Tuesday, January 6, 2026

पुस्तक समीक्षा | ज़बर्दस्त रोमांचक है मुकेश भारद्वाज के अभिमन्यु सिरीज़ का नया थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

पुस्तक समीक्षा | ज़बर्दस्त रोमांचक है मुकेश भारद्वाज के अभिमन्यु सिरीज़ का नया थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण
पुस्तक समीक्षा  

ज़बर्दस्त रोमांचक है मुकेश भारद्वाज के अभिमन्यु सिरीज़ का नया थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ 

- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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उपन्यास     - राज़महल 
लेखक       - मुकेश भारद्वाज
प्रकाशक     - वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
मूल्य       - 395/-
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‘‘जनसत्ता’’ के कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज अपने काॅलम ‘‘बेबाक बोल’’ के लिए तो चर्चित हैं ही किन्तु जब उन्होंने थ्रिलर उपन्यास लिखना शुरू किया तो अपने पहले उपन्यास ‘‘मेरे बाद’’ ने ही तहलका मचा दिया। हिन्दी जगत में रोमांचक जासूसी उपन्यासों को ले कर एक शून्यता का अनुभव हो रहा था, उस शून्यता को मुकेश भारद्वाज ने अपने उपन्यास ‘‘मेरे बाद’’ से भर दिया। उपन्यास का मुख्य पात्र अभिमन्यु पाठकों के मन-मस्तिष्क पर छा गया। इसका परिणाम यह हुआ कि एक साल बाद ही दूसरा जासूसी उपन्यास ‘‘बेगुनाह’’ और फिर तीसरा उपन्यास ‘‘नक्काश’’ पाठकों के हाथों में आ गया। यदि पाठक पसंद करें तो लेखक भी उत्साहित होता है। जिस तरह कभी विनोद-हमीद, सुनील और मेजर बलवंत के लिए पाठकों में जुनून पाया जाता था, ठीक उसी तरह ‘‘अभिमन्यु’’ के लिए भी पाठकों में जुनून जाग उठा है। वे अभिमन्यु के किरदार से स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस करते हैं। वे उसके साथ-साथ चल कर हर मिस्ट्री को सुलझाना चाहते हैं। बल्कि कई बार तो पाठक अपने प्रिय पात्र को भी मात दे कर आगे बढ़ जाना चाहता है और उससे पहले हत्या की गुत्थी सुलझा लेना चाहता है। यह वस्तुतः उस पात्र से जुड़ा यथार्थबोध होता है जो पाठकों को उकसाता है। थ्रिलर के मंजे हुए लेखक अपने पात्र और पाठकों के इस रिश्ते को भली-भांति समझते हैं और इसी सूत्र को पकड़ कर कथानक को आगे बढ़ाते हैं जिससे पाठकों को कभी अपना प्रिय पात्र यानी उपन्यास का हीरो आगे लगे तो कभी वे स्वयं को उससे आगे महसूस करें। यह ताना-बाना उपन्यास को सफलता के शिखर पर पहुंचा देता है। 
अभिमन्यु सिरीज़ का नवीनतम उपन्यास है ‘‘राज़महल’’। जी हां, राजा-रानी वाला कोरा सियासी ‘‘राजमहल’’ नहीं, वरन  ‘‘राज़महल’’ जिसमें राज़ ही राज़ हैं यानी ढेर सारा सस्पेंस। थ्रिलर उपन्यासों की मुख्य विशेषता ही होती है पाठकों के चेतन-अवचेतन में रोमांच, शंका और सतत उद्वेलन को जगाना। रहस्य-रोमांच  उपन्यासों के विपरीत, रोमांचकारी यानी थ्रिलर उपन्यास मात्र पूर्व घटित अपराध को सुलझाने पर केंद्रित नहीं होते हैं, वरन वे समय सीमा के भीतर भविष्य में होने वाले अपराध को रोकने का संघर्ष भी दिखाते हैं। थ्रिलर उपन्यासों की सबसे प्रमुख विशेषता होती है रोमांच और गति। थ्रिल यानी रोमांच तभी पैदा होता है जब पाठकों को आने वाले खतरे और परिणाम के बारे में अनिश्चितता का एहसास हो और उनकी उत्सुकता बनी रहे कि अब क्या होने जा रहा है? इसके साथ ही कथानक की गति भी इसे रोमांचक बनाती है। इसे दूसरे शब्दों में कहा जाए तो भरपूर एक्शन। ताकि पाठक एक बार पढ़ना शुरू करे उसे पूरा पढ़ कर ही थमें। इतना ही नहीं थमने के बाद भी वह अपने मानस में मुख्य पात्र के साथ कई-कई दिन तक घटनाओं का विश्लेषण करता रहे। यही प्रक्रिया उस सिरीज के अगले उपन्यास के लिए पाठक का मानस तैयार कर देती है। एक व्याकुलता जगा देती है कि इस सिरीज का अगला उपन्यास कब आएगा? फिर जब नया उपन्यास आता है तो उसकी उत्सुकता चरम पर पहुंच जाती है। 

मुकेश भरद्वाज ने अभिमन्यु के रूप में पाठकों को एक ऐसा पात्र दिया है जो कभी जेम्सबांड की तरह बिंदास एवं दिलफेंक है तो कभी शारलाक होम्स की तरह गंभीर, कभी सुनील की तरह दिल्ली की छाप लिए हुए तो कभी एक अनूठा अद्वितीय चरित्र जो देश के किसी भी हिस्से के पाठक को अपना-सा लगेगा। ‘‘राज़महल’’ उपन्यास में भी अभिमन्यु अपने पूरे किरदार के साथ उपस्थित है। इसीलिए आर्म डीलर निहाल सिंह की दूकान पर जब बला की खूबसूरत टाटा घोष से उसकी मुलाकात होती है तो वह टाटा से दोस्ती करने में एक पल की देर नहीं करता है। यह कोई रोमांटिक भेंट नहीं थी। टाटा घोष उस दूकान पर रिवाल्वर खरीदने आई थी। वह खरीदती भी है। यहीं से सस्पेंस शुरू हो जाता है कि एक सुंदर स्त्री किस पर गोली चलाने जा रही है? और क्यों? 
दूकानदार निहाल सिंह के रूप में पंजाबी बोली का तड़का आरम्भ से ही गुदगुदाता है। कुछ पन्नों की यात्रा के बाद मधुमालिनी और सुदक्षदीप सिंह की कहानी से गुज़रना होता है। सुदक्षदीप सिंह का कुत्सित कर्म और शिकार बनती है मधुमालिनी। कई बार एक अपनराध दूसरे अपराध की जमीन तैयार कर देता है। न्याय के नाम पर ही सही। ऐसे बिन्दु पर यह तय करना कठिन हो जाता है कि क्या उचित है और क्या अनुचित? पाठक का मानस उस पर एक चित्त हो कर विक्टिम यानी पीड़ित के पक्ष में डट कर खड़ा हो जाता है। सुदक्षदीप सिंह की रहस्यमयी मौत पाठक के मन को राहत तो देती है किन्तु उत्सुकता भी जगाती है कि उसे इस अंजाम तक किसने पहुंचाया? 

चाहे सत्या सुहानी हो, सबीना या सनम हो, उपन्यास के सभी पात्र अपनी-अपनी भूमिका में खरे उतरते हुए कथानक को जिस प्रकार गति देते हैं वह पाठकों को बांधे रखने के लिए पर्याप्त है। थ्रिलर लेखक अकसर कथानक में अप्रत्याशित मोड़ और भ्रामक संकेत दे कर तनाव और आश्चर्य बनाए रखते हैं। पाठक इन टूल्स से कुछ समय के लिए गुमराह हो जाता है और उलझ कर रह जाता है। यूं भी थ्रिलर उपन्यास का नायक प्रथमदृष्ट्या एक साधारण व्यक्ति होता है जिसे खतरे का आंशिक अनुभव तो होता है फिर भी वह स्वयं को असाधारण और जानलेवा स्थिति में फंसने से रोक नहीं पाता है। उसकी यह ‘डेयरिंग’ ही उसे पाठकों का प्रिय बना देती है। जैसे पाठक अभिमन्यु से जुड़ाव महसूस करते हैं और उसकी सुरक्षा और सफलता को ले कर चिंतित होने लगते हैं। भ्रम को सच के बोध में बदल कर लेखक अपने पात्र को पाठकों के मन-मस्तिष्क में उतार देता है, बड़ी चतुराई से उनका सहगामी बना देता है। एक थ्रिलर की मूल विशेषता है कि वह भय और समाधान की इच्छा जैसी मूलभूत मानवीय प्रवृत्तियों को जगा कर वास्तविकता से एक गहन, एड्रेनालाईन- युक्त संसार रचता है जिसमें परम उत्तेजना के पल पाठक को स्वयं एक जासूस बनने को विवश कर देते हैं। इसी बिन्दु पर लेखक की लेखकीय क्षमता की परीक्षा भी होती है। अभिमन्यु के किरदार का पाठको के मन पर छा जाना इस बात का सबूत है कि मुकेश भरद्वाज थ्रिलर लेखन के टूल्स से खेलने में माहिर हैं। वे जानते हैं कि कहां अभिमन्यु को चुस्त-चालाक दिखाना है और कहां उसे एक लापरवाह खिलंदड़ा रखना है।  
 
पाठकों को क्राइम और थ्रिलर फिक्शन पसंद क्यों आता है? क्योंकि यह उन्हें जीवन के घटनाक्रमों के अनजान हिस्सों को अनुभव करने का मौका देता है। वे अपनी जगह बैठे-बैठे जीवन के उन खतरनाक मोड़ों पर पहुंच सकते हैं जहां अपराधी पनपते हैं। वे अपराध के घिनौने रूपों से साक्षात्कार कर सकते हैं। वे स्वयं को अपराध रोकने वाले के पक्ष में खड़ा होते अनुभव कर सकते हैं। थ्रिलर सस्पेंस, एक्साइटमेंट और उत्सुकता पैदा करता है, जो दर्शकों को क्राइम, रहस्य, जासूसी या मनोवैज्ञानिक तनाव वाली हाई-स्टेक कहानियों के साथ मानसिक यात्रा करता है, जिसमें अक्सर तेज गति, अप्रत्याशित मोड़ और नायक समय या खतरे के खिलाफ दौड़ते हैं। इसमें लेखक सस्पेंस और उत्सुकता रूप जानकारी को नियंत्रित करके और अपरिहार्य घटनाओं में देरी करके तनाव पैदा करता है। हाई स्टेक्स रूप अक्सर जानलेवा स्थितियों, खतरे या मनोवैज्ञानिक यातना स्वाभाविक रूप से शामिल होती है। जटिलतम परिस्थितियों में नायक आमतौर पर भारी बाधाओं का सामना करता है, अक्सर अकेला होता है, एक खलनायक या टिक-टिक करती घड़ी के विरुद्ध काम करता है।

थ्रिलर की एक खूबी यह भी होती है कि उनमें से किसी एक को अंतिम रूप से ‘‘सबसे अच्छा’’ ठहराया नहीं जा सकता है लेकिन लेखकीय क्षमता किसी भी थ्रिलर को सर्वाधिक पाठक उपलब्ध करा कर उसे ‘बेस्ट सेलर’ बना देती है। जैसे कुछ प्रसिद्ध आधुनिक वास्तुशिल्प उपन्यासों में द साइलेंट पेशेंट (एलेक्स माइकलाइड्स), द हाउसमेड (फ्रीडा मैकफैडेन), द गर्ल ऑन द ट्रेन (पाउला हॉकिन्स), द ग्रैबेड मिस्टर रिपल (पेट्रीसिया हाईस्मिथ), और डी ऑफ द जैकल (फ्रेडरिक फोर्सिथ) शामिल हैं, जो अपने वैज्ञानिक गहराई, स्ट्रेनल फ्लेक्स और स्ट्रेंथ सैस्पेंस के लिए जाने जाते हैं। इसी क्रम में यदि हिन्दी थ्रिलर उपन्यास को देखें तो ‘‘राज़महल’’ पूरी तरह खरा उतरता है।
‘‘राज़महल" का  कवर पेज ही इस किताब के कंटेंट को पढ़ने के लिए उत्सुकता जगाता है। मध्य में पीठ पीछे पिस्तौल छिपाए खड़ा आदमी, उसके इर्दगिर्द मदिरा, रुपए, एक ओर एक पिस्तौलधारी जो दबे पांव अपने शिकार की ओर बढ़ रहा है, दूसरी ओर मात्र एक पिस्तौल जिसके साथ उंगलियों की मज़बूत पकड़ तो दिख रही है किन्तु उसे थामने वाला गोपन में है, कुछ लैंडमार्क जो घटनाओं के स्थान की ओर संकेत करते हैं। 

  किसी भी थ्रिलर उपन्यास के बारे में समीक्षात्मक लिखना कठिन होता है क्योंकि आप उसके कथानक को छू भी नहीं सकते हैं क्योंकि किसी भी तरह से भेद खोल कर लेखक की मेहनत पर पानी नहीं फेर सकते हैं। लेकिन बतौर समीक्षक यह दावा किया जा सकता है कि इसे पढ़ा जाए अथवा नहीं? या फिर लेखक ने कथानक के साथ न्याय किया है या नहीं? तो बेझिझक यह दावा किया जा सकता है कि मुकेश भारद्वाज का नवीनतम थ्रिलर ‘‘राज़महल’’ उन सभी पाठको को अवश्य पढ़ना चाहिए जिनकी रहस्य और रोमांच में गहरी रुचि है। लेखक ने अपनी पूरी लेखकीय क्षमता को काम लाते हुए इतने प्रभावी ढंग से उपन्यास का ताना-बाना बुना है कि इसके मुख्य पात्र अभिमन्यु के साथ पाठक भी स्वयं को एक जासूस की भांति महसूस करेगा। महल से निकला राज़ किस तरह एक पूरा राज़महल खड़ा कर सकता है, यह भी अनुभव होगा पाठकों को। इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि पाठक इसे पढ़ने के बाद अभिमन्यु सिरीज के अगले उपन्यास के लिए लेखक पर दबाव डालने लगें। यही इस उपन्यास की लोकप्रियता एवं सफलता का मानक है।
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