Tuesday, September 28, 2010

ग्रामीण औरतों का सच

  - डॉ.(सुश्री) शरद सिंह

ग्रामीण औरतों की ज़रूरतें क्या हैं? यह एक अहम् प्रश्न है। सुदूर ग्रामीण अंचलों में रहने वाली औरतों के जीवन की सच्चाई सिनेमा, विकास-पोस्टरों और सरकारी अंाकड़ों से बहुत भिन्न है। गंाव की असली औरतें न तो पनघटों में पानी भरती हैं और न खेतों में ठुमके लगाती हैं। गंावों में स्त्रियों का बचपन छोटा होता है और स्त्री-जीवन विस्तृत। आयु की सच्चाई को छिपा कर ब्याह दी जाती हैं अवयस्क लड़कियां। पहला शिशु एक वर्ष का हो नहीं पाता है कि दूसरे बच्चे के जन्म की तैयारी शुरू हो जाती है। सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी परिवार नियोजन जैसी कोई धारणा नहीं है। इसीलिए दस-बारह वर्ष की बड़ी बेटी को अपने दो-तीन छोटे भाई-बहनों का लालन-पालन करना ही पड़ता है क्योंकि उसकी मंा ‘सतत् जननी’ की भूमिका निभाने को विवश रहती है। बच्चों को भगवान का वरदान मानने की धारणा ऐसे क्षेत्रों में प्रभावी रहती है। बेटा पैदा हो तो कर्मों का पुण्य है और बेटी पैदा हो तो इसे कर्मों का पाप माना जाता है। इस संबंध में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का किसी को पता नहीं है, न तो स्त्रियों को और न पुरुषों को।
प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में अनेक शासकीय योजनाएं ग्रामीण क्षेत्रों के लिए बनाई जाती हैं। इन योजनाओं को क्रियान्वित करने की व्यवस्था भी की जाती है। प्रत्येक आदेश केन्द्र सरकार से चल कर राज्य, संभाग, जिला, तहसील होते हुए गंावों तक पहुंचते तो हैं लेकिन वे उसी रूप में क्रियान्वित नहीं होते हैं। इसीलिए ग्रामीण साक्षरता योजना के होते हुए भी ग्रामीण औरतों में साक्षरता का प्रतिशत न्यून है। स्त्री-स्वास्थ्य सेवाओं का संचार माध्यमों द्वारा जम कर प्रचार-प्रसार होता रहता है लेकिन गंावों में नियोजित परिवारों की संख्या अल्प है। ग्रामीण औरतों के हित में कई कानून हैं लेकिन उन्हें ही पता नहीं है कि उनके अधिकार क्या हैं? वे सामाजिक-पंचायतों के कानून को जानती हैं, वे अत्याचारी पति को भी ‘परमेश्वर’ के रूप में जानती हैं, वे जानती हैं कि वे अपनी इच्छानुसार मातृत्व धारण नहीं कर सकती हैं। उन्हें अपने घर में शौच की सुविधा भी उपलब्ध नहीं रहती है। इसके लिए भी उन्हें खेत, मैदान आदि में जाना होता है। यदि ग्रामीण औरतों के इस सच के पीछे जो मूलभूत कारण हैं वे हैं कि इन औरतों में शिक्षा की कमी है और शिक्षा की कमी के कारण जागरूकता का अभाव है। अपना नाम लिख लेना ही शिक्षा अथवा साक्षरता का मायना नहीं होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायतों में महिला सीट आरक्षित की गई, महिलाएं चुनाव जीत कर पंच, सरपंच भी बनीं लेकिन खालिस ‘रबरस्टैम्प’ की भांति। पंचायतों में ऐसी महिलाओं के अंाकड़े आज भी बहुत कम हैं जो स्वविवेक से अपने दायित्व को निभाती हैं। जब वे चुनाव में खड़ी होती हैं तो उस समय उनके नाम के साथ उनके पति का नाम चस्पा रहता है। चुनाव जीतने के बाद जब काम करने का समय आता है तो उन्हें नेपथ्य में धकेल कर उनके पति सामने आ खड़े होते हैं। यही सब ग्रामीण औरत का असली सच है। जब तक इनको ध्यान में रख कर विकास का कदम नहीं उठाया जाएगा तब तक ग्रामीण औरतों के विकसित होने की कल्पना निरी थोथी कल्पना साबित होगी। 

Friday, September 3, 2010

क्यों लगाई जाती हैं प्रतिमाएं?

- डॉ शरद सिंह

मगहर में संत कबीर की प्रतिमा के नीचे लगा पोस्टर
          किसी चौराहे या किसी महत्वपूर्ण परिसर में किसी महापुरुष, महास्त्री या किसी विशेष व्यक्ति की प्रतिमा क्यों लगाई जाती है? इस प्रश्न का उत्तर बहुत सीधा सरल है और जिसे रि व्यक्ति जानता है कि जब हम किसी व्यक्ति विशेष को विशेष सम्मान देना चाहते हैं अथवा उसके कार्यों के प्रति आभार प्रकट करना चाहते हैं तो उसकी प्रतिमा किसी चौराहे अथवा किसी परिसर पर लगा दी जाती है। किन्तु क्या यह शतप्रतिशत सच है? ऐसा लगता तो नहीं है क्योंकि लगभग हर चौराहे पर या लगभग हर महत्वपूर्ण परिसर में किसी न किसी महान व्यक्ति की प्रतिमा खड़ी की जाती है जिसे लगाने के लिए सरकार से मंाग की जाती है, प्रस्ताव रखा जाता है, बजट पारित होते हैं और किसी राजनीतिक महानुभाव के द्वारा पहले उस प्रतिमा को लगाए जाने वाली भूमि का पूजन कराया जाता है और फिर प्रतिमा लगा दिए जाने के बाद प्रतिमा का अनावरण कराया जाता है। इसके बाद क्या होता है?
           किसी व्यक्ति के प्रति हमारी सम्मान की वास्तविक भावना कितनी संक्षिप्त होती है इसे उन प्रतिमाओं की दशा देख कर सहज ही पता लगाया जा सकता है। धूल की पर्त से अटी या पक्षियों की बीट से सनी स्थिति को अनदेखा कर भी दिया जाए तो उनके बारे में क्या कहेंगे जो इन प्रतिमाओं के सिर, गरदन या हाथों से विज्ञापन, चुनाव अथवा समारोही पर्चियांे की रस्सियां बांधा करते हैं। गोया प्रतिमा सम्मानसूचक स्मारक न हो अपितु अलगहनी का बंास या खम्बा हो। भला उन लोगों के बारे में क्या टिप्पणी की जाए जो ऐसी प्रतिमाओं तथा उनके चबूतरों (पैडस्टल्स) को पोस्टर चिपकाने के लिए उपयोग में लाते हैं। उत्तर प्रदेश में स्थित मगहर में जहंा संत कबीर ने अंतिम विश्राम किया, वहां ऐसा ही एक दृश्य देखने को मिला। यह दृश्य पीड़ा पहुंचाने वाला अवश्य था किन्तु यह ठीक वैसा ही था जैसा लगभग हर प्रदेश के हर दूसरे चौराहे पर देखने को मिल जाता है। संत कबीर स्मारक के रूप में एक कलात्मक चबूतरे पर खड़ी संत कबीर की प्रतिमा भी अत्यंत कलात्मक है किन्तु उसके चबूतरे (पैडस्टल) को चुनावी पोस्टरों ने ढांक रखा था। स्वाभाविक है कि अन्य समय पर उपभेक्ता वस्तुओं के विज्ञापन या फिल्मों के पोस्टर चिपका दिए जाते होंगे।  मगहर में संत कबीर की दो समाधियां हैं एक हिन्दू पद्धति का स्मारक तथा दूसरी मुस्लिम पद्धति की मज़ार। दो पृथक कमेटियां दोनों स्मारकों की अलग-अलग देखभाल करती हैं किन्तु शायद दोनों में से किसी का भी ध्यान इस ओर नहीं जाता है कि उस परिसर के बाहरी भाग में उद्यान में लगी संत कबीर की प्रतिमा का चबूतरा अकसर पोस्टरों से ढंका रहता है। यही हाल अन्यत्रा लक्ष्मीबाई, महाराणा प्रताप, शिवाजी, प्रेमचंद या फिर किसी भी महान व्यक्ति की प्रतिमा का देखने को मिल जाता है।
             सम्मानसूचक प्रतिमाओं की यह दशा देख कर सोचने को विवश होना पड़ता है कि आखिर हम क्यों लगाते हैं प्रतिमाएं जबकि हम उन प्रतिमाओं के सम्मान की रक्षा भी नहीं कर पाते हैं अथवा उनके प्रति ध्यान भी नहीं दे पाते हैं। इससे तो अच्छा है कि इस प्रकार प्रतिमाएं लगाई ही न जाएं या फिर उसी स्थिति में लगाई जाएं जब कोई समिति, कोई विभाग या कोई व्यक्ति-समूह प्रतिमाओं के सम्मान की रक्षा करने की जिम्मेदारी ले और इस जिम्मेदारी को निभाए।

Sunday, August 29, 2010

औरत होने का मतलब ?

   - डॉ. शरद सिंह
रोज़ सुबह अख़बार उठाते ही सबसे पहले जिस समाचार पर ध्यान जाता है, वह होता है राजनीतिक समाचार। उसके बाद जो दूसरी ध्यानाकर्षण करने वाली ख़बर होती है, वह होती है औरत पर केन्द्रित। मसलन-आग से जलने पर महिला की मौत, नवयुवती ने फांसी लगाई, मां ने बच्चों सहित कुए में कूद कर जान दी, दहेज को ले कर हत्या, प्रताड़ित महिला द्वारा खुदकुशी आदि-आदि। देश की आजादी के वर्षों बाद भी हादसों के समाचार औरतों के ही खाते में है।
एक विदेशी महिला से छेड़छाड़ की घटना लखनऊ में घटी। पणजी से भी एक विदेशी महिला के साथ बलात्कार का मामला प्रकाश में आया। पुष्कर में भी बलात्कार का शिकार बनी एक विदेशी महिला। सवाल ये नहीं है कि महिला विदेशी थी या स्वदेशी? सवाल ये है कि महिलाओं के साथ ऐसे हादसे संस्कृति के धनी भारत में क्यों बढ़ते जा रहे हैं, उस पर हद तो ये कि 31 दिसम्बर2007 की काली रात को दो अनिवासी भारतीय महिलाओं को भीड़ की हैवानियत का शिकार होना पड़ा। टी.वी. चैनल्स पर उस हैवानियत को बार-बार दिखाया गया किन्तु क्या उस घटना के विरोध में किसी भी राजनीतिक दल अथवा सामजिक संगठन ने कोई देशव्यापी मुहिम छेड़ी, नहीं, छोटी-मोटी नेतागिरी के अलावा कोई ऐसा ठोस क़दम नहीं उठाया गया जो इस दिशा में प्रभावी परिणाम दे पाता। उस पर दुर्भाग्य यह कि कुछ एक नामी संगठनों ने कहा कि यदि औरतें पश्चिमी शैली के कपड़े पहनेंगी तो उनके साथ ऐसी घटनाएं होंगी ही। ऐसी बयानबाजी करने वाले उन घटनाओं को भूल जाते हैं जो खेत में काम करने वाली अथवा गांव में शौच के लिए बाहर जाने वाली सोलह हाथ की साड़ी और घूंघट में लिपटी औरत के साथ घटित होती हैं। उन घटनाओं के लिए जिम्मेदार कौन होता है?
एक ओर यह माना जाता है कि ‘सर्वत्र नारी की पूजा होनी चाहिए‘ और वहीं दूसरी ओर देश में प्रति घंटे 18 से बीस महिलाएं यौनहिंसा का शिकार होती हैं जिनमें से चार से छः महिलाएं बलात्कार की शिकार होती हैं। आंकड़े भयावह हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॅार्ड ब्यूरो के अनुसार 1971 की तुलना में 2007 तक देश में बलात्कार की घटनाओं में सात सौ प्रतिशत तक वृद्धि हो चुकी है। ब्यूरो के ये आंकड़े उन पूरे आंकड़ों की जानकारी नहीं दे पाते हैं जो थानों में दर्ज़ ही नहीं हुए। न जाने कितनी शिष्याएं अपने गुरुओं की हवस की शिकार होती रहती हैं न जाने कितनी नर्सें चिकित्सकों के हाथों लुटती रहती हैं और मात्र कामकाजी क्षेत्र में ही नहीं, घर की चारदीवारी के भीतर रिश्तों को कलंकित करने वाली हैवानियत का तांडव चलता रहता है जो आंकड़ों से परे है। औरत की रक्षा-सुरक्षा के लिए कानून बहुत से हैं लेकिन उस समय कानूनों की धज्जियां उड़ते साफ़-साफ़ देखने को मिल जाती हैं जब पुलिस वाले ही थाने में रिपोर्ट दर्ज़ करने में हीलहवाला करते नज़र आते हैं। 31 दिसम्बर 2007 की घटना इसका एक उदाहरण कही जा सकती है।
        क्यों बढ़ रही हैं ऐसी घटनाएं? जैसे-जैसे औरतें बहुमुखी प्रगति कर रही हैं वैसे-वैसे उनके विरुद्ध हिंसा भी बढ़ती जा रही हैं। आखिर कमी कहां है? किसमें है?औरतों में या पुरुषों में? आखिर इन्हीं दोनों से मिल कर तो बना है समाज। इस समाज में पुरुष का दर्जा हमेशा पहले नंबर पर रहा है। देश की विस्फोटक जनसंख्या में औरतों की आबादी अभी पुरुषों के बराबर नहीं तो आधी से तो अधिक ही है। कुछेक क्षेत्रों में स्त्री नेतृत्व को देखते हुए यह मान लेना बेमानी होगा कि औरतें अब जागरूक हो गई हैं। यदि ऐसा होता तो किसी मोटर कारखाने की स्थापना से कहीं अधिक विरोध किया जाता उन तमाम हिंसाओं का जो औरतों के विरुद्ध की जाती हैं।
दरअसल बचपन से ही यह भेदभाव स्थापित कर दिया जाता है। बेटा है तो वह बाहर जा कर खेल सकता है, बाहर जा कर पढ़ सकता है, हाट-बाज़ार में मस्ती से घूम सकता है, यहां तक कि उसे अपनी बहन की अपेक्षा अच्छा खाना, कपड़ा और लालन-पालन मिलता है। बेटी को यह सब नसीब होना कठिन है। उसे खेलने के लिए गुड़ियां दी जाती हैं, अपने छोटे भाई-बहनों की परवरिश करने की शिक्षा दी जाती है और चूल्हा-चौका तो उसके भविष्य के साथ बंाध ही दिया जाता है। घरों में जब माता-पिता अपने बच्चों के लिए खिलौने ले कर आते हैं तो उसमें बेटे के लिए क्रिकेट का बल्ला, हॅाकी स्टिक, मोटर, बाईक या एके-47 राईफल का खिलौना होता है लेकिन बेटी के लिए घर-गृहस्थी के सामानों के खिलौने जैसे गैसस्टोव, क्रॅाकरी, गुड़िया, पेंटिग या कशीदे का सामान। बेटों के मन में यह बात बचपन से बिठा दी जाती है कि तुम बेटियों से बढ़कर हो, तुम्हारे सौ खून माफ़ हैं। यही बेटे जब बड़े हो कर पुरुषत्व धारण करते हैं तो औरतों पर शासन करना अपना जन्मजात अधिकार समझते हैं।
देखा जाए तो ऐसे बेटों से कहीं अधिक दोषी वो मांए होती हैं जो अपने बेटों को ऐसे पुरुष के रूप में विकसित करती हैं जिनमें औरतों पर अधिकार करने का जुनून होता है। कहीं न कहीं स्वयं औरत भी दोषी है पुरुषों की हिंसा के मामले में। यह ठीक है कि औरतों को धर्मभीरु बनाया गया, उसके पुरुषों के पीछे-पीछे सिर झुका कर चलने वाली बनाया गया, पति को ईश्वर मान कर उसकी पूजा-स्तुति करने वाली बनाया गया किन्तु इन सारे ढांचों को आज भी वह स्वेच्छा से अपने इर्द-गिर्द लपेटे हुए है। औरत आज जानती है कि चन्द्रमा का स्वरूप क्या है, वह एक निर्जन उपग्रह मात्र है, वह भी पृथ्वी का उपग्रह, फिर भी हर साल करवां चौथ को वह निर्जला व्रत रखती है और चलनी से चन्द्रमा को देख कर पति की लम्बी उम्र की प्रार्थना करती है। करवा चौथ आते ही औरतों द्वारा उसे मनाए जाने की धूम मच जाती है लेकिन यह कभी सुनने में नहीं आया है कि किसी पति ने अपनी पत्नी को इस लिए पीटा हो या उससे संबंध विच्छेद किए हो कि उसने उसकी लम्बी उम्र के लिए करवां चौथ का व्रत नहीं रखा।
दहेज लेने, उसका प्रदर्शन करने, दहेज संबंधी ताना मारने और दहेज कम मिलने या बिलकुल न मिलने पर सबसे पहले औरत ही नाम आता है। दहेज के लिए अकेले ससुर ने बहू को शायद ही कभी जलाया हो लेकिन जब भी बहू को जलाए जाने की घटनाएं घटती हैं तो वह सास की पहलक़दमी पर ही घटती हैं। बहू बन कर विदा होती बेटी को भी यही घुट्टी पिलाई जाती है कि अब दोनों कुल की मर्यादा तेरे हाथ में हैं। गोया दोनों कुल की मर्यादा निभाने में वर का कोई दायित्व ही न हो। जो बहुएं कुछ ज्यादा ही घुट्टी पी कर आती हैं वो मरते-मरते भी यही कहती हैं कि उनका जलना महज एक दुर्घटना थी।
गर्भ में पलने वाले मादा भ्रूण को गर्भ से निकाल फेंकने के लिए होने वाली मां रूपी औरत जाती है, उस मां की सास या कोई और संबंधित महिला उसके साथ जाती है और गर्भपात कराती है एक अन्य औरत। अब वे चाहे किसी भी बाध्यता का नाम लें लेकिन सच तो ये है कि अभी औरतों ने खुद ही अपनी शक्ति, अपने अस्तित्व और अपने दायित्वों को भली-भांति नहीं समझा है। औरत होने का मतलब ये नहीं है कि वह घर बसाए, शादी करे, बच्चे पैदा करे, नौकरी भी करे तब भी चूल्हे-चौके की सभी जिम्मेदारियों को निभाए और आंख मूंद कर पुरुष प्रधान परम्पराओं को मानती रहे। दरअसल औरत होने का मतलब यही है कि अब औरत, औरत के पक्ष में अर्थात् खुद के पक्ष में खड़ी हो कर सारी बातों को गौर करे और अपने बचाव के रास्ते स्वयं निर्धारित करे।

Monday, August 9, 2010

बुन्देलखण्ड में सावन, संस्कृति और स्वाद

-डॉ.(सुश्री) शरद सिंह
आकाश में काले-काले बादलों के छाते ही मन में उमंग जाग उठती है। मन करता है कि उड़ कर बादलों को छू लिया जाए। इसी इच्छा को पूरी करने के लिए वृक्षों की शाखाओं पर झूले डाल दिए जाते हैं और उन झूलों पर बैठ कर ऊंची-ऊंची पींगें लेने की होड़ लग जाती है। झूला झूलने वाला हर व्यक्ति बादलों को सबसे पहले अपनी मुट्ठी में भर लेना चाहता है। विशेष रूप से युवतियां और किशोरियां झूला झूलना चाहती हैं क्यों कि झूलों का आनन्द उनके किशोरवय के सपनों जैसा होता है। सावन मास आते ही झूले डाले जाने की परम्परा द्वापर युग से चली आ रही है। जब श्रीकृष्ण ब्रज की गोपियों के साथ जी भर कर झूला झूलते थे और सावन की ठंडी फुहारों का आनन्द लेते थे। बुन्देलखण्ड में भी यह परम्परा यहंा की प्राचीनतम परम्पराओं में से एक है। बुन्देलखण्ड यूं भी सांस्कृतिक परम्पराओं का धनी है। बुन्देली साहित्य और संस्कृति में एक अनूठापन और कच्ची मिट्टी-सा सोंधापन है। जगनिक, ईसुरी और पद्माकर जैसे कवियों ने जहंा इसके साहित्य को समृद्ध किया है वहीं लोकगीतों और लोककथाओं ने इसकी लोकपरम्पराओं को जीवित रखा है।
सैरे की धूम - सावन मास आते ही गांव-गांव में सैरे गाए जाने लगते हैं। इसे मूलतः सावनगीत कहा जा सकता है। जिस प्रकार श्रीकृष्ण और गोपियों के प्रेमरस से भीगे गीत सावन की ऋतु को ऊर्जा प्रदान करते हैं, ठीक उसी तरह सैरे भी प्रेमरस से भीगे हुए गीत होते हैं। इसे युवक और युवतियां उल्लासपूर्वक गाते हैं। कुछ गीत सिर्फ युवक ही गाते हैं। इन गीतों में प्रेम के साथ ही हास-परिहास और व्यंग-विनोद भी होता है। परस्पर बातचीत भी होती है और छेड़खानी भी होती है।
एक युवती अपनी सहेली की बांह में कसे हुए बाजूबंद को देखकर उसे छेड़ती हुई प्रश्न करती है-
भुजों में चुभ लागे
कै मासे के जे बाजूबन्दा,
कै मासे के कुन्दा?

सहेली उत्तर देती है-
नौमाशे के जे बाजूबंदा
दस माशे के कुन्दा।

छेड़ने वाली युवती कहां चुप बैठने वाली? वह चुटकी काअती हुई पूछती है?
कौने गढ़ा दए जे बाजूबन्दा?
कौने जड़ा दए कुन्दा?

उत्तर मिलता है-
राजा गढ़ा दए जे बाजूबंदा
छैला जड़ा दए कुन्दा।

युवती देखती है कि उसकी सहेली इतने पर भी शरमाकर मुंह नहीं छिपा रही है तो उसका साहस बढ़ जाता है। वह इससे भी आगे बढ़ कर पूछती है-
काहे में टूटे जे बाजूबन्दा?
काहे में उड़ गए कुन्दा?

सहेली भी कम नहीं है। वह उन्मुक्त भाव से उत्तर देती है-
तानत में टूटे जे बाजूबंदा
दचकन उड़ गए कुन्दा।

प्रश्न पूछने वाली युवती को अपनी सहेली की निर्भीकता पर गर्व होता है। उसकी सहेली प्रेम को अपराध नहीं बल्कि सहज प्रवृति के रूप में स्वीकार कर रही है और स्पष्ट शब्दों में बता रही है कि प्रेमालाप के दौरान बाजूबन्द टूट गया और कुन्दा खुल गया। यह स्पष्टता जहंा एक ओर बुन्देली युवतियों की निर्भीकता और स्पष्टता को उजागर करती है वहीं तन-मन पर पड़ने वाली सावन की छाप को भी वर्णित करती है।
सावन के आने पर सैरा गीतों के माध्यम से अपनी उन सहेलियों को भी याद किया जाता है जो ससुराल में रह रही हैं। इन गीतों की विशेषता यह है कि इसमें अपनी सहेली का नाम जोड़ कर इन्हें गाया जाता है। जैसे-
कौन-सी गुंइयां सासरे,
माई सावन आए।
‘सीता’ सी गुंइया सासरे
माई सावन आए।

इसमें ‘सीता’ के स्थान में लता, मीना, शोभा आदि उस सहेली का नाम लिया जाता है जिसे सावन में याद किया जा रहा हो। आखिर सावन प्रियजन की स्मृतियों को जगा जो देता है।
सावन मास का महत्व भी सैरा गीत में याद दिलाया जाता है-
सदा न तुरैयां, अरे फूले
ने सदा रे सावन होय।
सदा ने राजा अरे रन जूझें
सदा ने जीवे कोय।
अर्थात् तुरैया की बेलें सदा नहीं फूलती हैं और न सावन सदा रहता है। जैसे युद्ध में राजा को सदा विजय नहीं मिलती और कोई भी सदा जीवित नहीं रहता है।

राछरे और कजरिया गीत - सावन मास में ही राछरे गीत गाए जाते हैं। राछरे गीत मुख्य रूप से स्त्रियां गाती हैं किन्तु कभी-कभी पुरुष भी इसे गाते हैं। इन गीतों में विवाहिताओं की उन स्मृतियों का विवरण होता है जो उनके मायके से जुड़ी होती हैं। इन गीतों में वे अपने माता-पिता, भाई-बहन, सखी-सहेली आदि को याद करती हैं। ये गीत चक्की चलाते हुए, झूला झूलते हुए और अन्य घरेलू काम करते हुए गाए जाते हैं। जबकि कजरियां गीत श्रावण शुक्ल नवमीं को कजरियां बोने से शुरू होते हैं। सावन की नौवमी तिथि को स्त्रियां झुण्ड के रूप में मिट्टी लेने जाती हैं। पहले उस स्थान की पूजा की जाती है जहंा से मिट्टी खोली जानी होती है फिर गेंहू ओर जौ के दाने मिट्अी में दबा कर मिट्टी खोदी जाती है। उस मिट्टी को घर ला कर मिट्टी के बरतनों में रख कर उसमें गेंहू या जौ बो दिया जाता है। इन दानों को रोज सींच कर बड़ा किया जाता है। कजरिया के रूप में बढ़ने वाली गेंहू की पौध अच्छी पैदावार के लिए शगुन की भांति होती है।
कजरिया बोने के समय कजरिया गीत गाए जाते हैं। कभी-कभी राछरे गीत भी कजरियों के साथ गाए जाते हैं। कजरियों की राछरों में आल्हा-ऊदल के युद्धों का वातावरण भी मिलता है। जैसे एक गीत में मंा अपनी बहन और बेटी को कजरिया सिराने के लिए बुला रही है किन्तु साथ में यह भी चेतावनी दे रही है कि वह किसी दुश्मन के हाथ न पड़ जाए अन्यथा कुल की प्रतिष्ठा धूल में मिल जाएगी।

धरी कजरियां तरा के पारैं, बिटिया आन सिराव
टूटी फौजें दुस्मन की बहिना, भगने हो भग जाओ।
हांत न परियो तुम काऊ के, लग जैहे कुल में दाग।।


आल्हा गायन - आल्हा जोश और मस्ती का काव्य है। सावन के बादलों के घिरते ही आल्हा काव्य की अनेक पंक्तियां वातावरण में सरसता घोलने लगती हैं। यह मूलतः वीररस का काव्य है किन्तु इसमें श्रंृगार रस के विभन्न रूपों का भी रसास्वादन होता है। आल्हा काव्य में जगनिक ने बड़े ही सुन्दर ढंग से सावन के बादलों से बरसने का आग्रह किया है। नवविवाहिता रानी कुसुमा बादलों से प्रार्थना करती है कि वे उसके महलों पर इतना बरसें कि उसका प्रिय उसे छोड़ कर न जा सके और उसकी आंखों के सामने बना रहे।
कारी बदरिया तुमको सुमरों, कौंधा बीरन की बलि जाऊं
झमकि बरसियो मोरे महलन पै, कंता आज नैनि रह जाएं।।

मेंहदी के रंग और चपेटा का संग- बुन्देलखण्ड पर प्रकृति की विशेष कृपा सदा रही हैं यहां के सघन वन वर्षा की बूंदों को आकर्षित करते रहे हैं। सावन आते ही मेंहदी की झाड़ियों के पत्ते चटख, गहरे हरे रंग में अपनी छटा बिखेरने लगते हैं। यही पत्ते जब पिसने के बाद हथेलियों पर लगाए जाते हें तो सुन्दर लाल रंग की छाप छोड़ जाते हैं। सावन का महीना हथेलियों पर मेंहदी रचाने का आमन्त्रण देने लगता है। आजकल बनी-बनाई मेंहदी भी बाजार में उपलब्ध हो जाती है जिससे मेंहदी लगाने का चाव परम्परागत रूप से प्रवाहमान है।
सावन आते ही चपेटा का खेल भी खेला जाने लगता है। सुदूर ग्रामीण अंचलों में आज भी किशोंरियां चपेटा खेलती हुई दिखाई दे जाती हैं। सावन की झड़ी में बाहर निकल कर खेल पाना कठिन होता है अतः घर के भीतर बैठ कर खेला जाने वाले खेल का लोकप्रिय होना स्वाभाविक है। ये पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़ों अथवा लाख के टुकड़ों से खेला जाने वाली खेल है। इन टुकड़ों को ‘चपेटा’ या ‘गुट्टा’ कहा जाता है। जो युवतियां लाख के सजावटी लाख के चपेटे नहीं खरीद पाती हैं, वे कंकडों को चपेटों के रूप में काम में लाती हैं। यह बहुत रोचक खेल है। इसमें बाकायदा दाम दिए और लिए जाते हैं। हार-जीत होती है।
लपटा और पकौड़े - सावन का महीना हो और लपटा या भजिए-पकौड़े न खाए जाएं तो सावन का मजा अधूरा लगता है। ये दोनों व्यंजन गरमा-गरम खाए जाते हैं। चूंकि ये दोनों व्यंजन बेसन से बनते हैं इसलिए इसमें अजवाइन का होना बहुत जरूरी होता है। अजवाइन स्वाद भी बढ़ाता है और पाचक तत्व का काम भी करता है।

बुन्देलखण्ड में सावन का जो आनन्द है वह कहीं और नहीं है। इसी संदर्भ में अंत में मेरा यह गीत-
सावन की बूंद जो झरे,
बरसाती दिन, अब जा के हुए हरे।

यादों ने कूक फिर लगाई
झूलों में झूले अंगनाई
अंाखों के कूप दो भरे
बरसाती दिन, अब जा के हुए हरे।

हरियाये बेल और बूटे
मन तोड़े बंधन के खूंटे
तन कब तक धीर को धरे
बरसाती दिन, अब जा के हुए हरे।

चूनर ने पत्र लिख दिया
धानी रंग, रंगा है जिया
काग़ज़ की नाव भी तरे
बरसाती दिन, अब जा के हुए हरे।
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