Tuesday, July 21, 2026

पुस्तक समीक्षा | छोटी बड़ी इबारतें : साहित्य की इबारतें भी इतिहास रचती हैं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा 
छोटी बड़ी इबारतें : साहित्य की इबारतें भी इतिहास रचती हैं
- समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक      - छोटी बड़ी इबारतें
लेखक      - हरजिंदर सिंह सेठी
प्रकाशक  - न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, सी-515, बुद्ध नगर, इंद्रपुरी, नई दिल्ली -110012
मूल्य        - 399/-
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साहित्य की इबारतें भी इतिहास रचती हैं, समय का इतिहास, संवेदनाओं का इतिहास, भावनाओं का इतिहास। शैली कोई भी हो सकती है गद्य या पद्य, या दोनों। जो साहित्यिक कृति मन को छू लेती है विचारों को आंदोलन कर देती है, वही इतिहास की तरह मानस के दस्तावेज में ढल जाती है। ‘‘इबारत’’ का शाब्दिक अर्थ है लिखावट, लेख, या गद्यांश। यह अरबी मूल का शब्द है जिसका प्रयोग अक्सर किसी दस्तावेज़, पुस्तक, या आलेख में लिखे गए शब्दों या वाक्यों की संरचना को दर्शाने के लिए किया जाता है। चर्चित वरिष्ठ लेखक हरजिंदर सिंह सेठी ने ऐसी ही इतिहास रचने वाली कृतियों एवं मुंबई की साहित्यिक उपलब्धियों पर अपने विचारों को संग्रह का रूप दे कर अपने आप में एक दस्तावेज रच दिया है। इसमें उनके द्वारा की गई समीक्षाएं, लेख एवं अनुशीलन भी है। साथ उन महत्वपूर्ण बिन्दुओं का विवरण है जिन्होंने मुंबई को निरंतर साहित्यिक वातावरण दिया। हरजिंदर सिंह सेठी की इस पुस्तक का नाम है- ‘‘छोटी बड़ी इबारतें’’। 
      इस पुस्तक में विचारों का एक सुरुचि पूर्ण संवाद है जो साहित्य के विविध व्यक्तित्व एवं उनकी सृजनधर्मिता से परिचित कराने के साथ ही तत्संबंधी वातावरण तैयार करने वाले कारकों की ओर भी ध्यान आकर्षित करता है। इस दृष्टि से ‘‘छोटी बड़ी इबारतें’’ मायानगरी मुंबई और आर्थिक केन्द्र मुंबई के साहित्यिक पक्ष से गहराई से परिचित कराती है।
      22 जुलाई 1947 को गाजियाबाद (उ.प्र.) में जन्मे हरजिंदर सिंह सेठी की शिक्षा मुंबई में हुई और उनका कार्यक्षेत्र भी मुम्बई रहा। उनकी पहचान एक प्रगतिशील चेतना के लेखक एवं कवि के रूप में है। उनके लेखन में विषय की बहुत विविधता है। उनकी प्रकाशित पुस्तकें हैं- गुरु तेग बहादुर एक युग व्यक्तित्व (जीवनी) 1995, यह चुप रहने का समय नहीं (कविता संग्रह) 2000, सौ सवाल सौ जवाब (इतिहास) 2003, कुछ किताबें कुछ लोग (समीक्षा संस्मरण) 2011, नामदेव वाणी: व्याख्या विवेचन (अध्ययन) 2015, बादशाह दरवेश (जीवन गाथा) 2017, मेरी धरती के लोग (कविता संग्रह) 2025। कुछ रचनाओं का प्रकाशन पंजाबी एवं गुजराती में भी। इनमें से गुरु तेग बहादुर एक युग व्यक्तित्व (जीवनी) तथा मेरी धरती के लोग (कविता संग्रह) मैंने पढ़ा है तथा कविताओं की समीक्षा भी की है। उनका लेखन प्रभावी है। लेखन के साथ ही कुछ महत्वपूर्ण सम्पादन भी किए हैं जिनमें हैं- ‘‘पानी के ताप में’’ भगवत लाल उत्पल की कविताओं का सम्पादन (1996), ‘‘मेरे मन सांझ हुई’’ डॉ. रविनाथ सिंह की कविताओं का सम्पादन (2007) एवं ‘‘एन.बी. सिंह नादान की चुनिंदा गजलें’’ (2025)। हरजिंदर सिंह सेठी को संपादन एवं साहित्य सृजन के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार मिले हैं जिनमें महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा काका कालेलकर पुरस्कार-1997 तथा महाराष्ट्र राज्य हिंदी अकादमी द्वारा आचार्य नंद दुलारे बाजपेयी पुरस्कार-
2013 शामिल हैं।
     ‘‘आ से आरम्भ’’ शीर्षक से पुस्तक की भूमिका में उन्होंने लिखा है कि ‘‘सन् 2011 में मेरी पुस्तक ‘‘कुछ किताबें कुछ लोग’’ प्रकाशित हुई थी जिसमें विभिन्न विधाओं की 28 पुस्तकें एवं साहित्य के क्षेत्र से जुड़े पांच व्यक्तियों पर लिखे गये आलेख शामिल थे, जिसे पाठकों और समीक्षकों से भरपूर सराहना मिली थी। उस किताब की चर्चा-गोष्ठी में कवि-समीक्षक विजय बहादुर सिंह, उपन्यासकार-कवि विनोद कुमार श्रीवास्तव, कवि-आलोचक विजय कुमार, कहानीकार हरियश राय, कवि-समीक्षक हृदयेश मयंक, राधेश्याम उपाध्याय, शैलेश सिंह, रमेश राजहंस जैसे दिग्गज साहित्यकारों एवं विद्वतजनों ने अपना सकारात्मक मत व्यक्त कर मुझे संबल प्रदान किया। ‘‘छोटी बड़ी इबारतें’’ उसी क्रम की अगली कड़ी है। मुम्बई के साहित्यिक जगत में उठते-बैठते जो प्राप्त हुआ, उसे ही किताब के रूप में प्रस्तुत करने का उपक्रम है यह। कुछ कृतियों और कुछ स्मृतियों के बहाने समीक्षा, संस्मरण, निबंध, आलेख, टिप्पणियों के अतिरिक्त बीते समय की कुछ महत्वपूर्ण संस्थाओं, पत्रिकाओं और व्यक्तियों की चर्चा के साथ मुम्बई में लिखी जा रही कविता के इतिहास को सहेजने की कोशिश की गई है इसमें।’’
     पुस्तक में कुल 37 लेख हैं-आ से आरम्भ, ललद्यदःगाथा अद्भुत प्रेम की विश्वसनीय कवितायें, अंधेरे में रोशन चिराग, मुस्तहसन अज्.म की ग़ज़लें: एक नई उम्मीद की आहट, डॉ. बंसीधर पंडा - समय, समाज और परिवेश, विजय कुमार की कवितायें: प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य का नियोजन स्वर्ग को जमीन पर उतार लाने की चाहत जीवन और समय को देखने की दृष्टि, ‘‘निर्वासिनी’’: नारी अस्मिता का आख्यान, पत्तों पर लिखी कवितायें: विजुअल पोएट्री का सर्जक, वैचारिक व्यंग्य की खुली किताब, अतीत के कुछ यादगार पन्ने, खामोशी की जुबां, ख्वाब ही बस देखते रह जायें क्या?, अक्षय जैन: सतत सक्रिय साहित्यिक सफर, आदमी को चाहिए एक मुट्ठी आसमान, अंधेरे में उजाले की उम्मीद भरी आश्वस्ति, नवगीत के उन्नायक: वीरेंद्र मिश्र, हृदयेश मयंक की कहानियां: स्मृतियों का आख्यान, गाथा एक निरासक्त कर्मयोगी की, पहाड़ की चिंता - चिंता का पहाड़, अपने समय का लेखा-जोखा, सपने, स्मृतियां, संघर्ष और प्रेम से रची कवितायें, दोहों में सिमटा कालखंड, इंसान और इंसानियत की पैरवी करती ग़ज़लें, डॉ. धर्मवीर भारती के साथ कुछ पल, तबले पर उंगलियों की जादुई थाप, एक यादगार शाम, मेघबिंदु, साहित्य सहकार, तथापि, मुम्बई की पंजाबी साहित्यिक संस्थायें, कविता मुम्बई: एक पुनरावलोकन, दो कदम हम भी चले एवं मुम्बई की लघु साहित्यिक पत्रिकायें।
पुस्तक के सभी लेखों पर यदि बारीकी से दृष्टिपात किया जाए तो उनके विषय की विविधा, जानकारी की सम्पन्नता और समय की लिपिबद्धता को स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है। जैसे पहला ही लेख ‘‘ललद्यद: गाथा अद्भुत प्रेम की’’ कश्मीरी कवयित्री कवयित्री ललद्यद के व्यक्तित्व और कृतित्व से परिचित कराता है। इस लेख में हरजिंदर सिंह सेठी लिखते हैं कि -‘‘कश्मीर में लगभग मिथक बन चुकी, सात सौ वर्ष पूर्व जन्मी, कश्मीरी भाषा की आद्य संत कवयित्री ललद्यद को कुछ लोग कवयित्री कहते हैं, कुछ विदुषी एवं ज्ञानवती, कुछ दैवी शक्ति, कुछ योगिनी, कुछ तपस्विनी, कुछ सूफी फकीर, तो कुछ लोग उसे शिव भक्त मानते हैं। पर यह तो स्वयं सिद्ध है कि उसके द्वारा रचित ‘‘वाख’’ (पद) कश्मीरी भाषा की प्रारंभिक रचनायें हैं, एवं वर्तमान कश्मीरी साहित्य की महत्वपूर्ण धरोहर। आध्यात्मिक स्वर से मुखरित ये गीत जीवन, योग, सहजोपासना, ईश्वर, धर्म, दर्शन एवं आत्मा के संदर्भ में कहे गये हैं। इनमें भक्ति और ज्ञान से अखंड-अव्यक्त स्वरूप का साक्षात्कार किया गया है। लल अद्वैतवादी और पूर्ण रूप से एक ब्रह्म में विश्वास रखने वाली कवयित्री रही है। वर्षों से उनके वाख लोगों की जुबान पर चढ़े हैं, अपितु उनके जीवन में, उनके दिलों में रच-बस गये हैं। आम कश्मीरी नागरिक की मानसिकता पर उनका गहरा प्रभाव है। वस्तुतः यह एक समीक्षा लेख है जिसमें वेदराही के उपन्यास ‘‘ललद्यद’’ की समीक्षा की गई है। लेखक ने उपन्यास के बारे में लिखा है कि ‘‘हिंदी में उनके बारे में कोई विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस कमी को पूरा करता है वेद राही का उपन्यास ‘‘ललद्यद’’ जो उसके जीवन, रहन-सहन, उसके समय, सामाजिक दशा, राजनीतिक परिस्थितियों एवं उसकी कविताओं को आधार बना कर बड़ी शोध, मेहनत, निष्ठा और ईमानदारी से लिखा गया है। अपनी अनूठी लेखन शैली, रवानी एवं पठनीयता के कारण यह उपन्यास बड़ा अद्भुत बन पड़ा है।’’
      एक समीक्षात्मक लेख हृदयेश मयंक की कविताओं पर है। इसमें हजजिंदर सिंह लिखते हैं कि ‘‘लगभग आधी शताब्दी बीत गई, हृदयेश मयंक को कविता के साथ विचरण करते हुए। जनधर्मी प्रतिबद्धता और जन जीवन से गहरा सरोकार रखने वाले कवि मयंक की काव्य यात्रा मैं शहर और सूरज, सायरन से सन्नाटे तक, युद्ध में शामिल नहीं थीं चिड़ियां, ठहराव के विरुद्ध, अभी भी बचा हुआ है बहुत कुछ, हम ये जो मिट्टी के बने हैं, अपने हिस्से की धूप, दिल से निकली दिल की बात, एक महक सोंधी माटी की के पड़ाव पार करती हुई अनवरत जारी है। इधर उनकी ‘‘चयनित कविताओं’’ का संकलन प्रकाशित होकर आया है, जो उनकी पूरी यात्रा के विकास क्रम को दर्शाता है। ’’
कविताओं के साथ ही ग़ज़ल संग्रह पर भी हरजिंदर सिंह सेठी ने अपनी समीक्षात्मक कलम चलाई है। ‘‘मुस्तहसन अज़्म की ग़ज़लेंः एक नई उम्मीद की आहट’’ शीर्षक लेख में मुस्तहसन अज़्म की ग़ज़लों के बारे में वे लिखते हैं कि ‘‘मुस्तहसन अज़्म अपने रचनाकर्म के लिए निजी मुहावरे की तलाश करते हुए ग़ज़ल की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए नजर आते हैं और ‘हमवार नहीं है कुछ भी’ नाम से अपना ग़ज़ल संग्रह लेकर आते हैं। आज के माहौल में यह शीर्षक बड़ा उचित जान पड़ता है। वर्तमान के पूरे परिदृश्य पर दृष्टि डालें, तो देखेंगे कि कुछ भी ठीक ठाक नहीं है।’’ वे आगे लिखते हैं-‘‘ऐसी स्थिति में मुस्तहसन अज़्म अपनी ग़ज़लों के माध्यम से बिगड़े वातावरण को संवारने की ख्वाहिश रखते हैं और सभी समस्याओं से निपटने के लिए जमीनी कार्यवाही की जरूरत पर बल देते हैं। शायर का हौसला इतना कि वह अकेला ही इस स्थिति से टकराने की जुर्रत करता है -
कदम जो बढ़ गये आगे तो रुक नहीं सकते 
सफर में साथ मेरे काफिला रहे न रहे।

     एक अन्य लेख में हरजिंदर सिंह सेठी ‘‘जीवन और समय को देखने की दृष्टि: डॉ. दलजीत सिंह की कवितायें’’ शीर्षक से उस कवि की कविताओं को प्रकाश में लाते हैं जो ‘‘डॉ. दलजीत सिंह नेत्र रोग विशेषज्ञ के रूप में संसार भर में विख्यात रहे हैं। सफेद मोतियाबिंद के आपरेशन के पश्चात आंखों में इंट्राओकुलर लेंस का प्रत्यारोपण करने वाले पहले भारतीय थे। उन्होंने मोतिया बिंद के एक लाख से अधिक आपरेशन कर और उनमें लेंस बिठा कर विश्व रिकार्ड बनाया। वे भारत के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के मानद सर्जन रहे।’’ ऐसे चिकित्सक के मन में सामाजिक विषमताओं, अभाव और अन्याय को लेकर कवि के भीतर एक गहरा असंतोष रहा है। -
बहुत जी करता है, 
सभी सोयों को जगा जाऊं, 
मकड़ी के जो जाले, पूरे देश को लगे हैं, 
एक तेज आंधी के साथ, 
जड़ों से उखाड़ ले जाऊं।

एक लेख संगीत मनीषी पर भी है। ‘‘तबले पर उंगलियों की जादुई थाप’’ में वे लिखते हैं कि सन् 1989 में अन्नु कपूर के ‘‘अंत्याक्षरी’’ कार्यक्रम के साथ टीवी पर शुरुवात करने के पश्चात उन्होंने ‘‘मेरी आवाज सुनो’’ में तबला वादन किया, पर उन्हें पहचान मिली शेखर सुमन के शो ‘शेकर एंड मूवर्स’ से। उसके बाद तो वे ग्रेट इंडियन लाफ्टर चौलेंज, नानसेंस अनलिमिटेड, कामेडी सर्कस, कपिल शर्मा शो आदि दर्जनों सीरियल्स में अपनी कला का जौहर दखाते हुए लगभग पैंतीस वर्षों से तबले की थाप के साथ लोगों के दिलों पर अपनी छाप छोड़ रहे हैं।’’

‘‘कविता मुम्बई: एक पुनरावलोकन’’ और ‘‘मुंबई की लघु साहित्यिक पत्रिकाएं’’ मुंबई के साहित्यिक इतिहास को सहेजते लेख हैं। दरअसल हरजिंदर सिंह सेठी की यह पुस्तक इस तथ्य को गाढ़ी स्याही से रेखांकित करती है कि साहित्य की इबारतें भी इतिहास रचती हैं। इसलिए इस पुस्तक की उपादेयता निर्विवाद है। यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि मुंबई की साहित्यिक धारा को जानना और समझना है तो यह पुस्तक अपनी पूरी रोचकता के साथ नितांत उपयोगी ठहरती है।
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आचरण,  21.07.2026
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Saturday, July 18, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | अबे लौं में हमने जोई पाओ के सागर से नोंनो कोनऊं सहर नोंई | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
अबे लौं में हमने जोई पाओ के सागर से नोंनो कोनऊं सहर नोंई
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
हमाई जे बात पढ़ के, के सागर से नोंनो  कोनऊं सहर नोंई, बायरे वारे सोचहें के ईमें का खास? अपनों सहर सो सबई खों नोंनो लगत आए। औ भीतरे वारे सोचहें के आज जे बर्यान लगीं, ने तो सबसे नोंनो होबे की ऐसी का आए इते? सो, आप सब ओरें तनक सहूरी धरो औ हमाई जे एक्पर्ट राय ध्यान से पढ़त जाओ!
       का आए के अपनों जो सागर सई मायने को सागर आए। ईको लंबो-चौंड़ो इतिहास आए। जबे अपन मानुस हरें मों बोलत ने जानत्ते ऊ टेम पे बी अपने पुरखा इते रैत्ते। ऊ टेम पे इते रैबे वारे अपने पुरखन ने इतई आगी जलाबी सीखी औ इतई फथरा के औजार बनाने सीखे। जबके ऊ टेम पे इते कोनऊं अनवरसिटी ने हती। अब जे ने पूछन लगियो के अनवरसिटी बने के बाद इते का-का आबिष्कार भए। काए से के इते के आबिस्कारन को अनवरसिटी से कोऊ लेबो-देबो कभऊं रहओ नईं। अब का तेल भरे की कुप्पी घांईं कारीडोर की डिजाइन अनवरसिटी वारन ने बनाईं? कभऊं नईं! बाकी जा सब छोड़ो, अपने सागर को करेजा भौत बड़ो आए। इते जोन एक बेर आत आए बा इतई को हो जात आए। इते के लोग सबखों गले लगात आएं। जेई से मुतके अधिकारी रिटायर होबे के टेम पे इतई को ट्रांसफर ले लेत आएं। उने पतो आए के बे जात-जात इते कित्तोई खात-खवाई कर लें, इते कोऊ ने बोलहे। भौतई दयालु औ सहनसील आएं इते के लोग। खैर, कछू नईं, जेई तो खूबी आए इते की। बाकी जे सोई आए के अपने सागर में हिंदू, मुसलमान, जैन, सिख, ईसाई, बौद्ध - मने सबई हिलमिल के रैत आएं। सबरे एक-दूसरे के त्योहार पे खुसियां मनात आएं। इते बृंदाबन बाग आए तो जामा मस्जिद भी आए। इते गौराबाई को जैन मंदिर आए तो सेंट पीटर्स चर्च औ गुरुद्वारा साहिब भी आए। इते करोड़ों की लगत्त से संत रविदास जू को मंदर बी बन रओ। मनें सागर में इत्ती खूबी आएं के बा सबरी आजई नईं गिनाईं जा सकत। सो, जा कॉलम पढ़त रहियो औ खूबी जानत रहियो! राम-राम!
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Friday, July 17, 2026

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात

बतकाव बिन्ना की  
मताई के नांव को एक पेड़ लगाओ के नईं
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
    कल हम तिगड्डा लौं गए के उते एक पैचान वारे मिल गए। उन्ने हमसे ने हमाओ हाल पूछो औ ने चाल पूछो, बस, छूटतई जेई पूछो के ‘‘आपने मताई के नांव को पेड़ लगाओ के नईं?’’
‘‘कोन की मताई के नांव को? हमने पूछी।
‘‘अरे अपनी मताई के नांव को।’’ उन्ने कई।
‘‘हमने तो पर की साल लगाओ रओ, आपने लगाओ के नईं?’’ हमने उनसे पूछी।
‘‘हमने पर की साल बी लगाओ रओ औ ई साल बी लगा आए। परों तो लगाओ आए।’’ बे उचकत भए बोले। संगे उन्ने हमसे जे सोई पूछ लई, ‘‘काए आपने हमाओ फेसबुक नईं देखो का? हमने पेड़ लगात की फोटुएं ऊमें डारी रईं। औ स्टेटस में सोई डारी रईं।’’
‘‘बा तो हम नें देख पाए, बाकी आप कै रए तो आपने पेड़ जरूर लगाओ हुइए।’’ हमने कई।
‘‘आपको सोई लगाओ चाइए। ईसे मताई की याद बनी रैहे।’’ बे आगे बोले।
‘‘हऔ, आप सई कै रए। बाकी अपने बाप-मताई, दादा-दादी, नाना-नानी औ उनके बी बाप-मताई, दादा-दादी, नाना-नानी ने पेड़ लगाओ रओ। मने हमाए पुरखा ने बी पेड़ लगाओ रओ जिनें अपन ओंरन ने काट डारो। अब जो जंगल कम पड़न लगे सो एक पेड़ मताई के नांव को लगाबे को डिरामा कर रए।’’ मोसे कै आई।
‘‘हाय रे, आप जो का कै रईं? हमने सो आज लौं एक डगरिया ने कटवाई, औ आप पेड़ कटवाबे को दोस हमपे मढ़ रईं। जे तो गल्त बात आए।’’ बे भिनकत भए बोले।
‘‘हमने अकेली आप की नईं कई। हमने तो सबकी कई जीमें कछू ने कछू जिम्मेवारी हमाई सोई आए।’’ हमने कई।
‘‘का मतलब?’’ उन्ने पूछी।
‘‘मतलब जे के आप ने बा कहनात सुनी हुईए के जो आप कतल करबे वारे खों कतल करते देख के बी हल्ला नईं मचा रए तो मनो आप सोई कतल में सामिल कहाए। सो अपन ओरन ने जगंल कटबे की खूब खबरें पढ़ीं। मनों मों से बोल ने फूटें। कभऊं खुल के बिरोध ने करी।’’ हमने कई।
‘‘सो अपन ओरें का कर सकत आएं? अपन ने तो खबई पढ़ी, अपनी आंखन से तो नईं देखो।’’ बे ढिठाई दिखात भए बोले।
‘‘सई कई के अपन ने अपनी सगी आंखन से तो नईं देखो। मनो अपन गांव, बस्ती, सहर खों तो बढ़त देख रए। जे जंगल की जमीन पे नईं फैल रए तो का चांद पे फैल रए?’’ हमने सोई कई।
‘‘अब जनसंख्या बढ़हे तो मकान तो लगहेंईं।’’ उन्ने कई।
‘‘जनसंख्या उत्ती नईं बढ़ी जित्ते की मकान बढ़ गए। काए से अब कोऊ बाप-मताई के संगे नईं रैत। सबखों अपने लगाने अलग मकान चाऊने। पैले का होत्तो के सबरे संगे रैत्ते। सो उतई पुस्तैनी मकान में चार तल्ला भले बना लए जात्ते मनों अलग रैबे की कोऊ ने सोचत्तो। अब तो सबखों अलग-अलग रैने औ सबखों अपनो अलग मकान चाऊने। काए सई कई के नईं।’’ हमने उनसे पूछी।
‘‘कै तो आप सई रई, पर जे सब तो चलन की बात आए। आजकाल जेई चलन चल रओ। का करो जा सकत आए?’’ बे मासूम बनत भए बोले।
‘‘ध्यान से सुनियो आप औ बुरऔ ने मानियो! का आए के बच्चा ऊंसईं बनत आएं जैसे मताई-बाप होत आएं। आप खों लेओ, आप उते बरिया चौक को अपनो पुरानो मकान छोर के नई बस्ती में रैबे खों चले आए। मताई-बाप खों उतई छोर आए। मने बा मकान बी आपको औ जे नओ मकान बी आपको। अब आप के लरका-बच्चा सोई जेई कर रए कोऊ नोएडा में घरे खरीद रओ तो कोऊ गुरुग्राम में तो कोऊ बैगलुरु में। मनों इते को मकान बी उने नई छोड़ने। उल्टे आजकाल सो जे चलन हो रओ के बे ओरें उते पइसा कमा के इते गांव-जंगल में अपनो फारम हाऊस खरीद के डार रए। जीमें उनको साल-दो साल में कभऊं-कभार आने। मनों एसेट्स के नांव पे जंगलई तो कटवाने उनें।’’ हमने कै डारी।
‘‘आप से तो कछू कैबो फजूल आए। आप से कओ आम, सो आप नींम की सुनान लगत आओ। हम जा रए।’’ बे बमकत भए बोले। काए से के हमें पता हती के उनके लरका औ बिटिया ने इते अपनों-अपनों फारम हाऊस खरीदो आए। अब आपई सोचो के जिनकी जिनगी नोएडा औ बैंगलुरु में कटनी होए, उनें इते जमीन दबा के बैठबे की का जरूरत? मनों नईं बा उनके लाने धरती मां को टुकड़ा नोईं, बा तो एसेट्स आए। भले ईके बदले कई एकड़ को जंगल कट गओ होए चाए खेती मिट गई होए।
‘‘अरे, आप बुरौ काए मान रए? हम तो जग की कै रए। आप हमाए कहे को पर्सनल ने लेओ। आप तो जे बताओ के पर की साल को आपको लगाओ गओ पेड़ कैसो आए?’’ हमने उनसे पूछी।
‘‘अच्छो हुइए।’’ बे बोले।
‘‘का मतलब के अच्छो हुइए? आप ऊको जा के देखत नइयां का?’’ महने पूछी।
‘‘अब लगा दओ रओ पेड़। सो अब बेर-बेर उते जा के को आ देख रओ? का जे नेता हरें अपनों लगाओ पेड़ देखबे खों जात आएं?’’ उन्ने उल्टे हमई से पूछ लई।
‘‘बे काए खों जैहें? का उने औ कोनऊं काम नइयां? औ फेर उनखों मताई के नांव को हर गांव-सहर में एक पेड़ लगाने होत आए, बे कां-कां जा के देखहें? मनों आप तो जा सकत हो।’’ हमने कई।
‘‘जेई तो बात आए के पेड़ लगा दओ। अब ऊको रोजीना को देख रओ।’’ बे बोले।
‘‘सई कई आपने। एक दिनां अपनी मताई खों याद कर लओ, ऊके नांव पे एक पेड़ लगा दओ, जीके लाने उते गड्डा पैले से खुदे मिलत आएं। ऊमें पेड़ लगाओ औ फोटू खेंचाई, फेर पानी डारो औ फोटू खेंचाई। फेर ऊ सबरी फोटुअन खों सोसल मीडिया पे डार दओ। कऊं पौंच लग गई तो अखबार में फोटू छपवा लई। हो गओ एक पेड़ मताई के नांव को। जै राम जी की।’’ हमने कई।
‘‘तो का? जेई से सब कर रए।’’ बे अपनो पल्ला झारत भए बोले।
‘‘फेर तो जे सई रैहे के ई दफा हमने पेड़ नईं लगाओ आए, सो कोऊ दिनां आप संगे चलियो औ पेड़ लगात भए हमाई फोटू खेंच दइयो। हम सोई उन फोटुअन खों सोसल मीडिया पे डार के पेड़न खों श्रद्धांजलि दे लेबी।’’ हमने उनसे कई।
‘‘हऔ जरूर! जब चलने हो हमें फोन कर लइयो। हम संगे चले चलबी। हम सोई एकाध पेड़ औ लगा देबी।’’ बे हुलसत भए बोले। उन्ने हमाई कई ‘श्रद्धांजलि’ पे कान ई ने दओ। बे हमाओ ब्यंग ने समझे।
बे तो ‘राम-राम’ कर के चले गए, मनों हम जेई सोचत रए के अपन ओरें इंसान हो के हाथी घांईं बनत जा रए जीके खाबे के दांत औ, दिखाबे के औ। हम तो बे गइया-बकरी से गए गुजरे होत जा रए जोन घास खों ऊपरे-ऊपरे से खाउत आएं, जड़ें छोरत जात आएं, ताके दूसरे दिनां फेर के उनको घास मिल सके। हम तो सब कछू जड़ई से खा जात आएं। कल के लाने बचाबे की कोन खों परी?
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के आप ओरन में से जोन-जोन ने मताई के नांव को पेड़ लगाओ, बे पलट के अपनों लगाओ पेड़ देखबे गए के नईं? औ गए तो कित्ती बेर?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, July 15, 2026

चर्चा प्लस | महात्मा गांधी की दृष्टि में कला और सौंदर्य की लोक-महत्ता | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस  
महात्मा गांधी की दृष्टि में कला और सौंदर्य की लोक-महत्ता      
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह                                                          
        महात्मा गांधी मानते थे कि कला को जनोपयोगी होना चाहिए। उनके अनुसार कला सिर्फ कला के लिए नहीं वरन आमजन के लिए होनी चाहिए। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा है कि ‘‘मैं उस कला और साहित्य का पक्षधर हूं जो जनता से जुड़ा हो। वही कला कला है जो सुखकर हो। सच्ची कला केवल आकार पर नहीं बल्कि उसकी पृष्ठभूमि में जो है, उस पर भी ध्यान केन्द्रित करती है। एक कला वह है जो मारती है और एक कला वह है जो जीवन देती है। इसीलिए माना जाता है कि यदि महात्मा गांधी के विचारों को समझना है तो उनके समग्र विचारों को जानना जरूरी है जैसे कला और सौंदर्य के संबंध में उनके विचार।


अधिकांश लोग महात्मा गांधी को एक राजनीतिक व्यक्ति के रूप में ही देखते और समझते हैं। उनकी दृष्टि में माहत्मा गांधी वे व्यक्ति थे जिन्होंने बड़े-बड़े अहिंसक आंदोलन किए और देश को स्वतंत्रता दिलाई। इसमें कोई संदेह नहीं है कि महात्मा गांधी में विशेष राजनीतिक सूझ-बूझ थी लेकिन इसके साथ ही जीवन के विविध पक्षों को ले कर उनमें अगाध जिज्ञासा थी तथा उनका अपना मौलिक दृष्टिकोण था। सादा जीवन जीने वाले महात्मा गांधी को कला और सौंदर्य की अद्भुत समझ थी। महात्मा गांधी ने अपनी पुस्तक ‘एक्सपेरिमेंट्उ विथ ट्रू’ में कला के बारे में लिखा है- ‘‘मैं जानता हूं कि बहुत-से व्यक्ति अपने को कलाकार कहते हैं और उन्हें इस रूप में मान्यता भी प्राप्त है लेकिन उनकी कृतियों में आत्मा के उदग्र आवेग और आकुलता का लेश भी नहीं होता जबकि प्रत्येक सच्ची कला आत्मा के आंतरिक स्वरूप की सिद्धि में सहायक होनी चाहिए। जहां तक मेरा ताल्लुक है, मुझे अपनी आत्मसिद्धि में बाह्य रूपों की सहायता की कतई जरूरत नहीं है। इसलिए मैं कोई कलाकृतियां प्रस्तुत नहीं कर सकता।’’
दरअसल किसी भी कला के तीन आधार तत्व होते हैं- 1. जातीय तत्ववाद  2. कल्पनात्मक विस्तार 3. ऐतिहासिक परम्परा। जातीय तत्ववाद में मानव जाति समूह का अथवा जातीय दर्शन एवं चिन्तन होता है। कभी-कभी यह तत्व अवचेतन में रहकर कला पर अपना प्रभाव डालता है तो कभी अपने जातीय तत्वों को जानबूझ कर कला में पिरोया जाता है। यह तत्व सामाजिक रुढ़ियों और जातिगत ऐतिहासिक परम्परा के रूप में भी गतिमान रहता है। कल्पनात्मक विस्तार वैचारिक परिपक्वता को दर्शाता है। कला के संदर्भ में कल्पना मूर्त और अमूर्त के मध्य संबंध स्थापन का कार्य करती है। कल्पना का हृदय से सीधा संबंध होता है इसलिए यह कला के रूप में प्रकट होने के बाद प्रायः चकित कर देती है। ऐतिहासिक परम्परा कला के विकास को वातावरण प्रदान करती है, उसे दिशा देती है। भारतीय कलाओं के आधार में मनुष्य और सृष्टि का अटूट संबंध है पाया जाता है यह संबंध सार्वभौमिक सम्पूर्णता के आदर्श पर आधारित रहा है।
महात्मा गांधी कला में प्राकृतिक तत्वों को असीमित मानते थे। उनके अनुसार मानवीय कला प्राकृतिक कला के सामने कुछ भी नहीं है। वे कला की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि -‘‘‘हो सकता है कि मेरे कमरे की दीवारें नंगी हों, मुझे तो शायद सिर पर छत की भी जरूरत नहीं है क्योंकि तब मैं असीम विस्तार वाले तारों भरे आकाश को निहार सकता हूं। जब मैं चमकते तारों से भरे आकाश को निहारता हूं तो मेरे सामने ऐसा अद्भुत परिदृश्य होता है जिसकी बराबरी मनुष्य की कला कभी नहीं कर सकती।’’

कला के महत्व के साथ ही महात्मा गांधी  ने कला के उद्देश्य को भी स्पष्ट किया। वे मानते थे कि कला का कोई न कोई उद्देश्य होता है और यह उद्देश्य ही कला की गुणवत्ता को सिद्ध करता है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मैं सामान्यतः मानी गई कला-वस्तुओं के मूल्य को स्वीकार करने से इन्कार करता हूं बल्कि सिर्फ यह है कि मैं व्यक्तिगत रूप से यह अनुभव करता हूं कि यह प्राकृतिक सौन्दर्य के शाश्वत प्रतीकों की तुलना में कितनी अपूर्ण है। इन कला-वस्तुओं का मूल्य वहीं तक है जहां तक कि वे आत्मा को सिद्धि की दिशा में अग्रसर होने में सहायक होती हैं। ’’

भारतीय दृष्टिकोण से कला की यही परिभाषा हो सकती है। हम केवल उसके लक्ष्य से ही यह लक्षण नहीं बना रहे हैं। काव्य की जो परिभाषा अपने यहाँ है, उसे यदि व्यापक रूप से लगाइए तो वह काव्य की ही परिभाषा नहीं रह जाती; चित्र, मूर्ति, कविता, संगीत आदि कलामात्र की परिभाषा हो जाती है। वस्तुतः कलामात्र की परिभाषा को ही काव्य की परिभाषा बनाने के लिए, एक देशीय रूप देकर काव्य की परिभाषा प्रस्तुत की गई है। अर्थात्, काव्य की परिभाषा पूर्ण व्याप्ति तभी होती है जब हम वाक्यं रसात्मकं काव्यम्” के स्थान परकृ“कृतिरसात्मिका कला कहें वा रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम्” के बदले रमणीयार्थप्रतिपादिका कृतिः कला”
महात्मा गांधी कला में सत्य को ढूंढते थे। यदि कला में सत्यता है तो वह सभी के लिए उपयोगी हो सकती है। उनके अनुसार ‘‘सत्य का शोध पहली चीज है, सौन्दर्य और शुभत्व उसमें अपने आप जुड़ जाएंगे। मैं समझता हूं कि ईसा मसीह सर्वोत्कृष्ट कलाकार थे, चूंकि  उन्होंने सत्य के दर्शन किए थे और उसे अभिव्यक्त किया था। ऐसे ही मोहम्मद साहब भी थे जिनकी ‘कुरान’ सम्पूर्ण अरबी साहित्य की सबसे श्रेष्ठ कृति है, कम-से-कम विद्वानों का मत यही है। कारण यह है कि दोनों ने पहले सत्य को पाने का प्रयास किया था, इसलिए उनकी वाणी में अभिव्यक्ति का सौन्दर्य सहज ही आ गया, हालांकि उन्होंने कोई कला-रचना नहीं की थी। मुझे इसी सत्य और सौन्दर्य की चाह है, मैं इसी के लिए जीऊंगा और इसी के लिए मरूंगा।’’

महात्मा गांधी मानते थे कि कला को जनोपयोगी होना चाहिए। उनके अनुसार कला सिर्फ कला के लिए नहीं वरन आमजन के लिए होनी चाहिए। उन्होंने साफ शब्दों में लिखा है कि ‘‘मैं उस कला और साहित्य का पक्षधर हूं जो जनता से जुड़ा हो। वही कला कला है जो सुखकर हो। सच्ची कला केवल आकार पर नहीं बल्कि उसकी पृष्ठभूमि में जो है, उस पर भी ध्यान केन्द्रित करती है। एक कला वह है जो मारती है और एक कला वह है जो जीवन देती है। सच्ची कला अपने रचनाकार की सुख-शांति, संतोष और शुचिता का प्रमाण होनी चाहिए। मैं संगीत और अन्य सभी कलाओं का प्रेमी हूं लेकिन मैं उनको उतना महत्त्व नहीं देता जितना कि आम तौर पर दिया जाता है। मिसाल के तौर पर मैं उन कार्यकलापों के महत्त्व को स्वीकार नहीं कर सकता जिन्हें समझने के लिए तकनीकी ज्ञान की जरूरत होती है। जीवन सब कलाओं से बढ़कर है। मैं तो यहां तक कहूंगा कि जिसने जीवन में प्रायः पूर्णता को प्राप्त कर लिया है, वह सबसे बड़ा कलाकार है, कारण कि उदात्त जीवन के निश्चित आधार और संरचना के बिना कला है भी क्या?’’
सत्य महात्मा गांधी का प्रिय विषय था। वे निरंतर सत्य की खोज में लगे रहते थे। वे कहते थे कि -‘‘मैं सत्य में अथवा सत्य के द्वारा सौन्दर्य को खोजता और पाता हूं। सत्य के सभी रूप-केवल सच्चे विचार ही नहीं बल्कि सच्ची तस्वीरें या गीत भी अत्यंत सुंदर होते हैं। लोग प्रायः सत्य में सौन्दर्य के दर्शन नहीं कर पाते, आम आदमी उससे दूर भागता है और उसमें सौन्दर्य के दर्शन की क्षमता ही खो बैठता है। जब लोग सत्य में सौन्दर्य के दर्शन करने लगेंगे, तब सच्ची कला का उदय होगा।’’

जर्मन दार्शनिक हेगेल का मानना थ कि ‘‘सौंदर्य संवोदी रूप में सत्य या विचार की अभिव्यक्ति है।’’ वे यह भी मानते थे कि सौंदर्य केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह मानवीय चेतना और परम सत्य की कलात्मक अभिव्यक्ति है। हेगेल के दर्शन में सौंदर्य मात्र बाहरी दिखावट अथवा इंद्रियों को प्रसन्न करने वाली चीज नहीं है, बल्कि यह मानवीय चेतना या आत्मा की बाहरी दुनिया में अभिव्यक्ति है। उनके अनुसार शुद्ध विचार या सत्य जब किसी कला माध्यम के द्वारा साकार होता है तो वही सौंदर्य है। कला में सौंदर्य प्रकृति की नकल करने से नहीं अपितु उसमें अपनी दृष्टि को शामिल करना भी है। ठीक इसी प्रकार महात्मा गांधी ने कला के साथ सौंदर्य के महत्व एवं विशेषताओं को देखा और परखा। वे कला, सौंदर्य और सत्य को परस्पर पूरक मानते थे। महात्मा गांधी के अनुसार -‘‘‘सच्चे कलाकार की दृष्टि में वही मुख सुंदर है जो अपने बाह्य रूप से भिन्न, आत्मा के भीतर प्रतिष्ठित सत्य से आलोकित है। सत्य से भिन्न कोई सौन्दर्य नहीं है। इसके विपरीत, सत्य अपने आपको ऐसे रूपों में प्रकट कर सकता है जो बाहर से तनिक भी सुंदर न हों। कहा जाता है कि सुकरात अपने जमाने का सबसे सत्यनिष्ठ व्यक्ति था लेकिन कहते हैं कि उसकी मुखाकृति ग्रीस में सबसे कुरूप थी। मेरी दृष्टि में सुकरात सुंदर था क्योंकि उसने आजीवन सत्य के लिए संघर्ष किया और आपको याद होगा कि सुकरात की बाह्याकृति के कारण फिडिएस को उसके अन्दर के सत्य की सुंदरता को सराहने में कोई बाधा नहीं आई, हालांकि कलाकार के नाते वह बाह्याकृतियों में भी सौन्दर्य के दर्शन का अभ्यस्त था।’’

महात्मा गांधी ने वास्तविक सुंदर कृति की बड़े सरल शब्दों में व्याख्या की है। वे इस बारे में भी प्रकाश डालते हैं कि सुंदर कृति कब जन्म लेती है-‘‘सत्य और असत्य प्रायः साथ-साथ मौजूद रहते हैं, उसी तरह अच्छाई और बुराई का भी साथ है। कलाकार में भी अनेक बार वस्तुओं की सच्ची और झूठी धारणाओं का सह-अस्तित्व रहता है। सच्ची सुंदर कृति तब जन्म लेती है जब कलाकार सच्ची धारणा से प्रेरित होता है। यदि इसके उदाहरण जीवन में विरल हैं तो कला के क्षेत्र में भी विरल ही हैं।’’ वे आगे कहते हैं कि ‘तुम सब्जियों के रंग में सुंदरता क्यों नहीं देख पाते? और निरभ्र आकाश भी तो सुंदर है, लेकिन नहीं, तुम तो इंद्रधनुष के रंगों से आकर्षित होते हो, जो केवल एक दृष्टिभ्रम है। हमें यह मानने की शिक्षा दी गई है कि जो सुंदर है, उसका उपयोगी होना आवश्यक नहीं है और जो उपयोगी है, वह सुंदर नहीं हो सकता। मैं यह दिखाना चाहता हूं कि जो उपयोगी है, वह सुंदर भी हो सकता है।’’
इसमें कोई संदेह नहीं है कि महात्मा गांधी ने न केवल राजनीतिक मसलों का हल निकाला बल्कि कला और सौंदर्य का भी गहराई आकलन किया और इन दोनों तत्वों को जनोपयोगी तथा मानसिक विकास के लिए आवश्यक माना। इसीलिए वे मानते थे कि जो कला और सौंदर्य आमजन के मन में शांति, सुंदरता और जीवंतता का बोध कराए वही सच्ची कला और सौंदर्य है। महात्मा गांधी ने जितने सुंदर ढंग से कला और सौंदर्य की व्याख्या की है, उसे पढ़ कर ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई दार्शनिक विषय के मर्म को आत्मसात कर के अपने विचार व्यक्त कर रहा हो। महात्मा गांधी के इन विचारों को जाने बिना उनके वैचारिक व्यक्तित्व को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता है।                                    ---------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 15.07.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, July 14, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | जो रोडें बरसात के पैले ठीक कर दईं जाएं तो रिपटबे को मजा कैसे मिलहे | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
जो रोडें बरसात के पैले ठीक कर दईं जाएं तो रिपटबे को मजा कैसे मिलहे
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
      भौत पैले एक फिल्मी गाना बजत्तो के “हम जो रिपट जाएं तो हमें ना उठियो”। भौत दिनां बाद अभईं रेडुवा पे ऊ गाना फेर के सुनाई परो। बा गाना सुनाबे वारे ने बताओ के जो गाना “नमक हलाल” फिलम को रओ। बा अमिताभ बच्चन औ स्मिता पाटिल की फिलम रई। बाकी गाना लिखो रओ अनजान साब ने। ई मोसम में जो गाना सुन के हमाए दिमाग की बत्ती जल गई। हमें लगो के गाना लिखबे वारे को नांव भलेई “अनजान” रओ मनों बे कभऊं ने कभऊं अपने सागर जरूर आए हुइएं औ उने इते की जानकारी हती। ऊंसई बिट्ठल भाई पटेल जू के संगे बालीबुड के लोग सागर आत-जात रैत्ते। एकाध दफा अनजान साब सोई आ गए हुइएं। हो सकत के कछू लोगन को ई बारे में पतो होए, मनों हमें तो जो गाना सुन के लगो के आए हुइएं। काए से के रिपटबे वारी रोडें तो इतई सागर में गारंटी से पाई जात आएं। जो सागर सिटी स्मार्ट सिटी बन गई सो ऊसे का? कोऊ अपनी परंपरा औ संस्कार थोड़ेई भुला सकत आए? अब ब्याओ मेंई देख लेओ के प्री-वेडिंग शूट से ले के स्टेज पे दूला-दुलैया को नचबो लौं हो जात आए, मनों ऊ के बाद बी दुलैया की ‘मों दिखाई’ की रसम तो होतई आए। आप सोच रए हुइयो के हम कां से कां पौंच गए, सो बात जे आए के हम जे बताबे की कोसिस कर रए के रिपटा वारी रोडें रखा के प्रसासन परंपरा खों निभा रओ। सो रिपटबे पे बुरौ ने मानियो। तनक सोचो के  जो सहर की सबरी रोडें बरसात के पैले ठीक कर दईं जाएं तो रिपटबे को मजा कैसे मिलहे? सो, अब जोन दिनां आप रिपटो सो प्रसासन खों ने गरियाइयो, बल्कि खुद खों अमिताभ बच्चन औ स्मिता पाटिल समझियो। संगे हड्डी वारे डाक्टरन खों बी याद कर लइयो, काए से के रिपटबे के बाद बेई भली करहें।
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏

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महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराधों के प्रति संवेदनशील होने की आवश्यकता है - डॉ शरद सिंह | प्रलेस सागर की गोष्ठी में

"महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध के प्रति संवेदनशील होने की आवश्यकता है तथा जागरूक होकर ऐसे माहौल बनाने की जरूरत है जिसमें महिलाएं घर से बाहर निकलने पर भी सुरक्षित महसूस करें।" कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए मैंने ( Sharad Singh ) अपना यह विचार रखा। अवसर था  प्रगतिशील लेखक संघ सागर की मकरोनिया इकाई की बैठक का।
    कल संपन्न हुई इस बैठक में महिला सुरक्षा को लेकर विचार विमर्श के साथ वर्तमान ज्वलंत विषयों पर कविताएं पढ़ी गईं। 
    गोष्ठी में प्रदेश के सागर इकाई के अध्यक्ष टीकाराम त्रिपाठी जी, प्रदेश महासचिव एडवोकेट पेट्रिस फुसकेले, गज़लकार डॉ गजाधर सागर, आशुकवि नलिन निर्मल, कवि वीरेंद्र  प्रधान, सजलकार ज.ल. राठौर, विद्यार्थी जी, मुकेश तिवारी, नमृता फुसकेले, सुमन झुडेले, हर्षिता ठाकुर आदि बड़ी संख्या में साहित्यकार उपस्थित थे। 
   श्री संजय श्रीवास्तव एवं श्री अजय श्रीवास्तव जी के सौजन्य से सुंदरलाल श्रीवास्तव हायर सेकेंडरी स्कूल के सभागार में आओ इस गोष्ठी का संचालन किया कवि एवं साहित्यकार सतीश पांडे जी ने।
समाचारपत्रों में -
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पुस्तक समीक्षा | बुंदेली को समृद्ध करने वाली अनुपम कृति- "श्रीमद्भगवद्गीता : बुन्देली भावार्थ" | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा     
बुंदेली को समृद्ध करने वाली अनुपम कृति- "श्रीमद्भगवद्गीता : बुन्देली भावार्थ"
- समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक      - श्रीमद्भगवद्गीता: बुन्देली भावार्थ
लेखिका     - डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव
प्रकाशक     - राधा पब्लिकेशन्स, 4231/1, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002
मूल्य        - 350/-
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श्रीमद्भगवद्गीता का विश्व की 578 से अधिक भाषाओं और बोलियों में गीता का अनुवाद हो चुका है। श्रीमद्भगवद्गीता एक ऐसा ग्रंथ है जो जीवन की नश्वरता एवं मृत्यु के यथार्थ का बोध कराता है लेकिन इसके साथ ही जीवन जीने की कला भी सीखता है। इसमें कुरुक्षेत्र के युद्ध भूमि में श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश तथा अर्जुन की शंकाओं का समाधान है। इसे अपनी दिव्य दृष्टि से संजय ने धृतराष्ट्र को सुनाया था। यह महाभारत महाकाव्य का एक अंश है किंतु सबसे लोकप्रिय अंश। सनातन धर्म का पालन करने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जिसने श्रीमद्भगवद्गीता को पढ़ा या सुन ना हो। किंतु कई बार भाषाई समस्या को लेकर श्रीमद्भगवद्गीता के अर्थ को समझने में परेशानी होती है। विशेष रूप से उन व्यक्तियों को जिनका भाषा ही ज्ञान सीमित है जो बोलियों के अधिक निकट हैं उन्हें संस्कृत या संस्कृतनिष्ठ श्रीमद्भगवद्गीता को समझने में परेशानी होती है। गीता प्रेस गोरखपुर के द्वारा टीका सहित श्रीमद्भगवद्गीता का प्रकाशन किया जा चुका है तथा कुछ अन्य प्रकाशक भी इसे टीका सहित प्रकाशित करते हैं। फिर भी यदि अपनी बोली में व्यक्ति को ऐसा ग्रंथ उपलब्ध हो तो यह उसके लिए तथा उन प्रवचन कर्ताओं के लिए जो उस बोली विशेष में प्रवचन करते हैं, एक अच्छी और उपयोगी उपलब्धता होगी। इसी बात को ध्यान में रखते हुए डॉक्टर सुमनलता श्रीवास्तव ने श्रीमद्भगवद्गीता का बुंदेली भावार्थ  पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराया है। इस भावार्थ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक श्लोक को बड़े सरल बुंदेली में भावांतरित किया गया है। पूरी पुस्तक में श्रीमद्भगवद्गीता का मूल भाव कहीं भी आहत नहीं हुआ है। इस भावार्थ में डॉ सुमनलता श्रीवास्तव का श्रम स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है। यह महत्वपूर्ण कार्य करके डॉ सुमनलता जी ने श्रीमद्भगवद्गीता को बुंदेली में उपलब्ध कराते हुए बुंदेली को समृद्ध किया है।

डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव ने 1967 में सागर विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. किया। 20 दिसम्बर 1946 को जन्मी डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव ने एक गृहिणी के रूप में अपने पारिवारिक दायित्वों को निभाते हुए इ.क.सं. विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से 2004 में संगीत में एम. ए., 2007 में संगीतशास्त्र, संस्कृत में पी.एच.डी.,तथा रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर से 2019 में सामुद्रिकशास्त्र में संस्कृत में डी.लिट्. की उपाधि प्राप्त की। उन्हें गुंजन कलासदन, जबलपुर द्वारा 2011 में सरस्वती अलंकरण, कादम्बरी, जबलपुर द्वारा 2012 में संगीतशास्त्र तथा 2016 में बहुआयामी हिन्दी सेवाओं के लिये पुरस्कृत किया गया। कहानी संग्रह ‘‘जिजीविषा’’ पर 2014 में म.प्र. लेखिका संघ, भोपाल द्वारा पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें साहित्य में रुचि के साथ ही रवीन्द्रसंगीत, नृत्य, नाटक, हस्तकला, गृहोद्यान एवं समाजसेवा में भी अभिरुचि है। उनके प्रकाशित ग्रंथ हैं- संगीताधिराज हृदयनारायण देव हृदयकौतुकम्- हृदयप्रकाशः, 2008, कालिदास-साहित्य एवं कामकला नायकनायिकानखशिखनिरूपण, 2014, कहानी संग्रह - जिजीविषा 2014,  कहानी संग्रह सरेराह- 2015 तथा सामुकद्रिशास्त्र के आलोक में कालिदास, 2021।

पुस्तक के आरंभ में अमरेंद्र नारायण, पूर्व महासचिव, एशिया पैसिफिक टेली कम्युनिटी, बैंकॉक ने ‘‘अनुशंसन’’ में उल्लेख किया है कि- ‘‘डॉ. सुमनलता जी के बहुमुखी प्रतिभा का ही पावन पुष्प है, बुंदेली में श्रीमद्भगवद्गीता का भावानुवाद । लोकभाषा में अत्यंत सहजता-पूर्वक उन्होंने गीता के अध्यायों को बुन्देली भाषी जनमानस के लिए प्रस्तुत कर एक अत्यंत प्रशंसनीय कार्य किया है। यह उनकी विद्वता और उनके व्यक्तित्व की सरलता का सुपरिणाम है कि गीता के सभी अध्यायों का मर्म एक सामान्य गृहस्थ को भी सुग्राह्य लगता है। जिन लोगों ने संस्कृत या हिंदी के माध्यम से गीता नहीं पढ़ी है, उन्हें अपने दैनिक बोलचाल की भाषा में गीता के रहस्य को समझने का सुअवसर प्राप्त होता है।’’
वहीं प्रोफेसर अरुण कुमार मिश्र डी.लिट्. हिन्दी साहित्य जबलपुर  ने अनुगुंजन शीर्षक से लिखा है-‘‘आज जब बोली में बातचीत करने वालों को भद्र समाज के कुछ लोग हेय दृष्टि से देखते हैं, तब कुछ लोग ऐसे भी हैं जो बोली के प्रति प्रगाढ़ आदर-भाव रखते हैं। यही वजह है कि सुमन जी ने एक दुष्कर कार्य करने का बीड़ा उठाया और महान् ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता के अठारह अध्यायों का बुन्देली बोली में अनुवाद किया। बुन्देली के वैभव का जिन्हें पता है, उनके लिए यह अनुवाद-कृति जीवन की संजीवनी औषधि के समान है। श्रीमद्भगवद्गीता पर कुछ भी कहना सामान्य मानव की बात नहीं है; पर जो लोग गीता के ज्ञान से पूर्णतः अनभिज्ञ हैं, लेकिन सामान्य सी बुन्देली बोली को समझने के योग्य हैं, उन लोगों के लिये प्रस्तुत ग्रंथ जीवन का पाथेय है।’’
प्रभा विश्वकर्मा ‘‘शील’’, संस्थापक अध्यक्ष-बुन्देली संस्कृति संगम, मध्यप्रदेश जबलपुर ने ‘‘अनुरंजन’’ के अंतर्गत बुंदेली में इस पुस्तक पर अपने विचार कुछ इस प्रकार प्रकट किए हैं - ‘‘भगवान किशन जू के मोंह सें गीता गाबे में जे कछु बोल संस्कृत में निकरे हैं। उन सबई अठारा अध्यायों के यानी सात सौ इस्लोकों को उल्था हमरी सुमनलता श्रीवास्तव जिज्जी ने ऐसी उम्दा बुन्देली बानी में करो है, कै हम का बताएँ! कित्तो सुरीलो लगत है सुनत में, बाँचत में।’’
“अनुभावन” शीर्षक से आत्मकथन लिखते हुए डॉ सुमनलता श्रीवास्तव ने इस बुंदेली भावार्थ के उद्देश्य के संबंध में प्रकाश डाला है- ‘‘ई अनुबाद में मोरी मंसा नें अपनौ गेयान बघारबे की आय और में प्रबचन करकें धरमगुरु बनबे की। मोरो तो संकलप इत्तोई है कै बुन्देलखण्ड के आम आदमी समज जाबें कै आखर गीता-ग्रंथ में लिखो का गओ है, जोन ईकी चरचा संत-महात्मा, गेयानी-बिज्ञानियों सें लैकें कारपोरेट बारे लौं करत हैं। अब तो गीतागेयान में नौजबानों खों सोई चाओ आन लगौ है।’’ उन्होंने आगे लिखा है कि - “हो सकत है, मोरी सगरयाउ बुन्देली सब खों नें जँचे, हिज्जे नें जमें, काय सें कै मैं तो बुन्देलखण्ड सें चालीस बरस दूर रही हौं। बई किसा, कै बीरन खों दै दये बाबुल महल अटारीं, हमखों दये परदेस। सो चाय परम्परा बारी बोली पै पकर सोई ढीली पर गई होय!”


आइए अब देखते हैं उनके द्वारा किया गया श्रीमद्भगवद्गीता का बुंदेली भावार्थ जिसमें बुंदेली का भाषाई सौंदर्य, सहजता, सरलता और लोक मूल्यवत्ता स्पष्ट प्रकट हुई है। सबसे पहले लक्ष्मीपति भगवान विष्णु का ध्यान किया गया है- अथ ध्यानम् - पाठ आरंभ करबे के पैलें अपन सब जनें ई इस्लोक खों पढ़ कें जगत के अधार, लच्छमीपति भगबान बिस्नु को धेयान करिये -
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।
भगबान की आकरिति भौत सांत है। बे सेसनांग की सैया पै सयन कर रय हैं। उनकी नाभि में कमल है। बे देवताओं के भी ईसबर हैं। पूरे जगत के अधार हैं। बे अकास के समान सब जग्घा बेयापत हैं। उनकौ बरन नीले मेघों के समान है। उनके अंग-अंग भौतई सुन्दर और सुभ हैं। बे लछमी जी के पति हैं। उनके नैन कमल घाईं हैं। उनें जोगी हरें धेयान करकें पा सकत हैं। जनम-मरन के भय कौ नास करबे बारे और सकल लोकों के स्वामी भगबान सिरी बिस्नु खों मैं बन्दत हौं। (पृ. 17)
अध्याय - 1 अर्जुनविषादयोग में भावार्थ देखिए जिसमें संजय द्वारा जन्मांध धृतराष्ट्र को अपनी दिव्यदृष्टि से कुरूक्षेत्र का हाल बताना आरम्भ करते हैं। लेखिका ने बुंदेली भावार्थ इस प्रकार किया है-
अब गीता को उल्था आरम्भ करहौं।
कुरुछेत्र में कौरबों और पांडबों की सेनाएँ जमा हो गई हैं। महाराजा ध्रितरास्ट द्रिस्टी सें लाचार हैं सो बे दिब्य-द्रिस्टी बारे संजय सें जुद्ध कौ पूरो आँखों देखो हाल सुनत जा रये हैं। सो आप औरें भी सुनो कै बे का जिग्गयासा कर रय हैं और संजय का जवाब दे रय है।
जोई आय गीता के पहले अध्याय को पहलौ इस्लोक-
धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चौव किमकुर्वत संजय।।1।।
ध्रितरास्ट बोले- हे संजय ! धरम की छेत्र, कुरुच्छेत्र में इकट्ठे भये, जुद्ध की इच्छा बारे मोरे और पाण्डु के पुत्रों ने का करौ, सो बताओ। (पृ. 21)
अर्जुन उवाच- कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन । इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन।।4।।
अरजुन बोले- अरे मधुसूदन ! मैं जुद्धभूमि में भीस्म पितामह और गुरु द्रोणाचार के बिरोध में बान चलाकें कैंसें लड़ाई करहों? ए अरिसूदन ! जे दोई मोरे पूजनीय आएँ। (पृ. 32)
इसी प्रकार कर्मयोग की व्याख्या है-
नैव तस्य कृतेनार्थाे नाकृतेनेह कश्चन ।न चा स्यसर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः।।18।।
ई संसार में कर्मयोग सें सिद्ध भए ऊ महापुरुस खों नें तो कर्म करबे सें कौनऊ मतलब रहत है और नें कर्मों के नें करबे सेंई कौनऊ मतलब रहत है। सकल प्रानियों सें भी ऊ कौ तन्नक भी स्वारथ कौ नातो नई होत ।
तस्मादसक्तः सततं कार्य कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः।।19।।
ई सें तुम बिगैर लाग-लगाव कें सदाँ-सरबदाँ करतब्ब-कर्म करत रहो, कायसें कै आसक्ति के बिना कर्म करत भओ मनुस्य परमात्मा खों प्राप्त हो जात है। (पृ. 53)

इस प्रकार लेखिका डॉ सुमनलता श्रीवास्तव ने श्रीमद्भगवद्गीता का बुंदेली भावार्थ कर के बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण कार्य किया है। यह बुंदेली भाषियों के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। यह पुस्तक बुंदेली के शोधार्थियों के साथ ही उन प्रवचनकर्ताओं के लिए भी उपयोगी है जो बुंदेली भाषियों के बीच श्रीमद्भगवद्गीता का प्रवचन करते हैं। बुंदेली को इस प्रकार समृद्ध करने के लिए डॉ सुमनलता श्रीवास्तव को साधुवाद है। इस प्रकार के भावार्थ अथवा भावानुवाद बुंदेली को न केवल समृद्ध करेगा वरन लोकप्रिय भी बनाएगा।
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Thursday, July 9, 2026

बतकाव बिन्ना की | ई किसां को पुरानो वर्जन सई, के नओ वर्जन? | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की 
ई किसां को पुरानो वर्जन सई, के नओ वर्जन?
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
      चलो आज अपन ओरें एक नीतिकथा पे बिचार करें। अब आप ओरें जा गिचड़ ने करन लगियो के कोन की नीति पे? काए से के आजकाल राजनीति में नीति सो दिखात नईंया। बाकी अपन को का करने राजनीति से? अपन तो ठैरे मतदाता। अपन खों तो बस वोट देने रैत आए। आगे से अपन खों का लेबो-देबो के मैंगाई बढ़े, चाए मंदर में चढ़ाबे की चोरी होए, चाए लुगाइन के संगे, बच्चियन के संगे कछू होत रए, अपन खों का करने? जबे वोट देने रओ तो सो दे दओ रओ। ऊंसई बी सोचबे वारी बात आए के अपन कहाऊंत आएं ‘मतदाता’, सो, देबे वारे खों कभऊं देबे के बाद कछू मांगो नईं चाइए। अच्छो नईं मानों जात। ‘मतदान’ में दान कर दओ सो कर दओ। अब जोन खों दान दओ, का ओई से कछू मांगों थोड़ेई जा सकत आए। जे अपने संस्कार नोंईं। औ अपन ठैरे कछू ज्यादई संस्कारी। जेई से जोन खों वोट देके जिताऊत आएं ऊंसे जे लौं नईं पूछ पाऊत आएं के तुमने जो-जो करबे की कई रई बा करी काए नईं? जा पूछबे में सो ऐसई लगहे जैसे भिखारी खों भीख देबे के बाद ऊको ठेन करी जाए के तुमने भीख के बदले आसीसें काए ने दईं? नईं भैया! अपन ठैरे संस्कारी सो अपन ऐसो नईं पूछ सकत। अपन ठैरे संस्कारी।  बाकी छोड़ो जे सब! हम सुनाबे जा हते एक ठो नीतिकथा, सो, बा सुनो औ गुनो!
का भओ के एक जंगल में एक शेर रैत्तो जो उते को राजा रओ। ऊके दरबार में एक कौवा, एक तेंदुआ औ एक लोमड़ी रैत्ती। शेर शिकार करत्तो औ अपनों भरपेट खा के, अफर के बाकी बा तीनों के लाने छोड़ देत्तो। तीनोंई शेर की भौतई चमचोंई करत्ते। काए से के उने पतो रओ के जबलौं शेर रार करत रैहे तबलौं फोकट को खाबे खों मिलत रैहे। उनें आड़ी के काड़ी ने टारने परहे।  
एक दार का भओ के ऊ जंगल में कऊं से एक ऊंट आ गओ। ऊको देख के कौवा, तेंदुआ औ लोमड़ी की बांछें खिल गईं। उन्ने सोची के जो शेर ई ऊंट को शिकार कर ले, तो उन तीनों को बी चार-छै दिनां को इंतजाम हो जैहे। सो, बा तीनों जने ऊंट खों घेर-घार के शेर के पास लेवा गए।
“जो को आ? जो अपने इते को तो ने दिखा रओ?” शेर ने पूछी।
“को जाने कां से आ गओ?” कौवा ने कई।
“हमें तो लगत आए के जो दूसरो जंगल से इते जासूसी करबे खों आओ आए।” तेंदुआ ने कई।
’ईको तो मार के खा लओ चाइए।” चतुरा लोमड़ी ने तुरतईं कई।
बा तीनों की बतकाव सुन के ऊंट कंपन लगो। ऊने शेर के पांव पकर लए।
“महराज, हमाई जान बख्श दई जाए। हम तो आपकी सरण में जे लाने आए के आप हमें अपने इते जियन खान देहो। मालक, हम जो झूठ बोलें तो हमाए मों में कीरा परें। मालक, जो आप अपने सरण में आए भए को जो  आप मार के खा जैहो तो आपकी भौतई बदनामी हुइए। सरण में आए भए खों मारो नईं जात आए, जा आप सोई जानत हो। बाकी आपकी मरजी।” कै के ऊंट शेर के पावन पे लोट गओ।
शेर ने सोची के ऊंट कै तो सई रओ आए। सो शेर ने ऊंट खों अपनी सरण में लेत भए अपनी सेवा में रख लओ। तीनों चमचों खों जा बात बुरई लगी, मनों ऊपर से उन्ने शेर के जैकारे लगाए
कछू दिनां गुजरे। एक दिनां शेर की तबीयत बिगर गई। हप्ता खांड़ लौन ने सुदरी। तीनों चमचे भूके मरन लगे। काए से उने तो शेर के करे शिकार में से खाबे की आदत रई। सो उन्ने शेर से कई के “मालक! आप तो शिकार कर नईं पा रए औ हम तीनों  भूक से मरे जा रए। सो, अब ऊंट खों मार के खा लओ जाए, जेई उपाय बचो आए।”
“अरे, हम तो सोच रए हते के जा ऊंट तो हमाओ सरण वारो ठैरो, सो ऊको तो हम नईं मार सकत, मनों तुम तीनों खों मार के न खा लओ जाए?” शेर ने कई।
शेर की बात सुन के तीनों कंपन लगे। औ उते भाग खड़े भए। ईके बाद शेर उन तीनों चमचों से छुटकारो मिल गओ। फेर शेर औ ऊंट खुसी-खुसी रैन लगे।
सो, जा हती बा नीति कथा जोन में बताओ गओ के एक राजा खों चापलूसन के कए में नईं आओ चाइए। 
अब तनक ज ईं किसां खों आज के हिसाब से सोची जाए तो किसां कैसी हुइए? 
तो सुनियो अब ई किसां को नओ वर्जन......
नओ वर्जन में किसां ऐसी हुइए के शेर हतो राजा औ राजा खों चापलूसन की घनी जरूरत रैत आए। जो चापलूस चौबीस घंटा ऊकी जैकारे ने करें तो ऊको राजा होबे की फीलिंग ने आहे। सो शेर जू खों सोई अपने तीनों चमचा कौवा, तेंदुआ औ लोमड़ी भौतई पोसात्ते। बा उन्हई की सलाय पे चलत्तो। ऊको पतो रओ के ऊकी परजा तो कऊं नईं जा रई, चाए बा ऊको गरो मसकत रए, चार मार के खात रए। परजा सो लात-जूता खात बनीं रैहे औ जैकारे लगात रैहे। सो, बा राजा शेर शिकार करत्तो औ खुद खात्तो, संगें अपने तीनों चमचों खो खिलाउत्तो।
एक दिनां ऊके जंगल में कऊं से ऊंट आ गओ। कौवा बोलो के - “मालक जे दूसरो जंगल को जासूस आए इको मार के खा लओ जाए।”
“नईं मालक, जो जे दूसरो जंगल को मेम्बर आए तो ईको अपने राज में मेम्बरशिप दे दई जाए औ कछू अच्छो सो पद दे दओ जाए, ईंसे उते औ मेम्बर फूट के इते आ जाहें। ईसे आपको राज सबसे बड़ो राज कहा हे।” तेंदुआ बोलो। काए से के ऊके दिल में चल रई हती के जो शेर अपनों राज बड़ो कर लैहे तो कल को ऊके टपकबे पे ऊ जा बड़े राज को मालक बन जैहे।
“हऔ महराज! दोई अपनी-अपनी जांगा सई कै रए। मनो अबे जा ऊंट तनक दूबरो आए। अबे खाबे जोग ईमें कछू खास नइयां, सो, ईको अबे अपने राज में कछू पोर्टफोलियो दे के खान-पियन देओ। फेर जब जे मुटा जाहे, तब सोचबी के कोन दिनां काटने औ कोन दिनां खाने।” लोमड़ी ने सोई अपनो एक्सपर्ट कमेंट दओ। ऊंट ने सोई मोका ताक के अपने जंगलवारों खों खूब गरियाओ औ अपनी पार्टी मने अपनों जंगल बदल लओ।
सो ई तरां ऊंट खों नए जंगल में जांगा मिल गई। फेर चारो परजा के मूंड़ पे तबला बजाऊत भए खत रए, मुटियात रए। अबे लौं ने राजा शेर बिमार परो ने ऊंट के खाए जाबे की नोबत आई। सबरे अपनी सात पीढ़ी के लाने जोग मसकत जा रए।
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के आज के टेम पे ई नीतिकथा मने किसां को पुरानो वर्जन सई, के नओ वर्जन?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, July 8, 2026

चर्चा प्लस | गंभीर चिंतन आवश्यक है विशेषणयुक्त संबोधनों को ले कर | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस     
गंभीर चिंतन आवश्यक है विशेषणयुक्त संबोधनों को ले कर
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
    
    स्त्री के लिए ‘लेखिका’ शब्द है और पुरुषों के लिए ‘‘लेखक’’ शब्द। लेकिन फिसलन यह कि ‘‘महिला लेखिका’’ शब्द का प्रयोग भी कर दिया जाता है। अर्थात् एक स्त्री के लिए विशेषण का दोहरा जेंडर। विशेष यह की कई बार हिन्दी के विद्वान प्राध्यापकों की लेखनी एवं उद्बोधन में भी यह प्रयोग पढ़ने-सुनने को मिल जाता है। इसी तरह एक विशेषण प्रत्यय प्रचलन हिन्दी में भी चलन में आया है - ‘‘कारा’’। जैसे ‘‘ग़ज़लकारा’’। यहां तक कि मैंने स्वयं अपने लिए संबोधन सुना है ‘‘कहानीकारा’’, ‘‘उपन्यासकारा’’। देखा जाए तो भाषा और स्त्री दोनों को भाषाई दोष की काराओं में बंदी बनाया जा रहा है। यह बात हंसी में नहीं उड़ाई जा सकती है क्योंकि थर्ड जेंडर राईटर्स के रूप में रचनाकार- संसार का विस्तार हो रहा है। इस समय विशेषणयुक्त संबोधनों को ले कर गंभीर चिंतन की आवश्यकता है।


वर्ष 2009 में नरेन्द्र कोहली की छः भागों की एक उपन्यास श्रृंखला आई थी जिसका नाम था ‘‘तोड़ो, कारा तोड़ो’’। यह स्वामी विवेकानंद के जीवन पर आधारित थी। मेरी इस चर्चा का इस उपन्यास से मात्र इतना ही संबंध है कि इस उपन्यास के नाम में ‘‘कारा’’ शब्द आया है और कारा अर्थात् बंधन। जिसे तोड़ने का आह्वान किया गया है उपन्यास में। इस ‘‘कारा’’ से ही बना है शब्द ‘‘कारावास’’ जिसका शाब्दिक अर्थ है बंदीगृह। स्त्री-जीवन से भी कारा शब्द का गहरा संबंध है। स्त्री-जीवन अनेक काराओं से अर्थात् बंधनों से जकड़ा हुआ है। इस बंधन की बुनियाद उसके बचपन में ही पड़ जाती है जब उसकी प्रत्येक चेष्टा पर ‘‘ऐ लड़की’’ कह कर अंकुश पर अंकुश लगाए जाते हैं। कृष्णा सोबती ने इसी संबंध में एक उपन्यास लिख डाला था जिसका नाम ही है-‘‘ऐ लड़की’’। स्त्री जीवन की काराओं का आरम्भिक रूप है कि ‘‘ऐ लड़की तू ये न कर’’, ‘‘ऐ लड़की तू वो न कर’’, ‘‘ऐ लड़की तू यहां मत जा’’, ‘‘ऐ लड़की तू वहां मत जा’’, ‘‘ऐ लड़की तू यह मत पहन’’, ‘‘ऐ लड़की तू वह मत पहन’’, ‘‘ऐ लड़की तू इससे बात मत कर’’,‘‘ऐ लड़की तू उससे बात मत कर’’ आदि-आदि अनेक बंधन। स्त्रियों ने इन अनावश्यक काराओं से मुक्त होने के लिए दुनिया भर में लंबा संघर्ष किया है। यह संघर्ष आज भी जारी है। किन्तु जिस अपनी पहचान और अस्तित्व की स्थापना के लिए अनेक स्त्रियां संघर्षरत हैं वहीं कथित प्रबुद्ध स्त्रियां अपने कार्य से जुड़े अस्तित्व की पहचान के साथ ‘‘कारा’’ जोड़े जाने पर कोई आपत्ति नहीं कर रही हैं।
चलिए बता दूं कि यह मुद्दा कहां से दिमाग़ में आया। वस्तुतः फेसबुक पर एक साहित्यिक कार्यक्रम का पोस्टर देखा। जिसमें कवियों के साथ कवयित्रियों, शायराओं की तस्वीरें थीं और उनके नाम के साथ उनकी विधा को स्पष्ट करते हुए ‘‘ग़ज़लकारा’’ शब्द लिखा गया था। अब यह ‘‘ग़ज़लकारा’’ क्या होता है? ‘‘ग़ज़लगो’’, ‘‘शायरा’’, ‘‘कवयित्री’’ जैसे शब्द प्रचलन में रहे हैं लेकिन इधर कुछ समय से ‘‘ग़ज़लकारा’’ शब्द वाया सोशल मीडिया तेजी से प्रचलन में आया है। अभी कुछ समय पहले एक कार्यक्रम में मेरा लेखकीय परिचय देते हुए एक संचालक महोदय ने मेरे लिए कहा था कि ‘‘ये चर्चित कहानीकारा हैं, उपन्यासकारा हैं, स्तम्भकारा हैं।’’ अपने परिचय के साथ तीन-तीन ‘‘कारा’’ सुन कर मुझे लगा कि इसके बाद बस, कारागार ही शेष बचता है।
एक ओर स्त्रियों और पुरुषों की समानता के लिए आवाज़ उठाई जाती है। बुद्धिजीवी साहित्यिक वर्ग यहां तक कहता है कि ‘‘लेखक’’, ‘‘साहित्यकार’’ ‘‘कवि’’ आदि शब्दों को लिंगभेद से अलग कर के देखा जाना चाहिए और चाहे स्त्री रचनाकार हो अथवा पुरुष रचनाकार दोनों के लिए एक समान सम्बोधन होना चाहिए। जैसे अंग्रेजी में ‘‘राईटर’’, ऑथर’’ जैसे शब्द दोनों के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। जहां जेंडर स्पष्ट करने की आवश्यकता होती है वहां ‘‘मेल राईटर’’, ‘‘फीमेल राईटर’’ का प्रयोग किया जाता है। हिन्दी में भी स्त्री लेखक, पुरुष लेखक जैसे शब्द प्रचलन में आ चुके हैं। लेकिन मजे की बात है कि इन शब्दों के प्रयोग में हिन्दी के प्राध्यापकों एवं शोधकर्ताओं तक को गलती करते पाया है। कई बार लिखा हुआ पढ़ने में आया ‘‘महिला लेखिका’’। बोलने में भी कई बार लोग ‘‘महिला लेखिका’’ बोल देते हैं किन्तु इसे ज़बान की फिसलन मान कर अनदेखा किया जा सकता है किन्तु लिखे हुए अथवा मुद्रित सामग्री में ‘‘महिला लेखिका’’ को कैसे फिसलन मान लेंगे? अब कोई ऐसी त्रुटि करने वाले से पूछे कि यदि आप ‘‘महिला लेखिका’’ शब्द ही प्रचलन में लाना चाहते हैं तो फिर साथ में ‘‘पुरुष लेखिका’’ शब्द का प्रयोग क्यों नहीं करते हैं? आखिर तय तो करना पड़ेगा कि आप महिला को ‘‘महिला’’ और ‘‘लेखिका’’ के दोहरे जेंडर सूचक शब्द में बांधना चाहते हैं या फिर सही और उचित संबोधन देना चाहते हैं?
यूं भी अब बात स्त्री या पुरुष सर्जकों की नहीं रह गई है। थर्ड जेंडर की कृतियां भी सामने आने लगी हैं। महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी की आत्मकथा ‘‘मी हिजड़ा, मी लक्ष्मी’’ मराठी, गुजराती, हिन्दी और अंग्रेजी आदि विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी है। आर. रेवती दक्षिण भारत में रहने वाली ट्रांसजेंडर सर्जक है। उनकी प्रथम पुस्तक तमिल में प्रकाशित हुई थी जिसका अंग्रेजी अनुवाद का नाम था ‘‘अवर लाइव्स, अवर वर्ड्स’’। फिर 2010 में उनकी दूसरी पुस्तक आई ‘‘दी ट्रुथ अबाउट मी: ए हिजड़ा लाईफ स्टोरी’’। आर. रेवती से प्रभावित हो कर ट्रांसजेंडर प्रियाबाबू ने 2007 में ‘‘नान सर्वनान अल्ला’’ और ट्रांसजेंडर विद्या ने ‘‘आई एम विद्या’’ पुस्तक लिखी। तो प्रश्न यह उठता है कि थर्ड जेंडर के साहित्य सर्जकों के लिए किस तरह का संबोधन प्रयोग में लाया जाएगा? क्या बेहतर यही नहीं होगा कि साहित्य सर्जकों को जेंडर सूचक शब्दों की कारा से मुक्त रखा जाए। यदि ‘‘लेखक’’ शब्द सभी के लिए प्रयोग किया जाना है तो वह स्त्री, पुरुष और थर्ड जेंडर तीनों के लिए प्रयोग में लाया जाए।
इस विषय पर मेरा ध्यान हमेशा ही आकृष्ट हुआ है। सन् 2005 में मेरे उपन्यास ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ का प्रथम संस्करण प्रकाशित हुआ था जिसकी भूमिका में मैंने हिन्दी व्याकरण में जेंडर की बात उठाते हुए लिखा था कि- ‘‘अंग्रेजी में व्यक्तिवाचक संज्ञा के लिए प्रथम, द्वितीय, तृतीय के साथ पर्सन अर्थात व्यक्ति शब्द जुड़ा होता है। यह पर्सन पुरुष भी हो सकता है और स्त्री भी। किंतु हिंदी भाषा के व्याकरण में मानो स्त्री न तो कोई व्यक्ति है न व्यक्तिवाचक संज्ञा। प्रथम है तो पुरुष, द्वितीय है तो पुरुष और तृतीय है तो पुरुष। फिर स्त्री के लिए जगह कहां है? क्या स्त्री का अस्तित्व मात्र लिंग तक सीमित है? क्या स्त्री की पहचान मात्र लिंग तक सीमित है? मैं न तो व्याकरण की आधिकारिक ज्ञाता हूं और न ही आधिकारिक व्याख्याकार हूं, लेकिन एक औरत होने के नाते मुझे यह बात सदैव चुभती है।’’
यह बात विस्मृत करने की नहीं है कि भाषा का सीधा संबंध संस्कार से होता है। भाषा व्यक्ति के व्यक्तित्व की परिचायक होती है। भाषा और संस्कार का अंतर्सम्बन्ध घनिष्ठ है। कोई व्यक्ति किस प्रकार की भाषा अथवा शब्दों का प्रयोग बोलचाल में कर रहा है, उसी से उसके संस्कारों का पता चल जाता है। यदि कोई व्यक्ति बात-बात में अपशब्दों का प्रयोग करता है तो तत्काल समझ में आ जाता है उस व्यक्ति को अच्छे संस्कार नहीं मिले हैं। वहीं कोई व्यक्ति सम्य, शालीन भाषा का प्रयोग करता है तो हम उसे संस्कारवान मानने में देर नहीं करते हैं। इसी बात को यदि और सरल शब्दों में कहा जाए तो भाषा संस्कार का ‘‘आईडी कार्ड’’ होती है। कहने का आशय यही है कि इस ग्लोबल होते समय में भाषा के संस्कार को बचाए और बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है।      
खैर, बात चल रही थी, ‘‘ग़ज़लकारा’’ की। इस शब्द ने मुझे इतना परेशान किया कि मैंने अपनी शंका-समाधान के लिए एक जाने-माने शायर से इस बारे में पूछा कि उर्दू में ‘‘ग़ज़लकारा’’ शब्द होता है क्या? वे उर्दू और हिन्दी दोनों भाषाओं में समान रूप से ग़ज़ल कहते हैं इसलिए मुझे उनसे अपना उत्तर मिलने की पूरी उम्मीद थी। उन्होंने भी वहीं उत्तर दिया जिसका मुझे पता था कि उर्दू में ऐसा कोई शब्द नहीं होता है। फिर उन्होंने विस्तार से समझाया कि ‘‘ग़ज़ल लिखी नहीं जाती बल्कि कहीं जाती है इसीलिए ग़ज़ल कहने वाले को ग़ज़लगो कहा जाता है। गजलकार शब्द हिंदी में प्रचलन में आ गया है जो उचित नहीं है। क्योंकि ग़ज़ल स्वतः बनती है, उसमें किसी प्रकार की कलाकारी नहीं की जाती है। जहां कलाकारी हो वही कार शब्द उचित लगता है जैसे अदाकार या अदाकारा।’’
इस बारे में मैंने डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के हिन्दी के प्रोफेसर से भी चर्चा कर डाली। उन्होंने भी ‘‘ग़ज़लकारा’’ शब्द पर आपत्ति जताई कि ‘‘यह सर्वथा गलत है।’’ एक ग़ज़ल विधा के ज्ञाता और दूसरे भाषाशास्त्र के ज्ञाता, इन दोनों से चर्चा करने के उपरांत मुझे विश्वास हो गया कि मैं सही दिशा में चिंतन कर रही हूं। दरअसल प्रश्न मात्र ‘‘ग़ज़लकारा’’ शब्द का ही नहीं है, प्रश्न है भाषा और स्त्री दोनों की अस्मिता का, उनकी पहचान का। इस प्रकार के शब्द गढ़ने वाले स्वयं को साहित्य का विद्वान कहते हैं और उसे अनदेखा करने वाले उन्हें अनजाने में प्रोत्साहन देते हैं। यह तो हुई भाषा में दोषपूर्ण शब्दों के समावेश की। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात है स्त्री की बौद्धिक विशेषता के लिए दिए जा रहे संबोधन की। स्त्री समाज जहां एक ओर अपनी काराओं को तोड़ कर स्वयं की क्षमता प्रमाणित करने में जुटा हुआ है, वहीं संबोधन में ‘कारा’ का विशेषण प्रफुल्लित हो कर स्वीकार किया जा रहा है। कवियों के लिए तो यूं भी प्रचलित है कि ‘‘जहां न जाए रवि, वहां जाए कवि’’, तो क्या कवि समुदाय इन काराओं तक पहुंच नहीं पा रहा है अथवा देख कर अनदेखा कर रहा है या फिर इस ओर सोचना ही व्यर्थ मानता है? बेशक़ प्रश्न अनेक हैं। क्या करूं, दिल है कि प्रश्न किए बिना मानता ही नहीं। वैसे, फिलहाल तो दिल यही कहना चाहता है (नरेन्द्र करेहली जी से क्षमायाचना सहित) कि ‘‘प्रिय रचनाकार बंधु-बांधवी, तोड़ो कारा तोड़ो और संबोधन के लिए चलन में उचित शब्द जोड़ो’’।                        
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(दैनिक, सागर दिनकर में 08.07.2026 को प्रकाशित) 
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Tuesday, July 7, 2026

पुस्तक समीक्षा | लोक मिथक के मूल्य और सौंदर्य पर एक रोचक मीमांसा | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा     
लोक मिथक के मूल्य और सौंदर्य पर एक रोचक मीमांसा
- समीक्षक डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक  - लोक मिथक : मूल्य और सौंदर्य दृष्टि
लेखक    - श्यामसुंदर दुबे
प्रकाशक - विजया बुक्स, 1/10753 सुभाष पार्क, गली नं. 3, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032
मूल्य        - 450/-
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आज लोक संस्कृति संग्रहालयों की वस्तु बनती जा रही है। वर्तमान भौतिकवाद के लिए लोक संस्कृति भी एक बाज़ार की एक वस्तु है। वस्तुतः बाजार की संस्कृति ने लोक संस्कृति को भी बाजार की वस्तु बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। घर की बैठक में वर्ली आर्ट या मधुबनी कलम की पेंटिग लगा लेना ही संस्कृति को सहेजना नहीं होता है। लोक संस्कृति को सहेजने के लिए सबसे पहले जरूरी है लोक संस्कृति के स्वरूप को समझना। यह समझना आवश्यक है कि लोक संस्कृति मात्र एक शब्द नहीं है, यह एक समृद्ध परम्परा है जो विचार, शिल्प कथा, आस्था आदि विविध रूपों में उस समय से प्रवाहित है जब दुनिया में संस्कृतियों का विधिवत उद्भव ही नहीं हुआ था। लोक संस्कृति वस्तुतः मौलिक चेष्टाएं हैं जो कभी अभिव्यक्ति के माध्यम से तो कभी कला, कल्पना और आस्था के माध्यम से व्यक्त होती रही हैं। लोक संस्कृति पर एक बहुत महत्वपूर्ण पुस्तक है ‘‘लोक मिथक - मूल्य और सौंदर्य दृष्टि’’। इसके लेखक है प्रतिष्ठित संस्कृतिविद डॉ. श्यामसुंदर दुबे।


लोक संस्कृति में मिथक की उपस्थिति के संबंध में डॉ. श्यामसुंदर दुबे ने लिखा है कि ‘‘लोक-संस्कृति, मानवीय सौंदर्य चेतना का अक्षय स्रोत है। निःसर्ग और मनुष्य के सह समायोजन से अभिव्यक्त होने वाली लोक संस्कृति अपनी सामाजिकता में उदार आशयों वाली है। उसकी नैतिकता वैश्विक परिदृश्य में सृष्टि के समुचित संरक्षण से आविर्भूत है। लोक संस्कृति जितना मनुष्य को संरक्षणीय मानती है, उतना ही संरक्षणीय वह प्रकृति के प्रत्येक अंग को संरक्षणीय मानती है उसकी अभेद दृष्टि सर्वत्र सभी संदर्भों में एक ही चैतन्य को तलाशती है। यही वजह है कि उसमें मानवीय अंतर्दृष्टि के आलोक को हम प्रत्येक रचना-विधान में प्राप्त करते हैं।’’


लोक संस्कृति की अपनी अलग पहचान एवं विशेषता होती है इसका संबंध किसी देश व क्षेत्र विशेष के सामान्य जन समुदाय से होता है समाज में प्रचलित विभिन्न क्रियाकलाप परंपराएं अचार-विचार, संस्कार, प्रथाएं कर्मकांड, आस्था एवं विश्वास - लोक संस्कृति के आधारभूत तत्व हैं। संस्कृति व्यक्ति एवं समाज के विकास का परिचायक होती है। लोक जीवन इसी संस्कृति का अक्षय भंडार है। लोक संस्कृति समाज के सांस्कृतिक मूल्यों को आकार देती है। लोक संस्कृति विविधरूपों में आकार लेती रहती है। जैसे- लोक भाषा, लोक परंपरा, लोकनाट्य, लोकगीत, लोककला आदि। लोक परंपराओं के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के व्रत, त्यौहार, प्रथाएं, मेले, रूढ़िया एवं संस्कार आते हैं, जिनके द्वारा समाज में उत्साह एवं विश्वास बना रहता है। लोक साहित्य लोक मानस की सहज एवं स्वाभाविक अभिव्यक्ति है यह प्राय अलिखित रहता है तथा वाचक परंपरा के द्वारा एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक प्रवाहित होता है। लोक साहित्य परिभाषित भाषा शास्त्रीय रचना पद्धति एवं व्याकरणिक नियमों से रहित होता है, इसकी भाषा लोक भाषा होती है लोक साहित्य के अंतर्गत लोक गाथा, लोकगीत, लोक कथाएं, सुभाषित, पहेलियां, लोकोक्तियां, लोकनाट्य आदि आते हैं।


लेखक श्यामसुंदर दुबे ने अपनी पुस्तक ‘‘लोक मिथक - मूल्य और सौंदर्य दृष्टि’’ में लोक मिथक के मूल्य और सौंदर्य दृष्टि को व्याख्यायित करते हुए विस्तार से लोक के स्वरूप को सामने रखा है। उन्होंने अपनी पुस्तक के कलेवर को मुख्य तीन शीर्षकों एवं 25 लेखों में विभक्त किया है। ‘‘लोक-संस्कृति: विमर्श के नए आयाम’’ शीर्षक से दी गई भूमिका के उपरांत तीन मुख्य शीर्षक हैं- मिथकीय संरचना का संसार, जीवन-मूल्यों के आधार तथा कला-दृष्टियों का समाहार। इन तीन मुख्य शीर्षकों अथवा खंडों के अंतर्गत जो पच्चीस लेख हैं उनके मिथकीय संरचना का संसार के अंतर्गत हैं- लोक आख्यान और मिथक के अंतर्संबंध, भाषिक संरचना और लोक आख्यान, लोक आख्यान और आज का लेखन-कर्म, मिथक संरचना के आधारभूत बिंदु, लोक चित्र परंपरा के मिथकीय आधार, लोक-संस्कृति की भूमि पर लोक-विश्वासों की हरी दूब, लोक-प्रतीकों की अवधारणा, लोक-परंपरा और लोक-संस्कार, आदिम चित्रकला अभिप्रायों का संसार।
जीवन-मूल्यों के आधार के अंतर्गत हैं- लोक संस्कृति: मानव संसाधन का आधार, मानवीय मूल्य और लोक-साहित्य, लोक-साहित्य की मूल्य-चेतना, लोक-साहित्य: जीवन-मूल्य और भारतीयता,  लोक-संस्कृति में माधुर्य-बोध, लोक की सौंदर्यशास्त्रीय भूमिका।
कला-दृष्टियों का समाहार के अंर्तगत हैं- बोलियों और लोकगीतों का अंतर्संवादी स्वर, प्रदर्शनकारी लोक-कलाएं और जन-संचार माध्यम, लोक-लय के प्रयोग, लोक गायिकी: रंगतों का वर्णपट, लोक नृत्य ‘राई’, आल्हा परंपरा की उखड़ती सांसें, मिट्टी तेरे रूप अनेक: मृदा कला, लोक में बाजार और बाजार में लोक, हिंदी साहित्य की लोकधर्मिता, लोक-गाथा में निहित समकालीनता।


लोक आख्यान और मिथक के अंतर्संबंध की विवेचना करते हुए लेखक ने लिखा है कि -‘‘ प्रारंभिक मिथक रचनाओं में आदिम मनुष्य का भय उसकी प्रसन्नता, उसकी घृणा, उसका बैर आदि मनोभावों के प्रबल प्रवेग ने मानवीय और अतिमानवीय चरित्रों के साथ मानवेतर प्राणियों और वस्तु संदर्भों के बीच संबंधों का चक्र निर्मित किया।यह चक्र आख्यान के सूत्रों के रेशों की सघन बुनावट से बना था। इन रेशों की चमक से जो झकर-मकर करता स्पेस निर्मित हो रहा था उसकी उर्वर क्षमता को इस रूप में अनुभव किया जा सकता है कि हमारे निकट अतीत के अनेक घटना प्रसंग जब आख्यान बनने हेतु समुद्यत होते हैं, तब मिथक के आदिम अनुभव से वे उद्रेकित होने लगते हैं। मिथक रहस्य भावना की उपज भी माने जा सकते हैं।’’
भाषिक संरचना और लोक आख्यान के अंतर्संबंध के बारे में लेखक श्यामसुंदर दुबे का कहना है कि- ‘‘भाषिक संप्राप्ति के तत्काल बाद ही मनुष्य आख्यानपरकता की ओर उन्मुख हुआ होगा। भाषा की वृत्ति अपने-आपको अभिव्यक्त करने की चेष्टाओं का भले ही ध्वन्यात्मक परिणाम हो, किंतु भाषिक संरचना की लंबी जद्दोजहद में मनुष्य की आख्यान व्याकुलता ही क्रियाशील रही है। मनुष्य केवल इच्छित विषय की संकेतधर्मी परंपरा से संबंधित ध्वनि-पर्यायों से संतुष्ट नहीं रहा- ये पर्याय वस्तु-बिंब और उससे जुड़े तमाम क्रिया- व्यापारों की आख्यान केंद्रित इकाई की तरह निर्मित हुए हैं। इसलिए प्रत्येक शब्द एक आख्यायिका को अपने भीतर छिपाए हुए है।’’ इसी लेख में लोकबोलियों के संबंध में लेखक ने सोदाहरण लिखा है कि- ‘‘कम-से-कम संस्कृत भाषा की शब्द- संरचनाओं में धातु आधार तो हमारे अभिज्ञान में है ही। इसी क्रम में लोक-बोलियों का विकास हुआ और इन बोलियों के शब्दों का मूल, क्रिया-जन्य ही है। क्रिया मात्र ध्वनि नहीं है वह एक पूरा दृश्याख्यान है। मैं यहाँ एक शब्द ‘पत्र’ लेता हूँ- यह शब्द प्रारंभ में वृक्ष के पत्ते के पर्याय को व्यक्त करने वाला रहा है-फिर चिट्ठी, पन्ना आदि का अर्थ देने वाला बना। लोक बोली के पत्ते को आधार बनाकर एक रूपक रचा ‘पत्ता टूटा डाल से-उड़कर गया अकास’ डाल से पत्ता टूटा और हवा के झोंके के साथ उड़कर आकाशचारी बना। पत्र के मूल में पत् क्रिया है। डाल से पत्र टूटा और पृथ्वी की सतह पर गिरा गिरने से पत् की आवाज आई। इस क्रिया के पूर्व पत्ता-पत्ता नहीं था-एक क्रिया ने उसका नामकरण किया। क्रिया संपूर्ण इंद्रिय-संवेदी व्यापार है, टूटते हुए पत्ते के शेड्स की झलमलाहट, पत् ध्वनि का परिस्पंदन, पत्ते के ताजे डंठल से निर्गत गंध, पत्ते की कोमलता को छूने का भाव, पत्ते की ओक बनाकर तरल पदार्थ पीने का अनुभव - ये संपूर्ण संवेदनाएँ एक ध्वनि-बिंब’ में सिमट आईं।’’


लोक-परंपरा और लोक-संस्कार के पारस्परिक संबंध को स्पष्ट करते हुए लेखक ने लिखा है कि -‘‘लोक एक परंपरा है। परंपरा सतत विकसित मूल्य-बोध है। इसके सातत्य में सृजनमूलक समस्त अनुष्ठान अगली पीढ़ी के लिए हस्तांतरित होते रहते हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसमें कुछ नया जुड़ता रहता है। परंपरा का विकास लगभग एक रैखिक होता है। चूँकि यह विकास है, इसलिए यह ऊर्ध्वगामी भी होता है। लोक में परंपरा का विकास एक तरह से सांस्कृतिक समुन्नयन भी है, इसलिए यह एक क्रियाशील जीवित प्रणाली है, जो सामाजिक प्रकार्यों को गति देती है। परंपरा का नाभिकेंद्र लोक है, अतः लोक के परिवृत्तों में जो परिवर्तन की ऊर्जा समाहित है, वह लोक की अभ्युदयमूलक सिसृक्षा है।’’


यह पुस्तक लोक मिथक को बीरीकी से समझाती है। डॉ. श्यामसुंदर दुबे स्वयं एक लोक संस्कृतिविद हैं अतः बुंदेली लोक संस्कृति के साथ ही उन्होंने देश की विभिन्न लोक संस्कृतियों का अध्ययन तथा उन पर लेखन किया है। सबसे अच्छी बात है कि जब वे लोक संस्कृति की चर्चा करते हैं अथवा उस पर कुछ लिखते हैं तो तथ्यात्मकरूप से लिखते हैं। अपनी इस पुस्तक में भी उन्होंने वैचारिक तर्कों के साथ लोकगीतों, लोककथाओं, लोकोक्तियों आदि के उदाहरण देकर विषय की व्याख्या की है। पुस्तक के प्रथम दो मुख्य शीर्षकों के अंतर्गत प्रस्तुत लेख समग्रता लिए हुए हैं। तीसरे कला-दृष्टियों का समाहार के अंर्तगत हैं रखे गए लेखों में मृदा कला,  हिंदी साहित्य की लोकधर्मिता आदि पर।
श्यामसुंदर दुबे के पास भाषाई समृद्धि है। संस्कृतनिष्ठ शब्दों से सुसम्पन्न उनकी भाषा उन लोगों को पर्याप्त भाषिक आनन्द देती है जो हिन्दी के श्रेष्ठ स्वरूप का रसास्वादन करना चाहते हैं किन्तु लोक एक ऐसा विषय है जिसमें हर तरह के पाठक वर्ग की रुचि हो सकती है। अतः पुस्तक की संस्कृतनिष्ठ भाषा उन पाठकों के लिए तनिक असुविधा पैदा कर सकती है जो संस्कृतनिष्ठ हिन्दी से दूर हैं। चूंकि यह पुस्तक लोक संस्कृति के लोक मिथक पर है अतः इसकी भाषा थोड़ी सरलीकृत होती तो और अधिक पाठकों के लिए सुविधाजनक होती। किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह पुस्तक सुधि पाठकों को लोक मिथक के सौंदर्य एवं स्वरूप से गहराई से भली-भांति परिचित कराने में सक्षम है। लोक संस्कृति अथवा संस्कृति में रुचि रखने वालों तथा उत्तम भाषा का रसास्वादन करने की इच्छा रखने वालों को इस पुस्तक को अवश्य ही पढ़ना चाहिए।   
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Sunday, July 5, 2026

टॉपिक एक्सपर्ट | झला परन लगे, अब उठ बैठो खतरा वारे घर औ स्कूलों के लाने | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम

टाॅपिक एक्सपर्ट
झला परन लगे, अब उठ बैठो खतरा वारे घर औ स्कूलों के लाने
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
एक कहनात सबई ने सुनी हुइए ‘आवन लगी बरात, सो ओटन लगे कपास’। मने जबे खबर मिलीं के बरात बस दोरे पे आनेई वारी आए सो घराती-बाराती दोई के लाने हुन्ना-लत्ता बनाबे के लाने सूत-कपास तैयार करन लगे। अब आपई सोचो के का इत्ती झट्टई हुन्ना-लत्ता तैयार हो पाहें? औ का तुमाए हुन्ना-लत्ता के लाने बरात दोरे पे ठाड़ी-ठाड़ी बाट जोहत रैहे? रार सो परहेई। जेई दसा अपने इते उन घरों औ स्कूलों की रैत आएं जोन पुराने पर के गिरबे के जोग हो गए। ने तो जोन रिपेयरिंग मांग रए। सई पूछी जाए तो ऐसे घरों औ स्कूलों खों यां तो गिरा दओ चाइए, ने तो समै रैत में उनकी रिपेयरिंग करा दओ चाइए। मगर अपने इते ऐसो कभऊं होत आए का? राम के नांव लेओ! ऐसो कभऊं नईं होत। इते तो जब झला परन लगत आएं तब परसासन के लाने कोऊ-कोऊ अखबार वारे याद दिलान लगत आएं के मालक झला परन लगे मने बरसात दोरे पे ठाड़ी। अब अपनी आंखन खों खोलके तनक उन ओरें घरों औ स्कूलों खों हेर लेओ जो रग्दा गिरे में गिर सकत आएं। तब कऊं नोटशीट पे चिरइयां बैठत आएं। मुतकी बेर ऐसो हो चुको के रग्दा परे में मने भारी बारिश होत बेरा ऐसे मकान धंसक गए, ने तो उनकी छतें गिर परीं। औ तो औ पर की सालों में जिला अस्पताल की छतें लौं चुअत रईं।
      अबकी साल सोई जेई भओ जा रओ के बरयाबर के झला परबे सुरू भए, बरसात को आबो पक्को हो गओ मनों सई-सई जे नईं पतो के कोन सो घर बरसात में गिरबे जोग आए औ कोन से स्कूलन में छत टपकबे को खतरा आए। मनों अबे बी टेम आए जो तनक फुरती दिखाई जाए सो बड़ो नुसकान से बचो जा सकत आए। काए सई कई के नईं!
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏

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Thursday, July 2, 2026

बतकाव बिन्ना की | मंदर में घपला करे से जो उने डर नईं लगो?| डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की  
मंदर में घपला करे से जो उने डर नईं लगो?  
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       हमें एक घटना याद आ रई, बरसो पैले की। का भओ रओ के पन्ना के जुगल किसोर मंदर में में एक दार चोरी भई। किसोर जू के मुकुट, मुरली औ सबरे जेवर ऊ भड़या ने चुरा लए। संकारे मंदर खुलो तो पुजारी जू ने हल्ला मचाओ। भीड़ लग गई। पुलिस आ गई। सबरे ऊ भड़या खों गरयान लगे के जीने बी जुगल किसोर जू के जेवर चुराए ऊकी ठठरी बंधे, ऊको कीरा परें, ऊपे जुगल किसोर जू की गाज गिरे। जांच सुरू करी गई। पब्लिक तो ऊंसई खोंखिया रई हती सो ऊने सोई पुलिस पे दबाव डारो। पुलिस के लाने सोई जे बड़े सरम की बात हती। सो पुलिस वारे ऊ भड़या खों पकरबे के लाने जुट परे। दोई दिनां में जा साबित हो गओ के जो पुलिस चाए तो कोनऊं बदमास बच नईं सकत। ऊ भड़या पकरो गओ औ किसोर जू के सबरे जेवर उतई मंदर के कुंआ में मिले। काए से के ऊ भड़या ने बा जेवर बांध के कुआ में लटका दए रए। ऊकी सेाच से के पुलिस को तो पतो परहे नईं। मनो पुलिस औ ऊके कुत्ता ने सूंघ-सांघ के बा जेवर ढूंढ निकारे। इत्तोई नोंई, पुलिस ने ऊ भड़या खों भी पकर लओ। जबे पब्लिक खों भड़या के बारे में पता परी तो सबरे अकबका के रए गए। काए से के बा भड़या और कोऊ नईं मंदर को पुजारी ई रओ। पब्लिक ने ऊ पुजारी खों औ गरियाओ। ऊ पे केस चलो। मनो सायद बा ऊ टेम पे जमानत पे छूटो रओ। सायद ईसे कहने पर रए के जा भौत पैले की बात आए। हम हते लोहरे ऊ टेम पे, सो जित्ती याद आ रई बता रए। फेर पता परी के ऊ पुजारी खों अपने करम पे इत्तो पछताओ भओ के ऊने ओई कुंआ में कूंद के अपने प्रान दे दए। इत्तई नईं, कछू समै बाद पता परी के ऊके घरे औ दो-तीन मौतें भईं। सो सबई कैत्ते के किसोर जू ने ऊको दंड दओ। बाकी काम बी तो ऊने बुरौ करो रऔ।
एसईं एक घटना औ भई रई। छतरपुर में हरपालपुर की रस्ता पे एक छोटो सो मंदर रओ। अब तो बा बड़ो बन गओ हुइए। मनो ऊ टेम पे बा छोटो सो रओ। ऊकी मानता ऊ टेम पे बी रई। अब हमें जे ध्यान नोंई के बा किसन जू को मंदर रओ के रामजी को, मनो इन्हई दोई में से एक को रओ हुइए। काए से के कोऊ ने मनौती पूरी होबे पे उते चांदी को मुकुट चढ़ाओ रओ। मुकुट चढाए चार दिनां भए नईं के एक दारूखोर भड़या रात को मंदर में घुसो औ बा मुकुट ले भगो। ऊको दारू के लाने पइसा चाउने रए सो ऊने जे न सोची के भगवान को मुकुट आए के कोन को आए? ऊने तो उठाओ औ चलतो बनो। दूसरे दिनां कोऊ ने बताओ के मंदर के लिंगे बा दारूखोर को घूमत देखो रओ। अब सबरे ऊको ढूंढबे में जुटे। ऊको कऊं पतो ने परो। बाद में पता परी के बा रातई खों कोनऊं टिरक में चढ़ के कानपुर भाग गओ रओ। इते पुलिस छतरपुर औ हरलपालपुर में ऊको ढूंढत फिरई हती, मनो बा तो उते कानपुर में दारू सूंट रओ हतो। फेर एक दिनां बड़ो गजब को भओ। बा दारूखोर भड़या गांव लौट आओ। ऊने बा मुकुट बी मंदर खों दे दओ। पुलिस ने ऊंसे पूछी के अब तक कां रए औ अब काए लौटे औ संगे जा मुकुट लौटाबे की तुमें काए सूझी? सो ऊ भड़या ने मजे की किसां सुनाई। ऊने बताई के ऊके लिंगे पइसा ने हते औ ऊको दारू की तलब लग रई हती। सो ऊने बिगैर कछू सोचे-बिचारे मंदर में से मुकुट चुरा लओ औ कानपुर भाग गओ। उते एक चोरी को समान खरीदबे वारे खों मुकुट बेंचो औ पईसा ले के दारू पियन लगो। रात की बेरा जब बा सोओ सो ऊको लगो के कोनऊं सीना पे चढ़ो बैठो। साना पे चढ़ो बा मानुस बिगैर मुकुट के भगवान की मूरत घांई दिखा रओ तो। दो रातें औ जेई भओ। ईंसे बा दारूखोर डरा गओ। ऊके मन में आई के ऊसे गलती हो गई, अब ऊको मुकुट वापस कर दओ चाइए। मनो बा तो ऊको बेंच चुको हतो। ऊने सोची के अब का करो जाए? जो कऊं बा ऊ चोरबजार वारे से मांगबे जैहे सो बा न लौटाहे। सो ऊ दारूखोर ने बा चोरबजार वारे के इते सेंध लगाई औ मुकुट ले भगो। ईके बाद बा वापस गांव वापस पौंचो औ ऊने मुकुट सोई मंदर खों लौटा दओ। चोरी करबे के कारन ऊको सजा तो भई, मनो कर्री ने भई। उते के लोग कैत्ते के जो बा मुकुट ने लौटातो तो भगवान ऊको पटक-पटक के मारते। बाकी बा चोरबजार वारो सोई पकरो गओ। ऊके तो पइसा बी गए औ मुकुट बी गओ। औ पुलिस के डंडा परे सो अलग से। अब बुरए काम को बुरौ अंत तो होतई आए।
सो जे दो किसां सो हमें याद आ रई। अब आप ओरन जानतई आओ के जे किसां हमें याद काए आई? ठीक समझे आप ओरें! अरे रामलला के इते चंदा के पइसा में गड़बड़ी भई सो हमें जे दोईं घटना याद आ गईं। ऊंसई अपने इते जब कछू होत आए तो मुतकी पुरानी बातें याद आन लगत आएं। जैो कोऊं के इते कोनऊं दिल के दौरा से सांत हो गओ होए तो सबरे जने जो उते जुटत आएं बे अपनी-अपनी सुनान लगत आएं के हमाए फूफा के संगे बी ऐसोई भओ रओ, तो हमाई मौसी के संगे बी ऐसई भओ रओ। मनो कोनऊं के इते समै के पैले मोड़ा या मोड़ी पैदा हो जाए सो सबई खों याद आन लगत आए के हमाए इते बी ऐसो भओ रओ। ऐसे समै सबई जनमपतरी खोल के बैठ जात आएं के कोन के इते सतमासी भई औ कोन के इते अठमासा भओ। जो कोऊ एक खों मलेरिया हो जाए सा बाकी सब जनों खों अपनों-अपनों मलेरिया याद आन लगत आए। सो जे तो बड़ी बात आए। इत्ते नोंने रामलला। इत्तो नोंनो मंदर। इत्ते अच्छे से प्रानप्रतिष्ठा भई रई के आज लौं आंखन के आगे दिखात आए। बाकी हम आज लौं रामलला के दरसनों के लाने ने जा पाए। हमने एक भैयाजी से तो यां तक कै रखी आए के जो हमें संगे ने लिवा गए अरै दरसन ने कराई तो आपके लाने पाप परहे। बाकी सांची तो जा आए के जबे रामलला को बुलावो आहे तभई उते जाबे खों मिलहे औ तभईं दरसन हो पाहें। 
बाकी जब से हमने बा खबर सुनी के उते चंदा के पइसा को घपला हो गओ, तभई से हमें जे दोई किसां याद आन लगीं। सो का आए के जोन ने रामलला के चंदा के पइसा डकारे उनें पचहे नईं, जे बात तो तै कहाई। एक तो भड़याई ऊंसई बुरऔ काम आए, ऊपे से मंदर में भड़याई? ईसे बढ़के औ कछू बुरौ काम होई नईं सकत आए। सो हम अपने जी खों जेई तसल्लसी दे रए के एक न एक दिनां सबरे भड़या हरों खों सजा जरूर मिलहे। इते अंधेर बी औ देर बी आए, मनो उते देर भले होए पर अंधेर ने हुइए।         
बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हप्ता करबी बतकाव तब तक लौं जेई की जुगाली करो। मनो सोचियो जरूर के बे ओरें कित्ते ढीठ आएं के इत्ते पापुलर मंदर में घपला करे से जो उने डर नईं लगो? रामलला के पइसा चुरात समै उनको जी ने कांपो? अब रामलला उनखों दंड दैहें के नईं?    
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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Wednesday, July 1, 2026

चर्चा प्लस | हम कितने तैयार हैं प्राकृतिक आपदा से बचने के लिए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर


चर्चा प्लस 
हम कितने तैयार हैं प्राकृतिक आपदा से बचने के लिए?   
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                   
      एक दिन अचानक सभी के मोबाईल पर रेड अर्लट बजा। चेतावनी थी मौसम विभाग की ओर से। साथ ही मैसेज भी था कि तीन घंटे में तेज हवाएं चलेंगी। तीन क्या, तेरह घंटे निकल गए लेकिन रेड अलर्ट वाली तेज हवाएं नहीं चलीं। बहरहाल, लोगों को रेड अर्लट बजने का अनुभव तो हुआ। लेकिन यदि सही में तेज तूफानी हवाएं चलतीं तो आमजन को क्या करना चाहिए इसका उन्हें कोई पता नहीं था। चूंकि तूफानी हवाएं नहीं चलीं तो मामला हंसी-मजाक में दब गया। लेकिन प्रकृति कभी मजाक नहीं करती। इसका जाता उदाहरण वेनेजुएला में आया भूकंप है। गूगल के मौसम विभाग ने चेतावनी भी दी थी किन्तु हताहतों की संख्या दस हजार से अधिक रही। क्योंकि उन्हें पता नहीं था कि वे अपना बचाव कैसे करें? वेनेजुएला कैरेबियन प्लेट पर स्थित है। भूकंपों की यह श्रृंखला 7.2 तीव्रता के भूकंप से शुरू हुई और 39 सेकंड बाद पास ही में 7.5 तीव्रता का एक और भूकंप आया। वेनेजुएला सम्हल नहीं सका। क्या हम सम्हल सकेंगे?


24 जून  2026 को वेनेजुएला में  शाम के समय दो शक्तिशाली भूकंप आए। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (यूएसजीएस) के अनुसार पहले 7.1 और दूसरे 7.5 तीव्रता के भूकंप ने काराकास में कई इमारतें गिरा दीं। लोग सड़कों पर आ गए। सुनामी की चेतावनी भी जारी की गई। पहला भूकंप 7.1 तीव्रता का था, जिसका केंद्र मोरॉन समुदाय के पश्चिम में था। ये देश के कैरेबियन तट पर स्थित है, काराकास से करीब 168 किलोमीटर दूर। इसकी गहराई 13 किलोमीटर थी। कुछ मिनट बाद दूसरा और भी बड़ा 7.5 तीव्रता का भूकंप आया, जिसकी गहराई 10 किलोमीटर थी। केंद्र मोरॉन से 16 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में था। इन भूकंपों ने पूरे क्षेत्र में भारी तबाही मचाई। लोग सड़कों पर निकल आए, इमारतों की दीवारें गिर गईं और धूल के गुबार उठते दिखे। इसके साथ ही कई राज्यों में झटके महसूस किए गए, खासकर काराकास के अल्तामिरा इलाके में भारी नुकसान हुआ। लोगों से बाहर रहने और आफ्टरशॉक्स से सावधान रहने की अपील की गई।
भूकंप पृथ्वी की टेक्टॉनिक प्लेट्स की गति से होते हैं। वेनेजुएला कैरेबियन प्लेट और साउथ अमेरिकन प्लेट की सीमा पर स्थित है।  भूगर्भीय वैज्ञानिकों के अनुसार कैरेबियन प्लेट साउथ अमेरिकन प्लेट के सापेक्ष पूर्व दिशा में लगभग 20 मिलीमीटर प्रति वर्ष की गति से खिसक रही है। यह क्षेत्र मुख्य रूप से ट्रांसफॉर्म बाउंड्री है, जहां प्लेट्स एक-दूसरे के बगल से गुजरती हैं, जैसे सैन सेबेस्टियन और एल पिलार फॉल्ट स जब प्लेट्स फंस जाती हैं और तनाव बढ़ता है, तो अचानक फिसलन होती है, जिससे भूकंप आता है। इस बार के भूकंप उथले थे (10-13 किमी गहराई), इसलिए उनका प्रभाव ज्यादा था। उथले भूकंप सतह पर ज्यादा कंपन पैदा करते हैं। यह क्षेत्र सदियों से सक्रिय है। सन 1812 और 1900 में भी काराकास के आसपास 7$ तीव्रता के भूकंप आए थे. इस प्लेट बाउंड्री का बड़ा हिस्सा श्लॉक्डश् है यानी तनाव जमा हो रहा है, जो 8 तीव्रता तक के भूकंप पैदा कर सकता है। इस डबलेट इवेंट (फोरशॉक के तुरंत बाद मेनशॉक) ने ऊर्जा रिलीज की, जो क्षेत्र की जटिल भू-संरचना का नतीजा है। उत्तर पश्चिम और दक्षिण पूर्व दिशा की सहायक फॉल्ट्स भी यहां सक्रिय हैं, जो स्ट्राइक-स्लिप मोशन पैदा करती हैं।
ध्यान देने की बात यह है कि वेनेजुएला ‘‘रिंग ऑफ फायर’’ का हिस्सा नहीं है,  जहां भूकंप, विशेष रूप से उच्च तीव्रता वाले भूकंप, अपेक्षाकृत आम हैं। यही कारण है कि इस तीव्रता का भूकंप वेनेजुएला जैसे स्थान पर जापान की तुलना में कहीं अधिक नुकसान पहुंचा। क्योंकि ‘‘रिंग ऑफ फायर’’  में या उसके निकट होने कारण जापान इस प्रकार की घटनाओं के लिए कहीं अधिक तैयार रहता है। वहां बच्चों को भी स्कूल में प्रशिक्षण्या दिया जाता है कि भूकंप की चेतावनी मिलने पर स्वयं को किस तरह सुरक्षित रहना है। हमारे देश में आम नागरिकों को नही पता कि बाढ़, भूकेप या ट्विस्टर आने पर किस तरह अपना बचाव करना है? 
ऐसा नहीं है कि कैरेबियन प्लेट में पहले कभी भूकंप नहीं आए, कैरेबियन प्लेट के दक्षिणी भाग में बड़े भूकंप आते रहते हैं। पिछले 100 वर्षों में इस क्षेत्र में 7 या उससे अधिक तीव्रता के पांच भूकंप आ चुके हैं। सितंबर 2025 में, उत्तरी वेनेजुएला में दो भूकंपों का एक साथ कहर बरपा लेकिन इसकी तीव्रता वर्तमान भूकंप से कम थी यानी रिक्टर स्केल पर 6.2/6.3 तीव्रता। यद्यपि 6.3 तीव्रता का भूकंप भी बड़ा होता है, लेकिन यह प्रायः व्यापक, विनाशकारी क्षति का कारण नहीं बनता है। 7.5 तीव्रता का  भूकंप अन्य भूकंपों की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली होता है।  इसमें खराब ढंग से निर्मित या बिना सुदृढ़ीकरण वाली इमारतों को भारी नुकसान पहुंचता है। जिससे अधिक जनहानि भी होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस वर्ष की घटना तीव्रता और उत्सर्जित ऊर्जा के आधार पर पिछले वर्ष की तुलना में कम से कम 63 गुना अधिक शक्तिशाली थी । उत्तरी वेनेजुएला में आए इस भूकंप से प्रभावित क्षेत्र के बारे में यूएसजीएस के  आकलन के अनुसार, ष्कुल मिलाकर, इस क्षेत्र की आबादी भूकंप के झटकों के प्रति संवेदनशील संरचनाओं में रहती है, हालांकि कुछ संरचनाएं भूकंप प्रतिरोधी भी हैं। सबसे अधिक संवेदनशील भवन प्रकार बिना सुदृढ़ीकरण वाली ईंटों की चिनाई और मिट्टी के ब्लॉक से निर्मित हैं।
2018 में,  7.3 तीव्रता का भूकंप वेनेजुएला के उत्तर-पश्चिमी हिस्से के कम आबादी वाले क्षेत्र (काराकास क्षेत्र में नहीं) के तट से काफी दूर उत्तर में आया था। इस घटना के परिणामस्वरूप मध्यम स्तर की क्षति हुई और कुछ लोगों की मौत हुई।
सन 1997 में,  कैरियाको के उत्तर में अंतर्देशीय क्षेत्र में 6.9 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसके परिणामस्वरूप कम से कम 81 लोगों की मौत  हुई थी।  सन 1967 में, तटरेखा के पास 6.6 तीव्रता का भूकंप आया, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 240 लोगों की मौतें हुई और ऊंची-ऊंची अपार्टमेंट इमारतों के ढहने सहित व्यापक क्षति हुई थी। सन् 97 वर्ष पूर्व, सन् 1929 में, समुद्र तट से दूर 6.7 तीव्रता का भूकंप आया था, जिसके परिणामस्वरूप सुनामी भी आई थी। ताजा भूकंप यानी जून 2026 में  आए दोहरे भूकंपों की घटना वेनेजुएला के आबादी वाले हिस्सों में, समुद्र तट से दूर नहीं, बल्कि अंतर्देशीय क्षेत्र में हुई, यह एक 7.5 तीव्रता के भूकंप से होने वाले दोहरे भूकंपों की तुलना में अधिक समय तक चली और इसलिए पिछली सदी में आए किसी भी भूकंप की तुलना में कहीं अधिक प्रभावशाली रही। यूएसजीएस का अनुमान है कि मृतकों की संख्या 1,000 से अधिक हो जाएगी और संभावित रूप से 10,000 से भी अधिक हो सकती है।
वेनेजुएला में आए भीषण भूकंप का भारतीय उपमहाद्वीप की जियोलॉजिकल (भूगर्भीय) संरचना से सीधा संबंध नहीं है, लेकिन भूवैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों के अनुसार यह भारत के लिए सजग रहने और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की एक बहुत बड़ी चेतावनी जरूर है।
वेनेजुएला में जो तबाही हुई, वह हमें निम्नलिखित कारणों से भारतीय उपमहाद्वीप के लिए सबक देती है कि भारत में हिमालयी क्षेत्र, उत्तर-पूर्व के राज्य, अंडमान-निकोबार, गुजरात, कच्छ और दिल्ली-एनसीआर अत्यधिक संवेदनशील भूकंपीय ज़ोन 4, 5  में आते हैं। इन क्षेत्रों के नीचे इंडियन प्लेट लगातार यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है, जिससे कभी भी वेनेजुएला जैसे या उससे भी बड़े तीव्र झटके (8.0$ मैग्नीट्यूड) आ सकते हैं।
वेनेजुएला के भूकंप के कुछ दिन दिल्ली, एमसीआर और उत्तर भारत के कई शहरों में भूकंप के झटके महसूस किए गए। वेनेजुएला में आए भूकंप का केंद्र धरती की सतह से काफी उथला था (10 से 20 किलोमीटर की गहराई), जिसके कारण धरती की सतह पर कंपन बहुत भयानक हुआ। हिमालय और उत्तर भारत के भूकंप भी अक्सर उथले होते हैं, जो अत्यधिक नुकसान पहुंचा सकते हैं।
वेनेजुएला में भारी तबाही का एक बड़ा कारण वहां की इमारतों का भूकंपरोधी न होना था। ठीक इसी तरह, दिल्ली-एनसीआर और देश के अन्य संवेदनशील शहरों में अधिकांश निर्माण अनियोजित हैं। यदि भारत में ऐसा भूकंप आता है, तो जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है। भूकंपीय संवेदनशीलतारू नेशनल सेंटर फॉर सिस्मोलॉजी के अनुसार, भारत के 29 प्रमुख शहर उच्च भूकंप जोखिम वाले क्षेत्रों में स्थित हैं।
प्रकृति में होने वाले निरंतर परिवर्तन जिन्हें हम जलवायु परिवर्तन भी कहते हैं लगातार किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा की चेतावनी दे रहा है लेकिन हम कागजी कार्यवाहियों में व्यस्त हैं। न तो गगनचुंबी इमारतों की ठीक से जांच होती है कि वे भूकंपरोधी हैं या नहीं और न भूकंप के समय सुरक्षित रहने का उपाय आमजन को सिखाया जाता है। यह कटु सत्य है कि जिन शहरों में इमारतों के आग से बचाव के उपाय की ही जांच नहीं की जाती है वहां प्राकृतिक आपदा से बचाव कहां सिखाया जाएगा? अब खुद आमजन को प्राकृतिक आपदा से बचना सीखना होगा जबकि यह आपदाप प्रबंधन तथा जिला प्रशासनों का दायित्व है।                                -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 01.07.2026 को प्रकाशित) 
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