Thursday, January 15, 2026

बतकाव बिन्ना की | जो सकरायत के लड़ुआ ने खाओ तो का खाओ | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बतकाव बिन्ना की | जो सकरायत के लड़ुआ ने खाओ तो का खाओ | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम
बतकाव बिन्ना की      
     
जो सकरायत के लड़ुआ ने खाओ तो का खाओ?          
                      
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

         दो दिनां हो गए, जबै भैयाजी के दोरे से कढ़ो सो कभऊं तिली भुंजबे की सुगंध मिली तो कभऊं आटो भुनबे की। मोय समझ में आ गई के भौजी सकरायत के लाने लड़ुआ बना रईं। भौतई अच्छो लड़ुआ बनाउत आएं भौजी। गुड़-मोमफली की पट्टी सोई बड़ी नोनी बनाउत आएं। मैंने सोची के बे बेचारी अकेली लड़ुआ बांध रई हुइएं, सो चलो तनक उनको हाथ बंटा दओ जाए। काए से के लड़ुआ खाबे के लाने सो मोय उनईं के इते जाने, सो लड़ुआ बंधाबे के लाने सोई जाबो चाइए, ऐसी मोय लगी। सो मैं भौजी के इते पौंची। उते जा के जे देख के मोय भौतई अच्छो लगो के भैयाजी सोई उनको हाथ बंटा रए हते। भौजी ने जो मोमफली भूंज के धरी हतीं, उने भैयाजी सूपा पे से फटकारत जा रए हते, जोन से मोमफली के छिलका अलग हो जाएं। 
‘‘राम-राम भौजी! मोय सोई कछू काम बताओ।’’ मैंने भौजी से कई। 
‘‘कछू नईं बिन्ना, सब बनत जा रए।’’ भौजी बोलीं। 
मोय जे देख के सोई बड़ो मजो आओ के बे आंगन में लकड़िया वारे चूला पे जे सब काम कर रईं हतीं। ने तो आजकाल तो सबई जनीं गैस के चूला पे बनाउती हैं, मनो अगर बनाने होय तो! ने तो इत्ते माॅल खुल गए, के उते हर त्योहार पे सब कछू मिल जात आए। मनो उनमें घर के बने को स्वाद कां मिलने? 
सो मैं सोई चूला के बाजू से बैठ गई औ हाथ तापन लगी। ऊंसई दो-चार दिनां से डगर-मगर हो रओ। कभऊं ठंड बढ़ जात आए, तो कभऊं गरमी। मनो चूला में हाथ तापे में भौतई अच्छो लगत आए। 
‘‘चलो जो लो तुमाए भैया मोंमफली साफ़ कर रए, तब लौं चाय बना लई जाए।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हौ, अच्छो अदरक डारियो!’’ भैयाजी बोल परे।
‘‘हौ, जैसे आपखों मिली जा रई? इते दो कप बन रई। एक हमाए लाने औ एक बिन्ना के लाने।’’ भौजी आंखें दिखात भईं भैयाजी से बोलीं।
मोय जे सुन के अचरज भओ। काए से के इते आ के मोय लग नई रओ हतो के भैयाजी और भौजी के बीच कोनऊं रार चल रई हुइए।
‘‘का हो गओ भौजी? भैयाजी से काय खफा हो?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘इनई से पूछो! हम हम जो कहें इने कोन मानने। हमाओ कहो मानबे में तो जे छोटे हो जैहें।’’ भौजी भैयाजी खों फटकारत भई बोलीं।
‘‘का हो गओ भैयाजी? हमाई भौजी खों काय नाराज कर दओ?’’ अब की बेर मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘अब का कहें बिन्ना! तुमाई भौजी को न जाने कां-कां की सूझत आए। इन्ने आज भुनसारे अखबार में न्यूज पढ़ लई के इते मेला भरने, उते मेला भरने। तभईं से जे हमाए पांछू परीं के हमें मेला ले चलो। अब तुमई बताओ के उते भीर में जा के जे का करहें?’’ भैयाजी बोले।
‘‘ आप दोई बात गलत बोल रए। एक तो के संकरायत में मेला नईं ले जा रए जबके सकरात के टेम पे जेई लाने मेला भरत आएं के सब जने उते पौंचे। घूमें-फिरें, तनक छुट्टी मनाएं औ आप हो के मेला ले जाबे से मना कर रए। दूसरी बात जे के मेला की भीर को डर दिखा रए? अरे, मेला में भीर ने हुइए तो कां हुइए? सो जे दोनों बातें गलत ठैरीं। आप तो भौजी खों मेला घुमाबे खों ले जाओ। उते इनके लाने चुरियां औ घड़िया-घुल्ला खरीद दइयो।’’ मैंने भैयाजी खों समझाओ।
‘‘गजबई हो तुम दोई! जैसी भौजी, उंसई नंदरानी। जे नई बनत के तुम अपनी भौजी खों हमाई तरफी से समझाओ के मेला घूमबे ने जाओ।’’ भैयाजी मों बनात भए बोले।
‘‘हमाई बिन्ना पे गुस्सा ने दिखाओ! ने तो हम आपके लाने ऐसो लड़ुआ बनाबी के जो आपके मूंड़ पे मारो जाए तो आपको मूंड़ई फूट जाए।’’ भौजी ने भैयाजी खों धमकाओ औ मोय उनकी धमकी सुन के हंसी आ गई। 
उनकी बात सुन के मोए एक पुरानी किसां याद आ गई। भओ का के ऊ टेम पे मोसे तिली के लड़ुआ बनात नईं बनत्ते। मनो मोए शौक भौत हतो के तिल के लड़ुआ बनाए जाएं। ऊ टेम पे ने तो मोबाईल हतो औ ने इंटर नेट। सो मैंने एक अखबार में पढ़ के तिली के लड़ुआ बनाबे की सोची। अच्छो तिल भूनों। ऊमें तनक घी सोई डार दओ। फेर चासनी बनाई और चासनी में तिल डार के लड़ुआ बांध लए। ऊमें जित्ते तार की चासनी बनाबे को लिखी थी बा मोसे ने बनी। काए से मोए बा समझई में ने आई हती।
कछू तो लड़ुआ बांध दए ते औ बची भई चासनी एक बसी में फैला दई। जब मोरी जिज्जी कालेज से लौटीं तो बे लड़ुआ देख के भौतई खुस भईं। उन्ने जैसई एक लड़ुआ अपने दांतन तरे दबाओ, ऊसई वापस धर दओ। 
‘‘काए? खा काय नई रईं? अच्छो नईं बनों?’’मैंने उनसे पूछीै
‘‘अच्छो तो बनो, मनो हम तनक लुढ़िया ले आएं काए से इनको कुचर-फोर के खाने परहे।’’ जिज्जी मुस्काईं।
मोए उनकी बात बुरई लगीे। इत्ते में उते हम ओरन को पलो भओ बिलौटा आ गओ। मैंने सोची के जब जिज्जी लड़ुआ में मीनमेक निकार रईं तो बसी को सीरा का खाहें? सो मैंने बा बसी ऊ बिलौटा के मों के पास धर दई। ऊ बिलौटा ने बसी सूंघी औ मों बना के उते से चलो गओ। मोए ऊ पे बी भौतई गुस्सा आई। 
फेर मैंने खुदई एक लड़ुआ उठाओ औ अपने दांतन से काटबो चाहो, सो लगो के दांतई ने बायरे आ जाएं। सो मोए समझ में आ गई के जिज्जी लुढ़िया से फोरबे के लाने काए कै रई हतीं। रामधई! बे लड़ुआ ऐसे बने हते के जो कोनऊं के मूंड़ पे फेंक के मारो तो कओ ऊको मूंड़ फूट जाए, मनो लड़ुआ ने फूटे। फेर मैंने बसी के सीरा पे उंगरिया फेरी तो लगो के कोनऊं कांच पे फेर रई होऊं। बा सीरा बसी में ऐसो चिपको के गरम पानी से बी ने निकरो। अखीर में बा बसी फोड़ के मेंकने परी। 
कैबो को मतलब जो आए के तिल के लड़ुआ बनाबो कोनऊं हंसी खेल नोंई। जो चासनी बिगर जाए तो बा तिल के लड़ुआ की जांगा किरकिट की बाॅल बन जात आए। बल्ला से मारो तो छक्काई लगहे। सो, भौजी ने भैयाजी खों डराबे को अच्छो तरीका ढूंढो।
भैयाजी सोई डरा गए। औ कैन लगे,‘‘तुम तो अच्छेई लड़ुआ बनाओ! हम तुम्हें अबई लेवा ले चल रए मेला घुमाबे।’’
भैयाजी खों हथियार डारत देख मोए औ भौजी दोई खों हंसी आ गई।   
मनो भौजी ने तोप के गोला घांईं लड़ुआ ने बनाए। उन्ने नरम-नरम बनाए। औ मैंने सोई दबा के खाए। दबा के मने मुतके खाए। काए से के जो सकरायत के लड़ुआ ने खाओ तो का खाओ?    
मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम! औ हैप्पी सकरायत! 
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बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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