Wednesday, July 27, 2022

संस्मरण | बाबू जी मायाराम सुरजन, पं. ज्वालाप्रसाद ज्योतिषी और प्रो. कमला प्रसाद : जिनसे मिलना मेरे जीवन के लिए महत्वपूर्ण रहा | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | युवाप्रवर्तक

मेरा संस्मरण प्रकाशित करने के लिए हार्दिक धन्यवाद युवा प्रवर्तक ....
https://yuvapravartak.com/66672/

यूट्यूब युवा प्रवर्तक के साइट पर जाकर पढ़ने में अधिक आनंद आएगा किंतु यहां भी मैं अपने इस संस्मरण लेख टेक्स्ट दे रही हूं....
संस्मरण
बाबू जी मायाराम सुरजन, पं. ज्वालाप्रसाद ज्योतिषी और प्रो. कमला प्रसाद : जिनसे मिलना मेरे जीवन के लिए महत्वपूर्ण रहा

 - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

सन् 1988 में पूर्णतया सागर में निवासरत होने से पूर्व सन् 1983 मैं व्यक्तिगत काम से पन्ना से सागर विश्वविद्यालय आई थी। वहां अर्थशास्त्र विभाग के सामने अचानक डाॅ. कमला प्रसाद जी से मुलाक़ात हो गई। इससे पहले मैं उनसे पन्ना में प्रगतिशील लेखक संघ के सम्मेलन में मिल चुकी थी। उन दिनों जैसे कि हर युवा कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़ा होता था, मैं भी थी। सोवियत कम्युनिज़्म और भारतीय कम्युनिज़्म पर मेरी उनसे लम्बी-चौड़ी वार्ता भी हुई थी। ज़ाहिर है कि वे भी मुझे भूले नहीं थे। मुझे देखते ही वे बोल उठे,‘‘अरे, शरद सिंह तुम यहां कहां? तुमसे तो मैं पन्ना में मिला था।’’

मैंने उनका अभिवादन किया और अपने आने का कारण बताया। 
‘‘कोई मदद करूं?’’ उन्होंने पूछा। 

मैंने कहा ‘‘नहीं’’। 

तो बोले, ‘‘अगर समय हो तो चलो फिर मैं तुम्हें एक विशेष व्यक्ति से मिलवाता हूं। मैं उन्हीं के पास जा रहा हूं।’’ डाॅ. कमला प्रसाद जी बोले।

‘‘ठीक है।’’ मैंने कहा ।

...और मैं और मेरी दीदी वर्षा सिंह उनके साथ कार में सवार हो कर चल पड़े। मुझे अच्छी तरह याद है कि वह सफ़ेद रंग की एम्बेस्डर कार थी। किसकी थी, यह पता नहीं। कम से कम कमला प्रसाद जी की नहीं थी। यूनीवर्सिटी की पहाड़ी से उतर कर बसस्टेंड, परकोटा होते हुए, शहर की किसी गली से गुज़रते हुए एक घर के सामने रुके। उस समय मुझे सागर के मोहल्लों का नाम भी ठीक से पता नहीं था और न ही नगरीय क्षेत्र के अंदरुनी हिस्सों की जानकारी थी।

हम कार से उतरे। सीढ़ियां चढ़ कर उनके पास पहुंचे जिनसे मिलने गए थे। एक बुजुर्ग व्यक्ति सामने थे। कमला प्रसाद जी ने उनका परिचय कराते हुए कहा,‘‘ये ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी जी हैं। जानती हो इनके बारे में?’’

‘‘हो, मां सागर के संदर्भ में हमेशा इनका जिक्र करती हैं।’’ मैं कहा और मैंने तथा दीदी ने आगे बढ़ उनके पैर छुए।

‘‘नहीं, नहीं! बेटियां पिता के पैर नहीं छूतीं। सदा सफलता प्राप्त करो।’’ ये उद्गार थे ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी जी के। 

‘‘मैं आपको दादा कह कर संबोधित कर सकती हूं?’’ मैंने पूछ लिया।

‘‘अवश्य!’’ उन्होंने मुस्कुरा कर कहा।

फिर कमला प्रसाद जी और ज्वाला प्रसाद जी बातों में मशगूल हो गए। ज्वाला प्रसाद जी बीच-बीच में हम दोनों बहनों से भी कुछ न कुछ बात कर लिया करते। इसी दौरान पोहा और चाय का नाश्ता आया। ज्वाला प्रसाद जी ने पानी भरे गिलास में रखी अपनी बत्तीसी (डेंचर) निकाल कर मुंह में लगाया। इससे पहले मैंने कभी किसी को डेंचर लगाते अपनी आंखों से नहीं देखा था। अज़ीब-सी अनुभूति हुई। शयद मेरी मनोदशा ज्योतिषी दादा भांप गए। वे हंस कर बोले,‘‘मेरे ये दांत नकली हैं, इसलिए मैं इन्हें लगा कर भी अहिंसक ही हूं।’’
उनके इस कथन से उनके विनोदी स्वभाव का भी मुझे परिचय मिला। मुझे सहज होने में भी सहायता मिली। हम सभी ने पोहा खाया और चाय पी। कुछ देर और चर्चा के बाद हम लोग वहां से विदा हुए। विदा लेते समय ज्योतिषी दादा ने हम दोनों बहनों के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था,‘‘जब भी सागर आओ, जरूर मिलना और अपनी माता जी डाॅ विद्यावती ‘मालविका’ को भी मेरा नमस्कार कहना।’’

चर्चा के दौरान ही पता चला था कि ज्योतिषी दादा मेरी मां को ही नहीं अपितु मेरे नाना संत श्यामचरण सिंह को भी जानते थे। मेरे नाना जी भी गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। ज्योतिषी दादा से पहली बार मिल कर ऐसा नहीं लगा था कि उनसे हम लोग पहली बार मिल रहे हैं। मुझे यही लगा था कि मेरे स्वर्गीय नाना जी एक बार फिर सजीव मेरे सामने बैठे हुए हैं। यदि उन दिनों दूरभाष या मोबाईल हमारी पहुंच में होता तो मैं अकसर उनसे बात करती रहती। लेकिन वे चिट्ठी-पत्री के दिन थे। मैंने एक-दो बार उन्हें पत्र लिखा जिसका तत्परता से उन्होंने जवाब भी दिया किन्तु फिर जीवन के उतार-चढ़ाव में पत्राचार छूट गया। 

उस दिन ज्योतिषी दादा से मिलने के बाद कमला प्रसाद जी ने हमें सरकारी बसस्टेंड पहुंचा दिया था जहां से हमें पन्ना के लिए बस पकड़नी थी। उन दिनों बसस्टेंड अपनी पुरानी जगह पर था और सागर झील भी बहुत बड़ी थी।

मैं अपनी पढ़ाई-लिखाई में रम गई। उन्हीं दिनों मुझे पत्रकारिता का भूत भी सवार हो गया और पढ़ाई के साथ जबलपुर से प्रकाशित होने वाले दैनिक ‘‘नवीन दुनिया’’ और ‘‘ज्ञानयुग प्रभात’’ के लिए स्वतंत्र पत्रकार के रूप में रिपोर्टिंग करने लगी। दमोह से प्रकाशित होने वाले ‘‘साप्ताहिक दमोह संदेश’’ के लिए कार्डधारी रिपोर्टर का भी काम किया। ‘जनसत्ता’ और ‘रविवार’ के लिए भी रिपोर्टिंग की। तब मुझे नहीं पता पता था कि एक दिन मैं किताबें लिखूंगी और दिल्ली से पहली पुस्तक प्रकाशन की भूमिका के साक्षी बनेंगे ज्योतिषी दादा। हां, उस समय तक यह अवश्य तय होने लगा था कि मां की संवानिवृत्ति के बाद हम लोग सागर में बस जाएंगे। स्कूल शिक्षा विभाग का संभागीय कार्यालय सागर में होने के कारण तथा परीक्षा काॅपी जांचने के लिए मां को पन्ना से सागर आना-जाना पड़ता था। यहां सुश्री लक्ष्मी ताम्रकार जो महारानी लक्ष्मीबाई शा.उ.मा. विद्यालय में पीटीआई थीं, उनकी अच्छी सहेली बन गई थीं। मां को सागर बहुत पसंद आ गया था, उस पर ताम्रकार आंटी ने भी उन्हें प्रोत्साहित किया और हम सन् 1988 में सागर में आ बसे। सागर आने के बाद कभी मां के साथ तो कभी दीदी के साथ मैं ज्योतिषी दादा से मिलने गई। 

सन् 1990 में, माह तो मुझे याद नहीं है लेकिन बारिश के दिन थे। रायपुर से मायाराम सुरजन जी का पत्र मिला कि वे सागर आने वाले हैं और विश्वविद्यालय के गेस्टहाउस में ठहरेंगे। दरअसल, सन् 1988 में स्थानीय मुकेश प्रिंटिंग प्रेस से मैंने अपनी पहली पुस्तक छपवाई थी। इसे छपवाने की प्रेरणा दी थी त्रिलोचन शास्त्री जी ने। यह नवगीत संग्रह था। नाम था-‘‘आंसू बूंद चुए’’। काव्य जगत ने तो मेरे पहले नवगीत संग्रह का स्वागत किया लेकिन पुस्तक की बिक्री को ले कर मेरा अनुभव आंसू बहाने वाला ही रहा। इसी दौरान मैं साक्षरता मिशन से जुड़ी और मेरी कहानियां मिशन की पत्रिका में प्रकाशित हुई। मेरे मन में विचार आया कि काश! मेरी वे कहानियां पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो जातीं। डाॅ राजमती दिवाकर जी ने मुझे सलाह दी कि शिवकुमार श्रीवास्तव जी का कई प्रकाशकों से परिचय है अतः मैं उनसे बात कर के देखूं। मैंने शिवकुमार श्रीवास्तव जी से चर्चा की। उन्होंने मुझसे पांडुलिपि मांगी। मैंने उन्हें दे दी। लगभग डेढ़ साल व्यतीत हो गए लेकिन शिवकुमार भाई साहब ने पांडुलिपियों के बारे में कोई चर्चा ही नहीं की। मुझे स्पष्टवादिता हमेशा अच्छी लगती है। यदि आप से कोई काम नहीं हो सकता है तो आप स्पष्ट मना कर दें। किंतु राजनीति में दखल रखने वाले शिवकुमार भाई साहब के लिए शायद कठिन रहा होगा कि वे स्पष्ट मना कर दें। 

उन्हीं दिनों ‘‘देशबंधु’’ समाचारपत्र ने प्रकाशन संस्थान आरम्भ किया था जिसके तहत वे पुस्तकें प्रकाशित करने वाले थे। मैंने मायाराम सुरजन जी को पत्र लिखा कि मैं अपनी साक्षरता विषयक कहानियों का संग्रह प्रकाशित करना चाहती हूं। उसी तारतम्य में उन्होंने मुझे पत्र लिख कर अपने सागर आने के कार्यक्रम के बारे में सूचित किया था।
उन दिनों हम लोग नरसिंहपुर रोड स्थित मध्यप्रदेश विद्युत मंडल की आवासीय काॅलोनी में रहते थे। वहां से मकरोनिया चौराहा काफी दूर था और उस ओर ऑटो भी नहीं मिल पाती थी। हमारे पास दूरभाष का कोई साधन नहीं था। अतः गेस्टहाउस पहुंचने से पूर्व हम लोग (मैं और वर्षा दीदी) सुरजन दादा से बात भी नहीं कर सके। उन्होंने सुबह दस बजे तक गेस्टहाउस में मिलने का समय चिट्ठी में लिखा था। साधन के अभाव में हमें वहां पहुंचने में तनिक देर हो गई। वहां पहुंच कर पता चला कि बाबू जी (मायाराम सुरजन जी) अभी-अभी ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी जी से मिलने उनके घर के लिए निकल गए हैं। पल भर को हताशा तो हुई किंतु फिर हमने तत्काल गेस्टहाउस से निकल कर ऑटो की और ज्योतिषी दादा के घर जा पहुंचे। बाबू जी भी वहां मिल गए। 

‘‘अरे, तुम लोगों की प्रतीक्षा करते-करते मैं निकल आया।’’ बाबू जी ने कहा। फिर उन्होंने बताया कि साक्षरता विषय किताबें प्रकाशित करना अभी देशबंधु प्रकाशन की योजना में शामिल नहीं है लेकिन वे दिल्ली के किसी प्रकाशक से इस बारे में बात कर सकते हैं। अंधा क्या चाहे, दो आंखे। मैं खुश हो गई उनकी बात सुन कर। लेकिन उन्होंने जब पांडुलिपि मांगी तो मैंने उन्हें सारा किस्सा सुना दिया कि लगभग डेढ़-दो साल से मेरी पांडुलिपियां शिवकुमार भाई साहब के पास रखी हैं।

‘‘शिवकुमार से वापस ले लो। वह नहीं छपाएगा।’’ ज्योतिषी दादा ने मेरी बात सुनते ही कहा। बाबू जी ने भी उनकी बात का समर्थन करते हुए मुझे सलाह दी कि मैं शिवकुमार भाई साहब से अपनी पांडुलिपियां वापस ले कर डाक द्वारा उनके पास रायपुर भेज दूं। 

‘‘मुझसे पूछा होता तो मैं पहले ही कहता कि शिवकुमार को पांडुलिपियां मत दो।’’ ज्योतिषी दादा ने पुनः मुझसे कहा। मुझे उस समय यह पछतावा हुआ कि मैंने ज्योतिषी दादा से इस बारे में पहले ही सलाह क्यों नहीं ली। 

दूसरे ही दिन मैंने शिवकुमार श्रीवास्तव भाई साहब से अपनी पांडुलिपियां वापस मांग ली। उन्होंने ने भी इस भाव से वापस कीं मानों उन्हें मेरे द्वारा वापस मांगे जाने की ही प्रतीक्षा थी। लेकिन जैसे कहा जाता है न कि हर अवरोध के बाद एक नया रास्ता खुलता है। इस बार अवरोधक नहीं, मार्गदर्शक मुझे मिले थे। ज्योतिषी दादा ने मेरी कहानियों को पढ़ा था। उन्हें वे पसंद आई थीं। अतः उन्होंने भी मायाराम सुरजन बाबू जी के निर्णय का समर्थन किया था। वे उन लोगों में से नहीं थे कि मुंह के सामने तारफ़ करें और पीठ पीछे कटाई करें। वे सभी का भला चाहने और सभी का भला करने वाले व्यक्ति थे। यह मैं अपने अनुभव के आधार पर दावे से कह सकती हूं। आज ऐसे लोगों की अनुपस्थिति बहुत खटकती है। सामाजिक वातावरण में गिरावट की एक वजह यह भी है कि आज  ज्योतिषी दादा जैसे सरल स्वभाव, युवाओं के पथप्रदर्शक एवं परोपकारी व्यक्तियों की कमी हो चली है। 

बहरहाल, मैंने अपनी पांडुलिपियां सुरजन दादा के पास भेज दीं। कुछ समय बाद सीधे दिल्ली से सामयिक प्रकाशन के मालिक जगदीश भारद्वाज जी का पत्र मेरे पास आया जिसमें उन्होंने मेरी साक्षरता विषयक कहानियों की किताबें छापना स्वीकृति दी थी। दरअसल मायाराम सुरजन बाबू जी ने मेरी पांडुलिपियां जगदीश भारद्वाज जी के पास दिल्ली भेज दी थीं। सन् 1993 में एक साथ दो किताबें प्रकाशित हुईं- ‘‘बधाई की चिट्ठी’’ और ‘‘बेटी-बेटा एक समान’’। उस समय मैंने दो ही लोगों को सबसे पहले अपनी किताबें दिखाई थीं। सबसे पहले ज्योतिषी दादा को और उसके बाद कपिल बैसाखिया जी को जिन्होंने मित्रवत सदा मेरा भला चाहा।

अच्छे लोगों के हाथों अच्छे भविष्य की नींव रखी जाती है, यह कहावत मेरे जीवन में चरितार्थ होती मैंने स्वयं अनुभव की है। उस समय मुझे पता नहीं था कि एक दिन सामयिक प्रकाशन मेरी ‘‘सिग्नेचर उपन्यासों’’ का प्रकाशक बनेगा। या वाणी प्रकाशन, साहित्य अकादमी, नेशनलबुक ट्रस्ट आदि से मेरी पुस्तकें प्रकाशित होंगी।

 मायाराम सुरजन बाबू जी ने जो मार्ग प्रशस्त किया मानो उसका शिलान्यास स्वयं ज्योतिषी दादा ने किया था। बड़ों का आशीर्वाद कभी व्यर्थ नहीं जाता है। मैं वे दोनों किताबें ले कर ज्योतिषी दादा के पास गई। उन दिनों वे अस्वस्थ चल रहे थे। किन्तु मेरी किताबें देख कर वे बहुत खुश हुए। उस समय उन्होंने मुझे जो आशीर्वाद दिया वह मेरे लिए पथ प्रदर्शक की तरह है। उन्होंने कहा था-‘‘अब इस यात्रा को जारी रखना और पीछे मुड़ कर कभी मत देखना।’’

दादा ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी जी, मायाराम सुरजन बाबू जी और कमला प्रसाद जी भले ही हमारे बीच नहीं हैं किन्तु उन तीनों का आर्शीवाद सदा अपने साथ महसूस करती हूं जिससे मुझे हमेशा आत्मिक संबल मिलता है। 
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सागर, मध्यप्रदेश

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