Friday, February 28, 2025

शून्यकाल | ग्लोबल होते धार्मिक मेलों से भी मिलता है जीवन का सही सबक | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक 'नयादौर' में मेरा कॉलम- शून्यकाल
      ग्लोबल होते धार्मिक मेलों से भी मिलता है जीवन का सही सबक
       - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
       मेले का जिक्र आते ही भीड़ का एक दृश्य आंखों के सामने घूम जाता है और यदि किसी से पूछा जाए कि मेला घूमने चलना है? तो वह नाक-भौं सिकोड़ते हुए यही कहेगा कि ‘कौन जाए उस भीड़ में!’ वहीं यदि बात हो किसी शॉपिंग मॉल में जाने की तो उसे राजी होने में दो पल भी नहीं लगेंगे। जबकि शॉपिंग मॉल की भीड़ में हम सिर्फ एक उपभोक्ता होते हैं, वहीँ किसी धार्मिक मेले में हम पहले एक भक्त होते हैं, फिर एक भ्रमणकर्ता होते हैं और फिर कहीं अंत में उपभोक्ता होते हैं। बहुत कुछ जानने, समझने और सीखने को मिलता है धार्मिक मेलों में। यहां प्रस्तुत है महाशिवरात्रि के अवसर पर बड़े महादेव जी परिसर के मेले का मेरा अनुभव, मेरा संस्मरण।
      त्योहार हमारे जीवन में रस घोलते हैं। यांत्रिक हो चले जीवन में सरसता अति आवश्यक है अन्यथा भावनाएं भी शून्य होने लगेंगी और संवेदनाएं और असंवेदना में ढल जाएंगी। त्योहार और मेलों का घनिष्ठ संबंध है। जब कोई त्यौहार पड़ता है तो मंदिरों के आसपास मेले अवश्य भरते हैं। मेले व्यष्टि से समष्टि की ओर ले जाते हैं। मेले ले जाते हैं एकाकीपन से भीड़ की ओर, एकांत से कोलाहल की ओर, अवसाद से उल्लास की ओर।
          शिवरात्रि एक ऐसा त्यौहार है जो शिव और पार्वती के विवाह उत्सव के रूप में मनाया जाता है। शिव मंदिर शहर के मध्य से लेकर सुदूर ग्रामीण अंचल तक मौजूद हैं। मेले सब जगह भरते हैं कहीं छोटे, कहीं बड़े। सागर शहर से लगभग 12 किलोमीटर दूर खुरई मार्ग पर सिंधु नगर में बड़े महादेव जी की विशालकाय प्रतिमा स्थापित है। यह सिंधु समाज द्वारा स्थापित की गई थी तथा आज भी सिंधु समाज ही इस प्रतिमा की देखरेख करता है। संयोगवश शिवरात्रि को बड़े महादेव जी के दर्शन का अचानक शुभ अवसर मुझे प्राप्त हुआ। बिना किसी पूर्व योजना के।
          मैं अंधविश्वासी नहीं हूं किंतु प्राकृतिक संरचना, संवेग एवं घटनाओं पर पूरा विश्वास करती हूं। यह कहूं कि ईश्वर के अस्तित्व पर मेरा विश्वास है तो यह गलत नहीं होगा। यह बात अलग है कि कई बार में ईश्वर को संबोधित करके कहती हूं यदि आप हैं तो इस संसार में दुख क्यों है? पीड़ितजन क्यों है? पुण्यात्मा क्यों कष्ट झेलते हैं और भ्रष्टाचारी या अपराधी क्यों आनंद की जिंदगी व्यतीत करते हैं, कोरोना जैसी महामारी क्यों आई? यद्यपि यह मेरी निजी शिकायत है, निजी प्रश्न हैं और निजी रोष है। लेकिन कभी-कभी कुछ ऐसी अविश्वसनीय घटनाएं घट जाती हैं कि मन सोच में पड़ जाता है। इस महाशिवरात्रि को भी ऐसा ही कुछ घटित हुआ।
         हुआ यह कि मैं अपनी कॉलोनी के मंदिर में पार्थिव शिवलिंग निर्माण के लिए पहुंची। वहां मैंने महिलाओं और बच्चों के साथ बैठकर उत्साह पूर्वक शिवलिंग निर्माण किया। इस दौरान कुछ ऐसा प्रसंग आया कि मेरा मन खिन्न हो गया और मैं वापस घर आ गई। मैं कुछ देर दुखी मन से चुपचाप उदास बैठी रही। फिर मेरी अपने एक बड़े भाई से फोन पर चर्चा हुई और अचानक कार्यक्रम बन गया बड़े महादेव जी के दर्शन करने का। पहले तो मन हुआ कि न जाऊं लेकिन फिर लगा कि जाने से मन हल्का हो जाएगा। घर में उदास बैठे रहने से कोई फायदा नहीं है, कोई आंसू भी पोंछने नहीं आएगा। फिर मुझे उस प्रसंग का किसी से जिक्र भी नहीं करना था। कुछ देर बाद मैं सबके साथ निकल पड़ी बड़े महादेव जी के दर्शन करने के लिए। 
          हल्के-फुल्के हंसी मजाक के साथ 12 किलोमीटर का रास्ता तय करके जब बड़े महादेव जी की प्रतिमा स्थल पर पहुंची तो अचानक ऐसा लगा कि जैसे यह तो बड़े महादेव जी का बुलावा था। शायद उन्हें पता चल गया था कि मैं दुखी हूं और उन्होंने मुझे उसे कोलाहल में अपने पास बुला लिया। यह मेरे मन का वहम भी हो सकता है लेकिन सच यही था कि मैं उस समय बड़े महादेव जी के सम्मुख जा पहुंची थी। वह कहावत है न कि यदि धरती पर एक पत्ता भी हिलता है तो उसका असर नक्षत्रों तक होता है। शायद उस समय मुझे हुई मानसिक पीड़ा ने प्रकृति का कोई पत्ता हिला दिया था और प्रकृति ने मुझे उस स्थान पर पहुंचा दिया था जहां धर्म, दर्शन, प्रकृति और जन सभी मौजूद थे। 
         मेरे सामने था ग्लोबल होता ग्रामीण मेला। इस मेले में भीड़ का सैलाब था। महिलाएं, पुरुष, बच्चे सभी उत्साहपूर्वक  शिव प्रतिमा की ओर बढ़े जा रहे थे। सबका प्रथम उद्देश्य था - शिव के दर्शन करना। दूसरा उद्देश्य मेला घूमना और  तीसरा उद्देश्य था रोजमर्रा के जीवन से अलग हटकर जीवन जीना। शिवस्थली तक रास्ते के दोनों और कतार से दुकानें लगी हुई थीं। बीच में फिर दुकानों की एक पंक्ति थी जो रोड डिवाइडर का काम कर रही थी। दूकानों में तरह-तरह के समान बिक्री के लिए सजा कर रखे गए थे। इनमें चूड़ी, बिंदी, बर्तन, खिलौने, कपड़े, खाने की वस्तुओं से लेकर इलेक्ट्रिक स्कूटर का स्टाल भी लगा हुआ था। यही तो था मेले का ग्लोबल रंग कि एक ठेले पर चना चटपटे बिक रहा था तो दूसरे ठेले पर चाऊमीन। एक ठेले पर देसी कुल्फी बिक रही थी तो दूसरे ठेले पर इंग्लिश फालूदा। इस तरह खाने-पीने की वस्तुओं का भी एक खूबसूरत कंट्रास्ट वहां मौजूद था। 
           दर्शनार्थियों में भी भारतीय और पाश्चात्य का मिला-जुला पहनावा देखा जा सकता था। युवा लड़के-लड़कियां, बच्चे और पुरुष जींस, शर्ट और टॉप पहने  थे, वही लगभग हर उम्र की महिलाएं साड़ी पहने थीं। कुछ सीधे पल्ले की तो कुछ उल्टे पल्ले की। उल्टे पल्ले की साड़ियां स्टाइलिश तरीके से पहनी गई थीं, बिल्कुल किसी टीवी सीरियल की अभिनेत्री की भांति। अधिकांश महिलाओं ने भी मस्तक पर हल्दी और सिंदूर से शिव आकृति बनवा रखी थी। साथ में मैचिंग की चूड़ी, झुमके, गले का हार उनकी सुरुचि और साज-सज्जा की एक अलग ही कहानी कह रहा था। ऐसे मेलों में कई रोचक प्रसंग भी देखने सुनने को मिलते हैं।
          एक 20-22 साल की विवाहिता युवती ने वही ठेले पर बिक रहे एक काले चश्मे को पहनते हुए अपने पति से बुंदेली में कहा- "हम जे चश्मा ले रए। जे हम पे सूट कर रओ।" मैंने भी देखा, वह चश्मा सचमुच उस पर बहुत सूट कर रहा था। लेकिन उसके पति ने उससे ठिठोली करते  हुए कहा, "जे पैन्ह के तुम हीरोइन नोंई बन जेहो।"
        "हम तो ऊंसई हिरोइन आएं। कओ तो  कछु करके दिखा दें।" उसे युवती ने भी इठलाकर हंसते हुए नहले पर दहला मारा। "कछु करके दिखा दें" का रिस्क उसका पति नहीं उठा सकता था इसलिए उसने हथियार डाल दिए और तुरंत उसके लिए चश्मा खरीद दिया। वह युवती शान से चश्मा लगाकर इधर-उधर देखने लगी। अचानक उसकी नज़र मुझ पर पड़ी और उसे एहसास हुआ कि मैं उसे देख रही हूं तो उसने झेंप कर मुस्कुरा दिया। मैंने भी मुस्कुराया और कहा, “जंच रओ जे चश्मा तुम पे।” इसके बाद मैं आगे बढ़ गई। वह युवती अपरिचित थी और अपरिचित ही रही। लेकिन उसकी और उसके पति के बीच की हंसी-ठिठोली मेरे मस्तिष्क में अपनी छाप छोड़ गई। 
           मैं जब किसी मेले में जाती हूं तो वहां कुछ न कुछ खाना मुझे अच्छा लगता है। वहां मेले में ग्रामीण परिवेश का खाना तो बिल्कुल नहीं था लेकिन चना चटपटे देखकर मेरा भी मन हो गया खाने का। मेरे साथ गए मेरे बड़े भाई प्रोफेसर आनंद प्रकाश त्रिपाठी जी तथा भाभी डॉ बिंदु त्रिपाठी जी का व्रत था अतः वे दोनों कुछ भी खाने वाले नहीं थे। किंतु हमारे साथ एक प्यारी सी लड़की नताशा (वैसे वह शिक्षिका है) उसका व्रत नहीं था। तो मैंने और नताशा ने चना चटपटे लिए। नताशा तो संकोचवश खड़ी-खड़ी खाती रही किंतु मैं आदतन अपने फक्कड़पन से एक बंद शटर से टिक कर बैठ गई। बैठने के दौरान वहां उबड़-खाबड़ होने से मैं ज़रा डिसबैलेंस हुई और मेरी बाएं हाथ की कोहनी शटर से  टकराई जिससे जोरदार आवाज़ हुई। बाजू में दूसरी शटर से टिक कर बैठे दो देहाती युवक यह देखकर मुझ पर हंस पड़े। मैंने भी उनकी ओर देखा और हंसने लगी। फिर मैं व्यवस्थित बैठकर चना चटपटे खाने लगी। यही, 2 मिनट बाद  मेरा ध्यान उन दोनों युवकों की ओर गया। वे सहज भाव से आपस में बात करने में तल्लीन हो गए थे। जैसे 2 मिनट पहले वहां कुछ घटित हुआ ही न हो। 
             मेले में यूं तो आधुनिक झूले, घिसलपट्टी आदि थे लेकिन वहां एक स्टॉल पर 10 रुपए में पूड़ी-सब्जी का दोना भी उपलब्ध था। इस महंगाई के जमाने में एक बहुत बड़ी नेमत। अच्छी खासी भीड़ थी उसे स्टॉल पर। इतना सस्ता भोजन कौन नहीं पाना चाहेगा? वहीं मेले के प्रवेश स्थल के निकट धर्मार्थ प्रसादी वितरण की व्यवस्था भी थी। वह प्रसादी मैंने भी ग्रहण की। काजू आदि मेवे डली साबूदाने की एक कटोरा स्वादिष्ट खीर। देखा जाए तो 10 रुपये के एक दोना पूड़ी-सब्जी या एक कटोरा खीर में किसी का हमेशा के लिए पेट भरने वाला नहीं है लेकिन इससे जो पारस्परिक सामंजस्य और आत्मीयता बढ़ती है वह सामाजिक व्यवस्थाओं परंपराओं और आस्थाओं के प्रति विश्वास को दृढ़ करती है। प्रसादी वितरण करने वाला कभी किसी से उसकी जाति या धर्म नहीं पूछता है। उसके लिए वे सब एक समान होते हैं जो उसके सम्मुख प्रसादी पाने के लिए हाथ बढ़ाते हैं। सामाजिक समरसता का इससे अच्छा उदाहरण और भला क्या हो सकता है? 
          धार्मिक मेलों की एक और सबसे बड़ी विशेषता यह भी होती है कि वहां महिलाओं के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ या अभद्रता नहीं होती है। अधिकांश लोग धार्मिक भावना से वहां पहुंचते हैं, दृश्य भगवान का डर उनके मन में मौजूद होता है जो उन्हें कुछ भी गलत करने से रोकता है।  धार्मिक भावना की आड़ में यदि कोई उटपटांग व्यक्ति पहुंच भी जाए तो उसके लिए वहां उपस्थित कारसेवक पर्याप्त होते हैं जो “अपनी सेवा” से उन्हें अच्छी “समझाइए” दे देते हैं। यद्यपि ऐसे अवसर यदाकदा ही आते हैं। इसीलिए धार्मिक मेलों में स्त्रियां, बालिकाएं और बच्चे सभी उन्मुक्त भाव से अपने उल्लास को जी पाते हैं। बस, ज़ेबकतरों का डर बना रहता है।
          धार्मिक मेलों की परंपरा समय के साथ भले ही बिक्री के सामानों, खाद्य वस्तुओं, ईवी गाड़ियों के प्रचार स्टॉलों, आधुनिक झूलों के रूप में ग्लोबल हो रही हो लेकिन उसका मूल चरित्र अभी भी संस्कारवान और पुरातन ही है, जो सुखद है। वस्तुतः हमें शॉपिंग मॉल संस्कृति से कुछ समय निकालकर मेलों में जाने और ग्राम्य जीवन के साथ शहरी जीवन को घालमेल होते देखने का भी आनंद लेते रहना चाहिए। मेला घूमना तन, मन, समाज, संस्कार, परिवार, उल्लास और उत्साह सभी के लिए जरूरी है।
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