Friday, April 5, 2024

डॉ (सुश्री) शरद सिंह का बुंदेली व्यंग लेख "बुंदेली बसंत 2024" में

"बुंदेली बसंत" एक ऐसी पत्रिका है जो बुंदेली संस्कृति, साहित्य एवं कला को समर्पित है तथा विगत 25 वर्षों से डॉ बहादुर सिंह परमार के संपादन में निरंतर प्रकाशित हो रही है। पत्रिका के संरक्षक पूर्व विधायक एवं बुंदेली संस्कृति के पैरोकार श्री शंकर प्रताप सिंह बुंदेला "मुन्ना राजा" हैं।
   छतरपुर के बुंदेली विकास संस्थान से प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका में बुंदेली साहित्य, कला, भाषा एवं संस्कृति पर केंद्रित साहित्य की हर विधा की रचनाएं शामिल की जाती हैं। क्षेत्रीय स्तर पर किसी सांस्कृतिक पत्रिका का लगातार 25 वर्ष तक प्रकाशित होना  अपने आप में एक कीर्तिमान है।
    उल्लेखनीय है कि "बुंदेली बसंत 2024" का लोकार्पण प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के द्वारा ग्राम बसारी में बुंदेली महोत्सव के दौरान किया गया।
   डॉ बहादुर सिंह परमार अपने तमाम दायित्वों के बीच व्यस्त रहते हुए भी जिस प्रकार लगन और कर्मठता से बुंदेली संस्कृति की अलख जगाए हुए हैं, वह प्रशंसनीय एवं अनुकरणीय है।
        इस वर्ष के अंक में प्रकाशित अपना बुंदेली व्यंग्य लेख है - "इनको पेट गणेशजी के पेट से बड़ो कहानो"।  इसे मैं यहां हार्दिक आभार सहित शेयर कर रही हूं ...😊
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शून्यकाल | चुनावी राजनीति के प्रति पं. दीनदयाल उपाध्याय के उसूल | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

 
दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम "शून्यकाल"-
चुनावी राजनीति के प्रति पं. दीनदयाल उपाध्याय के उसूल
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
          हर उम्मीदवार चुनाव में विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से अपनी रणनीति बनाता है। कई उम्मीदवार ‘‘प्रेम और राजनीति में सब जायज़ है’’ केे तर्ज़ पर साम, दाम, दण्ड, भेद को अपना लेते हैं। यही राजनीति का वह दूषित आचरण है जो राजनीतिक शुचिता को ठेस पहुंचाता है। जातीय समीकरण भी इन्हीं ठेस पहुंचाने वाले तत्वों में से एक है। ‘‘वोट बैंक’’ की राजनीति इसका एक कुरूप चेहरा प्रस्तुत करता है। पं. दीनदयाल उपाध्याय इस तरह की राजनीति के कट्टर विरोधी थे। सन् 1963 के चुनाव में एक उम्मींदवार के रूप में उन्होंने यह साबित कर दिया था कि वे किसी भी मूल्य पर चुनाव और राजनीति को स्वार्थपूर्ति का साधन नहीं बना सकते हैं।
        पं. दीनदयाल उपाध्याय समझौता परस्त नहीं थे। वे राजनीति को स्वार्थपूर्ति के साधन के रूप में नहीं, वरन जनता के हितों को साधने के माध्यम के रूप में देखते थे। कई ऐसे अवसर आए जब अपने उसूलों के कट्टर राजनीतिज्ञों को भी थेड़ा लचीलापन अपनाना पड़ा लेकिन पं. दीनदयाल उपाध्याय ने ऐसे लचीलेपन को कभी स्वीकार नहीं किया जिसमें जातिगत आधार पर राजनीति की जा रही हो। सन् 1963 में लोकसभा की चार के लिए चुनाव होने थे। इन चार सीटों के लिए जिन चार बड़े़े राजनेताओं का नाम प्रस्तावित हुआ उनमें थे जौनपुर से पं.दीनदयाल उपाध्याय, फर्रूखाबाद से राममनोहर लोहिया, अमरोहा से जेबी कृपलानी, और राजकोट से मीनू मसानी। इनकी सीधी टक्कर कांग्रेस से थी। इन चारों नेताओं में पं. दीनदयाल और डा. राम मनोहर लोहिया ऐसे नेता थे जो राजनीति के जातिवादी आधार के सख़्त विरोधी थे। किन्तु फर्रूखाबाद ऐसा क्षेत्र था जहां जातिवादी समीकरण को अनदेखा नहीं किया जा सकता था। न चाहते हुए भी डाॅ लोहिया को अपने विचारों में तनिक ढील देनी पड़ी। जातिगत समीकरण के आधार पर ही डाॅ. लोहिया को फर्रुखाबाद से विजय हासिल हुई। डाॅ लोहिया के पक्ष में पं. दीनदयाल ने भी प्रचार किया यद्यपि वे जातिीय समीकरण के प्रबल विरोधी थे। फिर भी एक व्यापक उद्देश्य के लिए उन्होंने जातिगत समीकरण को नहीं लेकिन डाॅ लोहिया को समर्थन दिया। इधर कांग्रेस ‘‘वोट बैंक’’ की राजनीति पर डटी हुई थी। वहीं पं. दीनदयाल ने अपने क्षेत्र में अपनी ओर से जातिवाद को स्वयं से दूर रखा। उन्होंने खुलेआम अपनी चुनावी सभाओं में यह कहा कि- ‘‘जो जातीय आधार पर मेरी सभा में आए हैं, वे कृपया इस सभा से प्रस्थान कर जाएं। मुझे जाति के आधार पर समर्थन नही चाहिए।’’ 
परिणाम पं. दीनदयाल के लिए पराजय के रूप में सामने आया। किन्तु उन्होंने इसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करते हुए कहा कि-‘‘पं. दीनदयाल की पराजय हुई है लेकिन भारतीय जनसंघ को विजय मिली है।’
           वस्तुतः पं. दीनदयाल जनसंघ में राष्ट्रवादी विचारों एवं राजनीतिक स्वच्छता के संवाहक थे। राजनीति को ले कर उनके विचार स्पष्ट थे। वे अपनों विचारों को व्यक्त करने में हिचकते भी नहीं थे। पं. दीनदयाल उपाध्याय ने ‘राष्ट्रधर्म’ एवं ‘पांचजन्य’ में कई महत्वपूर्ण राजनीतिक लेख लिखे। ये लेख भारतीय राजनीति के स्वरूप पर विवेचनात्मक लेख थे। इनमें भारतीय राजनीति की विशिष्टताओं, व्यवस्थाओं एवं त्राुटियों पर विहंगम दृष्टि डाली गई थी। कुछ अति महत्वपूर्ण लेख इस प्रकार हैं-
(1) भारतीय संविधान पर एक दृष्टि
(2) राष्ट्रजीवन की समस्याएं
(3) राष्ट्रजीवन की दशा
(4) भारतीय राजनीति की मौलिक भूलें
‘राष्ट्रधर्म’ के माध्यम से पं. दीनदयाल आमजन के लिए राजनीति का विश्लेषण सामने रखना चाहते थे। उनका मानना था कि प्रत्येक नागरिक को जो राजनीतिक परिवेश से घिरा रहता है भले ही वह राजनेता न हो, उसे राजनीति के प्रत्येक पक्ष की जानकारी होनी चाहिए। इसी उद्देश्य से उन्होंने ‘राष्ट्रधर्म’ में ‘राष्ट्रजीवन की समस्याएं’ तथा ‘भारतीय राजनीति की मौलिक भूलें’ लेख लिख कर तत्कालीन भारतीय राजनीति की समुचित व्याख्या की। 

अपने लेख ‘राष्ट्रजीवन की दशा’ में उन्होंने लिखा कि ‘‘केवल प्रारंभिक आवश्यकताओं की पूर्ति ही मानव जीवन का उद्देश्य नहीं है। भौतिक आवश्यकताओं के साथ ही मनुष्य की आधिभौतिक और आध्यात्मिक आवश्यकताएं भी होती हैं। केवल संास चलती रखने के परे मानव जीवन का एक निश्चित और सबसे निराला लक्ष्य होता है, उपनिषदों ने इस लक्ष्य का वर्णन आत्मा की आवश्यकताओं के रूप में किया है।’’ इसी लेख में उन्होंने आगे लिखा कि ‘‘किन्तु कतिपय विद्वानों को इस अदृश्य शक्ति में विश्वास नहीं। उनके मत में केवल दृश्यजगत ही एकमेव सत्य है। ये लोग भौतिक सुख-साधनों से युक्त जीवन को चरम लक्ष्य मान कर उन सुखों की प्राप्ति के लिए आवश्यक प्रयास करते रहने में ही मानव जीवन की सार्थकता मानते हैं।’’ 
‘पांचजन्य’ में ‘भारतीय संविधान पर एक दृष्टि’ शीर्षक से लेख लिख कर भारतीय राजनीति की संवैधानिक अवस्था एवं उसके संवैधानिक दायित्वों का गंभीरतापूर्वक आकलन किया। उन्होंने भारतीय संविधान में भारतीयता के तत्वों को बढ़ाए जाने की पैरवी की। वे मानते थे कि महापुरुषों के विचारों के अनुरुप राजनीतिक आचरण से राजनीति में शुचिता बनी रह सकती है। 

       भारतीय इतिहास की गौरवशाली परम्पराएं पं. दीनदयाल को सदैव आंदोलित करती रहीं। वे भारतीय संस्कृति पर पड़ने वाले पाश्चात्य संस्कृति के दुष्प्रभावों को दूर करना चाहते थे। उनका मानना था कि अपने जीवन को उत्तम बनाने के लिए महापुरुषों के जीवन से बहुत कुछ सीखा और आत्मसात किया जा सकता है। अपने लेखों में पं. दीनदयाल ने भारतीय इतिहास में राष्ट्रधारा, कर्मवाद एवं स्वतंत्राता प्राप्ति के प्रयासों में तिलक जैसे महानुभावों के राजनीतिक विचारों और उनके भारतीय इतिहास में महत्व का अंाकलन करने का महती कार्य किया। इस संबंध में उनके तीन लेख विशेष उल्लेखनीय हैं- 
(1) भगवान कृष्ण
(2) भारतीय राष्ट्रधारा का पुण्यप्रवाह: गौतमबुद्ध से शंकराचार्य तक
(3) लोकमान्य तिलक की राजनीति
देश के स्वतंत्र होने के बाद लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की प्रथम जयंती के अवसर पर ‘पांचजन्य’ में ‘लोकमान्य तिलक की राजनीति’ लेख लिखा था। ‘भगवान कृष्ण’ तथा ‘भारतीय राष्ट्रधारा का पुण्यप्रवाह: गौतमबुद्ध से शंकराचार्य तक’ लेख ‘राष्ट्रधर्म’ में प्रकाशित हुए थे।
पं. दीनदयाल यह भली-भांति जानते थे कि देश की सांस्कृतिक विरासत को तभी बचाया जा सकता है, राजनीति को उसी स्थिति में दोषमुक्त रखा जा सकता है जब देश की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हो। चूंकि प्रत्येक अर्थव्यवस्था के मूल में राजनीतिक विचार निहित होते हैं अतः उन्हें यह आवश्यक लगता था कि राजनीतिक दलों को पहले अपने आय-व्यय पर समुचित ध्यान देना चाहिए। जहां तक संभव हो राजनीतिक स्तर पर आर्थिक मितव्ययिता बरती जानी चाहिए। इसे वे संवैधानिक आर्थिक ढांचे के लिए बुनियादी तत्व कहते थे। ‘पांचजन्य’ में ‘राजनीतिक आय-व्यय’ शीर्षक से लेख में उन्होंने लिखा था कि जो लोग मात्रा अर्थ एवं सम्पत्ति को सर्वोपरि मानते हैं और जिनका लक्ष्य मात्रा अर्थ है वे साम्यवाद तथा समाजवादी श्रेणी में आते हैं। ऐसे लोग चाहते हैं कि भारतीय राजनीति की धुरी मात्रा अर्थनीति रहे। ऐसे लोगों की दृष्टि में संस्कृति एवं जनमत का कोई महत्व नहीं होता है। उन्होंने ‘टैक्स या लूट’ शीर्षक लेख में कर प्रणाली की निंदा की।

   पं. दीनदयाल के राजनीतिक उसूलों एवं विचारों से सरसंघ चालक गोलवलकर गुरूजी अत्यंत प्रभावित थे। इसीलिए उन्होंने पं. दीनदयाल की क्षमता पर पूरा भरोसा जताते हुए दल की ओर से उन्हें सबसे बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई। सन् 1967 में जनसंघ का चौदहवां अधिवेशन कालीकट में हुआ। दल के सभी पदाधिकारियों ने एकमत से निर्णय लेते हुए पं. दीनदयाल को जनसंघ का अध्यक्ष घोषित किया। पं. दीनदयाल के जनसंघ के अध्यक्ष बनने से भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय शुरू हुआ। जनसंघ का अध्यक्ष बनने के बाद पं. दीनदयाल का ध्यान इस ओर गया कि जनसंघ की छवि एक हिन्दू सम्प्रदायवादी संस्था के रूप में मानी जा रही है। वे अपने दल को किसी सम्प्रदायवादी शक्ति नहीं वरन् देशभक्ति की शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहते थे। देखा जाए तो आज जब हमारा देश ग्लोबल एप्रोच में शीर्ष पर है, पं. दीनदयाल उपाध्याय के राष्ट्रवादी शुचितापूर्ण राजनीति की ही आवश्यकता है।
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Thursday, April 4, 2024

डॉ. (सुश्री) शरद सिंह जब पत्रकार थीं..

अजी ब्लॉग मित्रो, मैं भी कभी ज़मीनी पत्रकार थी... और पढ़ाई भी करती थी ..🤷 
🚩तत्कालीन केंद्रीय मंत्री श्रीमती मेनका गांधी, श्री एच.के.एल भगत तथा राज्यमंत्री कैप्टन जयपाल सिंह जी से प्रेस कॉन्फ्रेंस की.... तस्वीरें पन्ना के सरकिट हाऊस तथा जनसंपर्क कार्यालय की है ....➡️
🚩1.मेनका गांधी जी की बगल में  खड़ी वो दुबली-पतली पत्रकार मैं हूं 😀
🚩2.एच.के.एल भगत जी से औपचारिक परिचय का आदान-प्रदान🤗
🚩3.एच.के.एल भगत जी से वार्तालाप🤗
🚩4. कैप्टन जयपाल सिंह जी से प्रेसवार्ता😊
एल्बम में मिली यह कुछ पुरानी तस्वीर...
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लेखिका डॉ (सुश्री) शरद सिंह के जीवन एवं लेखन पर लघु फीचर न्यूज़ 18 पर


News 18 के  प्रखर युवा पत्रकार Anuj Goutam द्वारा अपने चैनल के लिए मेरे जीवन तथा लेखन पर बनाए गए लघु फीचर का लिंक आप सभी से साझा कर रही हूं 😊
हार्दिक आभार #News18  🙏
हार्दिक आभार अनुज गौतम जी 🙏

https://hindi.news18.com/news/business/success-story-the-woman-swore-to-take-bundeli-to-every-corner-of-the-country-left-her-university-job-and-wrote-58-books-in-sagar-8205854.html

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बतकाव बिन्ना की | चुनाव की बेरा सबई बर्रयान लगत आएं | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
चुनाव की बेरा सबई बर्रयान लगत आएं    
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       ‘‘ऊ पार्टी के दोरे हमाए लाने खुल जाएं सो हम सोई उते पिंड़ जाएं।’’ लोहरे दाऊ मन मसोसत भए बोले। उनके मों पे उनकी इच्छा छपी सी दिखा रई हती। लोहरे दाऊ को अपनो एक राजनीतिक इतिहास आए। बे चार दफा निर्दलीय ठाड़े भए रए, मनो चारो की चारो बेर उनकी जमानतें जब्त हो गई। मोय तो उनके बारे में जे समझ में कभऊं नहीं आओ के हर बेर जमानत जब्त कराबे के लाने उनके लिंगे रुपैया कां से आ जात आएं? खैर, करत हुइएं कोनऊ जुगाड़। अपनो देश ऊंसई जुगाड़न को देश आए। इते सब कछू जुगाड़ से चलत रैत आए। अब कैने को तो क्रेडिट भगवान जी खों दे दओ जात आए के इते सब कछू भगवान भरोसे चलत आए। बाकी सई कई जाए तो भगवान भरोसे नोईं जुगाड़ भरोसे चलत आए।
अब जेई से तो देख लेओ के पैले जां ‘‘मेड इन इंडिया’’ कओ जात्तो, उतई अब ‘‘मेक इन इंडिया’’ कओ जान लगो। इते-उते से पुरजा जुगाड़ो औ बना लओ कछू ने कछू। जेई टाईप को जुगाड़मेंट तो ई टेम पे अपने इते की चुनावी राजनीति में चल रओ आए। सबई अपनी-अपनी जुगाड़ लगाबे में भैराने से फिर रए। कछू ऊ पार्टी में जाबे के लाने लेन लगा के ठाड़े दिखा रए जोन में पौंच के कछू मिलबे औ जीतबे की उम्मींदे ज्यादा आएं। औ कछू सोच रए के उते तो कओ कोऊ पूछे ना, सो ईसे अच्छो आए के जिते धरे, उतई धरे रओ। बाकी कछू लोहरे दाऊ घांई बी आएं जो चुनाव को टेम आतई साथ बर्रयान लगत आएं। बे इते जात आएं, उते जात आएं औ जब दोरे-दोरे फिरत-फिरत कछू हाथ नई लगत, ऊपर से गोड़े औ दुखन लगत आएं तब बे निर्दलीय ठाड़े हो के अपनो गम गलत करत आएं।
‘‘दाऊ आप तो बरहमेस निर्दलीय ठाड़े होत रए हो, फेर ई बेर काय सोच रए के कोनऊं पार्टी में घुसो जाए?’’ मैंने लोहरे दाऊ से पूछी।
‘‘हऔ, ठीक जेई हम पूछो चा रए हते।’’ भैयाजी सोई बोल परे।
‘‘तुम ओरे का समझो जे राजनीति की बातें? तुमें तो चुनाव में खाली बटन दबाने आए। तुम ओरन खों कोन कछू मेनत करने। जे तो हम ओरन से पूछो जोन खों चुनाव में ठाड़े होने परत आए।’’ लोहरे दाऊ ऐंड़ देत भए बोले।
‘‘काय, ऐसी कोन सी मजबूरी कहानी जो तुमाओ चुनाव में ठाड़े होने जरूरी आए?’’ भैयाजी ने पूछी। उने लोहरे दाऊ की ऐंड़ ने पोसाई।
‘‘मजबूरी आए भैया, बड़ी मजबूरी आए। जो हम ओरें ठाड़े ने होंय तो चुनाव कोन के बीच हुइए?’’ अब की बेर लोहरे दाऊ मुस्क्या के बोले।
‘‘सो आप ने ठाड़े हुइयो, तो कोनऊं तो हुइए। औ जो कोनऊं एकई उम्मीदवार रओ सो ऊको ऊंसई जीत मिली कहाई।’’ भैयाजी ने कई।
‘‘जेई तो बात आए। तुमें का पतो के कोनऊं उम्मीदवार अपने विरोधी के बिगैर चुनाव नई लड़न चात आए। जो अकेलो ठाड़ो हो जाए औ जीतो कहा जाए, तो खबर का बनहे? जा कां से कई जाहे के उन्ने अपने विरोधी खों इत्ते हजार वोटों से हराओ। सो सिंगल वाली जीत तो ऊ फटफटिया घांईं कहाई के नांव तो आए फटफटिया मनो आवाज फुस्स की बी ने होए।’’ लोहरे दाऊ ने बाकायदा उदाहरण दे के हम दोई खों समझाओ।
‘‘पर दाऊ, आप जे कैसे कै रए के हम ओरें जो वोटें डारबे वारे आएं, उने कछू मेनत नईं करनी परत आए? हम ओरन खों सोई सोचने परत आए के कोन खों वोट दओ जाए औ कोन खों ने दओ जाए? कई दफा तो सबरे उम्मींदवार अपने चिनारी वारे निकर आत आएं, ऐसे में सो औरई सोचने परत आए के कोन खों देबे में अपने वोट की इज्जत रैहे?’’ मैंने लोहरे दाऊ से कई।
‘‘हऔ, औ हम ओरन की उंगरिया में सबसे घनी ताकत रैत आए। हमाई उंगरिया जोन को बटन दबा देवे, बोई को उद्धार हो जात आए। जे मानो के वोट डारबे वारन की उंगरिया पे जुगल किशोर जू को सुदर्शनचक्र वोटिंग पावर के रूप में आत जात आए। एक बटन दबाए से जोन बदमाश दिखानो, ऊको राजनीतिक कैरियर कटत भए देर नई लगत।’’ भैयाजी बोले।
‘‘वाह भैयाजी! आपने खूबई नोनों उदाहरण दओ आए। वोट मने सुदर्शनचक्र। बुरए नेताओं से अपने क्षेत्र को बचाबे वारो हथियार। खूब कई आपने।’’ मोय भैयाजी की बात भौतई अच्छी लगी। कभऊं-कभऊं भैयाजी गजब की बात बोल जात आएं।
‘‘औ बे नोटा दबाबे वारन के बारे में का बिचार है आप दोई को?’’ लोहरे दाऊ ने चुटकी सी ले लई।
‘‘हमाए बिचार से तो जे नोटा-मोटा को बटन निकार फेकबो चाइए। जो वोट डारबे जा रए हो तो या तो जिताओ, ने तो हराओ। जे का के हमें कोनऊं नोई पोसा रओ को बटन चटका के आ गए। का उते कोनऊं स्वयंबर हो रओ के तुमें जिनगी भर के लाने सोचने? अरे खाली पांच बरस के लाने चुन लेओ, औ ने तो बीच में छोर-छुट्टी करा के दफा करो जा सकत है। बो का आए, एक विज्ञापन एक बिस्कुट को दिखाओ जात आए ने के अंदर की खूबी तो ट्रायल लेबे में पता परत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ बात तो आप सांची कै रए भैयाजी! बाकी बा विज्ञापन मोय नई पोसात। बा विज्ञापन में एक कोच दिखाओ जात आए औ मोड़ी की मां कैती आए के अंदर की खूबी तो आजमाने पे पता परत आए। अब आपई सोचो के जो कोनऊं कोच मोड़ी की मताई के कैबे में आ के अंदर की कोनऊं और खूबी देखन लगो तो बोई दसा हुइए जो अपने इते की महिला पहलवानों की भई। सो ऐसो विज्ञापन मोय नई अच्छो लगो।’’ मैंने भैयासे कई।
‘‘अरे हऔ, जे तो हमने सोचई ने हती! तुमें कां से सूझी?’’ भैयाजी अचरज कर भए पूछन लगे।
‘‘मोरो सोई ध्यान नई गओ रओ। बा तो एक भौजी आएं उन्ने जा बात कई, सो मोय सोई सोचने परी के बे कै तो सई रईं।’’ मैंने भैयाजी खों बताई।
‘‘तुम ओरें कां से कां पौंच गए? बात चल रई हती नोटा के बटन की औ तुम ओरे अंदर की खूबी ले के बैठ गए।’’ लोहरे दाऊ नाराज होत भए बोले। उने हम ओरन की बात अपने मतलब की नईं लगी।
‘‘सो, आप बताओ के जो आपके लाने बा बड़ी पार्टी के दोरे खुल जाएं सो आप का करहो?’’ मैंने लोहरे दाऊ से पूछी। मोरो सवाल सुन के लोहरे दाऊ ऐसे खुश भए जैसे राजा बिक्रमादित्य के कंधा पे बैठो भूत फेर के पीपर के पेड़ पे लटक के खुश हो गओ होय।
‘‘जो हमाए लाने उते के दोरे खुल जाएं सो हमें टिकट सोई मिल जाहे।’’ लोहरे दाऊ उचकत भए बोले। मनो उने टिकट मिलत भई दिखान लगी।
‘‘दाऊ, नींद में ने निंगो, गिर जैहो!’’ मैंने कई।
‘‘का मतलब?’’ दाऊ ने चैंक के पूछी।
‘‘मतलब जे के आप सपनोई देखत रैहो, उते सबरी टिकट खतम भई जा रईं।’’ मैंने लोहरे दाऊ खों याद कराई।
‘‘सो होन देओ खतम। बे हमें टिकट ने दें, सो ने दें। हम वोट सो काटई लेबी।’’ लोहरे दाऊ चतुराई से मुस्काए।
उनकी बात सुन के अब की बेरा मैं चैंक गई। काय से के उनको हर-हर दइयां चुनाव में ठाड़ो होबो और अपनी जमानतें जब्त कराबे को चक्कर कछू-कछू समझ में आ गओ।
‘‘सो जा बात आए!’’ मोरो मों से निकर परो।
मोरी बात सुन के भैयाजी ने मोरो हाथ दबा के मोए चुप रैबो को इशारो करो औ धीरे से बोले,‘‘दाऊ खों बर्रयान तो देओ। चुनाव के टेम पे सबई बर्रयान लगत आएं। तुम औ ने छेड़ो, ने तो जे अबई अपने दोई की खपड़िया खा जैहें।’’
भैयाजी की बात सुन के मोय हंसी आ गई। बाकी उनकी बात सई हती, सो मैं उठ खड़ी भई औ लोहरे दाऊ से टाटा-बाय-बाय करी। जो लौं भैयाजी सोई बोले के,‘‘मोय सोई कटरा जाने, फिर मिलबी दाऊ! जो आपके लाने दोरे खुल जाएं सो बतइयो।’’
हम दोई उते से खसक गए। दाऊ बी कोऊ और खों पकरबे के लाने निकर परे। बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
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Wednesday, April 3, 2024

चर्चा प्लस | लोक जीवन में जल और पर्यावरण के सरोकार | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
लोक जीवन में जल और पर्यावरण के सरोकार
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      गर्मियां शुरू होते ही सबसे पहली चिन्ता जागती है जल समस्या की। जल का घटता हुआ स्तर इस बात की संभावना प्रकट करने लगता है कि आगे चल कर दिन और कठिनाइयों भरे और शुष्क होंगे। वहीं यदि हम अपनी लोक चेतना को टटोलें तो पाएंगे कि लोक जीवन में जल और पर्यावरण के प्रति हमेशा जागरूकता रही है। यह जागरूकता किसी नारे या अभियान के समान नहीं थी बल्कि प्रकृति ये आत्मीयता के रूप में थी। एक रिश्तेदारी के रूप में थी। संकट तभी से शुरू हुआ जब से हमने प्रकृति से अपनी रिश्तेदारियां को भुला दीं और हम उसके शोषणकर्ता बन गए।      
    महात्मा गांधी ने 26 सितम्बर 1929 के ‘यंग इंडिया’ के अंक में लिखा था- ‘‘ऐसी हालत में वृक्ष-पूजा में कोई मौलिक बुराई या हानि दिखाई देने के बजाए मुझे तो इसमें एक गहरी भावना और काव्यमय सौंदर्य ही दिखाई देता है। वह समस्त वनस्पति-जगत् के लिए सच्चे पूजा-भाव का प्रतीक है। वनस्पति-जगत तो सुन्दर रूपों बौर आकृतियों का अनन्त भण्डार है। उनके द्वारा वह मानो असंख्य जिह्वाओं से ईश्वर की महानता और गौरव की घोषणा करता है। वनस्पति के बिना इस पृथ्वी पर जीवधारी एक क्षण के लिए भी नहीं रह सकते। इसलिए ऐसे देश में जहां खासतौर पर पेड़ों की कमी है, वृक्ष पूजा का एक गहरा आर्थिक महत्व हो जाता है।’’

जल और पर्यावरण दोनों ही जीवन के आवश्यक तत्व हैं। जल के बिना जीवन संभव नहीं है और स्वस्थ पर्यावरण के बिना जल की उपलब्धता संभव नहीं है। हमारे ऋषि-मुनियों को पर्यावरण का समुचित ज्ञान था। उन्होंने जड़ जगत अर्थात् पृथ्वी, नदियां, पर्वत्, पठार आदि तथा चेतन जगत अर्थात् मानव, पशु, पक्षी, वनस्पति आदि के पारस्परिक सामंजस्य को भी समझा और इस सामंजस्य को पर्यावरण के एक आवश्यक तत्व के रूप में निरूपित किया।वे समझ गए थे कि जड़ एवं चेतन तत्वों में किसी की भी क्षति होने से प्रकृति का संतुलन बिगड़ सकता है। इसीलिए उन्होंने प्रत्येक तत्व के प्रति आदर-भाव को प्रतिपादित किया। ताकि मानव किसी भी तत्व को क्षति न पहुंचाए। हम धीरे-धीरे इन प्राचीन मूल्यों को भूलते गए जिसके फलस्वरूप आज हमें पर्यावरण असंतुलन के संकट से जूजना पड़ रहा है। उदाहरण के लिए - जब तक हमारे मन-मस्तिष्क में वृक्ष देवता के रूप में अंकित रहे तब तक हमने वनों की अंधाधुंध कटाई नहीं की। किन्तु जैसे-जैसे हमने वन एवं वृक्षों को देवतुल्य मानना छोड़ दिया वैसे-वैसे वे हमें मात्र उपभोग की वस्तु दिखने लगे और हमने उन्हें अंधाधुंध काटना शुरू कर दिया।
 
आज दुनिया के अधिकांश देश जल-संकट से जूझ रहे हैं। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में पेय-जल का संकट सबसे भयावह संकट कहा जा सकता है। जिस देश में कभी कुए, तालाब और नदियों की कमी नहीं रही वहां के आमजन को आज पीने के पानी के लिए जूझना पड़ रहा है। देश में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहंा एक घड़ा पानी लाने के लिए औरतों को चार-पांच किलोमीटर से भी अधिक की दूरी तय करनी पड़ती है। हमारे देश में पानी के संकट का सबसे बड़ा कारण आबादी के अनुपात में घटते हुए जल संसाधन हैं। इस मामले में कहा जा सकता है कि हमारे पूर्वज हमसे कई गुना अधिक दूरदर्शी थे। क्यों कि जिस समय जल की कोई कमी नहीं थी उस समय भी उन्होंने जल को संरक्षित करने के आचरण को अपनाया। वैदिक ग्रंथों में इस तथ्य का अनेक स्थानों पर उल्लेख है।
 
लोक जीवन में आज भी जल और पर्यावरण के प्रति सकारात्मक चेतना पाई जाती है। एक किसान धूल या आटे को हवा में उड़ा कर हवा की दिशा का पता लगा लेता है। वह यह भी जान लेता है कि यदि चिड़िया धूल में नहा रही है तो इसका मतलब है कि जल्दी ही पानी बरसेगा। लोकगीत, लोक कथाएं एवं लोक संस्कार प्रकृतिक के सभी तत्वों के महत्व की सुन्दर व्याख्या करते हैं। लोक जीवन की धारणा में पहाड़ मित्र है तो नदी सहेली है, धरती मंा है तो अन्न देवता है। प्रकृति के वे सारे तत्व जिनसे मिल कर यह पृथ्वी और पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जड़-चेतन मनुष्य के घनिष्ठ हैं, पूज्य हैं ताकि मनुष्य का उनसे तादात्म्य बना रहे और मनुष्य इन सभी तत्वों की रक्षा के लिए सजग रहे।
आज हम नदियों की स्वच्छता और जल-स्तर को ले कर चिन्तित हैं वहीं एक नदी लोकजीवन में किस तरह आत्मीय हो सकती है यह तथ्य बुन्देलखण्ड में गाए जाने वाले बाम्बुलिया लोकगीत में देखा जा सकता है। एक नदी लोकजीवन में किस तरह आत्मीय हो सकती है यह तथ्य बुन्देलखण्ड में गाए जाने वाले बम्बुलिया लोकगीत में देखा जा सकता है। बुंदेलखण्ड में नर्मदा को मां का स्थान दिया गया है। नर्मदा स्नान करने नर्मदातट पर पहुंची मनुष्यों की टोली नर्मदा को देखते ही गा उठती है-
नरबदा मैया ऐसे तौ मिलीं रे
अरे, ऐसे तौ मिलीं के जैसे मिले मताई औ बाप रे
नरबदा मैया... हो....
भोजपुरी लोकगीत में गंगा को मां, यमुना को बहन, चांद और सूरज को भाई कहा गया है और साथ ही स्त्री की झिझक को प्रकट करते हुए यह भी कहा गया है कि इनके द्वारा अपने परदेसी पति को संदेश कैसे भिजवाऊ?
चननिया छिटकी मैं का करूँ
गुझ्या गंगा मोरी मइया,
जमुना मोरी बहिनी,
चान सुरुज दूनो भइया,
पिया को संदेस भेजूं गुंइया।

 वनस्पति के मानवीकरण भोजपुरी लोकगीतों में बड़े सुन्दर ढंग से मिलता है। जैसे उपनयन, विवाह आदि सरकारों में तीर्थस्थल गया को और तीर्थराज प्रयाग को निमत्रण भेजा जाता है-
गया जी के नेवतिले आजु
त नेवीती बेनीमाधव हो।
नवतिले तीरथ परयाग,
तबही जग पूरन...।
अर्थात जब गया और तीर्थराज प्रयाग जैसे पावन स्थलों का आवाहन किया जाएगा तभी यज्ञ तभी पूरा होगा। आधुनिक समाज में जिन लोक संस्कारों को पुरातन मान्यता कह कर अनदेखा कर दिया जाता है उन लोक संस्कारों में भी जल और पर्यावरण के प्रति जागरूकता के अनेक तत्व मौजूद हैं। कुछ उदाहरण यहां प्रस्तुत हैं -
मातृत्व साझा कराना - सद्यःप्रसूता जब पहली बार प्रसूति कक्ष से बाहर निकलती है तो सबसे पहले वह कुएं पर जल भरने जाती है। यह कार्य एक पारिवारिक उत्सव के रूप में होता है। उस स्त्राी के साथ चलने वाली स्त्रियां कुएं का पूजन करती हैं फिर प्रसूता स्त्री अपने स्तन से दूध की बूंदें कुएं के जल में निचोड़ती हैं। इस रस्म के बाद ही वह कुएं से जल भरती है। इस तरह पह पेयजल को अपने मातृत्व से साझा कराती है क्योंकि जिस प्रकार नवजात शिशु के लिए मां का दूध जीवनदायी होता है उसी प्रकार समस्त प्राणियों के लिए जल जीवनदायी होता है।
कुआ पूजन - विवाह के अवसर पर विभिन्न पूजा-संस्कारों के लिए जल की आवश्यकता पड़ती है। यह जल नदी, तालाब अथवा कुए से लाया जाता है। इस अवसर पर रोचक गीत गाए जाते हैं। ऐसा ही एक गीत है जिसमें कहा गया है कि विवाह संस्कार के लिए पानी लाने जाते समय एक सांप रास्ता रोक कर बैठ जाता है। स्त्रियां उससे रास्ता छोड़ने का निवेदन करती हैं किन्तु वह नहीं हटता है। जब स्त्रियां उसे विवाह में आने का निमंत्रण देती हें तो वह तत्काल रास्ता छोड़ देता है।
सप्तपदी में जल विधान - विवाह में सप्तपदी के समय पर जो पूजन-विधान किया जाता है, उसमें भी जल से भरे मिट्टी के सात कलशों का पूजन किया जाता है। ये सातो कलश सात समुद्रों के प्रतीक होते हैं। इन कलशों के जल को एक-दूसरे में मिला कर दो परिवारों के मिलन को प्रकट किया जाता है।
पूजा-पाठ में जल का प्रयोग - पूजा-पाठ के समय दूर्वा से जल छिड़क कर अग्नि तथा अन्य देवताओं को प्रतीक रूप में जल अर्पित किया जाता है जिससे जल की उपलब्धता सदा बनी रहे।
मृत्यु संस्कार में जल का प्रयोग -  मृत्यु संस्कार में जल से भरा हुआ घट उपयोग में लाया जाता है।  

कहने का आशय यही है कि लोक जीवन में जीवन के आरम्भ से ले कर जीवन के समापन तक जल की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।
जीवन में जल के महत्व, उसके संरक्षण और पर्यावरण संतुलन के विचार को व्यापक रूप से प्रचारित और प्रसारित करने के लिए आवश्यक है कि हम आधुनिक वैज्ञानिक संसाधनों एवं धारणाओं के साथ-साथ परम्परागत लोकमूल्यों एवं विचारों को भी माध्यम बना कर चलें। इस तरह हम उन सभी में जल और पर्यावरण के संरक्षण के प्रति पुनः चेतना ला सकेंगे जो उपभोक्तावादी आधुनिकता से भ्रमित हो कर इस पृथ्वी सहित स्वयं के भविष्य को नष्ट करने की दिशा में चल पड़े हैं। या दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि ऐसे लोग जिस डाल पर बैठे हैं, उसी को काट रहे हैं। इस डाल को बचाने के लिए लोक थाती से चेतना के तत्व उठा कर उन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लोक मानस में एक बार फिर संचारित करना होगा ताकि वे सारे लोकतत्व जो जल और पर्यावरण संरक्षण में सहयोगी भूमिका निभा सकते हैं, उनका उपयोग किया जा सके। लेकिन इन सबके लिए हमें अपनी उस आत्मीयता पूर्ण लोक व्यवहार की ओर लौटना होगा जहां प्रकृति हमारी है और हम प्रकृति के हैं। आज जब हम अपने रक्तसंबंधियों से, पड़ोसियों से, परिचितों से तक दूर होते जा रहे हैं तो प्रकृति से निकट होने की आशा करना खोखली आशा प्रतीत होती है। हमें अपने भीतर उस आत्मीयता को फिर से जगाना होगा जो यह सिखाती है कि यदि हमारे पास एक रोटी है तो हम उसे आपस में बांट कर खाएं। जरा सोचिए यदि एक समर्थ व्यक्ति बिजली की मोटर लगा कर जलस्रोत का पूरा पानी खींच ले तो बाकी लोगों के हिस्से में तो जल संकट ही आएगा। यदि उसी पानी को मितव्ययिता से और आपस में बांट कर काम में लाएंगे तो कोई संकट पैदा नहीं होगा। लोकजीवन में यही मूलमंत्र था जिसने प्रकृति को हर तरह के संकटों से सदियों तक बचाया।  
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Tuesday, April 2, 2024

पुस्तक समीक्षा | इन वीतरागी कविताओं में है जीवन का सच | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 02.04.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई मुनिश्री क्षमा सागर जी के काव्य संग्रह (चयन एवं सम्पादन : प्रताप राव कदम) "चिड़िया लौट आई है" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा
इन वीतरागी कविताओं में है जीवन का सच
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह  - चिड़िया लौट आई है
कवि        - मुनिश्री क्षमासागर
चयन एवं सम्पादन - प्रताप राव कदम
प्रकाशक    - राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड 7/31, अंसारी मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-110 002
मूल्य       - 95/-
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कविताएं और वह भी एक मुनिश्री की! यह सोच कर ही हर पाठक पूर्वाग्रही हो उठता है। उसे लगता है कि इन रचनाओं में तत्व दर्शन, ज्ञान दर्शन, धर्म दर्शन तथा दर्शन के तमाम कठिन आयाम होंगे। ऐसे में  पाठक थोड़ा सतर्क हो कर, भयभीत होकर, पढ़ना शुरू करता है। ऐसे साहित्य को पढ़ते समय मन के किसी कोने से बार-बार एक ध्वनि की आवृत्ति होती है कि हम एक मुनिश्री की रचनाएं पढ़ रहे हैं। एक ऐसे व्यक्ति की रचनाएं जो तमाम कषाय को बहुत पीछे छोड़ चुका है। जो वितरागी है। जो जीवन के प्रपंचों से बहुत दूर निकल गया। जो आत्म चिंतन में लीन रहता रहा। लेकिन जब हम मुनि क्षमासागर जी की कविताओं से हो कर गुजरते हैं तो यह अनुभव करके चकित रह जाते हैं कि उनके वीतरागी चिंतन में जीवन का सटीक परिचय है। मुनि क्षमासागर का चिंतन सकल मानवता को अभिव्यक्ति देता है। वे चिड़िया, नदी, आकाश, रोशनी, खिड़की आदि के बहाने मानवता की ही बात करते हैं। वे कहीं भी जिंदगी से पलायन की बात नहीं करते बल्कि जीवन को पूरे जोश और होश से जीने की बात उन्होंने अपनी कविताओं में की है। उनकी हर कविता में जिंदगी का एक सबक है, एक अनुभव है। 

मुनि क्षमासागर जी की कविताओं का चयन एवं संपादन किया है प्रताप राव कदम ने, जो स्वयं एक प्रतिनिधि साहित्यकार हैं। प्रताप राव कदम ने संग्रह की भूमिका में मुनिश्री की कविताओं के संबंध में बहुत सटीक बात लिखी है कि-‘‘मुनि क्षमासागरजी की कविताओं से गुजरकर चीजें वह नहीं रहती जो पूर्व में थीं। उन्हें देखने का नजरिया अलहदा हो जाता है।’’
जब कोई रचना पाठक का दृष्टिकोण बदलने की क्षमता रखती हो तो उसका प्रभाव सर्वकालिक हो जाता है। मुनिश्री की कविताएं सर्वकालिक संवाद की कविताएं हैं। वे भीड़ में एकाकीपन की व्याख्या करते हैं। जीवन में भीड़ महत्वपूर्ण नहीं होती। भीड़ तो मात्र एक भ्रम पैदा करती है। व्यक्ति भीड़ से घिरा हो तो वह स्वयं को सक्षम और सर्वप्रिय मान लेने की भूल कर बैठता है। इस बात को आकाश की उपमा के माध्यम से मुनिश्री ने बहुत सटीकता से सामने रखा है, अपनी ‘‘आकाश’’ शीर्षक कविता में - 
रात आती है 
सारा आकाश 
तारों से 
भर जाता है 
दिन होते ही 
मानो सब 
झर जाता है 
इसमें सोचो 
तो सोचते ही रहो 
हाथ क्या आता है? 
जो समझते हैं 
वे समझते हैं 
कि डूबते-उगते 
सितारे हैं 
आकाश 
अकेला था 
अकेला ही
रह जाता है।
जीवन का एक शाश्वत सत्य है मृत्यु। लोग मुत्यु को भूले रहना चाहते हैं। किन्तु मुनिश्री अपनी कविता के माध्यम से आग्रह करते हैं कि मृत्यु से भयभीत रहते हुए जीवन व्यतीत करने से अच्छा है कि उसका स्वाभाविक रूप से स्वागत करो। उसे याद रखो। तभी जीवन को अच्छे ढंग से जिया जा सकता है। ‘‘द्वार-दीप’’ में यही संदेश रेखांकित किया है मुनिश्री ने-
मौत को 
प्रणाम करता हूं 
कि मैं /जीने की 
शुरुआत करता हूं 
डूबते सूरज को 
प्रणाम करता हूँ 
कि मैं /द्वार पर 
इक दीप धरता हूं
मृत्यु पर ही एक और बहुत सुंदर कविता है ‘‘जवाब’’, जिसमें मुनिश्री ने सरल, सहज शब्दों में मृत्यु के अकाट्य सत्य को निरूपित किया है-
हमारी हर सांस 
मौत के नाम 
रोज-रोज 
खत लिखती है 
लेकिन मौत 
एक रोज आकर 
खुद जवाब देती है। 
मुनि क्षमासागर जी का प्रकृति को देखने का दृष्टिकोण मानव जीवन के सापेक्ष रहा। वे प्रकृति के तत्वों को मनुष्य की भांति संघर्षरत देखते रहे। “रोशनी के लिए” कविता में कवि ने सूरज को एक निरंतर, चिरंतन, सतत प्रयास का प्रतीक माना है -
सांझ के किनारे 
खड़े हो कर 
मैंने पहाड़ से उतरती 
रात को देखा 
और सोच में 
डूब गया/कि अँधेरा 
कितने जल्दी 
उतर आया/सुबह 
रोशनी के लिए 
सूरज को /पूरा पहाड़ 
चढ़ना होगा।
आज हम भौतिकवाद से इतने अधिक घिर गए हैं कि चौबीस घंटे संग्रहण की चिंता में डूबे रहते हैं। हर व्यक्ति को यही लगता है कि उसे यह भी मिल जाए, वह भी मिल जाए। और जो मिलता है वह उसे हमेशा अपर्याप्त प्रतीत होता है। यह संग्रहण की प्रवृत्ति व्यक्ति को हमेशा बेचैन बनाए रखती है। उसका सुकून खो जाता है जब वह व्यक्ति किसी को देखता है और स्वयं की उससे तुलना करके सोचता है कि ‘उसकी कमीज मेरी कमीज से सफेद क्यों?’ यहीं से सारा टेंशन शुरू हो जाता है। जब टेंशन होगा तो मन में सुकून कहां से रहेगा? इसीलिए जैन धर्म सहित सभी धर्मों में उतना ही संग्रहण करने की बात कही गई है जितना पारिवारिक स्थिति में नितांत आवश्यक हो। इस बात को मुनि क्षमासागर जी ने अपनी कविता ‘‘सुकून’’ में तार्किकता से कहा है जिसमें वह चिड़िया के माध्यम से भौतिकतावाद और आत्मसंतोष तथा आत्मिक सुख की बात करते हैं-
चिड़िया के पास 
जेब नहीं है 
जिसमें वह रुपए 
रख सके।
दुकान नहीं है 
जिससे व्यापार कर 
चार पैसे कमा सके 
और आड़े समय में 
अपनी गृहस्थी 
सुख से बिता सके। 
उसके पास है 
निस्पृहता, 
कुछ नहीं होते 
हुए भी/सब कुछ,
जीवन का सुकून ।
‘‘चिड़िया लौट आई है’’ के नाम से प्रकाशित मुनिक्षमासागर जी की चयनित कविताएं कालजयी हैं। इन्हें बार-बार पढ़ा जाना ज़रूरी है। इन्हें जितनी बार पढ़ा जाए उतनी बार चिंतन के उतने विविध आयाम मस्तिष्क का द्वार खटखटाएंगे। वस्तुतः मुनि क्षमासागर की वीतरागी कविताओं में है जीवन का सच। मुनिश्री की कविताओं से होकर गुजरना जीवन के यथार्थ से परिचित होने के समान है। उनकी कविताएं जीवन जीने का सही रास्ता दिखाती हैं। चिड़िया, नदी, आकाश आदि प्राकृतिक बिंबो के द्वारा मुनिश्री ने काषाय को त्याग कर जीवन को सार्थक बनाने का मार्ग सुझाया है। मुनि क्षमासागर एक जैन मुनि होने के साथ ही बहुत बड़े दार्शनिक, चिंतक एवं श्रेष्ठ कवि थे। साहित्य, धर्म, दर्शन और समाज के लिए उनका अवदान हमेशा याद रखा जाएगा। तथा इस संग्रह में चयनित एवं संग्रहीत उनकी कविताएं मनुष्यत्व का पाठ पढ़ाती रहेंगी।
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