चर्चा प्लस
चिरस्थायित्व एवं अमरत्व के भ्रम में जीने वाले लोग
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
संत कबीर ने कहा है कि “कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस। ना जानो कहां मारिसी, कै घर कै परदेस।।” अर्थात तुम अपने इस शरीर और जीवन पर इतना अहंकार क्यों करते हो? मृत्यु (काल) ने तुम्हारे बाल पकड़ रखे हैं। वह तुम्हें कब और कहाँ ले जाकर मार देगी यह कोई नहीं जानता। फिर भी कुछ लोग सोचते हैं कि मैं सर्वश्रेष्ठ हूं! मैं सर्वोत्तम हूं! मैं अजर अमर हो गया हूं! मेरे विचार अनंत काल तक प्रवाहित रहेंगे! क्या सचमुच ऐसा संभव है?
जब विचारधाराएं ही स्थाई नहीं रहती अमरत्व को प्राप्त नहीं कर पाती हैं, फिर भी कोई व्यक्ति सोचे कि मैं हमेशा रहूंगा, मेरा नाम हमेशा रहेगा, मेरा अस्तित्व हमेशा रहेगा, तो यह सबसे बड़ा भ्रम है। दुख और सुख भी स्थाई नहीं रहते हैं तो फिर कोई विचार कोई व्यक्ति या कोई संस्था स्थाई कैसे रह सकती है?
भगवद्गीता के अध्याय 2 के श्लोक 14 में कहा गया है कि संसार में सुख-दुःख और परिस्थितियाँ स्थायी नहीं हैं-
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत।।
अर्थात, हे कुन्ती पुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इंद्रियों और विषयों के संयोग केवल आने-जाने वाले और अनित्य (अस्थायी) हैं। हे भारत! तुम सहनशील बनो और उन्हें धैर्यपूर्वक सहन करो।
सहन करना यह एक बहुत बड़ी विशेषता है और जो इस विशेषता में पारंगत हो जाता है वह निर्विकार हो जाता है। किंतु सहन करने के भी अनेक अर्थ हैं। जो व्यक्ति निर्बल है उसके द्वारा किसी भी प्रकार की अत्याचार को सहन करना निर्विकार की श्रेणी में नहीं आएगा। उसकी स्थिति दलित और पीड़ित की ही बनेगी। अल्पकाल के लिए सहन करना और अवसर प्राप्त होते ही अपने सहनशक्ति को एक और रख कर आक्रामक हो जाना यह अवसरवादी सहनशीलता होती है। ऐसे मामले अधिकांश राजनीति के क्षेत्र में देखे जाते हैं या फिर कार्यालय परिवेश में जहां परिस्थिति वश व्यक्ति प्रताड़ित करने वाले अथवा दबाव बनाने वाले व्यक्ति की हर बात को सहन करता रहता है सिर्फ इस प्रतीक्षा में कि एक दिन समय आने पर वह पलटवार करेगा और डट कर जवाब देगा। बहरहाल चर्चा सिर्फ सहनशक्ति की नहीं बल्कि स्थायित्व और अमरत्व के भ्रम की है।
जब व्लादिमीर लेनिन ने रूस में साम्यवाद की स्थापना की थी और सोवियत संघ ने अपना आकार पाया था तक किसने सोचा था कि उन्हें के वंशज एक दिन लेनिन की मूर्ति को तोड़कर फेंक देंगे उनके विचारों को कुचल देंगे और साम्यवाद से पूंजीवाद की ओर बढ़ जाएंगे। ठीक इसी तरह हमारे देश के पश्चिम बंगाल में भी उस समय तक किसी ने यह नहीं सोचा होगा कि वहां से साम्यवाद के निशान ढूंढ के मिटा दिए जाएंगे, जिस समय वहां साम्यवादी सरकार थी, साम्यवादी विचारधारा का बोलबाला था। समय बदल चुका है। पूरी दुनिया में साम्यवाद सिमट चुका है। पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच एक नया पूंजीवादी साम्यवाद जन्म ले चुका है जिसे यदि राजनीतिक भ्रम कहा जाए तो गलत न होगा। किंतु इसकी किलकारी भी अभी दुनिया के बहुत कम देश में सुनाई देती है। हमारे देश भारत में स्थितियां बिल्कुल बदल चुकी हैं। पश्चिम बंगाल में कई सड़कों और पुलों के नाम बदलने की कवायद शुरू हो चुकी है। राज्य सरकार की 10 सदस्यीय कमेटी कोलकाता की प्रमुख सड़कें लेनिन सरणी, कार्ल मार्क्स, सरणी व हो-ची-मिन्ह सरणी के नाम बदलने में जुट गई है। यानी अंतिम निशान भी पोंछे जा रहे हैं। हमेशा यही होता है और यही होता रहेगा। जब हम वह कहावत सुनते हैं कि खंडहर बता रहे हैं इमारत बुलंद थी तो इससे यह भी सिद्ध हो जाता है कि कभी उस इमारत का दबदबा रहा होगा। लेकिन समय के साथ इमारत ढहने लगी और खंडहर में बदल गई। न जाने कितने शहरों, गलियों और चौराहों के नाम बदले जा चुके हैं। यहां तक कि दुनिया में कुछ देशों ने भी अपने नाम बदल दिए। यह यूं ही नहीं होता। जब एक विचार दूसरे विचार पर स्थापित हो जाता है तो वह अपने अनुरूप पूरे परिवेश को बदलने लगता है चाहे वह किसी स्थान का नाम हो या व्यक्ति के कार्य या कृतित्व की स्मृति हो। यह प्रभावी विचार का दम्भ ही होता है जो समसामयिक रूप से उसे स्थाई और अमर होने के भ्रम में डाल देता है। वह सोचने लगता है कि मैं सर्वोत्तम हूं। मैं श्रेष्ठ हूं। मेरे जैसा दूसरा नहीं। मुझे यह दुनिया युगों-युगों तक याद रखेगी। मैं अमर हो गया हूं। मेरे विचार अमर हो गए हैं। ऐसे समय में वह भूल जाता है कि जिन विचारों को कुचलकर वह स्थापित हुआ है उन विचारों ने भी यही भ्रम पाल था कि वह अमर हो गए हैं।
अपने नाम एवं कार्यों के अमरत्व की भावना से प्रेरित होकर टाइम कैप्सूल भी भूमि में गाड़े गए। भारत में सबसे चर्चित सरकारी टाइम कैप्सूल (काल पात्र) 15 अगस्त 1973 को तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा लाल किले के पास जमीन से 32 फीट नीचे गाड़ा गया था। इसे आज़ादी के 25 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में रखा गया था। लाहौरी गेट के पास दबाए गए इस टाइम कैप्सूल को ‘‘काल पात्र’’ नाम दिया गया था। इसे लेकर देश में काफी लंबा राजनीतिक विवाद चला।इसमें भारत की आज़ादी के शुरुआती 25 वर्षों का घटनाक्रम, संघर्ष और देश की उपलब्धियों का विवरण था। इसके भीतर लगभग 10,000 शब्दों की एक पांडुलिपि को तांबे की प्लेटों पर उकेरा गया था ताकि वह हजारों सालों तक सुरक्षित रहे। यह टाइम कैप्सूल 1,000 साल तो दूर, अपनी जगह पर मात्र 4 साल ही रह सका। आपातकाल के बाद जब 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार सत्ता में आई, तो उन्होंने इस कैप्सूल को जमीन से बाहर निकलवा लिया। सरकार बदलने के बाद इसे निकाला और खोला तो गया, लेकिन इसके अंदर मिली सामग्री की पूरी रिपोर्ट को कभी भी आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक नहीं किया गया।
मेरे एक परिचित प्रोफेसर थे हिंदी विषय के। एक बार उन्होंने अपने शोध कार्य के संबंध में चर्चा करते हुए यह कहा कि मैंने फलां साहित्यकार पर शोध करके, उन पर सेमिनार करवा कर उन्हें अमर कर दिया है। उनकी लिखी सारी किताबें लाइब्रेरी में खरीदवा दी हैं। उन पर लिखी मेरी सारी किताबें भी लाइब्रेरी में हमेशा रहेंगी। फिर उन्होंने यहां तक कह दिया कि मेरे नाम से उन्हें यानी उन फलां साहित्यकार को जाना जाएगा। मुझे उस समय आश्चर्य हुआ था यह सुनकर क्योंकि मैं इतिहास की विद्यार्थी थी और मैं यही पढ़ रही थी कि किस प्रकार बिस्मार्क, हिटलर, मुसोलिनी आदि काल की गर्त में समा गए। उनके विचार इतिहास की विषय वस्तु बन कर रह गए। उस कालखंड की तमाम विशेषताओं से हम विद्यार्थी सिर्फ अक्षरों के द्वारा ही ज्ञान प्राप्त कर रहे थे अन्यथा उसकी कल्पना हमारे लिए कठिन थी कि वह युग कैसा रहा होगा। मुझे उस समय भी लगा था कि आज प्रोफेसर जो कह रहे हैं कल इन्हें भी कोई याद रखने वाला रहेगा या नहीं क्योंकि यह इतिहास बनाने का भ्रम पाल रहे हैं लेकिन इनका व्यक्तित्व इतिहास में दर्ज होने योग्य भी नहीं है। हुआ भी यही है आज उन्हें कोई याद नहीं करता है उनकी लिखी किताबों के बारे में तो कोई जानता भी नहीं है और जिस साहित्यकार को अपनी लेखनी के द्वारा अमरत्व दिलाने का दावा उन्होंने किया था, वे जरूर एकेडमिक तबके में कभी-कभार याद कर लिए जाते हैं। अमरत्व उनके नाम को भी नहीं मिला।
कुछ साहित्यकारों को यह भ्रम होता है कि उनकी रचना यदि सिलेबस में शामिल हो जाएगी तो वह अमर हो जाएंगे, आने वाली पीढ़ी उन्हें याद रखेगी। जबकि हर पीढ़ी की व्यवस्था अलग होती है। हर पीढ़ी में अपने एक मौलिक विचार विकसित होते हैं। सिलेबस में दर्ज हर बात हमेशा याद नहीं रहती है। परीक्षा उत्तीर्ण करने और उपाधि प्राप्त करने के साथ ही सिलेबस की पुस्तकों के अनेक पन्ने स्मृति से गायब हो जाते हैं। ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि उन पन्नों में दर्ज़ ज्ञान और विचार व्यवहारिक जीवन के लिए अनुपयोगी हो जाते हैं और अनुपयोगी तत्वों से कोई भी अपना वास्ता नहीं रखना चाहता है, मस्तिष्क भी नहीं।
शाश्वत सत्य यही है कि जो आज है वह कल नहीं होगा और जो कल होगा वह परसों नहीं रह जाएगा। समय,परिस्थितियां और विचार परिवर्तनशील होते हैं। कुछ बुनियादी वैचारिक तत्व ही स्थाई रहते हैं जो यह बार-बार याद दिलाते हैं कि जीवन स्थाई नहीं है, सामान्य विचार अथवा कुविचार स्थाई नहीं हैं। यदि कुछ स्थाई है तो वह अच्छे विचार और नश्वरता का स्मरण।
स्वयं को सर्वोच्च और सर्वशक्तिमान मानने वालों को देखते हुए कबीर दास जी का यह दोहा याद आ जाता है-
माटी कहै कुम्हार सों, तू क्या रौंदे मोए।
एक दिन ऐसा होएगा, मैं रौंदूगी तोए।। -----------------------
(दैनिक, सागर दिनकर में 24.09.2026 को प्रकाशित)
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शाश्वत केवल एक वही है, शेष सभी कुछ नश्वर है, सुंदर बोध देता आलेख शरद जी !!
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