Tuesday, January 20, 2026

पुस्तक समीक्षा | तन्हाईयों के स्वर को शब्दों में पिरोतीं बेहतरीन ग़ज़लें | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
तन्हाईयों के स्वर को शब्दों में पिरोतीं बेहतरीन ग़ज़लें
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
-------------------
गजल संग्रह - तन्हाईयाँ आवाज देती हैं
शायर      - विनीत मोहन फ़िक्र सागरी
प्रकाशक  - के.बी.एस. प्रकाशन दिल्ली, 111 ए.जी-एफ, आनन्द पर्वत, इंडस्ट्रियल एरिया, दिल्ली-110005
मूल्य - 200/- पेपर बैक, 300/- हार्डबाउंड
---------------------


विनीत मोहन औदिच्य उर्दू शाइरी में जिनका तख़ल्लुस “फ़िक्र सागरी” है, एक बेहतरीन अनुवादक और उम्दा सॉनेटियर हैं। इन्होंने पाब्लो नेरूदा के सॉनेट्स का अनुवाद किया है। स्वयं भी सॉनेट्स लिखते हैं तथा विभिन्न समाचारपत्रों, पत्रिकाओं व वेबसाइट्स में रचनाओं का सतत प्रकाशन होता रहता है। 10 फरवरी, 1961 करहल, मैंनपुरी, उ.प्र. में जन्में तथा वर्तमान में सागर, मध्यप्रदेश में निवासरत विनीत मोहन औदिच्य की ग़ज़लों से पहले मैंने उनके द्वारा अनूदित सॉनेट्स तथा उनके मौलिक सॉनेट पढ़े थे। उसी दौरान मुझे विनीत मोहन औदिच्य  उर्फ फ़िक्र सागरी की ग़ज़लों को पढ़ने का भी अवसर मिला और उनकी बहुमुखी प्रतिभा से मेरा परिचय हुआ। गुजराती भाषी विनीत मोहन औदिच्य को अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं पर सामान अधिकार है। वर्तमान में वे शासकीय महाविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य व भाषा का अध्यापन कार्य कर रहे हैं। अब तक उनके काव्यात्मक अनुवाद सहित 11 काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनके कृतित्व के लिए उन्हें राष्ट्रीय स्तर की कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।
‘‘तन्हाईयाँ आवाज देतीं हैं’’ ग़ज़ल संग्रह की ग़ज़लों का आकलन आरम्भ किया जाए उस ग़ज़ल से जिससे संग्रह का नामकरण हुआ है। यद्यपि यह संग्रह की कुल 105 ग़ज़लों में 42 वीं ग़ज़ल है। इस ग़ज़ल में रूमानियत का वह पहलू है जिससे लगभग हर व्यक्ति को अपने जीवन में कभी न कभी हो कर गुज़रना पड़ता है। इस ग़ज़ल में विछोह का वह स्वर है जो अपने किसी भी प्रिय से बिछड़ जाने के दुख को प्रतिध्वनित करता है। ग़ज़ल के कुछ शेर देखें -
सुरों में  गूंजतीं  शहनाइयाँ आवाज देती हैं
मुझे बागों में अब अमराइयाँ आवाज देती हैं
चहकता था मुहब्बत से जो सुहबत में कभी तेरी
मुझे उस घर की अब तन्हाइयाँ आवाज देती हैं
हुए पागल-दीवाने हम कहाँ था होश इतना भी
न जाना इश्क की रुसवाइयाँ आवाज देतीं हैं
अभी भी उन पुरानी यादों की छत से मुझे अक्सर
तेरी शोखी  भरी  अंगड़ाइयाँ आवाज देतीं हैं

यूं भी यह अकेलेपन को जीने के दौरान स्मृतियों एवं आत्मसंवाद का वे पल होते हैं जब ऐसा प्रतीत होता है कि तनहाई ही साथी बन कर बात कर रही है, आवाज़ दे रही है। इस ग़ज़ल संग्रह की ग़ज़लों पर ज़दीद और ‘‘रिवायती ख़़यालात से सजी ग़ज़लों का मज़्मुआ’’ शीर्षक से वरिष्ठ शाइर प्रो. डॉ. गजाधर सागर ने लिखा है कि  - ‘‘तन्हाईयाँ आवाज़ देतीं हैं’। मेरे दिल को छू गए हैं। संग्रह का शीर्षक ‘‘तन्हाइयाँ आवाज देतीं हैं’’ यह दर्शाता है कि सिर्फ भीड़, बातचीत, शोर अथवा तबादला-ए-ख़यालात में ही आवाज़ नहीं गूँजती है वरन् तन्हाईयों, ख़ामोशियों और अकेलेपन में भी आवाज़ सुनाई देती है बस उसे सुनने की ताब सुनने वालों में होना चाहिए।’’

इसी संग्रह की भूमिका में चर्चित शाइर देवेन्द्र माँझी ने ‘‘अनेक विषय-वस्तुओं के फूल खिले हैं ‘तन्हाईयाँ आवाज देती हैं’ के गजल-उद्यान में” के रूप में लिखा है कि - “सुप्रसिद्ध कवि विनीत मोहन औदिच्य की ग़ज़लों का ऐसा संग्रह है, जिसके अश्आर प्रेम-रस की गंगा तो बहाते ही हैं, साथ ही साथ सामाजिक-राजनीतिक और धार्मिक पहलुओं पर भी अपनी पैनी नजर गड़ाए रखते हैं। शब्दों का किसी बहर विशेष में जमावड़ा कर देने भर से ग़ज़ल नहीं हो जाती, जिसके लिए कोमल और चमत्कारिक लहजे की भी आवश्यकता होती है-इस बात को कवि श्री औदिच्य जी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं, तभी उन्होंने अपने रचना-धर्मिता के सफ़र में शब्दों को बहुत देखभाल कर और ठोंक-बजाकर अपना हमसफर बनाया है।’’

वहीं, “शाइर की कलम से” में अपनी बात करते हुए फ़िक्र सागरी लिखते हैं कि- “ख़ुशबू-ए-सुखन, कारवाँ-ए-सुखन, कारवाँ-ए-ग़ज़ल, अंदाज़-ए-सुखन व अंदाज़-ए- ग़ज़ल के बाद, तन्हाईयाँ आवाज़ देतीं हैं मेरा छठवाँ ग़ज़ल मज़्मुआ है जो शाया होने जा रहा है। अपनी इन ग़ज़लों में मैंने अपनी ज़िन्दगी के मुख़्तलिफ रंगों के अहसासात को शामिल किया है। उन्यान चाहे जो हो, मुहब्बत, ज़दीदी, रवायती समाजी, सियासी, इंसानियत के ख़िलाफ नाइंसाफ़ी या ज़ुल्म, ऐसी कोशिश की गई है कि ज़िन्दगी का कोई भी पहलू नहीं छूटे।”

बेशक़ शाइर फ़िक्र सागरी ने ज़िन्दगी के हर पहलू को समेटने का प्रयास किया है फिर भी प्रेम की कोमल भावनाएं उभर कर प्रभावी ढंग से सामने आई हैं जिनमें मिलन की मधुरता भी है और वियोग की पीड़ा भी। इश्क़ में क्या हाल होता है इसकी बानगी में देखिए संग्रह की एक ग़ज़ल के कुछ शेर-
हुस्न की बेशुमार चाहत में
दिल लुटाते रहे शराफ्त में।
इश्क में दर्द कम नहीं होता
मर्ज़ बढ़ने लगा है उल्फत में।
हाल सुनता कहाँ है वो मेरा
जान अब आ पड़ी है आफत में।

मोहब्बत में परस्पर मिल कर दुख-सुख बांटने और एक-दूसरे की भावनाओं को समझने का तीव्र आग्रह निहित होता है। इस स्थिति को शाइर ने बड़ी ख़ूबसूरती से बयान किया है-
ज़ीस्त के हर गम को भी साझा करे
मुझसे मिलने का भी वो वादा करे।
चैन ही मिलता नहीं है अब मुझे
कौन है जो दर्द को आधा करे
हों भले जज़्बात दिल के अर्श पर
बात तो तब है बयां सादा करे
छोड़कर दामन चला अब किसलिए
कुर्ब में वो बैठ कर चर्चा करे

फ़िक्र सागरी व्यष्टि की बात करते-करते बड़े स्वाभाविक ढंग से समष्टि की बात करने का महारत रखते हैं। वर्तमान दशा में मरती संवेदनाएं एवं गिरते चरित्र को बखूबी रेखांकित किया है शाइर ने। उदाहरण के लिए उनके ये शेर देखें-
वो सदा अपने ही किरदार से भारी निकला
उसके पैरों के तले रेत से पानी निकला।
इस मुहब्बत के जो अल्फाज़ कई खोजे तो
सनसनीखेज इबारत में मआनी निकला।
फलसफा ज़ीस्त का जो हमको सुनाने आया
वो भी बंदर को लिए एक मदारी निकला।
भीड़ भगवान के मंदिर में बड़ी देखी तो
भोग की चाह में अंदर से शराबी निकला।

    इंसानों में अवसरवादिता इस तरह पैंठ गई है कि हर दूसरा इंसान इंसानियत खो कर दूसरे का अधिकार छीनने को उतारू हो उठता है। यही कारण है कि हर इंसान परस्पर एक-दूसरे से डरने लगा है।
जाने ये कैसा जमाने का असर लगता है
आज इंसान को इंसान से डर लगता है।
मेरी फितरत ही नहीं शोर-शराबा करना
दर्द होता है मगर जख़्म जिधर लगता है।

इसी हालात को और अधिक बयां करते हुए फ़िक्र सागरी ये शेर कहते हैं कि -
ये ताज़ा ख़ौफ़ का मंज़र वही है
चुभा जो पीठ में खंज़र वही है
नहीं कुछ बोलता मुँह से कभी जो
वो कड़वा सच न बोले डर वही है

      अगर माहौल बिगड़ता है तो उसकी जिम्मेदारी से सियासत को बरी नहीं किया जा सकता है। इसी कटु यथार्थ पर शाइर ने कहा है-‘‘चुनी अंधों ने हो सरकार पहले तो नहीं देखी / तनी हो जुल्म की तलवार पहले तो नहीं देखी।’’ सारी अव्यवस्थाओं के पीछे भी झांक कर देखते हुए फ़िक्र सागरी उनका कारण तलाशते हैं और उन्हें कारण मिलता भी है कि -‘‘रात दिन जुल्मों को सहता आदमी / है मयस्सर कब यहाँ सबको खुशी। / बेटियों की लुट रही इज़्जत मगर / छा रही सारे जहाँ में ख़ामुशी।’’ सो, जब ऐसा वातावरण होगा तो मोहब्बत रुस्वा और बदहाल तो होगी ही।

विनीत मोहन औदिच्य ‘‘फ़िक्र सागरी’’ का यह ग़ज़ल संग्रह ‘‘तन्हाईयां आवाज़ देती हैं’’ में प्रेम की निज भावनाओं से ले कर जीवन के विभिन्न स्तरों पर छाई दुरावस्था की बात करती ग़ज़लें हैं। चूंकि एकांत विचार मंथन एवं भावों के आकलन का अवसर देता है इसलिए तन्हाई के स्वर को पिरोते हुए फ़िक्र सागरी ने बेहतरीन ग़ज़लें पाठकों के लिए दी हैं। उर्दू ज़मीन की इन ग़ज़लों को देवनागरी लिपि में सहजता से पढ़ा जा सकता है और इन्हें ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए। खा़लिस उर्दू के कठिन शब्दों के होते हुए भी ग़ज़लों के मर्म को समझना आसान है क्यों कि इन्हें इस सहजता से कहा गया है कि उन शब्दों का भावार्थ सुगमता से समझा जा सकता है।
---------------------------
#पुस्तकसमीक्षा #डॉसुश्रीशरदसिंह  #bookreview #bookreviewer
#पुस्तकसमीक्षक #पुस्तक #आचरण #DrMissSharadSingh

No comments:

Post a Comment