Tuesday, March 31, 2026

पुस्तक समीक्षा | दादू का पिटारा : बालमन के लिए एक जरूरी सृजन | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
दादू का पिटारा : बालमन के लिए एक जरूरी सृजन
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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बाल कहानी संग्रह - दादू का पिटारा
लेखक - गोकुल सोनी
प्रकाशक - इंद्रा पब्लिशिंग हाउस, ई-5/21,अरेरा कॉलोनी, हबीबगंज पुलिस स्टेशन रोड, भोपाल 462016
मूल्य -199/-
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    बाल कहानियों का प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में बहुत महत्व होता है। बचपन में सुनी हुई कहानियां व्यक्ति के व्यक्तित्व के निर्माण में सहायक होती हैं। ये मात्र मनोरंजन नहीं, वरन जीवन से जुड़ी शिक्षाओं का अनौपचारिक माध्यम होती हैं। बाल कहानियाँ बच्चों के सर्वांगीण विकास में एक आधारभूत भूमिका निभाती हैं। ये न केवल मनोरंजन का साधन हैं, बल्कि ज्ञान, नैतिकता और भाषा सीखने का सबसे प्रभावी माध्यम भी हैं। बचपन में कहानी सुनाना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बच्चों को व्यस्त रखता है, भाषा के विकास को बढ़ावा देता है और उनकी कल्पनाशीलता को बढ़ाता है। कहानियों के माध्यम से बच्चे अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं, नई दुनिया और विचारों से परिचित हो सकते हैं और सीखने के प्रति रुचि विकसित कर सकते हैं। कहानियाँ बच्चों की कल्पना शक्ति  और तर्कशक्ति को बढ़ाती हैं। यह उन्हें नए विचारों और रचनात्मक तरीके से सोचने के लिए प्रेरित करती हैं। कहानियाँ सुनने या पढ़ने से बच्चों के शब्दकोश  में वृद्धि होती है और उनकी भाषा शैली बेहतर होती है। यह उनमें सुनने, बोलने, पढ़ने और लिखने  के कौशल को विकसित करती हैं। अधिकांश बाल कहानियाँ, विशेष रूप से पंचतंत्र की कहानियाँ, ईमानदारी, दया, साहस, और मित्रता जैसे नैतिक गुण सिखाती हैं। भावनात्मक और सामाजिक समझरू कहानियों के पात्रों के माध्यम से बच्चे भावनाओं (जैसे खुशी, दुख, डर, सहानुभूति) को समझते हैं। यह उन्हें सामाजिक परिस्थितियों को समझने और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने में मदद करती हैं। पौराणिक और लोककथाएँ बच्चों को अपनी संस्कृति, इतिहास और परंपराओं से परिचित कराती हैं। कहानी सुनना बच्चों में ध्यान केंद्रित करने  की क्षमता बढ़ाता है और उनके मन में जिज्ञासा पैदा करता है।यह बच्चों के लिए मनोरंजक होने के साथ-साथ तनावमुक्त होने का एक स्वस्थ साधन भी है। बाल कहानियाँ बच्चों को आदर्श नागरिक बनने, उनके व्यक्तित्व को निखारने और उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
कई बार संवाद में यह सामने आता है कि एक तो बाल साहित्य को हमंशा हाशिए पर खड़ा रखा गया, उस पर बाल साहित्य के स्वरूप को ही कई साहित्यकार समझ नहीं पाते हैं। जबकि हमारे देश में प्राचीनकाल से बाल साहित्य रचा जा रहा है। विष्णु शर्मा ने चार उद्दंड राजकुमारों को शिक्षित करने तथा जीवन की नीतियों का ज्ञान देने के लिए वे कहानियां सुनाईं जिनके पात्र पशु, पक्षी थे। हम उन कहानियों के संग्रह को ‘‘पंचतंत्र’’ के नाम से जानते हैं। प्रश्न आता है सबसे नवीनतम टैक्नोलाजिकल स्थिति का, जिसे हम ‘‘एआई’’ यानी आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस के नाम से जान रहे हैं। उसने तूफान की तरह बड़ी तरंगे उठानी शुरू कर दी हैं। कहा तो ये जाता है कि इन दिनों कई किताबें भी एआई के द्वारा लिखी जा रही हैं। क्या यह छल बाल साहित्य के मर्म को समझ सकेगा? जबकि बाल साहित्य से अपेक्षा की जाती है कि वह टेक्नाॅलाजी के साथ परिवर्तित होते युग में बच्चों के लिए मानवीय मूल्यों, राष्ट्रीय मूल्यों और आदर्श पूर्ण मूल्यों को बनाए रखे। यह एक चुनौती है। शासकीय इकाइयां मात्र सहायता कर सकती हैं, अन्यथा इस चुनौती से स्वयं साहित्यकारों को निपटना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि वे साहित्य सृजन करने में एआई के छल का सहारा न लें, वर्तमान बाल मनोविज्ञान को समझें और पारंपरिक मूल्यों व संस्कारों को आधुनिक प्रवृतियों के साथ इस प्रकार समायोजित करें कि वह बच्चों को मनोरंजन और शिक्षा एक साथ मिल सके तथा उनमें पुस्तक पढ़ने के प्रति रुचि जाग सके।
कथाकार गोकुल सोनी ने पांपरिक कलेवर की कथाओं को बड़ी रोचकता से आधुनिक वैज्ञानिकता से जोड़ दिया है जिससे वे ज्ञानवर्द्धन तथा समसामयिकता की शर्तों को अच्छी तरह से पूरा करती हैं। इस संदर्भ में “आश्वति” के अंतर्गत मनीष गुप्ता, निदेशक, इंद्रा पब्लिशिंग हाउस, भोपाल ने संग्रह की विशेषताओं को बखूबी रेखांकित किया है। उन्होंने लिखा है कि “श्री गोकुल सोनी साहित्य जगत में एक जाना पहचाना नाम है। मैं उनके सदैव कुछ नया सोचने और कुछ नया करते रहने की विलक्षण क्षमता का कायल हूं। वे चाहे व्यंग्य लिखें, गीत, कविता, लघुकथा या कहानी लिखें उसमें रोचकता और पठनीयता तो होती ही है, उनके विषय अक्सर ऐसे होते हैं जो दूसरों की दृष्टि से छूट गए होते हैं। प्रस्तुत पुस्तक ष्दादू का पिटाराष् जिसको ‘जादू का पिटारा’ भी कहें तो अतिशयोक्ति न होगी, क्योंकि इस बाल कहानी संग्रह की कहानियों में जहां आज के समय की नवीनतम टेक्नालॉजी से खेल खेल में परिचित कराती कहानियां, जैसे ड्रोन, साइबर फ्रॉड, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, के सिद्धांतों पर आधारित जादू की कहानियां हैं तो वहीं मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कैसे बढ़ाएं, बीमारियों से बचाव कैसे करें, हमारा स्वस्थ आहार कैसा हो, ग्रामीण परिवेश, संस्कृति, तीज त्यौहार, भी हैं। छोटे बच्चों की मन को लुभाने वाली शैतानियां हैं, तो किशोर वय के बच्चों को ऐसी कहानियां भी हैं जो उनको अपने कैरियर को चुनने में मार्गदर्शक सिद्ध होंगी।”

संग्रह में कुल 24 कहानियां हैं जिनमें अन्वय और जूते, अन्वय मंदिर में, अर्जुन और केंचुआ, मकर संक्रांति, चलें गांव की ओर, ज्न्म दिन, गुलेल, ड्र्ोन दीदी, गुमशुदा तारे, लालच की सजा, सावधानी हटी दुर्घटना घटी जैसी विविधतापूर्ण कहानियां हैं। “ग्राम्य-जीवन-परिदृश्य की कहानियाँ वैज्ञानिक सोच के साथ” शीर्षक से महेश सक्सेना निदेशक,बाल कल्याण एवम बाल साहित्य शोध केंद्र,भोपाल ने लिखा है कि “यूँ साधारण से दिखने वाले श्री गोकुल सोनी मध्यप्रदेश के प्रतिभावान, प्रभावशाली, साहित्यिक प्रतिभा के असाधारण व्यक्ति है। वे एक कवि, लेखक, लोकभाषा बुन्देली के अध्येता, कथाकार, पैनी लघुकथा के सर्जक तो हैं ही, लेकिन एक उत्कृष्ट व्यंग्यकार तथा समीक्षक की उनकी विशिष्ट पहचान है। प्रायः वे छोटे-बड़े आयोजनों में किसी भी विधा की पुस्तक पर समीक्षात्मक आलेख पढ़ते हुये नजर आते हैं। उनके हर समीक्षात्मक आलेख से रचना और रचनाकार का कद बढ़ता है तथा समुचित मार्गदर्शन भी मिलता है।”

  डॉ. विकास दवे, निदेशक, साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश शासन, भोपाल ने संग्रह की कहानियों को “बालमन से सरोकार रखती, चिंतन से उपजी कहानियां” कहते हुए लिखा है कि “इस पुस्तक की सबसे अच्छी बात है, रचनाओं का बालमन से सरोकार। उस पर ‘सोने पर सुहागा’ यह कि वे आत्यंतिक मानवीय चिंतन प्रक्रिया से उपजी हैं। ये इस पुस्तक की दो सशक्त भुजाएं हैं। गोकुल जी लंबे समय से लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं। विविध विधाओं में लेखन करते हैं। आपके परिश्रम की यह सुंदर परिणीति बाल साहित्य विधा में प्रथम प्रयास है जो अप्रतिम बन पड़ेगी इसमें कोई संशय नहीं।”

    गोकुल सोनी ने अपने इस बाल कहानी संग्रह के स्वरुप में आने के परिप्रेक्ष्य में लिखा है कि “बच्चों के लिए कहानियां और कविताएं में काफी समय से लिखता आ रहा हूं, कुछ प्रकाशित भी हुई हैं परंतु ऐसा कभी कभार ही होता था। सदैव मुझे भ्रातावत स्नेह देने वाले आदरणीय श्री महेश सक्सेना जी ने मुझसे पिछले वर्ष एक आग्रह किया कि सोनी जी, जब आप प्रत्येक विधा में लिखते हैं तो बाल साहित्य की भी कोई पुस्तक आपकी आना चाहिए। मैंने उनके आग्रह को आदेश मानते हुए उनसे वायदा किया कि मेरा पूर्ण प्रयास होगा कि एक वर्ष में कम से कम एक बाल साहित्य की पुस्तक आपको अवश्य भेंट करूँगा। उसी प्रेमाग्रह का परिणाम है यह बाल कहानी की पुस्तक। इन कहानियों के विषयों का अनुमोदन भी उनसे कराया और उनका मूल्यवान मार्गदर्शन पाकर ही मैंने ये कहानियां लिखी। सरल सहज व्यक्तित्व के धनी, आत्मीय प्रेम से परिपूर्ण, बाल साहित्य के निष्णात विद्वान श्री महेश सक्सेना जी का मार्गदर्शन पाकर मैं ही नहीं, अनेकों बाल साहित्यकार पुष्पित और पल्लवित हुए हैं। मेरे लिए दूसरे मार्गदर्शक की भूमिका का निर्वाह किया मेरे आत्मीय अनुज डा. विकास दवे जी ने। ‘बालवीर’ जैसी प्रतिष्ठित बाल-पत्रिका का बतीस वर्षों तक संपादन करने वाले डा. विकास दवे जी का अनुभव संसार भी बहुत समृद्ध है।”
गोकुल सोनी ने जहां ‘‘अन्वय के जूते’’ में प्रिय लगने वाला कोई भी सामान उठा लेने की बालमनोवृति को सामने रखा है तो वहीं ‘‘अर्जुन और केंचुआ’’ में मिट्टी की उर्वरता के लिए केंचुओं के महत्व को बड़े सरल ढंग से समझाया है। ‘‘ड्रोन दीदी’’ में कृषि कार्य एवं कृषि को हुए प्रकृतिक नुकसान के आलन में ड्रोन की भूमिका को कथात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। अर्थात कहानी की कहानी और ज्ञान का ज्ञान। ‘‘गुमशुदा तारे’’ में जुगनुओं के बारे में बताया गया है। वहीं, ‘‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’’ में साइबर अपराधों और डिजिटल अरेस्ट के बारे में बताया गया है। यद्यपि यह कहानी भाई दृष्टि से तथा विषय के अनुसार बालमन से अधिक युवाओं तथा प्रौढों के लिए अधिक सटीक बैठती है किन्तु अन्य सभी कहानियां भाषाई स्तर पर बच्चों के लिए शिक्षाप्रद कहानियां हैं। इस प्रकार की कहानियां अधिक से अधिक लिखी जानी चाहिए। विशेषरूप से बालकथानकों को आधुनिक परिवेश से जोड़ कर बच्चों में कहानियों के प्रति रूचि जगाई जा सकती है। इस दृष्टि से गोकुल  सोनी का बाल कहानी संग्रह ‘‘दादू का पिटारा’’ एक उत्तम कृति है।
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Saturday, March 28, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | अब झटका जोर से लगहे, बिजली वारे अगले महिना से झटका देबे वारे आएं | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
अब झटका जोर से लगहे, बिजली वारे अगले महिना से झटका देबे वारे आएं
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
     ई साल सबरे त्योहार  जल्दी- जल्दी कढ़ गए सो गर्मी को मौसम सोई तनक जल्दी आ गओ। ऊको बी लगो हुइए के पेड़-मेंड़ सो कटत जा रए सो अपन सोई मार्च के मइना से अपनो दम दिखान लगें। जो बात होए दम दिखाबे की तो बिजली के झटका से बड़ो दम तो कोनऊं को हो नई सकत। नईं-नईं, बा वारो झटका नोईं जो बिजली के तार छूबे से लगत आए। हम बा वारे झटका की कै रए जोन बिजली के बिल को छूबे से लगत आए। हऔ बिजली विभाग वारे अगली माह से जोर को झटका देबे वारे आएं। टैरिफ सो बढ़ाई रए आएं औ ऊपे से जे सोई तै कहानो के जोन ने संझा बिरियां छै से दस बजे लौं बिजली से चलत वारीं बड़ी चीजें चलाईं उने अच्छे पइसा घलहें। 
     चलो मान लओ के तेल वारे देसन में चल रई लड़ाई के चलत भए डीजल, पेटरोल पे कोनऊं संकट आ सकत आए, मनो जे बिजली वारे काए दाम बढ़ा रए। चलो जे बी मान लई के गरमी खपत बढ़बे के कारन दाम बढ़ा रए। सो का बरसात सुरू होबे पे टैरिफ कम कर देहें? रामधई! ऐसो कभऊं नईं होत के रुपइया भरे बढ़ाए गए दाम पूरे रुपइया घटे होंए। भौत करी तो आठ पईसा ने तो दस पईसा घटा के खुनखुना पकरा दओ जात आए। सो, अगली मईना से जोर को झटका खाबे को तैयार रहियो औ पसीना पोंछत रहियो। जो हो सके तो ठिलिया से ले के बरफ को गोला खात रहियो। ईसे कूलर, पंखा चलाबे की जरूरत ने परहे। जै राम जी की!
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Thursday, March 26, 2026

बतकाव बिन्ना की | जरूरत आए ‘‘माई’’ को मतलब समझबे की | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
जरूरत आए ‘‘माई’’ को मतलब समझबे की
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
‘‘जो कोनऊं त्योहर चलत आएं तो समै को पतो नईं परत। आज प्रथमा, सो काल दुतिया औ परों तृतिया औ जेई तरां से सप्तमें औ आठें सोई गुजर जात आएं। मनो दिन को सोई पतो नई परत के कैसे गुजर जात आए।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘हऔ बिन्ना! ऐसई करत-करत जिनगी गुजर जात आए।’’ भौजी तनस सोंसत सी बोलीं।
‘‘ऐसी काए कै रईं? ई दफा तो चैत की नवरातें बी पैले पर गईं औ बीच में तनक पानी सोई गिर गओ सो ठंडक बनी रई। नें तो जो कभऊं अप्रैल में नवरातें परत आएं तो धूप तपन लगत आए औ उपास राखबे में सोई परेसानी होत है। ई दफे तो मंदिर-दिवाला गए में गोड़े बी नईं जरे। जोन दिनां मैं ज्वाला देवी के मंदिर गई रई ऊ दिनां उतई पानी परसन लगो रओ। भौतई अच्छो सो मौसम हो गओ रओ। बाकी फसल के लाने जरूर चिंता भई रई काए से के रसता में देखी रई के फसल कट के खेतन में सूखबे खों धरी हती औ कऊं-कऊं तो खड़ी हती। मने कटाई बी नईं भई रई।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘जा सब तो ठीक आए बिन्ना मनो जे देखो के अपने इते नौ-नौ दिन लौं देवी माई की पूजा होत आए। सबरे लुगवा सोई माई की पूजा करत आएं, उपास रखत आएं। कोऊ-कोऊ तो नौ दिनां चप्पलें नईं पैनत, दाढ़ी नईं कटात औ धरती पे सोऊत आएं। मनो माई खों प्रसन्न करबे के लाने खूब-खूब जतन करत आएं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, जे तो आप सांची कै रईं। मनो लुगाइयां सोई नौ दिनां उपवास राखत आएं। कोऊ फलाहारी करत आएं तो कोऊ निरजला लौं रैत आएं। माई को खुस को नईं करबेा चात आए? सबई चात आएं के माई की किरपा उनपे बनी रए।’’ मैंने कई।
‘‘जेई तो बात आए बिन्ना, के एक तरफी तो सब चात आएं के माई की किरपा उनपे बनी रए औ दूसरी तरफी बे मरई को मतलब नईं समझत आएं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘का मतलब आपको? तनक खुल के बोलो आप।’’ मैंने कई।
‘‘हम का खुल के बोलें? सब कछू तो आंगू में खुलो डरो।’’ भौजी बोलीं।
‘‘मनो मोए समझ नईं पर रई के आप का कैबो चा रईं? सो तनक जे सोई बताओ के जे आप काए के बारे में कै रईं?’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘अरे, मोए तो रै-रै के बोई खयाल परत आए के बा बिचारी खों कैसो लगो हुइए जब ऊके घरवारे ने ई ऊको मारो औ गाड़ी में बार दऔ।’’भौजी बोलीं।
‘‘कऊं आप बा डाक्टर वारी घटना की तो नईं कै रईं?’’मैंने भौजी से पूछी।
‘‘हऔ, ओई की बात कर रई। कैसो राकस डाक्टर रओ ऊ?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ बा घटना के बारे में मैंने सोई पढ़ी रई औ मोए बी बुरौ लगो रऔ।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘नईं, तुमई सोचो बिन्ना के जो का मतलब भओ? एक तरफी तो सबई जने माई की पूजा करत आएं। औ कओ बी जात आए के जां लुगाई की इज्जत होत आए उते देवता रैत आएं। औ इते तो लुगाइयन की इज्जत का, जान को ठौर नइयां। अरे तुमें नईं पुसा रई तो छोड़ो। छोर-छुट्टी करा लेओ औ दूसरी राख लेओ। जे का के तुमे अब नई पुसा रई सो तुमने ऊको मार के ठिकाने लगा दओ। का बा इंसान नोंई? कोनऊं सामान आए का के बोर हो गए सो तोड़-ताड़ के कूडा में मेंक दओ, ने तो बार दओ। बा जोन डाक्टर ने अपनी लुगाई खों कार में बार दओ, अबे तो पतो परहे के मार के बारो के बारत समै बा जिन्दा हती?’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ भौजी! कोन टाईप के होत आएं जे ओरें जो कोऊ खों ऐसे मारबे को करेजा रखत आएं। इते ब्लड टेटस्ट के लाने जाओ तो खून नईं देखो जात आए। मैं तो अपनों मों दूसरी तरफी फेर लेत आओं। बा तो भौतई बुरौ करो बा नीच आदमी ने। ऊको तो डाक्टर कैबे में डाक्टरन को अपमान होत आए।’’ मैंने कई।
‘‘एक बोई का? अखबार उठा के देख लेओ, मुतकी खबरे मिल जैहें ई टाईप की। कऊं दहेज के लाने मार डारत आएं तो कऊं इज्जत लूट के बार देत आएं तो कऊं खाली दूसरी लाबे के चक्कर में निपटा देत आएं। मनो लुगाई ने भई कोनऊं बेजान चीज हो गई के मन भर गओ तो तोड़-मोड़ के मेंक दओ। ऊपे दम भरत आएं माई की पूजा की। अरे, जोन समाज में ऐसे लुगवा रैत होंए ऊपे माई काए खों प्रसन्न हुइएं?’’ भौजी तनक गुस्सा सी करत भई बोलीं। मनो उनकी बात सांची हती।
‘‘आप सई कै रईं भौजी, जो माई खों समझबे को दम भरत आएं उने लुगाई की जान की बी इज्जत करो चाइए। हमें तो जे देख के लगत आए के अपने ई समाज में धरम खों समझबे वारे कित्ते आएं औ धरम के नांव पे ठेकेदारी करबे वारे कित्ते आए? अब आपई देखो के ज्यादा से ज्यादा व्रत त्योहार अपन ओरन मने लुगाइन के करे से चल रए। या तक के मैंने देखी आए के कई मंदिरन में मंगल के मंगल सुंदरकांड को पाठ करो जात आए, बा बी लुगाइयां करत आएं। कम से कम बजरंगबली के लाने तो लुगवों खों टेम निकारने चाइए। पैले जोई होत्तो, मंगलवार खों लुगवा हरें मंदर में भजन गाउत्ते और बजरंबली की पूजा करत्ते। अब उने मोबाईल पे टिपियाबे से फुरसत नइयां।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘औ का, जेई से तो जे सब कांड होन लगे। औरन बी मोबाईल पे बा न्यूज देख-सुन लई औ अगली पोस्ट पे बढ़ गए। कोन खों परी के ऊके विरोध में कछू हल्ला-गुल्ला करें। जितनी बहस फिलम पे होत आए उत्ती तो ई टाईप की घटना पे लौं नई होत। औ ईके लाने अपन लुगाइयां सोई जिम्मेवार कहाईं।’’ भौजी बोलीं।
‘‘बा कैसे?’’ मैंने पूछी।
‘‘बा ऐसे के अपन माई के नौ रूपों की पूजा तो करत आएं मनो उनके घांईं बनबे की सोचत बी नइयां। तनक अपने भीतरे जो माई को भाव ले आवें सो कोन की हिम्मत के अपन खों कछू कर सके। बोलो सई कई के नईं?’’ भौजी ने मोसे पूछी।
‘‘बिलकुल सई कै रई आप। का आए के डरने या घबड़ाने का नईं, हिम्मत से मुकाबला करबे की जरूरत आए। जो कोनऊं बदमाशी करे सो ऊको इूंसई-ठूंसा मारो फेर देखो माई कैसे साथ देत आएं।’’ मैंने भौजी से कई।
‘‘जेई लाने ई दफा सो हमने माई से जेई मांगो के सगरे लुगवा औ लुगाइयन खों बुद्धी दे माई औ लुगाइयन खों तनक बुद्धी के संगे शक्ति देंवें के बे जो खतरा देखें तो बुद्धी से काम लेवें। पैले खुद सामना करें औ जो लगे के मदद की जरूरत आए तो संकोच ने करें औ सबई से मदद मांगे। कुट-पिट के बाथरूम में अपट परी कैबे से काम ने चलहे। इसे बुरै इंसानों के हौसले बढ़त आएं। काए सई कई के नईं?’’ भौजी बोलीं।
‘‘बिलकुल सई भौजी। जब तक सबरे जे ने समझहें के माई को मतलब का आए तब तक खाली पूजा करे से कछू ने मिलहे। सबई खों माई को मतलब समझबे की जरूरत आए।’’ मैंने कई।  
आकी बतकाव हती सो बढ़ी गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के आप ओरें माई को मतलब कित्तो समझत हो?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, March 25, 2026

चर्चा प्लस | स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं माता दुर्गा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चाप्लस 
स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं माता दुर्गा
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह                            
   नवरात्रि...नौ दिन देवी दुर्गा के नौ रूपों की स्तुति... दुर्गा जो स्त्रीशक्ति का प्रतीक हैं, असुरों का विनाश करने की  क्षमता रखती हैं... किन्तु इस बात पर विश्वास करना ही र्प्याप्त है क्या? सिर्फ़ सोचने या मानने से नहीं बल्कि करने से कोई भी कार्य पूरा होता है। इसलिए यदि आज स्त्री प्रताड़ित है, अपराधों का शिकार हो रही है तो उसे अपनी शक्ति को पहचानते हुए स्वयं दुर्गा की शक्ति में ढलना होगा। डट कर समाना करना होगा स्त्रीजाति के विरुद्ध की समस्त बुराइयों का और स्त्री का सम्मान करना सीखना होगा समस्त पुरुषों को, तभी नवरात्रि का अनुष्ठान सार्थक होगा।


या देवि सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।
मां दुर्गा की उपासना करते समय जिस स्त्रीशक्ति का बोध होता है वह उपासना के बाद स्मरण क्यों नहीं रहता? न स्त्रियों को और न पुरुषों को। समाचारपत्रों में आए दिन स्त्री के विरुद्ध किए गए जघन्य अपराधों के समाचारों भरे रहते हैं। कभी तेजाब कांड तो कभी दहेज हत्या तो कभी बलात्कार और बलात्कार के बाद नृशंसतापूर्वक हत्या। ये घटनाएं हरेक पाठक के दिल-दिमाग़ को झकझोरती हैं। बहुत बुरा लगता है ऐसे समाचारों को पढ़ कर। समाज में आती जा रही चारित्रिक गिरावट को देख कर अत्यंत दुख भी होता है लेकिन सिर्फ़ शोक प्रकट करने या रोने से समस्या का समाधान नहीं निकलता है। देवी दुर्गा का दैवीय चरित्र हमें यही सिखाता है कि अपराधियों को दण्डित करने के लिए स्वयं के साहस को हथियार बनाना पड़ता है। जिस महिषासुर को देवता भी नहीं मार पा रहे थे उसे देवी दुर्गा ने मार कर देवताओं को भी प्रताड़ना से बचाया।

नवरात्रि के दौरान लगभग हर हिन्दू स्त्री अपनी क्षमता के अनुसार दुर्गा के स्मरण में व्रत, उपवास पूजा-पाठ करती है। अनेक महिला निर्जलाव्रत भी रखती हैं। पुरुष भी पीछे नहीं रहते हैं। वे भी पूरे समर्पणभाव से मां दुर्गा की स्तुति करते हैं। नौ दिन तक चप्पल-जूते न पहनना, दाढ़ी नहीं बनाना आदि जैसे सकल्पों का निर्वाह करते हैं। लेकिन वहीं जब किसी स्त्री को प्रताड़ित किए जाने का मामला समाने आता है तो अधिकांश स्त्री-पुरुष तटस्थ भाव अपना लेते हैं। उस समय गोया यह भूल जाते हैं कि आदि शक्ति दुर्गा के चरित्र से शिक्षा ले कर अपनी शक्ति को भी तो पहचानना जरूरी है।
किसी भी प्रकार की प्रताड़ना या हिंसा का स्त्रीसमाज पर शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक दुष्प्रभाव पड़ता है। इसके कारण महिलाओं के काम तथा निर्णय लेने की क्षमता पर प्रभाव पड़ता है। परिवार में आपसी रिश्तों और आसपड़ौस के साथ रिश्तों व बच्चों पर भी इस हिंसा का सीधा दुष्प्रकभाव देखा जा सकता है। इससे स्त्रियों की सार्वजनिक भागीदारी में बाधा पड़ती है और वे स्वयं को अबला समझने लगती हैं। जबकि इसके विपरीत मां दुर्गा का चरित्र उन्हें दृढ़ और सबल होने का संदेश देता है।

हिन्दुओं के शाक्त साम्प्रदाय में भगवती दुर्गा को ही दुनिया की पराशक्ति और सर्वोच्च देवता माना जाता है। उल्लेखनीय है कि शाक्त साम्प्रदाय ईश्वर को देवी के रूप में मानता है। वेदों में तो दुर्गा का व्यापाक उल्लेख है। उपनिषद में देवी दुर्गा को “उमा हैमवती“ अर्थात् हिमालय की पुत्री कहा गया है। वहीं पुराणों में दुर्गा को आदिशक्ति माना गया है। वैसे दुर्गा शिव की अर्द्धांगिनी पार्वती का एक रूप हैं, जिसकी उत्पत्ति राक्षसों का नाश करने के लिये देवताओं की प्रार्थना पर पार्वती ने धारण किया था देवी दुर्गा के और भी कई रूपों की कल्पना की गई है। दुर्गा सप्तशती में दुर्गा के कई रूप भी बताए गए है, जैसे- ब्राह्मणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नरसिंही, ऐन्द्री, शिवदूती, भीमादेवी, भ्रामरी, शाकम्भरी, आदिशक्ति, रक्तदन्तिका।

दुर्गा सप्तशती में कुल 13 अध्याय हैं, जिसमें 700 श्लोकों में देवी-चरित्र का वर्णन है। मुख्य रूप से ये तीन चरित्र हैं, प्रथम चरित्र (प्रथम अध्याय), मध्यम चरित्र (2-4 अध्याय) और उत्तम चरित्र (5-13 अध्याय)। प्रथम चरित्र की देवी महाकाली, मध्यम चरित्र की देवी महालक्ष्मी और उत्तम चरित्र की देवी महासरस्वती मानी गई है। यहां दृष्टव्य है कि महाकाली की स्तुति मात्र एक अध्याय में, महालक्ष्मी की स्तुति तीन अध्यायों में और महासरस्वती की स्तुति नौ अध्यायों में वर्णित है, जो सरस्वती की वरिष्ठता, काली (शक्ति) और लक्ष्मी (धन) से अधिक सिद्ध करती है। मां दुर्गा के तीनों चरित्रों से संबंधित तीन रोचक कहानियां भी हैं-
प्रथम चरित्र - बहुत पहले सुरथ नाम के राजा राज्य करते थे। शत्रुओं और दुष्ट मंत्रियों के कारण उनका राज्य, कोष सब कुछ हाथ से निकल गया। वह निराश होकर वन से चले गए, जहां समाधि नामक एक वैश्य से उनकी भेंट हुई। उनकी भेंट मेधा नामक ऋषि के आश्रम में हुई। इन दोनों व्यक्तियों ने ऋषि से पूछा कि यद्यपि हम दोनों के साथ अपने लोगों (पुत्र, मंत्रियों आदि) ने दुर्व्यवहार किया है फिर भी उनकी ओर हमारा मन लगा रहता है। मुनिवर, क्या कारण है कि ज्ञानी व्यक्तियों को भी मोह होता है। ऋषि ने कहा कि यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, भगवान विष्णु की योगनिद्रा ज्ञानी पुरुषों के चित्त को भी बलपूर्वक खींचकर मोहयुक्त कर देती है, वहीं भगवती भक्तों को वर देती है और ’परमा’ अर्थात ब्रह्म ज्ञानस्वरूपा मुनि ने कहा, ’नित्यैव सा जगन्मूर्तिस्तया सर्वमिद ततम्’ अर्थात वह देवी नित्या है और उसी में सारा विश्व व्याप्त है। प्रलय के पश्चात भगवान विष्णु योगनिद्रा में निमग्न थे तब उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो असुर उत्पन्न हुए। उन्होंने ब्रह्माजी को आहार बनाना चाहा। ब्रह्माजी उनसे बचने के लिए योगनिद्रा की स्तुति करने लगे। तब देवी योगनिद्रा उन दोनों असुरों का संहार किया।

मध्यम चरित्र - इस चरित्र में मेधा नामक ऋषि ने राजा सुरथ और समाधि वैश्य के प्रति मोहजनित कामोपासना द्वारा अर्जित फलोपभोग के निराकरण के लिए निष्काम उपासना का उपदेश दिया है। प्राचीनकाल में महिषासुर सभी देवताओं को हराकर स्वयं इन्द्र बन गया और सभी देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया। वे सभी देवता- ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के पास सहायतार्थ गए। उनकी करुण कहानी सुनकर विष्णु और शंकर के मुख से तेज प्रकट हुआ। इसी प्रकार का तेज अन्य देवताओं के शरीर से भी निकला। यह सब एक होकर देवी रूप में परिणित हुआ। इस देवी ने महिषासुर और उनकी सेना का नाश किया। देवताओं ने अपना अभीष्ट प्राप्त कर, देवी से वर मांगा। ’जब-जब हम लोगों पर विपत्तियां आएं, तब-तब आप हमें आपदाओं से विमुक्त करें और जो मनुष्य आपके इस चरित्र को प्रेमपूर्वक पढ़ें या सुनें वे संपूर्ण सुख और ऐश्वर्यों से संपन्न हों।’ महिषासुर को मार कर देवी ‘महिषासुरमर्दिनी’ कहलाईं।

उत्तम चरित्र - उत्तम चरित्र में परानिष्ठा ज्ञान के बाधक आत्म-मोहन, अहंकार आदि के निराकरण का वर्णन है। पूर्व काल में शुंभ और निशुंभ नामक दो असुर हुए। उन्होंने इन्द्र आदि देवताओं पर आधिपत्य कर लिया। बार-बार होते इस अत्याचार के निराकरण के लिए देवता दुर्गा देवी की प्रार्थना हिमालय पर्वत पर जाकर करने लगे। देवी प्रकट हुई और उन्होंने देवताओं से उनकी प्रार्थना करने का कारण पूछा। कारण जानकर देवी ने परम सुंदरी ’अंबिका’ रूप धारण किया। इस सुंदरी को शुंभ-निशुंभ के सेवकों चंड और मुंड ने देखा। इन सेवकों से शुंभ-निशुंभ को सुंदरी के बारे में जानकारी मिली और उन्होंने सुग्रीव नामक असुर को अंबिका को लाने के लिए भेजा। देवी ने सुग्रीव से कहा, ’जो व्यक्ति युद्ध में मुझ पर विजय प्राप्त करेगा, उसी से मैं विवाह करूंगी।’ दूत के द्वारा अपने स्वामी की शक्ति का बार-बार वर्णन करने पर देवी उस असुर के साथ नहीं गई। तब शुंभ-निशुंभ ने सुंदरी को बलपूर्वक खींचकर लाने के लिए धूम्रलोचन नामक असुर को आदेश दिया। धूम्रलोचन देवी के हुंकार मात्र से भस्म हो गया। फिर चंड-मुंड दोनों एक बड़ी सेना लेकर आए तो देवी ने असुर की सेना का विनाश किया और चंड-मुंड का शीश काट दिया, जिसके कारण देवी का नाम ’चामुंडा’ पड़ा। असुर सेना का विनाश करने के बाद देवी ने शुंभ-निशुंभ को संदेश भेजा कि वे देवताओं को उनके छीने अधिकार दे दें और पाताल में जाकर रहें, परंतु शुंभ-निशुंभ मारे गए। रक्तबीज की विशेषता थी कि उसके शरीर से रक्त की जितनी बूंदें पृथ्वी पर गिरती थीं, उतने ही रक्तबीज फिर से उत्पन्न हो जाते थे। देवी ने अपने मुख का विस्तार करके रक्तबीज के शरीर का रक्त को अपने मुख में ले लिया और असुर का सिर काट डाला। इसके पश्चात शुंभ और निशुंभ भी मारे गए और तब देवताओं ने स्तुति की-
सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरी विनाशम्।।

हमें यह विचार करना ही होगा कि पूजा-अर्चना द्वारा हम देवी के इन चरित्रों का आह्वान करते हैं तो फिर देवी के इन चरित्रों से प्रेरणा ले कर उन लोगों पर शिकंजा क्यों नहीं कस पाते हैं जो असुरों जैसे कर्म करते हैं? क्या हम इन प्रेरक कथाओं के मर्म को समझ नहीं पाते हैं अथवा समझना ही नहीं चाहते हैं? बहरहाल, एक और रोचक कथा है- राजा सुरथ और समाधि वैश्य दोनों ने देवी की आराधना की। देवी की कृपा से सुरथ को उनका खोया राज्य और वैश्य का मनोरथ पूर्ण हुआ। उसी प्रकार जो व्यक्ति भगवती की आराधना करते हैं उनका मनोरथ पूर्ण होता है। ऐसी मान्यता है कि दुर्गा सप्तशती के केवल 100 बार पाठ करने से सर्वार्थ सिद्धि प्राप्त होती है। इस मान्यता को व्यवहारिकता में ढालते हुए यदि स्त्रियों के हित में अपनी शक्ति को पहचान कर अपराधों का प्रतिकार किया जाए तो यह मां दुर्गा की सच्ची स्तुति होगी।         
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(दैनिक, सागर दिनकर में 25.03.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, March 24, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | होंए जालपा चाए ज्वाला माई,परन न देवें दुख की छांई | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
होंए जालपा चाए ज्वाला माई,परन न देवें दुख की छांई
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
चैत की नवरातें आतई साथ पूरे सागरे में देवी मैया के जयकारे गूंजने लगत आएं। चाए दीनदुखी होंएं, चाए सुखी मानुस, सबई माता के दोरे पे माथा टेकबे के लाने निकर परत आएं। कोऊ रानगिर वारी हरसिद्धि माई के लिंगे जात आए तो कोऊ बाघराज वारी हरसिद्धि माई के इते। ऊंसई अपने सागरे में माई के दरबार चारों खूंट में आए। जेई लाने तो भगतें गाई जात आएं के-
होंए जालपा चाए ज्वाला माई। परन ना देवें दुख की छांई ।।
   सागर से खुरई जात में जरुआखेड़ा से जलंधर के लाने रोड  कटत आए। आप जोन जलंधर पौंचे सो मनो ज्वाला देवी के दरबार के दोरे पे पौंच गए। उते ऊंची पहरिया पे माई को मंदिर आए। जो छिड़ियां चढ़ के ऊपरे ज्वालामाई के दरबार में पौंचो तो भौतई अच्छो लगत आए, काए से उते से चारो तरफी पहरियां दिखात आएं। बे पहरियां बी अबे जंगल वारी आएं। ज्वालामाई की सौं, उते भौतई नोनों लगत आए। ऐसो लगत आए के उते सजीवन माता उतर आई होंए।
   मनो होत का आए के जां सब साफ-सुथरो होय, लोग बी नोने जी से कऊं पौंचें तो उते देवी मैया को वास सो फील होत आए। माता सो माता आएं, बे अपने बच्चन खों चाए दो लपाड़े लगा लेवें मनो कभऊं साथ नईं छोरत आएं। मनों अपन ऐसो काम काए खरें के माई अपन खो थपड़िआएं। कैबे को मतलब जे के जो अपन अपने पूरे सागरे खों साफ-सुथरो औ अच्छो राखें तो हरसिद्धि माई, जालपा माई औ ज्वाला माई सबई की किरपा अपने सहर पे बनी रैहे।  सो, बोलो जै माई की!    
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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पुस्तक समीक्षा | बुंदेली की मिठास में डूबा काव्य संग्रह ‘‘बुंदेली बानी’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
बुंदेली की मिठास में डूबा काव्य संग्रह ‘‘बुंदेली बानी’’
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - बुंदेली बानी
कवयित्री - डॉ. कुंकुम गुप्ता
प्रकाशक-संदर्भ प्रकाशन,भोपाल
मूल्य -200/- 
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प्रत्येक बोली कि अपनी विशेषता और अपनी मिठास होती है। बुंदेली बोली भी इसी तरह से अपने क्षेत्रीय मिठास लिए हुए हैं जो सुनने और पढ़ने वाले के मन को सहज ही स्पर्श करती है। बोलियां जहां एक ओर संस्कृति की संवाहक होती हैं वही निज गौरव और आत्मीयता का भी बोध कराती हैं। डॉ कुंकुम गुप्ता ने बुंदेली बोली की मिठास को अपनी कविताओं में प्रस्तुत करते हुए बुंदेली संस्कृति को भी सहेजा है। उनके काव्य संग्रह का नाम है “बुंदेली बानी”। 
“बुंदेली बानी” में कुल 51 कविताएं हैं, जिनमें संस्कृतिस सामाजिकता, प्रकृति, राष्ट्रीयता तथा आध्यात्मिकता के साथ ही हास्य और प्रेम के संवेग भी समाहित हैं। हिन्दी विभागाध्यक्ष एवं वर्तमान में प्राचार्य, पं. दीनदयाल उपाध्याय शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय सागर (म.प्र.) प्रो. सरोज गुप्ता ने संग्रह की प्रस्तावना लिखते हुए डॉ. कुंकुम गुप्ता की रचना धर्मिता के साथ उनका संक्षिप्त परिचय भी प्रस्तुत किया है। डॉ सरोज गुप्ता के शब्दों में- “डॉ कुंकुम गुप्ता साहित्य जगत में बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न रचनाकार हैं। साहित्य की विभिन्न विधाओं कविता, कहानी, निबन्ध, समीक्षा, संस्मरण, बाल साहित्य आदि में लेखनी चलाने के साथ नित नूतन प्रयोग करने की कला में दक्ष हैं। आपकी रचनाओं में बुन्देलखण्ड की माटी की सौंधी महक, सहजता, सरलता, उदारता, भावों में सम्प्रेषणीयता के साथ जन्मभूमि के प्रति समर्पण, बुन्देली और बुन्देली संस्कृति से जुड़ाव दृष्टव्य है। आप राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त परिवार में जन्मीं, बखरी में दद्दा जी, बापू जी के प्यार दुलार के साथ बचपन में अनेक वरिष्ठ साहित्यकारों से सहज संपर्क से उनके साहित्यिक संस्कारों को आत्मसात करते हुए न सिर्फ अपनी रचनाधर्मिता को जीवन्त बनाये हुए हैं वरन् अपनी रचनाओं के माध्यम से हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि कर रही हैं। डॉ. कुंकुम गुप्ता समाज की गतिविधियों, लोक व्यवहारों का यथार्थ पूरी ईमानदारी के साथ प्रस्तुत करती हैं।”
डॉ. कुंकुम गुप्ता सौभाग्यशाली हैं कि वे राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त की वंशज हैं। साहित्य प्रेम उनकी धमनियों में प्रवाहित होना स्वाभाविक है। डाॅ कुंकुम गुप्ता लेखिका संघ मध्यप्रदेश की प्रांतीय अध्यक्ष हैं। वे अन्य महिला रचनाकारों को अपनी संस्था के अंतर्गत निरंतर प्रोत्साहित करती रहती हैं। अपनी रचनाशीलता के बारे में डॉ. कुंकुम गुप्ता ने “आत्मकथ्य” में लिखा है- “मेरा बचपन झाँसी जिले के चिरगाँव में बीता इसलिए बुंदेली परिवेश, पर्वों, लोकगीतों, परम्पराओं आदि से लगाव रहा है। भोपाल आकर जब साहित्यकारों से बुंदेली, निमाड़ी, मालवी आदि में कविताएँ सुनीं तो मेरे मन में भी यह जिज्ञासा जागृत हुई कि मैं भी बुंदेली में रचनाएँ लिखूँ। मध्यप्रदेश लेखक संघ की लोक भाषा गोष्ठी में भी कविता सुनाने का अवसर मिला तो कुछ आत्मविश्वास जागा और हिन्दी लेखिका संघ में भी बुंदेली में कविताओं को पढ़ा जिसको सराहना मिली इससे मेरा उत्साहवर्धन हुआ।”
बोलियों की यह विशेषता होती है कि हर दस कोस में बोली के कुछ शब्द बदल जाते हैं। जैसे बुंदेलखंड में पन्ना की तरफ बेटियों को “बिन्ना” कहा जाता है जबकि ललितपुर, झांसी के तरफ उन्हें “बिन्नू” कहकर पुकारा जाता है इसीलिए कुंकुम गुप्ता जी की प्रथम कविता का शीर्षक है “बिन्नू काए रिसानी”। इस कविता में कवयित्री ने बालिका शिक्षा सहित बालिका के अधिकारों की बात बहुत सहजता से उठाई है। बानगी देखिए-
बिन्नू काय रिसानी हमसें, 
बिन्नू काय रिसानी 
बैठीं हो काय मों लटकायें, 
भर आँखन में पानी।

रोज तो तुम गैया बछियन की 
साफ-सफाई करततीं
फिर कुअलन पै पानी भरवे
सखियन संग निकरततीं
आज कछु न कर रही बिन्नू 
अब लौं करी न सानी 
बिन्नू काय रिसानी हमसें, बिन्नू काय रिसानी।

दादा भौत देख लई हमने 
बातें बड़ी तुम्हाई 
कहत कछु और करत कछु 
फिर पीछें देत सफाई
सबकी बिटियाँ आगें पढ़ रहीं 
तुमने बात न मानी 
बिन्नू काय रिसानी हमसें, बिन्नू काय रिसानी।
     जब बिन्नू अर्थात बेटियों की बात चलेगी तो सखियों की चर्चा भी होना स्वाभाविक है। बेटियों का संसार अपनी सखियों के संग से ही आरम्भ होता है। ‘‘गुइयाँ’’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां देखिए जिनमें सेहत की बातों के संग सखियों का विमर्श भी मौजूद है- 
ऐसी काय बैठी मोरी गुइयां
बैठी उदास औ लटकी मुंइयां
कछू न पूछौ हाल सखी री 
देर रात कैं खा लई घुइयाँ।
आज परहेज करौ थोड़ो सो 
लौकी बनाओ चाँय तुरइयाँ।
हरी सब्जिन को स्वाद न भावैं 
अबै उमर तो है लड़कैंया।
वादी की चीजें हमें भाउतीं 
सो गुस्सा होंय हमारे सइयाँ।
आज से सेहत कौ ख्याल करलो 
तन को दुख कोउ बाँटत नइया।
      वृद्धावस्था जीवन का एक शाश्वत सत्य है। किन्तु सामाजिक परिवर्तनों के कारण अनेक लोगों के लिए वृद्धावस्था कष्टप्रद साबित होने लगी है। इसका मूल कारण है कि युवा अपने बड़ों से विरत होने लगे हैं और वृद्धाश्रम पनपने लगे हैं। दूसरी ओर वे माता-पिता भी जो धनअर्जन करने की लिप्सा में पहले स्वयं को व्यस्त कर लेते हैं फिर बच्चों को अपने से दूर भेज देते हैं उन्हें भी कवयित्री ने चेताया है। वस्तुतः डाॅ. कुंकुम गुप्ता की ‘‘बुढ़ापा’’ कविता हर व्यक्ति को जीवन के सत्य का स्मरण कराती है-
बुढ़ापौ सबको आने है 
एक दिना मर जाने है।
जानत तो है जौ सब कोऊ 
फिर भी सीना ताने है।
कैसेउ प्रीत लगा लो सबसें 
बाद में रोने गाने है।
साठ साल के बाद सबई कौ 
जानै कबै बुलउआ आने है।
ताले कुची लगा लो कित्ती 
बनाओ कितेक तहखाने है।
जिनसे छिपा के जोड़ी माया 
उनई खौं सब हथियाने है।
   संग्रह में एक बहुत ही ‘स्वादिष्ट’ कविता भी है क्योंकि इसमें बुंदेलखंड के पारंपरिक व्यंजनों का विवरण दिया गया है। कविता की पंक्तियां कुछ इस प्रकार हैं-
बुंदेली व्यंजन की कर लैवें बात 
स्वाद इनकौ सबखौं भौतई सुहात 
बैगन का भर्ता और मौन दई गकइयाँ 
सब मिल कैं खावें पड़ौसी और गुंड्याँ 
आम की चटनी स्वाद है बढ़ात।
चूरमा के लड्डू दाल बाटी को स्वाद 
शुद्ध घी की खुशबू और बढ़िया पुलाव 
ऊपर से मठा पियो जल्दी पचात ।
समूदी रोटी खौं देख जिया डोले 
बरा मगौरा पापड़ मिश्री सी घोलें 
खीचला कचरियां कालोनी में मिलात।
      यह विशेषता है बोलियों में सृजन की कि जब कोई रचनाकार अपनी बोली में रचना करता है तो वह अपनी परंपराओं, संस्कृति, रीति-रिवाजों एवं माटी की सुगंध को उसमें पिरोना नहीं भूलता है। डाॅ कुंकुम गुप्ता ने भी अपनी बुंदेली कविताओं में समसामयिक समस्याओं पर कलम चलाते हुए बुंदेली मिठास को भरपूर संजोया है। इस तरह के काव्य संग्रह बहुतायत आने चाहिए क्योंकि यही बुंदेलखंड की संस्कृति को भविष्य तक पहुंचाने में सहायक होंगे। डाॅ. कुंकुम गुप्ता का यह बुंदेली काव्य संग्रह ‘‘बुंदेली बानी’’ इतनी सहज बुंदेली में है कि सुगमता से सभी को समझ में आ सकता है तथा हर क्षेत्र का पाठक इन कविताओं से जुड़ सकता है।      
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Thursday, March 19, 2026

बतकाव बिन्ना की | ब्याओ की दावतें, माई को दिवारा औ लाड़लो बन्नू | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
ब्याओ की दावतें, माई को दिवारा औ लाड़लो बन्नू
  - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       ‘‘रामधई! अब कछू नई हो सकत। बे ओरें मोरी काय सुनहें? उने तो अपनी परी है। बस, कहत भर के लाने हैं नोने भैया, बाकी नोने भैया की परवा कोनऊ को नईयां।’’ नोने भैया बड़बड़ात भए मोरे दरवाजे के आगूं ठाड़े हते। बड़बड़ा काए मनो चिचियां रये हते। तभई तो उनकी आवाज मोरे कान लों पोंच गई। मों पे हुन्ना बंधो हतो, फेर भी उनको चिचियानो मोये समझ में आ गओ। मोसे न रही गई सो मैंने तो पूछई लई, ‘‘काय नोने भैया, का हो गए? काय के लाने बमकत फिर रए?’’
‘‘अरे हम काय बमकें बिन्ना? बमके हमारे दुस्मन।’’ नोने भैया ठसक के बोले।
‘‘सो फेर काए चिचियां रये?’’ मैंने पूछी।
‘‘हम कहां चिचिया रये?’’ नोने भैया फेर के मुकर गये।
‘‘सो, जे को आ बोल रओ के अब कछू नई हो सकत? अब कछु बता बी देओ, भैया! मन की मन में नईं रखी जात। मोरे लाने कछु काम होय तो बताओ।’’ मैंने नोने भैया से कही।
‘‘अब का बताऊं बिन्ना! बड़े बुरै दिन आ गए। हमाई तो कोऊ सुनतई नईयां।’’ नोने भैया बोले।
‘‘ऐं? ऐसो का हो गओ? तुमाई तो सबई सुनत आएं? जे ऐसई काय कै रै?’’ नोने भैया बुझउव्वल-सी बुझा रए हते, सो मोए झुंझलाहट हो लगी, ‘‘अब कछु तो बोलो नोने भैया, जे ऐसई पहेलियां न बुझाओ। बाकी न बताना होय सो, न बताओ, मोय सोई टेम नइयां तुमई फालतू की बातें सुनबे के लाने।’’ मैने सोई नोने भैया खों तनक हड़काओ।
‘‘जे का बात भई बिन्ना? पैले तो पूछ रई हतीं, ओ अब कै रईं के तुमाये लाने टेम नइयां। जे तो गल्त बात आए।’’ नोने भैया ने बुरऔ सो मों बनाओ।
‘‘अब तुमई तो मों नई खोल रये। कछु बताओ तो सुनी जाये।’’ मैंने कही।
‘‘अरे, सुनाबे के लाने का है बिन्ना, भौतई बुरै दिन आ गए हैं। सोच-सोच के कलेजो फटत आए। जी तो करत आये के उन सबई जने को मार-मार के मुर्गा बना दओ जाए। चले हैं ब्याओ करने।’’ नोने भैया बोले।
‘‘कोन को मारबे को जी रओ तुमाओ? और कोन को ब्याओ करा रये?’’ मोए नोने भैया की बातें कछु समझ ने आईं।
‘‘हम काये करा रये ब्याओ? बे ओरे करा रये। हमाओ बस चले तो कोनऊ को ब्याओ न होन देवे।’’ नोने भैया बोले।
‘‘कोन के ब्याओ की कै रये, भैया? कछु साफ तो बोलो।’’
‘‘अरे, बे रहली वारी फुआ की बिटिया को ब्याओ होने वारो है।’’ नोने भैया कसमसात भए बोले।
‘‘काय, बोई वारी बिटिया, जोन के लाने तुमने फुआ की खूब सेवा करी हती?’’ मोये हंसी आ गई।
‘‘हओ तो, बोई वारी। बाकी हमें अब ऊसे कोनऊ लेबो-देबो नइयां। ऊने जब लों हमाए लाने मना कर दओ, तभई से हमने ऊके घरे ढूंको लो नइयां।’’ नोने भैया बोले।
‘‘सो, अब परेसानी का आए?’’ मैंने पूछी।
‘‘परेसानी तो भौतई बड़ी कहानी। मोये तो जे नई समझ में आ रओ के मोय ठुकरा दओ, कोनऊं गिला नइयां। पर कोन ने कई के ब्याओ कराओ औ मोए न्योतो ने भेजो।’’ नोने भैया चिढ़त भये बोले।
‘‘कछू बात हुइये।’’ मैंने कहीं।
‘‘का बात हुइए? हप्ता भरे पैलें ऊके बापराम मिले हते। बे बोले के हमें रासन वारी सस्ती शक्कर देवा देओ। मोड़ी के ब्याओ के लाने चाउने। जा सुन के हमाओ जी करो के हम उनसे कएं के दद्दा अपनी मोड़ी हमें देत तो बनो नईं औ शक्कर मंगात सरम नईं आ रई? मनो हमने ऐसो गओ नईं। काए से के हमें लगो के कछू बी होए मनो बे हमाए एक्स जानू के बापराम आएं सो हमें उनके लाने शक्कर को जुगाड़ करो चाइए। सो हमने जुगाड़ कर दओ। ऊ दिनां से रोज हम परखे बैठे के उनके इते से अब ब्याओ को न्योतो आहे, तब आहे, मनो काय को? बे तो हमें भूलई गए।’’ नोने भैया उदासे से बोले। 
‘‘अपनों जी दोटो ने करो। हुइए कछू कारण। मनो उन्ने जो आप से मदद लई सो उने न्योतो तो भेजबो चाइए तो।’’ मैंने नोने भैया से कई।
‘‘जेई से तो हमाओ दिमा्र खराब भओ जा रओ।’’ नोने भैया बोले।
‘‘कओ उने लगो होए के आप अपनी जानू खों दूजे की दुल्हन बने ने देख पाहो, सो बे आपखों नईं न्योत रए।
‘‘बा दुल्हन बने, चाये कछू बने, मोये दुख नई होने। जी तो जे लाने मसक रओ के का जमाना आ गओ? एक जमाना हतो जब दस दिनां में बीस ब्याओ जीम लेत ते। ओ अब जे जमाना आ गओ के हमाई जानूं के ब्याओ में हमें नईं बुलाओ जा रओ। हमाओ जी तो तरसहे ब्याओ की दावत खाबे के लाने। सबई खों न्योत रए औ मोये तरसा रये।’’ ठंडी सांस भरत भए नोने भैया बोले।
‘‘ऐं? सो भैया तुम ब्याओ की दावत के लाने रो रये? ओ हमने सोसी के ऊ फुआ की बिटिया के लाने...।’’मोए अचरज भओ।
‘‘अरे, तुमने सोई भली चलाई। ऐसी तो बिटियां मुदकी फिरत मोरे आंगू-पीछूं पर ब्याओ की दावतें सबई की थेड़ी मिलत आएं। सो हम तो कै आए फूफा से के जो हमाई जानू को ब्याओ करा रए तो हमें न्योतो देओ ने तो ब्याओ ने होन देबी। बस, जेई सुन के फूफा ने जूता फेंक के मारो मोए, वो तो लगो नइयां। बाकी ई समै बयाओ करा के बे गल्त कर रये।’’ कहत भये नोने भैया सो आगे बढ़ गये और मैं सोसत रै गई के वाह रे नोने भैैया, इने प्रेमिका को ब्याओ को गम नइयां, गम आये सो ब्याओ की दावत ने मिल पाबे को। बाकी मोए नोने भैया पे दया सी आई सो मैंने उने पांछू से आवाज़ लगाई।
‘‘का आए?’’ नोने भैया ने मुंड़ के देखो औ पूछो।
‘‘बात जे आए नोने भैया, के मोसे आपको जो दुख देखो नई जा रओ। सो आपके लाने मोए एक तरीका सूझो आए। कओ तो बताएं?’’ मैंने नोने भैया से कई।
‘‘अरे बताओ, का बता रईं?’’ नोने भैया पूछन लगे
आप ऐसो करो के नवरातें तो सुरू हो गई आएं औ आपकी जानू को ब्याओ नवरातों के बाद आए। सो आप चार-छै जांगो पे माई के दिवारे दरसन कर आओ। उते कछू न कछू परसात बंअत रैत आए, तुमाओ काम बन जैसे। ब्याओ की दावत नोंई सो मई के दिवारे को परसाद तो मिलई जाहे।’’ मैंने सलाय दई।
‘‘बात तो तुमाई ठीक आए। कछू नईं से, जो कछू मिले वोई ठीक आए।’’ नोने भैया खुश होत भए बोले। फेर बे बोले के,‘‘चलो हम माई के बड़े दिवारे से सुरू कर देत आएं।’’
बे तो उते से खुस होत भए चले गए, मनो मोए लगो के जे तो सरकार की लाड़ली बिन्ना घांईं लाड़लो बन्नू आए जोन को मुफत को खाबे की ऐसी लत लग गई के अपनी जानू के ब्याओ को न्योतो खाबे खों पगला रओ। मनो अब सरकार खों सोई ‘‘लाड़लो बन्नू योजना’’ चलाई दओ चाइए। आप ओरें सोई सोचियो ई बारे में।    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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चर्चा प्लस | देवी दुर्गा को बहुत प्रिय है बारले अर्थात जौ | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस       
देवी दुर्गा को बहुत प्रिय है बारले अर्थात जौ
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह सिंह                                                                   
      नवरात्रि की शुरुआत के साथ ही जौ के बीज ‘‘ज्वारे’’ के रूप में बोए जाते हैं। क्या आप जानते हैं कि जौ कितना महत्वपूर्ण अनाज है? आप कहेंगे कि हाँ! आजकल इसे मोटे अनाज के रूप में खाने पर जोर दिया जा रहा है। इसे स्वास्थ्य के लिए अच्छा बताया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन को देखते हुए भी ज्वार की खेती को बढ़ावा देने की जरूरत महसूस की जा रही है। लेकिन क्या आप यह भी जानते हैं कि हमारे वैदिक साहित्य में इसे ‘‘ब्रह्मा का अन्न’’ माना गया है। वेदों में उल्लेख है कि धरती पर सबसे प्राचीन अनाज जौ है। इसीलिए इसे यज्ञ, हवन और जवारों में भी पवित्र अनाज के रूप में शामिल किया जाता है और देवी मां दुर्गा को भी मोटा अनाज जौ बहुत प्रिय है।


     वर्तमान में पूरे विश्व में खाद्य समस्या और जलवायु परिवर्तन को देखते हुए मोटे अनाज के उपयोग और उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है। हमारे देश भारत में भी मोटे अनाज को खाद्यान्न के मूल आधार के रूप में देखा जा रहा है। ये मोटे अनाज हैं जौ, बाजरा, रागी आदि। ये सभी अनाज पहले हमारे भोजन की थाली में शामिल ते थे। लेकिन आधुनिकता और पाश्चात्य भोजन शैली के कारण ये हमारी भोजन की थाली से दूर होते चले गए। जबकि हमारे देश में, चाहे वे किसी भी धर्म से ताल्लुक रखते हों, सभी जानते हैं कि नवरात्रि की शुरुआत में ‘‘ज्वारे’’ बोए जाते हैं। यह एक तरह का धार्मिक अनुष्ठान है। इन बीजों को बोने का एक अर्थ यह भी है कि इससे देवी दुर्गा प्रसन्न होती हैं और अच्छी फसल का आशीर्वाद देती हैं। हालांकि इस संबंध में देश के अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग मान्यताएं और कहानियां प्रचलित हैं। लेकिन सभी का मानना है कि देवी मां को जौ के बीज चढ़ाने से वे प्रसन्न होती हैं। इसका सीधा सा मतलब है कि देवी मां दुर्गा को भी मोटा अनाज जौ पसंद है। यह धरती पर उगाए जाने वाले सबसे पुराने अनाजों में से एक है। प्राचीन काल से ही इसका इस्तेमाल धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता रहा है। संस्कृत में इसे ‘‘यव’’ कहा जाता है। इसका उत्पादन मुख्य रूप से रूस, यूक्रेन, अमेरिका, जर्मनी, कनाडा और भारत में होता है।

नवरात्रि में जौ बोने का विशेष महत्व है। नवरात्रि में कलश और घटस्थापना के साथ ही घट में जौ (कभी-कभी गेहूं) बोया जाता है। मां दुर्गा को यह बहुत पसंद है। आइए जानते हैं क्या है इसका रहस्य। नवरात्रि में देवी दुर्गा के नौ रूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है और व्रत रखे जाते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों में लोग अपने घरों में अखंड ज्योति जलाते हैं। साथ ही माता रानी के नौ रूपों की पूजा भी करते हैं। नवरात्रि में कलश स्थापना और जौ का बहुत महत्व होता है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना यानी कलश स्थापना के साथ ही जौ बोए जाते हैं। कहा जाता है कि इसके बिना मां अम्बे की पूजा अधूरी रहती है। कलश स्थापना के साथ जौ बोने की परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है। ऐसे में आइए आज जानते हैं कि नवरात्रि में जौ क्यों बोए जाते हैं और इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यता और वैज्ञानिक महत्व है?
जौ को भगवान ब्रह्मा का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवान ब्रह्मा ने इस सृष्टि की रचना की तो वनस्पतियों में सबसे पहली फसल ‘‘जौ’’ ही थी। इसीलिए नवरात्रि के पहले दिन घट स्थापना के समय सबसे पहले जौ की पूजा की जाती है और कलश में भी इसे स्थापित किया जाता है।
पुराणों और वेदों में जौ (यव) को सबसे प्राचीन, पवित्र और पौष्टिक अन्न माना गया है, जिसे ‘‘यज्ञ का अन्न’’ कहा जाता है। नवरात्रि में दुर्गा पूजा के समय जौ बोना धन-धान्य और समृद्धि का प्रतीक है। पुराणों के अनुसार, यह विष्णु का स्वरूप है और पितृ तर्पण में भी अनिवार्य है, जो यव-प्रिय (जौ को प्रेम करने वाला) कहलाता है।
सप्तधान्य श्लोक में यव यानी जौ का महत्व इन शब्दों में बताया गया है-
यवधान्यतिलाः कंगु मुद्गचणकश्यामकाः।
एतानि सप्तधान्यानि सर्वकार्येषु योजयेत्।।
(अर्थात जौ, धान, तिल, कँगनी, मूँग, चना, और सांवा - ये सात प्रकार के धान्य सभी शुभ कार्यों में अनिवार्य हैं।)
अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात।
- अर्थात अन्न ही ब्रह्म है। ऋग्वेद में जौ को दिव्य अन्न माना गया है।)
पौराणिक मान्यताओं में जौ को अन्नपूर्णा का स्वरूप माना गया है। शांति ऋषियों को सभी धान्यों में जौ सर्वाधिक प्रिय है। इसी कारण ऋषि तर्पण जौ से किया जाता है। पुराणों में कथा है कि जब जगतपिता ब्रह्मा ने ब्रह्मांड का निर्माण किया, तो वनस्पतियों के बीच उगने वाली पहली फसल जौ ही थी। इसी से जौ को पूर्ण सस्य यानी पूरी फसल भी कहा जाता है। यही कारण है कि नवरात्र में भगवती दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए जौ उगाए जाते हैं। सम्मान में किसी को सस्य देना अर्थात नवधान्य देना शुभ व कल्याणकारी माना गया है। नवरात्र उपासना में जौ उगाने का शास्त्रीय विधान है, जिससे सुख, और समृद्धि प्राप्त होती है। जौ को देवकार्य, पितृकार्य व सामाजिक कार्यों में अच्छा माना जाता है।

जौ को सृष्टि की पहली फसल माना जाता है, इसलिए जब भी देवी-देवताओं की पूजा या हवन किया जाता है तो जौ को ही अर्पित किया जाता है। यह भी कहा जाता है कि जौ अन्न यानी ब्रह्मा के समान है और अन्न का हमेशा सम्मान करना चाहिए। इसलिए पूजा-पाठ में जौ का प्रयोग किया जाता है। नवरात्रि में कलश स्थापना के दौरान बोए गए जौ दो-तीन दिन में ही अंकुरित हो जाते हैं, लेकिन अगर ये अंकुरित न हों तो यह भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है। ऐसी मान्यता है कि अगर दो-तीन दिन बाद भी अंकुर न निकलें तो इसका मतलब है कि कड़ी मेहनत के बाद ही फल मिलेगा। इसके अलावा अगर जौ उग आए हैं लेकिन उनका रंग नीचे से आधा पीला और ऊपर से आधा हरा है तो इसका मतलब है कि आने वाला साल आधा तो ठीक रहेगा, लेकिन बाद में परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। अगर बोए गए जौ सफेद या हरे रंग के उग रहे हैं तो इसे बहुत शुभ माना जाता है। इसका मतलब है कि पूजा सफल रही। आने वाला पूरा साल खुशियों से भरा रहेगा। नवरात्रि के दिनों में कलश के सामने मिट्टी के बर्तन में जौ या गेहूं बोया जाता है और उसकी पूजा भी की जाती है। बाद में जब नौ दिन में जवारे बड़े हो जाते हैं तो उन्हें नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। देवी मां के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं के लिए जब भी हवन किया जाता है तो उसमें जौ का बहुत महत्व होता है। जौ बोने से बारिश, फसल और व्यक्ति के भविष्य का भी अनुमान लगाया जाता है। कहा जाता है कि अगर जौ सही आकार और लंबाई में नहीं उगते हैं तो साल छोटा रहेगा और फसल भी कम होगी। इसका असर भविष्य पर पड़ता है। बोए गए जौ का रंग भी शुभ और अशुभ संकेत देता है। ऐसा माना जाता है कि अगर जौ का ऊपरी आधा भाग हरा और निचला आधा भाग पीला है, तो इसका मतलब है कि आने वाला साल आधा अच्छा होगा और आधा मुश्किलों से भरा होगा। ऐसा माना जाता है कि अगर 2 से 3 दिन में जौ अंकुरित हो जाएं तो यह बहुत शुभ होता है और अगर आदि जौ नवरात्रि के अंत तक जौ नहीं उगते हैं, तो इसे अच्छा नहीं माना जाता है। हालाँकि, कभी-कभी ऐसा होता है कि अगर जौ को ठीक से नहीं बोया है, तो भी जौ नहीं उगते हैं। इसके साथ ही, अगर जौ का रंग हरा है या सफेद हो गया है, तो इसका मतलब है कि आने वाला साल बहुत अच्छा होगा। इतना ही नहीं, देवी भगवती की कृपा से आपके जीवन में अपार सुख और समृद्धि आएगी। ऐसा कहा जाता है कि नवरात्रि के दौरान बोए गए जौ जितने अधिक बढ़ते हैं, उतनी ही अधिक देवी दुर्गा की कृपा बरसती है। यह इस बात का भी संकेत है कि व्यक्ति के घर में सुख और समृद्धि आएगी।

जौ बोने की रस्म हमें अपने भोजन और अनाज का हमेशा सम्मान करना सिखाती है। इसका वैज्ञानिक पहलू यह है कि इस तरह खेती से न जुड़ा व्यक्ति भी खेती के काम को समझ पाता है। यहां तक कि परिवार के बच्चे भी ज्वार बोने और उसे हरा-भरा रखने में जरूरी सावधानियों को जान और समझ पाते हैं। स्वस्थ ज्वारे खेती के लिए मौसम को समझने में भी मदद करते हैं। जरा सोचिए जौ का मोटा अनाज कितना महत्वपूर्ण है, जिसे देवी मां को प्रसन्न करने के लिए उनके सामने उगाया जाता है और फिर नौ दिन बाद उन ज्वारों को देवी मां के साथ जल में विसर्जित कर दिया जाता है। यानी उन अनाजों को देवी मां के साथ ही भेज दिया जाता है, जैसे विदाई के समय रास्ते में किसी मेहमान को खाने के लिए खाना पैक करके दिया जाता है। ऐसे महत्वपूर्ण अनाजों को हमें अपने रोजमर्रा के जीवन में अपनाने में कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। वैज्ञानिक भी कहते हैं कि मोटा अनाज स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। जौ जैसा मोटा अनाज खाने के बहुत लाभ हैं, जैसे- मोटे अनाज में प्रोटीन, खनिज, और विटामिन, चावल और गेहूं से तीन से पांच गुना ज्यादा होते हैं। मोटे अनाज में फाइबर काफी होता है, जिससे पाचन तंत्र बेहतर होता है। मोटे अनाज में कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स (जीआई) होता है, जिससे मधुमेह की रोकथाम में मदद मिलती है। मोटे अनाज में कैल्शियम, आयरन, और जिंक जैसे खनिज होते हैं। मोटे अनाज में मौजूद पोषक तत्व हड्डियों को मजबूत बनाते हैं और कैल्शियम की कमी को रोकते हैं। मोटे अनाज में मौजूद फाइबर की वजह से लंबे समय तक पेट भरा रहता है, जिससे बार-बार खाने की जरूरत नहीं होती। मोटे अनाज खाने से एनीमिया का खतरा कम होता है। मोटे अनाज दिल के लिए भी अच्छे होते हैं।
खाद्य विशेषज्ञ मोटे अनाज खाने का तरीका भी सुझाते हैं। उनके अुनसार मोटे अनाज को हमेशा भिगोकर या अंकुरित करके खाना चाहिए। मोटे अनाज में फिटिक एसिड होता है, जो शरीर में बाकी पोषक तत्वों को अवशोषित नहीं होने देता। लेकिन परंपरागत तरीकों से भी मोटे अनाज को खाया जा सकता है जैसे उबाल कर, पीस कर रोटी आदि के रूप में।

यही सब कारण हैं कि आजकल मोटे अनाज को स्वास्थ्य के लिए अच्छा बताया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन को देखते हुए भी ज्वार की खेती को बढ़ावा देने की जरूरत महसूस की जा रही है। वेदों में उल्लेख है कि धरती पर सबसे प्राचीन अनाज जौ और इसकी भांति मोटे अनाज की श्रेणी में आनेे वाले अन्न ही हमें स्वास्थ्य एवं खद्यान्न संकट से भी उबार सकते हैं। अतः इस नवरात्रि से गर्व के साथ याद रखिए कि देवी मां दुर्गा को भी मोटा अनाज जौ बहुत प्रिय है और हम इसे उनके आशीर्वाद के रूप में अपनी खाद्यचर्या में शामिल कर सकते हैं।         
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(दैनिक, सागर दिनकर में 19.03.2026 को प्रकाशित) 
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Wednesday, March 18, 2026

चित्रों के जरिए कलाकारों ने देशभक्ति और संस्कृति को रंगों में उतारा - डॉ (सुश्री) शरद सिंह, कला समीक्षक | दैनिक भास्कर

🙏 हार्दिक आभार एवं धन्यवाद #दैनिकभास्कर  🌹🙏🌹
कला भवन आर्ट क्लासेस की श्रीमती स्वाति हल्वे एवं गुरुकृपा फाइन आर्ट के हेमंत ताम्रकार के संयुक्त प्रयास से आयोजित दो दिवसीय पेंटिंग एग्जीबिशन की मेरे द्वारा की गई समीक्षा एवं विस्तृत रिपोर्ट दैनिक भास्कर में फुल स्पेस के साथ....👍

🌹हार्दिक बधाई प्रिय स्वाति एवं हेमंत 💐
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Tuesday, March 17, 2026

पुस्तक समीक्षा | सच की आंच में तपी हुई कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा
सच की आंच में तपी हुई कविताएं
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - वक्त की ही तू तलाश है
कवि - डाॅ. प्रदीप पाण्डेय
प्रकाशक -सुभारती प्रकाशन, डी ब्लाॅक, पाॅकेट 16, 153,सेक्टर-7, राहिणी, नई दिल्ली-85
मूल्य -350/-
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यह कहा जाता है कि सच कड़वा होता है। निःसंदेह जो लोग सच में कड़वाहट घोलने के लिए जिम्मेदार होते हैं उनके लिए सच कड़वा ही होता है। गोया वे अपना को कृत्य स्वयं देख, सुन नहीं सकते या सहन नहीं कर पाते हैं। ठीक वहीं दूसरी ओर जो सच की कड़वाहट से जूझता है और उस कड़वाहट को मिठास में बदलने की आकांक्षा रखता है उसके लिए यही कड़वाहट एक चुनौती होती है। कवि प्रदीप पांडेय की कविताओं में विपरीत परिस्थितियों के प्रति एक ललकार ध्वनित होती है।  प्रदीप पांडेय एक ऐसे रचनाकार है जो समाज में व्याप्त विसंगतियों के विरुद्ध आवाज उठाने में विश्वास रखते हैं। उनकी पहली कृति  ‘‘पक्षद्रोह’’ उपन्यास  के रूप में पाठकों के समक्ष आई, जिसमें उन्होंने न्याय, कानून  तथा सरकारी तंत्र में व्याप्त विसंगतियों पर करारा प्रहार किया था । उनका यह काव्य संग्रह ‘‘वक्त की ही तू तलाश है’’ लगभग उसी तेवर पर आधारित है। विधा उपन्यास के स्थान पर कविताओं में ढल गई है किंतु ललकार की ध्वनि वही है जो उनके उपन्यास में मौजूद है। इस इस संग्रह की कविताओं में कवि प्रदीप पांडेय ने बिना किसी संकोच के कठोर से कठोर शब्दों में उन लोगों को ललकारा है जो जागते हुए भी सो रहे हैं और अव्यवस्था को निरंतर अनदेखा किया जा रहे हैं। साहित्य में इस प्रकार के तेवर आज काम ही दिखाई देते हैं। बहुत कम लोग ऐसे हैं जो सीधे-सपाट तरीके से सच कहने का माद्दा रखते हैं। सृजन के दौरान जब भावनाएं पूरे आवेग से प्रभाव डाल रही हों तो शिल्प गौण होने लगता है लेकिन कविता वह विधा है जो शिल्प की गौणता को भी संभाल लेती है और एक वैशिष्ट्य में परिवर्तित कर देती है।
‘‘वक्त की ही तू तलाश है’’ संग्रह की कविताओं से गुजरते हुए यह स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है कि प्रदीप पांडेय अपनी कविताओं में शब्दों से उलझाते नहीं हैं वरन वे अपनी बात स्पष्टता से कहते हैं। जैसे उनकी कविता है- ‘‘जिंदा हो कि मर गए हो’’ । इस कविता में बिना किसी लाग-लपेट के सीधे करारे शब्दों में कटाक्ष किया गया है-
सहमे - सहमे दुबके- दुबके
जियत हो कैंसें, तुम छुप-छुपके
कोई कांड कहूं, कछु कर गए हो
कछु तो बोलो !
जिंदा हो कि मर गए हो !
प्रदीप पांडेय की कविताओं में रोष का अपना एक अलग रंग है। ‘‘ये गधों की रेस है’’ शीर्षक कविता में वे लिखते हैं कि-
करता है जी
उठा लूँ बेसवाल या बल्ला
पकडू सिरमौरों को
जमाऊं रोज
चाहे करते रहें
अब्बा व लल्ला
फीलिंग्स है अंदर ही दम तोड़ देती है
जाने दो गुनहगारों ये सोचकर छोड़ देती है
आज हर शहर विकसित भी है और समस्याओं से जकड़ा हुआ भी ।अपने शहर को लक्षित करते हुए प्रदीप पांडेय उस सारी अव्यवस्था को लक्ष्य करते हैं जिसके कारण शहर कोलाहल से भरा हुआ होने पर भी निष्पंद और निःशब्द प्रतीत होता है। शहर में व्याप्त सारी सक्रियता थोथी नजर आती है। ‘‘ये मेरा शहर’’ कविता में देश-दुनिया के तमाम शहर समाए हुए हैं-
न सुने दर्द की आवाजें
न देखे दाग जिगर के
जिंदा जैसे दिखने वाले
है मुर्दे लोग शहर के
संग्रह की कुछ कविताओं में शब्दों का चयन जितना चैंकाता है, उतना ही गुदगुदाता भी है। जैसे ‘‘ऐ मुश्किलों’’ कविता में वे ‘‘दामाद’’ शब्द का प्रयोग करते हुए कवि ने मखमली प्रहार किया है-
ऐ मुश्किलों
ज्यादा न इतराओ
दामाद हूँ तुम्हारा
दूर कहाँ जाऊँगा
साथ तुम्हारा /मुझको भी
बहुत भाता है /कमजर्फ नहीं हूँ
तुमको जो भूल जाऊंगा।
संतान आयु में चाहे जितनी भी बड़ी हो जाए किंतु उसके लिए मां का आंचल सदा महत्वपूर्ण रहता है। हर संतान हर आयु में यही चाहती है कि उसकी मां हमेशा स्फूर्त, चैतन्य और युवा रहे तथा उसकी ममत्व की छांह हमेशा मिलती रहे। कवि की आकांक्षा भी यही है । ‘‘माँ तुम और बूढ़ी न होना’’ कविता की कुछ पंक्तियां देखिए-
थपकियां बनकर
मुझको सुलाती उंगलियां
कभी ‘‘मां’’ सिर पर
फेरा करती थी
तो सब कुछ भूल जाता
कैसे गिले कैसे शिकवे
कहां याद रहते
जब मै रोता
तो वो मुझको मनाती
ढेरों किस्से कहानी सुनाती।
संग्रह की छः कविताएं एक अलग ही धरातल की रोचक कविताएं हैं। ये सभी कविताएं मदिरा और मदिरा पान करने वालों पर केंद्रित हैं। जैसे - ‘‘हे मदिराप्रेमी’’, ‘‘मद्यासक्त’’, ‘‘मदिरादृष्टि’’, ‘‘मदिरा योग’’, ‘‘मद्याभिलाषी’’ तथा ‘‘हे मधुग्राही’’। ‘‘मद्याभिलासी’’ कविता में व्यंजना-अभिव्यंजना में निबद्ध शब्दावली  की छटा निराली है। यथा-
हे मद्याभिलासी !
मद्यसक्त धैर्य न खोना,
न छटपटाना
बरसती धूप हो या समंदर
तुम सूखे गले ठेके पे जाना
सरकार ने सजाये है ठेके
तुम्हारी आस विश्वास में
कैसा धर्म? कैसी नीति?
तुम तो बस! प्याले उठाना।
और अंत में उस कविता की चर्चा जो संग्रह की शीर्षक कविता है। ‘‘वक्त की ही तू तलाश है’’ कविता की भावभूमि सच की आंच में तप कर सुदृढ़ हुए व्यक्ति का आत्मपरिचय प्रस्तुत करती हुई हृदय में ओज का संचार करती है-
आज कर, इसी वक्त कर
एक प्रण! कर ठान ले ।
है तू ही य सर्वज्ञ जग में
आज इतना जान ले ।
उठ जिगर में, भरकर
आंधी बैठा क्यों, होकर
उदास है वक्त ने बोया है तुझको
वक्त की ही, तू तलाश है ।
कवि प्रदीप पांडे की कविताएं वर्तमान के प्रत्येक सच को खुलकर रेखांकित करती है तथा विसंगतियों को मिटाने का आह्वान करती हैं। कविताओं की भाषा सरल, सहज एवं आम बोलचाल की है। छंद मुक्त होते हुए भी इनमें एक प्रवाह है जो पाठकों को बांधे रखने में सक्षम है। यह संग्रह पठनीय है क्योंकि इसकी कविताओं में एक विशेष वैचारिक उद्वेलन है जो मानस को झकझोरता है और ठहर कर सोचने को विवश करता है।      
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Sunday, March 15, 2026

साहित्य अकादमी के "स्मरण मुक्तिबोध" में सारस्वत अतिथि डॉ (सुश्री) शरद सिंह

"मुक्तिबोध न तो पूरी तरह  साम्यवादी थे और न वामपंथी, वे मूल रूप से सिर्फ मानवतावादी थे। यह बात उनकी कहानियां "ब्रह्मराक्षस का शिष्य" और "क्लॉड ईथरली" जैसी कहानियां पढ़ने के बाद भली-भांति समझा जा सकता है। मुक्तिबोध की रचनाओं को पुनर्व्याख्यायित किया जाना आवश्यक है।"- बतौर सारस्वत अतिथि मैंने मुक्तिबोध के व्यक्तित्व एवं विचारों पर अपने विचार रखे।
🚩अवसर था "स्मरण मुक्तिबोध" का। जिसकी अध्यक्षता की डॉक्टर हरिशंकर दुबे जी ने।
,🚩हार्दिक आभार मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक आदरणीय डॉ.विकास दवे जी, मुक्तिबोध सृजन पीठ के निदेशक आदरणीय ऋषि कुमार मिश्र जी एवं  श्यामलम संस्था सागर के अध्यक्ष आदरणीय उमाकांत मिश्र जी 🚩🙏🚩
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Saturday, March 14, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | पब्लिक खों अंधरा काए बनात रैत | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टॉपिक एक्सपर्ट | पब्लिक खों अंधरा काए बनात रैत | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
टाॅपिक एक्सपर्ट
पब्लिक खों अंधरा काए बनात रैत
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
         दो दिनां पैले की बात आए हम मकरोनिया चौराए से कढ़े, वा बी रात के साढ़े ग्यारा बजे। अब आप ओरें सोचहो के हम रात को साढ़े ग्यारा बजे उते कां फिर रए हते? काए से अपने इते को जो चलन आए के जोन बात जानो चाइए ऊ छोर के ई जानबे में ज्यादा मन लगत आए के को कां, काए को,  कोन के संगे घूम रओ तो? सो ऐसे जिज्ञासुअन के लाने बताबो जरूरी आए के हम अनरय करके बंडा से लौट रए हते। अनरय मने कोनऊं के घरे गमी के बाद को पैलो त्योहार। पर गई ठंड? चलो, अब आगे की असल बात सुनो के हमने मकरोनिया चौराए पे देखी के उते मसीन से गड्ढा सो खोदो जा रओ तो। बा देख के हमाए मों से निकरो के “इते जो का हो रओ?” जा सुन के हमाए डिराइवर भैया ने कई के “को जाने का करत रैत आएं? कभऊं गोलचक्का (रोटरी) पटा देत आएं, तो कभऊं जा तिकुनियां (आईलैंड) बना देत आएं। अब को जानें का कर रए?” 
     “हमें लगत आए के जे फेर के इते रोटरी बना रए।” हमाई संगवारी बोलीं। तभई हमाई संगवारी के संगवारे बोले के “हमें तो लग रओ के कछू पानी की पाईप को काम आए।” 
   “अरे नईं, आप ओरें का जानों के उने खुदई पता ने हुइए के बे इते काए के लाने गढ़ा खोद रए।” संगवारे के सालेजू ने ठिठोली करी। जा सब सुन के मोए बा एक हाथी औ चार अंधरा की किसां याद आ गई। जीमें चारों अंधरा हाथी खों थथोल-थथोल के अपनों-अपनों बखान करत आएं। बाकी अपने सागरे में सोई दसा अंधरन घांईं आए। करबे वारन के अलावा कोनऊं खों पतो नईं रैत के कब कां, का होन लगहे। पब्लिक को पइसा, मनो पब्लिक खों पैले नईं बताओ जात के का करबे जा रए। अरे एक ठइयां न्यूज छपाबे में का जा रओ? जे पब्लिक खों अंधरा सो काए बनात रैत आएं? तनक सोचियो!
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Thursday, March 12, 2026

बतकाव बिन्ना की | उनें कुंआ चाउने, इनें फुआ चाउने | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की
उनें कुंआ चाउने, इनें फुआ चाउने
 - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
जब से ऊने लड़ाई छेड़ी आए, बस तभई से मोरो मुंडा खराब चल रओ। काए से के अपने ओरें लड़ाई-झगड़ा वारे जो नोंईं। राजी-खुसी बनी रए ओई अच्छो लगत आए। मनो बा पगलेट खों तो कछू औ सूझई नईं रओ। सबई खों लड़ाई के चूला में झोकबे खों उधारो खाओ फिर रओ। बाकी अपने इते होली के हुरियाने कोसिस तो करत रए के इते सबको जी अच्छो सो बने रए। काए से के अपन तो ठैरे व्रत-त्योहरन में अपनो जी लगा के अपनो दुख-पीरा से ध्यान बांटबे वारे। जेई से तो अपने बुंदेलखंड में मुतके टाईप के होरी गीत गाए जात आएं। तनक ध्यान करो ईसुरी को। उन्ने सोई फागें लिखीं, मनो जब लुगाइयन की होरी खोलबे की बात आई सो उन्ने राधा रानी के बहाने लुगाइयन को पावर दिखा दओ। बुंदेलखंड की राधारानी किसन भगवान जू से डरबे वारी नोंईं। जेई से ईसुरी ने लिखो के-  
फागु की भीर, अभीरिन ने गहि गोविंद लै गई भीतर गोरी
भाय करी मन की पद्माकर उपर नाई अबीर की झोरी
छीने पीतांबर कम्मर तें सु बिदा कई दई मीड़ि कपोलन रोरी
नैन नचाय कही मुसकाय -लला फिर आइयो खेलन होरी 
अब दम हो सो आएं गोविंद फेर के होरी खेलबे खों। ऊंसई तो गोविंद जू गोपियन के चीर के के दुपा देत्ते औ उने परेसान करत्ते, मनो होरी के टेम पे गोपियन ने उनसे बदला ले लओ। बे उने घरे भीतरे लिवा ले गईं औ अपने मन की कर डारी। गोविंद जू को पितांबर छीन लओ, गालन पे गुलाल मल दओ औ फेर अंखियां मटकात भईं बोली के ‘‘लला फेर आइयो खेलन होरी’’। 
आप ओरन ने बरसाने की लट्ठमार होरी के बारे में तो सुनो हुइए मनो अपने बुंदेलखंड में सोई लट्ठमार होरी होत आए। हऔ, झांसी जिला के पुनावली कलां गांव में होरी के टेम पे लुगाइयां गुड़ को डगला एक पुटरिया में बांध के पेड़ की डगरिया पे टांग देती आएं। फेर बे लुगाइयां लट्ठ ले के खुदई। ऊकी रखवारी करत आएं। जो बी लुगवा बा पुटरिया लेबे की कोसिस करत आए, ऊकी लट्ठ से कुटाई करी जात आए। जे खेल होबे के बादई होलिका को बारो जात आए औ रंग खेलो जात आए। जे जो रिवाज आए, ईके बारे में एक किसां कई जात आए के जबें होलिका बालक प्रहलाद को अपनी गोदी में ले के आगी में बैठीं तो जा देख के उते ठाड़ी लुगाइयन से रई नई गई औ उन ओरन ने होलिका माई के राक्षसन से लट्ठ घुमा-घुमा के लड़ाई करी। संगे भगवान बिष्णु से प्रार्थना करी के बे बालक प्रहलाद खों बचा लें। भगवान ने देखी के बे लुगाइयां अपनी जान पे खोल के राक्षसन से लड़ रई आएं सो भगवान आए औ उन्ने प्रहलाद खों बचा लओ। मनो ईके बाद जे रिवाज सो चल परो के होरी जलाए के पैले उते लुगाइयां लठ्ठ चलाउत आएं फेर कऊं होरी जलत आए औ फेर रंग खोलो जात आए।  
पुनावली कलां गांव में नोईं बल्कि उत्तर प्रदेस के बुंदेलखंड में हमीरपुर के कुंडौरा गांव में सोई लट्ठमार होरी खेली जात आए। इते एक नई, बल्कि दो दिनां रंग खेले जात आएं। होलिका जलाए जाबे के बाद पैले दिन लुगाइयां होरी खेलत आएं। ऊ दिनां लुगवा घर से बायरे निकरबे में डर आएं। काए से जोन लुगवा बायरे दिखाओ ऊको खेंच के लट्ठ जमा दओ जात आए।ईके अगले दिन सबई की होरी होत आए। जा रिवाज बी ऐसोई नईं बन गओ। ईके पांछू सोई एक किसां आए। का भओ के  ग्राम कुंडौरा में एक लंबरदार रओ जोन को नांव रओ मेंहर सिंह (मेंबर सिंह)। एक दफा जबे जानकी मंदिर में फागें गाई जा रई हतीं, उतई समै मेंहर सिंह ने एक जने की उतई मंदिर में हत्या कर दई औ सबईं खों धमकाओ के जो कोनऊं ने ऊके खिलाफ बोलो तो बा ऊको काट डारहे। ईके बाद वां ऐसी दहसत फैली के होरी ने मनाई गई। कई बरस हो गए मनो होरी ने मनी। जा बात उते की लुगाइयन खों ने जंची। उन्ने अच्छे लट्ठ निकारे औ निकर परीं होरी खेलने के लाने।
अब चलो आप के लाने सागर सिटी की स्पेसल होरी बता दई जाए। सागर सहर के गोपालगंज झंडा चैक में श्री नृत्यगोपाल मंदिर आए। उते होलाष्टक के टेम पे लुगाइयां राधा-कृष्ण के संगे फूलों की होरी खेलत आएं। बे फाग औ भजन सोई गात आएं। एम-दूजे पे फूल सोई बरसाए जात आएं। जेई टाईप से उत्तरप्रदेश के कुलपहाड़ में सोई फूलन की होरी खेली जात आए। जे कुलपहाड़ महोबा जिला में आए। ऊटेम पे फूल बरसाए जात आएं औ ईसुरी की फागें गाई जात आएं। ऐ फाग आप ओरें सोई देखो-
आज बिरज में होरी रे रसिया।
कौना गांव के कुंअर कन्हैया,
कौना गांव की गोरी रे रसिया। आज...
नन्दगांव के कुंअर कन्हैया,
बरसाने की गोरी रे रसिया। आज...
वैसे कई तो जे जात आए के जा होरी के त्योहार की सुरुआत अपने बुंदेलखंड से भई रई। ई के बारे में एक कहनात आए के झांसी से कोनऊं 66 कि.मी. दूर एरच गांव से में पैली होरी खेली गई रई। काए से के एरच राजा हिरयकश्यपु के राज की राजधानी हुआ करत्ती। एरच में ई होलिका प्रहलाद खों अपनी गोदी में ले के बैठी रईं। जीमें होलिका सो जल गईं औ प्रहलाद बच गओ रओ। जेई से उते पांच दिनां की होरी खेली जात आए औ गीत गाए जात आएं -
अपने-अपने महल से निकरीं सखी सब
कोऊ श्यामल कोऊ गोरी रे रसिया। आज...
उड़त गुलाल लाल भये बादर,
मारत भर-भर रोरी रे रसिया। आज...
औ जो करीला की रंगपांचे की बात ने करी तो मनो बात पूरी ने हुइए। मध्यप्रदेश के अशोक नगर से कोनऊं 75 कि.मी. दूर एक गांव आए करीला। इते सीता माता का मंदिर आए। यां बेड़िनियां पूजा करबे के लाने आऊत आएं। कओ जात आए के इतई सीता मैया ने लव औ कुश को जनम दओ रओ। करीला में रंगपांचे पे भौतई बड़ो मेला भरत आए।
अपने ई बुंदेलखंड में अकेली श्रीकृष्ण जू से नोईं श्रीराम और जानकी मैया से सोई होरी खेली जात आए- 
राजकिशोरी महल बिच खेलत रे होरी।
कर झटकत घूंघट पट खोलत,
मलत कपोलन रोरी। महल...
कंचन की पिचकारी घालत,
तक मारत उर ओरी। महल...
मनो मोए कलई एक नओ बुंदेली फाग सुनबे को मिली जीमें आजकाल की लड़ाई पे तानो मारो गओ आए। दो-चार लाइनें आप ओरें सोई सुन लेओ-
उनें कुआ चाउने, इनें फुआ चाउने
बाकी जाएं चूला में, रमें हैं बे तो दूला में
उनकी तोपें उनको राज, बाकी के सब गिरे काज
उनें रुंआ चाउने, इने पुआ चाउनें....
जेई के संगे मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। मनो सोई सोचियो जरूर के जे लड़ाई करे से का मिलहे उने? औ जो मिलहे का बे अपने संगे ऊ पार लौं ले जाहें, जो सबको चैन बिगार रए।    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, March 11, 2026

चर्चा प्लस | हाशिए में खड़ा बाल साहित्य क्या एआई के साथ कदम मिला सकेगा? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 

हाशिए में खड़ा बाल साहित्य क्या एआई के साथ कदम मिला सकेगा?

- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                               

         हाल ही में सागर में बाल साहित्य पर एक संगोष्ठी हुई जिसमें स्थानीय एवं अतिथि साहित्यकारों ने अपने विचार रखे। दूसरे सत्र में बाल कविताएं भी पढ़ी गईं। यह सेमिनार कई प्रश्न जगाने में सफल रहा जिनमें सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या पर्याप्त बाल साहित्य लिखा जा रहा है? दूसरा प्रश्न था कि क्या एआई का युग में बाल साहित्य को प्रभावित करेगा? अर्थात हाशिए में खड़ा बाल साहित्य क्या एआई के साथ कदम मिला सकेगा? इस दृष्टि से सेमिनार सफल रहा कि वह विचारों को उद्वेलित कर सका, बशर्ते साहित्यकारों के मानस में यह उद्वेलन बना रहे। 

       
बाल साहित्य शोध सृजनपीठ, साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश शासन संस्कृति विभाग द्वारा मध्यप्रदेश के संभागीय मुख्यालय सागर में 06 मार्च 2026 को बाल साहित्य पर एक विमर्श एवं काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें स्थानीय श्यामलम संस्था का पूर्ण सहयोग रहा। विमर्श का विषय था ‘‘लोक ध्वनि से बाल ध्वनि तक’’। बाल साहित्यकारों ने अपने-अपने विचार रखे। बाल साहित्य शोध सृजनपीठ की अध्यक्ष डाॅ मीनू पांडे ‘नयन’ ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही कि बाल साहित्य लिखने के लिए बाल मनोविज्ञान को जानना और समझना जरूरी है।

सेमिनार के बाद बाल साहित्य की दशा और दिशा को ले कर मेरे मन में भी मंथन चलता रहा। मुझे याद आने लगा वह समय जब मैं अपनी बाल्यावस्था में अपने नानाजी से कहानियां सुना करती थी। इतना ही नहीं मेरे घर खाना पकाने का काम करने वाली जिन्हें हम आदरपूर्वक ‘‘बऊ’’ यानी ‘मां’ कहते थे, वे भी चूल्हें में रोटियां सेंकने के दौरान ढेर सारी कहानियां सुनाया करती थीं। बाल्यावस्था में मैंने दो और लोगों से कहानियां सुनीं, एक अपने कमल सिंह मामाजी से और दूसरी अपनी दीदी वर्षा सिंह जी से। यानी मेरा बचपन कहानियों से सराबोर रहा। चारो के कथानक परस्पर बहुत भिन्न हुआ करते थे। नानाजी जो कहानियां सुनाते थे उनमें रामायण और महाभारत से निकले किस्से हुआ करते थे। उनमें कई क्षेपक कथाएं होती थीं। जैसे उन्होंने सुनाया था कि महाभारत काल के अंत समय में भीम को घमंड हो गया कि यदि उसने दुर्योंधन को नहीं मारा होता तो युद्ध कभी समाप्त नहीं होता। यानी युद्ध की विजय का सारा श्रेय उसी को है। श्रीकृष्ण उसके इस घमंड को ताड़ गए और उन्होंने पांडवों से कहा कि बहुत दिन से वन घूमने नहीं गए हैं, चलो चलते हैं। श्रीकृष्ण के साथ पांडव वन की ओर निकल पड़े। रास्ते में एक वृद्ध वानर अपनी पूंछ फैलाए लेटा हुआ था। यह देख कर भीम ने उस वानर से डपटते हुए कहा कि अपनी पूंछ हटा ले। वानर ने अपनी पूंछ हिलाई भी नहीं। इस पर भीम को क्रोध आ गया। उसने ललकारते हुए कहा कि यदि तू अपनी पूंछ नहीं हटाएगा तो मैं तेरी पूंछ काट दूंगा। तब उस वानर ने अपनी आंखें खोली और मंद स्वर में कहा कि मैं इतना बूढ़ा और अशक्त हो गया हूं कि अपनी पूंछ भी नहीं हिला पा रहा हूं। इसलिए तुम स्वयं मेरी पूंछ उठा कर एक ओर सरका दो और निकल जाओ। यह सुन कर भीम को और क्रोध आया किन्तु श्रीकृष्ण ने उसका कंधा दबा कर इशारा किया कि तुम्हीं पूंछ सरका दो। भीम ने पहले उंगली से पूंछ हटाने का प्रयास किया, वह नहीं हटी। फिर एक हाथ से प्रयास किया, मगर वह रंचमात्र नहीं सरकी। इसके बाद भीम ने अपने दोनों हाथों से अपनी पूरी शक्ति लगा कर पूंछ को सरकाने का प्रयास किया लेकिन पूंछ टस से मस नहीं हुई। तब भीम को लगा कि इसमें अवश्य कोई रहस्य है और उसने उस वानर के सम्मुख हाथ जोड़ कर पूछा की महानुभाव आप कौन हैं? इस पर वह वानर उठ खड़ा हुआ और अपने दिव्य रूप में आ कर उत्तर दिया कि मैं श्रीराम भक्त हनुमान हूं। यह सुनते ही भीम उनके चरणों में गिर गया और उसे अपनी भूल का अहसास हो गया कि वह गलत घमंड कर रहा था। - यह कहानी उपेदशात्मक तो थी ही साथ ही कल्पना शक्ति को बढ़ावा देने वाली भी थी। कहानी सुनते समय मैं कल्पना करती के कैसे भीम को वृद्ध वानर के रूप में हनुमान मिले होंगे? कैसे उसका घमंड चूर-चूर हुआ होगा?

बऊ की कहानियां राजा, रानियों, भूत, प्रेत आदि से भरी होती थीं। लेकिन सब की सब सुखांत और सत्य की विजय स्थापित करने वाली। एक मनुष्य भूत के सामने भी कैसे निडरता से डटा रह सकता है, उनकी कहानियों में यही नुस्खा रहता था। मामाजी की कहानियों में आदिवासी अंचलों की कहानियों की बहुलता होती थी। आदिवासियों के देवी, देवता, उनका जुझारूपन आदि उन कहानियों में रहता था। मेरी वर्षा दीदी की कहानियों में ‘‘अंधेर नगरी चैपट राजा’’ भी शामिल रहती थी, क्योंकि उन्हें कहानियां, नाटक आदि पढ़ने का भी बहुत शौक था। आज अगर मैं कहानियां या उपन्यास लिख पाती हूं तो उसके मूल में बचपन में सुनी वे कहानियां ही हैं जिन्होंने मुझे कल्पना और दृश्यात्मकता का पाठ पढ़ाया। मेरे समकालीन लगभग सभी साहित्यकारों के जीवन में यह दौर आया होगा जब उन्होंने अपने बचपन में जी भर-भर के कहानियां सुनी होंगी। कल्पना शक्ति को बढ़ाने और संस्कारित करने में चंदामामा, नंदन आदि की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। वे बाल पत्रिकाएं हमारे लिए उसी प्रकार प्रिय थीं जैसे आज छोटे बच्चों को मोबाईल पसंद है। लेकिन उन पत्रिकाओं और मोबाईल में जमीन-आसमान का अन्तर है। उनमें भटकने की गुंजाइश नहीं थी किन्तु मोबाईल में बालमन को भटकने के अनेक अवसर रहते हैं।

जब से मोबाईल ‘‘लाईफ लाइन’’ की भांति जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है तब से एक बात मैंने गौर की है कि कई युवा माताएं अपने बच्चे के मन बहलाने तथा उन्हें उलझाए रखने के लिए उनके हाथ में मोबाईल थमा देती हैं। बच्चा अधिकतर मार-काट वाले गेम्स में उलझता चला जाता है और मां को इसका अहसास ही नहीं हो पाता है। आजकल छोटे बच्चों के जिद्दी और क्रोधी स्वभाव बढ़ने का एक कारण यह भी मुझे लगता है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि उनके हाथों से मोबाइल दूर कर के उन्हें चित्रों वाली किताबें, और तनिक बड़े होने पर बाल साहित्य वाली किताबें दी जाएं। क्योंकि जो बच्चे को दिया जाएगा, वह उसी के प्रति आकर्षित होगा और उसे ही पहचानेगा।

आधुनिक मांए आजकल लोरी, गीत या कहानियां कम ही सुनाती हैं, यह काम ‘‘एलेक्सा’’ को सौंप दिया जाता है जिसमें साहित्य तो होता है किन्तु स्पर्श या संवेदनात्मकता नहीं होती है। लिहाज़ा यह एक कठिन दौर है जब बाल साहित्य अपनी पुनस्र्थापना की मांग कर रहा है। साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश शासन के अध्यक्ष विकास दवे जी को इसकी चिंता है किन्तु मात्र क्या उनकी चिंता करने से सबकुछ संभव हो सकेगा? साहित्यकारों को भी बाल साहित्य लिखने में ईमानदारी बरतनी होगी। मात्र कथित बाल कविताओं की तुकबंदियां कर स्वयं को बाल साहित्यकार समझ लेने वाले रचनाकार भले ही अपनी पुस्तकों की संख्या बढ़ा लें किन्तु बच्चों के लिए उपयोगी साहित्य कभी नहीं दे सकते हैं।
कई बार संवाद में यह सामने आता है कि एक तो बाल साहित्य को हमेशा हाशिए पर खड़ा रखा गया, उस पर बाल साहित्य के स्वरूप को ही कई साहित्यकार समझ नहीं पाते हैं। जबकि हमारे देश में प्राचीनकाल से बाल साहित्य रचा जा रहा है। विष्णु शर्मा ने चार उद्दंड राजकुमारों को शिक्षित करने तथा जीवन की नीतियों का ज्ञान देने के लिए वे कहानियां सुनाईं जिनके पात्र पशु, पक्षी थे। हम उन कहानियों के संग्रह को ‘‘पंचतंत्र’’ के नाम से जानते हैं। ‘‘सिंहासन बत्तीसी’’ की कहानियां रोचक होती हुई शिक्षाप्रद हैं। ‘‘वेताल कथाओं’ को भला कैसे भुलाया जा सकता है जिसमें विक्रमादित्य वेताल को वृक्ष की शाखा से उतार कर अपने कंधे पर रखता है और वेताल अचानक सचेत हो कर राजा से कहता है कि ‘राजन, मैं तुझे एक कहानी सुना रहा हूं। इसके अंत में एक प्रश्न आएगा जिसका उत्तर यदि तूने नहीं दिया तो तेरे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।’ विडंबना ये कि राजा को पता है कि यदि वह बोलेगा तो वेताल फिर से पेड़ पर जा कर लटक जाएगा। अतः रोज रात को विक्रमादित्य वेताल को शाख से उतारता और उसकी कहानी के अंत के प्रश्न का उत्तर देकर उसे खो देता। इस तरह अनेक कहानियों की श्रृंखला है वह।

प्रश्न उठता है कि क्या आज बाल साहित्य का स्वरूप पहले जैसा बचा है? अथवा उसके कलेवर को समकालीन बनाए रखा जा सकता है? जब हम छोटे तो हमने जो कविताएं सुनी थीं, याद की थीं उनमें एक नन्हीं-सी कविता थी -
चल उठ,
मुंह धो,
जल भर।
आज बच्चे को इस तरह पानी भरना सिखाने की आवश्यकता लगभग नहीं है। फिर अधिकांश बच्चे अंग्रेजी स्कूलों के सुपुर्द कर दिए जाते हैं जहां वे ट्विंकल- ट्विंकल लिटिल स्टार’’ और ‘‘जैक एंड जिल’’ जैसी कविताएं सीखते हैं। यहां भी विडंबना ये कि फ्लैट्स में रहने वाले और अधिकांश समय पंखा, एसी में सोने वाले बच्चे खुले आसमान की तारों वाली रात देख ही नहीं पाते हैं। वे न तो ‘चोरखटिया’ यानी बड़ी सप्तऋषि जानते हैं और न छोटी सप्तऋषि। ध्रुव तारा आकाश में कहा स्थित होता है, उन्हें यह भी पता नहीं। न जानने के क्रम में वह कदंब का पेड़ भी है जिस पर सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी प्रसिद्ध कविता लिखी थी कि-
वह कदंब का पेड़ अगर मां होता यमुना तीरे
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया, बनता धीरे-धीरे।
आज शहरों से कंदब के पेड़ गायब हो चुके हैं, जो बचे हैं वे बच्चों के माता-पिता के भी संज्ञान में भी नहीं रहते हैं।

अब प्रश्न आता है सबसे नवीनतम टैक्नोलाजिकल स्थिति का, जिसे हम ‘‘एआई’’ यानी आर्टीफीशियल इंटेलीजेंस के नाम से जान रहे हैं। उसने तूफान की तरह बड़ी तरंगे उठानी शुरू कर दी हैं। कहा तो ये जाता है कि इन दिनों कई किताबें भी एआई के द्वारा लिखी जा रही हैं। क्या यह छल बाल साहित्य के मर्म को समझ सकेगा? जबकि बाल साहित्य से अपेक्षा की जाती है कि वह टेक्नाॅलाजी के साथ परिवर्तित होते युग में बच्चों के लिए मानवीय मूल्यों, राष्ट्रीय मूल्यों और आदर्श पूर्ण मूल्यों को बनाए रखे। यह एक चुनौती है। शासकीय इकाइयां मात्र सहायता कर सकती हैं, अन्यथा इस चुनौती से स्वयं साहित्यकारों को निपटना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि वे साहित्य सृजन करने में एआई के छल का सहारा न लें, वर्तमान बाल मनोविज्ञान को समझें और पारंपरिक मूल्यों व संस्कारों को आधुनिक प्रवृतियों के साथ इस प्रकार समायोजित करें कि वह बच्चों को मनोरंजन और शिक्षा एक साथ मिल सके तथा उनमें पुस्तक पढ़ने के प्रति रुचि जाग सके। यहां मैं वे दो बातें कहना चाहूंगी जो मेरी मां मुझसे कहा करती थीं कि कोई भी चुनौती स्थाई नहीं होती और कोई भी चुनौती ऐसी नहीं होती जिसका कोई हल न निकाला जा सके, यदि चुनौती का सामना करने की ईमानदार मंशा हो।               
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(दैनिक, सागर दिनकर में 11.03.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, March 10, 2026

पुस्तक समीक्षा | बुंदेलखंड की सांस्कृति विरासत पर महत्वपूर्ण पुस्तक है यह | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
बुंदेलखंड की सांस्कृति विरासत पर महत्वपूर्ण पुस्तक है यह
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक - बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत
संपादक - प्रो. नागेश दुबे, डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन
प्रकाशक -रिसर्च इंडिया प्रेस ई-6/34 फर्स्ट फ्लोर, संगम विहार नई दिल्ली-110080
मूल्य -3500/-
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बुंदेलखंड संस्कृति का धनी है। इसके इतिहास के पन्ने इसकी संस्कृति के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। यहां तक कि प्रागैतिहासिक काल में भी वह संस्कृति बुंदेलखंड में मौजूद थी जिसके मनुष्यों ने आबचंद की गुफाओं में भित्ति चित्र बना कर अपने अनुभवों एवं अपनी जीवनचर्या को आने वाली पीढ़ियों के लिए अंकित कर दिया। बुंदेलखंड में अवशेषों के रूप में मिलने वाले मृदभाण्ड, औजार एवं आभूषणों से इस अंचल में सास्कृतिक विकास की सम्पूर्ण कथा पढ़ी और जानी जा सकती है। बुंदेलखंड में कला और संस्कृति के विकास का चरम बिन्दु था खजुराहो के मंदिर एवं मूर्तियां। जहां धर्म, दर्शन, आध्यात्म, जीवन आदि सभी एकाकार हो कर बोल उठते हैं तथा तत्कालीन समाज की मानसिक विशालता से परिचित कराते हैं। बुंदेलखंड में अभी भी अनेक पक्ष ऐसे हैं जिन पर सतत शोधकार्य किया जा रहा है ताकि काल के पर्दों के पीछे छिपे हुए तथ्यों को प्रकाश में लाया जा सके। इस कार्य में डाॅ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग का सबसे बड़ा योगदान है। विभाग में म्यूजियम के संस्थापक डाॅ. के.डी. बाजपेयी से ले कर वर्तमान विभागाध्यक्ष प्रो. नागेश दुबे ने गहन शोध कार्य किए हैं तथा कराए हैं। प्रो.नागेश दुबे ने समय-समय पर सेमिनार में शोध आलेख का न सिर्फ वाचन कराया अपितु उन शोध आलेखों को पुस्तक के रूप में प्रकाशित करा कर उन्हें दस्तावेज में ढाल दिया जो कि भावी शोधकर्ताओं के लिए भी जानकारी उपलब्ध कराने के साथ दिशानिर्देश देने का भी काम करते हैं। ऐसा ही एक शोध ग्रंथ प्रकाशित हुआ है जिसका नाम है ‘‘बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत’’। इस शोघ ग्रंथ का संपादन किया है प्रो. नागेश दुबे तथा डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन ने।

प्रो. नागेश दुबे ने डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) से ही वर्ष 1998 में पीएच.डी. की उपाधि प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग से प्राप्त की। वे इसी विभाग में नियुक्त हुए तथा अकादमिक कार्यों के साथ ही वर्ष 2014 से निरन्तर इस विभाग में विभागाध्यक्ष पद का भी निर्वहन कर रहे हैं। इनकी विषय विशेषज्ञता प्राचीन भारतीय सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास तथा भारतीय कला एवं स्थापत्य है। इन्होंने अनेक पुरातात्त्विक सर्वेक्षणों एवं उत्खननों में भी सहभगिता की है। इनकी आठ पुस्तके प्रकाशित हैं। इन्होंने सात राष्ट्रीय संगोष्ठियों का सफल आयोजन आपके निर्देशन में करवाया है तथा सौ से अधिक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में सहभागिता भी की है। इनके 60 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हैं। इनके शोध निर्देशन में 20 शोधार्थियों ने शोधकार्य पूर्ण किया है।
वहीं, डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन ने प्राचीन भारतीय इतिहास एवं पुरातत्त्व विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय (उ.प्र.) से स्नातकोत्तर तथा प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। इन्होंने पुरातत्त्व विषय में यूजीसी नेट परीक्षा पास की है। इन्होंने संग्रहालय विज्ञान, प्रागैतिहास, शैलचित्र कला, पुरातात्त्विक उत्खनन एवं अन्वेषण में विशेषज्ञता हासिल की है। इनके द्वारा अशोकनगर जिले में विद्यमान 50 से अधिक नवीन पुरास्थलों सहित 6.6 करोड़ वर्ष पुराने जीवश्मों की भी खोज की गई। विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में इनके 15 से अधिक शोधपत्र प्रकाशित हैं। इनकी तीन संपादित पुस्तकें भी प्रकाशित हैं। उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों, सम्मेलनों में 30 से अधिक शोध पत्र भी प्रस्तुत किए हैं। डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन वर्तमान में शासकीय महाविद्यालय, शाढ़ौरा, जिला अशोकनगर, मध्य प्रदेश में इतिहास विभाग में सहायक प्राध्यापक (अतिथि विद्वान) के रूप में कार्यरत हैं।

‘‘बुंदेलखंड की सांस्कृतिक विरासत’’ पुस्तक के सह-सम्पादक हैं डॉ. राघवेन्द्र प्रताप सिंह, डॉ. सुरेन्द्र कुमार यादव, डॉ. मशकूर अहमद कादरी, डॉ. शिव कुमार पारोचे तथा मो. आदिल खान।
जब विषय विशेषज्ञ अपना शोधपत्र प्रस्तुत करते हैं तथा विषय विशेषज्ञों की एक पूरी टीम उसका संपादन करती है तो ऐसी शोधात्मक पुस्तक की अर्थवत्ता, गुणवत्ता एवं सामग्री विषयक विश्वसनीयता स्वयं सिद्ध रहती है। इस शोध्रगंथ रूपी पुस्तक में बुंदेलखंड की संस्कृति के विविध पक्षों पर शोघात्मक सामग्री सहेजी गई है। पुस्तक में कुल 34 आलेख हैं जिनमें कई आलेखों के साथ छायाचित्र भी प्रस्तुत किए गए हैं। इन लेखों में इतिहास एवं पुरातत्व से ले कर भूगोल तक, खानपान से ले कर आस्था एवं संगीत तक हर पक्ष को सामने रखा गया है। विशेष यह कि जब इतिहास एवं पुरात्तव बात करते हैं तो साक्ष्य सहित बात करते हैं। प्रो. नागेश दुबे ने ‘‘प्राक्कथन’’ में लिखा है कि ‘‘बुन्देलखण्ड का भू-भाग आदिकाल से ही अपने अंचल में विभिन्न युगों की सांस्कृतिक विरासत को संजोये रहा है। इस क्षेत्र में विभित्र संस्कृतियाँ पुष्पित और पल्लिवित हुई। बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत के विविध पक्षों को उद्घाटित करने के लिये भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् (आईसीएसएसआर) नई दिल्ली की वित्तीय सहायता से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरात्तत्त्व विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर द्वारा विश्वविद्यालय में स्थित पुरातत्व संग्रहालय में 17-18 फरवरी, 2022 में राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया था। जिसमें बुंदेलखंड के सांस्कृतिक विरासत के विविध पक्षों, साहित्यिक परम्परा, कला-स्थापत्य, समाज, धर्म, पर्यटन, आदि विविध पक्षों पर केन्द्रित शोध पत्र प्रस्तुत किये गये। इस ग्रंथ में बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत को उदघाटित करने वाले शोधपत्रों को सम्मिलित किया गया है।’’

व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए यह गर्व का विषय है कि मैं भी भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरात्तत्त्व विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर की ‘‘गोल्ड मेडलिस्ट’’ विद्यार्थी रही हूं तथा यही से मैंने ‘‘खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्व’’ विषय पर पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की थी। मेरा भी एक शोधपत्र इस पुस्तक में शामिल है। यद्यपि सतत अकादमिक रूप से मैं कभी विभाग से जुड़ी नहीं रही किन्तु समय-समय पर अपने शोधपत्र वाचन करने तथा विषय विशेषज्ञ के रूप में सेमिनारों में मुझे विभाग ने शामिल किया है। इसीलिए मैं विभाग द्वारा किए जाने वाले शोध कार्यों की गंभीरता से भली-भांति परिचित भी हूं और इसीलिए इस पुस्तक पर आधिकारिक तौर पर कोई भी समीक्षात्मक टिप्पणी करने के योग्य स्वयं को अनुभव करती हूं। 

पुस्तक में जो आलेख हैं उनकी गुणवत्ता एवं श्रेष्ठता निःसंदेह स्वीकार्य है। जैसाकि मैंने पूर्व में भी लिखा कि यह पुस्तक भावी शोधकर्ताओं को एक ऐसी ज़मीन देती है जिस पर खड़े हो कर वे इन पर पुनर्शोध एवं इससे आगे का कार्य कर सकते हैं। यूं भी इतिहास एवं पुरातत्व नवीन दृष्टिकोण से बार-बार शोध कार्य की मांग करते हैं। इस पुस्तक में जो 34 लेख हैं वे इस प्रकार हैं-   1.बुन्देलखण्ड के संग्रहालयों में प्रदर्शित बुन्देलखण्ड की साँस्कृतिक विरासत - प्रो. नागेश दुबे 2. सागर की सांस्कृतिक विरासत एवं पर्यटन की संभावनायें - डॉ. बी.के. श्रीवास्तव 3. बुंदेलखण्ड की संस्कृति प्राचीन हिंदी साहित्य के आइने में - प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी 4. बुंदेलखण्ड में प्रभु श्रीराम - डॉ. कृष्ण कुमार त्रिपाठी 5. मढ़-बमोरा के प्राचीन मंदिर परिसर से ज्ञात सदाशिव प्रतिमा - प्रो. आलोक श्रोत्रिय, डॉ. मोहनलाल चढ़ार 6. खजुराहो की मूर्तिकला में दशावतार का अंकन - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह 7. दमोह जिला. मध्य प्रदेश की विशिष्ट नटराज प्रतिमाएं प्रतिमाशास्त्रीय अवलोकन - डॉ० सुरेन्द्र कुमार यादव 8. चन्देल काल में शाक्त एवं अन्य सम्प्रदाय - डॉ. राघवेन्द्र प्रताप सिंह 9. बुन्देलखण्ड की लोक संस्कृति के विविध पक्ष (व्रत, पर्व एवं उत्सव के विशेष सन्दर्भ में) - डॉ. विश्वजीत सिंह परमार 10. सागर संभाग के संग्रहालयों में प्रदर्शित विष्णु की गरूड़ासीन प्रतिमाएँ: एक अध्ययन - डॉ. शिवकुमार पारोचे 11. खानपुर (सागर) के शैलचित्रों का सांस्कृतिक अनुक्रम - डॉ. मशकूर अहमद कादरी 12. एरण से प्राप्त नवीन सती स्तम्भ - डॉ. मोहन लाल चढ़ार 13. मध्यप्रदेशीय बुन्देलखण्ड में जैन संस्कृति की निरन्तरता के अभिलेखीय प्रमाण - डॉ. जिनेन्द्र कुमार जैन 14. सागर जिले के धार्मिक पर्यटन स्थल - डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन 15. रहली अंचल का प्राचीन शैव मूर्तिशिल्प एक सर्वेक्षणात्मक अध्ययन - डॉ. गोविन्द सिंह दांगी 16. सागर क्षेत्र के प्रागैतिहासिक शैलचित्र -डॉ. प्रदीप कुमार शुक्ल 17. सागर संभाग की शिव प्रतिमाओं से सम्बद्ध सांस्कृतिक तत्व - राज बहादुर क्षत्री 18. सागर एवं दमोह का संस्कृत साहित्य - डॉ. नौनिहाल गौतम 19. बुन्देलखण्ड की लोकगाथाएँ (दिमान हरदौलजी एवं कारसदेवजी के विशेष सन्दर्भ में) - श्रीमती दीपशिखा सिंह परमार 20. लोक गीतों में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष बुंदेली लोक गीतों के विशेष संदर्भ में - डॉ. अखिल कुमार गुप्ता 21. बुन्देलखण्ड का स्थापत्य शिल्प (मन्दिर, मठ, दुर्ग एवं गढ़ी) -डॉ. अर्चना द्विवेदी 22. सागर जिला पुरातत्त्व संग्रहालय में प्रदर्शित देवी गंगा की प्रतिमाएँ - डॉ. मनीषा तिवारी 23. थूबोन (जिला अशोकनगर) की प्रमुख गणेश प्रतिमाएँ - कीरत अहिरवार 24. खजुराहो की कला में यक्ष प्रतिमाओं का अंकन एवं मान्यताएँ - डॉ आशीष कुमार चाचोंदिया 25. दोनी (जिला-छतरपुर) के प्राचीन मंदिर - डॉ. रमेश कुमार अहिरवार 26. रानी दमयंती की नगरी का पुरा वैभव - डॉ. सुरेन्द्र कुमार चैरसिया 27. बुन्देलखण्ड अंचल की सांस्कृतिक विरासत - डॉ. दीपक कुमार 28. बुन्देलखण्ड के लोकजीवन में लोकउत्सव एंव मेले - निधि सोनी 29. बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत में लोक नृत्य -अंजली पाण्डेय 30. बुन्देलखण्ड के संगीत में ताल वाद्य परंपरा - डॉ. राहुल स्वर्णकार 31. दमोह जिले का प्रमुख कला केन्द्र नोहटा - डॉ. वन्दना गुप्ता 32. बुंदेली कला, साहित्य, संस्कृति एवं वैभव के प्रचार प्रसार में जनमाध्यमों की भूमिका - डॉ. अलीम अहमद खान 33. बुन्देलखण्ड की पुरा सम्पदा का सर्वेक्षण एवं राजनीतिक परिदृश्य - डॉ. रणवीर सिंह ठाकुर तथा 34. सेटपीटर्स चर्च सागर: एन एक्जाम्पल ऑफ कोलोनियल आर्कीटेक्चर।

   इस प्रकार देखा जाए तो बुंदेलखंड के लगभग प्रत्येक कालखंड को तथा प्रत्येक सांस्कृतिक पक्ष को इस पुस्तक में संग्रहीत किया गया है जिससे पुस्तक का कलेवर समृद्ध एवं सुरुचिपूर्ण है। प्रो. नागेश दुबे एवं डॉ. सुल्तान सलाहुद्दीन ने इस महत्वपूर्ण प्रकाशन के लिए साधुवाद के पात्र हैं। अकादमिक प्लेटफार्म के साथ विशेषज्ञों की मुहर किसी भी पुस्तक को एथेंटिक एवं बहुउपयोगी बना देती है। उस पर विशेषता यह है कि सभी आलेख सहज एवं सरल भाषा में हैं तथा संदर्भ सूचियों से परिपूर्ण हैं। शोधकर्ताओं एवं विद्यार्थियों के साथ ही बुंदेलखंड को समग्रता से जानने के इच्छुक आम पाठकों के लिए भी यह पुस्तक पठनीय एवं संग्रहणीय है।        
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