Tuesday, April 14, 2026

पुस्तक समीक्षा | जेंडर डिस्कोर्स की रोशनाई वाला विशेषांक और नए कानूनों की रोशनी | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


पुस्तक समीक्षा
जेंडर डिस्कोर्स की रोशनाई वाला विशेषांक और नए कानूनों की रोशनी
- समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह
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विशेषांक - समय के साखी (जेंडर डिस्कोर्स पर केंद्रित)
संपादक - आरतीे
प्रकाशक - संपादकीय कार्यालय, 701, अन्नपूर्णा परिसर, पीएण्डटी चौराहा के पास, भोपाल (म.प्र.) 462003
मूल्य - 300/-
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         आरती जी के संपादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिका “समय के साखी” का 57 वां अंक सागर के वरिष्ठ कवि वीरेंद्र प्रधान जी के सौजन्य से मुझे प्राप्त हुआ। वस्तुतः यह अंक सामान्य अंक न होकर विशेषांक है और वह भी जेंडर डिस्कोर्स पर। यह एक ऐसा विषय है जिस पर सभी को गंभीरता से चिंतन करने की आवश्यकता है। विशेष रूप से अब, जब जेंडर को लेकर नए अधिनियम आकार ले रहे हैं। वीरेंद्र प्रधान जी ने “समय के साखी” पत्रिका का जेंडर डिस्कोर्स विशेषांक इस आग्रह के साथ दिया कि मैं इस विशेषांक के संबंध में कुछ समीक्षात्मक लिखूं। चूंकि जब मैं सामयिक प्रकाशन की साहित्यिक पत्रिका “साहित्य सरस्वती’’ (नई दिल्ली) की कार्यकारी संपादक थी तब पत्रिका के संपादक महेश भारद्वाज जी के निर्देशन में थर्ड जेंडर विमर्श विशेषांक प्रकाशित किया गया था। बाद में विशेषांक की सामग्री के अलावा कुछ और विद्वानों से लेख आमंत्रित करके कलेवर को “थर्ड जेंडर विमर्श” पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया गया। ताकि शोधार्थियों एवं जेंडर डिस्कोर्स में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए विशेष एवं तार्किक जानकारी एक ही ज़िल्द में उपलब्ध हो सके। जहां तक स्त्री विमर्श का सवाल है तो मेरा लेखन एवं सामयिक प्रकाशन का मुख्य प्रकाशन स्त्री विमर्श पर ही केंद्रित रहा है। इसलिए ‘‘समय के साखी’’ पत्रिका का जेंडर डिस्कोर्स विशेषांक मेरे लिए दिलचस्प का विषय था। फिर भाई वीरेंद्र प्रधान जी का आग्रह भी था। परिणामतः मैंने विशेषांक को एकाग्रचित्त हो कर आद्योपांत पढ़ा। विशेषांक में स्त्री विमर्श और ट्रांसजेंडर विमर्श दोनों मौजूद हैं। मुझे भी लगा कि इस पर अवश्य लिखा जाना चाहिए।
   दिलचस्प बात यह है की ट्रांसजेंडर को लेकर विगत दिनों अधिनियम 2026 पर बड़ा बवाल मचा। ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026, 2019 के कानून को बदलकर पहचान के लिए स्व-घोषणा की जगह मेडिकल सर्टिफिकेट अनिवार्य किय गया है। इस प्रस्तावित बदलाव का ट्रांसजेंडर समुदाय विरोध कर रहा है क्योंकि उनका मानना है कि यह आत्म-निर्णय के अधिकार को सीमित करता है। यह बिल 13 मार्च 2026 को पेश किया गया था। यह कानून 2014 के ‘‘नालसा’’ (नेशनल लीगल सर्विसेस अथरिटी) फैसले का उल्लंघन माना जा रहा है, जिसने पहचान के स्व-निर्धारण को मान्यता दी थी। समुदाय द्वारा ‘‘काला कानून’’ कह कर इसे आत्म-सम्मान के खिलाफ भी कहा गया। वही दूसरा विषय है स्त्रियों के अधिकारों का ‘‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’’ (106वां संवैधानिक संशोधन) के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में लागू किया जाना है। प्रधानमंत्री मोदी के अनुसार, इस कानून का लाभ 2029 के लोकसभा चुनाव से मिलना शुरू हो सकता है। यह कितने प्रतिशत महिलाओं को सशक्त बना सकेगा यह तो भविष्य ही बताएगा किंतु इससे महिलाओं की सभी सहभागिता राजनीति में बढ़ेगी।
    स्त्री विमर्श और ट्रांसजेंडर विमर्श यह दोनों विषय विशेषांक में शामिल हैं। इन पर विद्वानों ने अपनी अपनी राय दी है। देखा जाए तो 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में महिला जनसंख्या लगभग 58.64 करोड़ (कुल जनसंख्या का 48.5 प्रतिशत) थी। 2021 में 1000 पुरुषों पर 1020 महिलाएं थीं, जबकि शहरी क्षेत्रों 985 पाया गया है। वहीं, सन 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की आधिकारिक संख्या 4.88 लाख थी। हालांकि, कार्यकर्ता और विभिन्न अनुमान बताते हैं कि सामाजिक कलंक और पहचान के मुद्दों के कारण वास्तविक संख्या इससे 6-7 गुना अधिक हो सकती है। सटीक सरकारी आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
विशेषांक में समाज में जेंडर के अनुपात, उनकी स्थितियों एवं उनके जीवन की प्रगति की संभावनाओं पर विचार किया गया है। जो आलेख इसमें शामिल किए गए हैं वे हैं- बंदीगृह की औरतें और खामोशी का विमर्श- प्रज्ञा जोशी, जिंदा कौमों की मुर्दा दास्तान- नाइश हसन, वे बहादुर स्त्रियाँ- हिन्दी कहानी में घुमंतू समुदाय, स्त्री और पुलिस- रमाशंकर सिंह,  ट्रांसजेंडर और समाज मनोवैज्ञानिक समझ की जरूरत- अब्दुल रहीम ‘‘चंदा’’, दलित स्त्री का ‘अन्य’ आत्मकथा-संदर्भ- डॉ. बजरंग बिहारी तिवारी, इकोफेमिनिज्म: स्त्री और प्रकृति का पक्षधर-सुरेश तोमर, राष्ट्रवादी उन्माद के दौर में मुस्लिम स्त्री - समीना खान, संघर्ष से कामयाबी तक का लंबा सफर- सुमित पी.वी., पितृसत्ता: विचारधारा-आलोचना के नए आयाम- ईश्वर सिंह दोस्त, समकालीन भारतीय स्त्री आंदोलन- अवंतिका शुक्ला।
आलेखों के साथ ही दो वर्ताएं -‘‘बातचीत-एक’’ तथा ‘‘बातचीत-दो’’ हैं। जिनमें ‘‘बातचीत-एक’’ में सविता सिंह, सीमा आजाद, रेखा सेठी, रेखा कस्तवार, संजीव चंदन के विचार हैं तथा ‘‘बातचीत-दो’’ में वंदना चौबे, जितेन्द्र विसारिया, अनुपम सिंह एवं नेहा नरूका के विचार हैं। 
‘‘लेखा-जोखा’’ के अंतर्गत ‘‘कुछ पहाड़ लाँधे हैं, अभी बाकी हैं बहुत....’’ शीर्षक से सुधा अरोड़ा के ज़मीनी विचार हैं। इसके साथ ही ‘‘प्रसंग: आलोचना’’ के अंतर्गत माया मिश्र ने लिखा है ‘‘स्त्री रचनात्मकता: किताबों के आलोक में’’।
लेखक रामशंकर सिंह का यह कथन ध्यान देने योग्य है-‘‘पितृसत्तात्मक परिवारों में महिलाओं को अपना ताबेदार बनाया और इस ताबेदारी को लिखने की प्रक्रिया से और ताकत मिली। सब कुछ लिख दिया गया- कौन स्वामी, कौन सेवक, किसको किस जगह पर रखा जाना है- यह सब लिखा गया। उन समाजों में जहाँ लेखन कला नहीं थी, वहाँ ‘परम्परा के भीतर’ स्त्रियों की ताबेदारी को सुरक्षित रखा गया। यह अनायास नहीं था कि मानवविज्ञानी लेवी स्ट्रॉस को कहना पड़ा कि एक केंद्रीकृत, पदानुक्रमित राज्य अपने आपको पुनरुत्पादित करने के लिए लेखन कला का प्रयोग करता है...। लेखन एक अजीब चीज है...। एकमात्र घटना जो इसके साथ हमेशा जुड़ी रही है, वह है शहरों और साम्राज्यों का निर्माण राजनीतिक व्यवस्था में एकीकरण, अर्थात् बड़ी संख्या में व्यक्तियों का जातियों और वर्गों के पदानुक्रम में एकीकरण। यह मानवजाति के ज्ञानोदय की अपेक्षा शोषण को ही बढ़ावा देने के लिए प्रतीत होता है।’ वास्तव में पहले परम्परा और बाद में लिखित संहिताओं में स्त्रियों के लिए ताबेदारी की इबारतें तैयार की गई। इसे आप अनुभवमूलक तरीके से उस समय लक्षित कर सकते हैं, जब कहा जाता है कि ‘ऐसा हमारे ग्रंथों में कहा गया है’ ‘हमारी परम्परा में ऐसा है’ या ‘हमारे यहाँ तो ऐसा था।’ इन सारे तर्कों में लेखन कला, समाज का वर्चस्वशाली सांस्कृतिक तंत्र और राज्य भूमिका निभाते हैं।’’
सक्रिय समाजसेवी, लेखिका एवं स्त्री अधिकारों की पैरोकार सुधा आरोड़ा ने स्त्रीमुक्ति - ‘‘कुछ भ्रांतियाँ और सुझाव’’ शीर्षक से स्त्री विमर्श के स्वरूप की बारीकी से व्याख्या की है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘स्त्री विमर्श दरअसल पितृसत्ता, सम्पत्ति में भागीदारी और राजनीतिक तथा सांस्कृतिक रूप से स्त्रियों की बराबरी और सम्मान का मुद्दा है। भारत में स्त्री का अस्तित्ववादी संघर्ष बहुत पुराना है। बौद्धकाल से लेकर वैदिक काल और मध्यकाल तक इसके अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं। गार्गी, मैत्रेयी, अपाला, घोषा, लोपा, अनेक थेरियों सहित सारन्धा, अहिल्याबाई से लेकर रजिया सुल्तान तक हम एक परंपरा देख सकते हैं कि स्त्रियों ने सोच और सत्ता दोनों ही स्तरों पर संघर्ष किया। मीराबाई, अक्क महादेवी, ललद्यद, जनाबाई और बहिणा बाई दर्जनों नाम हैं। लेकिन दुर्भाग्य से भारत में इन सबके द्वारा उठाए गए प्रश्नों को जोड़कर स्त्री मुक्ति का एक वृहद पाठ तैयार नहीं किया जा सका इसलिये लिंगभेद के खिलाफ भारत में संघर्ष की परंपरा को बल न मिल सका।’’  सुधा आरोड़ा ने आगे लिखा है कि ‘‘स्त्रियों में बदलाव आया पर इस बदलाव के लिये हमारा समाज तैयार नहीं है। उन्होंने घर की चहारदीवारी के साथ अर्थ उपार्जन में भी हाथ बंटाया पर यह दोहरी जिम्मेदारी भी उसे अपना सम्मान दिलाने में नाकाम रही। दिक्कत यह है कि स्त्री की दशा में सुधार, समाज और पुरुषों की मानसिकता को बदले बिना नहीं हो सकता और समाज पुरुषसत्तात्मक है और आंदोलनकारी स्त्रियों की जमात को पीछे धकेलने में पुरुषों का ही नहीं, पुरुष सोच वाली महिलाओं का भी बहुत बड़ा हाथ है। यह एक अलग मुद्दा है।’’
ट्रांसजेंडर की जब बात आती है तो भारत के प्ररिप्रेक्ष्य में वह और अधिक जटिल हो जाती है। सच तो ये है कि आज भी यहां लोग ट्रांसजेंडर की जैविक विविधता को नहीं जानते और समझते हैं। उनके लिए एक ट्रांसजेंडर मात्र ट्रांसजेंडर होता है, नाच-गा कर नेग के पैसे मांगने वाला समुदाय। इस संदर्भ में अब्दुल रहीम ‘‘चंदा’’ का लेख ‘‘ट्रांसजेंडर और समाज: मनोवैज्ञानिक समझ की जरूरत’’ बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘ट्रांस जेंडर शब्द को लेकर समाज के आम लोग अक्सर भ्रम की स्तिथि में होते हैं। वे ट्रांस जेंडर केवल उन्हें समझते हैं जो किन्नर के रूप में नाच-गाकर बधाई माँगने का काम करते हैं। जबकि ऐसा नहीं है। ट्रांस जेंडर में वे सभी व्यक्ति आते हैं जिनका जन्म से प्राप्त लिंग उनके मनोवैज्ञानिक लिंग अर्थात जेंडर से मेल नहीं खाता। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति का जन्म एक पुरुष के रूप में हुआ लेकिन वह व्यक्ति जेंडर से खुद को एक स्त्री महसूस करता है या एक स्त्री शरीर में जन्मा व्यक्ति खुद को पुरुष अनुभव करता है। अर्थात जिन व्यक्तियों की लैंगिक पहचान जन्म के समय निर्धारित लिंग से मेल नहीं खाती ऐसे सभी व्यक्ति ट्रांस जेंडर होते हैं। ट्रांस जेंडर में अलग अलग श्रेणियों के लोग सम्मिलित हैं।’’ उन्होंने ट्रांस महिला, ट्रांस पुरुष, इंटर सेक्स, ट्रांस सेक्सुअल  में बायोलाॅजिकल अंतर बताते हुए ‘‘हिजड़ा या किन्नर’’ को भी स्पष्ट किया है। उन्होंने लिखा है कि ‘‘हिजड़ा शब्द अरबी भाषा के हिज से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है विछोह, विरह या छोड़ देना। वैसे हिजड़ा या किन्नर अपने आप मे कोई जेंडर नहीं। यह एक गुरु-शिष्य आधारित परम्परा है। जो परंपरा सदियों पुरानी है। वर्तमान में यह परम्परा भारत, पाकिस्तान, नेपाल और बंग्लादेश में है, इस परम्परा को केवल ट्रांस महिलाएँ ही आगे बढ़ाती हैं।’’
यहां उल्लेखनीय है कि अब्दुल रहीम ‘‘चंदा’’ स्वयं ट्रांसजेंडर समुदाय से हैं। उन्होंने एमकॉम, एमए (भारतीय शास्त्रीय संगीत में) जबलपुर से किया है। वे कई वर्षों तक किन्नर डेरे में रहीं। 2007 में डेरा छोड़ कर ट्रांस जेंडर अधिकारों पर एक कार्यकर्ता के रूप में में काम की शुरुआत की। 2011 में ‘‘अस्मान फाउंडेशन’’ नाम से समुदाय आधारित संगठन की स्थापना की जो वर्तमान में ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों पर कार्य कर रहा है। वे सामाजिक न्याय विभाग द्वारा गठित जिला किन्नर कल्याण बोर्ड में समुदाय की प्रतिनिधि सदस्य भी हैं। उन्होंने कविताएं एवं ग़ज़लें भी लिखी हैं। देखा जाए तो वे अपने समुदाय की एक बौद्धिक प्रतिनिधि हैं। इस विशेषांक में उनका लेख ट्रांसजेंडर समुदाय की स्थिति को आधिकारिक रूप से सामने रखता है।
जैसाकि ‘‘समय के साखी’’ की संपादक आरती ने लिखा है-‘‘विशेषांक में बातचीत के दो भाग वरिष्ठ और युवा साथियों के साथ अलग-अलग रखकर, खासतौर पर चार दशक के स्त्री चिंतन, चुनौतियों और अभी तक के हासिल को समझने की कोशिश की गई है। उससे भी ज्यादा जरूरी है कि जो लोग लगातार जेंडर जस्टिस पर काम करते आए हैं, उनके विचारों की समानता और विभिन्नता को जाना जा सके।’’ इस दृष्टि से ‘‘समय के साखी’’ का यह ट्रांसजेंडर डिस्कोर्स विशेषांक पठनीय होने के साथ-साथ संग्रहणीय भी है तथा शोधार्थियों के लिए तो बेहद उपयोगी है।    
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1 comment:

  1. आपकी विस्तृत एवं उपयोगी समीक्षा से लगता है कि 'समय के साखी' का यह अंक निश्चय ही पठनीय है तथा इसमें सम्मिलित रचनाएं विचारोत्तेजक हैं। इससे परिचित करवाने हेतु आपका आभार।

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