Wednesday, January 10, 2018

चर्चा प्लस ... हादसों के बीच स्कूली बच्चे और हमारी चेतनाहीनता - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
मेरा कॉलम : चर्चा प्लस
हादसों के बीच स्कूली बच्चे और हमारी चेतनाहीनता
- डॉ. शरद सिंह


(दैनिक सागर दिनकर, 10.01.2018)

    इन्दौर स्कूल बस हादसा एक ऐसा सबक है जिससे हमारी आंखें खुल जानी चाहिए। साथ ही प्रश्न उठता है कि नौनिहालों की ज़िन्दगी से खिलवाड़ करने वाले कौन हैं? इस प्रश्न के उत्तर में पहली उंगली उठती है लापरवाह बस मालिकों की ओर जो स्कूल बसों के लिए निर्धारित सुरक्षा नियमों का ठीक से पालन नहीं करते हैं। दूसरी उंगली उठती है, उन ड्राईवर्स की ओर जो गाड़ी की फिटनेस की बिना बारीकी से जांच किए, बसों में बच्चों को भर कर चल पड़ते हैं। तीसरी उंगली उठती है, उन माता-पिता एवं अभिभावकों की ओर जो स्कूल बसों पर बच्चों को चढ़ाने से पहले बस की फिटनेस के प्रति कोई जागरूकता नहीं दिखाते हैं। क्या हम इतने चेतनाहीन होते जा रहे हैं कि बच्चों का जीवन बचाने के लिए एक अभिभावक या एक नागरिक के रूप में सजग नहीं हो सकते हैं?
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik

एक उत्साही एवं जागरूक फेसबुक मित्र हेमेन्द्र सिंह चंदेल बगौता ने अपनी एक पोस्ट में मध्यप्रदेश के छतरपुर नगर में चल रही कुछ ऐसी स्कूल बसों के बारे में जानकारी शेयर की जो शासन द्वारा निर्धारित किए गए सुरक्षा नियमों का पालन नहीं कर रही हैं। उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा कि ‘‘इंदौर स्कूल बस हादसा से न तो छतरपुर के बच्चों के माता पिता ने न ही स्कूल संचालकों ने कोई सबक नही लिया है और न ही आरटीओ विभाग ने कोई चेकिंग करने की जहमत उठाई है।’’ उन्होंने प्रमाण के तौर पर कुछ कागज़ात भी फेसबुक पर शेयर किए। यूं तो छतरपुर के हेमेन्द्र सिंह चंदेल (जैसा कि उनकी प्रोफाईल में लिखा है) म.प्र. कांग्रेस आई.टी. एवं सोशल मीडिया सेल के प्रदेश सचिव हैं लेकिन यहां मुद्दा राजनीतिक नहीं अपितु उन मासूम बच्चों की ज़िन्दगी है जो हमारा भविष्य हैं। वैसे भी ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीतिक खींचतान के बजाए मानवीय आधार को प्रमुखता मिलनी चाहिए। अच्छा लगा उनकी फेसबुक-पोस्ट को देख कर कि कोई व्यक्ति सुरक्षा-कमियों के प्रति प्रमाण सहित आवाज़ उठा रहा है। यदि कोई स्कूल बस मालिक सुरक्षा नियमों की अनदेखी कर रहा है तो हर व्यक्ति का दायित्व है कि वह ‘व्हिसिल-ब्लोअर’ बन कर ऐसी जानकारी को सामने लाए ताकि कोई बड़ा हादसा होने से पहले स्थिति को सुधारा जा सके। यह देश के हर शहर के नागरिकों एवं प्रत्येक उस माता-पिता का दायित्व है जो अपने बच्चों को स्कूल बसों में भेजते हैं।
इन्दौर स्कूल बस हादसा एक ऐसा सबक है जिससे हमारी आंखें खुल जानी चाहिए। इंदौर के कनाडिया रोड के पास एक सड़क दुर्घटना में 5 बच्चों समेत बस ड्राइवर की मौत हो गई। इस हादसे में डीपीएस (दिल्ली पब्लिक स्कूल) की स्कूली बस के ड्राइवर की लापरवाही का मामला सामने आया। हुआ यूं कि तेजाजी नगर की ओर जा रही एक तेज रफ्तार दिल्ली पब्लिक स्कूल बस कनाडिया क्षेत्र के पास सामने से आ रहे ट्रक से टकरा गई। इस घटना में स्कूली बस में सवार 5 बच्चों और ड्राइवर की मौत हो गई है। कनाडिया थाना प्रभारी के अनुसार, ’‘स्कूली बस गलत साइड से जा रही थी। शायद बस के ब्रेक फेल हो गए या फिर डिवाइडर से टकराने की वजह से ट्रक से सीधी भिड़ंत हो गई।’’ हादसे में स्कूल बस का अगला भाग बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। स्कूल की छुट्टी के बाद यह बस विद्यार्थियों को उनके घर छोड़ने जा रही थी। कनाडिया थाना प्रभारी ने बताया कि बस तेजाजी नगर की तरफ जा रही थी, जो कि वन-वे है। मतलब साफ है कि स्कूली बस गलत दिशा में जा रही थी। पूरी घटना पर टिप्पणी करते हुए एएसपी इंदौर ने भी कहा, बस ने अपना संतुलन खो दिया और दूसरी लेन में सामने से आ रहे ट्रक से टकरा गई। प्रश्न यह उठता है कि गलती कहां और किससे हुई है?
चिंताजनक बात यह भी है कि विगत दो माह में अर्थात् नवम्बर, दिसम्बर 2017 में भी स्कूल बसों के भीषण हादसां ने दिल दहलाया है। विगत 30 नवम्बर, 2017 को उत्तर प्रदेश के गौतमबुद्ध नगर जनपद के सेक्टर 39 थाना क्षेत्र में गोल्फ कोर्स मेट्रो स्टेशन के पास स्कूली बच्चों से भरी बस पलट गई। सुबह लगभग 7ः30 बजे नौ स्कूली बच्चों और दो अध्यापिकाओं को लेकर जा रही विश्व भारती पब्लिक स्कूल की बस गोल्फ कोर्स मेट्रो स्टेशन के पास शशि चौक पर ऑटो को बचाने की कोशिश में अनियंत्रित होकर पलट गई। बस पलटने से उसमें सवार बच्चे और शिक्षिकाएं फंस गईं। बच्चों की चीख-पुकार सुनकर मौके पर पहुंचे लोगों ने बस का शीशा तोड़कर बच्चों को सकुशल निकाला। गनीमत यह है कि इस हादसे में बस चालक और कुछ बच्चे मामूली रूप से घायल हुए। मौके पर पहुंची पुलिस ने लोगों की मदद से बच्चों और अध्यापिकाओं को सकुशल बाहर निकाला। बस एक प्राइवेट ट्रैवलर की थी। वह स्कूल की बस नहीं थी। बस मालिक ने सुरक्षा के पूरे मानक पूरे नहीं किए थे।
वहीं इससे पहले 03 नवम्बर 2017 को हिमाचल प्रदेश के मंडी से बच्चों को लेकर आगरा आ रही बस एक्सप्रेस-वे पर पलट कर खाई में जा गिरी। इस हादसे में बस ड्राइवर की मौत हो गई जबकि, टीचर व बच्चे मिलाकर 35 लोग घायल हो गए। हादसे में गंभीर रूप से घायल एक छात्र का हाथ काटना पड़ा। हादसा बस का अचानक टायर फटने की वजह से हुआ। बताया जाता है कि बागपत नंबर की टूरिस्ट बस हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में स्थित आलोक भारती पब्लिक स्कूल के करीब 125 बच्चों को स्टडी टूर पर लेकर निकली थी। गुरुवार को छात्रों ने मथुरा, वृंदावन का भ्रमण किया। शुक्रवार की सुबह बच्चों को आगरा घुमाने के लिये मथुरा से एक्सप्रेस-वे के रास्ते से निकली थी। इसी दौरान जब बस एत्मादपुर के गढ़ी रस्मी गांव के करीब झरना नाले पर पहुंची तभी बस का अगला टायर अचानक तेज आवाज के साथ फट गया। बस की रफ्तार तेज होने की वजह से ड्राइवर बस पर नियंत्रण नहीं कर पाया और बस रोड साइड रेलिंग तोड़ते हुए खाई में जा गिरी।
यूं भी, भारत में हर वर्ष सड़क दुर्घटना में मृत्यु का आंकड़ा बढ़ रहा है। सन् 2015 में 400 लोगों के प्रतिदिन मौतों की तुलना में पिछले साल 2016 में भारत में सड़क दुर्घटनाओं में कम से कम 410 लोगों की प्रतिदिन मौत का आंकड़ा दर्ज किया गया। टाइम्स ऑफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार डेढ़ लाख लोग 2016 में सड़क दुर्घटना में मारे गए जबकि तुलनात्मक रुप से 2015 में ये आंकड़ा एक लाख छियालिस हज़ार था। साल 2016 में उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल सहित छह राज्यों में हुए मौतों के आंकड़े को देखा जाए तो इसमें चिंताजनक वृद्धि हुई है। इन आकड़ों ने 1970 के बाद के सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं।
देश में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं के दुखद सच के बीच उन बच्चों की ज़िन्दगी दांव पर लगी रहती है जो लापरवाह बस मालिकों की बसों में अपना भविष्य बनाने घर से निकलते हैं और अपने जीवन से हाथ धो बैठते हैं। स्कूली बच्चों की मृत्यु के ये आंकड़े बताते हैं हमारे देश में स्कूल जाने-आने के दौरान होने वाली सड़क दुर्घटना में बच्चों की मृत्यु दर में प्रति वर्ष बढ़ोत्तरी होती जा रही है। वर्ष 2000 से 2012 तक के आंकड़ों के अनुसार देश में मध्य प्रदेश ‘टॉप फाईव’ सबसे असुरक्षित राज्यों में शामिल है। नंबर एक पर महाराष्ट्र है, जहां वर्ष 2000 से 2012 में लगभग 52,073 स्कूली बच्चों की मौत हुई। वहीं 48,993 के आंकड़े के साथ मध्यप्रदेश दूसरे नंबर पर है। देश में प्रतिदिन लगभग 2 करोड़ 70 लाख स्कूली बच्चे अनुमानतया 5 लाख बसों से स्कूल जाते हैं। इस दौरान कतिपय लापरवाह बस स्कूल मालिकों के कारण उनकी सलामती की कोई गारंटी नहीं रहती है। सन् 2002 से 2012 के बीच एक दशक के आंकड़ों से भी साफ़ पता चलता है कि भारत में सड़क दुघर्टना में होने वाली स्कूली बच्चों की मौतों में बढ़ोत्तरी होती जा रही है।
प्रश्न फिर वही कि नौनिहालों की ज़िन्दगी से खिलवाड़ करने वाले कौन हैं? इस प्रश्न के उत्तर में पहली उंगली उठती है लापरवाह बस मालिकों की ओर जो स्कूल बसों के लिए निर्धारित सुरक्षा नियमों का ठीक से पालन नहीं करते हैं। दूसरी उंगली उठती है, उन ड्राईवर्स की ओर जो गाड़ी की फिटनेस की बिना बारीकी से जांच किए, बसों में बच्चों को भर कर चल पड़ते हैं। तीसरी उंगली उठती है, उन माता-पिता एवं अभिभावकों की ओर जो स्कूल बसों पर बच्चों को चढ़ाने से पहले बस की फिटनेस के प्रति कोई जागरूकती नहीं दिखाते हैं। क्या हम इतने चेतनाहीन होते जा रहे हैं कि बच्चों का जीवन बचाने के लिए एक अभिभावक या एक नागरिक के रूप में सजग नहीं हो सकते हैं? माता-पिता होने का मात्र इतना ही दायित्व नहीं होता है कि मोटी फीस और डोनेशन दे कर बच्चों को अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाया और उस स्कूल या उससे संबंधित बस आदि की सुविधाएं उपलब्ध कराने वालों के गुलाम हो गए। आंख मूंद कर बच्चों का बस पर चढ़ाया और उनकी सुरक्षा के प्रति हो गए निश्चिन्त। जिस तरह हम अपने बच्चों के खाने-पीने, ओढ़ने-पहनने के प्रति सर्त्तकता बरतते हैं, ठीक वैसे ही उन्हें स्कूल ले जाने वाली बसों की फिटनेस के प्रति भी सचेत रहना होगा। यदि बस सुरक्षा नियमों के अनुरूप नहीं है तो बस मालिक को टोकना होगा, यदि चालक लापरवाही से बस चलाता है तो उसे परिणामों के प्रति आगाह करना होगा। मासूम बच्चों के जीवन की सुरक्षा की खातिर जगाना होगा अपनी सोई हुई चेतना को और बनना ही होगा ‘व्हिसिल ब्लोअर’।
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Tuesday, January 9, 2018

"औरत : तीन तस्वीरें " पुस्तक की समीक्षा...

"औरत : तीन तस्वीरें " पुस्तक की दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित समीक्षा ...
Review of  Sharad Singh's book " Aurat Teen Tasviren" , Tribune, Chandigarh, 01.10.2017

Sharad Singh's book " Aurat Teen Tasviren"


Saturday, January 6, 2018

क्रूज पर सैर .... डॉ (सुश्री) शरद सिंह

Enjoy on the Cruise...⛴️

🌞जाड़े की सुबह कुनकुनी धूप में क्रूज 🛳️  की सवारी में ठंड का एहसास ही नहीं हुआ ....⚓⛴️🛳️
Dr (Miss) Sharad Singh, Author

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Friday, January 5, 2018

Dr (Miss) Sharad Singh at Rahgiri Sagar

Dr (Miss) Sharad Singh at Rahgiri Sagar
ऊर्जा से भरपूर सागर राहगीरी में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक "दैनिक भास्कर", सागर राहगीरी सोशल ग्रुप तथा शुभ पर्यावरण एवं समाजोत्थान समिति द्वारा आयोजित पौधारोपण कार्यक्रम की कुछ तस्वीरें आप सब से शेयर कर रही हूं। - 31.12.2017
 इस अवसर पर सागर नगर विधायक श्री शैलेन्द्र जैन, दैनिक भास्कर के कार्यकारी संपादक श्री अनिल कर्मा, सोशल राहगीरी ग्रुप के श्री बंटी जैन एवं श्री भावेश दर्जी, तथा ईएमआरसी के प्रोड्यूसर श्री माधव चंदेल की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।
Dr (Miss) Sharad Singh at Rahgiri Sagar

Dr (Miss) Sharad Singh at Rahgiri Sagar

Dr (Miss) Sharad Singh at Rahgiri Sagar

Dr (Miss) Sharad Singh at Rahgiri Sagar

Dr (Miss) Sharad Singh at Rahgiri Sagar

Dr (Miss) Sharad Singh at Rahgiri Sagar

Dr (Miss) Sharad Singh at Rahgiri Sagar

Dr (Miss) Sharad Singh at Rahgiri Sagar

Dr (Miss) Sharad Singh at Rahgiri Sagar

Dr (Miss) Sharad Singh at Rahgiri Sagar

Dr (Miss) Sharad Singh at Rahgiri Sagar

Dr Varsha Singh at Rahgiri Sagar
 

Wednesday, January 3, 2018

चर्चा प्लस ... वर्ष 2018 : आशाएं भी, चुनौतियां भी - डॉ शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
मेरा कॉलम - चर्चा प्लस  
वर्ष 2018 : आशाएं भी, चुनौतियां भी
- डॉ. शरद सिंह
   (दैनिक सागर दिनकर, 03.01.2018)     
                                                                     
दुनिया के हर देश, हर शहर और हर नागरिक को स्वयं तय करना है कि वर्ष 2018 में उसकी प्राथमिकताएं क्या रहेंगी? जहां तक हमारे अपने देश का प्रश्न है तो विगत दो वर्ष में न सिर्फ़ राजनीतिक दल वरन आमजनता भी आग के दरिया से हो कर गुज़री है। विधानसभाओं एवं महत्वपूर्ण नगरपालिक निगमों के चुनाव हुए, नोटबंदी हुई और डिजिटिलाईजेशन की बाढ़ आ गई। गोया देश का सम्पूर्ण आर्थिक जगत् एप्पस् में ढल गया। देश की अशिक्षित या कम पढ़ी-लिखी जनता के लिए यह क्रांति किसी पाहाड़ लांघने से कम नहीं रही। फिर भी वर्ष 2016 और 2017 को पार करते हुए 2018 में आ ही पहुंचे जहां आशाएं तो असीमित है लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। 
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Dainik
मैंने अपने फेसबुक पेज़ ‘पिछले पन्ने की औरतें’ में नववर्ष की शुभकामनाएं लिखते हुए लिखा कि ‘‘वर्ष वह पन्ना है जिसे समय पढ़ता और पलटता जाता है।’ मेरे इस कथन पर एक मित्र ने 01 जनवरी को टिप्पणी की कि ‘‘लीजिए नया पन्ना अब सामने आ गया है।’’ सच लिखा उसने। हमारे समाने सन् 2018 के रूप में वह पन्ना खुल गया है जिस पर समय के साथ-साथ हमें भी कुछ लिखना है और उसमें से कुछ पढ़ना है। समय जो सबक देता है वह उम्र भर नहीं भूलता है। वर्ष 2018 हमें क्या सबक देगा, इसका तो हम अभी से अनुमान भी नहीं लगा सकते हैं लेकिन हमें इस वर्ष क्या-क्या करना है, इसकी प्राथमिकताएं तो हमें ही तय करनी होंगी जबकि ढेर सारी चुनौतियां हमारे सामने मुंहबाए खड़ी हैं। 

○दूर न जाते हुए मैं उस ज़मीनी चुनौती से आरम्भ करती हूं जिसका अनुभव मुझे वर्ष के पहले दिन, पहली सुबह को हुआ। एक संगठन है ‘ #प्रजामंडल ’ जिसमें नगर के समाजसेवी और बुद्धिजीवी जुड़े हुए हैं। प्रदेश के एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र की परिकल्पना पर यह गठित किया गया था। तो, ‘#प्रजामंडल ’ के हम सभी सदस्यों ने यह तय किया कि नववर्ष का आरम्भ किसी सार्थक कार्य से किया जाए। ऐसा कार्य जो समाजहित में हो और लोगों में जागरूकता लानेवाला हो। तय हुआ कि हम सभी नए साल की पहली सुबह शहर की एक गंदी बस्ती में जाएंगे और वहां लोगों से शौचालय के महत्व तथा बस्ती में स्वच्छता बनाए रखने के बारे में चर्चा करेंगे। पहली जनवरी की सुबह समाज के प्रत्येक क्षेत्र के बुद्धिजीवी एवं समाजसेवी जैसे उमाकांत मिश्र, शिवरतन यादव, मैं स्वयं डॉ #शरदसिंह, डॉ शीतांशु राजौरिया,       संतोष स्टील, अनुराग ब्रजपुरिया,     राजा रिछारिया, बाबूलाल रोहित,      बलवंत सिंह ठाकुर, नरेन्द्र ठाकुर आदि निश्चित स्थान पर एकत्र हो गए। इसके बाद हमने बस्ती में प्रवेश किया। महिलाओं से चर्चा का दायित्व मुझे सौंपा गया। बस्ती की महिलाएं पहले झिझकीं फिर आहिस्ते से खुल कर बोलने लगीं। एक महिला ने जिस सरलता से मुझे अपनी सच्चाई बताई, उस पर मुझे समझ में नहीं आया कि मैं उसकी साफ़गोई के लिए उसे बधाई दूं या उसकी ‘लाईफ स्टाईल’ के लिए उसे फटकार लगाऊं। हुआ यूं कि जब मैंने उस महिला से पूछा कि क्या तुम्हारे घर में शौचालय है? उसने बड़े इतरा कर, मुस्कुरा कर उत्तर दिया -‘‘हऔ, है। हमाये इते शौचालय है।’’ लेकिन ग्रामीण इलाके के मेरे पूर्वअनुभवों ने मेरे भीतर घंटी बजा दी और मैंने दूसरे ही पल उससे पूछ लिया, ‘‘लेकिन तुम शौचालय में जाती हो या लोटा ले कर बाहर?’’ वह जरा झेप कर, हंस कर बोली,‘‘हमें तो बाहर अच्छो लगत है। हम तो बाहर ई जात आएं।’’ मेरी शंका सही निकली। वहां उपस्थित अन्य लोग उसका उत्तर सुन कर चकित रह गए थे। उस समय मुझे याद आया कि जब हम इस पहली सुबह की योजना बना रहे थे तो यही बात बार-बार सामने आ रही थी कि सुविधाएं उपलब्ध होने से भी कहीं बड़ी आवश्यकता है व्यवहार परिवर्तन की। 

○व्यवहार परिवर्तन की आवश्यकता पर एक मुहर उस समय और लग गई जब वार्ड राजनीति से प्रेरित एक महिला और उसके सहयोगी गंदगी के प्रति स्वयं के दायित्वों को नकारते हुए यह कहते हुए तैश में आ गई कि ‘‘सरकार कहती भर रहती है, करती कुछ नहीं है।’’ जबकि सच यह है कि उस क्षेत्र में कचरा उठाने वाली गाड़ी हर घर के दरवाज़े से गुज़रती है। लेकिन यदि यह सोचा जाए कि आपके घर का कचरा घर से निकाल कर गाड़ी तक सरकार पहुंचाएगी तो फिर दुनिया का कोई स्वच्छता मिशन कामयाब नहीं हो सकता है। यदि कुछ सकारात्मक है तो उसे मात्र राजनीति से प्रेरित हो कर बिगाड़ना या नकारना तो किसी भी मायने में नागरिक कर्त्तव्य नहीं है। यदि नागरिक कर्त्तव्य की बात भी छोड़ दी जाए तो स्वयं के और अपने परिवार के स्वास्थ्य और सुरक्षा के प्रति जो दायित्व बनता है, यह उसकी भी अवहेलना ही कहलाएगा। मुझे वहां महिलाओं को यह याद दिलाना और समझाना पड़ा कि अपनी बेटियों को, बहनों को खुले में शौच के लिए मत भेजो और स्वयं भी मत जाओ। आजकल आए दिन बलात्कार की इतनी घटनाएं सुनने को मिलती हैं, किसी दिन तुम्हारे साथ या तुम्हारे परिवार की किसी बेटी के साथ ऐसी कोई घटना घट गई तो तुम क्या करोगी? नुकसान तो तुम्हारा ही होगा न! सच कहूं तो यह समझाते हुए मुझे यह सोच कर दुख रहा था कि ये सब भी महिलाएं हैं तो ये इस ख़तरनाक सच्चाई को देख कर अनदेखा क्यों करती हैं? जो मैं इनके कह रही हूं, वह सब ये अपने परिवार के पुरुषों को क्यों नहीं कहती हैं? मुझे लगा कि यहां भी मुद्दा वही व्यवहार परिवर्तन का है। उन्हें अपनी आदत बदलनी होगी, स्वयं के लिए नही ंतो कम से कम अपने बच्चों के लिए और यही तो एक बड़ी चुनौती है जिसे इस वर्ष हमें गंभीरता से लेना चाहिए।

यूं भी इस वर्ष अब तक संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2018 के लिए कोई एक विशेष एजेंडा घोषित नहीं किया है। यानी संयुक्त राष्ट्र संघ भी चाहता है कि प्रत्येक देश अपनी ज़मीनी समस्याओं से निपटने की प्राथमिकताएं स्वयं तय करे। 

वर्ष 2017 मुस्लिम महिलाओं को एक बड़ी सौगात दे गया है जो है ‘तीन तलाक’ के शब्दों से मुक्ति। लेकिन यह सौगात उन्हें यूं ही मुफ़्त में नहीं मिली है। इसे पाने के लिए उन महिलाओं ने आगे आकर लम्बी लड़ाई लड़ी जिन्होंने कभी घर से बाहर निकल कर खुली हवा में सांस भी नहीं ली थी। अब एक लड़ाई लड़नी है पूरे समाज को, और वह भी जाति, धर्म या वर्ग से ऊपर उठ कर। वह लड़ाई है उन अपराधियों से जो स्त्री-अस्मिता और स्त्री-जीवन को तार-तार कर रहे हैं। विगत कुछ वर्षों में बलात्कार की घटनाओं की बाढ़ सी आ गई है। अब उम्र और लिंग का भेद भी बलात्कारियों के लिए बेमानी हो चला है। दो साल की बच्ची से ले कर नब्बे साल की उम्र दराज़ महिला भी बलात्कारियों की कुदृष्टि का शिकार हो रही है और वहीं कम उम्र बच्चे भी ऐसी घटनाओं की चपेट में आ रहे हैं। लिहाजा हमें निपटना ही होगा ऐसी दूषित प्रवृत्ति से जो दिन दूनी और रात-चौगुनी बढ़ रही है। ऐसी घटनाओं के बढ़ने के पीछे कहीं यह कारण तो नहीं कि आज लगभग हर हाथ में मोबाईल के माध्यम से इन्टरनेट आ गया है जिसमें यौनहिंसा भड़काने वाली सामग्रियां भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं जबकि इसके उलट हमारे पास साईबर अपराध रोकने के साधन सीमित हैं। शायद यही कारण है कि बलात्कार जैसे अपराध नाबालिग आयु के युवा भी कर रहे हैं। 

एक ओर ग्लोबलाईजेशन की चकाचौंध और दूसरी ओर ग़रीबी और बेरोजगारी का अंधेरा। युवाओं के लिए इसे फ्रस्टेशन का दौर कहा जा सकता है।  
राज्यों के चुनाव भी निकट आ रहे हैं। जिससे जनता की आशाएं बढ़ती जा रही हैं और राजनीतिक चुनौतियां जटिल होती जा रही हैं। दिक्कत यह है कि तात्कालिक राजनीतिक चुनौती से निपटने के लिए जो तरीके अपना लिए जाते हैं उनके परिणाम आगे चल कर घातक होते हैं। ग़रीब जनता से मुफ़्तखोरी के वायदे एक ओर आमजनता को सुनहरे ख़्वाब दिखाती है वहीं दूसरी ओर राज्यों की आर्थिक कमर तोड़ कर रख देती है। भला कर्जों के बोझ तले दबा कोई राज्य कभी तरक्की कर सकता है? इस सच को भी समझना होगा सभी राजनीतिक दलों को और तय करन होगा कि वे सचमुच जनहित चाहते हैं या महज़ भुलावे की राजनीति खेलना चाहते हैं। 

अच्छा यही होगा कि समूचा देश ही नहीं वरन् देश का हर शहर और हर नागरिक स्वयं तय करे कि वर्ष 2018 में उसकी प्राथमिकताएं क्या रहेंगी? विगत दो वर्ष में न सिर्फ़ राजनीतिक दल वरन आमजनता भी आग के दरिया से हो कर गुज़री है। विधानसभाओं एवं महत्वपूर्ण नगरपालिक निगमों के चुनाव हुए, नोटबंदी हुई और डिजिटिलाईजेशन की बाढ़ आ गई। गोया देश का सम्पूर्ण आर्थिक जगत् एप्पस् में ढल गया। देश की अशिक्षित या कम पढ़ी-लिखी जनता के लिए यह क्रांति किसी पाहाड़ लांघने से कम नहीं रही। फिर भी वर्ष 2016 और 2017 को पार करते हुए 2018 में आ ही पहुंचे जहां आशाएं तो असीमित है लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं।
जीवन की तमाम विषमताओं के होते हुए भी अच्छे दिनों की आशाएं रखनी ही चाहिए।
 अंत में ‘सागर दिनकर’ के सभी पाठकों के प्रति ये पंक्तियां -
नूतन सपनों को  ले आया, आने वाला साल
नई सफलता पर हो फिर इतराने वाला साल
पूरी हों  इच्छाएं  सबकी, सबको खुशी मिले
साबित हो सच्चे दिल से अपनाने वाला साल  
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Monday, January 1, 2018

नये साल 2018 की सार्थक शुरुआत.. 2018

A Meaningful Start of New Year 2018
 आज नववर्ष 2018 की पहली सुबह एक सार्थक सुबह रही ...आज सुबह नवदुनिया समाचारपत्र के तत्वावधान में प्रजामंडल सागर के हम सभी सदस्यों ने एक गंदी बस्ती में जा कर वहां के वासियों को शौचालय और स्वच्छता का महत्व समझाया तथा उनकी समस्याओं से रूबरू हुए। - डॉ शरद सिंह
🏵️इस सार्थक सुबह के लिए धन्यवाद नवदुनिया एवं प्रजामंडल सागर 🙏








HAPPY NEW YEAR 2018

NEW YEAR WISHES By DR (Miss) Sharad Singh