Tuesday, May 7, 2024

पुस्तक समीक्षा | ये नवगीत विगत धारा से आगे का आयाम रचते हैं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 07.05.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई डॉ श्यामसुंदर दुबे जी के नवगीत संग्रह  "ठौर-कुठौर" की समीक्षा।
-------------------
पुस्तक समीक्षा     
ये नवगीत विगत धारा से आगे का आयाम रचते हैं
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
-------------------
नवगीत संग्रह - ठौर-कुठौर
कवि         - श्यामसुंदर दुबे
प्रकाशक     - बिम्ब-प्रतिबिम्ब पब्लिेकेशंस, शाॅप नं.4, ट्रेकऑन कोरियर, फगवाड़ा, पंजाब-01
मूल्य        - 350/-
-------------------
हिन्दी साहित्य जगत में डाॅ. श्यामसुंदर दुबे एक स्थापित नाम हैं। वे संस्कृतिविद हैं, प्रकृति के संवादी हैं और गद्य-पद्य दोनों विधा में समान अधिकार से सृजन करते हैं। वे अपने ललित निबंधों के लिए भी जाने जाते हैं। डाॅ. श्यामसुंदर दुबे ने नवगीत भी लिखे हैं। एक श्रेष्ठ नवगीतकार के रूप में भी उनकी पहचान है। ‘‘ठौर-कुठौर’’ उनका पांचवां नवगीत संग्रह है। इसमें वे नवगीत भी हैं जो कोरोनाकाल के बाद लिखे गए, इसलिए उनकी भावभूमि मार्मिक एवं हृदयस्पर्शी है। नवगीत के उद्भव का उद्देश्य भी यही रहा है कि उसमें यथार्थ का अधिक समावेश हो किन्तु सम्पूर्ण कोमलता के साथ।
नवगीत को आधुनिक युग की काव्य धारा कहा जाता है। सन 1948 में अज्ञेय के संपादन में ‘‘प्रतीक’’ का ‘‘शरद अंक’’ आया, जिसमें अघोषित रूप से नवगीत विद्यमान थे। उस समय जो नए गीत आ रहे थे, वे पारम्परिक गीतों के मानक को तोड़ रहे थे और अपना अलग विधान रच रहे थे। सन 1958 में राजेन्द्र प्रसाद सिंह के संपादन में ‘‘गीतांगिनी’’ का प्रकाशन हुआ। ‘‘गीतांगिनी’’ में राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने गीत की इस नूतन विधा को ‘‘नवगीत’’ का नाम दिया। इसी के साथ इस विधा का तात्विक विवेचन भी किया गया। राजेद्र प्रसाद सिंह की ‘आईना’ पत्रिका ने नवगीत को प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। नवगीत अपने विकास के साथ-साथ अपनी कहन के विषय स्वयं निर्धारित करता गया। इसमें जहां ग्राम्य जीवन की विषमताओं का आरेखन था वहीं नगरीय यांत्रिकता भरी विडम्बनाओं का विवरण था। शंभुनाथ सिंह, रामदरश मिश्र, देवेद्र शर्मा इंद्र, कुंवर बेचैन, अनुप अशेष, वीरेद्र मिश्र, जहीर कुरेशी, महेश्वर तिवारी, ठाकुरप्रसाद सिंह, उमाकांत मालवीय, बुद्धिनाथ मिश्र, श्रीरामसिंह शलभ, नचिकेता, राजेन्द्र गौतम, नईम आदि वे नवगीतकार रहे जिन्होंने इस विधा को शिखर पर पहुंचा दिया। वीरेन्द्र आस्तिक के शब्दों में -‘‘अर्थात्मक दृष्टि से आज नवगीत गद्य कविता से किसी मायने में कम नहीं है।’’
डाॅ. श्यामसुंदर दुबे के नवगीतों में जीवन की विषमताओं एवं कठोरता का चित्रण है, किन्तु लालित्य भी है। वे अपनी बात सहजता से कहते हैं। उनके गीतों में आंतरिक तथा बाह्य प्रति संवेदनाओं का एक संतुलित स्वरूप दिखाई देता है। ‘‘ठौर-कुठौर’’ में श्यामसुंदर दुबे के संग्रहीत 77 नवगीतों में से कुछ की चर्चा बानगी के रूप में की जा सकती है। जैसे संग्रह का पहला नवगीत है ‘‘इस सुरंग में’’। इस नवगीत में कर्ज़, मंहगाई और लाचारी का वह दृश्य है जो सेाचने को विवश कर देता है कि हम किस वातावरण में जी रहे हैं, जहां भूख है, संत्रास है और छल-कपट है-
दिन भारी है
आरी के भीतर आरी है
कैसी ये पहरेदारी है
रातों लूटे चोर, दिनों में जेब कतराता
मिठबोला बेपारी है!
पुरखिन पूंजी
हाटों बिक गई
सूने घर की भूख बड़ी है
यह कैसी इमदाद
ऊंट के मुंह में जीरा जैसी
इजलासों में भीड़ खड़ी है!

गरीबी किसी जाति, धर्म अथवा समाज को नहीं चुनती है अपितु वह सिर्फ़ उस घर में कब्ज़ा किए रहती है जहां विपन्नता हो। फिर भी घोर विपन्नता में भी पास्परिक संबंधों की उष्मा उम्मीद की किरण और खुशी का एक कण संजोने की ताकत रखती है। ‘‘घर हिलता है’’ में इसी भाव को देखिए-
रिश्तों के पर्दों को
अब्बू की सुई जैसे सिल रही
घर की दीवार
इधर वर्षों से हिल रही
नींव का पत्थर क्या खिसका है
छप्पर की छाती कर्कश आवाजों की
छैनी से छिल रही !
पौर के कोने तक
कुछ धूप अभी बाकी है,
तमाम कालिखों के बीच
झिलमिल-सी बिटिया, दिया बाती है!

डाॅ. श्यामसुंदर दुबे अपने नवगीतों में उन नबीन बिम्बों को चुनते हैं जो हमारे बीच, हमारे समाज में मौजूद हैं और हम कहीं न कहीं उन्हीं की तरह अपने आप को जी कर खुद को पहचान सकते हैं। ‘‘धुनिया’’ शीर्षक नवगीत में कवि ने एक धुनिया यानी रुई धुनने वाले की तरह जीवन जीने का आह्वान करते हैं ताकि विषमताओं के कारण मन में जमते जा रहे नैराश्य को धुन कर अलग किया जा सके। नवगीत का एक अंश देखिए-
तुम ही कुछ कहो
और केवल हम सुने
धुनिया बन
अपने ही भीतर की रूई को धुनें
रूई जो/प्रवादों के फाहों में
लिपट-लिपट गर्द और गुबार हुई,
अपनी ही आबरू
विचारों की पींजन में
चिन्दी-चिन्दी उडी और तार-तार हुई!
कौन सी/दिशा में मुड़ें
कब किससे हम जुड़ें
दोगले समय में आओ हम राह चुनें!

जब बुंदेलखंड के आधुनिक साहित्य की बात आती है तो बांदा निवासी चर्चित कवि केदारनाथ अग्रवाल के स्मरण के बिना चर्चा अधूरी रहती है। वहीं बुंदेलखंड की चर्चा आते ही इस भू-भाग से किसानों और श्रमिकों के पलायन का ज्वलंत बिन्दु भी जाग उठता है। श्यामसुंदर दुबे ने केदारनाथ का स्मरण करते हुए किसानों और श्रमिकों के पलायन की समस्या को बड़ी सहजता से प्रस्तुत किया है। ‘‘सूना है बुंदेलखंड’’ शीर्षक का यह पूरा नवगीत अपने-आप में अद्भुत है, जिसका एक अंश है -  
अब होते जो
अगर कवि जी
तो किससे कहते
करबी काटो/पत्थर तोड़ो
भरी भुजाओं से/मजदूरों
अड़ियल पथ के रूख को मोड़ो ।
सूना है बुंदेलखंड
मजदूर-किसानों से
हुआ पलायन इतना भारी
इक्के-दुक्के यहां गांव में अब वे दिखते।
श्यामसुंदर दुबे के नवगीतों में विषय की विविधता एवं संवेदनाओं का विस्तार है। वे समष्टि से व्यष्टि और व्यष्टि से समष्टि तक विचरण करते हैं। गोया वे भावनाओं के रेशे-रेशे को अपने नवगीत में बुन देना चाहते हैं। ‘‘आसक्तियों का अपरंपार’’ इसका एक अच्छा उदाहरण है- ‘‘समय की धार ने/कुछ चिह्न छोड़े/जीवन-नदी के इन पठारी तटों पर/अब बचा है-रेत का विस्तार!/बांचता हूं/इन्हें चश्मा चढ़ाकर/आंख पर/किसी पक्षी की कथा के/चित्र उभरे/एक टूटी पांख पर/नापता आकाश था जो/पेड़ जिसको न्यौतते थे/व्याघ का शर चुभा था जिसे/वह क्रौंच में ही था/सिमट आया चिलाचिलाती रेत पर/जिसका ब्यथा संसार।’’
वस्तुतः ‘‘ठौर-कुठौर’’ नवगीत संग्रह में डाॅ श्यामसुंदर दुबे के नवगीत एक ऐसा संसार रचते हैं जहां भावनाओं की गहराई है और जीवन का सच है। इसमें भाषाई सौम्यता है, निर्झरणी के प्रवाह-सी शैली है तथा वैचारिक गाम्भीर्य है। ये नवगीत भावनाप्रधान होते हुए भी बौद्धिक चेतना से ओतप्रोत हैं। ये नवगीत विगत धारा से आगे का आयाम रचते हैं। निःसंदेह यह नवगीत संग्रह हिन्दी काव्य को समृद्ध करने वाली कृति है।                    -------------------------
#पुस्तकसमीक्षा  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #bookreview #bookreviewer  #आचरण  #DrMissSharadSingh

Monday, May 6, 2024

टॉपिक एक्सपर्ट | पत्रिका | कछू करियो, ने करियो, मतदान जरूर करियो | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली में
..................................
टाॅपिक एक्सपर्ट
कछू करियो, ने करियो, मतदान जरूर करियो
    - डॉ (सुश्री) शरद सिंह
      जे सई के अपने इते भौत कमी आए। मुतके काम ऐसे डरे के कभऊं-कभऊं लगत आएं के जे अपन की जिनगी में तो कभऊं पूरे ने हुइयें। कछू काम चल रए, सो उनकी स्पीड देख के चिटियां सोई शरमां जाएं। उत्तई नईं, गजब की बात तो जे आए के बनी-बनाई सड़क खोदबे को काम में कोनऊं अलाली नईयां। अभईं रजाखेड़ी रोड पे गई रई, सो देखी के रोड खुदी डरी। पूछबे पे पतो परो के उते पाईप लाईन डरने। सो, का प्लानिंग वारे भैया हरें साजी रोड बनबे खों तके बैठे हते, जो पैले पाईप लाईन ने डार पाए। जे सोई सांची आए के अपने इते अच्छे औ सस्ते इलाज के लाने बाहरे भगने परत आए। जे सोई सई आए के अपने इते रेलगाड़ियां कम आएं। चीलगाड़ी मने हवाई जहाज की तो बातई छोड़ो। अपने इते के तला की का कएं, ऊपे बनो कारीडोर फटो जा रओ। ऊपे दरारें दिखन लगीं। सो, इते समस्याएं तो मनो कुल्ल आएं, इत्ती के गिनाबे बैठो सो उंगरियां दुखन लगें।
     मनो, ईको मतलब जे नोईं के अपन मतदान करबे खों ने जाएं। एक भैया मिले सो कैन लगें के कोनऊं कछू नईं करत, हम काए जाएं मतदान करबे? अब जे का बात भई? अरे, अपन ओरन खों गुस्सा है अधिकारियन पे, अपने नेता हरों पे सो तब तो मतदान करबे और पौंचो चाइए। अपनों मतदान को पावर दिखा दओ चाइए। जोन उम्मीदवार ठीक लगे, उनको जिताओ औ अपनों पावर दिखाओ। घरे बैठ के गरियाबे से कछू ने हुइए। जेई तो टेम आए बताबे को के आप का चात हो? सो, हमाई मानो तो कछू करियो, चाए ने करियो, मनो मतदान जरूर करियो। ईसे सबको भलो हुइए।
-----------------------------
Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
#टॉपिकएक्सपर्ट #डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #पत्रिका  #patrika #rajsthanpatrika #सागर  #topicexpert #बुंदेली #बुंदेलीकॉलम 
#मतदानदिवस  #मतदान2024  #मतदानमहादान #मताधिकार #votingday #votingpower  #voting  #voting2024  #मतदानजागरूकता #voters  #VotingAwareness  #letsdoit

Friday, May 3, 2024

डॉ वर्षा सिंह की तृतीय पुण्यतिथि पर डॉ (सुश्री) शरद सिंह द्वारा संजीवनी बालाश्रम में भोजन कराया गया

आज तीसरे वर्ष ... वर्षा दीदी की स्मृति में आज संजीवनी बालाश्रम में बच्चों को भोजन कराया... दीदी को बच्चों से बहुत प्रेम था.... 
  इस बालाश्रम को निराश्रित बच्चों को आश्रय देने के लिए स्व.श्रीमती सत्यभामा अरजरिया जी ने आरम्भ किया था। उनके बाद से उनकी बहू श्रीमती प्रतिमा अरजरिया उनके दायित्व का बखूबी निर्वहन कर रही हैं।
       मुझे यह देखकर सुखद लगा कि वहां रहने वाली कई बच्चियां मुझे पहचानने लगी है और मेरे पहुंचने पर वे बहुत खुश हुईं ... दरअसल, व्यर्थ आडंबर में पढ़ने के बजाय बच्चों को दो पल कघ खुशी देना मुझे ज्यादा अच्छा लगता है क्योंकि मुझे पता है कि यदि दीदी होती तो वे भी यही करतीं।
 🚩 हार्दिक आभार प्रिय बहन प्रतिमा जी 🙏
  🚩हार्दिक आभार दीदी के प्रति सम्मान एवं स्नेह रखने वाले श्री पंकज शर्मा जी, जो  निःस्वार्थ भाव से सदा सहयोग करते हैं 🙏

#डॉसुश्रीशरदसिंह  #DrMissSharadSingh  #VarshaSingh #DeathAnniversary 
#thirddeathannyversary

मेरी दीदी डॉ वर्षा सिंह की तृतीय पुण्यतिथि

03 मई 2021... कोरोना का वह भयानक दौर... 5 दिनों का जीवन संघर्ष... उस दौर का अकेलापन मेरी जिंदगी का अकेलापन बन गया ... यही वह तारीख़ है जिसने मुझसे मेरी वर्षा दीदी को छीन लिया... बस, हर पल यही लगता है कि मुझे उनकी जगह होना चाहिये था... और मेरे बदले उन्हें यहां होना चाहिए था... दुनिया के लिए वे डॉ Varsha Singh थीं... कवयित्री थ़ी... ग़ज़लकार थीं... लेकिन मेरे लिए तो मेरी वह "दीदू" थीं जिनकी उंगली पकड़ कर मैंने चलना सीखा था... जिनसे हंसना, मुस्कुराना सीखा था... आज दीदी के बिना ज़िंदगी... ज़िंदगी नहीं लगती है...
 😢 दीदी! तुम्हारा साक्षात मेरे साथ न होना मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी कमी है... बस, तुम्हारे साथ होने के अहसास के सहारे ज़िंदा हूं...अपनी इस अभागी "बेटू" को याद रखना😞😢🥺
Love you Didu ❤️ 
& Miss you lot 💔
#डॉसुश्रीशरदसिंह #DrMissSharadSingh #VarshaSingh #sister #sisterlove #Memory #brokenheart #missyou #loneliness #DeathAnniversary #ThirdDeathAnnyversary

Thursday, May 2, 2024

बतकाव बिन्ना की | मनो, मतदान करबे के लाने जाइयो जरूर | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
------------------------
बतकाव बिन्ना की
मनो, मतदान करबे के लाने जाइयो जरूर 
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       ‘‘राम-राम बतोले दाऊ! भौत दिनां बाद दिखाने।’’ मैं भैयाजी के इते बैठी बतकाव कर रई हती के इत्ते में उतई बतोले दाऊ आ गए। बतोले दाऊ बी एक अनोखई चीज आएं। उनकी नैया अलगई चलत आए। सबरे दाएं खों जा रए हुइएं, सो बे बाएं खों चल परहें। बाकी बे भौत दिनां बाद मिले।
‘‘हऔ बिन्ना! तनक अपने सासरें चले गए रए। उते हमाए ससुर साब की तबीयत बिगड़ गई रई।’’ बतोले दाऊ ने बताई।
‘‘अब कैसे आएं बे?’’ मैं औ भैयाजी दोई एक संगे पूछ बैठे।
‘‘अब तो ठीक आए। उने नागपुर ले गए रए। उते एक छोटो सो ऑपरेशन भओ औ बे ठीक हो गए।’’ बतोले दाऊ बोले।
‘‘काय को ऑपरेशन?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘अरे कछू नईं, तनक पेट में तकलीफ रई। कछू पथरी-मथरी-सी हो गई रई।’’ बतोले दाऊ ने लापरवाई से कई। मनो, बे ऊ बारे में बतकाव नई करो चात्ते।
‘‘वैसे तुम ठीक टेम पे लौट आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘काय? ठीक टेम को मतलब?’’ बतोले दाऊ ने पूछी।
‘‘ठीक टेम को मतलब जे के अबे मतदान होने, सो तुमाओ नांव तो इतई की वोटर लिस्ट में हुइए। सो तुमें तो इतई वोट देने रैहे। जो उते रैते तो वोट कैसे डार पाते?’’ भैयाजी बोले।
‘‘वोट कां डारने? उते तो बटन दबाने।’’ बतोले दाऊ मों बना के बोले।
‘‘सो ईमें का दाऊ? वोट तो वोट होत आए, चाय कागज की पर्ची डार के देओ, चाय बटन दबा के।’’मैंने बतोले दाऊ से कई।
‘‘औ का।’’ भैयाजी ने मोरो समर्थन करो।
‘‘पर हमें नईं पोसात जो बटन वारो सिस्टम।’’ बतोले दाऊ ने फिर मों बनाओ।
‘‘अरे तुम सोई बेई के बेई रए। अरे, आजकाल सब कछू इलेक्ट्राॅनिक हो गओ, सो तुमें ईवी मशीन से का परेशानी हो रई?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘हमने कई न, के हमें नईं पोसात।’’ बतोले दाऊ ऊंसई बोले।
‘‘पर दाऊ, आप जे सोचो के जे जो आप मोबाईल ले के घूमत आओ बा तो आप खों खूब पोसात आए। मुतके ग्रुपों में भुनसारे से ब्यालू लौं अपनी पोस्टें पेलत रैत हो, सो इते का परेशानी हो रई?’’ मैंने सोई भैयाजी की बात खों आगे बढ़ाओ।
‘‘तुम ओरें हमाए पीछे काए पर गए? हमें नईं पोसात, सो नईं पोसात! बस्स!’’ बोले दाऊ खिजियात भए बोले।
‘‘चलो, मान लओ के तुमें नईं पोसात, तो का मतदान करबे खों ने जैहो?’’ भैयाजी ने पूछी।
‘‘नईं, हम कऊं नई जा रए।’’ बतोले दाऊ तनक अकड़ के बोले।
‘‘जे का बात भई? तुमें बा वोटिंग मशीन पसंद नइयां, सो ईको मतलब जे थोड़ी होने चाइए के तुम मतदान करबे खों ई ने जाओ? तुमाई जे बात अब हमें नईं पोसा रई।’’ भैयाजी खों बतोले दाऊ के विचार जान के भारी अचरज भओ।
‘‘हऔ, जेई समझो।’’ बतोले दाऊ बोले।
‘‘समझो से का मतलब? का कोनऊं और बात बी आए?’’ अबकी बतोले दाऊ से मैंने पूछी।
‘‘अब का बताएं बिन्ना! कए में शरम आउत आए।’’ बतोले दाऊ बोले। उनकी जे बात सुन के अब मोय अचरज भओ के ऐसी कोन सी बात आए जोन को कैबे में दाऊ खों शरम आ रई, औ वो बी मतदान खों ले के?
‘‘अब बताई दो दाऊ! का मोरे सुनबे जोग नइयां? का मैं बाहरे चली जाऊं?’’ मैंने बतोले दाऊ से पूछी।
‘‘अरे नईं-नईं! ऐसी-वेसी वारी बात बी नोंई।’’ बतोले दाऊ हड़बड़ा के बोले।
‘‘सो का बात आए? अब बक बी देओ।’’ भैयाजी तनक फटकारत भए बोले।
‘‘बो का आए के अबे लौं कोनऊं पार्टी को उम्मींदवार हमाए घरे नईं पौंचो, वोट मांगबे। सो हमई काय वोट डारबे जाएं?’’ बतोले दाऊ ने अब असल बात बोली।
‘‘अरे, दाऊ! आप सोई! देख नईं रए के टेम कम आए और एरिया बड़ो आए। अब उम्मींदवार दोरे-दोरे नईं पौंच पा रए तो ईमें बुरौ नई मानो चाइए।’’ मैंने बतोले दाऊ खों समझाई।
‘‘काय बुरौ ने मानें? पांच साल में एक बेरा तो उनकी मों दिखाई को टेम आत आए, औ ई टेम पे बी बे अपनो मों ने दिखाएं तो हमई काएं उनके लाने जाएं, उते लेन से लगें?’’ बतोले दाऊ बमकत भए बोले। उनकी बात में दम दिखानी, सो मैंने कछू ने कई, बाकी भैयाजी काय चुप रैते?
‘‘अरे, उनकी पार्टी वारे सो आहें, तनक गम्म खाओ!’’ भैयाजी ने कई।
‘‘उम्मींदारवार बे आएं, के उनकी पार्टी वारे? संसद में बे जाहें, के उनकी पार्टी वारे? सांसद को भत्ता और पावर उने मिलहे, के उनकी पार्टी वारन खों?’’ बतोले दाऊ ने अपने मन की बात बोलनी शुरू कर दई।
‘‘इत्तो ने सोचो! बे पार्टी के औ अपन ओरन के प्रतिनिधि होत आएं। अब सबरे संसद में तो नईं पौंच सकत। इत्ती निगेटिव बातें ने सोचो।’’ भैयाजी ने बतोले दाऊ खों समझाई।
‘‘काय ने सोचो? ईसे अच्छो तो पार्षद को चुनाव, के ऊमें सबरे उम्मींदवार दोरे पे आ के हाथ जोड़त आएं, पांव परत आएं।’’ बतोले दाऊ बोले।
‘‘हऔ, औ बाद में अपन ओरें उनके दोरे हाथ जोड़त आएं।’’ मैंने हंस के कई। काय से के मोय लगो के बातकाव कछू ज्यादई गंभीर होत जा रई।
‘‘तुम तो मोहल्ला मेंई डरे रओ। अरे, कछू देश-दुनिया की बी सोच लओ करे। जेई चुनाव से तो अपने प्रधानमंत्री लौं तै होत आएं।’’ भैयाजी ने बतोले दाऊ खों फेर के समझाई।
‘‘हऔ! जा तो तुमने सई कई।’’ बतोले दाऊ बोले। अब बे सोच में पर गए।
‘‘सो अब मतदान करने जाहो के नईं?’’ उने सोचत भओ देख के भैयाजी ने पूछी।
‘‘अबे पक्को नइयां! अबे सोचबी।’’ बतोले दाऊ डगमग होत भए बोले।
‘‘अब ईमें सोचने का? जा के बटन दबा आइयो।’’ भैयाजी उने उत्साहित करत भए बोले।
‘‘कोन को बटन दबा आएं? हमने कई ने के अबे लौं कोनऊं हमाए इते नईं आओ।’’ बतोले दाऊ झुंझलात भए बोले।
‘‘जो कोनऊं ठीक समझ में ने आए, सो ‘नोटा’ को बटन दबा आइयो। तुमाए टाईप के कनफुजियाएं लोगन के लाने बा बटन रखो गओ आए।’’ भैयाजी ने सुझाओ दओ।
‘‘अरे दाऊ, अबई से नोटा-मोटा की ने सोचो। जो तुमाए इते कोनऊं ने आए तो जा सोचियो के कोन की पार्टी खों तुम देश को शासन चलाऊत देखो चात आओ। बस, बोई पार्टी खों बटन दबा आइयो।’’ मैंने बतोले दाऊ खों तुरतईं समझाओ। ताकि बे और ने कनफुजियाएं।
‘‘हऔ जे तुमने ठीक कई बिन्ना!’’ बतोले दाऊ अपनी मुंडी हिलात भए बोले। उने मोरी बात जम गई।
‘‘चलो तुमें कछू समझ में तो आई।’’ भैयाजी ने सोई चैन की सांस लई।
सो भैया औ बैन हरों, अपने क्षेत्र के उम्मींदवारों के अपने दोरे आबे औ ने आबे खों ले के संकोच ने करियो। मनो, मतदान करबे के लाने जरूर जाइयो। बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
 -----------------------------   
#बतकावबिन्नाकी  #डॉसुश्रीशरदसिंह  #बुंदेली #batkavbinnaki  #bundeli  #DrMissSharadSingh #बुंदेलीकॉलम  #bundelicolumn #प्रवीणप्रभात #praveenprabhat  #मतदान #मतदान2024 #मतदानदिवस

शून्यकाल | बचपन-विहीन इन बच्चों का क्या दोष है? | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम...      
शून्यकाल
बचपन-विहीन इन बच्चों का क्या दोष है?
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                              
        एक बच्चे की पहचान क्या होती है? यही न, कि वह छोटी अवयस्क आयु का होता है और बड़ों के संरक्षण की उसे आवश्यकता होती है। लेकिन उन बच्चों को क्या माना जाए जो माता-पिता के साथ चौराहों पर भीख मांगते हैं, जो चौराहों पर कंघी, बालपेन जैसी छोटी-छोटी वस्तुएं बेचते हैं, जो भिखारी नहीं हैं किन्तु भिखारियों की तरह धार्मिक स्थलों के आस-पास भीख मांगते हैं या फिर वे जो ढाबों और छोटे होटलों में बरतन धोने का काम करते हैं। कई बार उनकी असली उम्र का नकली प्रमाणपत्र उन्हें कानूनी सहायता के दायरे से बाहर कर देता है। क्या वे बच्चे, बच्चे नहीं हैं?* 
       सन् 1993 में ‘‘न्यूयार्क टाईम्स’’ में न्यूज फोटोग्राफर केविन कार्टर द्वारा खींची गई एक तस्वीर प्रकाशित हुई थी जो सूडान की थी। उस तस्वीर में हृदयविदारक दृश्य था। एक गिद्ध एक कुपोषित मरणासन्न बच्ची को टोह रहा था। गिद्ध उसकी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था। यह तस्वीर सूडान में भुखमरी की भयावह स्थिति बताने के लिए अपने आप में पर्याप्त सबूत थी। इस तस्वीर के लिए फोटोग्राफर केविन कार्टर को पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। लेकिन वहीं दूसरी ओर लोगों ने उसकी इस बात के लिए कटु निंदा की कि उसने फोटोग्राफी तो की लेकिन इंसानीयत नहीं निभाई। उसने उस बच्ची को गिद्ध से बचाने का कोई प्रयास नहीं किया बल्कि उसे तो जल्दी थी अपना वापसी का हवाईजहाज पकड़ने की। केविन को भी अपनी इस भूल का गहरा अपराधबोध हुआ। लोगों को इस बात का अहसास तब हुआ जब पुरस्कार मिलने के तीन माह बाद केविन ने अपराधबोध न सहन कर पाने की स्थिति में आत्महत्या कर ली। उसे भी लगता रहा कि वह बच्ची को बचाने का प्रयास कर सकता था, जो उसने नहीं किया था और एक निर्मम मौत के हवाले कर दिया था।

इसके बाद दुनिया के सामने एक और तस्वीर आई। यह नाईजीरिया के उस बच्चे की तस्वीर थी जिसे उसके समुदाय ने ‘‘शापित’’ मान कर त्याग दिया था। हड्डी का ढंाचा मात्र रह कर वह नग्नावस्था में भूखा-प्यासा भटकता अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा था। तब डेनमार्क निवासी महिला अंजा रिंगरेन लोवेन ने उसे अपनी बाॅटल से पानी पिलाया जिससे उसकी थमती सांसों में गति आई। फिर वह उसे गोद में उठा कर ऐसे लोगों के पास ले गई जो उसका लालन-पालन कर सकें। आज वह बच्चा अच्छा स्वस्थ हो चुका और पढ़ने के लिए स्कूल जाता है। देखा जाए तो उस तस्वीर के बाद पूरी दुनिया ने उसे अपने संरक्षण में ले लिया। अंजा रिंगरेन लोवेन ने अपनी नौकरी छोड़ कर उन बच्चों के लिए जीवन समर्पित कर दिया जिन्हें अंधविश्वास के चलते शापित मान कर त्याग दिया जाता था और वे बच्चे भूख-प्यास से दम तोड़ देते थे। अंजा रिंगरेन लोवेन ने ऐसे बच्चों के लिए एक आश्रम खोला। जिस पहले बच्चे को अंजा ने बचाया था उसकी दशा की अपडेट के तौर पर एक वर्ष पहले उसकी हंसती-खेलती तस्वीर जारी की गई थी ताकि पूरी दुनिया जान सके कि मौत के मुंह में खड़ा वह बच्चा अब एक अच्छी जिन्दगी जी रहा है। सचमुच सभी को अच्छा लगा था उसी तन्दुरुस्ती भरी तस्वीर देख कर।

लेकिन कितने बच्चों की ज़िंदगी बदल पाती है? हम भी अकसर कई स्वयंसेवी संस्थाओं के विज्ञापन देखते हैं जिनमें कुपोषित, दयनीय अवस्था के बच्चों की तस्वीरें दिखा कर सहयोगराशि मांगी जाती है। इनमें कई विज्ञापन चार-पांच वर्ष तक एक ही बच्चे की तस्वीर या वीडियो के साथ चलते रहते हैं। हमें विज्ञापन के रूप में उनकी दशा का अपडेट नहीं दिखाया जाता है कि दी गई सहायताराशि से उस बच्चे की जान बची या नहीं अथवा अब वह किस स्थिति में है? ऐसे बच्चों को भला हम किस श्रेणी में रखेंगे? 

फरवरी 2022 में एनसीपीसीआर ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि राज्यों से प्राप्त जानकारी के अनुसार देश में 17,914 बच्चे सड़कों पर हैं। आयोग के उस आंकड़े के अनुसार इनमें से 9,530 बच्चे सड़कों पर अपने परिवारों के साथ रहते हैं और 834 बच्चे सड़कों पर अकेले रहते हैं। इनके अलावा 7,550 ऐसे बच्चे भी हैं जो दिन में सड़कों पर रहते हैं और रात में झुग्गी बस्तियों में रहने वाले अपने परिवारों के पास लौट जाते हैं। धार्मिक स्थलों से ट्रैफिक सिग्नल तक इन बच्चों में सबसे ज्यादा (7,522) बच्चे 8-13 साल की उम्र के रहते हैं। इसके बाद 4-7 साल की उम्र के 3,954 बच्चे हैं। राज्यवार देखें तो सड़कों पर सबसे ज्यादा बच्चे (4,952) महाराष्ट्र में, इसके बाद गुजरात (1,990) में, तमिलनाडु (1,703), दिल्ली (1,653) और मध्य प्रदेश (1,492) में हैं। यद्यपि अदालत ने इस आंकड़े पर संदेह जताते हुए राज्यों से बेहतर जानकारी देने के लिए कहा था। अदालत ने इन आंकड़ों पर सवाल खड़ा करते हुए कहा था कि सड़क पर बच्चों की अनुमानित संख्या 15 से 20 लाख है और यह सीमित आंकड़े इसलिए सामने आ रहे हैं क्योंकि राज्य सरकारें राष्ट्रीय बाल आयोग के पोर्टल पर जानकारी डालने का काम ठीक से नहीं कर रही हैं। 

अनेक होटल, ढाबे ऐसे हैं जहां बच्चों से काम कराया जाता है। चूंकि यह कानूनी अपराध है अतः उन बच्चों के नकली आयु-सर्टीफिकेट बनवा लिए जाते हैं। इसमें बच्चों के परिजन भी भागीदार होते हैं। उन्हें अपनी जिम्मेदारी नहीं बल्कि बच्चों की कमाई से मतलब रहता है। बात कहने में कठोर है मगर यदि अपने बच्चे का पालन नहीं कर सकते हैं तो उन्हें पैदा कर के उनसे उनका बचपन छीनने का भी उन्हें कोई अधिकार नहीं होना चाहिए। ऐसे बच्चे कभी समझ ही नहीं पाते हैं कि वे कब बच्चे थे और कब बड़े हो गए? इसके साथ ही मुझे याद आया कि यह क्षेत्र तो नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी का है जिन्होंने अपना पूरा जीवन बच्चों के संरक्षण में लगा दिया। ‘‘बचपन बचाओ आन्दोलन’’ के तहत वे विश्व भर के 144 देशों के हजारों बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए कार्य कर चुके हैं। लेकिन यदि माता-पिता और मजदूर मालिक संगठित हो कर छल करें तो इसका हल नहीं निकाला जा सकता है। तमाम सरकारी योजनाओं के बाजजूद यह कड़वा सच आज भी हमारे बीच ऐसे बच्चे बहुसंख्यक मौजूद है।

धार्मिक स्थानों के आस-पास अनेक बच्चे भिखारियों की भांति मंडराते रहते हैं। उन्हें इस तरह ज़िद्दी बना दिया जाता है कि जब तक वे भीख में कुछ पा न जाएं तब तक आपका कपड़ा खींचना या बाजू पर हाथ से टोंहका लगाना बंद नहीं करते हैं। उनके माता-पिता जानते हैं कि छोटे बच्चों को कोई जोर से डांटेगा नहीं, मारेगा नहीं और थक-हार कर कुछ पैसे दे ही देगा। ये ज़िद्दी बच्चे अपनी जिद मनवाने के बाद विजेता की भांति अपने माता-पिता के पास पहुंच कर अपनी आमदनी दिखाते हैं। वे नहीं जानते हैं कि उनकी इस उम्र में उन्हें चौराहों पर जिद भरी विक्रेतागिरी करने के बजाए किसी स्कूल में पढ़ना चाहिए। भले ही सरकारी स्कूल हो। भले ही वहां बहुत अच्छी पढ़ाई न होती हो लेकिन चार अक्षर तो पढ़ ही सकेंगे। मगर उस छोटी-सी उम्र में वे अपने जीवन का अच्छा-बुरा तय नहीं कर सकते हैं और जिन्हें तय करना चाहिए, उन्हें तत्काल के चार पैसे अधिक सुखद लगते हैं। क्योंकि यदि वे कोई और रास्ता जानना चाहते होते तो बच्चों को उनका असली बचपन देने के लिए कुछ तो प्रयास करते। वहीं, उन चौराहों से गुज़रने वाले ‘हम समझदार लोग’ भी यह सब अनदेखा कर देते हैं। हम हमेशा खुद को अपनी ही मुसीबतों से घिरा हुआ पाते हैं। हमें लगता है कि हमारे पास इनके बारे में सोचने का भी समय नहीं है। ऐसे बच्चे इस बात से अनजान रहते हैं कि उनसे उनके बचपन की मासूमीयत छीनी जा रही है। उन्हें हठी बनाया जा रहा है। उन्हें हर तरह के हथकंडे अपना कर कुछ न कुछ हासिल कर लेने की कला में माहिर किया जा रहा है। यह ट्रेनिंग कभी-कभी आगे चल कर उन्हें अपराध जगत में पहुंचा देती है। पकड़े जाने पर मां-बाप भी उनसे पल्ला झाड़ लेते हैं। ऐसे बच्चे अपनों के द्वारा की गई भावनात्मक ठगी के शिकार रहते हैं। ऐसे बच्चों को हम भला किस श्रेणी में रखेंगे?

बच्चे समाज की धरोहर और जिम्मेदारी होते हैं। केवल सरकार, आयोग, स्वयंसेवी संगठन आदि ही इनके लिए उत्तरदायी नहीं है, हम भी इन बच्चों के लिए उत्तरदायी हैं और यह हमें समझना चाहिए। दरअसल हम अपने आप में इतने सिमट गए हैं कि हमें न तो केविन कार्टर की तरह अपराधबोध होता है और न अंजा रिंगरेन लोवेन की तरह हम मदद के लिए कटिबद्ध हो पाते हैं। ऐसे बच्चों की ओर देखने से बचने के लिए हम अपने मोबाईल की ओर देखते हुए खुद को आभासीय दुनिया में धकेल देते हैं। जब मैं अपने देश के कुपोषित और सहायता से दूर या अपने ही माता-पिता के हाथों अपना बचपन गंवाते बच्चों को देखती हूं तो मुझे यह समझ में नहीं आता है कि ऐसे बच्चों को किस श्रेणी में रखा जा सकता है- भिखारी, अनाथ, कुपोषित या फिर कोई और श्रेणी? जरूरी है इस पर विचार करना।    
---------------------------------
#DrMissSharadSingh #columnist #डॉसुश्रीशरदसिंह #स्तम्भकार #शून्यकाल  #कॉलम #shoonyakaal #column #दैनिक  #नयादौर 

Wednesday, May 1, 2024

चर्चा प्लस | स्वजागृति से परे हम जी रहे हैं ब्रांडिंग के दौर में | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
स्वजागृति से परे हम जी रहे हैं ब्रांडिंग के दौर में
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      हमारे चारो ओर बाज़ार का एक संजाल है और इस बाज़ारवाद ने हमें उस दौर में पहुंचा दिया है जहां राष्ट्रीय और मानवीय कर्तव्य भी ब्रांड बन गए हैं। बेटी बचाओ एक ब्रांड है, स्वच्छता मिशन एक ब्रांड है, शौचालय का उपयोग एक ब्रांड है, निर्मलजल एक ब्रांड है और अतुल्य भारत अभियान एक ब्रांड है, तो हम बाज़ारवाद से बाहर कैसे निकल सकते हैं? हर ब्रांड का एक एम्बेस्डर है। वह एम्बेस्डर क्या करता है? वह अपने ब्रांड का विज्ञापन करता है और पैसे कमाता है। क्या कभी सोचा है कि यह दौर हमें किस ओर ले जा रहा है?
      हम आज ब्रांडिग के दौर में जी रहे हैं। हमारे शौच की व्यवस्था से ले कर राज्य, कत्र्तव्य और संवेदनाओं की भी ब्रांंिडग होने लगी है। ब्रांड क्या है? अर्थशास्त्र के अनुसार ब्रांड उत्पाद वस्तु की बाजार में एक विशेष पहचान होती है जो उत्पाद की क्वालिटी को सुनिश्चित करती है, उसके प्रति उपभोक्ताओं में विश्वास पैदा करती है। क्यों कि उत्पाद की बिक्री की दशा ही उत्पादक कंपनी के नफे-नुकसान की निर्णायक बनती है। कंपनियां अपने ब्रांड को बेचने के लिए और अपने ब्रांड के प्रति ध्यान आकर्षित करने के लिए ‘ब्रांड एम्बेसडर’ अनुबंधित करती हैं। यह एक पूर्णरुपेण बाज़ारवादी आर्थिक प्रक्रिया है। यह उत्पाद की वस्तुओं की बिक्री के लिए होता है लेकिन आज हमारे नागरिक कर्तव्य और हमारी संवेदनाएं भी गोया बिक्री की वस्तु हो गई हैं। कमाल की बात यह है कि ब्रांडिग हमारे जीवन में गहराई तक जड़ें जमाता जा रहा है। इसीलिए नागरिक कर्तव्यों, संवेदनाओं एवं दायित्वों की भी ब्रांडिंग की जाने लगी है, गोया ये सब भी उत्पाद वस्तु हों।
    
     आजकल राज्यों के भी ब्रांड एम्बेसडर होते हैं। जबकि ‘‘राज्य एक ऐसा भू भाग होता है जहां भाषा एवं संस्कृति के आधार पर नागरिकों का समूह निवास करता है।’’ - यह एक अत्यंत सीधी-सादी  परिभाषा है। यूं तो राजनीति शास्त्रियों ने एवं समाजवेत्ताओं ने राज्य की अपने-अपने ढंग से अलग-अलग परिभाषाएं दी है। ये परिभाषाएं विभिन्न सिद्धांतों पर आधारित हैं। राज्य उस संगठित इकाई को कहते हैं जो एक शासन के अधीन हो। राज्य संप्रभुता सम्पन्न हो सकते हैं। जैसे भारत के प्रदेशों को ’राज्य’ कहते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार राज्य की उत्पत्ति का एकमात्र कारण शक्ति है। इसके अलावा युद्ध को राज्य की उत्पत्ति का कारण यह सिद्धांत मानता है जैसा कि वाल्टेयर ने कहा है प्रथम राजा एक भाग्यशाली योद्धा था। इस सिद्धांत के अनुसार शक्ति राज्य की उत्पत्ति का एकमात्र आधार है शक्ति का आशय भौतिक और सैनिक शक्ति से है। प्रभुत्व की लालसा और आक्रमकता मानव स्वभाव का अनिवार्य घटक है। प्रत्येक राज्य में अल्पसंख्यक शक्तिशाली शासन करते हैं और बहुसंख्यक शक्तिहीन अनुकरण करते हैं। वर्तमान राज्यों का अस्तित्व शक्ति पर ही केंद्रित है।

    राज्य को परिभाषित करते सामाजिक समझौता सिद्धांत को मानने वालों में थाॅमस हाब्स, जॉन लॉक, जीन जैक, रूसो आदि का प्रमुख योगदान रहा। इन विचारकों के अनुसार आदिम अवस्था को छोड़कर नागरिकों ने विभिन्न समझौते किए और समझौतों के परिणाम स्वरुप राज्य की उत्पत्ति हुई। वहीं विकासवादी सिद्धांत मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय प्रमाणों पर आधारित है। इसके अनुसार राज्य न तो कृत्रिम संस्था है, न ही दैवीय संस्था है। यह सामाजिक जीवन का धीरे-धीरे किया गया विकास है इसके अनुसार राज्य के विकास में कई तत्व जैसे कि रक्त संबंध धर्म शक्ति राजनीतिक चेतना आर्थिक आधार का योगदान है पर आज सबके हित साधन के रूप में विकसित हुआ। ऐसा राज्य क्या कोई उत्पाद वस्तु हो सकता है? जिसके विकास के लिए ब्रांडिंग की जाए?

       शौचालय, और स्वच्छता की ब्राडिंग किया जाना और इसके लिए ब्रांड एम्बेसडर्स को अनुबंधित किया जाना बाजारवाद का ही एक आधुनिक रूप है। बाज़ारवाद वह मत या विचारधारा जिसमें जीवन से संबंधित हर वस्तु का मूल्यांकन केवल व्यक्तिगत लाभ या मुनाफ़े की दृष्टि से ही किया किया जाता है। मुनाफ़ा केंद्रित तंत्र को स्थापित करने वाली यह विचारधारा; हर वस्तु या विचार को उत्पाद समझकर बिकाऊ बना देने की विचारधारा है। बाजारवाद में व्यक्ति उपभोक्ता बनकर रह जाता है, पैसे के लिए पागल बन बैठता है, बाजारवाद समाज को भी नियंत्रण में कर लेता है, सामाजिक मूल्य टूट जाते हैं। बाजारवाद में संस्कृति भी एक सांस्कृतिक पैकेज होती है। इस पैकेज में उपभोक्ता टॉयलेट पेपर इस्तेमाल करता है, वह एयर कंडीशनर में ही सोना पसन्द करता है, एसी कोच में यात्रा करता है, बोतलबंद पानी साथ लेकर चलता है घर में आरो लगवाता है, एयर प्यूरीफायर लगवाता है। इस संस्कृति के चलते लौह उत्खनन से लेकर बिजली, कांच और ट्रांसपोर्ट की जरूरत पड़ती है। यही सच है कि बाजारवाद परंपरागत सामाजिक मूल्यों को भी तोड़ता है।

    जीवनस्तर में परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। प्रत्येक व्यक्ति भौतिक सुखों के पीछे भागता है। उसकी इसी प्रवृत्ति को बाज़ार अपना हथियार बनाता है। यदि बाजार का स्वच्छता से नुकसान हो रहा है तो वह स्वच्छता को क्यों बढ़ने देगा? पीने का पानी गंदा मिलेगा तो इंसान वाटर प्यूरी फायर लेगा, हवा प्रदूषित मिलेगी तो वह एयर प्यूरी फायर लेगा। इस तरह प्यूरी फायर्स का बाज़ार फलेगा-फूलेगा। इस बाजार में बेशक नौकरियां भी मिलेंगी लेकिन नौकरियों के अनुपात में प्रदूषित वातावरण अधिक रहेगा और सेहत पर निरंतर चोट करता रहेगा। तो इसका खामियाजा भी तो हमें ही भुगतना होगा। स्वच्छता बनाए रखना एक नागरिक कत्र्तव्य है और एक इंसानी पहचान है। यदि इसके लिए भी ब्रांडिंग की जरूरत पड़े तो वह कत्र्तव्य या पहचान कहां रह जाता है? वह तो एक उत्पाद वस्तु है और जिसके पास धन है वह उसे प्राप्त कर सकता है, जिसके पास धन की कमी है वह स्वच्छता मिशन के बड़े-बड़े होर्डिंग्स के नीचे भी सोने-बैठने की जगह हासिल नहीं कर पाता है।

भ्रूण हत्या एवं बेटी बचाओ का सीधा संबंध हमारी मानवीय भावना और संवेदनशीलता से है। यह भावना हमारे भीतर स्वतः जाग्रत चाहिए अथवा सरकार जो इन अभियानों की दिशा में प्रोत्साहनकारी कार्य करती है उन्हें संचालित होते रहना चाहिए। जब बात आती है इन विषयों के ब्रांड एम्बेसडर्स की तो फिर प्रश्न उठता है कि क्या बेटियां उपभोक्ता उत्पाद वस्तु हैं या फिर भ्रूण की सुरक्षा के प्रति हमारी संवेदनाएं महज विज्ञापन हैं। आज जो देश में महिलाओं के विरुद्ध आए दिन आपराधिक घटनाएं बढ़ रही हैं तथा संवेदना का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है, उसका सबसे बड़ा कारण यही है कि जाने-अनजाने हमारी तमाम कोमल संवेदनाएं बाजार के हाथों गिरवी होती जा रही हैं।
      बात उत्पादन की बिक्री की हो तो उचित है किन्तु बाजार से हो कर गुजरने वाले कत्र्तव्यों में दिखावा अधिक होगा और सच्चाई कम। ब्रांड एम्बेसडर अनुबंधित करने के पीछे यही धारणा काम करती है कि जितना बड़ा अभिनेता या लोकप्रिय ब्रांड एम्बेसडर होगा उतना ही कम्पनी को आय कमाने में मदद मिलती है क्योंकि लोग वह सामान खरीदेंगे। अमूमन जितना बड़ा ब्रांड होता है उतना ही महंगा या उतना ही लोकप्रिय व्यक्ति ब्रांड एम्बेसडर बनाया जाता है क्योंकि बड़ा ब्रांड अधिक पैसे दे सकता है जबकि छोटा ब्रांड कम। ऐसा इसलिए क्योंकि कोई भी व्यक्ति जो ब्रांड का प्रतिनिधित्व करता है, उसकी फीस करोड़ों में होती है। एक तो अगर जनता उस व्यक्ति को अगर रोल मॉडल मानती है तो ऐसे में ब्रांड का लोगो के दिलों में जगह बनाना आसान हो जाता है।
      ब्रांडिंग की छोटी इकाईयां भी हैं। राष्ट्र स्तर पर ब्रांड एम्बेस्डर होते हैं। फिर राज्य स्तर पर ब्रांड एम्बेस्डर होते हैं। इसके बाद शहरों के भी अलग-अलग ब्रांड एम्बेस्डर होते हैं। आगे चल कर गली-मोहल्ले के स्तर पर भी ब्रांड एम्बेस्डर होने लगें तो कोई आश्चर्य नहीं है। क्योंकि नागरिक हितों की सरकारी योजनाएं भी आज ब्रांड में ढल चुकी हैं। ऐसे ब्रांड में जिसका कोई खुला बाज़ार नहीं है और कोई प्रतिद्वंद्विता है। उदाहरण के लिए स्वच्छता मिशन को ही लें। अपने शहर को स्वच्छ रखना नागरिेक कर्तव्य है। इसके लिए नागरिकों को सफाई-मित्र उपलब्ध कराना, कचरा-कलेक्शन गाड़ियां चलाना, होर्डिंग्स लगवाना तथा दंड स्वरूप हर्जाना वसूलना पर्याप्त है। इसके लिए करोड़ों रुपये खर्च कर के किसी सेलीब्रटी को ब्रांड एम्बेस्डर बनाना क्यों जरूरी है? यदि देश का प्रधानमंत्री या राज्य का मुख्य मंत्री शहर में स्वच्छता बनाए रखने की अपील करता है तो क्या इतना पर्याप्त नहीं है? क्या स्वच्छता एक ब्रांड हो सकता है? क्या स्वच्छता को कोई ऐसा बाज़ार है जहां उसका कोई प्रतिद्वंद्वी ब्रांड मौजूद हो जिससे उसे टक्कर लेनी हो? बेशक, झाडू की ब्रांडिंग हो सकती है, डस्टपैन की ब्रांडिंग हो सकती है, फिनायल तथा अन्य स्वच्छता बनाने में उपयोगी वस्तुओं की ब्रांडिंग हो सकती है, मगर स्वच्छता मिशन की ब्रांडिंग? यही तो बाज़ारवाद है जिसके चलते हम निर्जीव वस्तुओं एवं भावनाओं में अंतर को भुलाते जा रहे हैं और इस पर आपत्ति नहीं करते हैं कि एक विख्यात अभिनेता या खिलाड़ी हमें सिखाता है कि हमें शौच के बाद हाथ धोना चाहिए। आखिर हम सभ्यता के किस चरण में विचरण कर रहे हैं कि जहां शौच के बाद हाथ धोने की प्रक्रिया भी एक ब्रांड है।      
 
     यदि राज्य एक ब्रांड है, बेटी बचाओ एक ब्रांड है, स्वच्छता मिशन एक ब्रांड है, शौचालय का उपयोग एक ब्रांड है, निर्मलजल एक ब्रांड है और अतुल्य भारत अभियान एक ब्रांड है तो हम अपने युवाओं से राष्ट्रप्रेम की आशा रखें अथवा बाज़ारवाद की? यदि राष्ट्र और मानवता के प्रति भावनाएं एवं कर्तव्य भी ब्रांड बन कर प्रचारित होने का समय हमने ओढ़ लिया है जो भारतीय विचार संस्कृति के मानक पर यह ब्रांडिंग कहां सही बैठती है, यह भी विचारणीय है। हमारी भारतीय संस्कृति स्वजागृति पर आधारित है लेकिन हम वहां पहुच गए हैं जहां जागते हुए भी जगाए जाने की प्रतीक्षा करने लगे हैं।    
        --------------------------
#DrMissSharadSingh #चर्चाप्लस  #सागरदिनकर #charchaplus  #sagardinkar #डॉसुश्रीशरदसिंह