टाॅपिक एक्सपर्ट
रहिमन छिड़ियां राखिए, बिन छिड़ियां सब सूनन
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
जिनगी में छिड़ियां भौतई जरूरी आए। जो छिड़ियां ने होंए तो तरक्की नईं करी जा सकत। कओ जात आए के मेनत की छिड़ियां से आदमी कऊं के कऊं पौंच सकत आए। मनो जे किताबी बातन से ज्यादा प्रैक्टिकल वारी बातन पे आ जाओ चाइए। काए से हमाओ आज लौं तक को एक्सपियरेंस जो रओ के चाए कित्तौ छिड़ियां चढ़ जाओ, चाए कित्तई तरक्की कर लेओ, मनो जो घरे एक ठइयां छिड़ियां ने होए तो आप अपने छत को पंखा ठीक नईं करा सकत औ ने ट्यूब लाईट बदरवा सकत। जो हमाई कई झूठी लगे तो तनक बा टेम याद कर लइयो जबें आपने पंखा या एसी सुधरवाबे खों, नें तो छत पे लगो बलब बदरवावे खों कोनऊं मिस्त्री भैया खों बुलाओ होए औ ऊने आतई संगे सबसे पैले जेई ने पूछो होए के छिड़ियां कां धरी? मनो हर घर में छिड़ियां भओ चाइए। औ अपनी मजबूरी के अपन मों खोल के नईं कै सकत के भैया छिड़ियां संगे लाने रई। आपखों पता हती के ऊपरे चढ़ने पड़हे। बाकी होत का आए के अपन पड़ोसियन के इते भगत फिरत आएं छिड़ियां की भिखमंगी करबे के लाने। बरयाबर के एकाद के इते मिलत आए। सो पैले ऊकी बड़ियाई सुनो, फेर छिड़ियां उठवा के अपने घरे ल्याओ तो मिस्त्री भैया की कई सुनो के “ज्यों लौं छिड़ियां आई उत्ते टेम में तो पूरो काम हो गओ होतो, हमें अबे मुतकी जांगा जाने।”
अब जे ने बोल पाऊंत आएं के भैया जू मिस्त्री आप आओ के हम? छिड़ियां आपखों रखो चाइए के हमें? सो, हर दइयां ऊ टेम पे जेई सोचत आएं के एक छिड़ियां ले लई जाए। फेर लगत आए के कोन रोज लगत आए? कां राखबी? वईं जब मिस्त्री भैया आके ठेन करत आएं तो रहीम जू से माफी संगे जोई लगत आए के - ‘रहिमन छिड़ियां राखिए, बिन छिड़ियां सब सून।’
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