Saturday, January 31, 2026
टॉपिक एक्सपर्ट | रहिमन छिड़ियां राखिए, बिन छिड़ियां सब सून | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
Thursday, January 29, 2026
बतकाव बिन्ना की | भैया हरों, ऊपर वारे से डरो तनक | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
Wednesday, January 28, 2026
चर्चा प्लस | अपराध की पहली सीढ़ी घर से ही शुरू होती है | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
Sunday, January 25, 2026
शून्यकाल | हमारा भी दायित्व है अपने गणतंत्र के अनुरूप बनना | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
Saturday, January 24, 2026
टॉपिक एक्सपर्ट | गरब करो संविधान सभा के मेंबर रए अपने गौर बब्बा | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
Thursday, January 22, 2026
चर्चा प्लस | बाज़ारवाद को कोसते और कर्तव्यों की ब्रांडिंग करते हम | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
बाज़ारवाद को कोसते और कर्तव्यों की ब्रांडिंग करते हम
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
यदि राज्य एक ब्रांड है, बेटी बचाओ एक ब्रांड है, स्वच्छता मिशन एक ब्रांड है, शौचालय का उपयोग एक ब्रांड है, निर्मलजल एक ब्रांड है और अतुल्य भारत अभियान एक ब्रांड है तो हम अपने युवाओं से राष्ट्रप्रेम की आशा रखें अथवा बाज़ारवाद की? हमने अपने सुरक्षा बलों को भी ब्रांड बना दिया और उनके लिए ब्रांड एम्बेसडर भी अनुबंधित कर लिए गए। जैसे- सीआरपीएफ की ब्रांड एम्बेसडर है पी. वी. सिन्धु तो बीएसएफ के ब्रांड एम्बेसडर है विराट कोहली रहे हैं। यदि राष्ट्र और मानवता के प्रति भावनाएं एवं कत्र्तव्य भी ब्रांड बन कर प्रचारित होने का समय हमने ओढ़ लिया है जो भारतीय विचार संस्कृति के मानक पर यह ब्रांडिंग कहां सही बैठती है, यह विचारणीय है। फिर बाज़ारवाद को क्यों कोसना? .
हम आज ब्रांडिग के समय में जी रहे हैं। हमारे शौच की व्यवस्था से ले कर राज्य, कत्र्तव्य और संवेदनाओं की भी ब्रांंिडग होने लगी है। ब्रांड क्या है? ब्रांड उत्पाद वस्तु की बाजार में एक विशेष पहचान होती है जो उत्पाद की क्वालिटी को सुनिश्चित करती है, उसके प्रति उपभोक्ताओं में विश्वास पैदा करती है। क्यों कि उत्पाद की बिक्री की दशा ही उत्पादक कंपनी के नफे-नुकसान की निर्णायक बनती है। कंपनियां अपने ब्रांड को बेचने के लिए और अपने ब्रांड के प्रति ध्यान आकर्षित करने के लिए ‘ब्रांड एम्बेसडर’ अनुबंधित करती हैं। यह एक पूर्णरुपेण बाज़ारवादी आर्थिक प्रक्रिया है। कमाल की बात यह है कि ब्रांडिग हमारे जीवन में गहराई तक जड़ें जमाता जा रहा है। इसी लिए नागरिक कत्र्तव्यों, संवेदनाओं एवं दायित्वों की भी ब्रांडिंग की जाने लगी है, गोया ये सब भी उत्पाद वस्तु हों।आजकल राज्यों के भी ब्रांड एम्बेसडर होते हैं। जबकि राज्य एक ऐसा भू भाग होता है जहां भाषा एवं संस्कृति के आधार पर नागरिकों का समूह निवास करता है। - यह एक अत्यंत सीधी-सादी परिभाषा है। यूं तो राजनीतिशास्त्रियों ने एवं समाजवेत्ताओं ने राज्य की अपने-अपने ढंग से अलग-अलग परिभाषाएं दी है। ये परिभाषाएं विभिन्न सिद्धांतों पर आधारित हैं। राज्य उस संगठित इकाई को कहते हैं जो एक शासन के अधीन हो। राज्य संप्रभुतासम्पन्न हो सकते हैं। जैसे भारत के प्रदेशों को ’राज्य’ कहते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार राज्य की उत्पत्ति का एकमात्र कारण शक्ति है। इसके अलावा युद्ध को राज्य की उत्पत्ति का कारण यह सिद्धांत मानता है जैसा कि वाल्टेयर ने कहा है प्रथम राजा एक भाग्यशाली योद्धा था। इस सिद्धांत के अनुसार शक्ति राज्य की उत्पत्ति का एकमात्र आधार है शक्ति का आशय भौतिक और सैनिक शक्ति से है। प्रभुत्व की लालसा और आक्रमकता मानव स्वभाव का अनिवार्य घटक है। प्रत्येक राज्य में अल्पसंख्यक शक्तिशाली शासन करते हैं और बहुसंख्यक शक्तिहीन अनुकरण करते हैं। वर्तमान राज्यों का अस्तित्व शक्ति पर ही केंद्रित है।
राज्य को परिभाषित करते सामाजिक समझौता सिद्धांत को मानने वालों में थाॅमस हाब्स, जॉन लॉक, जीन जैक, रूसो आदि का प्रमुख योगदान रहा। इन विचारकों के अनुसार आदिम अवस्था को छोड़कर नागरिकों ने विभिन्न समझौते किए और समझौतों के परिणाम स्वरुप राज्य की उत्पत्ति हुई। वहीं विकासवादी सिद्धांत मनोवैज्ञानिक, ऐतिहासिक और समाजशास्त्रीय प्रमाणों पर आधारित है। इसके अनुसार राज्य न कृत्रिम संस्था है, न ही देवीय संस्था है। यह सामाजिक जीवन का धीरे-धीरे किया गया विकास है इसके अनुसार राज्य के विकास में कई तत्व जैसे कि रक्त संबंध धर्म शक्ति राजनीतिक चेतना आर्थिक आधार का योगदान है पर आज सबके हित साधन के रूप में विकसित हुआ। ऐसा राज्य क्या कोई उत्पाद वस्तु हो सकता है? जिसके विकास के लिए ब्रांडिंग की जाए?
शौचालय, और स्वच्छता की ब्राडिंग किया जाना और इसके लिए ब्रांड एम्बेसडर्स को अनुबंधित किया जाना बाजारवाद का ही एक नया रूप है। बाज़ारवाद वह मत या विचारधारा जिसमें जीवन से संबंधित हर वस्तु का मूल्यांकन केवल व्यक्तिगत लाभ या मुनाफ़े की दृष्टि से ही किया किया जाता है; मुनाफ़ा केंद्रित तंत्र को स्थापित करने वाली विचारधारा; हर वस्तु या विचार को उत्पाद समझकर बिकाऊ बना देने की विचारधारा। बाजारवाद में व्यक्ति उपभोक्ता बनकर रह जाता है, पैसे के लिए पागल बन बैठता है, बाजारवाद समाज को भी नियंत्रण में कर लेता है, सामाजिक मूल्य टूट जाते हैं। बाजारवाद एक सांस्कृतिक पैकेज होता है। जो उपभोक्ता टॉयलेट पेपर इस्तेमाल करता है, वह एयर कंडीशनर में ही सोना पसन्द करता है, एसी कोच में यात्रा करता है और बोतलबंद पानी साथ लेकर चलता है। इस संस्कृति के चलते लौह उत्खनन से लेकर बिजली, कांच और ट्रांसपोर्ट की जरूरत पड़ती है। यूरोप और अमेरिका में लाखों लोग केवल टॉयलेट पेपर के उद्योग में रोजगार पाते हैं। यह सच है कि बाजारवाद परंपरागत सामाजिक मूल्यों को भी तोड़ता है।
जीवनस्तर में परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। प्रत्येक व्यक्ति भौतिक सुखों के पीछे भागता है। उसकी इसी प्रवृत्ति को बाज़ार अपना हथियार बनाता है। यदि बाजार का स्वच्छता से नुकसान हो रहा है तो वह स्वच्छता को क्यों बढ़ने देगा? पीने का पानी गंदा मिलेगा तो इंसान वाटर प्यूरी फायर लेगा, हवा प्रदूषित मिलेगी तो वह एयर प्यूरी फायर लेगा। इस तरह प्यूरी फायर्स का बाज़ार फलेगा-फूलेगा। इस बाजार में बेशक नौकरियां भी मिलेंगी लेकिन बदले में प्रदूषित वातावरण बना रहेगा और सेहत पर निरंतर चोट करता रहेगा तो इसका खामियाजा भी तो हमें ही भुगतना होगा।
स्वच्छता बनाए रखना एक नागरिक कत्र्तव्य है और एक इंसानी पहचान है। यदि इसके लिए भी ब्रांडिंग की जरूरत पड़े तो वह कत्र्तव्य या पहचान कहां रह जाता है? वह तो एक उत्पाद वस्तु है और जिसके पास धन है वह उसे प्राप्त कर सकता है, जिसके पास धन की कमी है वह स्वच्छता मिशन के बड़े-बड़े होर्डिंग्स के नीचे भी सोने-बैठने की जगह हासिल नहीं कर पाता है।
भ्रूण हत्या एवं बेटी बचाओ का सीधा संबंध हमारी मानवीयता एवं संवेदनशीलता से है। यह भावना हमारे भीतर स्वतः जागनी चाहिए अथवा सरकार जो इन अभियानों की दिशा में प्रोत्साहनकारी कार्य करती है उन्हें संचालित होते रहना चाहिए। जब बात आती है इन विषयों के ब्रांड एम्बेसडर्स की तो फिर प्रश्न उइता है कि क्या बेटियां उपभोक्ता उत्पाद वस्तु हैं या फिर भ्रूण की सुरक्षा के प्रति हमारी संवेदनाएं महज विज्ञापन हैं। आज जो देश में आए दिन आपराधिक घटनाएं बढ़ रही हैं तथा संवेदना का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है, उसका सबसे बड़ा कारण यही है कि जाने-अनजाने हमारी तमाम कोमल संवेदनाएं बाजार के हाथों गिरवी होती जा रही हैं।
बात उत्पादन की बिक्री की हो तो उचित है किन्तु बाजार से हो कर गुजरने वाले कत्र्तव्यों में दिखावा अधिक होगा और सच्चाई कम। ब्रांड एम्बेसडर अनुबंधित करने के पीछे यही धारणा काम करती है कि जितना बड़ा अभिनेता या लोकप्रिय ब्रांड एम्बेसडर होगा उतना ही कम्पनी को आय कमाने में मदद मिलती है क्योंकि लोग वो सामान खरीदते है। अमूमन जितना बड़ा ब्रांड होता है उतना ही महंगा या उतना ही लोकप्रिय व्यक्ति ब्रांड एम्बेसडर बनाया जाता है क्योंकि बड़ा ब्रांड अधिक पैसे दे सकता है जबकि छोटा ब्रांड कम और ऐसा इसलिए क्योंकि कोई भी व्यक्ति जो ब्रांड का प्रतिनिधित्व करता है, उसकी फीस करोड़ों में होती है। एक तो अगर जनता उस व्यक्ति को अगर रोल मॉडल मानती है तो ऐसे में लोगो के दिलों में जगह बनाना आसान हो जाता है।
सड़क सुरक्षा अभियान के ब्रांड एम्बेसडर है अक्षय कुमार, फिट इंडिया अभियान के ब्रांड एम्बेसडर कौन रहे हैं सोनू सूद, पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास के ब्रांड एम्बेसडर मैरीकॉम, असम राज्य के ब्रांड एम्बेसडर रही हैं हिमा दास, अरुणाचल प्रदेश राज्य के ब्रांड एम्बेसडर जॉन अब्राहम, हरियाणा (योग और आयुर्वेद) के ब्रांड एम्बेसडर रहे बाबा रामदेव, तेलंगाना राज्य के ब्रांड एम्बेसडर सानिया मिर्जा और महेश बाबू। इसी प्रकार सिक्किम राज्य के ब्रांड एम्बेसडर ए. आर. रहमान, गुड्स एण्ड सर्विस टैक्स (जीएसटी) के ब्रांड एम्बेसडर अमिताभ बच्चन, हरियाणा के स्वास्थ्य कार्यक्रम के ब्रांड एम्बेसडर गौरी शोरान, स्वच्छ आदत, स्वच्छ भारत के ब्रांड एम्बेसडर काजोल, स्वच्छ आंध्र मिशन के ब्रांड एम्बेसडर पी. वी. सिंधु, स्वच्छ भारत मिशन की ब्रांड एम्बेसडर शिल्पा शेट्टी, स्वच्छ भारत मिशन उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड के ब्रांड एम्बेसडर अक्षय कुमार, भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट (वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट) की ब्रांड एम्बेसडर दीया मिर्जा, असम राज्य पर्यटन की ब्रांड एम्बेसडर प्रियंका चोपड़ा, स्किल इंडिया अभियान की भी ब्रांड एम्बेसडर है प्रियंका चोपड़ा, ‘माँ’ अभियान की ब्रांड एम्बेसडर माधुरी दीक्षित, हेपेटाइटिस-बी उन्मूलन के ब्रांड एम्बेसडर अमिताभ बच्चन, अतुल्य भारत अभियान के ब्रांड एम्बेसडर है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भारत के पशुपालन बोर्ड के ब्रांड एम्बेसडर है अभिनेता रजनीकांत, किसान चैनल के ब्रांड एम्बेसडर है अमिताभ बच्चन, स्वच्छ साथी कार्यक्रम की ब्रांड एम्बेसडर दीया मिर्जा, निर्मल भारत अभियान की ब्रांड एम्बेसडर विद्या बालन, डिजिटल भारत की ब्रांड एम्बेसडर कृति तिवारी, उत्तर प्रदेश के समाजवादी किसान बीमा योजना के ब्रांड एम्बेसडर रहे अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दकी।
ब्रांडिग का क्रम यही थम जाता तो भी गनीमत था। गोया हमने अपने सुरक्षा बलों को भी ब्रांड बना दिया और उनके लिए ब्रांड एम्बेसडर भी अनुबंधित कर लिए गए। जैसे- सीआरपीएफ की ब्रांड एम्बेसडर पी. वी. सिन्धु और बीएसएफ के ब्रांड एम्बेसडर विराट कोहली। यदि हमने सुरक्षा बलों के लिए सिर्फ एम्बेसडर यानी राजदूत रखा होता तो बात थी लेकिन हमने तो ‘‘ब्रांड’’ एम्बेसडर रखा।
यदि राज्य एक ब्रांड है, बेटी बचाओ एक ब्रांड है, स्वच्छता मिशन एक ब्रांड है, शौचालय का उपयोग एक ब्रांड है, निर्मलजल एक ब्रांड है और अतुल्य भारत अभियान एक ब्रांड है तो हम अपने युवाओं से राष्ट्रप्रेम की आशा रखें अथवा बाज़ारवाद की? यदि राष्ट्र और मानवता के प्रति भावनाएं एवं कत्र्तव्य भी ब्रांड बन कर प्रचारित होने का समय हमने ओढ़ लिया है जो भारतीय विचार संस्कृति के मानक पर यह ब्रांडिंग कहां सही बैठती है, यह विचारणीय है और फिर क्यों कोसते हैं बाज़ारवाद को जिसका बुनियादी आधार ही ब्रांडिंग होता है। हमें सोचना चाहिए अपने इस दोहरेपन के बारे में।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 22.01.2026 को प्रकाशित)
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बतकाव बिन्ना की | एक ने कई औ सैंकड़न ने दोहराई | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
Tuesday, January 20, 2026
पुस्तक समीक्षा | तन्हाईयों के स्वर को शब्दों में पिरोतीं बेहतरीन ग़ज़लें | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा
तन्हाईयों के स्वर को शब्दों में पिरोतीं बेहतरीन ग़ज़लें
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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गजल संग्रह - तन्हाईयाँ आवाज देती हैं
शायर - विनीत मोहन फ़िक्र सागरी
प्रकाशक - के.बी.एस. प्रकाशन दिल्ली, 111 ए.जी-एफ, आनन्द पर्वत, इंडस्ट्रियल एरिया, दिल्ली-110005
मूल्य - 200/- पेपर बैक, 300/- हार्डबाउंड
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विनीत मोहन औदिच्य उर्दू शाइरी में जिनका तख़ल्लुस “फ़िक्र सागरी” है, एक बेहतरीन अनुवादक और उम्दा सॉनेटियर हैं। इन्होंने पाब्लो नेरूदा के सॉनेट्स का अनुवाद किया है। स्वयं भी सॉनेट्स लिखते हैं तथा विभिन्न समाचारपत्रों, पत्रिकाओं व वेबसाइट्स में रचनाओं का सतत प्रकाशन होता रहता है। 10 फरवरी, 1961 करहल, मैंनपुरी, उ.प्र. में जन्में तथा वर्तमान में सागर, मध्यप्रदेश में निवासरत विनीत मोहन औदिच्य की ग़ज़लों से पहले मैंने उनके द्वारा अनूदित सॉनेट्स तथा उनके मौलिक सॉनेट पढ़े थे। उसी दौरान मुझे विनीत मोहन औदिच्य उर्फ फ़िक्र सागरी की ग़ज़लों को पढ़ने का भी अवसर मिला और उनकी बहुमुखी प्रतिभा से मेरा परिचय हुआ। गुजराती भाषी विनीत मोहन औदिच्य को अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं पर सामान अधिकार है। वर्तमान में वे शासकीय महाविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य व भाषा का अध्यापन कार्य कर रहे हैं। अब तक उनके काव्यात्मक अनुवाद सहित 11 काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनके कृतित्व के लिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर की कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।
‘‘तन्हाईयाँ आवाज देतीं हैं’’ ग़ज़ल संग्रह की ग़ज़लों का आकलन आरम्भ किया जाए उस ग़ज़ल से जिससे संग्रह का नामकरण हुआ है। यद्यपि यह संग्रह की कुल 105 ग़ज़लों में 42 वीं ग़ज़ल है। इस ग़ज़ल में रूमानियत का वह पहलू है जिससे लगभग हर व्यक्ति को अपने जीवन में कभी न कभी हो कर गुज़रना पड़ता है। इस ग़ज़ल में विछोह का वह स्वर है जो अपने किसी भी प्रिय से बिछड़ जाने के दुख को प्रतिध्वनित करता है। ग़ज़ल के कुछ शेर देखें -
सुरों में गूंजतीं शहनाइयाँ आवाज देती हैं
मुझे बागों में अब अमराइयाँ आवाज देती हैं
चहकता था मुहब्बत से जो सुहबत में कभी तेरी
मुझे उस घर की अब तन्हाइयाँ आवाज देती हैं
हुए पागल-दीवाने हम कहाँ था होश इतना भी
न जाना इश्क की रुसवाइयाँ आवाज देतीं हैं
अभी भी उन पुरानी यादों की छत से मुझे अक्सर
तेरी शोखी भरी अंगड़ाइयाँ आवाज देतीं हैं
यूं भी यह अकेलेपन को जीने के दौरान स्मृतियों एवं आत्मसंवाद का वे पल होते हैं जब ऐसा प्रतीत होता है कि तनहाई ही साथी बन कर बात कर रही है, आवाज़ दे रही है। इस ग़ज़ल संग्रह की ग़ज़लों पर ज़दीद और ‘‘रिवायती ख़़यालात से सजी ग़ज़लों का मज़्मुआ’’ शीर्षक से वरिष्ठ शाइर प्रो. डॉ. गजाधर सागर ने लिखा है कि - ‘‘तन्हाईयाँ आवाज़ देतीं हैं’। मेरे दिल को छू गए हैं। संग्रह का शीर्षक ‘‘तन्हाइयाँ आवाज देतीं हैं’’ यह दर्शाता है कि सिर्फ भीड़, बातचीत, शोर अथवा तबादला-ए-ख़यालात में ही आवाज़ नहीं गूँजती है वरन् तन्हाईयों, ख़ामोशियों और अकेलेपन में भी आवाज़ सुनाई देती है बस उसे सुनने की ताब सुनने वालों में होना चाहिए।’’
इसी संग्रह की भूमिका में चर्चित शाइर देवेन्द्र माँझी ने ‘‘अनेक विषय-वस्तुओं के फूल खिले हैं ‘तन्हाईयाँ आवाज देती हैं’ के गजल-उद्यान में” के रूप में लिखा है कि - “सुप्रसिद्ध कवि विनीत मोहन औदिच्य की ग़ज़लों का ऐसा संग्रह है, जिसके अश्आर प्रेम-रस की गंगा तो बहाते ही हैं, साथ ही साथ सामाजिक-राजनीतिक और धार्मिक पहलुओं पर भी अपनी पैनी नजर गड़ाए रखते हैं। शब्दों का किसी बहर विशेष में जमावड़ा कर देने भर से ग़ज़ल नहीं हो जाती, जिसके लिए कोमल और चमत्कारिक लहजे की भी आवश्यकता होती है-इस बात को कवि श्री औदिच्य जी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं, तभी उन्होंने अपने रचना-धर्मिता के सफ़र में शब्दों को बहुत देखभाल कर और ठोंक-बजाकर अपना हमसफर बनाया है।’’
वहीं, “शाइर की कलम से” में अपनी बात करते हुए फ़िक्र सागरी लिखते हैं कि- “ख़ुशबू-ए-सुखन, कारवाँ-ए-सुखन, कारवाँ-ए-ग़ज़ल, अंदाज़-ए-सुखन व अंदाज़-ए- ग़ज़ल के बाद, तन्हाईयाँ आवाज़ देतीं हैं मेरा छठवाँ ग़ज़ल मज़्मुआ है जो शाया होने जा रहा है। अपनी इन ग़ज़लों में मैंने अपनी ज़िन्दगी के मुख़्तलिफ रंगों के अहसासात को शामिल किया है। उन्यान चाहे जो हो, मुहब्बत, ज़दीदी, रवायती समाजी, सियासी, इंसानियत के ख़िलाफ नाइंसाफ़ी या ज़ुल्म, ऐसी कोशिश की गई है कि ज़िन्दगी का कोई भी पहलू नहीं छूटे।”
बेशक़ शाइर फ़िक्र सागरी ने ज़िन्दगी के हर पहलू को समेटने का प्रयास किया है फिर भी प्रेम की कोमल भावनाएं उभर कर प्रभावी ढंग से सामने आई हैं जिनमें मिलन की मधुरता भी है और वियोग की पीड़ा भी। इश्क़ में क्या हाल होता है इसकी बानगी में देखिए संग्रह की एक ग़ज़ल के कुछ शेर-
हुस्न की बेशुमार चाहत में
दिल लुटाते रहे शराफ्त में।
इश्क में दर्द कम नहीं होता
मर्ज़ बढ़ने लगा है उल्फत में।
हाल सुनता कहाँ है वो मेरा
जान अब आ पड़ी है आफत में।
मोहब्बत में परस्पर मिल कर दुख-सुख बांटने और एक-दूसरे की भावनाओं को समझने का तीव्र आग्रह निहित होता है। इस स्थिति को शाइर ने बड़ी ख़ूबसूरती से बयान किया है-
ज़ीस्त के हर गम को भी साझा करे
मुझसे मिलने का भी वो वादा करे।
चैन ही मिलता नहीं है अब मुझे
कौन है जो दर्द को आधा करे
हों भले जज़्बात दिल के अर्श पर
बात तो तब है बयां सादा करे
छोड़कर दामन चला अब किसलिए
कुर्ब में वो बैठ कर चर्चा करे
फ़िक्र सागरी व्यष्टि की बात करते-करते बड़े स्वाभाविक ढंग से समष्टि की बात करने का महारत रखते हैं। वर्तमान दशा में मरती संवेदनाएं एवं गिरते चरित्र को बखूबी रेखांकित किया है शाइर ने। उदाहरण के लिए उनके ये शेर देखें-
वो सदा अपने ही किरदार से भारी निकला
उसके पैरों के तले रेत से पानी निकला।
इस मुहब्बत के जो अल्फाज़ कई खोजे तो
सनसनीखेज इबारत में मआनी निकला।
फलसफा ज़ीस्त का जो हमको सुनाने आया
वो भी बंदर को लिए एक मदारी निकला।
भीड़ भगवान के मंदिर में बड़ी देखी तो
भोग की चाह में अंदर से शराबी निकला।
इंसानों में अवसरवादिता इस तरह पैंठ गई है कि हर दूसरा इंसान इंसानियत खो कर दूसरे का अधिकार छीनने को उतारू हो उठता है। यही कारण है कि हर इंसान परस्पर एक-दूसरे से डरने लगा है।
जाने ये कैसा जमाने का असर लगता है
आज इंसान को इंसान से डर लगता है।
मेरी फितरत ही नहीं शोर-शराबा करना
दर्द होता है मगर जख़्म जिधर लगता है।
इसी हालात को और अधिक बयां करते हुए फ़िक्र सागरी ये शेर कहते हैं कि -
ये ताज़ा ख़ौफ़ का मंज़र वही है
चुभा जो पीठ में खंज़र वही है
नहीं कुछ बोलता मुँह से कभी जो
वो कड़वा सच न बोले डर वही है
अगर माहौल बिगड़ता है तो उसकी जिम्मेदारी से सियासत को बरी नहीं किया जा सकता है। इसी कटु यथार्थ पर शाइर ने कहा है-‘‘चुनी अंधों ने हो सरकार पहले तो नहीं देखी / तनी हो जुल्म की तलवार पहले तो नहीं देखी।’’ सारी अव्यवस्थाओं के पीछे भी झांक कर देखते हुए फ़िक्र सागरी उनका कारण तलाशते हैं और उन्हें कारण मिलता भी है कि -‘‘रात दिन जुल्मों को सहता आदमी / है मयस्सर कब यहाँ सबको खुशी। / बेटियों की लुट रही इज़्जत मगर / छा रही सारे जहाँ में ख़ामुशी।’’ सो, जब ऐसा वातावरण होगा तो मोहब्बत रुस्वा और बदहाल तो होगी ही।
विनीत मोहन औदिच्य ‘‘फ़िक्र सागरी’’ का यह ग़ज़ल संग्रह ‘‘तन्हाईयां आवाज़ देती हैं’’ में प्रेम की निज भावनाओं से ले कर जीवन के विभिन्न स्तरों पर छाई दुरावस्था की बात करती ग़ज़लें हैं। चूंकि एकांत विचार मंथन एवं भावों के आकलन का अवसर देता है इसलिए तन्हाई के स्वर को पिरोते हुए फ़िक्र सागरी ने बेहतरीन ग़ज़लें पाठकों के लिए दी हैं। उर्दू ज़मीन की इन ग़ज़लों को देवनागरी लिपि में सहजता से पढ़ा जा सकता है और इन्हें ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए। खा़लिस उर्दू के कठिन शब्दों के होते हुए भी ग़ज़लों के मर्म को समझना आसान है क्यों कि इन्हें इस सहजता से कहा गया है कि उन शब्दों का भावार्थ सुगमता से समझा जा सकता है।
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Saturday, January 17, 2026
टॉपिक एक्सपर्ट | जबरा मारे औ रोन न दए | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | पत्रिका | बुंदेली कॉलम
Friday, January 16, 2026
शून्यकाल | आज फिर आवश्यकता है ‘ढाई आखर’ को समझने की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर
Thursday, January 15, 2026
चर्चा प्लस | दो पीढ़ियों की परस्पर दूरियां मिटाती है मकर संक्रांति | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस | दो पीढ़ियों की परस्पर दूरियां मिटाती है मकर संक्रांति | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर
चर्चा प्लस
दो पीढ़ियों की परस्पर दूरियां मिटाती है मकर संक्रांति
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
मकर संक्रांति तिल-गुड़, स्नान और पतंग का त्यौहार है। यूं तो सूर्य के धनु से मकर राशि में प्रवेश को उत्तरायण माना जाता है और सूर्य के उत्तरायण में प्रवेश के संक्रांतिकाल को मकर संक्रांति के पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह मात्र धार्मिक पर्व नहीं वरन् एक सामाजिक पर्व है और इसमें निहित है संदेश दो पीढ़ियों के बीच निकटता लाने का। यह संदेश आज के परिवेश में बेहद महत्वपूर्ण है जब आज परिवार बिखर रहे हैं, वृद्धाश्रम खुलते जा रहे हैं और बड़ों ओर बच्चों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं जेनेरेशन गेप के नाम पर। मकर संक्रांति में पिता-पुत्र के पारस्परिक मेल की रोचक कथा भी मौजूद है जिसे जानना और समझना जरूरी है।
सूर्य पर आधारित मकर संक्रांति का भारतीय संस्कृति में बहुत महत्व माना गया है। वेद और पुराणों में भी इस दिन का विशेष उल्लेख मिलता है। मकर संक्रांति खगोलीय घटना है, जिससे जड़ और चेतन की दशा और दिशा तय होती है। सूर्य के धनु से मकर राशि में प्रवेश को उत्तरायण माना जाता है। वर्ष को दो भागों में बांटा गया है। पहला उत्तरायण और दूसरा दक्षिणायन। उक्त दो अयन को मिलाकर एक वर्ष होता है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करने की दिशा बदलते हुए थोड़ा उत्तर की ओर बढ़ता जाता है, इसलिए इस काल को उत्तरायण कहते हैं। सूर्य है तो जीवन है। इसीलिए, सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना वैदिक ज्योतिष के अनुसार काफी महत्वपूर्ण घटना है। सूर्यदेव जिस दिन धनु से मकर राशि में पहुंचते हैं उसे मकर संक्रांति का दिन कहते हैं। सूर्य के मकर राशि में आते ही मलमास समाप्त हो जाता है। इसी दिन से ही देवताओं का दिन शुरू होता है, जो आषाढ़ मास तक रहता है। दक्षियायन देवताओं के लिए रात्रि का समय होता है। ठीक इसी समय से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायन हो जाता है। मकर संक्रांति को उत्तरायण भी कहते हैं, क्योंकि इस दिन से सूर्यदेव उत्तर दिशा की ओर बढ़ना शुरू कर देते हैं। इस दिशा परिवर्तन के समय को ही मकर संक्रांति कहते हैं।
मकर संक्रांति समूचे भारत में मनाया जाता है, चाहे इसका नाम प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग हो और इसे मनाने के तरीके भी भिन्न हों, किंतु यह बहुत ही महत्व का पर्व है। मकर संक्रांति को गुजरात में उत्तरायण, पंजाब में लोहड़ी पर्व, गढ़वाल में खिचड़ी संक्रांति और केरल में पोंगल के नाम से मनाया जाता है। वहीं सिंधी लोग इस त्योहार को तिरमौरी कहते हैं। इस अवसर पर गुजरात समेत कई राज्यों में पतंगें भी उड़ाई जाती है। इस समय से दिन बड़े और रात छोटी होने के साथ ही मौसम ठंडी से गर्मी की तरफ बढ़ने लगता है। मकर संक्रांति की विभिन्न परंपराओं में स्नान, दान का विशेष महत्व है, किन्तु इसके अलावा इसदिन पारंपरिक खिचड़ी और तिल के उपयोग से पकवान बनाने की भी मान्यता है। देश के हर कोने में अलग अलग तरीके से खिचड़ी और तिल के व्यंजन पकाए जाते हैं। इन्हें मकर संक्रांति के दिन बनाया जाता है और भगवान को भोग लगाने के बाद अगले दिन सूर्य उदय के पश्चात ही ग्रहण किया जाता है।
किन्तु मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी क्यों बनाई जाती है? इसदिन तिल के प्रयोग से तरह तरह के पकवान क्यों तैयार किए जाते हैं? इसके पीछे का कारण क्या है? आइए इनके पीछे छिपी पौराणिक कहानियों के बारे में जानते हैं।
कथा एक - श्रीमद्भागवत एवं देवी पुराण में दर्ज एक कथा के अनुसार शनि देव का हमेशा से ही अपने पिता सूर्य देव से वैर था। एक दिन सूर्य देव ने शनि और उसकी माता छाया को अपनी पहली पत्नी संज्ञा के पुत्र यमराज से भेद भाव करते हुए देख लिया। इससे नाराज होकर उन्होंने अपने जीवन से छाया और शनि को निकालने का कठोर फैसला लिया। इससे नाराज होकर शनि और छाया ने सूर्य को कुष्ठ रोग हो जाने का शाप दिया और वहां से चले गए। पिता को कुष्ठ रोग से परेशान होते देख यमराज ने तपस्या की। आखिरकार सूर्य देव कुष्ठ रोग से मुक्त हुए। किन्तु उनके मन में अभी भी शनी देव को लेकर क्रोध था। क्रोधित अवस्था में ही वे शनि देव के घर (कुंभ राशि में) गए और उसे जलाकर काला कर दिया। इसके बाद शनि और उनकी माता छाया को कष्ट भोगना पड़ा।
अपनी सौतेली मां और शनिदेव को दुख में देखकर यमराज ने उनकी मदद की। सूर्य देव को दोबारा उनसे मिलने भेजा। इस बार जब सूर्य देव वहां पहुंचे तो शनि देव ने काले तिल से उनकी पूजा की। चूंकि घर में सब कुछ जल चुका था, इसलिए शनि देव के पास केवल तिल ही थे। शनि की पूजा से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने शनिदेव को वरदान दिया और कहा कि तुम्हारे दूसरे घर ‘मकर’ में आने पर तुम्हारा घर धन-धान्य से भर जाएगा। इसी कारण से मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव की तिल से पूजा की जाती है और अगले दिन तिल का सेवन किया जाता है।
कथा दो - एक अन्य कथा के अनुसार शनिदेव का जन्म महर्षि कश्यप के अभिभावकत्व में कश्यप यज्ञ से हुआ। छाया शिव की भक्तिन थी। जब शनिदेव छाया के गर्भ में थे तो छाया ने भगवान शिव की इतनी कठोर तपस्या कि वे खाने-पीने की सुध तक उन्हें न रही। भूख-प्यास, धूप-गर्मी सहने के कारण उसका प्रभाव छाया के गर्भ में पल रहे शनि पर भी पड़ा और उनका रंग काला हो गया। जब शनिदेव का जन्म हुआ तो रंग को देखकर सूर्यदेव ने छाया पर संदेह किया और उन्हें अपमानित करते हुए कह दिया कि यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता। मां के तप की शक्ति शनिदेव में भी आ गई थी उन्होंने क्रोधित होकर अपने पिता सूर्यदेव को देखा तो सूर्यदेव बिल्कुल काले हो गये, उनके घोड़ों की चाल रुक गई। परेशान होकर सूर्यदेव को भगवान शिव की शरण लेनी पड़ी और शिव ने उनको उनकी गलती का अहसास कराया। सूर्यदेव ने अपनी गलती के लिये क्षमा याचना की जिसके बाद उन्हें फिर से अपना असली रूप वापस मिला।
तीसरी कथा - यह कथा प्रायः कथावाचकों द्वारा सुनाई जाती है। एक समय जब पृथ्वीलोक पर बब्रुवाहन नामक एक राजा हुआ करता था। उसके राज्य में किसी चीज की कमी नहीं थी। इसी राज्य में एक हरिदास नामक ब्राह्मण भी निवास करता था। जिसका विवाह गुणवती से हुआ था जो कि बहुत ही धर्मवती एवं पतिव्रता महिला थी। गुणवती ने अपना पूरा जीवन सभी देवी देवताओं की उपासना में लगा दिया और वह सभी प्रकार के व्रत करती थी और दान धर्म भी किया करती थी। इसके अलावा अतिथि सेवा को वह अपना धर्म मानती थी। ऐसे ही ईश्वर की उपासना करते हुए वह वृद्ध हो गयी। जब उसकी मृत्यु हुई तो धर्मराज के दूत उसे अपने साथ धर्मराजपुर ले गए। यमलोक में एक सुन्दर सिंहासन पर यम धर्मराज विराजमान थे और उनके पास ही चित्रगुप्त भी बैठे थे। चित्रगुप्त जब धर्मराज को प्राणियों का लेखा जोखा सुना रहे थे तभी यमदूत गुणवती को लेकर पहुंचे। गुणवती ने यमराज से पूछा कि प्रभु मुझसे क्या भूल हुई है? धर्मराज ने कहा कि हे गुणवती, तुमने सभी देवी-देवताओं के व्रत किए हैं, उपासना की है लेकिन कभी भी तुमने मेरे नाम से कुछ पूजा या पाठ या दान नहीं किया। तुमसे ही तो तुम्हारी संताने यह सब सीखेंगी अतः इन अच्छे संस्कारों स्वयं भी पालना था तथा अपने बच्चों को भी सिखाना था।
धर्मराज ने बताया कि जिस दिन सूर्य देव उत्तरायण में प्रवेश करते हैं यानि मकर संक्रांति के दिन मेरी पूजा शुरू करनी चाहिए साथ ही मेरी पूजा करने वाले व्यक्ति को धर्म के इन दस नियमों का पालन अवश्य करना चाहिए- धैर्य रखना, अपने मन को वश में रखना और सभी को क्षमा करना, किसी प्रकार का दुष्कर्म नहीं करना, मानसिक और शारीरिक शुद्धि का ध्यान रखना, अपनी इन्द्रियों को वश में रखना, बुरे विचारों को अपने मन में न लाना, पूजा, पाठ और दान पुण्य करना, व्रत करना और व्रत की कहानी सुनना, सच बोलना और सभी से अच्छा व सच्चा व्यवहार करना, क्रोध न करना। इसके बाद मेरी एक मूर्ति बनाकर विधि विधान से प्राण प्रतिष्ठा करवाकर हवन पूजन करें और साथ ही चित्रगुप्त की भी पूजा करें। और काले तिल के लड्डू का भोग लगाना। मकर संक्रांति आते ही गुणवती और उसके पति ने ये व्रत शुरू कर दिया। इसी व्रत के प्रभाव से उनपर धर्मराज की कृपा हुई और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। गुणवती की संतानों ने भी उसका अनुकरण किया।
चौथी कथा - इस कथा का एक रूप और कथावाचकों द्वारा सुनाया जाता है जिसमें पुत्रों द्वारा माता गुणवती एवं पिता की अवहेलना का प्रकरण है। इस कथा के अनुसार अपने पांच पुत्रों द्वारा घर से निकाल दिए जाने के बाद गुणवती और उसके पति ने व्यथित हो कर अपनी इहलीला समाप्त करने का कदम उठाया। दोनों ने पहाड़ की चोटी से खाई में गिर कर अपने प्राण दे दिए। यमदूत उनके प्राणों को अर्थात आत्मा को यमराज के पास ले कर पहुंचे। यमराज ने चित्रगुप्त से कहा कि इन दोनों के कर्मों का लेखाजोखा बताओ। तब चित्रगुप्त ने अपना बहीखाता देखा और कहा कि इन्हें से अभी मरना ही नहीं चाहिए था। ये सदकर्मी हैं किन्तु अपने पुत्रों की अवहेलना और प्रताड़ना से त्रस्त हो कर आत्महत्या कर बैठे हैं। इस पर यमराज ने यमदूतों से कहा कि जाओ इन आत्माओं को इनके शरीर में वापस छोड़ आओ और बदले में इनके पांचों पुत्रों के प्राण ले आओ। यह सुन कर गुणवती और उसके पति की आत्मा त्राहि-त्राहि कर उठी। उन्होंने कहा कि ऐसा मत करिए। वे जैसे भी हैं हमारे पुत्र हैं। उनके बदले हमारे जीवित रहने का भी क्या अर्थ है? उन्हें जीने दीजिए। तब यमराज ने कहा कि ठीक है तुम दोनों के कहने पर मैं उन्हें छोड़ दूंगा लेकिन पहले उनको सबक सिखा दूं। फिर यमराज ने गुणवती के पांचों पुत्रों के प्राणों को अपने पास मंगा लिया। पांचों की आत्माएं यमराज के सामने रोने लगीं। उनसे कहने लगीं कि आप अभी हमें मत मारिए क्योंकि अभी हमारे बच्चे बहुत छोटे हैं, उन्हें हमारी जरूरत है। तब यमराज ने कहा कि एक शर्त पर मैं तुम पांचों के प्राण वापस कर सकता हूं यदि तुम लोग अपने माता-पिता को सम्मान के साथ अपने पास रखो। पांचों ने यमराज की शर्त मान ली और अपने माता-पिता की आत्माओं के साथ अपने-अपने शरीर में लौट गए। चूंकि तब तक प्राणहीन शरीर मैले हो चुके थे अतः उन्होंने अपने-अपने शरीरों को तिल का उबटन लगा कर साफ किया। फिर ताकत के लिए तिल और गुड़ का सेवन किया। इसके बाद गुणवती अपने पति और पांचों पुत्रों के साथ प्रसन्नतापूर्वक रहने लगी। चूंकि उसी दिन सूर्य उत्तरायण हुआ था अतः उसी दिन से तिल-गुड़ कि त्योहार की परंपरा पड़ गई।
ये कथाएं इस बात का संदेश देती हैं कि माता, पिता और पुत्र में भूल चाहे जिससे भी हुई हो, उन्हें परस्पर मिल कर, एक दूसरे से बातचीत कर के मसले को सुलझा लेना चाहिए। यह संदेश आज के परिवेश में बेहद महत्वपूर्ण है जब आज परिवार बिखर रहे हैं, वृद्धाश्रम खुलते जा रहे हैं और बड़ों ओर बच्चों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं जेनेरेशन गेप के नाम पर। मिल-बैठ कर परस्पर दुख-सुख जानने का चलन परिवारों से खत्म होता जा रहा है, जिसके लिए मकर संक्रांति में पिता-पुत्र के पारस्परिक मेल की रोचक कथाओं को जानना और समझना जरूरी है। बुंदेलखंड में तो यह मान्यता भी है कि मकर संक्रांति पर जब कोई पिता अपने पुत्र से मिलने जाते है, तो उनके बीच के मतभेद दूर हो जाते हैं।
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(दैनिक, सागर दिनकर में 15.01.2026 को प्रकाशित)
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