बात करती है’’ डॉ वर्षा सिंह का ग़ज़ल संग्रह है। चूंकि डाॅ. वर्षा सिंह मेरी बड़ी बहन थीं, इसलिए मुझे इस संग्रह के प्रत्येक शेर के सृजन के दौरान उन्हें सृजित होते देखने और महसूस करने का अवसर मिला। यह सभी 18 पुस्तकें मैंने भी पढ़ी हैं इसलिए जब डॉ. सुजाता की ‘‘18 समीक्षाएं’’ पुस्तक मेरे सामने आई तो इन पुस्तकों के प्रति लेखिका के दृष्टिकोण को समझने में मुझे बहुत सुगमता हुई। इस संग्रह में कश्मीर में किए गए अमानवीय व्यवहार पर आधारित अग्नि शेखर की पुस्तक ‘‘जलता हुआ पुल’’ पर भी डाॅ. सुजाता ने अपनी जो समीक्षा शामिल की है उसमें उनके व्यक्तिगत विचार बहुत अर्थपूर्ण हैं।
यह पुस्तक इस बात का स्पष्ट संकेत करती है कि डॉ. सुजाता प्रत्येक उस पुस्तक की कथावस्तु अथवा विषय वस्तु का सूक्ष्मता से आकलन करती हैं, जिसे वे पढ़ती हैं। वे सरसरी तौर पर पुस्तक पढ़ कर उस पर टिप्पणी कर देना वे उचित नहीं समझती हैं। वे पुस्तक में कही गई बातों के मर्म को अपनी विशेष आकलन दृष्टि से देखती हैं तौलती है और तब उस पर गंभीरता से टिप्पणी करती हैं। डॉ. सुजाता की भाषाई पकड़ सुदृढ़ है। वे इस बात को जानती हैं कि कहां किन शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए, जिससे समीक्ष्य पुस्तक पर समुचित प्रकाश पड़ सके। लेखिका के पास एक सशक्त मौलिक विवेचनात्मक दृष्टि है। वे साहित्य क्षेत्र में अभी युवा हैं, इसलिए कहीं-कहीं कुछ अधिक कठोरता से भी तर्क दे प्रस्तुत कर देती हैं। वे स्पष्टवक्ता हैं और अपने निजी विचारों का समावेश करने में वे तनिक भी नहीं हिचकती हैं। जब किसी पुस्तक की समीक्षा की जाती है तो उसमें कई बार समीक्षक के लिए जरूरी हो जाता है कि वह अपने पूर्वाग्रह को, अपने निजी दृष्टिकोण को परे रखकर तटस्थता से यह देखें कि पुस्तक में क्या कहा गया है, क्यों कहा गया है और किस दृष्टिकोण से कहा गया है। अपने निजी विचारों, पूर्वाग्रहों एवं धारणाओं को परे रखकर पुस्तक की समीक्षा करना कठिन कार्य होता है जिसमें सुजाता जल्दी ही निष्णात हो जाएंगी। मुझे विश्वास है कि वे एक प्रखर समीक्षक के रूप में हिंदी साहित्य में अपना स्थान बनाएंगी क्योंकि उनमें साहित्य के प्रति एक विशेष समझ है। साहित्य के प्रति उनका रुझान, उत्सुकता एवं आग्रह रेखांकित किए जाने योग्य है। वे समीक्षा करते हुए मानो आख्यान गढ़ती हैं। इस दृष्टि से सुजाता की इस पुस्तक में उनकी अठारह समीक्षाएं अठारह आख्यान की भांति हैं।
डाॅ. सुजाता मिश्र एक प्रखर दृष्टि रखने वाली अत्यंत संभावनाशील लेखिका हैं। उनकी पुस्तक ‘‘18 समीक्षाएं’’ साहित्य के प्रति उनके गंभीर सरोकार का प्रमाण है। वे किसी परंपरागत फॉर्मेट में पुस्तकों की समीक्षा  नहीं करती हैं वरन अपनी समीक्षा में पुस्तकों की विषयवस्तु का आकलन, विश्लेषण एवं समसामयिकता को भी रेखांकित करती हैं। समीक्षा पुस्तकों में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक अत्यंत महत्वपूर्ण है क्यों कि यह एक साथ विविध विधाओं की अठारह पुस्तकों से परिचित कराती है।                
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Monday, April 4, 2022

डॉ (सुश्री) शरद सिंह द्वारा पुस्तक लोकार्पण

"नुक़्ताचीं खूब करो, याद रहे ये लेकिन
चांद में दाग़, तो सूरज में तपन होती है।
इस जहां में नहीं होता है मुकम्मल कोई
फूल के साथ भी कांटों की चुभन होती है।
    - यही वह बुनियादी बात है जिससे एक समीक्षक को हमेशा याद रखना चाहिए उसे याद रखना चाहिए कि वह कोई अंतिम जज नहीं है की पुस्तक पर अपनी समीक्षा रूपी निर्णय सुना कर अपनी क़लम तोड़ दे। किसी भी कृति का असली निर्णय असली समीक्षक उसका पाठक वर्ग होता है। समीक्षक तो पुस्तक और पाठक के बीच एक सेतु का कार्य करता है। बस विशेषता यही होती है कि उसमें समीक्षक अपनी निजी टिप्पणी भी शामिल करने की छूट रखता है। सुजाता मिश्र की प्रथम कृति का लोकार्पण वनमाली सृजनपीठ और श्यामलम संस्था के संयुक्त आयोजन में होना सुखद है। सुजाता मिश्रा एक प्रखर दृष्टि रखने वाली अत्यंत संभावनाशील लेखिका हैं। उनकी पुस्तक "18 समीक्षाएं" साहित्य के प्रति उनके गंभीर सरोकार का प्रमाण है। वे किसी परंपरागत फॉर्मेट में पुस्तकों की समीक्षा ही नहीं करती हैं वरन अपनी समीक्षा में पुस्तकों की विषयवस्तु का आकलन, विश्लेषण एवं समसामयिकता को भी रेखांकित करती हैं। अभी तो उन्होंने अपनी यात्रा आरंभ की है अभी उन्हें बहुत आगे तक जाना है। मुझे पूरा विश्वास है कि एक दिन में हिंदी साहित्य जगत में दैदीप्यमान नक्षत्र की भांति चमकती हुई दिखाई देंगी।" - विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ (सुश्री) शरद सिंह ने यानी मैंने अपने ये विचार व्यक्त किए। 
        अवसर था होटल मैजेस्टिक प्लाज़ा में श्यामलम संस्था, वनमाली सृजन पीठ एवं महिला काव्य मंच के संयुक्त तत्वावधान में युवा लेखिका सुजाता मिश्र की प्रथम पुस्तक "18 समीक्षाएं" का लोकार्पण समारोह दिनांक 03.04.2022 को। कार्यक्रम की अध्यक्षता की प्रो आनंद प्रकाश त्रिपाठी अध्यक्ष संस्कृत विभाग डॉ हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर, मुख्य अतिथि थे श्री संतोष सहगौरा कुलसचिव डॉ हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर तथा विशिष्ट अतिथि थी वनमाली सृजन पीठ सागर इकाई की अध्यक्ष एवं आपकी यह मित्र डॉ (सुश्री) शरद सिंह। कार्यक्रम का कुशल संचालन किया कवयित्री डॉ अंजना चतुर्वेदी तिवारी ने। स्वागत भाषण दिया श्यामलन संस्था के अध्यक्ष श्री उमाकांत मिश्र जी ने तथा आभार प्रदर्शन किया पाठक मंच के सागर इकाई संयोजक आर के तिवारी जी ने। 
      समूचे आयोजन के दौरान डॉ सुजाता मिश्रा के जीवन साथी श्री माधव चंद्र का उत्साह एवं उमंग ने सभी के मन को छू लिया। 18 पुस्तकों की डॉ सुजाता मिश्र द्वारा की गई समीक्षाओं के इस संग्रह के लोकार्पण के अवसर पर डॉ मनीष झा, डॉ आराधना झा, डॉ  शशि कुमार सिंह, डॉ  आशुतोष मिश्रा, आदि बड़ी संख्या में साहित्यमनीषी उपस्थित थे।
🚩 प्रिय सुजाता को उनकी प्रथम पुस्तक के लोकार्पण पर पुनः हार्दिक बधाई 🌷❤️🌷

Sunday, April 3, 2022

प्लीज़ कॉल मी हनी | व्यंग्य | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नवभारत

#ThankYou #Navbharat 🌷
नवभारत में प्रकाशित | व्यंग्य
प्लीज़ काॅल मी हनी!
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘अप्सरा उर्वशी! आजकल मेनका दिखाई नहीं दे रही है? मैंने भी उसे कहीं नहीं भेजा, फिर वह कहां व्यस्त है?’’ देवराज इन्द्र ने अपने सिंहासन पर पहलू बदलते हुए उर्वशी से पूछा। 
‘‘बाॅस, फिलहाल बड़े चुनाव निपट गए। अब तो मेनका वेकेशन पीरियड एन्ज्वाय कर रही होगी।’’ उर्वशी ने लापरवाही से उत्तर दिया।
‘‘लेकिन ये तो गलत है। मैं देवराज इन्द्र हूं और मुझसे अनुमति लिए बिना छुट्टी मनाना, सारासर गलत है। यह मेरे दरबार के नियमों का सरासर उल्लंघन है।’’ देवराज इन्द्र की भृकुटी तन गई। वे एक टिपिकल बाॅस की तरह व्यवहार पर उतर आए।
‘‘लेखापाल को बुलाऊं क्या?’’ उर्वशी ने पूछा। दरअसल वह भी मेनका पर तनिक क्रोधित थी कि वह अकेली ही छुट्टी मनाने चली गई।
‘‘लेखापाल को क्यों? क्या मेनका के बदले अब मैं उसका नृत्य देखूंगा?’’ देवराज इन्द्र खिसिया कर बोले।
‘‘नृत्य कराने के लिए नहीं बाॅस! मेनका के लिए शोकाॅज़ नोटिस बनवाने के लिए।’’ उर्वशी ने कहा।
‘‘उसकी कोई ज़रूरत नहीं है। आजकल हमारे दरबार के संदेशवाहकों को भी पृथ्वी की हवा लग गई है। वे चार दिन में नोटिस पहुंचाएंगे। उस पर कहीं मेनका ने उन्हें उत्कोच का लालच दे दिया तो कह देंगे कि मेनका का उन्हें पता ही नहीं लगा। क्या मैं जानता नहीं हूं कि जब से कुछ सिफारशी पृथ्वीवासी मेरे दरबार में काम करने लगे हैं तब से यहां भी भ्रष्टाचार मच गया है। मुझे भी अब सफ़ाई अभियान चलाना होगा वरना मेरी भी दशा तेजी से कालकवलित होते राजनीतिक दलों जैसी हो जाएगी।’’ देवराज इन्द्र ने उर्वशी के सामने अपनी चिंता व्यक्त की।
‘‘यू आर राईट बाॅस।’’ उर्वशी ने कहा।
‘‘बाॅस इज़ आॅलवेज़ राईट!’’ इन्द्र ने अकड़ कर कहा। फिर दूसरे ही पर झुंझला कर बोल उठा,‘‘ये क्या, तुम अप्सराओं के चक्कर में मैं देवभाषा यानी अपनी भाषा संस्कृत भूल कर अंग्रेजी बोलने लगा हूं। यह मेरे लिए लज्जाजनक बात है।’’
‘‘इसमें लजाने वाली कोई बात नहीं बाॅस! पृथ्वीलोक में तो हिन्दी, संस्कृत के पक्ष में लम्बे-लम्बे भाषण देने वाले महानुभाव भी अपने बच्चों को सिर्फ़ अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाना पसंद करते हैं। खाने के दांत कुछ और और दिखाने के दांत कुछ और। खैर, बाॅस! फिर क्या सोचा आपने मेनका के बारे में?’’ उर्वशी ने चर्चा को विषयांतर होने से रोक दिया।
‘‘सोचना क्या है? मैं अभी उसे मानस संदेश भेजता हूं। वह जहां कहीं भी होगी उसे तुरंत यहां उपस्थित होना होगा।’’ देवराज इन्द्र ने कहा।
‘‘बाॅस, पृथ्वीवासी भी मानस संदेश का फामूर्ला ढूंढने में जुटे हुए हैं। मुझे तो यह सोच कर भय होता है कि जब अभी मोबाईल सेवा का सहारा ले कर एक-दूसरे का जीना मुश्क़िल किए रहते हैं तो जब उन्हें मानस संदेश सेवा हासिल हो जाएगी तो फिर तो तबाही मचा देंगे।’’ उर्वशी ने कहा।
‘‘ठीक है, ठीक है। पृथ्वीवासी जानें और उनका काम जाने। लेकिन तुम लोग अपनी भाषा पर ध्यान दो।’’ देवराज इन्द्र ने कहा।
‘‘हम लोग ऐसा नहीं कर सकती हैं। क्योंकि जब आप हमें ड्यूटी पर पृथ्वी के भारतीय भू-भाग में  भेजते हैं तो हमें वहां अंग्रेजी में ही बात करनी पड़ती है। हिन्दी भी चल जाती है मगर संस्कृत तो बिलकुल नहीं चलती है। सो क्षमा करें बाॅस! हम आपकी इस आज्ञा का पालन नहीं कर सकेंगी। अगर हमने आपकी यह आज्ञा मानी तो भारतीय भू-भाग में पहुंच कर आपकी दूसरी आज्ञाओं का पालन नहीं हो सकेगा।’’
देवराज इन्द्र कोई उत्तर दे पाते इससे पहले मेनका वहां उपस्थित हो गई।
‘‘व्हाय आर यू काॅल मी, बाॅस?’’ मेनका ने इठलाते हुए पूछा।
‘‘ये तुमने क्या फटेचिटे कपड़े पहन रखे हैं? कहीं कटीली झाड़ियों में उलझ गई थीं क्या?’’ देवराज इन्द्र ने मेनका की कटी-फटी जींस-टाॅप की ओर इशारा करते हुए कहा।
‘‘अरे नहीं बाॅस! ये तो पृथ्वीलोक के सबसे फैशनेबुल कपड़े हैं। वह तो आपने शीघ्र उपस्थित होने का संदेश दिया इसलिए मैं कपड़े नहीं बदल पाई और पृथ्वीलोक के कपड़ों में ही यहां चली आई।’’ मेनका ने कहा और फिर पूछा,‘‘आपने बताया नहीं कि मुझे इतनी जल्दबाज़ी में क्यों बुलाया? कोई इमरजेंसी?’’
‘‘नहीं कोई इमरजेंसी नहीं! लेकिन तुम लोग यहां स्वर्ग लोक में अंग्रेजी मत बोला करो। तुम लोगों की संगत में मेरी भाषा भी भ्रष्ट हुई जा रही है...।’’
‘‘बट माई बाॅस!’’ मेनका ने देवराज इन्द्र को टोक कर कुछ कहना चाहा। जिस पर देवराज इन्द्र क्रोधित हो कर बोले-‘‘शटअप! अप्सरा मेनका तुम भूल रही हो कि मैं देवराज इन्द्र हूं और तुम एक अदना सी अप्सरा। जो मैं कहूंगा वहीं यहां होगा।’’ 
‘‘माई फुट! मैं भी देखती हूं कि यहां तो आप अपनी चला लेंगे मगर वहां पृथ्वीलोक में तपभंग कराने का काम फिर किससे कराएंगे? क्यों कि अगर आपने मेरी बात नहीं मानी तो मैं अभी, इसी समय रिज़ाइन कर दूंगी। पृथ्वीलोक में बहुत-सी कंपनियां हैं, राजनीतिक भी और कार्पोरेट जगत में भी जहां मेरी और उर्वशी की बहुत डिमांड है।’’ मेनका ने भाव दिखाते हुए कहा।
‘‘अप्सरा मेनका, क्या आशय है तुम्हारा?’’ देवराज इन्द्र ने चकित होते हुए पूछा।
‘‘पहले तो आप हमें ये अप्सरा-वप्सरा कहना बंद करें। ये आउटडेटेड हो गया है।’’ मेनका ने आपत्ति की।
‘‘तुम अप्सराओं को मैं अप्सरा न कहूं तो और क्या कहूं?’’ देवराज इन्द्र को कुछ समझ में नहीं आया।
‘‘आप हमें हनी कह कर पुकारिए!’’ मेनका ने कहा।
‘‘यस, काॅल अस हनी!’’ उर्वशी ने भी तुरंत समर्थन दिया। ठीक वैसे ही जैसे विरोधी संासद, विधायक भी अपना वेतन-भत्ता बढ़वाने के लिए एक सुर में बोलने लगते हैं। 
‘‘लेकिन हनी क्यों?’’ देवराज इन्द्र ने पूछा।
‘‘आजकल पृथ्वीलोक में तप भंग करने, अपनी सुंदरता के जाल में फंसाने वालियों को हनी और उनके जाल को हनीट्रेप कहा जाता है। आप भी हमसे यही काम कराते आए हैं। इस ऋषि का तप भंग कर दो, उस ऋषि को अपने रूपजाल में फंसा लो, तो हम लोग भी तो हनी कहलाएंगी।’’ मेनका ने देवराज इन्द्र को समझाया।
‘‘ठीक है अप्सरा मेनका...।’’
‘‘नो-नो! प्लीज़ काॅल मी हनी!’’ मेनका ने टोका।
‘‘ओके हनी मेनका डियर! रिज़ाइन मत दो! तुम लोगों के बिना मेरी सत्ता कैसे चलेगी?’’ देवराज इन्द्र अनुनय-विनय करते हुए कहा।
‘‘ठीक है, तो फिर डील! आप हमें हमारे पृथ्वीलोक के अनुरुप कपड़े पहनने दें, पृथ्वीलोक के अनुरुप भाषा बोलने दें, कुछ दिनों का वेकेशन दें फिर देखिए कि हम आपके कितने विरोधियों के ट्रेप करती हैं। क्यों उर्वशी, मैंने ठीक कहा न?’’
‘‘हंड्रेड परसेंट ट्रू!’’ उर्वशी मेनका के प्रति अपने गुस्से को भूल कर उसका समर्थन करने लगी। जैसे हर बुद्धिमान राजनेता अपनी पार्टी को धता बता कर दमदार पार्टी में शामिल हो जाता है। यह अवसरवादिता भी उसने पृथ्वीलोक में ही सीखी थी।
‘‘लेकिन मैंने तो सुना है कि हनीट्रेप वाली हनियां पैसा कमाने के लिए भी जाल बिछाती हैं।’’ देवराज इन्द्र ने कहा।
‘‘हां, आपने ठीक सुना है। पर वे लोस्टैंडर्ड की हनीज़ होती हैं, जस्ट लाईक काॅलगर्ल। लेकिन हमारी जैसी हनीज़ हाई प्रोफाईल काम करती हैं, सिर्फ पाॅलिटिक्स और कार्पोरेट के लिए। बट ओके! मैं अपना वेकेशन बरबाद नहीं होने दे सकती हूं। मैं जा रही हूं छुट्टी मनाने। हां, अगर कोई इमरजेंसी आ जाए तो आप मुझे काॅल कर सकते हैं, बाॅस!’’ मेनका ने कहा और वहां से अंतध्र्यान हो गई।
‘‘तो बाॅस, मेनका तो चली गई और मैं भी अब वेकेशन पर जा रही हूं।’’ उर्वशी ने कहा।
‘‘ठीक है अप्सरा उर्वशी!’’ देवराज इन्द्र ने मन मार कर कहा। क्योंकि जो वे युगों-युगों से हनीट्रेप कराते आ रहे हैं वह इन्हीं अप्सराओं के दम पर। इसलिए इन्हें खुश रखना ही होगा। उन्होंने फिर दोहराया,‘‘ठीक है अप्सरा उर्वशी, तुम भी छुट्टी मना लो।’’
‘‘थैंक यू बाॅस! बट नो अप्सरा, प्लीज़ काॅल भी हनी!’’ उर्वशी ने भी मेनका की नकल में कहा और वहां से अंतध्र्यान हो गई। वहीं, देवराज इन्द्र अपने सूने दरबार को टुकुर-टुकुर देखते रह गए।
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03.04.2022
 #व्यंग्य #चिन्ता_दिवस #नवभारत #डॉशरदसिंह #डॉसुश्रीशरदसिंह #शरदसिंह #हिंदीसाहित्य #हिंदीव्यंग्य #satire #hindi_satire #drsharadsingh          

Article | Climate Change and its Impacts: Hollywood aware but We? | Dr (Ms) Sharad Singh | Central Chronicle

⛳Friends ! Today my article "Climate Change and its Impacts: Hollywood aware but We?" has been published in the Sunday edition of #CentralChronicle. Please read it.  
🌷Hearty thanks Central Chronicle🙏
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Article | Climate Change and its Impacts: Hollywood aware but We?

-    Dr (Ms) Sharad Singh
Writer, Author & Social Activist
Blogger - "Climate Diary Of Dr (Ms) Sharad Singh"

While we consider cinema only as a means of entertainment, Hollywood has been making cinema on climate change for the last several decades. The sole purpose of these films is to show the impact of climate change and to warn of possible future dangers. It is not that a person entering the film industry does not want to earn money. Cinema makers on climate change also want to make money because their cinema costs not less than other commercial cinema, but sometimes more. Yet they take risks because they want to warn everyone about the dire effects of climate change. They are aware. Maybe more aware than us.

"Climate change is real. It is happening right now, it is the most urgent threat facing our entire species and we need to work collectively together and stop procrastinating." actor, environmentalist and philanthropist Leonardo Di Caprio said.
We can talk here about a few Hollywood movies based on climate change impacts.  'Racing Extinction' - It is based on evidence of flights like ocean acidification, rising temperatures, and CO2 emissions. In the 'Interstellar' movie, struggling to survive due to climatic, Dust Bowl-like conditions, the movie follows a group of astronauts in search of a new home for mankind, ultimately traveling through a wormhole to do so. FernGully: The Last Rainforest (1992)
The Day After Tomorrow (2004), An Inconvenient Truth (2006), The Day the Earth Stood Still (2008), Beasts of the Southern Wild (2012), Snowpiercer (2014), mother (2017), Chasing Coral (2017), The Hottest August (2017), Don't Look Up (2021). Few other movies are Twister, Geostorm, 2012 and Best Tsunami Movies are Deep Impact (1998), The Perfect Storm (2000), Tidal Wave (2009), Hereafter (2010), Immortals (2011). 
Several Showy Hollywood blockbusters have imagined a world devastated by climate change. In “The Day After Tomorrow” (2004), the most famous example of a “cli-fi” disaster film, the planet is beset by super storms, hurricanes and tsunamis. A paleoclimatologist must save his son as the globe is plunged into a new ice age. The basic plot of Day After Tomorrow is the beginning of an ice age over a large part of America, including New York, due to global warming. A group of students who had gone to New York to participate in a competition take shelter in a library to save their lives. Where precious books are burnt to escape from the cold. In the film 2012, the entire earth is hit by a tsunami due to global warming. Continents sink. Large ships built in secret by China give space to the world's most powerful and capitalists, while the general public is left to die. In this film, while on one hand the horrific effects of climate change have been shown, the cruel faces of administration and capitalism have also been exposed. It also draws attention to how the dangers of climate change are allowed to grow by capable countries in the pursuit of becoming superpowers.
Environmental devastation is the backdrop to dystopian stories, too—think of the desert world of “Mad Max: Fury Road”, the smog-filled city-scapes of “Blade Runner 2049” (2017) or the icy tundra of “Snowpiercer” (2013). Climate change may also be the Mac Guffin that forces characters to abandon Earth and seek a new home elsewhere, as in “Avatar” (2009) or “In Lincoln’s words still resonate to all of us here today: “We will be remembered in spite of ourselves. The fiery trial through which we pass will light us down, in honor or dishonor, to the last generation… We shall nobly save, or meanly lose, the last best hope of earth.” That is our charge now – you are the last best hope of Earth. We ask you to protect it. Or we – and all living things we cherish – are history." Actor and Director Leonardo Di Caprio spoke at the United Nations Summit.  
Leonardo Di Caprio, an Academy Award-winning actor, has been an outspoken advocate for environmental issues throughout much of his career. In 1998, at the age of 24, Di Caprio established his foundation with the mission of protecting the Earth’s last wild places and implementing solutions to build a more harmonious relationship between humanity and the natural world. Through grant making, public campaigns, and media projects, Di Caprio has worked to bring attention and funding to the protection of biodiversity, ocean and forest conservation, and climate change. The Leonardo Di Caprio Foundation supports over 35 innovative conservation projects around the world that protect fragile ecosystems and key species. Di Caprio also serves on the board of several environmental protection organizations including the World Wildlife Fund, the Natural Resources Defense Council, and International Fund for Animal Welfare, Pristine Seas and Oceans 5. He is also an advisor on The Solutions Project, an organization dedicated to scaling up the adoption of clean, renewable energy. In 2014, Di Caprio was honored with the prestigious Clinton Global Citizen Award for his philanthropic work. The Secretary-General designated Di Caprio as a Messenger of Peace with a special focus on climate change ahead of the 2014 Climate Summit, aimed at catalyzing and galvanizing climate action towards a global climate agreement in 2015.
Leonardo Di Caprio said he'd been looking to do a film about the climate crisis for a while but finding the right approach had proved difficult, until now.  “You either do some existential journey through a person's lifetime, or you make it a catastrophe movie where New York freezes over,” Di Caprio said.
How many actors in our country India have serious concerns on climate change and its impact? How many movies have we made on climate change? Do we have any data competitively with Hollywood? No, we have not because our Bollywood is not interested in this topic. Unfortunately our Filmmaker and directors centralize mainly on crime and political issues. Perhaps they thought that topics of environment and climate change are risky or they do not want to work hard. I can not understand that will climate change not affect them? They also live on this earth. Like Leonardo Di Caprio, no influential actor of our Bollywood even thinks of raising a strong voice about global warming until the government makes him the brand ambassador of climate change or environmental affairs or a commercial agency has contracted him. It's shameful for us.
Today we are all familiar with changing climate change. As a responsible citizen, it is the responsibility of us and every section to think seriously on this subject and pay attention to its publicity, so that an atmosphere of discussion can be created in this direction. Media and film industry can intervene in this matter much better, because today it has reach to every section. Looking at the reach of cinema, we can say that if a film on climate change comes today, it can get a good response from the people.                                  
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 (03.04.2022)
#ClimateCahnge  #MyClimateDiary
#KnowYourClimate
#KnowYourEnvironment
#unclimatechange
#nature #Environment

डॉ (सुश्री) शरद सिंह द्वारा रेल यात्रियों की जल सेवा

भयावह कोरोनाकाल के बाद 02 अप्रैल 22 को एक बार फिर श्रीराम सेवा समिति सागर द्वारा रेलवे स्टेशन प्लेटफार्म नंबर एक पर निशुल्क पेयजल व्यवस्था का शुभारंभ किया गया इस अवसर पर मैं भी एक सेवादार के रूप में वहां उपस्थित हुई। मैंने अपने विचार रखें तथा रेल यात्रियों की जल सेवा की। आज जब पीने का पानी बोतलों में बंद करके 15 से ₹20 तक की कीमत में बेचा जाता है ऐसी स्थिति में घड़े का शुद्ध शीतल जल निशुल्क उपलब्ध कराकर यात्रियों को विशेष सुविधा प्रदान की जाती है। विगत 24 वर्षों से चली आ रही परंपरा लगभग दो वर्ष के व्यवधान के बाद एक बार फिर आरंभ हो गई है । अब लगभग ढाई महीने चौबीसों घंटे निरंतर जल सेवा का कार्य चलता रहेगा। 
      आज शुभारंभ के अवसर पर गांधीवादी चिंतक श्री रघु ठाकुर जी समाजसेवी श्री राजेंद्र यादव जी पूर्व महापौर सुश्री मनोरमा गौर सहित नगर के अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित थे श्री राम सेवा समिति के युवा, कर्मठ अध्यक्ष भाई  श्री विनोद तिवारी ने सभी का स्वागत किया तथा निरंतर सेवा कार्य का आह्वान किया। इस दौरान हमने जिन अपनों को खोया उनके लिए श्रद्धांजलि भी अर्पित की गई। उनकी कमी सभी को महसूस हो रही थी। किंतु स्वर पीड़ा से सेवाकार्य अधिक बड़ा होता है अतः हम सभी उत्साह से सेवा कार्य में जुटे रहे। - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
#जलसेवा 
#श्रीरामसेवासमिति 
#SagarRailwayStation
#डॉसुश्रीशरदसिंह 
#DrMissSharadSingh

Friday, April 1, 2022

जो भावनाओं को उद्दीप्त करके विचारों को रसमय बना दे वही काव्य है। - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

"जो भावनाओं को उद्दीप्त करके विचारों को रसमय बना दे वही काव्य है। अभिव्यक्ति की सशक्त शैली काव्य को मंच प्रदान करके हिन्दी लेखिका संघ महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है जिसके लिए उसकी प्रशंसा की जानी चाहिए। इस मंच ने कई कवयित्रियों की छुपी प्रतिभा को न केवल सामने लाया है बल्कि उन्हें कवयित्री के रूप में प्रतिष्ठा भी प्रदान की है। लेखिका संघ को अब कथालेखन, लघुकथा लेखन, ललित निबंध लेखन आदि पर वर्कशॉप भी करने चाहिए। इससे इस मंच से जुड़ी महिला रचनाकारों में विविध विधाओं के प्रति चिंतन का विस्तार होगा।" अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में मैंने (डॉ सुश्री शरद सिंह ने) ये विचार प्रकट किए तथा एक ग़ज़ल भी सुनाई।
      अवसर था कल शाम 31 मार्च 2022 को कांची रेस्टोरेंट में हिन्दी लेखिका संघ मध्यप्रदेश भोपाल की सागर इकाई द्वारा आयोजित काव्य गोष्ठी का। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि थे पाठक मंच सागर इकाई के संयोजक श्री आर के तिवारी एवं डॉ नलिन जैन नलिन। विशिष्ट अतिथि थी डॉ विजय लक्ष्मी दुबे 'विभा'। विशिष्ट आमंत्रित अतिथियों में श्यामलम संस्था के अध्यक्ष श्री उमाकांत मिश्र एवं डॉ प्रदीप पांडे थे। आयोजक थी हिंदी लेखिका संघ की इकाई अध्यक्ष श्रीमती सुनीला सराफ तथा संचालन किया डॉ छाया चौकसे जी ने। इकाई की सभी सदस्यों ने अपनी उपस्थिति से आयोजन को आत्मीय वातावरण में सफल बनाया।
हार्दिक आभार #हिन्दीलेखिकासंघ , सागर 🙏
हार्दिक आभार प्रिय बहन सुनीला सराफ जी 🌷