Monday, May 8, 2017

पुस्तक-चर्चा में ...Sharad Singh in a Book Discussion

Dr (Miss) Sharad Singh
#रविवार (07.05.2017 ) की एक #सार्थक #शाम ... जो एक #पुस्तक-चर्चा में व्यतीत हुई.... 

#Sunday .. a #meaningful #evening (07.05.2017) ... which has been spent in a book discussion ....  Dr (Miss) #SharadSingh in a #book_discussion, #Sagar, #MadhyaPradesh, #India 07.05. 2017

Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017
Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017 ..... Dainik Bhaskar, Sagar Edition, 08.05.2017
Thank You Dainik Bhaskar !!!
Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017 Navdunia,  Sagar Edition, 08.05.2017
Thank You Nav Dunia !!!

Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017 .... Patrika, Sagar Edition, 08.05.2017
Thank You Patrka !!!

 
Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017


Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017

 
Dr (Miss) Sharad Singh in a book discussion, Sagar , 07.05. 21017

Wednesday, May 3, 2017

कब तक चलेंगी पाक की नापाकियां ... - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
"कब तक चलेंगी #पाक की #नापाकियां "....."मेरे कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 03.05. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper.... चर्चा प्लस 

 
कब तक चलेंगी पाक की नापाकियां
- डॉ. शरद सिंह 


भारत और पाकिस्तान को अलग-अलग हुए लगभग 70 साल हो चुके हैं फिर भी पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। सीमा पर हमलों की निरंतर घटनाओं के बाद भारतीय सेना के जवानों के शवों को क्षत-विक्षत करना उसके घिनौने इरादों को बयान करता है। जबकि सच तो यह है कि दुनिया के अधिकांश देश पाकिस्तान को आतंकवाद को पनाह देने वाला देश घोषित कर चुके हैं और स्वयं पाकिस्तान की आंतरिक दशा कोई अच्छी नहीं है, फिर भी मानो वह कोई सबक लेना ही नहीं चाहता है या फिर उकसाना चाहता है भारत को ताकि वह आतंकी देश की जगह पीड़ित का नकाब पहन सके। 
 
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

भारत विभाजन के सत्तर साल होना यह चाहिए था कि भारत और पाकिस्तान विकास के अपने-अपने सपनों को पूरा करते और विकसित देशों की पंक्ति में जा खड़े होते। मगर परिदृश्य इसके ठीक विपरीत है। पाकिस्तान आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक हर दिशा में पिछड़ा हुआ है। एक ब्राजीलियन कहावत है कि ‘‘हथियारों की खेती खून की नदियां बहाती है, पेट नहीं भरती।’’ यही दशा है पाकिस्तान की। साक्षरता का प्रतिशत औसत से भी कम है क्यों कि वहां की आधी आबादी यानी महिलाएं हर संभव तरीके से शिक्षा से दूर रखी जाती हैं। अगर यह सच नहीं होता तो मासूम मलाला को अपने सिर पर गोली नहीं खानी पड़ती। होना तो यही चाहिए था कि पाकिस्तान अपने नागरिकों की सुरक्षा और उनके बहुमुखी विकास के लिए समर्पित रहता लेकिन वहां के कतिपय राजनेता आतंकवादी गतिविधियों में अपनी शक्तिसम्पन्नता का आसरा ढूंढते हैं। यह माना जाता है कि विकास के मुद्दे को ले कर ही पाकिस्तान के जन्म की रूपरेखा तैयार की गई थी। मोहम्मद अली जिन्ना ने यही कहा था कि पाकिस्तान के रूप में अलग देश में रहते हुए मुस्लिम समुदाय तेजी से विकास कर सकेगा। लेकिन संभवतः मोहम्मद अली जिन्ना पाकिस्तान के भावी राजनेताओं की नीतियों का अनुमान नहीं लगा सके। भारत ने तो तरक्की की और भारत में रहने वाले मुस्लिम समुदाय ने भी तरक्की की लेकिन पाकिस्तान के नागरिकों के हाथ आया आतंकवाद और वैश्विक निंदा।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही पाकिस्तान भारत से बैर रखने लगा था और कश्मीर पर कब्जा करने के इरादे से युद्ध के मैदान में भारत को ललकारता रहा। भले ही हर बार उसे मुंह की खानी पड़ी। इसीलिए जब उसे आभास हो गया कि सीधे युद्ध में भारत को पराजित करना या कश्मीर पर कब्जा करना संभव नहीं है, तब आतंकवाद को पाल-पोस कर छद्म युद्ध की राह पर चल पड़ा। एक ओर पाकिस्तान की भारत से दुश्मनी 70 साल बाद भी निरंतर जारी है वहीं दूसरी ओर, भारत में सरकारों के बदलने के साथ-साथ नीतियों में उतार-चढ़ाव आता रहा. पाकिस्तान के साथ दोस्ती के मकसद से नये-नये प्रयोग हुए, उदारता दिखाते हुए कई एकतरफा समझौते किए गए। लेकिन दुर्भाग्य से आज स्वतंत्र भारत की तीसरी पीढ़ी भी पाकिस्तान के साथ संबंधों को सामान्य करने के लिए जूझ रही है। भारत की ओर से हमेशा सद्भाव ही प्रकट किया गया। पाकिस्तान के गठन के समय नेहरू ने कहा था कि दोनों देशों में दोस्ताना रिश्ते रहेंगे, कोई वीजा-पासपोर्ट नहीं लगेगा। लेकिन, ऐसा नहीं हो पाया और नेहरू की यह सोच असफल हो गयी।
इसी तरह से अटल बिहारी वाजपेयी ने लाहौर डिक्लरेशन किया और उसके बाद लगा कि भारत-पाक के मसले पर बहुत से मसले हल हो जायेंगे, लेकिन हुआ कुछ नहीं। गुजराल डॉक्ट्रिन में भी सभी पड़ोसी देशों के साथ बातचीत और सहयोग की नीति अपनायी गयी, लेकिन वह डॉक्ट्रिन सफल नहीं हो पायी, जिसके चलते गुजराल की काफी आलोचना भी हुई थी। इसलिए इसे भी कूटनीतिक गलती कही गयी. यहां तक कि पाकिस्तान के गठन के समय नेहरू ने कहा था कि दोनों देशों में दोस्ताना रिश्ते रहेंगे, कोई वीजा-पासपोर्ट नहीं लगेगा। लेकिन, ऐसा नहीं हो पाया और नेहरू की यह सोच असफल हो गयी। नरेंद्र मोदी जी ने भी प्रधानमंत्री बनते ही पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की पिछले दो साल में बहुत कोशिशें कीं। लेकिन, पाकिस्तान ने हमें पठानकोट, ताजपुर और उड़ी जैसे हमले दिए। कश्मीर की हालत अब और भी खराब हो गई है। हो सकता है कि लोग इसे प्रधानमंत्रा नरेन्द्र मोदी की कूटनीतिक गलती ठहराएं लेकिन यह कूटनीतिक गलती नहीं है। क्योंकि एक देश दूसरे देश से सद्व्यवहार की अपेक्षा ही रख सकता है, इसके लिए उसे प्रोत्साहित कर सकता है लेकिन उसे किसी प्रकार से बाध्य नहीं कर सकता है।
भारत और पाकिस्तान के बीच कई बार युद्ध छिड़ा। युद्ध की पहल पाकिस्तान ने की और जिसका शांति के साथ समापन भारत ने किया। अप्रैल, 1965 में गुजरात के कच्छ के रण के पास सीमा गश्ती दलों के बीच विवाद पैदा हो गया। अगस्त माह में स्थानीय कश्मीरियों के वेश में 26 हजार पाकिस्तानी सैनिक भारतीय सीमा में घुस आए। दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ गया और भारतीय सेना लाहौर स्थित अंतरराष्ट्रीय सीमा तक पहुंच गयी। कई दिनों तक चले युद्ध के बाद 22 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र की दखल के बाद युद्ध समाप्ति की घोषणा कर दी गयी। पूर्वी पाकिस्तान के मुद्दे पर पाकिस्तान ने 1971 का युद्ध किया। ढाका में पाकिस्तानी सेना की ज्यादतियों के खिलाफ भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी। इस युद्ध के परिणामस्वरूप पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश के रूप में नया राष्ट्र बना। सन् 1972 में शिमला समझौता शांति बहाली के दिशा में एक सराहनीय प्रयास माना गया। वरना चाहता तो भारत बांगलादेश को अपने कब्जे में ले सकता था किन्तु उसने ऐसा नहीं किया क्यों कि भारतीय उपमहाद्वीप में शांति बनाए रखना उसका मून उद्देश्य था। फिर भी आदत से लाचार पाकिस्तान द्वारा सन् 1989 कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियां की गईं। सन् 1999 का कारगिल युद्ध ने भारत के मन-मस्तिष्क को झकझोर दिया।
विभाजन के बाद भारत की पहल पर कई ऐसे समझौते किए गए जो कार्यरूप में पाकिस्तान द्वारा भी अपनाए जाते तो आज वातावरण इतना कटु नहीं होता। उल्लेखनीय है कि भारत और पाकिस्तान, इन दोनों देशों के सैन्य नेतृत्व के बीच 27 जुलाई, 1949 को सीजफायर समझौता किया गया था। सन् 1950 में लियाकत-नेहरू पैक्ट या दिल्ली पैक्ट के तहत दोनों देशों के बीच शरणार्थी, संपत्ति, अल्पसंख्यकों के अधिकार के मुद्दों पर समझौता किया गया था। सिंधु जल-संधि (1960) : सिंधु और उसकी अन्य सहायक नदियों के जल बंटवारों को लेकर 19 सितंबर, 1960 को सिंधु जल-संधि समझौता सम्पन्न हुआ था और आशा की गई थी कि भविष्य में सिंधु नदी के पानी के विषय पर भविष्य में कोई विवाद नहीं होगा। पाकिस्तान की ओर से यह आशा झूठी साबित हुई। फिर सन् 1965 में भारत-पाक युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच 10 जनवरी, 1966 को ताशकंद समझौता हुआ था। सन् 1971 में हुए बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के बाद विवादों खत्म करने के लिए शिमला में 2 जुलाई, 1972 को दोनों देश सहमत हो गये थे यह समझौता इतिहास में शिमला समझौता के नाम से विख्यात है। इसके बाद, 28 अगस्त, 1973 को भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच समझौता था दिल्ली समझौता हुआ था। सन् 1980 में भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के बीच 21 दिसंबर, 1988 को नॉन-न्यूक्लियर एग्रीमेंट के नाम से समझौता हुआ था जिसे ‘‘इस्लामाबाद समझौता’’ कहा जाता है।
पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित कई देशों में भारत की नुमाइंदगी करनेवाले अनुभवी राजनयिक जेएन दीक्षित (1936-2005) ने अपनी किताब ‘भारत-पाक संबंध : युद्ध और शांति में’ में आजादी के बाद से कारगिल युद्ध तक के घटनाक्रमों और कूटनीतिक फैसलों का विश्लेषण किया है। उन्होंने अपनी पुस्तक में स्पष्ट लिखा है कि -‘‘भविष्य का अनुमान लगानेवाले एकमात्र राजनेता थे 1947 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष और भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद. उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि पाकिस्तान का निर्माण भारत के मुसलमानों को नुकसान पहुंचायेगा और सीमा के दोनों ओर उनकी इसलामी पहचान के बारे में संकट उत्पन्न करेगा। उन्हें पूर्वाभास हो गया था कि जातीय-भाषायी और कट्टरवादी शक्तियां भारत और पाकिस्तान, खासकर पाकिस्तान को प्रभावित करेंगी। उनकी स्पष्ट धारणा थी कि भारत एवं पाकिस्तान एक दीर्घकालीन शत्रुतापूर्ण संबंधों के रास्ते पर चलेंगे।’’
भारत और पाकिस्तान को अलग-अलग हुए लगभग 70 साल हो चुके हैं फिर भी पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। सीमा पर हमलों की निरंतर घटनाओं के बाद भारतीय सेना के जवानों के शवों को क्षत-विक्षत करना उसके घिनौने इरादों को बयान करता है। जबकि सच तो यह है कि दुनिया के अधिकांश देश पाकिस्तान को आतंकवाद को पनाह देने वाला देश घोषित कर चुके हैं और स्वयं पाकिस्तान की आंतरिक दशा कोई अच्छी नहीं है, फिर भी मानो वह कोई सबक लेना ही नहीं चाहता है या फिर उकसाना चाहता है भारत को ताकि वह आतंकी देश की जगह पीड़ित का नकाब पहन सके। कभी किसी निर्दोष को जासूस बता कर बंदी बना लेना और उसे अमानवीय ढंग से प्रताड़ित करना तो कभी सेना के जवानों पर हमले कर के उनके शवों का भी अपमान करना पाकिस्तान की गोया आदत बनती जा रही है। उसकी इस आदत को ध्यान में रखते हुए भारत को कुछ कड़े कदम उठाने ही होंगे। सिर्फ़ यह कहना कि अब भारत बर्दाश्त नहीं करेगा, र्प्याप्त नहीं है। पाकिस्तान की नापाकियों पर अंकुश लगाने के लिए जरूरी नहीं है कि युद्ध का बिगुल बजाया जाए। उसके विरुद्ध आर्थिक नाकेबंदी और वैश्विक दबाव भी बनाया जा सकता है जो एक शांतिपूर्ण लेकिन असरदार रास्ता होगा।
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#भारत #पाकिस्तान #कारगिल
#शिमला_समझौता #लियाकत_नेहरू_पैक्ट #दिल्ली_पैक्ट #ताशकंद_समझौता #दिल्ली_समझौता  #इस्लामाबाद_समझौता #आर्थिक_नाकेबंदी #वैश्विक_दबाव

Wednesday, April 26, 2017

कब तक खून से लाल होते रहेंगे #आदिवासी क्षेत्र... - डॉ. शरद सिंह -

Dr (Miss) Sharad Singh
" कब तक खून से लाल होते रहेंगे #आदिवासी क्षेत्र "....."मेरे कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 26.04. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper..


चर्चा प्लस
 कब तक खून से लाल होते रहेंगे आदिवासी क्षेत्र
  - डॉ. शरद सिंह                                                                                                                               
#छत्तीसगढ़ के #नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। #सुकमा और उसके जैसे अन्य क्षेत्र आए दिन खून से लाल हो रहे हैं। निर्दोष मासूम #आदिवासी जनता और अपनी ड्यूटी पर डटे रहने वाले बहादुर जवान दोनों के ही खून की नदियां बह रही हैं। आजकल के अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों जैसे ड्रोन तथा ट्रेक मशीनों के होते हुए भी नक्सली हिंसा पर लगाम नहीं लग पा रही है। स्थानीय पुलिस बल से कंधे से कंधा मिला कर सीआरपीएफ के जवान अपने प्राणों को दांव पर लगा रहे हैं लेकिन दशकों से चली आ रही समस्या ख़त्म होने के बजाए विकराल रूप धारण करती जा रही है। इस तथ्य की पड़ताल जरूरी है कि आखिर चूक कहां हो रही है? अब यह लक्ष्य निर्धारित करना ही होगा कि अब यह खूनी खेल बंद हो।

Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper
 
24 अप्रैल को #छत्तीसगढ़ के #सुकमा में #सीआरपीएफ के जवानों पर #नक्सलियों द्वारा किए गए हमले से पूरा देश बौखला उठा है। इस हमले में कुल 25 जवान शहीद हुए हैं, तो वहीं 7 जवान घायल हुए। #नक्सली भी और सीआरपीएफ के जवान भी दोनों ही भारतीय नागरिक हैं। एक ही ज़मीन के बाशिंदे और एक ही जैसी समस्याओं से जूझने वाले। यदि भुखमरी और ग़रीबी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में है तो उन क्षेत्रों में भी हैं जहां से ये जवान भर्ती हो कर आते हैं। बहादुर दोनों हैं नक्सल ब्रिगेड में शामिल जवान भी और सीआरपीएफ के जवान भी। दोनों अपने प्राण देना जानते हैं। लेकिन सबसे बड़ा अन्ता यही है कि नक्सली ब्रिगेड के जवान अपनी ऊर्जा गलत दिशा में लगा रहे हैं। हिंसा से कभी कोई समस्या हल नहीं होती है। यदि हिंसा ही एकमात्र रास्ता होता तो महात्मा गांधी अहिंसा का मार्ग चुन कर देश की आज़ादी की बात अंग्रेजों को नहीं समझा पाते। हाल ही हुए इस हमले में जो 25 सीआरपीएफ के जवान शहीद हुए उनके बारे में क्या नक्सलियों ने कभी सोचा कि उन जवानों के भी घर-परिवार हैं। किसी के घर में बूढ़े माता-पिता तो किसी के घर में नन्हें बच्चे। स्वयं नक्सल ब्रिगेड के जवानों की हालत इससे अलग नहीं है। वे भी अनाथालय में बड़े नहीं हुए हैं, उनके भी परिवार हैं किन्तु उन्हें अपने परिवार को हिंसा की आग में झोंकते हुए हिचक नहीं होती है अथवा वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उनके लिए सही रास्ता कौन-सा है। कई बार राजनीतिक स्वार्थ जाने-अनजाने हिंसा को बढ़ावा देते चले जाते हैं। नक्सली हिंसा के पीछे भी ऐसा कोई सच मौजूद हो तो कोई आश्चर्य नहीं।  
आज नक्सलियों के इतिहास पर एक नज़र डालना जरूरी है। ‘‘नक्सल’’ शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के छोटे से गांव #नक्सलबाड़ी से हुई है जहां भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता #चारू_मजूमदार और #कानू_सान्याल ने 1967 में सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की भी। जी हां, आज देश जिस नक्सलवाद से जूझ रहा है उसकी शुरुआत प. बंगाल के छोटे से गांव नक्सलबाड़ी से हुई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के चारू मुजुमदार और कानू सान्याल ने 1967 में एक सशस्त्र आंदोलन को नक्सलबाड़ी से शुरू किया इसलिए इसका नाम नक्सलवाद हो गया। उनका मानना था कि भारतीय मज़दूरों और किसानों की दुर्दशा के लिए सरकारी नीतियां और पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था जिम्मेदार है। सिलिगुड़ी में पैदा हुए चारू मजूमदार आंध्र प्रदेश के तेलंगाना आंदोलन से व्यवस्था से बागी हुए। इसी के चलते 1962 में उन्हें जेल में रहना पड़ा, जहां उनकी मुलाकात कानू सान्याल से हुई। वैसे नक्सलवाद के असली जनक कानू ही माने जाते हैं। कानू का जन्म दार्जिंलिग में हुआ था। वे पश्चिम बंगाल के सीएम विधानचंद्र राय को काला झंडा दिखाने के आरोप में जेल में गए थे। कानू और चारू मुजुमदार जब बाहर आए तो उन्होंने सरकार और व्यवस्था के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का रास्ता चुना। कानू ने 1967 में नक्सलबाड़ी में सशस्त्र आंदोलन की अगुवाई की। आगे चलकर कानू और चारू के बीच वैचारिक मतभेद बढ़ गए और दोनों ने अपनी अलग राहें, अलग पार्टियों के साथ बना लीं।
उल्लेखनीय है कि मजूमदार चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग के बहुत बड़े प्रशंसकों में से थे और उनका मानना था कि भारतीय मज़दूरों और किसानों की दुर्दशा के लिये सरकारी नीतियां जिम्मेदार हैं जिसके कारण न केवल उच्च वर्गों का शासन तंत्र स्थापित हो गया है बल्कि कृषितंत्र पर भी उन्हीं की पकड़ बन गई है। दोनों नक्सली नेताओं का मानना था कि ऐसे न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है। सन् 1967 में नक्सलवादियों ने कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई। इन विद्रोहियों ने औपचारिक तौर पर स्वयं को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर लिया और सरकार के खिलाफ़ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी। सन् 1971 में सत्यनारायण सिंह के नेतृत्व में आंतरिक विद्रोह हुआ और मजूमदार की मृत्यु के बाद यह आंदोलन एकाधिक शाखाओं में विभक्त हो गया। चारू मुजुमदार की मृत्यु 1972 में हुई, जबकि कानू सान्याल ने 23 मार्च 2010 को फांसी लगा ली। यद्यपि, दोनों की मृत्यु के बाद नक्सलवादी आंदोलन भटक गया। लेकिन यह भारत के कई राज्यों आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ, उड़ीसा, झारखंड और बिहार तक फैलता गया, पर जिन वंचितों, दमितों, शोषितों के अधिकारों की लड़ाई के लिए शुरू हुआ, ना तो उनके कुछ हाथ आया, न नक्सलवादियों के। हिंसा की बुनियाद पर रखी। यह माना जाता है कि चारू मुजुमदार और कानू सान्याल की मृत्यु के बाद नक्सली मुहिम अपने मूल उद्देश्यों से भटक गई।
भारत जैसे शांतिप्रिय देश में ऐसे हिंसात्मक रास्ते को ज़मीन कैसे मिली यह एक शोध का विषय है। बहरहाल, स्थितियों एवं परिस्थितियों पर ध्यान दिया जाए तो कई प्रश्नों के उत्तर मिलने लगते हैं। यदि स्वतंत्रता प्राप्ति के कई वर्ष बाद भी देश के वनांचलों एवं दूरस्थ इलाकों में रोटी, कपड़ा, मकान, सड़क, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव बना रहेगा तो जनता में असंतोष होना स्वाभावित है। शिक्षा की कमी और पेट की आग जब आपस में मिल जाती है तो बुद्धि अच्छे या बुरे में भेद करना छोड़ देती है। संसाधनों के अभाव और लालफीता शाही में फंसी व्यवस्था में बड़े पैमाने पर लोगों का शोषण, अधिकारों का हनन हुआ, जिसका नतीजा व्यवस्था से नाराजगी के रूप में सामने आया और आगे चलकर इसने विद्रोह का रूप ले लिया, जिसकी परिणित हिंसा के रूप में हुई। नक्सलवादी हिंसा में सैंकड़ो निर्दोषों की मौत हो चुकी है जबकि देश का आदिवासी समुदाय भी अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष रूप से इस हिंसा का शिकार है।
यदि नक्सली प्रभावित क्षेत्रों के संदर्भ में राजनीति की बात की जाए तो आज कई नक्सली संगठन वैधानिक रूप से स्वीकृत राजनीतिक पार्टी बन गये हैं और संसदीय चुनावों में भाग भी लेते है। लेकिन बहुत से संगठन अब भी छद्म लड़ाई में लगे हुए हैं। नक्सलवाद के हिंसात्मक कार्यवाहियों की आंच से आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ, उड़ीसा, झारखंड और बिहार झुलस रहे हैं।

प्रत्येक नक्सली हमले के बाद कई सवाल उठ खड़े होते हैं। ये सवाल राजनीति, सुरक्षा और क़ानून व्यवस्था से जुड़े हुए है। इनमें आरोप हैं, प्रत्यारोप है और नाराज़गी भी शामिल रहती है। नक्सली ख़ुद स्वीकार कर चुके हैं कि नक्सलियों के विरुद्ध कथित स्वतःस्फ़ूर्त जनआंदोलन ’सलवा जुड़ूम’ से सबसे ज़्यादा लाभ ंनक्सलियों को ही हुआ। फिर आखिर ऐसे कौन-से कारण हैं कि यह समस्या दशक दर दशक हल होने की बजाय और विकट होती जाती है?
#नक्सल_समस्या का हल नहीं निकलने के दो कारण स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। एक तो ये कि राजनीतिक दलों में इस बता पर सहमति ही नहीं है कि ये समस्या सामाजिक आर्थिक समस्या है या क़ानून व्यवस्था की। इस सवाल पर विभिन्न दलों के बीच विवाद चलता रहता है जबकि यह समस्या विवाद को परे रख कर सुलझाए जाने योग्य है। जरूरी है कि इस पर सभी दलों में एक सहमति बने। ऐसा होने से कम से कम उन आदिवासी नागरिकों को राहत मिलेगी जो हिंसा के पाट में पिसे जा रहे हैं। दूसरा मुद्दा है अर्थशास्त्र का। नक्सल प्रभावित हर ज़िले को केंद्र और राज्य सरकार इतना पैसा देती है कि अगर उसे पूरी तरह खर्च किया जाए तो ज़िलों की तस्वीर बदल जाए। लेकिन यह कटु सत्य है कि अपार पैसों के बावजूद बस्तर की बहुसंख्यक आबादी बिजली, पानी और शौचालय के अभाव में जीने को विवश है। दरअसल, ऐसी मॉनीटरिंग की जरूरत है जो सरकारी पैसे पर पूरी नज़र रखे कि वह जिस मद के लिए दिया जा रहा है, उस मद में पूरा का पूरा पहुंच रहा है या नहीं तथा जिस तरह उसका उपयोग किया जाना चाहिए, उस तरह उसका समुचित उपयोग हो रहा है या नहीं।
यदि छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही है। सुकमा और उसके जैसे अन्य क्षेत्र आए दिन खून से लाल हो रहे हैं। निर्दोष मासूम आदिवासी जनता और अपनी ड्यूटी पर डटे रहने वाले बहादुर जवान दोनों के ही खून की नदियां बह रही हैं। आजकल के अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक संसाधनों जैसे ड्रोन तथा ट्रेक मशीनों के होते हुए भी नक्सली हिंसा पर लगाम नहीं लग पा रही है। स्थानीय पुलिस बल से कंधे से कंधा मिला कर सीआरपीएफ के जवान अपने प्राणों को दांव पर लगा रहे हैं लेकिन दशकों से चली आ रही समस्या ख़त्म होने के बजाए विकराल रूप धारण करती जा रही है। इस तथ्य की पड़ताल जरूरी है कि आखिर चूक कहां हो रही है? अब यह लक्ष्य निर्धारित करना ही होगा कि अब यह खूनी खेल बंद हो।
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#छत्तीसगढ़ #सुकमा #सीआरपीएफ #नक्सली #नक्सलबाड़ी #चारू_मजूमदार #कानू_सान्याल #विधानचंद्र_राय #सशस्त्र_विद्रोह 

Saturday, April 22, 2017

Thursday, April 20, 2017

भारत भवन में डॉ शरद सिंह का कहानी पाठ ... in News Papers

My Storytelling at Bharat Bhavan's News in Sagar News Papers ... 
Thank You Dainik Bhaskar, Patrika and Sagar Dinkar ... 
Your affinity always encourage me !!!
Dainik Bhaskar, Sagar Edition, 19.04.2017,
Storytelling by Dr (Miss) Sharad Singh at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017

Patrika, Sagar Edition,  19.04.2017, Storytelling by Dr (Miss) Sharad Singh at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017

Sagar Dinkar, Sagar Edition,  19.04.2017, Storytelling by Dr (Miss) Sharad Singh at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017

भारत भवन में डॉ शरद सिंह का कहानी पाठ ...

Storytelling by Dr (Miss) Sharad Singh at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017

Storytelling by Dr (Miss) Sharad Singh at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017

Storytelling by Dr (Miss) Sharad Singh at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017

Storytelling by Dr (Miss) Sharad Singh at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017

Storytelling by Dr (Miss) Sharad Singh at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017

Before Storytelling I am with authors, writers and poets at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017
Before Storytelling Dr (Miss) Sharad Singh with authors, writers and poets at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017
For Story Telling in 'Aadya ' function at Bharat Bhavan, Bhopal (15.04.2017) - Dr Sharad Singh.
With beautiful sculpture at Bharat Bhavan, Bhopal, 15.04.2017

उत्साही युवा लेखिका डॉ. लता अग्रवाल की Facebook Wall से उनके आत्मीय उद्गार ..... ‘‘आज वरिष्ठ साहित्यकार सुश्री शरद जी से भेंट हुई। साहित्य के विविध विषयों एवं वर्तमान लेखन को लेकर उनसे लम्बी चर्चा हुई। साथ में हैं सतना से श्रीमती सुषमा मुनीन्द्र जी। दो - दो वरिष्ठ अनुभवी साहित्यक मित्रों के साथ अविस्मरणीय पल।’’
धन्यवाद डॉ. लता...   

With Dr Lata Agrawal in my room at Hotel Palash Residency, Bhopal

With Dr Lata Agrawal in my room at Hotel Palash Residency, Bhopal

With Dr Lata Agrawal in my room at Hotel Palash Residency, Bhopal
With Dr Lata Agrawal in my room at Hotel Palash Residency, Bhopal

With poetess Poonam Aurora at Hotel Palash, Bhopal ... Occasion Aadya Samaroh, Bharat Bhavan, Bhopal, 16.04 2017

With writer Savita Singh & Sushma Munindra at Hotel Palash, Bhopal ... Occasion Aadya Samaroh, Bharat Bhavan, Bhopal MP, 16.04.2017


पिंक, मातृ और मॉम .... सोचने को विवश करती फिल्में - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
"#पिंक, #मातृ और #मॉम .... सोचने को विवश करती #फिल्में "मेरे कॉलम #चर्चा_प्लस में "दैनिक सागर दिनकर" में ( 19.04. 2017) ..My Column #Charcha_Plus in "Sagar Dinkar" news paper
 
चर्चा प्लस
पिंक, मातृ और मॉम .... सोचने को विवश करती फिल्में
- डॉ. शरद सिंह
नायिका के बिना भारतीय सिनेमा की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। कई फिल्में नायिका प्रधान ही बनाई जाती रही हैं। लेकिन ऐसी फिल्मों में महत्व रहता है स्त्रीपक्ष के प्रति गंभीरता और उसके प्रस्तुतिकरण का। साथ ही इसका भी कि वे स्त्री की दशा के किस पक्ष की ओर संकेत कर रही हैं। इस लेख में ‘इंसाफ का तराजू’ के आधार पर ‘पिंक’, ‘मातृ’ और ‘मॉम’ के बहाने भारतीय सिनेमा और स्त्री की दशा को संक्षेप में खंगाला गया है, जिसका निष्कर्ष अत्यंत चौंकाने और चिन्तित करने वाला है।

भारतीय सिनेमा में अकसर भड़कीले आईटम चरित्रवाली या फिर निरा परम्परावादी चरित्र की कहानियां परोसी गई हैं। ऐसी कम फिल्में आई हैं जिनमें औरतों के पक्ष को, उनकी समस्याओं को, उनकी पीड़ा को बखूबी और बारीकी से रखा गया हो। ‘मदर इंडिया’ जैसी फिल्मों को छोड़ दिया जाए तो औरतों को अधिकतर पुरुषाश्रित ही फिल्माया जाता रहा है। यदि उन्हें शक्तिशाली दिखाया भी गया तो या तो ‘हंटरवाली’ के रूप में या फिर ‘डाकूरानी’ के रूप में। समाज में औरतों की स्थिति का इसे सही चित्रण नहीं कहा जा सकता। किन्तु ऐसा भी नहीं है कि भारतीय सिनेमा ने स्त्रीजीवन की सच्चाइयों से हमेशा नज़रें चुराई हों। कई निर्माता निर्देशक ऐसे भी है जिन्होंने निर्माण और हानि के तमाम जोखिम उठाते हुए स्त्रीजीवन को उसकी पूरी कड़वाहट भरी सच्चाई के साथ फिल्माया। बहुत पुरानी बात न करते हुए यदि सन् 1980 की बात की जाए तो उस वर्ष एक फिल्म रिलीज़ हुई थी-‘इंसाफ का तराजू’। बी. आर. चोपड़ा के द्वारा निर्देशित इस फिल्म की भारतीय स्क्रिटिंग की थी शब्द कुमार ने। वस्तुतः यह फिल्म हॉलीवुड की एक प्रसिद्ध मूवी ‘लिपिस्टिक’ पर आधारित थी। कहानी नायिका प्रधान थी और बलात्कार जैसे संवेदनशील विषय पर आधारित थी। सौंदर्य प्रतियोगिता में सफल रहने वाली एक सुंदर युवती पर एक अय्याश पूंजहपति का दिल आ जाता है और वह यह जानते हुए भी कि युवती किसी और की मंगेतर है, उसके साथ बलात्कार करता है। वह युवती पुलिस में रिपोर्ट लिखाती है। मुक़द्दमा चलता है और भरी अदालत में प्रतिवादी का वकील अमानवीयता की सीमाएं तोड़ते हुए युवती से अश्लील प्रश्न पूछता है और अंततः युवती को बदचलन ठहराने में सफल हो जाता है। पीड़ित युवती उस शहर को छोड़ कर दूसरे शहर में जा बसती है। उसका जीवन ग्लैमर से दूर एकदम रंगहीन हो जाता है। फिर भी वह अपनी छोटी बहन के लिए जीवन जीती रहती है। दुर्भाग्यवश कुछ अरसे बाद उसकी छोटी बहन भी नौकरी के सिलसिले में उसी अय्याश पूंजीपति के चंगुल में फंस जाती है और बलात्कार का शिकार हो जाती है। एक बार फिर वहीं अदालती रवैया झेलने और अपनी छोटी बहन को अपमानित होते देखने के बाद वह युवती तय करती है कि अब वह स्वयं उस बलात्कारी को दण्ड देगी। 
 
Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in "Sagar Dinkar" Daily News Paper

‘इंसाफ का तराजू’ पर यह आरोप हमेशा लगता रहा कि एक संवेदनशील मुद्दे को व्यावयासिक ढंग से फिल्माया गया। दूसरी ओर ‘चक्र’, ‘दमन’, ‘बाज़ार’ जैसी फिल्में पूरी सादगी से और अव्यवसायिक ढंग से स्त्री-मुद्दों को उठा रही थीं। लेकिन ‘इंसाफ का तराजू’ की अपेक्षा इनकी दर्शक संख्या न्यूनतम थी। ये फिल्में बुद्धिजीवियों और अतिसंवेदनशील दर्शकों की पहली पसंद बन पाई जबकि ‘इंसाफ का तराजू’ ने बॉक्स आफिस पर रिर्कार्ड तोड़ दिया।
कुछ महिला फिल्म निर्देशकों ने समय-समय पर स्त्रीजगत के पक्षों को बारीकी के साथ सेल्यूलाईड पर उतारा जिनमें प्रमुख नाम हैं- मीरा नायार, दीपा मेहता, अपर्णा सेन, कल्पना लाजमी और अनुषा रिजवी। इन्होंने अपनी फिल्मों के द्वारा कथानकों की विविधता को प्रस्तुत किया किन्तु उन सबके मूल था स्त्री चरित्रों एवं सामाजिक सरोकार का गहन दायित्वबोध। क्या कोई पुरुष निर्देषक ‘फायर’ को इतनी संवेदनषील तटस्थता के साथ फिल्मा पाता? शायद नहीं। क्या मीरा नायर का ‘चंगेज खान’ पात्र इतने आत्ममंथन के साथ रूपहले पर्दे पर आ पाता? शायद नहीं। लेकिन इन फिल्मों की संख्या न्यून है।
पिछले दशकों में बीच-बीच में कुछ फिल्में आईं जिन्होंने स्त्री-अस्मिता के सामाजिक परिवेश को यथार्थवादी तरीके से सामने रखा। जेसिका लाल एवं आरुषी मर्डर केस पर बनी फिल्मों ने भी अपनी ओर ध्यान खींचा। लेकिन अनिरुद्ध रॉय चौधरी की ‘पिंक’ ने जिस जोरदार ढंग से स्त्री-अस्मिता और बलात्कार के मुद्दे को उठाया, उसने दर्शकों के मन को झकझोर दिया। ’अनुरानन’ और ’अंतहीन’ जैसी एक से बढ़कर एक बंगाली फिल्में डायरेक्ट करने के बाद पहली बार डायरेक्टर अनिरुद्ध रॉय चौधरी ने हिंदी फिल्म ’पिंक’ का डायरेक्शन किया। फिल्म की स्क्रिप्ट रितेश शाह ने बहुत ही सरल लेकिन सोचने पर विवश करने वाली लिखी। स्क्रिप्ट लिखने से पहले र्प्याप्त रिसर्च वर्क किया गया। कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, दर्शकों और पात्रों के बीच रिश्ता बनने लगता है। पात्रों का चित्रण भी बखूबी किया गया। अमिताभ बच्चन की अदाकारी ने फिल्म को उसकी समूची आत्मा के साथ उस ऊंचाई पर पहुंचा दिया जो ऊंचाई उस कथानक को मिलनी चाहिए थी। ‘पिंक’ दिल्ली में किराए पर रहने वाली तीन वर्किंग लड़कियों मीनल अरोड़ा, फलक अली एंड्रिया तेरियांग की कहानी है। एक रात एक रॉक कॉन्सर्ट के बाद पार्टी के दौरान जब उनकी मुलाकात राजवीर और उसके दोस्तों से होती है तो रातों-रात कुछ ऐसा घटित हो जाता है जिसकी वजह से मीनल, फलक और एंड्रिया डर-सी जाती हैं, और भागकर अपने किराए के मकान पर पहुंचती हैं, वहीं से बहुत सारे ट्विस्ट और टर्न्स शुरू हो जाते हैं, कहानी और दिलचस्प तब बनती है जब इसमें वकील दीपक सहगल के रूप में अमिताभ बच्चन की एंट्री होती है। तीनों लड़कियों को कोर्ट जाना पड़ता है और उनके वकील के रूप में दीपक उनका केस लड़ते हैं। कोर्ट रूम में वाद विवाद के बीच कई सारे खुलासे होते हैं। ‘पिंक’ उस पुरुषवादी मानसिकता के खिलाफ एक कड़ा संदेश देती है, जिसमें महिला और पुरुष को अलग-अलग पैमानों पर रखा जाता है। इस फिल्म की कहानी बताती है कि यदि कोई पुरुष ताकतवर परिवार से होता है तो किस तरह से पीड़ित महिला के लिए न्याय की लड़ाई लड़ना कठिन हो जाता है। मूवी समाज की उस सोच पर सवाल खड़े करती है, जो लड़कियों की छोटी स्कर्ट और पुरुषों के साथ ड्रिंक करने पर उनके चरित्र को खराब बताती है। फिल्म यह भी बताती है कि भले ही कोई महिला सेक्स वर्कर हो या फिर पत्नी हो, लेकिन यदि वह ’न’ कहती हो तो किसी भी पुरुष को उसे छूने और उसके साथ जबरदस्ती करने का अधिकार नहीं है।
अभिनेत्री रवीना टंडन की फिल्म ‘मातृ’ भी स्त्रीअस्मिता के मुद्दे को उठाती है। इस फिल्म में रवीना एक ऐसी मां की भूमिका में हैं जिन्हें उनकी बेटी के सामूहिक बलात्कार और हत्या के बाद इंसाफ नहीं मिलता। पुलिस यहां तक कि उसका पति भी साथ छोड़ देता है, ऐसे में वह मां गुनहगारों को अपने तरीके से सबक सिखाती है और अपनी बेटी के कातिलों को सज़ा दिलाती है। अश्तर सैयद के निर्देशन में बनी यह फिल्म व्यवस्था के प्रति एक बार फिर कई प्रश्न खड़े करती है। ‘मातृ’ के ट्रेलर के अनुसार फिल्म की नायिका विद्या (रवीना टंडन) दिल्ली में रहती है। वह अपनी बेटी के साथ कहीं जा रही होती है तभी कुछ गुंडे उन्हें पकड़ लेते हैं। इसके बाद गुंडे विद्या की बेटी के साथ बलात्कार करते हैं जिससे उसकी मौत हो जाती है। जब विद्या कानून का दरवाजा खटखटाती है तो उसे पुलिस से मदद नहीं मिलती और फिर अपनी बेटी के कातिलों से बदला लेने का फैसला करती है। ट्रेलर में रवीना एक्शन करती हुई भी दिखाया गया है। इस फिल्म के निर्देशक हैं अश्तर सैयद। लेकिन इस फिल्म को दर्शकों तक पहुंचने से पहले सेंसरबोर्ड की कैंची से हो कर गुज़रना पड़ा है। कुछ दिन पहले ’लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ को सेंसर बोर्ड ने ’असंस्कारी’ बताते हुए सर्टिफिकेट नहीं दिया था और अब रवीना टंडन की ’मातृ’ भी सेंसर ने आपत्ति जताई। बेशक़ यह फिल्म देश में बढ़ते हुए बलात्कार को लेकर है किन्तु सेंसरबोर्ड ने इसके हिंसक रेप सीन पर ऐतराज किया।
फिल्म ’इंग्लिश-विंग्लिश’ में अपनी बेहतरीन अदाकारी से दर्शकों का दिल जीतने वाली श्रीदेवी की फिल्म ’मॉम’ का टीजर लॉन्च किया गया है। श्रीदेवी अपनी फिल्म ’मॉम’ के साथ फिर पर्दे आने को तैयार हैं। ’मॉम’ की स्टोरी एक मां के कॉन्फिलिक्ट की कहानी है। जी स्टूडियो की इस फिल्म के डायरेक्टर हैं रवि उद्यावर, मॉम इनकी पहली फिल्म है। अपराध आधारित कहानी ’मॉम’ में सौतेली मां का अपनी बेटी के साथ संघर्ष की कहानी है। अक्षय खन्ना भी इस फिल्म में निगेटिव किरदार में नजर आ रहे हैं। इस फिल्म में श्रीदेवी के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी महत्वपूर्ण किरदार में नजर आएंगे. रवि उदयवार के डायरेक्शन में बनी ’मॉम’ को श्रीदेवी के पति बोनी कपूर प्रोड्यूस किया हैं। इस फिल्म की शूटिंग दिल्ली और जॉर्जिया की लोकेशन पर की गई है।
इन फिल्मों के कथानकों का यदि निष्कर्ष देखा जाए तो जो सच्चाई सामने आती है वह चिन्ता में डालने को र्प्याप्त है कि ‘इंसाफ का तराजू’ से ‘पिंक’, ‘मातृ’ और ‘मॉम’ तक देश के हालात में आमूलचूल परिवर्तन आ चुका है, देश तेजी से प्रगतिपथ पर बढ़ रहा है लेकिन बलात्कार जैसे गंभीर अपराध के विरुद्ध न्याय मिलने के बदले स्त्री को स्वयं जूझना पड़ता है और अपने ढंग से दण्डित करने को विवश होना पड़ता है, बशर्ते उसमें इसका साहस हो। यानी सामाजिक दबाव और दोहरेपन के चलते स्त्री को अभी भी न्याय नहीं मिल पा रहा है।
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