Thursday, July 7, 2022

बतकाव बिन्ना की | इतई देख लेओ गढ़ा, तला, झिरना | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | साप्ताहिक प्रवीण प्रभात

"इतई देख लेओ गढ़ा, तला, झिरना"... ये है मेरा बुंदेली कॉलम-लेख "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक "प्रवीण प्रभात" (छतरपुर) में।
हार्दिक धन्यवाद #प्रवीणप्रभात 🙏
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बतकाव बिन्ना की
इतई देख लेओ गढ़ा, तला, झिरना            
- डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
           जे परों की बात आए। भौजी भिनभिनात भईं मोरे घरें आईं। मोरी गदेली पे एक कुची धरत भईं बोलीं-‘‘जो तुमाए भैयाजी आएं सो जे उने दे दइयो।’’
‘‘का हो गओ भौजी? जे कहां की कुची आए? औ तुम कहां जा रईं?’’ मैंने भौजी से पूछी।
‘‘जे घरे की कुची आए। दे दइयो अपने भैयाजी खों!’’ कैत भईं भौजी जाबे के लाने पलटीं। पर मोसे नई रहो गओ। मोए लगो के कोनऊ तो बात जरूर आए।
‘‘सो, तुम कहां जा रईं भौजी? औ भैयाजी कहां गए?’’ मैंने फेर के पूछी।
‘‘तुमाए भैयाजी गए चूला में! औ हमें नईं रैने तुमाए भैयाजी के संगे।’’ कैत भईं, गुस्से में फनफनात भौजी चली गईं।
‘‘अरे सुनो तो भौजी!’’ मैंने पांछूं से आवाज दई। पर भौजी कहां सुनबे वारी हतीं। बे तो ऐसे कढ़ निकरीं जैसे पुंगरियां से सांप निकर गओ होए।
कछु देर बाद भैयाजी टहलत भए आए और पूछन लगे,‘‘काए बिन्ना, तुमे कछु पतो के तुमाई भौजी कहां निकर गईं? घरे तालों डार गईं।’’
भैयाजी बड़े निष्फिकर दिखा रए हते।
‘‘जे रई आपके घरे की कुची। भौजी मोए दे गई रईं। मनो, जे तो बताओ भैयाजी के हो का गओ? भौजी को मूड कछु ठीक नईं दिखा रओ हतो। बे कै रईं हतीं के अब हमें तुमाए भैयाजी के संगे नई रैने। सो, ऐसो हो का गओ?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘का? का कही? तुमाई भौजी का कै रई हतीं के उने हमाए संगे नई रैने?’’ निष्फिकर भैयाजी खों मनो बेरी को कांटा टुच्च गओ। 
‘‘हऔ! जेई कै रई हतीं। औ बड़े गुस्सा में दिखा रई हतीं।’’ मैंने बताई।
‘‘बे घरे छोड़ के चली गईं? नासमिटे हमाई अकल की!’’ कैत भए भैयाजी सोई बढ़ा गए।
‘‘अरे सुनो तो भैयाजी!’’ मैंने पुकारी, पर भैयाजी कहां सुनबे वारे, बस उनने इत्ती बोली के ‘‘लौट के बताबी’’ औ चले गए।
मोए भैयाजी औ भौजी दोई के चरित्तर समझ में ने आए बाकि इत्तो जरूर समझ में आ गओ रओ के दोई के बीच कछु बात पे ठनाठनी हो गई आए।
अभई मैं अपने घरे के बरामदा में बैठी परों की जे बातें सोच रई हती के इत्ते में भैयाजी दिखाने।
‘‘राम-राम भैयाजी!’’ मैंने भैयाजी को स्वागत करो।
‘‘राधे-राधे बिन्ना!’’ भैयाजी ने जवाब दओ औ पंखा के नेचे बैठ के कहन लगे,‘‘जे तुमने इते बरामदा में सोई पंखा लगवा लओ, अच्छो करो। ने तो गर्मी में तो मनो प्रान निकरे जा रए। इत्तो पानी गिर गओ, मनो गर्मी कम ने हो रई। ऊपर से जे उमस ससुरी औ जान ले रई।’’
मोरे ‘‘राम-राम’’ के जवाब में भैयाजी के ‘‘राधे-राधे’’ कहबे की सोई एक किसां आए। पैलऊं भैयाजी सोई ‘‘राम-राम’’ कैत्ते। फेर भौजी राधे-राधे मंडली के संगे हो लीं सो उनने भैयाजी खों हिदायत दई के अब आप के लाने ‘‘राम-राम’’ नईं ‘‘राधे-राधे’’ कैने आए। भैयाजी भौजी की कही ने माने ऐसो कभऊं नईं हो सकत। जब मैंने उनकी चुटकी लई के आपने भौजी के डर से पार्टी बदल लई? सो बे बोले,‘‘जो राम, बोई राधा, बोई कृष्ण! कोनऊ नांव से पुकारो जाए, का फरक परत आए?’’
‘‘हऔ, भौजी जैसी मनवाबे वारी होंय सो सबई आप घांई मानबे लगें।’’ मोय उनकी दार्शनिक बातें सुन के हंसी आ गई रई।
‘‘जे इते पंखा के नीचे बैठ के तनक जान में जान आई।’’ भैयाजी तनक रिलैक्स महसूस करत भए बोले।
‘‘बो तो सब ठीक आए भैयाजी, आप तो जे बताओ के हो का गओ रओ? औ भौजी कहां चली गई रहीं? औ अब वापस आ गईं के नईं?’’ मैंने सांस लों नई भरी औ सबरे सवाल पूछ डारे।
‘‘गम्म खाओ बिन्ना! हमें पतो आए के तुमाए पेट में दरद हो रओ हुइए। बाकी दम तो धरो, हम बता रए।’’ भैयाजी मुस्कात भए बोले।
‘‘सो, अब बताई दो!’’ मोए रहाई ने पर रई हती।
‘‘ऐसो भओ बिन्ना, के परों तुमे सुरता हुइए के सुभै से पानी गिर रओ हतो, और रात भर सोई बरसात होत रई। सो, सुभै तुमाई भौजी हमें चाय देत भई बोलीं के इत्ती नोनी बरसात हो रई, पर तुम हमें घुमाबे के लाने कहूं नईं ले जा रए। हमने कही के जे कोन अभी इत्तो पानी गिर गओ के घूमबे के जोग हो गओ होय। तनक अच्छी बरसात हो जान दो, फेर ले चलबी।’’
‘‘हऔ, ठैर-ठैर के पानी बरस रओ।’’ मैंने हामी भरी।
‘‘जे ई तो! पर तुमाई भौजी ठैंरी गुड़ा-गुड़तान। उन्ने जो एक बेरा ठान लई, सो ठान लई। बे कहन लगीं के तुम जे ऐसईं टरकात रैत हो। परकी साल बी तुमने ऐसईं करो रओ। हमें कहूं नईं ले गए रए। तुमाई भौजी की जे बात सुन के सो हमने अपनी अकल कछु ज्यादाई चला दई। हमें उने सुरता कराई के परकी साल हमें तुमें पन्ना औ छतरपुर ले गए रए। मनो कोरोना खों डर बनो रओ फेर बी तुमें संगे लिवा ले गए रए।’’ भैयाजी बतात जा रए हते।
‘‘हऔ, परकी साल आप ओंरे पन्ना-छतरपुर सो गए रए। मनो भौजी उते से लौट के बी खुस नईं दिखात रईं हतीं।’’ मोए सोई परकी साल की सुरता हो आई।
‘‘जे ई तो, उने खुस करबो कुत्ता की पूंछ सीधी करबे जोग आए। बाकी, हम बता रए हते कि फेर बे कहन लगीं के जब अपन ओरें छतरपुर से पन्ना जा रए हते सो हमने कही रई के तनक हमें पांडव फाल घुमा देओ। पर तुमने कही के नईं लौटती बेरा देखबी। औ जब लौटत की बेरा रई, सो तुमने कहीं के अब देर हो जेहे सो सागर चलो। उते राहतगढ़ वाटर फाल दिखा देबी। औ राधे सों, तुमने हमें नरदा औ भरका लों नईं दिखाओ। तुम सबसे बड़े वारे झूठे कहाने। हमें नहीं रैने तुमाए संगे। सो, हमने सोई मों चला दओ के तुम सो जब हमाओ संग छोड़ हो, हम तुमे छोड़ के अबई जा रए।’’ भैयाजी ने तो मनो सुतली-बम सो फोड़ दओ।
‘‘का कही? आपने भौजी से कै दई के आप खों उनके संगे नई रैने?’’ मोए लगो के मोए गश आ जेहे।
‘‘हओ बिन्ना! हमाई मति मारी गई रई के हमने तुमाई भौजी से कछु ज्यादाई बोल दओ।’’ भैयाजी अफसोस कर भए बोले।
‘‘कछु ज्यादा? जे तो भौतई ज्यादा कै दई रई आपने।’’ मोए भारी अचरज भओ।
‘‘जेई से तो तुमाई भौजी हमसे गुस्सा हो के अपने भैया के घरे दमोए चली गई रईं। उनके भैया समझदार आएं। उन्ने हमाई साईड लई औ तुमाई भौजी खों प्रेम से समझाओ के फेर के दुबारा जे ऐसी गलती ने करहें, सो तुमाई भौजी मान गईं। औ हमाए संगे लौट आईं।’’ भैयाजी ने बताई।
‘‘चलो जे ठीक भओ।’’ मैंने कही।
‘‘हऔ, हम जल्दी में अपनी फटफटिया पे ई भगत गए रए, सो लौटत में उने वोई फटफटिया में घुमात-फिरात ले आए, सो अब बे बड़ी खुस आएं। काए से के का गांव-का शहर, सबई जांगा पानी भरो दिखा रओ हतो। तला, मोहल्ला में कछु फरकई नई रओ हतो। हमने तुमाई भौजी से कही। वाटर फाल में का रखो, जे देखो असली बरसात को मजो। बे बड़ी खुस भईं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘याने आप कैने चाह रए के जो कोनऊ अपनी घरवारी खों वाटर फाॅल घुमाबे के लाने ने जा पा रओ होए, सो ऐसे लोगन खों चाइए के जभईं एकाद इंची पानी गिरे तभईं शहर में संगे ले के निकर परे और जोन मोहल्ला में पानी भर गओ होए उते जरूर ले जाए। ईसे एकई संगे भरका, तला, झिरना, फाल सबई कछु दिखा जाहें।’’ मैंने खुल के पूछी।
‘‘हऔ! ठीक समझीं।’’ कहत भए भैयाजी उठ खड़े भए,‘‘अब मोए चलन देओ। ने तो कोनऊ और सल्ल ने बींध जाएं।’’             
बाकी मोए सोई बतकाव करनी हती सो कर लई। अब चाए सड़कें गढ़ा बने, चाए मोहल्ला तला बने। मोए का करने? जो कोनऊ जिम्मेदार खों फिकर होती तो हर की साल जे दशा काए रैती? बाकी, बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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(07.07.2022)
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