Saturday, March 19, 2022

जयप्रकाश चौकसे जी से भेंट | यादें | डॉ (सुश्री) शरद सिंह


 कम्प्यूटर फाईल्स में आज अचानक एक पुरानी तस्वीर मिल गई और कई यादें ताज़ा हो गईं... जयप्रकाश चौकसे जी का सागर आना होता रहता था... तीन बार भेंट हुई.. लम्बी चर्चाएं भी हुईं..। ऐसे ही एक सागर- प्रवास के दौरान की यह तस्वीर है... इसमें  मैं हूं दीदी डॉक्टर वर्षा सिंह जी हैं और जयप्रकाश चौकसे जी हैं... वे अपने रिश्तेदार के निवास पर ठहरे हुए थे... हंसमुख... मिलनसार.. जिंदादिल... अब सिर्फ यादें हैं पर सुखद....
(लगभग 5-6 साल पुरानी तस्वीर...)

#डॉसुश्रीशरदसिंह #डॉवर्षासिंह #जयप्रकाशचौकसे #DrMissSharadSingh #drvarshasingh #jaiprakashchouksey

Thursday, March 17, 2022

...और दीदी ने लगा दिया गालों में गुलाल! - शरद सिंह


प्रिय मित्रो, आज #पत्रिका समाचारपत्र ने 'सेलीब्रिटीज़' में मुझे शामिल कर मेरी यादगार होली को प्रकाशित किया है...'फील गुड हो रहा है' 😊

" ...और दीदी ने लगा दिया गालों में गुलाल! - शरद सिंह

सन् 2020 की होली मैं कभी नहीं भूल सकती हूं। कोरोना का आतंक था। होली खेलने घर से निकलना संभव नहीं था। जिसके कारण मेरा मूड ख़राब था। मेरी दीदी डॉ वर्षा सिंह जी ने मेरा मूड ठीक करने के लिए मुझे चुटकुले तक सुना डाले। मगर मेरा मन उखड़ा हुआ था। होली के दिन होली खेलने को न मिले तो बोरियत तो होगी ही। मैं कुनमुनाती बैठी थी कि वर्षा दीदी ने अचानक पीछे  से आकर मेरे गालों में गुलाल लगा दिया और ज़ोर से बोलीं - "हैप्पी होली!" बस, उसके बाद तो मुझे भी जोश आ गया। मेरी सारी बोरियत गायब हो गई और हम दोनों बहनें घर में ही देर तक एक दूसरे को रंग गुलाल लगाते हुए होली खेलती रहीं। वह होली मेरी यादगार होली है क्योंकि उस दिन मुझे यह भी समझ में आ गया कि होली रंगों, उमंगों के साथ ही परस्पर एक-दूसरे की भावनाओं को समझने का भी त्यौहार है।" 

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हार्दिक आभार पत्रिका, सागर संस्करण 🙏
🚩पत्रिका परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनाएं 🎈🎉🎈


(17.03.2022)

#होली2022 #होलीकीशुभकामनाएं

#डॉसुश्रीशरदसिंह #होलीमुबारक़ #HappyHoli2022 #HappyHoli

Wednesday, March 16, 2022

सौजन्य भेंट | हिंदी विभाग | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | डॉ हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर

मित्रो, आज  डॉ हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर के हिंदी विभाग में विभागाध्यक्ष विदुषी डॉक्टर चंदाबेन, विद्वान प्राध्यापक द्वय डॉ हिमांशु कबीर  एवं डॉ सुजाता मिश्रा से नगर के साहित्यकारों डॉ (सुश्री) शरद सिंह यानी मैंने, डॉ टीआर त्रिपाठी, श्री पी आर मलैया, श्री वीरेन्द्र प्रधान, श्री मुकेश तिवारी जी ने सौजन्य भेंट की। लेकिन वह कहते हैं न कि जब चार साहित्यकार कहीं जुड़ जाए तो भाषा और साहित्य की चिंतन- चर्चा हो ही जाती है। आज भी हिंदी विभागाध्यक्ष के कक्ष में व्याकरण, भाषा और साहित्य पर गंभीर चर्चाएं हुई। जिनमें पाणिनि के संस्कृत व्याकरण से लेकर कबीर के दर्शन और महामति प्राणनाथ के विचारों तक का समावेश होता चला गया।
   ❤️ बहुत आत्मीय और स्नेहिल भेंट। 
दिनांक - 16.03.2022
#डॉसुश्रीशरदसिंह
#हिंदीविभाग #सौजन्यभेंट  #डॉहरीसिंहगौरकेंद्रीयविश्वविद्यालय

सारस्वतम व्याख्यानमाला | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | संस्कृत विभाग | डॉ हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर

मित्रो, संस्कृत विद्वान डॉ राधावल्लभ त्रिपाठी जी का व्याख्यान सुनना हमेशा सुखद लगता है क्योंकि वे संस्कृत वांग्मय को आधुनिक दृष्टि से आकलन करते हुए अपनी बात सामने रखते हैं। जिससे संस्कृत वांग्मय की वास्तविक उपादेयता एवं समसामयिक मूल्यवत्ता को समझने में सुगमता होती है। आज भी राधावल्लभ त्रिपाठी जी का व्याख्यान सुनने का  सुअवसर प्राप्त हुआ।
      डॉ हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग एवं कालिदास संस्कृत अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद उज्जैन के संयुक्त तत्वावधान में "मध्य प्रदेश का आधुनिक संस्कृत साहित्य एवं पं. प्रेमनारायण द्विवेदी" विषय पर  व्याख्यानमाला "सारस्वतम" का आयोजन किया गया। जिसमें मुख्य वक्ता थे डॉ राधावल्लभ त्रिपाठी जी। कार्यक्रम का संचालन किया संस्कृत विभाग के विद्वान प्राध्यापक डॉ नौनिहाल गौतम जी ने।
       संस्कृत के विभागाध्यक्ष आनंद प्रकाश त्रिपाठी तथा वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ शशि कुमार सिंह की संकल्पना एवं प्रयासों से इस प्रकार के उत्कृष्ट आयोजन संस्कृत विभाग द्वारा निरंतर होते रहते हैं और नगर के साहित्यकारों को भी इन आयोजनों में आत्मीयता से आमंत्रित किया जाता है जिससे एक सुखद और स्वस्थ परंपरा स्थापित हो रही है। 
यह आयोजन अंग्रेजी विभाग के सभागार में सम्पन्न हुआ। इसमें विभागीय प्राध्यापकों छात्रों शोधार्थियों के साथ ही नगर के साहित्यकारों श्री हरगोविंद विश्व, डॉ गजाधर सागर, श्री पीआर मलैया, श्री वीरेंद्र प्रधान, श्री मुकेश तिवारी और मैं डॉ (सुश्री) शरद सिंह की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
#डॉसुश्रीशरदसिंह #संस्कृतविभाग #व्याख्यानमाला

चर्चा प्लस | राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस | ज़िन्दगी को सुरक्षित रखते हैं टीके | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस | 16 मार्च : राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस
   ज़िन्दगी को सुरक्षित रखते हैं टीके
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
             कोविड-19 ने टीकाकरण का महत्व सभी को भली-भांति समझा दिया है। लेकिन इससे पूर्व पोलियो, चेचक आदि के टीकाकरण के प्रति सजगता आ चुकी है। प्रति वर्ष 16 मार्च को मनाये जाने वाले राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस की वर्ष 2022 की थीम है-‘‘वेक्सीनेस वर्क फाॅर ऑल’’ अर्थात् ‘‘सभी के लिए टीकाकरण’’। यह थीम इस बात की याद दिलाती है कि कोरोना संबंधी टीकाकरण के सारे डोज़ अभी पूर्ण नहीं हुए हैं। बड़ों के लिए अभी बूस्टर डोज़ बाकी है और अधिकांश बच्चों को सुरक्षा टीका लगना अभी शेष है।
देश में टीकाकरण की शुरुआत 16 मार्च 1995 को हुई। तभी से हर वर्ष 16 मार्च को राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस मनाया जाता है। 20वीं शताब्दी तक पूरी दुनिया पोलियो जैसी खतरनाक बीमारी से जूझ रही थी। तभी पोलियो खुराक की खोज हुई। भारत में 16 मार्च, 1995 में पहली खुराक 5 साल के कम बच्चे दी गयी। पल्स पोलियो अभियान के तहत, देश में पांच वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों को ओरल पोलियो वैक्सीन की दो बूंदें दी गई थीं। इसके लिए एक नारा दो बूंद जिंदगी की काफी लोकप्रिय हुआ था। गांव-गांव, शहर-शहर स्वास्थ्य विभाग और सामाजिक संगठनों की टीम घर-घर जाकर, स्कूल, बस अड्डे, रेलवे स्टेशन आदि स्थानों पर बच्चों को पोलियो की खुराक पिलाते थे। इन प्रयासों के कारण ही 2014 में भारत को पोलियो मुक्त घोषित किया गया था। पोलियो खुराक मुंह के जरिए दी जाती है। पोलियो की खुराक के बारे में जागरूक करने के लिए अभियान चलाया गया था। जिसका नाम “पल्स पोलियो टीकाकरण दो बूंद जिन्दगी के लिए”। पूरे भारत में यह अभियान चलाया गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2014 में भारत को पोलियो मुक्त घोषित कर दिया। पोलियो मुक्त होने वाला भारत एशिया महाद्वीप का दूसरा देश बन गया है। दुनियाभर में व्यापक टीकाकरण अभियानों के परिणामस्वरूप दुनिया के प्रमुख हिस्सों से चेचक, खसरा, टिटनस, पोलियो, प्लेग जैसे अत्यधिक संक्रामक और खतरनाक बीमारियों का खात्मा हुआ है।
टीकाकरण अत्यधिक संक्रामक रोगों को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका है. टीकाकरण के कारण व्यापक प्रतिरक्षा अधिकतर दुनिया भर में चेचक के उन्मूलन और दुनिया की एक बड़ी मात्रा से पोलियो, खसरा और टेटनस जैसी बीमारियों के नियंत्रण के लिए जिम्मेदार है. देश में पहली बार राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस 16 मार्च, 1995 को मनाया गया था। उस दिन देश में ओरल पोलियो वैक्सीन की पहली खुराक दी गई थी। देश में विकलांगता की जनक मानी जानी वाली पोलियो महामारी को खत्म करने के लिए भारत सरकार द्वारा पल्स पोलियो अभियान की शुरुआत की गई थी। पिछले कुछ दशकों में टीटनस, पोलियो, टीबी जैसी घातक बीमारियों से लड़ने के लिए टीके एक अभिन्न हथियार के तौर पर उभरे हैं और इनके कारण लाखों लोगों की जिंदगियां बचाई जा सकीं हैं।
 टीके एंटीजेन कहलाते है यह एक ऐसी दवाई होती है जो टीके के रूप में दी जाती हैं इससे रोगकारक जीवाणु एवं विषाणु की शरीर में जीवित क्षीण मात्रा रहती है। यह विषाणुओं को मारकर अथवा अप्रभावी कर टीके के रूप में प्रयोग किया जाता हैं। टीकाकरण कराने से लोगों का इम्युनिटी सिस्टम मजबूत होता है, जिसकी वजह से गंभीर एवं बड़ी बीमारियों से लड़ने के लिए शरीर को मजबूती मिलती है। बच्चे के जन्म के बाद ही डॉक्टर द्वारा उसके माता- पिता को टीकाकरण कराने की सलाह दी जाती है। छोटे नवजात बच्चों का इम्युनिटी सिस्टम बेहद कमजोर होता हैं जिसकी वजह से उन्हें गंभीर एवं घातक बीमारी होने का खतरा बना रहता है। इसलिए सरकार द्वारा नवजातों के स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए शासकीय अस्पतालों एवं स्वास्थ्य केन्द्रों में मुफ्त टीकाकरण किया जाता है। जिससे की देश की आने वाली पीढ़ियां स्वस्थ बन सकें। गर्भवती महिला गर्भावस्था के दौरान को टिटेनस की बीमारी से बचाने के लियेटिटेनसटाक्साइड बूस्टर के दो टीके एक महिने-एक महीने के अंतर में लगवाना चाहिए। डीपीटी टीके बेहद महत्वपूर्ण होते है यह टीके तीन संक्रामक बीमारियों डिफ्थीरिया, पर्टुसिस और टिटनेस से बचाव के लिए दिए जाते हैं। हिपेटाइटिस बी एवं ए के संक्रमण से बचाव के लिए टीकाकरण जरुरी हैं। बच्चों को उल्टी- दस्त से बचाने के लिए रोटावायरस टीका लगाया जाता है। वस्तुतः टीकाकरण रक्त में घुलकर शरीर में प्रतिरक्षा प्रणाली विकसित करता है जो शरीर में एंडीबॉडी का निर्माण करता है। एंडीबॉडी हमारे शरीर में वायरस और बैक्ट्रिया से सुरक्षा करता है। शरीर में एंडीबॉडी बनने से वायरस और बैक्ट्रिया कमजोर हो जाते है। या खत्म हो जाते है। जिससे व्यक्ति बीमारी के शिकार नहीं होते है।
शिशुओं को जीवित रहने के लिए टीकाकरण जरूरी है। नियमित टीकाकरण को छोड़ने से नवजात के जीवन पर जानलेवा प्रभाव पड़ सकता है। शिशुओं के जीवन और भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए टीकाकरण सबसे प्रभावी और कम लागत का तरीका है। यदि शिशु का टीकाकरण किया जाए तो विश्व में उनके बचाव में लगभग 15 लाख शिशु मृत्यु को रोका जा सकता है। भारत को सन 2014 में पोलियो मुक्त और सन 2015 में मातृत्व व नवजात टेटनस उन्मूलन का सर्टिफिकेट मिला। टीकाकरण परिवार और समुदाय को सुरक्षित रखने के लिए सुरक्षा कवच का काम करता है। संपूर्ण टीकाकरण सुनिश्चित करने के लिए प्रति वर्ष भारत में 90 लाख से भी अधिक टीकाकरण सत्रों का आयोजन किया जाता है। इस कार्यक्रम के तहत नीमोकॉक्कल कन्ज्यूगेट वैक्सीन (पीसीवी) और रोटावायरस वैक्सीन (आरवीवी) जैसे नए टीकों को भी शामिल किया गया है। इसके तहत एक देशव्यापी मीजल्स-रूबेला अभियान भी चलाया जा रहा है। जिससे सभी बच्चों को लक्षित किया गया है चाहे उनका आवास कही भी हो। इस प्रगति के बावजूद भी भारत में शिशु मृत्यु दर और अस्वस्थता में संक्रामक बीमारियों की उच्च भागीदारी है। भारत में लगभग 10 लाख बच्चे अपने पांचवा जन्मदिन मनाने से पहले ही मर जाते हैं। इनमें से चार में से एक की मृत्यु निमोनिया और डायरिया के कारण होती है जो विश्व भर में शिशु मृत्यु के दो प्रमुख संक्रामक बीमारी है। इनमें से अधिकांश को शिशु स्तनपान टीकाकरण एवं उपचार देकर बचाया जा सकता है।
विगत 70वर्षों में टीकाकरण यूनिसेफ के कार्य के केंद्र में रहा है। विश्व भर में शिशुओं के लिए सेवाओं को प्रदान करने के लिए इससे बढ़कर कोई संस्था नहीं है। यूनिसेफ भारत सरकार के टीकाकरण कार्यक्रम का तकनीकी साझेदार है और यह सरकार को सहयोग करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि टीकाकरण के द्वारा सुरक्षित किए जाने वाले बीमारियों से कोई भी शिशु प्रभावित न हो सके। सतत विकास लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए टीकाकरण का प्रसार महत्वपूर्ण है। एक समय हजारों बच्चों की जान लेने वाली बीमारियां,पोलियो और स्मॉल पॉक्स का उन्मूलन किया जा चुका है एवं प्राथमिक रूप से सुरक्षित व प्रभावी टीकों के कारण अन्य बीमारियां भी उन्मूलन के कगार पर हैं। यूनिसेफ भारत सरकार एवं अन्य साझेदारों के साथ-साथ स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का भी सहयोगी है। यूनिसेफ जीएवीआई को प्रस्तावना विकास,वार्षिक प्रगति प्रतिवेदन एवं क्रियान्वयन के माध्यम से सहयोग करता है। यूनिसेफ,राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह,टीकाकरण एक्शन समूह और पोलियो विशेषज्ञ सलाहकार समूह में नीति विकास का एक सक्रिय सदस्य है। यूनिसेफ सभी जगह सभी लड़कों और लड़कियों के लिए नियमित टीकाकरण पहुँच में सुधार करके,उनके जीवन को बचा कर,बाल अधिकार की वचनबद्धता को सुनिश्चित करता है। यह अपने सहयोगी एवं साझेदारों के साथ मिलकर सभी भौगोलिक स्थानों,ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में गरीबों,वंचितों,कम पढ़े लिखे समूहों में टीकाकरण की कमियों को समाप्त करने के लिए कार्यरत है। ऐसा करके यह सुनिश्चित करता है कि वह सभी शिशु जो टीकाकरण के लिए आते हैं उन्हें आवश्यक व पर्याप्त टीका के सभी डोज मिल सके। ऐसा करने के लिए सभी स्तर पर आवश्यक संसाधनों जैसे टीकाकरण करने वाले,आपूर्ति,कौशल,मोटिवेशन और सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित करना शामिल है।
फरवरी 2017 से अब तक भारत में 32 राज्यों में 23 करोड़ शिशुओं को एमआर टीका का डोज दिया जा चुका है। इस अभियान में उपयोग किया जाने वाले एमआर वैक्सीन का निर्माण भारत में किया गया है एवं उसे विश्वभर में उपयोग के लिए निर्यात भी किया गया है। मिशन इंद्रधनुष कार्यक्रम अभियान के बाद संपूर्ण टीकाकरण में 18.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। मिशन इंद्रधनुष से प्राप्त अनुभवों को देशभर में टीकाकरण से छूट चुके शिशुओं को टीकाकरण में शामिल करने और संपूर्ण टीकाकरण आच्छादन को 90 प्रतिशत तक स्थाई बनाने के लिए उपयोग किया जा रहा है।
शिशु मृत्यु दर को कम करने वाले पहल में टीकाकरण तक पहुंच को सुधारने के लिए भारत की वचनबद्धता महत्वपूर्ण है और सरकार के उच्च स्तर पर टीकाकरण की प्रधानता दी जाती है। 190 जिलों में यह मिशन इंद्रधनुष चलाया गया था। नियमित व प्रभावी टीकाकरण से भारत को प्रभावित करने वाले कई बीमारियों का उन्मूलन किया जा सकता है। वर्तमान दौर में टीकाकरण के महत्व को कमतर नहीं आंका जा सकता है। इंसानों को ज्ञात गंभीर और घातक बीमारियों या महामारियों से बचाने के लिए टीकाकरण ही सबसे प्रभावी उपाय है। भारत में पोलियो उन्मूलन इसका ज्वलंत उदाहरण है।
हाल ही में वैश्विक संक्रामक महामारी कोविड-19 के खिलाफ दुनियाभर में टीकाकरण की शुरुआत हुई है। इससे पहले भी दुनियाभर में व्यापक टीकाकरण अभियानों के परिणामस्वरूप दुनिया के प्रमुख हिस्सों से चेचक, खसरा, टिटनस जैसे अत्यधिक संक्रामक और खतरनाक बीमारियों का खात्मा हुआ है। राष्ट्रीय टीकाकरण दिवस की वर्ष 2022 की थीम है-‘‘वेक्सीनेस वर्क फाॅर ऑल’’ अर्थात् ‘‘सभी के लिए टीकाकरण’’। यह थीम इस बात की याद दिलाती है कि कोरोना संबंधी टीकाकरण के सारे डोज़ अभी पूर्ण नहीं हुए हैं। बड़ों के लिए अभी बूस्टर डोज़ बाकी है और अधिकांश बच्चों को सुरक्षा टीका लगना अभी शेष है। अतः स्वास्थ और सुरक्षा की दृष्टि से टीकाकरण के प्रति सभी का जागरूक होना जरूरी है।        
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(16.03.2022)
#शरदसिंह  #DrSharadSingh #चर्चाप्लस #दैनिक #सागर_दिनकर
#राष्ट्रीयटीकाकरणदिवस #nationlvaccinationday

Tuesday, March 15, 2022

अखिल भारतीय वैदिक संगोष्ठी में अपने शोध आलेख "वैदिक वांग्मय में जल की महत्ता एवं जल संरक्षण" का वाचन करते हुए डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह ने अपने विचार रखे

 

National Seminar On Vaidik Vangmay - Water Conservation Method in Vaidik Vangmay - Paper presented by Dr (Ms) Sharad Singh


"पूरी दुनिया जल संकट से जूझ रही है अतः अब समय आ गया है कि हम अपने अतीत के उन पन्नों को पलटें जिन पर जल के महत्व और संरक्षण के बारे में ज्ञान संरक्षित है। जी हां, हमारा वैदिक वांग्मय वह असीमित ज्ञान का भंडार है जो हमें पर्यावरण से तादात्म्य स्थापित करने का मार्ग दिखाता है। अथर्ववेद में यह निर्देश है कि मनुष्य को चाहिए कि वह वर्षा, कुआ, नदी और सागर के जल को, अपने खान-पान, खेती और शिल्प- कला आदि के लिए उपयोग करे एवं अपने जीवन को सम्पूर्ण बनाए और चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करे-

शं त आपो हैमवतीः शमु ते सन्तूत्स्याः ।
शं ते सनिष्पदा आपः शमु ते सन्तु वर्ष्याः।।
वैदिककाल में जल को सर्वोच्च स्थान दिया गया।
यदि हम अपने वैदिक वांग्मय का ध्यानपूर्वक अनुशीलन करें तो हम जल के महत्व को भली-भांति समझ सकते हैं। यह सर्वविदित है कि जो भी तथ्य अथवा तत्व हमें महत्वपूर्ण लगता है हम उसके प्रति सजग रहते हैं। अतः हमें जल के महत्व को समझते हुए उसके संरक्षण के बारे में भी तत्पर रहना होगा तभी हम अपनी आने वाली पीढ़ी को शुद्धजल सौंप सकेंगे। हमें प्रकृति और पर्यावरण के हर घटक को देवतुल्य मानकर संरक्षित एवं विकसित करने का प्रयास करना होगा। तभी पृथ्वी प्रसन्न रहेगी और अस्तित्व में रहेगी।" मैंने अपना शोध आलेख "वैदिक वांग्मय में जल की महत्ता एवं जल संरक्षण" का वाचन करते हुए अपने विचार रखे।
🚩अवसर था कल 14.03.2022 को डॉ हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर के संस्कृत विभाग एंव महर्षि संदीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान उज्जैन के सम्मिलित आयोजन में "वैदिक वांग्मय के विविध आयाम एवं प्रासंगिकता" विषय पर दो दिवसीय अखिल भारतीय वैदिक संगोष्ठी का प्रथम सत्र। जिसकी अध्यक्षता की नई दिल्ली से पधारे जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रो गिरीश पंत जी ने।
National Seminar On Vaidik Vangmay - Water Conservation Method in Vaidik Vangmay - Paper presented by Dr (Ms) Sharad Singh

National Seminar On Vaidik Vangmay - Water Conservation Method in Vaidik Vangmay - Paper presented by Dr (Ms) Sharad Singh

National Seminar On Vaidik Vangmay - Water Conservation Method in Vaidik Vangmay - Paper presented by Dr (Ms) Sharad Singh

National Seminar On Vaidik Vangmay - Water Conservation Method in Vaidik Vangmay - Paper presented by Dr (Ms) Sharad Singh

National Seminar On Vaidik Vangmay - Water Conservation Method in Vaidik Vangmay - Paper presented by Dr (Ms) Sharad Singh

National Seminar On Vaidik Vangmay - Water Conservation Method in Vaidik Vangmay - Paper presented by Dr (Ms) Sharad Singh

National Seminar On Vaidik Vangmay - Water Conservation Method in Vaidik Vangmay - Paper presented by Dr (Ms) Sharad Singh

National Seminar On Vaidik Vangmay - Water Conservation Method in Vaidik Vangmay - Paper presented by Dr (Ms) Sharad Singh

National Seminar On Vaidik Vangmay - Water Conservation Method in Vaidik Vangmay - Paper presented by Dr (Ms) Sharad Singh

National Seminar On Vaidik Vangmay - Water Conservation Method in Vaidik Vangmay - Paper presented by Dr (Ms) Sharad Singh

National Seminar On Vaidik Vangmay - Water Conservation Method in Vaidik Vangmay - Paper presented by Dr (Ms) Sharad Singh


🚩इसके ठीक पूर्व उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता की थी सागर विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ नीलिमा गुप्ता ने, मुख्य अतिथि थे डॉ राधावल्लभ त्रिपाठी, विशिष्ट अतिथि थे डॉ भवतोष इन्द्रगुरु। डॉ आनंद प्रकाश त्रिपाठी जी के संयोजकत्व में डॉ शशि कुमार सिंह, डॉ नौनिहाल गौतम, डॉ रामहेत गौतम डॉ विजय सिंह आदि संस्कृताचार्योंं ने आयोजन के विभिन्न सत्रों को संचालित किया।
🚩देश के प्रमुख वैदिक विद्वानों एवं उद्भट संस्कृताचार्यों की उपस्थिति विश्वविद्यालय ही नहीं वरन सागर नगर के लिए भी प्रसन्नता एवं गौरव का विषय है जिसके लिए अध्यक्ष संस्कृत विभाग डॉ आनंद प्रकाश त्रिपाठी जी साधुवाद के पात्र हैं।
🚩इस महत्वपूर्ण पटल पर मुझे अपने विचार रखने का अवसर देने के लिए हार्दिक आभार डॉ आनंद प्रकाश त्रिपाठी जी एवं डॉ शशि कुमार सिंह जी 🙏

पुस्तक समीक्षा | भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक गंभीर उपन्यास | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 15.03.2022 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई लेखक प्रदीप पाण्डेय के उपन्यास "पक्षद्रोह" की समीक्षा... आभार दैनिक "आचरण" 🙏
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पुस्तक समीक्षा
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक गंभीर उपन्यास
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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उपन्यास   - पक्षद्रोह
लेखक     - प्रदीप पांडेय
प्रकाशक   - प्रभात पेपरबैक्स, प्रभात प्रकाशन, 4/19, आसफअली रोड, नई दिल्ली- 110002
मूल्य      - 250 रुपए 
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भ्रष्टाचार का शाब्दिक अर्थ है वह आचरण जो किसी भी प्रकार से अनैतिक और अनुचित हो। जब कोई व्यक्ति न्याय व्यवस्था के मान्य नियमों के विरूद्ध जाकर अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए गलत आचरण करने लगता है तो वह व्यक्ति भ्रष्टाचारी कहलाता है। आज देश में भ्रष्टाचार अपनी जड़े जड़े जमा चुका है। आज पूरी दुनिया में भारत भ्रष्टाचार के मामले में 94वें स्थान पर है। भ्रष्टाचार के कई रंग-रूप है जैसे रिश्वत, काला-बाजारी, जान-बूझकर दाम बढ़ाना, पैसा लेकर काम करना, सस्ता सामान लाकर महंगा बेचना आदि। भ्रष्टाचार में मुख्य घूस यानी रिश्वत, चुनाव में धांधली, ब्लैकमेल करना, टैक्स चोरी, झूठी गवाही, झूठा मुकदमा, परीक्षा में नकल, परीक्षार्थी का गलत मूल्यांकन, हफ्ता वसूली, जबरन चंदा लेना, न्यायाधीशों द्वारा पक्षपातपूर्ण निर्णय, पैसे लेकर वोट देना, वोट के लिए पैसा और शराब आदि बांटना, पैसे लेकर रिपोर्ट छापना, अपने कार्यों को करवाने के लिए नकद राशि देना यह सब भ्रष्टाचार ही है। जीवन का कोई भी क्षेत्र इसके प्रभाव से मुक्त नहीं है। यदि हम इस वर्ष की ही बात करें तो ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जो कि भ्रष्टाचार के बढ़ते प्रभाव को दर्शाते हैं। यह एक संक्रामक रोग की तरह है। समाज में विभिन्न स्तरों पर फैले भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कठोर दंड-व्यवस्था की जानी चाहिए। आज भ्रष्टाचार की स्थिति यह है कि व्यक्ति रिश्वत के मामले में पकड़ा जाता है और रिश्वत देकर ही छूट जाता है। 
भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए सजगता और साहस जरूरी है। यह दोनों तत्व साहित्य के माध्यम से मन-मस्तिष्क में अपनी जगह बना सकते हैं। एक ऐसा नायक जो भ्रष्टाचारियों से स्वयं लड़ता है और अपने संघर्ष के द्वारा दूसरों को संघर्ष का मार्ग दिखाता है। निसंदेह इस तरह साहित्य का दायित्व चुनौती भरा हो जाता है। वस्तुतः नई-नई चुनौतियां साहित्य को परिमार्जित करती रहती हैं। साहित्य के लिए यह आवश्यक है कि वह पुरातन मूल्यों की नींव पर नवीनतम मूल्यों की इमारत खड़ी करता रहे। हिन्दी साहित्य में निःसंदेह इसे आवश्यकता को एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया गया। जहां तक बात उपन्यासों की है तो हिंदी उपन्यास लेखन में सन 1960 के बाद एक नया मोड़ शुरू होता है। साठ के बाद के हिंदी उपन्यासों में यथास्थितिवाद के स्थान पर संघर्ष और विद्रोह का आग्रह दिखाई पड़ता है। इस तरह के लेखन की शुरुआत हुई नई कहानी के रूप में। नई कहानी आंदोलन के पीछे जो तत्व प्रेरक शक्ति के रूप में काम कर रहे थे उसके मूल में मोहभंग, हताशा, कुंठा, देश का बंटवारा, सांप्रदायिक दंगे, संयुक्त परिवारों का तेजी से हो रहा विघटन, पारिवारिक संबंधों पर अर्थ का दबाव, प्रेम संबंधों की समस्या, अमीरी-गरीबी के बीच लंबी होती खाई, नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के बीच सामंजस्य की समस्या, बेरोजगारी, महानगरीयता, अकेलापन, शिक्षित और आर्थिक रूप से स्वावलंबी स्त्रियों की नई विचारधारा, कामकाजी स्त्रियों का दोहरा शोषण, जातिगत व्यवस्था में उपेक्षा का भाव आदि।
हमारे देश को सैकड़ों वर्ष तक गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहना पड़ा। अंग्रेजों ने भारत की अर्थव्यवस्था को इतना जर्जर कर दिया कि वह आज तक सम्हल नहीं सका है। यद्यपि 1967 के मध्यावधि चुनाव के दौरान आर्थिक असमानता को दूर करने का प्रयत्न किए गए। राजाओं की पेंशन बंद कर दी गई, बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया, चीनी राष्ट्रीय कोयला खदानों खाद्यान्नों का भी राष्ट्रीयकरण करने का प्रयत्न किया गया जिससे उल्टा असर हुआ परिणाम हुआ कि मुद्रास्फीति को बढ़ावा मिला चीजें महंगी होने लगीं। इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलने लगा। बाजारवाद ने आर्थिक परिस्थितियों का संतुलन तेजी से बिगाड़ा। परिणाम तक रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार सिर चढ़कर बोलने लगे। एक कागज को एक मेज से दूसरे मेज तक पहुंचाने के लिए मेज के नीचे से रिश्वत देने की परंपरा ने अपने अपनी जड़े जमा लीं। यदि कोई सरकारी काम करवाना है तो रिश्वत देना जरूरी हो गया। हिंदी साहित्य में आर्थिक भ्रष्टाचार पर लगभग हर विधा में लिखा गया। उपन्यास, कहानियां, व्यंग, कविताएं सभी विधाओं में भ्रष्टाचार का विश्लेषण एवं उसका निदान रेखांकित किया गया। इस दिशा में श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास ‘‘राग दरबारी’’ सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है जिसमें हर स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार को खुलकर सामने रखा गया। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही उदय प्रकाश की लंबी कहानी ‘‘दिल्ली की दरबार’’ प्रकाशित हुई थी। जयप्रकाश कर्दम का उपन्यास ‘‘उत्कोच’’ भी कुछ ऐसे ही विषय पर है। जो यह दृश्य सामने रखता है कि बिना रिश्वत दिए कोई काम हो पाना संभव नहीं है इसी क्रम में युवा लेखक प्रदीप पांडेय का उपन्यास पक्षद्रोह भ्रष्टाचार के एक और पक्ष को सामने रखता है। इस उपन्यास का नायक विक्रम स्वाभिमानी है। ईमानदारी का जीवन जीना चाहता है लेकिन समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार दफ्तरों में व्याप्त रिश्वत लेने देने की परंपरा उसे ईमानदारी से डिगाने पर तत्पर दिखाई देती है। लेकिन विक्रम इसका इसका रास्ता ढूंढ निकालता है। यह उपन्यास युवा पीढ़ी से एक ऐसा आग्रह करता दिखाई देता है जिससे समाज में आर्थिक अपराध कम हो सकते हैं। यद्यपि यह रास्ता आसान नहीं है। विक्रम को भी अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है क्योंकि विक्रम युवा है अतः उसके हृदय में उत्पन्न होने वाली प्रेम की भावना भी उपन्यास में एक अलग रंग भर्ती है जो कि मानव जीवन के एक महत्वपूर्ण पक्ष को इंगित करती हैं। जिसमें वह घर बसाना चाहता है और सुख में जीवन जीना चाहता है। 
लेखक प्रदीप पांडे सामाजिक कार्यों से भी जुड़े हुए हैं और राजनीतिक स्तर पर भी उन्होंने भ्रष्टाचार की हर एक रंग को निकट से देखा है इसलिए उन्होंने अपने उपन्यास में इसे बड़ी बारीकी से प्रस्तुत किया है। भ्रष्टाचार जगत में व्याप्त टेबल से नीचे पैसे देने का मुहावरा प्रयोग में लाते हुए प्रदीप पांडे ने बड़े दिलचस्प शैली में लिखा है- ‘‘बहुत खूब जो लोग जुबान के पक्के होते हैं, वे जीवन में बहुत तरक्की करते हैं।’’ ‘‘बैग में से पेपर का बंडल निकालकर पेपर को फाड़ते हुए नोट का बंडल निकालकर विक्रम बोला- ‘यह पैसे मैं आपको फिल्मों की तरह टेबल से नीचे दूंगा।’ ‘हां हां, लाओ कहीं से भी दे दो’ हंसकर साहब ने कहा और टेबल के नीचे से पैसे लेते हुए पूछा- ‘क्या लोगे?’ रुपए टेबल पर रखे बैग में रखते हुए पूछा-‘क्या लोगे ठंडा या गरम?’ ‘चाय चल जाएगी साहब, पचहत्तर हजार की चाय तो बनती ही है साहब ।’ 
जीवन में चुनौती को स्वीकार करना और आत्मविश्वास बनाए रखना यह दोनों स्थितियां भ्रष्टाचार के विरुद्ध खड़ा होने का साहस प्रदान करती हैं। इस संबंध में उपन्यासकार प्रदीप पांडेय ने एक स्थान पर लिखा है-‘‘जीवन में आपके द्वारा उठाया गया कोई भी कदम जो आपके स्वयं के अथवा सामाजिक सिद्धांतों से बाहर है, वही चुनौती होती है, वही जो व्यक्ति जीवन की प्रत्येक चुनौती को सहज स्वीकार कर ले तो समझ ही उसमें जी वक्ता कूट-कूट कर भरी है। कई दफा हमारा आत्मविश्वास सातवें आसमान पर होता है, हम हार जाते हैं। इसके पीछे एक ही कारण है एकाग्रता का न होना।’’
एक समूचा कथानक रिश्वतखोरी के विरुद्ध आवाज़ उठाता है, यह भी अपने-आप में विशिष्टतापूर्ण है। वैसे उपन्यास लेखन की भी अपनी निजी चुनौतियां होती हैं। एक कथानक को संतुलित विस्तार देना और विविध पात्रों को उनका उचित स्पेस देते हुए रोचक तत्वों को समाहित करना सुगम नहीं होता है। कई बार अतिरेक में बह जाने का भय होता है लेकिन उपन्यास लेखन के क्षेत्र में पहलकदमी करते हुए प्रदीप पांडेय ने संतुलन बनाए रखा है जिससे उपन्यास की रोचकता आद्योपांत बनी रहती है। यह उपन्यास सामाज में व्याप्त दूषित व्यवस्थाओं की वास्तविकता से अवगत करता है। मेडिकल लाइसेंस बनाने के बदले ड्रग ऑफिसर द्वारा रिश्वत मांगने से शुरू हुई कहानी विभिन्न मोड़ लेती हुई एक ऐसे क्लाइमैक्स तक पहुंचती है, जहां पक्ष और विपक्ष दोनों ही अनिर्णय की स्थिति में स्वयं को पाते हैं। वही अचानक साक्ष्य के आधार पर न्यायालय निर्णय तक पहुंचता है। लेकिन पक्ष में खड़ा व्यक्ति पक्षद्रोह का दोषी दिखाई देने लगता है तथा भ्रष्टाचारी एक अजीब परिस्थिति में स्वयं को पाकर चैका देने वाला कदम उठाता है। इस पूरे उपन्यास को पढ़ते समय पाठक स्वयं को उपन्यास के नायक विक्रम के साथ-साथ चलता हुआ स्वयं को महसूस करेगा, यह बात विश्वास पूर्वक कही जा सकती है। समाज में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे कभी न कभी किसी ना किसी भ्रष्टाचार का सामना न करना पड़ा हो। लगभग हर व्यक्ति को अपने जीवन में कम से कम एक बार और अधिकतम अनेक बार भ्रष्टाचार का सामना करना ही पड़ता है चाहे वह उस के पक्ष में खड़ा हो अथवा ना हो लेकिन भ्रष्टाचारी का चेहरा वह अपने सामने पाता है।
प्रदीप पांडेय का उपन्यास सटायर न होकर एक गंभीर उपन्यास है जो भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे पर गंभीरता से सोचने का तीव्र आग्रह करता है। यह उपन्यास निश्चित रूप से पाठकों को पसंद आएगा और उन्हें चिंतन मनन के लिए विवश करेगा।
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