Saturday, February 20, 2021

मेरी पुस्तक ‘‘औरत तीन तस्वीरें’’ में मेरे ब्लाॅगर साथी | डाॅ शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh

प्रिय ब्लाॅगर साथियों,

सन् 2014 में मेरी पुस्तक ‘‘औरत तीन तस्वीरें’’ सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुई थी। स्त्रीविमर्श की मेरी इस पुस्तक में एक अध्याय है वेश्यावृत्ति के प्रश्न पर। इन प्रश्नों को मैंने तीन कड़ियों में अपने ब्लाॅग ‘‘शरदाक्षरा’’ में उठाया था। जिसमें उस समय मेरे ब्लाॅग साथियों ने अपने विचार रखते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं। उनमें से अधिकांश टिप्पणियां अपनी पुस्तक के इस अध्याय में शामिल की थीं। अपनी पुस्तक के वे पन्ने यहां साझा कर रही हूं। सन् 2014 से 2021 के लम्बे अंतराल में दो-तीन ब्लाॅगर साथी बिछड़ गए, कुछ दूसरे प्लेटफार्म पर व्यस्त हो गए और कुछ फिर से मिल गए। 

   तो प्रस्तुत है पुस्तक का वह अध्याय जिसमें संगीता स्वरूप, दिलबाग विर्क, संजय भास्कर, कुंवर कुसुमेश, संजय कुमार चौरसिया, सुरेन्द्र सिंह झंझट, ज्ञानचंद मर्मज्ञ, शिखा वार्ष्णेय आदि बॅगर साथियों की टिप्पणियां साभार समाहित हैं।

Aurat Teen Tasveeren, Dr (Miss) Sharad Singh -Front Cover

Aurat Teen Tasveeren, Dr (Miss) Sharad Singh -Back Cover


यह पुस्तक अमेजाॅन पर ...

https://www.amazon.in/Sharad-Singh-Book-Set-Aurat/dp/B07Z2QX9VD


और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध है

https://www.flipkart.com/aurat-teen-tasvire/p/itmfyjzmxhcgzas6


इसी पुस्तक की समीक्षा आजतक टीवी चैलन की साहित्यिकी में की गई थी। लिंक दे रही हूं-

https://www.aajtak.in/literature/review/story/book-review-aaurat-teen-tasverein-220596-2014-09-11


 इसे फेमिना पत्रिका (हिन्दी) ने वर्ष 2015 में सन् 2014 की स्त्रीविमर्श की श्रेष्ठ पुस्तकों में चुना था। जिसके पृष्ठ इस पोस्ट के अंत में दे रही हूं।


वेश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जे पर एक सार्थक बहस


भारतीय दंडविधान 1860 से वेश्यावृत्ति उन्मूलन विधेयक 1956 तक सभी कानून सामान्यतया वेश्यालयों के कार्यव्यापार को संयत एवं नियंत्रित रखने तक ही प्रभावी रहे हैं। जिस्मफरोशी को कानूनी जामा पहनाए जाने की जोरदार वकालत करते हुए कांग्रेस सांसद प्रिया दत्त ने कहा था कि यौनकर्मी भी समाज का एक हिस्सा हैं और उनके अधिकारों की कतई अनदेखी नहीं की जा सकती। सन् 2011, जनवरी में प्रिया दत्त के इस बयान के बाद समाज के प्रत्येक तबके में सुगबुगाहट शुरु हो गई थी। इस पर मैंने अपने ब्लाॅग ‘शरदाक्षरा’ में कुछ प्रश्न अपने ब्लाॅगर साथियों के समक्ष रखे। उन प्रबुद्ध साथियों ने बहस में पर्याप्त रुचि दिखाई और बहस तीन कड़ियों तक ज़ारी रही। इस लेख में उसी बहस को अपने प्रबुद्ध ब्लाॅगर साथियों की महत्वपूर्ण टिप्पणियों सहित सहेज रही हूं जो उन्होंने सार्वजनिक रूप से मेरे ब्लाॅग पर व्यक्त की थी। ये सभी टिप्पणियां जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए या नहीं, इस पर बड़ी ही बारीकी से जांच-परख करने में सक्षम हैं।

 

प्रिया दत्त ने कहा था कि ‘जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए, ताकि यौनकर्मियों की आजीविका पर कोई असर नहीं पड़े। मैं इस बात की वकालत करती हूं।’ उन्होंने कहा कि जिस्मफरोशी को दुनिया का सबसे पुराना पेशा कहा जाता है। यौनकर्मियों की समाज में एक पहचान है। हम उनके हकों की अनदेखी नहीं कर सकते। उन्हें समाज, पुलिस और कई बार मीडिया के शोषण का भी सामना करना पड़ता है। उत्तर-मध्य मुंबई की युवा सांसद ने कमाठीपुरा का नाम लिए बगैर कहा कि देश की आर्थिक राजधानी के कुछ रेड लाइट क्षेत्रों में विकास के नाम पर बहुत सारे यौनकर्मियों को बेघर किया जा रहा है।

प्रिया दत्त की इस मांग पर कुछ प्रश्न उठते हैः-

1-क्या किसी भी सामाजिक बुराई को वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए ?

2-क्या वेश्यावृत्ति उन्मूलन के प्रयासों को तिलांजलि दे दी जानी चाहिए ?

3-जो वेश्याएं इस दलदल से निकलना चाहती हैं, उनके मुक्त होने के मनोबल का क्या होगा?

4-जहां भी जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा दिया गया वहां वेश्याओं का शोषण दूर हो गया?

5- क्या वेश्यावृत्ति के कारण फैलने वाले एड्स जैसे जानलेवा रोग वेश्यावृत्ति को संरक्षण दे कर रोके जा सकते हैं ?

6- क्या इस प्रकार का संकेतक हम अपने शहर, गांव या कस्बे में देखना चाहेंगे?

7- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार विश्व में लगभग 60 लाख बाल श्रमिक बंधक एवं बेगार प्रथा से जुड़े हुए है, लगभग 20 लाख वेश्यावृत्ति तथा पोर्नोग्राफी में हैं, 10 लाख से अधिक बालश्रमिक नशीले पदार्थों की तस्करी में हैं। सन् 2004-2005 में उत्तरप्रदेश, छत्तीसग, बिहार, कर्नाटक आदि भारत में सेंटर फाॅर एजुकेशन एण्ड कम्युनिकेशन द्वारा कराए गए अध्ययनों में यह तथ्य सामने आए कि आदिवासी क्षेत्रों तथा दलित परिवारों में से विशेष रूप से आर्थिकरूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को बंधक श्रमिक एवं बेगार श्रमिक के लिए चुना जाता है। नगरीय क्षेत्रों में भी आर्थिक रूप से विपन्न घरों के बच्चे बालश्रमिक बनने को विवश रहते हैं।

वेश्यावृत्ति में झोंक दिए जाने वाले इन बच्चों पर इस तरह के कानून का क्या प्रभाव पड़ेगा? 


कुछ और प्रश्न वेश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जे पर (दूसरी कड़ी)  


अपनी पिछली पोस्ट में मैंने सांसद प्रिया दत्त की इस मांग पर कि जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए, ‘वेश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जे पर कुछ प्रश्न प्रबुद्ध ब्लाॅगर-समाज के सामने रखे थे। विभिन्न विचारों के रूप में मेरे प्रश्नों के उत्तर मुझे भिन्न-भिन्न शब्दों में प्राप्त हुए। कुछ ने प्रिया दत्त की इस मांग से असहमति जताई तो कुछ ने व्यंगात्मक सहमति। 

सुरेन्द्र सिंह ‘झंझट’ ने स्पष्ट कहा कि ‘सांसद प्रिया दत्त की बात से कतई सहमत नहीं हुआ जा सकता। किसी सामाजिक बुराई को समाप्त करने की जगह उसे कानूनी मान्यता दे देना, भारतीय समाज के लिए आत्मघाती ही साबित होगा।’ साथ ही उन्होंने महत्वपूर्ण सुझाव भी दिया कि ‘इस धंधे से जुड़े लोगों के जीवनयापन के लिए कोई दूसरी सम्मानजनक व्यवस्था सरकारें करें। इन्हें इस धंधे की भयानकता से अवगत कराकर जागरूक किया जाये।’ अमरेन्द्र ‘अमर’ ने सुरेन्द्र सिंह ‘झंझट’ की बात का समर्थन किया। दिलबाग विर्क ने देह व्यापार से जुड़ी स्त्रिायों के लिए उस वातावरण को तैयार किए जाने का आह्वान किया जो ऐसी औरतों का जीवन बदल सके। उनके अनुसार, ‘दुर्भाग्यवश इज्जतदार लोगों का बिकना कोई नहीं देखता जो मजबूरी के चलते जिस्म बेचते हैं उनकी मजबूरियां दूर होनी चाहिए ताकि वे मुख्य धारा में लौट सकें।’ कुंवर कुसुमेश ने देह व्यापार से जुड़ी स्त्रिायों की विवशता पर बहुत मार्मिक शेर उद्धृत किया- 

उसने तो जिस्म को ही बेचा है, एक फाकें को टालने के लिए।

लोग  ईमान  बेच  देते  हैं,  अपना मतलब निकलने के लिए।

                 

मनोज कुमार, रचना दीक्षित, जाकिर अली ‘रजनीश’ एवं विजय माथुर ने ‘वेश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जे पर कुछ प्रश्न’ उठाए जाना को सकारात्मक माना।

राज भाटिया ने प्रिया दत्त की इस मांग के प्रति सहमति जताने वालों पर कटाक्ष करते हुए बड़ी खरी बात कही कि -‘सांसद प्रिया दत्त की बात से कतई सहमत नहीं हूं, और जो भी इसे कानूनी मान्यता देने के हक में है वो एक बार इन वेश्याओं से तो पूछे कि यह किस नर्क  में रह रही है , इन्हें जबर्दस्ती से धकेला जाता है इस दलदल में,  हां जो अपनी  मर्जी से बिकना चाहे उस के लिये लाईसेंस या कानूनी मान्यता हो, उस में किसी दलाल का काम ना हो, क्योंकि जो जान बूझ कर दल दल में जाना चाहे जाये। वैसे हमारे सांसद कोई अच्छा रास्ता क्यों नही सोचते? अगर यह सांसद इन लोगो की भलाई के लिये ही काम करना चाहते हैं तो अपने बेटों की शादी इन से कर दें, ये कम से कम इज्जत से तो रह पायेंगी।’

संजय कुमार चौरसिया ने जहां एक ओर देह व्यापार से जुड़ी स्त्रिायों की विवशता को उनके भरण-पोषण की विवशता के रूप में रेखांकित किया वहीं साथ ही उन्होंने सम्पन्न घरों की उन औरतों का भी स्मरण कराया जो सुविधाभोगी होने के लिए देह व्यापार में लिप्त हो जाती हैं। गिरीश पंकज ने प्रिया दत्त की इस मांग पर व्यंगात्मक सहमति जताते हुए टिप्पणी की कि -‘जिस्मफरोशी को मान्यता देने में कोई बुराई नहीं है। कोई अब उतारू हो ही जाये कि ये धंधा करना है तो करे। जी भर कर कर ले। लोग देह को सीढ़ी बना कर कहां से कहां पहुंच रहे है(या पहुंच रही हैं) तो फिर बेचारी वे मजबूर औरते क्या गलत कर रही है, जो केवल जिस्म को कमाई का साधन बनाना चाहती है। बैठे-ठाले जब तगड़ी कमाई हो सकती है, तो यह कुटीर उद्योग जैसा धंधा (भले ही लोग गन्दा समझे,) बुरा नहीं है, जो इस धंधे को बुरा मानते है, वे अपनी जगह बने रहे, मगर जो पैसे वाले स्त्री-देह को देख कर कुत्ते की तरह जीभ लपलपाते रहते हैं, उनका दोहन खूब होना ही चाहियेकृ बहुत हराम की कमाई है सेठों और लम्पटों के पास। जिस्मफरोशी को मान्यता मिल जायेगी तो ये दौलत भी बहार आयेगी। ये और बात है, की तब निकल पड़ेगी पुलिस वालों की, गुंडों की, नेताओं की। क्या-क्या होगा, यह अलग से कभी लिखा जायेगा। फिलहाल जिस्मफरोशी को मान्यता देने की बात है। वह दे दी जाये, चोरी-छिपे कुकर्म करने से अच्छा है, लाइसेंस ही दे दो न, सब सुखी रहे। समलैंगिकों को मान्यता देने की बात हो रही है,लिवइन रिलेशनशिप को मान्यता मिल रही है। इसलिए प्रियादत्त गलत नहीं कह रही, वह देख रही है इस समय को।’ 

संगीता स्वरुप ने एक बुनियादी चिन्ता की ओर संकेत करते हुए कहा कि  ‘कानून बनते हैं पर पालन नहीं होता गिरीश पंकज जी की बात में दम है लेकिन फिर भी क्या ऐसी स्त्रियों को उनका पूरा हक मिल पाएगा?’ 

वहीं, राजेश कुमार ‘नचिकेता’ ने बहुत ही समीक्षात्मक विचार प्रकट किए कि -‘इस काम के वैधानिक करने या ना करने दोनों पक्षों के पक्ष और उलटे में तर्क हैं, वैधानिक होने में बुरी नहीं है अगर सही तरह से कानून बनाया जाए। अगर शराब बिक सकती है ये कह के कि समझदार लोग नहीं पीयेंगे। तो फिर इसमें क्या प्राॅब्लम है,जिनको वहां जाना है वो जायेंगे ही लीगल हो या न हो। लीगल होने से पुलिस की आमदनी बंद हो जायेगी थोड़ी। अगर ना हो और उन्मूलन हो जाए तो सब से अच्छा,वैधानिक न होने की जरूरत पड़ेे तो अच्छा,लेकिन देह व्यापार से जुड़ेे स्त्री-पुरुष के लिए कदम उठाना जरूरी है।’


इस सार्थक चर्चा के बाद भी मुझे लग रहा है कि कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न अभी भी विचारणीय हैं जिन्हें मैं यहां विनम्रतापूर्वक आप सबके समक्ष रख रही हूं - 

1- यदि जिस्मफरोशी को वैधानिक रूप से चलने दिया जाएगा तो वेश्यावृत्ति को बढ़ावा मिलेगा, उस स्थिति में वेश्यागामी पुरुषों की पत्नियों और बच्चों का जीवन क्या सामान्य रह सकेगा?  

2- यदि जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा दे दिया जाए तो जिस्मफरोशी करने वाली औरतों, उनके बच्चों और उनके परिवार की (विशेषरूप से) महिला सदस्यों की सामाजिक प्रतिष्ठा का क्या होगा?

3- क्या स्त्री की देह को सेठों की तिजोरियों से धन निकालने का साधन बनने देना न्यायसंगत और मानवीय होगा? क्या कोई पुरुष अपने परिवार की महिलाओं को ऐसा साधन बनाने का साहस करेगा? तब क्या पुरुष की सामाजिक एवं पारिवारिक प्रतिष्ठा कायम रह सकेगी?

4.- विवशता भरे धंधे जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा देने के मुद्दे को क्या ऐच्छिक प्रवृति वाले सम्बंधों जैसे समलैंगिकों को मान्यता अथवा लिव-इन-रिलेशनशिप को मान्यता की भांति देखा जाना उचित होगा?

5.-भावी पीढ़ी के उन्मुक्तता भरे जीवन को ऐसे कानून से स्वस्थ वातावरण मिलेगा या अस्वस्थ वातारण मिलेगा?


बहस जारी रहेगी....वेश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जे पर (तीसरी कड़ी) 


अपनी पिछली पोस्ट ‘कुछ और प्रश्न: वेश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जे पर’ में मैंने सांसद प्रिया दत्त की इस मांग पर कि जिस्मफरोशी को वैधानिक दर्जा दिया जाना चाहिए, कुछ और प्रश्न  प्रबुद्ध ब्लाॅगर-समाज के सामने रखे थे। विभिन्न विचारों के रूप में मेरे प्रश्नों के उत्तर मुझे भिन्न-भिन्न शब्दों में प्राप्त हुए। कुछ ने प्रिया दत्त की इस मांग से असहमति जताई तो कुछ ने सहमति। 

डाॅ. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा कि ‘आधुनिक समाज में ये मुद्दे सिर्फ बहस करने के लिए उठाये जा रहे हैं। इस तरह के विषय उठाने वालों का (चाहे वे प्रिया दत्त ही क्यों न हों) कोई सार्थक अर्थ नहीं होता है। इस तरह की समस्या को यदि वैधानिक बना दिया जाए तो घर-घर, गली-गली वेश्यावृत्ति होती दिखेगी।’ 

संजय कुमार चौरसिया ने लिखा कि ‘एक-एक प्रश्न अपने आप में बहुत मायने रखता है, सभी पर विचार करना बहुत जरूरी है।’

सुरेन्द्र सिंह झंझट ने अपनी विस्तृत टिप्पणी में लिखा कि ‘आज जब हम नारी-उत्थान और नारी सम्मान की बातें करते हैं, ऐसे में वैश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जा देने का मतलब इसे बढ़ावा देना है....क्या हम इसी तरह नारी सम्मान की रक्षा करेंगे....आज महिलाएं पुरुषों से किसी भी मामले में पीछे नहीं हैं - चाहे वह सेवा हो, व्यवसाय हो, राजनीति हो, साहित्य हो, खेल हो या सेना हो अगर कहीं इनकी सहभागिता कम है तो प्रयास जारी है कि इनकी सहभागिता बढ़े दहेज उत्पीडन, यौन शोषण एवं आनर किलिंग जैसी विभीषिकाओं से जूझ रही नारी को निजात दिलाने के लिए कार्यपालिका, न्यायपालिका, स्वयंसेवी संस्थाएं एवं प्रबुद्ध वर्ग प्रयासरत हैं....नारी मात्र भोग की वस्तु नहीं है बल्कि वह मां, बहन, बेटी, बहू और अर्धांगिनी जैसे पवित्रा संबंधों से सकल सृष्टि को पूर्णता प्रदान करने वाली शक्ति है फिर हम नारी के प्रति किस दृष्टिकोण के तहत वैश्यावृत्ति को वैधानिक दर्जा देने की बात सोच भी सकते हैं? जो महिलाएं इस क्षेत्र में हैं उनमें से कम से कम 90 प्रतिशत किसी न किसी मजबूरी के कारण नारकीय जीवन जीने को विवश हैं। अगर कोई सार्थक पहल करनी ही है तो कुछ सकारात्मक सोचा जाये, इस पेशे में लगी बुजुर्ग या अधेड़ महिलाओं को स्वावलंबी बनाने के क्रम में रोजमर्रा की जरूरतों वाले सामानों की छोटी-मोटी दूकाने खुलवाई जाएं, समाज के लोग सामने आकर साहस का परिचय देते हुए मेडिकल जांच के उपरांत लड़कियों का विवाह करवाएं, भयंकर बीमारियों से जूझ रही महिलाओं का उचित इलाज कराया जाए, छोटी बच्चियों को इस माहौल से दूर करके प्रारंभिक और ऊंची शिक्षा दिलवाई जाये जिससे वे संभ्रांत समाज की मुख्य धारा में शामिल हो सकें, इनकी बस्तियों से दलालों को दूर किया जाये, न मानने पर दण्डित किया जाये द्य इनके गलियों-मोहल्लों में अस्पताल, स्कूल, आदि सभी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं, कुल मिलाकर इस दलदल से इन्हें उबारा जाये न कि वैधानिक दर्जा देकर सदा के लिए दलदल में धकेल दिया जाये।’

सुशील बाकलीवाल के विचार से ‘प्रश्न आपके जटिल इसलिये है कि पक्ष व विपक्ष दोनों दिशाओं में उदाहरण सहित काफी कुछ कहा जा सकता है। किन्तु सच यह है कि उन सभी स्त्रियों के हित में जो किसी भी मजबूरी या दबाव के चलते इस धंधे में सिसक रही हैं उनकी इस दलदल से मुक्ति के ठोस उपाय किये जाने चाहिये।’

राजेश  कुमार ‘नचिकेता’ ने सुशील जी से सहमति प्रकट करते हुए लिखा कि ‘आपका भय अन्यथा नहीं है शायद इस कारण भी ये वैधानिक नहीं हुआ है। इस कुरीती को दूर करने के लिए इसका वैधानिक होना बिलकुल जरूरी नहीं है। बल्कि उन्मूलन का प्रयास होना ही बेहतर विकल्प है। किसी भी कुरीति को मान्य बनाना कोई तर्क नहीं हो सकता और ना ही इससे समस्या से निजात पायी जा सकती है, ठीक वैसे ही जैसे की घूसखोरी को वैधानिक बना के इससे नहीं निबटा जा सकता वैधानिक बनाने के विपक्ष में एक प्रश्न मैं भी जोड़ देता हूं। वैधानिक करने से क्या इसे अपना व्यवसाय बनाने वालों को छोट नहीं मिल जायेगी...और अधिक अधिक पुरुष भी आ जायेंगे इस काम मेंकृऔर मैं मानता हूं की पुरुषों में इस काम को करने के मजबूरी हो ये काफी मुश्किल जान पड़ता है।’ 

शिखा वार्ष्णेय ने लिखा कि ‘एकदम सही सवाल उठाये हैं आपने। वेश्यावृति को वैधानिक बना दिया गया तो जायज नाजायज के बीच की रेखा ही नहीं रह जायेगी।’

ज्ञानचंद मर्मज्ञ के अनुसार ‘आपके सारे सवालों के जवाब बस यही हैं कि वेश्यावृत्ति को संवैधानिक नहीं बनाना चाहिए। यह समाज पर लगा एक ऐसा धब्बा है जिसे मिटाने के लिए सदियां गुजर जाएंगी फिर भी इंसानियत शर्मसार रहेगी।’

डाॅ. श्याम गुप्ता ने कुछ और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए ‘....किसी कुप्रथा को मिटाने के प्रयत्न की बजाए उसे संवैधानिक बनाना एक मूर्खतापूर्ण सोच है...जो मूलतः विदेशी चश्मे से देखने के आदी लोगों की है....आखिर हम सती-प्रथा, बाल-विवाह, बलात्कार, छेड़छाड़ सभी को क्यों नहीं संवैधानिक बना देते....आखिर सरकार ट्रेफिक के, हेल्मेट के नियम क्यों बनाती है, जिसे मरना है मरने दे।कृजहां तक कानून के ठीक तरह से न पालन की बात है वह आचरण की समस्या है...चोरी जाने कब से असंवैधानिक है पर क्या चोरी-डकैती समाज से खत्म हुई तो क्या पुनः चोरी को संवैधानिक कर दिया जाय.....सही है गैर संवैधानिकता के डर से निष्चय ही समाज में कुछ तो नियमन रहता है.. बिना उसके तो ?’

संजय भास्कर भी मानते हैं कि ‘प्रश्न जटिल है जो सिर्फ वेश्याओं से जुड़ा नहीं है, बल्कि इसका असर समाज की दूसरी संस्थाओं पर भी पडेगा।’

सतीश सक्सेना मानते हैं कि ‘कानूनी जामा पहनना ही उचित है !’ उन्होंने अपनी विस्तृत टिप्पणी में लिखा कि ‘इससे इस वर्ग का विकास होगा! जहां तक नाक-भौं सिकोड़ने का सवाल है लोगों की मानसिकता कोई नहीं रोक पाया है! मानव विकास के शुरूआती दिनों से, आदिम काल से यह नहीं रुका है और न रुक सकता! वेश्याएं समाज में समाज में गन्दगी नहीं फैलाती बल्कि गंदगी रोकने में सहायक है, सवाल केवल यह है कि आप के लिए ( पाठकों ) समाज और परिवार की परिभाषा क्या है ! 

1. प्रश्न अपने आप में बहुत सीमित है, वहां जाने वाले कौन हैं? इसे समझना होगा!

2. हर एक का अपना निजी समाज होता है और प्रतिष्ठा के मापदंड ही अलग अलग होते हैं! जरा इसी सन्दर्भ में हिजड़ों के बारे में विचार करें।

3. यह प्रश्न ही असंगत हैं यह विशेष वर्ग, अच्छे भले परिवारों में कौन सा सामंजस्य है? 

4. बहुत आवश्यक है।

5. मेरे विचार से दोनों अलग अलग क्षेत्र है! आपके उपरोक्त प्रश्नों का उत्तर बेहद जटिल है! ब्लाक मस्तिष्क से अगर इस पर विचार करेंगे तो इस महत्वपूर्ण विषय के साथ अन्याय ही होगा !’

विजय कुमार सप्पत्ती मानते हैं कि ‘आई थिंक दैट दिस प्रोफेशन शुड बी गिवेन  लीगल स्टेटस ओनली...कम से कम इस कारण से औरतों का शोषण तो नहीं होगा!’

रचना दीक्षित के अनुसार ‘जिस्मफरोशी को संवैधानिक दर्जा देने से वेश्यावृत्ति का उन्मूलन होगा, ये तो हास्यास्पद ही होगा। हां, इसका समाज पर व्यापक असर होना स्वाभाविक है।’

मनप्रीत कौर ने रचना दीक्षित के विचारों पर सहमति प्रकट की और जिस्मफरोशी को संवैधानिक दर्जा देने की बात का विरोध किया।  

अरविन्द जांगिड ने बहुत ही रोचक ढंग से अपने विचार प्रस्तुत करते हुए लिखा कि ‘जिस्म फरोशी को ही यदि संवैधानिक दर्जा देना है तो फिर चोरी को भी दे दो, लूट खसोट, भ्रष्टाचार, आदि को भी संवैधानिक दर्जा दे दो. सीधी सी बात है की हमारे वर्तमान समाज के नैतिक पक्ष का तीव्र गति से पतन होता जा रहा है। ये बहुत ही चिंता का विषय है और ये हुआ इसलिए है क्यों की अच्छे लोग अपनी मर्यादा की दुहाई देकर चुप हो जाते हैं, बोलते ही नहीं, बुराई इसलिए जीतती है क्यों की उसका संगठन होता है, और एक नेक व्यक्ति को जब नीलाम किया जाता है तो बाकी नेक व्यक्ति भेड़ बकरियों की तरह बस देखते ही रहते हैं। नेक बात पर लड़ना बिलकुल सही है और हमें इस और प्रयत्न भी करना होगा, अन्यथा यदि समाज के नैतिक पक्ष का पतन यूं ही होता रहा तो हो सकता है की आने वाले समय में बच्चे शब्दकोष से पता लगाएंगे की ‘मामा’ कहते किसे हैं।’

मुकेश कुमार सिन्हा ने अरविन्द जांगिड के तर्क से सहमति प्रकट करते हुए अपनी राय दी कि ‘जो अपराध की श्रेणी में है, उसको वैसे ही ट्रीट करना बेहतर है।नहीं तो फिर भगवान मालिक है। फिर तो बलात्कारी भी अगर कहे, मैं विवाह करने के लिए तैयार हूं मुझे सजा मत दो । क्या ऐसे किसी घृणित कार्य को सहमति दी जा सकती है?’

डाॅ. अजीत  के अनुसार ‘समाजशास्त्रिायों, मनोवैज्ञानिकों के लिए भी यह अभी यह तय करना थोड़ा मुश्किल काम होगा कि इस आफ्टर मैथ्स क्या रहेंगे कारण भारतीय समाज की संरचना अधिक संश्लिष्ट है। मेरी राय से इसके उन्मूलन के लिए इसको कानून वैद्य करना तार्किक नही होगा इससे और बढ़ावा ही मिलेगी।’

यह तय है कि जब-जब वेश्यावृत्ति का मुद्दा उठेगा तब-तब समाज सोचने पर मजबूर होगा इसे वैध दर्ज़ा दिया जाना चाहिए या नहीं।


(उन सभी के प्रति आभार जिनके विचार यथावत् मैंने यहां प्रस्तुत किए। यह एक बहुत ही स्वरूथ एवं सार्थक बहस रही। इसमें शामिल सभी प्रबुद्ध व्यक्तियों ने खुल कर अपने विचारों को रखा और एक संवेदनशील विषय के प्रत्येक पक्ष को सामने लाने में मदद की। सभी के विचार यहां साभार प्रस्तुत किए गए हैं।)

Aurat Teen Tasveeren, Dr (Miss) Sharad Singh, Page 245

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Aurat Teen Tasveeren, Dr (Miss) Sharad Singh, Page 250

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Aurat Teen Tasveeren, Dr (Miss) Sharad Singh, Page 252
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फेमिना इंडिया (हिन्दी)
Femina, September 2015

Femina, September 2015

Femina, September 2015

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 #औरत तीन तस्वीरें #सामयिक प्रकाशन #Femina #ब्लाॅगरसाथी #डाॅ शरद सिंह


Friday, February 19, 2021

नमामि देवी नर्मदे | विशेष लेख | नर्मदा जयंती | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh

प्रिय ब्लॉग पाठकों, नर्मदा जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏

   नर्मदा जयंती पर प्रस्तुत है मेरा यह विशेष लेख, जिसे जनसंपर्क विभाग, मध्यप्रदेश शासन, सागर द्वारा अपने फेसबुक पेजों पर भी अपलोड किया गया है। 



नर्मदा जयंती पर विशेष लेख

    नमामि देवी नर्मदे !

                  - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

आज 19 फरवरी 2021 को नर्मदा जयंती है। सागर जिले सहित समूचे बुंदेलखंड, समूचे मध्यप्रदेश में नर्मदा जयंती धूम-धाम से मनाई जाती है। यूं भी नर्मदा का उद्गम स्थल अमरकंटक मध्यप्रदेश में स्थित होने के कारण यह पर्व मध्यप्रदेशवासियों के लिए विशेष महत्त्व रखता है। नर्मदातट पर बसे शहरों व स्थानों  जैसे होशंगाबाद (नर्मदापुर), महेश्वर, अमरकण्टक, ओंकारेश्वर आदि सहित नर्मदा तट से दूर बसे शहरों व स्थानों में भी नर्मदा जयंती विधि-विधान से मनाई जाती है। इस दिन प्रातःकाल मां नर्मदा का पूजन-अर्चन व अभिषेक प्रारंभ हो जाता है। सायंकाल नर्मदा तट पर दीपदान कर दीपमालिकाएं सजाई जाती हैं। ग्रामीण अंचलों में भंडारे व भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है। नर्मदा के प्रति अटूट श्रद्धा के एक नहीं अनेक कारण हैं। पूरे विश्व में मां नर्मदा ही एकमात्र ऐसी नदी हैं जिनकी परिक्रमा की जाती है। मां नर्मदा सात पवित्रतम नदियों में से एक हैं-
गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती, 
नर्मदा सिन्धु कावेरी जलेस्मित सन्निधिकुरुः।। 

शास्त्रों के अनुसार मां नर्मदा के दर्शन मात्र से पुण्यफल प्राप्त होता है -

त्रिभिः सारस्वतं पुण्यं सप्ताहेन तु यामुनम।
सद्यः पुनाति गांग्गेय दर्शनादेव नर्मदा।।

अर्थात् सरस्वती का जल तीन दिन में, यमुना का जल एक सप्ताह में, गंगाजल स्नान करते ही पवित्र करता है किन्तु मां नर्मदा के जल का दर्शन मात्र ही पवित्र करने वाला होता है। कलियुग में मां नर्मदा के दर्शन मात्र से तीन जन्म के और नर्मदा स्नान से हजार जन्मों के पापों की निवृत्ति होती है।

नमामि देवी नर्मदे

नर्मदा मात्र एक नदी नहीं अपितु संस्कृति का उद्गम है, आस्था का प्रतीक है और इसके तट पर बसने वाले मनुष्यों की जीवन रेखा है। नर्मदा मैकल पर्वत के अमरकण्टक शिखर से निकल कर मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र तथा गुजरात राज्यों को सिंचित करती हुई भरुच में पहुंच कर खम्बात की खाड़ी में सागर से जा मिलती है। नर्मदा के तट पर प्रागैतिहासिक मानवों ने आश्रय पाया था। नर्मदा के प्रति अपनत्व और श्रद्धा रखने वाले आज भी इसे अपनी मां-पिता के समान मानते हैं। नर्मदा-स्नान के लिए पहुंचने वाले श्रद्धालु जब इसके घाटों पर पहुंचते हें तो जो उनकी भावुक मनोदशा होती है उसका वर्णन इस बुंदेली ‘बम्बुलिया’ लोकगीत में बखूबी मिलता है-
नरबदा मैया ऐसे तो मिली रे
ऐसे तो मिलीं के जैसे मिले
मताई औ बाप, रे
नरबदा मैया हो....

नर्मदा की जलधाराएं आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देती हैं, ये तन-मन को तरोताज़ा कर देती हैं। कालिदास के मेघदूत ने भी अपनी थकान मिटाने के लिए नर्मदा के उद्गम क्षेत्र अमरकंटक को ही अपना पड़ाव बनाया था। नर्मदा भारत की वह इकलौती नदी है, जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है। इसका जन्म किसी ग्लैशियर से नहीं हुआ है बल्कि यह वनाच्छादित पर्वत से निकली है। इसीलिए इसकी जलधाराएं गंगा आदि अन्य नदियों की जलधाराओं की अपेक्षा शांत हैं। यही कारण है कि मन को एकाग्रता देने के इच्छुक नर्मदा के तट को ध्यान-योग के अधिक उपयुक्त मानते हैं। इसकी जलधाराओं को देख कर मिलने वाली शांति मन को अलौकिक-सी अद्भुत अनुभूति प्रदान करती है।

नर्मदा से जुड़ी आस्था और श्रद्धा इसे विशेष नदी का स्थान दिलाती है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को मनाई जाती है- नर्मदा जयंती। नर्मदा के जन्म के संबंध में अनेक रोचक कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार अंधकासुर का वध करने के बाद शिव मैकल पर्वत पर समाधिस्थ थे। तभी ब्रह्मा, विष्णु सहित सभी देवता उनसे मिलने आए। देवताओं ने शिव से पूछा कि-‘हे भगवन! हम देवता भोगों में रत रहने से, बहुत-से राक्षसों का वध करने के कारण हमने अनेक पाप किए हैं, उनका निवारण कैसे होगा आप ही कुछ उपाय बताइए, तब शिवजी की भृकुटि से एक तेजोमय पसीने की बूंद पृथ्वी पर गिरी और कुछ ही देर बाद एक कन्या के रूप में परिवर्तित हो गई। उस कन्या का नाम नर्मदा रखा गया। सभी देवताओं ने उसे आशीर्वाद दिया। वह दिन था माघ शुक्ल सप्तमी का। उस दिन नर्मदा ने नदी के रूप में धरती पर बहना आरंभ किया। इसीलिए इस तिथि को नर्मदा अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है।

नमामि देवी नर्मदे

एक अन्य कथा के अनुसार तपस्या में बैठे शिव के पसीने से नर्मदा प्रकट हुई। नर्मदा ने प्रकट होते ही अपने अलौकिक सौंदर्य से ऐसी चमत्कारी लीलाएं प्रस्तुत कीं, जिन्हें देख कर स्वयं शिव-पार्वती चकित रह गए। उन लीलाओं को देख कर उनके मन में सुख का संचार हुआ। इसलिए उन्होंने नामकरण किया ‘नर्म’ अर्थात् सुख और ‘दा’ अर्थात् देने वाली -‘नर्मदा’।

नर्मदा के अवतरण के संबंध में ‘स्कंद’ पुराण में भी एक रोचक कथा मिलती है। इस कथा में कहा गया है कि राजा हिरण्यतेजा ने चौदह हजार वर्ष तक भगवान शिव की कठिन तपस्या की। तपस्या से  शिव प्रसन्न हो गए। तब राजा ने शिव से प्रार्थना की कि वे एक ऐसी नदी पृथ्वी पर प्रवाहित करें जो भूमि को सिंचित करे, पापों का प्रक्षालन करे और सभी प्रकार के सुख प्रदान करे। तब शिव ने नर्मदा को धरती पर अवतरित किया। वे मगरमच्छ पर सवार हो कर उदयाचल पर्वत पर उतरीं और पश्चिम दिशा की ओर प्रवाहित हुईं। उसी समय विष्णु ने नर्मदा को आशीर्वाद दिया कि -
नर्मदे त्वें माहभागा सर्व पापहरि भव। 
त्वदत्सु याः शिलाः सर्वा शिव कल्पा भवन्तु ताः।
   अर्थात् तुम सभी पापों का हरण करने वाली होगी तथा तुम्हारे जल के पत्थर शिव-तुल्य पूजे जाएंगे। तब नर्मदा ने शिवजी से वर मांगा कि जैसे उत्तर में गंगा स्वर्ग से आकर प्रसिद्ध हुई है, उसी प्रकार से मैं भी दक्षिण गंगा के नाम से प्रसिद्ध होऊं। शिवजी ने नर्मदाजी को अजर-अमर होने तथा प्रलयकाल तक इस धरती पर रह कर आदर, सम्मान पाने का वरदान दिया।
नर्मदा की कथाएं जनमानस के लिए उन अनमोल विचारों की तरह हैं जो उन्हें प्रकृति का सम्मान और संरक्षण करने के लिए प्रेरित करती हैं। इसीलिए तो जनमानस स्तुति कर उठता है-
त्वदीय पाद पंकजम नमामि देवी नर्मदे
नमामि देवी नर्मदे,   नमामि देवी नर्मदे

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Wednesday, February 17, 2021

चर्चा प्लस | हर वृद्ध को पता होना चाहिए उसके कानूनी अधिकार | डाॅ शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh

चर्चा प्लस    
हर वृद्ध को पता होना चाहिए उसके कानूनी अधिकार
 - डाॅ शरद सिंह
    चाहे कितनी भी बड़ी घटना हो, हम उसे भुलाने में देर नहीं लगाते हैं। ख़बरें पहले पन्ने से आख़िरी पन्ने पर पहुंच कर दो-तीन पहुंच कर ग़ायब हो जाती है। यही आज का कड़वा सच है। पर इस सच से आगे बढ़ कर हमें सोचना ही होगा जब प्रश्न हमारे बुजुर्गों का हो। पिछले चर्चा प्लस में ‘समाज के मुंह पर ज़ोरदार तमाचा है इंदौर की घटना‘ और ‘सड़कों पर कहां से आते हैं ये वृद्ध भिखारी?’ शीर्षकों से दो लेख, जिनका संदर्भ था इंदौर नगर निगम कर्मचारियों द्वारा भिखारी बुजुर्गों को शिप्रा के समीप छोड़ने के प्रयास की शर्मनाक घटना। वृद्धों के भी होते हैं कानूनी अधिकार जिनके बारे में अधिकांश वृद्ध जानते ही नहीं हैं। इस मुद्दे पर ‘चर्चा प्लस’ में प्रस्तुत है चर्चा की तीसरी और अंतिम कड़ी।            
चर्चा प्लस | हर वृद्ध को पता होना चाहिए उसके कानूनी अधिकार | डाॅ शरद सिंह | सागर दिनकर, 17.02.2021

अर्जेन्टीना के कवि राबर्टो जुआरोज़ की एक कविता है-
‘‘वह बूढ़ा जो नुक्कड़ पर बैठा
फटा कोट पहने
मांगता है भीख,
क्या इसलिए कि वह भिखारी है?
नहीं, 
वह मांगता है-
क्योंकि हम बनना चाहते थे दाता
कितना सरल गणित है
समाज का।’’ 

जब कोई भीख मांगता है तो निःसंदेह उसके लिए समाज ही सबसे पहले उत्तरदायी होता है क्योंकि यदि परिवार किसी बुजुर्ग का त्याग करता है तो समाज उसे ऐसा न करने के लिए उस पर दबाव बना सकता है। लेकिन एकल परिवार के बढ़ते चलन के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाता है। आज बुजुर्ग हाशिए पर धकेले जा रहे हैं। जेनरेशन गैप और जीवन शैली में बदलाव के कारण बुजुर्ग व्यक्ति उपेक्षा, अलगाव और असुरक्षा के शिकार हो चले हैं। एकल परिवार के चलन में बुजृर्गों के लिए कोई जगह नहीं है। वे अपने पैतृक घरों में अकेले रह जाते हैं जहां उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं होता है। न ही उन्हें दवाइयों की याद दिलाने वाला कोई होता है, न ही उनकी दवाई लाने वाला कोई होता है। अनेक मामले ऐसे भी होते हैं जिनमें वृद्ध माता-पिता के साथ इस तरह दुर्व्यवहार किया जाता है कि या तो वे स्वयं घर छोड़ देते हैं या फिर उन्हें घर से निकाल दिया जाता है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिसमें बुजुर्गों से मार-पीट, प्रताड़ना और यहां तक कि उनकी हत्या भी की गई है। कुछ समय पहले की ही बात है। 50 साल के एक प्रौढ़ ने अपनी मां की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी, क्योंकि वह उनका चिकित्सा खर्च वहन नहीं कर पा रहा था। 
      
वृद्धों के पक्ष में सरकार ने मैंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट 2007 अर्थात् माता-पिता वरिष्ठ नागरिकों की देखरेख एवं कल्याण अधिनियम 2007 लागू किया हुआ है। यह कानून इसलिए बनाया गया ताकि वृद्ध अर्थात वरिष्ठ नागरिक आत्मसम्मान एवं आराम से जीवनयापन कर सकें। इस कानून के दायरे में वे सभी नागरिक आते हैं जो साठ वर्ष की उम्र पूर्ण कर चुके हों। यह कानून परिजन को भी परिभाषित करता है जिसके अनुसार स्वयं की संतान एवं निकट संबंधी न होने की स्थिति में वरिष्ठ नागरिकों के उत्तराधिकारी भी 'परिजन' हैं।  मैंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट 2007 बच्चों और परिजनों पर कानूनी उत्तरदायित्व तय करता है, जिससे बच्चे अपने माता-पिता और बुजुर्गों को सम्मानजनक तरीके से सामान्य जीवन बसर करने दें। इस कानून में राज्य सरकारों के लिए भी निर्देश हैं। इसमें कहा गया है कि राज्य सरकार हर जिले में वृद्धाश्रम खोले और उनका रखरखाव सुनिश्चित करें। इस कानून के अंतर्गत जो माता-पिता अपनी आय से अपना पालन-पोषण करने में सक्षम नहीं हैं, वे वृद्धजन अपने वयस्क बच्चों से 'मेंटेनेंस मनी' लेने का अधिकार रहते हैैं। इस मेंटेनेंस में उचित आहार, आश्रय, कपड़ा और चिकित्सा उपचार आता है, ताकि वे वृद्धजन सामान्य जीवन जी सकें। पालक या तो वास्तविक हो, या उन्होंने बच्चे को गोद ले रखा हो, या सौतेले माता या पिता हों। फिर भले ही वे वरिष्ठ नागरिक हों या नहीं, लेकिन उनकी देखरेख का जिम्मा बच्चों पर होता है। ऐसे बुजर्ग जिनके बच्चे नहीं हैं और जो साठ वर्ष या इससे अधिक के हैं, वे भी मेंटेनेंस का दावा कर सकते हैं। वे परिजनों से मेंटेनेंस की अपील कर सकते हैं। वे उन लोगों से कह सकते हैं, जिनको उत्तराधिकार के रूप में उनकी संपत्ति मिलने वाली हो। इसका आवेदन उक्त बुजुर्ग को खुद ही देना होता है। इसके लिए वे किसी व्यक्ति को भी अधिकृत कर सकते हैं। साथ ही वे किसी स्वैच्छिक संगठन से भी आवेदन देने को कह सकते हैं। इस कानून के तहत बनाए गए न्यायाधिकरण या ट्रिब्यूनल तभी बनते हैं, जब यह स्पष्ट हो कि बच्चों या परिजनों ने उक्त बुजुर्ग की अनदेखी की या फिर उनकी देखरेख करने से इंकार कर दिया। ये न्यायाधिकरण इन बच्चों या परिजनों को 10,000 रु. महीना गुजारे के लिए देने को कह सकता है। इस तरह की प्रक्रिया में वकीलों की भी कोई जरूरत नहीं होती है। लेकिन सबसे बड़ी खामी यही होती है कि अधिकांश वृद्धों को अपने इस अधिकार का पता ही नहीं होता है। विशेष रूप से ग्रामीण अंचल के अथवा कम पढ़े लिखे एवं अपर वृद्धों के साथ इस कानूनी अज्ञान की समस्या विकट रूप से है।

मैंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट 2007 में एक महत्वपूर्ण  क्लॉज़ यह भी है कि यदि कोई वरिष्ठ नागरिक, जो उपहार या किसी अन्य तरीके से अपनी संपत्ति का हस्तांतरण किसी को करता है। जिसके नाम संपत्ति की गई है, यदि वह उक्त बुजुर्ग व्यक्ति की देखरेख नहीं कर पाता है या करने से इंकार करता है तो यह माना जाता है कि संपत्ति हस्तांतरण धोखाधड़ी से किया गया है अथवा या किसी के प्रभाव में संपत्ति हस्तांतरण करा लिया गया है। 

हिंदू दत्तक एवं देखभाल कानून 1956 में भी स्पष्ट उल्लेख है कि जो माता-पिता या पालक खुद का खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं, साथ ही उनको किसी स्रोत से आय नहीं है, उनको इस कानून में मेंटेनेंस पाने का अधिकार है तथा बच्चों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे माता-पिता की देखरेख करें।  मुस्लिमलॉ के अनुसार पुत्र एवं पुत्री का यह दायित्व बनता है कि वे अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखरेख करें। इस कानून के अंतर्गत विवाहित बेटियों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे माता-पिता की देखरेख करें। यदि किसी मजिस्ट्रेट ने किसी वरिष्ठ नागरिक या माता-पिता की जिम्मेदारी वहन करने का आदेश दिया है और कोई संतान या दत्तक या परिजन उसका पालन नहीं करता है तो उसके ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत प्रकरण चलाया जा सकता है तथा प्रथम श्रेणी के न्यायाधीश उसे माता-पिता को एक निश्चित मासिक भत्ता तय देने को कह सकते हैं। 

वृद्धों के हित में सरकार सदैव सजग रहती है। सन् 1999 में केंद्र सरकार ने वृद्धजन के लिए राष्ट्रीय नीति घोषित की थी। इसमें उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और उनके सुचारू जीवन का ध्यान रखा गया। इस नीति में परिजनों को बुजुर्गों की देखरेख के लिए प्रोत्साहित किया गया। सरकार की ओर से वरिष्ठ नागरिकों को कई सुविधाएं दी जाती हैं। जैसे रेल टिकट में छूट, ट्रेन में नीचे की बर्थ, आयकर में छूट, बैंक एफडी पर ज्यादा ब्याज आदि। 

देश में बुजुर्गों हित के लिए इतने नियम-कानून होने के बावजूद बुजुर्ग यदि सड़कों पर भिखारियों का जीवन बिताने को विवश हैं तो इसके मूल दो कारण हैं- पहला कि उन्हें इन कानूनों एवं प्रावधानों ज्ञान नहीं है और दूसरा कारण कि वे संतान-मोह के कारण अपने बच्चों के दुर्व्यवहार के विरुद्ध भी आवाज़ नहीं उठाना चाहते हैं। बुजुर्गों के हितों की रक्षा के लिए जरूरी है कि वे सारे कानून और प्रावधान जो उनके हितों की रक्षा करते हैं, हर स्तर पर प्रचारित किए जाएं तथा स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम में भी जोड़े जाएं। इससे बच्चों को भी इनका ज्ञान रहेगा और वे अन्याय करने से डरेंगे। वही दूसरी ओर यही बच्चे जब उम्र बढ़ने पर वृद्धावस्था या सीनियर सिटिजन के दौर में पहुंचेंगे तो उन्हें अपने अधिकारों का भली-भांति पता होगा। बहरहाल वर्तमान में जो वृद्धजन सड़कों पर भीख मांगने को विवश हैं उन्हें वृ़द्धाश्रमों में पहुंचा कर एक सम्मानजनक जीवन देना सरकार के साथ ही समाज के हर नागरिक का कर्त्तव्य बनता है। यह तय है कि अपने बुजुर्गों के प्रति संवेदनाओं को जगाए रखने से न तो वृद्धजन सड़कों पर भीख मांगने को मजबूर होंगे और ‘‘इंदौर-कांड’’ जैसी शर्मनाक घटना की पुनरावृत्ति भी कभी नहीं होगी। 

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(दैनिक सागर दिनकर 17.02.2021 को प्रकाशित)
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Wednesday, February 10, 2021

चर्चा प्लस । सड़कों पर कहां से आते हैं ये वृद्ध भिखारी । डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस 
सड़कों पर कहां से आते हैं ये वृद्ध भिखारी
 - डाॅ शरद सिंह
       पिछले चर्चा प्लस में ‘समाज के मुंह पर ज़ोरदार तमाचा है इंदौर की घटना’ शीर्षक से इंदौर नगर निगम कर्मचारियों द्वारा भिखारी बुजुर्गों को शिप्रा के समीप छोड़ने के प्रयास की शर्मनाक घटना   की चर्चा की गई थी। बेशक भिखारी हमारे समाज की कमजोर कड़ी हैं सामाजिक कल्याण मंत्रालय के अनुसार सन् 2018 तक भारत में भिखारियों की संख्या कुल 413760 भिखारी थे। सड़कों पर ये वृद्ध भिखारी आते कहां से हैं? इस मुद्दे पर ‘चर्चा प्लस’ में प्रस्तुत है चर्चा की दूसरी कड़ी।    
        
जब चर्चा भिखारियों की चल रही हो तो महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘‘भिक्षुक’’ याद आ जाना स्वाभाविक है। स्कूल की किताब में पहली बार पढ़ी थी लेकिन मन पर एक ऐसे टैटू की तरह छप कर रह गई जो कभी मिटाया न जा सकता हो। कविता की पंक्तियां देखिए - 

पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को, भूख मिटाने को
मुंह फटी पुरानी झोली को फैलाता 
दो टूक कलेजे के करता पछताता, पथ पर आता।
साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाए,
बाएं से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया दृष्टि-पाने की ओर बढ़ाए
भूख से सूख होंठ जब जाते
दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?
घूंट आंसुओं के पीकर रह जाते
चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए।

भिखारी शब्द से जो छवि मन में कौंधती है वह एक दीन, हीन मनुष्य की होती है। जो चलने फिरने, काम करने में अयोग्य होने के कारण अपनी जीविका कमा पाने में असमर्थ हो और भिक्षा मांगकर अपना पेट पालता हो। अंधे, लूले लंगड़े, कमजोर, लाचार व्यक्ति को देख कर मन द्रवित हो जाता है और उसके द्वारा भिक्षा मांगने पर दयाभाव उपजता ही है। कुछ भिक्षुक दूसरे प्रकार के होते हैं जो आलसी और कामचोर होते हैं। वह हृष्ट-पुष्ट और स्वस्थ होते हुए भी ढोंग करते हैं और भीख मांग कर जीवनयापन करते हैं। हमारे देश प्रत्येक स्थान पर भिक्षुक देखे जा सकते हैं। तीर्थ स्थानों, धार्मिक स्थलों, मंदिरों में तो यह बहुत अधिक संख्या में पाये जाते हैं। सड़कों, चैराहों, पर्यटन स्थलों और बाजारों में भी भिक्षावृत्ति का साम्राज्य है। भिक्षावृत्ति में अब कई प्रकार के भिखारियों ने कदम जमा लिये हैं। कुछ भिखारी अपने अंधे लंगड़े या अपाहिज होने का कारण बताते हुए भीख मांगते हैं। कुछ वेषभूषा को अजीब बना कर, लम्बे बाल करके, राख पोत कर स्वांग करके मांगते हुये दिख जाते हैं। कुछ बसों एवं रेलगाड़ियों में गा बजा कर पैसे मांगते हैं तो कुछ साधु संतों के रूप में मांगते हैं। कई अपराधी तत्व भिखारियों का वेश धारण करके महिलाओं को ठगने, बच्चों का अपहरण करने जैसा अपराध करते हैं। लेकिन वे बड़ी संख्या के भिखारी जो सड़कों, मंदिरों तथा पर्यटन स्थलों में दिखाई देते हैं, वे सब कहां से आते हैं। उनमें से अनेक बेघर होते हैं और दुर्दशापूर्ण जीवन बिताते हुए दूसरों की दया रूपी भीख पर निर्भर रहते हैं। यदि बात की जाए बुजुर्ग भिखारियों की तो इनके जीवन की पर्तें खोलते हुए वह भयावह दृश्य देखने को मिलता है जिसकी कल्पना भी सहज रूप से नहीं की जा सकती है। बच्चों और युवा भिखारियों की चर्चा बाद में पहले वृद्ध भिखारियों की बात की जाए।

भिखरियों में कुछ वृद्ध (वृद्ध का आशय वृद्धाओं से भी है) बेघर हैं और कुछ परिवार वाले होते हैं। जो वृद्ध बेघर हैं वे अपने परिवारजन द्वारा घर से निकाल फेंके गए हैं या यूं कह लें कि उन्हें अपनों के द्वारा सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। सन् 2021 के प्रथम माह की ही घटना है जब सागर जिले में दो जवान पुत्र अपने बीमार वृद्ध पिता को गांव से मोटरसायकिल पर बैठा कर शहर लाए और वहां उसे छोड़ कर भाग रहे थे कि लोगों को संदेह हुआ और उन्होंने दोनों युवकों को पकड़ कर पूछताछ की तो सच्चाई सामने आई। दोनों पुत्र अपने बीमार पिता से पीछा छुड़ाने के लिए उसे छोड़ कर भाग रहे थे। लोगों के दबाव डालने पर वे अपने पिता को साथ ले कर लौट गए। इस घटना का फाॅलोअप किसी को पता नहीं है कि उन दोनों कलियुगी बेटों ने दोबारा ऐसा प्रयास किया या नहीं? या फिर वे अपने इरादे में कामयाब हो कर अपने पिता से पीछा छुड़ा चुके हैं? ऐसी घटनाएं देश के हरेक कोने में आए दिन घटित होती रहती हैं जब युवा संतानों द्वारा अपने वृद्ध माता-पिता को घर से निकाल दिया जाता है।  हिसार में एक कलयुगी बहू ने अपनी 80 साल की सास को घर से बाहर निकाल दिया था। इतना ही नहीं बहू ने अपनी सास के कपड़े भी बाहर गली में फेंक दिए थे। सहरसा जिले मेंएक कलयुगी बेटे ने हैवानियत की हदें पार करते हुए अपने ही मां-बाप को बेरहमी से पिटाई कर घर से निकाल दिया। इस तरह घर से बाहर फेंके गए वृद्ध अशिक्षित या कम शिक्षित हैं तो उन्हें यह समझ में नहीं आता है कि इस स्थिति में वे कहां जाएं या क्या करें? दुव्र्यवहार के बावजूद संतान-मोह पुलिस के पास जाने से उन्हें रोके रखता है। ऐसी दशा में सड़कों पर भीख मांग कर अपने जीवन की गाड़ी खींचने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं बचता है। कई बार परिवार के बुरे व्यवहार और तानों से तंग आ कर वृद्ध घर छोड़ कर निकल पड़ते हैं। इसके बाद वे एक भिखारी की ज़िन्दगी जीने को विवश हो जाते हैं। सरकार की ओर से वृद्ध पेंशन जैसी कई योजनाएं चलाई जा रही हैं लेकिन घर से बाहर कर दिए गए वृद्धों को इनकी कोई जानकारी नहीं होती है। यदि किसी पढ़े-लिखे वृद्ध को इनकी जानकारी हो भी तो वे अपने के द्वारा किए गए दुव्र्यवहार से इतने टूट चुके होते हैं कि उनके भीतर किसी भी तरह का अधिकार पाने या अधिकार के लिए लड़ने की इच्छा ही नहीं रह जाती है।

भिखारियों में वृद्धों की दूसरी श्रेणी वह होती है जो आर्थिक विपन्नता के कारण भीख मांगने को मजबूर होते हैं। उनके परिवार वाले भी इस तथ्य को समझते हैं कि एक बूढ़े भिखारी पर लोगों को दया आ ही जाएगी। इसलिए वे स्वयं तो भीख मांगते ही हैं, साथ ही अपने घर के वृद्धों को सड़कों पर भीख मांगने को प्रेरित करते हैं। यह विवशता की स्थिति होती है। इसमें दोषी वे नहीं अपितु उनकी परिस्थिति होती है। ऐसे भिखारी धार्मिक स्थलों के आस-पास अधिक संख्या में मौजूद होते हैं।  
       
सरकारी सर्वे के अनुसार हमारे देश की 70 प्रतिशत आबादी नौजवानों की है और यह देश के लिए एक पूंजी है, लेकिन चिंता का विषय यह भी है कि क्या यह 70 प्रतिशत आबादी हमेशा युवा ही रहेगी? जो आज युवा देश है वह वह भी बूढ़ा भी तो होगा। यूनाइटेड नेशन पॉपुलेशन फंड और हेल्पएज इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 तक भारत में बुजुर्गों की संख्या 17 करोड़ 30 लाख और 2050 में यह बढ़कर 34 करोड़ हो जाएगी अर्थात् 2050 तक हर 5 वां भारतीय 60 साल से अधिक उम्र का होगा, फिलहाल देश में 60 साल से ज्यादा उम्र के आबादी के लगभग 8 करोड़ लोग हैं। बढ़ती उम्र में प्रतिरोधक क्षमता घटने से 60 वर्ष और उससे अधिक आयु में, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, फेफड़ों की बीमारी, और हृदय की बीमारी आदि घेरने लगती है। 

अच्छे रोजगार की चाह में युवाओं का दूसरे शहरों की ओर पलायन और टूटते संयुक्त परिवारों ने वृद्धों को एकाकी कर दिया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी एक रिपोर्ट ‘बुजुर्गों की स्वास्थ्य समस्याएं’ बताती है कि 25 प्रतिशत भारतीय बुजुर्ग अवसाद में जी रहे हैं, 33 प्रतिशत को गठिया या हड्डी के रोग से ग्रस्त हैं, 40 प्रतिशत को एनीमिया है, गांवों में 10 और शहरों में 40 प्रतिशत को डायबीटीज है, 10 प्रतिशत कम सुनने संबंधी समस्या से गुजर रहे हैं, गांवों में 33 प्रतिशत तो शहरों में 50 प्रतिशत को हाइपरटेंशन है,  लगभग 50 प्रतिशत वृद्धों की नजर कमजोर है, 10 प्रतिशत भारतीय बुजुर्ग कहीं न कहीं  गिरकर अपनी कोई न कोई हड्डी तुड़वा बैठते हैं तो 33 प्रतिशत पाचन तंत्र के विकार से जूझ रहे हैं। इसी रिपोर्ट के अनुसार अनुमान है कि 2025 ऐसे बुजुर्गों की संख्या कुल आबादी की 12.50 प्रतिशत होगी और उनमें से 10 प्रतिशत तो पूरी तरह से बिस्तर पर होंगे। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि 4 से 6 प्रतिशत बुजुर्ग तो हमेशा कुपोषित ही रहते हैं। भारत की मौजूदा जीवन प्रत्याशा दर 69 वर्ष है जबकि विश्व की औसत जीवन प्रत्याशा दर 72 साल है। अब यदि युवा वृद्धों को बोझ मानें और उन्हें साथ रखने को तैयार न हों तो भिखारी वृद्धों की संख्या बढ़ना तय है। यह असंवेदनशील ही नहीं बल्कि अमानवीय है। (क्रमशः) 
  
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(दैनिक सागर दिनकर 10.02.2021 को प्रकाशित)
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Wednesday, February 3, 2021

चर्चा प्लस | समाज के मुंह पर ज़ोरदार तमाचा है इन्दौर की घटना | डाॅ शरद सिंह

Charcha Plus Column of Dr (Miss) Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily

चर्चा प्लस

समाज के मुंह पर ज़ोरदार तमाचा है इन्दौर की घटना

    - डाॅ शरद सिंह

                      

किसी भी घटना को राजनीतिक रंग देना आज एक फैशन हो गया है। इन्दौर में बुजुर्ग, लाचार भिखारियों के साथ किए गए दुर्व्यवहार में भी राजनीतिक तड़का लगाया गया लेकिन किसी ने भी समाज के गिरेबान में झांक कर देखने की कोशिश नहीं की कि हमारे समाज से संवेदनशीलता क्यों गुम होती जा रही है? सड़कों पर ऐसे बेघर भिखारी तो हर सरकार के समय मौजूद रहे हैं। कभी किसी ने सोचा कि ये सड़कों पर क्यों है? दरअसल, इस मुद्दे का स्थाई हल ढूंढने के लिए इसे राजनीतिक नहीं अपितु सामाजिक मुद्दे की तरह देखे जाने की ज़रूरत है। इस मुद्दे पर ‘चर्चा प्लस’ में चर्चा की प्रथम कड़ी प्रस्तुत है।            

चर्चा प्लस |  समाज के मुंह पर ज़ोरदार तमाचा है इन्दौर की घटना | डाॅ शरद सिंह | सागर दिनकर

देश में स्वच्छता में नंबर एक का मुकाम रखने वाले इंदौर नगर निगम के कुछ कर्मचारियों की ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने सभी को हतप्रभ कर दिया। इंदौर नगर निगम कर्मचारियों का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें निगम के कुछ कर्मचारी सड़क किनारे रहने वाले बुजुर्गों और भिखारियों को एक डंपर में भरकर शहर के बाहर छोड़ने पंहुचे। उसके बाद स्थानीय लोगों के विरोध की वजह से उन बुजुर्गों को दूसरी जगह ले जाया गया। जो चलने की स्थिति में भी नहीं थे और उस स्थिति में नगर निगम के कर्मचारी उन्हें और उनके सामान को उठाकर गाड़ी में रख दिया था। ये कर्मचारी बुजुर्ग भिखारियों को शहर की सीमा के पार शिप्रा नदी के निकट छोड़कर जाने वाले थे। स्थानीय लोगों ने जब देखा तो उन्होंने इस पर आपत्ति की जिसके बाद कर्मचारी उन्हें वहां से लेकर चले गए। इस कड़ाके की ठंड में जब तापमान 4-5 डिग्री सेल्शियस से भी नीचे जा रहा हो बेघर बुजुर्ग भिखारियों को इस तरह नदी के समीप कूड़ा-करकट की तरह छोड़ जाना अमानवीयता की सारी सीमाएं लांघ गया। वस्तुतः इन बुजुर्गों को रैन बसैरा लेकर जाना चाहिए था लेकिन निगम के अधिकारी के कहने पर इन्हें शहर से उठाकर शिप्रा नदी के पास ले जाया गया और उसके बाद उन्हें वहां छोड़ा जाना था। लेकिन स्थानीय लोगों ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया। उसके बाद उन्हें शहर भर में घुमाते रहे और अंत में उन्हें रैन बसैरा में छोड़ा गया। इन्हें इस तरह ले जाने का उद्देश्य था कि स्वच्छ इंदौर भिखारी विहीन रहे। लेकिन भिखारी विहीन करने का यह तरीका अत्यंत अमानवीय था। इस घटना से युवराज सिद्धार्थ के जीवन से जुड़ी घटना आद आ गई। कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन के घर जन्मे सिद्धार्थ के लिए ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि वे छोटी आयु में सन्यासी हो जाएंगे। इसीलिए राजा शुद्धोधन ने यह व्यवस्था कर रखी थी कि जब युवराज सिद्धार्थ नगर भ्रमण को निकलें तो कोई भी अप्रिय दृश्य उनके सामने न आए कि जिससे उनके मन में वैराग्य पैदा हो। सारे भिखारी, अपाहिज, दुखीजन रास्ते से हटा दिए जाते थे। यह बात और है कि अंततः ऐसे दृश्य सिद्धार्थ ने देख ही लिए जिन्हें देख कर उनके मन में वैराग्य भाव आग उठे और उन्होंने सांसारिकता छोड़ दी तथा तपस्या कर के भगवान बुद्ध कहलाए। लेकिन इंदौर में किसी युवराज की सवारी नहीं निकलनी थी। यहां तो मसला स्वच्छता रैंकिंग बनाए रखने की होड़ का था। इस होड़ के चक्कर में नगर निगम के अधिकारी-कर्मचारी यह भी भूल गए कि वे जिस मुख्यमंत्री के शासनकाल में यह कदम उठा रहे हैं वे बुजुर्गों के प्रति अतिसंवेदनशील हैं। वे यह भी भूल गए कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 3 सितम्बर 2012 को मुख्यमंत्री तीर्थ-दर्शन योजना आरम्भ की थी जिसका उद्देश्य है कि प्रदेश के 60 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिक राज्य सरकार की सहायता से निर्धारित तीर्थ-स्थानों में से किसी एक स्थान की तीर्थ यात्रा कर सकें। 

 

बुजुर्गों के प्रति संवेदनशील मुख्यमंत्री का इंदौर प्रकरण पर तुरंत एक्शन में आना स्वाभाविेक था। जैसे ही यह समाचार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान तक पहुंचा, उन्होंने ने मामले को अपने संज्ञान में लेते हुए एक अधिकारी को सस्पेंड कर दिया और दो कर्मचारियों को बर्खास्त करने का आदेश दे दिया। साथ ही शिवराज सिंह चैहान ने ट्वीट किया, ‘‘आज इंदौर में नगर निगम कर्मचारियों द्वारा वृद्धजनों के साथ अमानवीय व्यवहार के संबंध में मुझे जानकारी मिली। इस मामले में जिम्मेदार नगर निगम उपायुक्त सहित दो कर्मचारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित करने और कलेक्टर इंदौर को बुजुर्गों की समुचित देखभाल करने का निर्देश दिया है। बुजुर्गों के प्रति अमानवीय व्यवहार किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मेरे लिये नर सेवा ही नारायण सेवा है। हर वृद्ध को आदर, प्रेम और सम्मान मिलना चाहिए, यही हमारी संस्कृति है और मानव धर्म भी।’’


नगरीय विकास मंत्री भूपेंद्र सिंह ने कहा, ‘‘यह घटना अमानवीय है और इस पर फौरन कार्रवाई की गई है। हमारी कोशिश है कि इस तरह के मामले आगे न आये इसलिये विभाग जल्द ही दिशानिर्देश जारी कर रहा है।’’ इस मामले में सरकार ने जांच के आदेश भी दिए कि आखिर किस अधिकारी ने यह आदेश दिया था कि इन लोगों को शहर के बाहर कर दिया जाए ताकि शहर स्वच्छ रह सकें। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इस वीडियो को लेकर सरकार पर निशाना साधा। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने भी इस वीडियो को शेयर किया और लिखा, ‘‘इंदौर, मप्र की ये घटना मानवता पर एक कलंक है। सरकार और प्रशासन को इन बेसहारा लोगों से माफी मांगनी चाहिए और ऑर्डर लागू कर रहे छोटे कर्मचारियों पर नहीं बल्कि ऑर्डर देने वाले उच्चस्थ अधिकारियों पर एक्शन होना चाहिए।’’ कमलनाथ ने अपने ट्वीट में लिखा- ‘‘इंदौर नगर निगम की शर्मनाक हरकत, बुजुर्गों को निगम की गाड़ी में जानवरों की तरह भरा। शर्म करो शिवराज’’


कांग्रेस के राज में ऐसी घटना भले ही नहीं घटी लेकिन क्या उनके शासनकाल में एक भी वृद्ध भिखारी सड़कों पर भीख नहीं मांगते थे? यह कहने का मकसद किसी राजनीतिक दल को समर्थन देना या किसी का विरोध करना नहीं है। बल्कि आग्रह मात्र ये है कि इस घटना को राजनीतिक चश्में के बजाए सामाजिक अवमूल्यन स्तर की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। समस्या की जड़ को टटोलने की जरूरत है। जरूरत है यह जानने की वृद्धजन आखिर सड़कों पर क्यों हैं? वे भीख मांगने को मज़बूर क्यों हैं? उनके प्रति समाज का रवैया असंवेदनशील क्यों हो चला है? इन सारे प्रश्नों के उत्तर पाना सबसे जरूरी है क्योंकि यह घटना हमारे समाज के मुंह पर एक ज़ोरदार तमाचा है। 

 

इस तारतम्य में स्मरण किया जा सकता है कि फरवरी 2016 में दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भीख मांगने को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि भीख मांगने वालों को दंडित करने का प्रावधान असंवैधानिक है और यह रद्द किए जाने लायक है।’’ अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए सरकार से पूछा था कि ‘‘ऐसे देश में भीख मांगना अपराध कैसे हो सकता है जहां सरकार भोजन या नौकरियां प्रदान करने में असमर्थ है।’’ दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि लोग इसलिए भीख नहीं मांगते कि ऐसा करना उनकी इच्छा है, बल्कि इसलिए मांगते हैं क्योंकि ये उनकी जरूरत है। भीख मांगना जीने के लिए उनका अंतिम उपाय है, उनके पास जीवित रहने का कोई अन्य साधन नहीं है।’’


तत्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और जस्टिस सी. हरिशंकर की पीठ ने कहा था कि ‘‘भीख मांगने को अपराध बनाने वाले ‘बॉम्बे भीख रोकथाम कानून’ के प्रावधान संवैधानिक जांच में टिक नहीं सकते।’’

बॉम्बे भीख रोकथाम अधिनियम, 1959 के आधार पर ही सभी राज्यों में भिक्षा विरोधी लागू किया गया था। कई भिखारियों को राजधानी में इस कानून के तहत जेल में डाल दिया जाता था। बॉम्बे रोकथाम अधिनियम, 1959 को गैरजरूरी मानते हुए कोर्ट ने आगे कहा, ‘सरकार के पास जनादेश सभी को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए होता है जिससे सभी नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं मिलना सुनिश्चित हो सके। लेकिन, भीख मांगने वालों की मौजूदगी इस बात का सबूत है कि राज्य इन सभी नागरिकों को ये जरुरी चीजें उपलब्ध कराने में कामयाब नहीं रहा है। भीख मांगने को अपराध बनाना हमारे समाज के कुछ सबसे कमजोर लोगों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। इस स्तर के लोगों की भोजन, आश्रय और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी आवश्यकताओं तक पहुंच नहीं है। और ऊपर से  उन्हें अपराधी बताना उन्हें अपनी दुर्दशा से निपटने के मौलिक अधिकार से रोकता है।’


अपने 23 पृष्ठीय फैसले में पीठ ने कहा था कि इस फैसले का अपरिहार्य परिणाम यह होगा कि कथित रूप से भीख मांगने का अपराध करने वालों के खिलाफ कानून के तहत मुकदमा खारिज करने योग्य होगा। हाई कोर्ट ने यह फैसला हर्ष मंदर और कर्णिका साहनी की जनहित याचिकाओं पर सुनाया जिसमें राष्ट्रीय राजधानी में भीख मांगने वालों के लिए मूलभूत मानवीय और मौलिक अधिकार मुहैया कराए जाने का अनुरोध किया गया था। याचिका में बॉम्बे भीख रोकथाम अधिनियम, 1959 के प्रावधानों को भी चुनौती दी गई थी। केंद्र सरकार ने इस पर कहा था कि भीख मांगने को अपराध की श्रेणी से बाहर नहीं किया जा सकता है। अदालत ने इस कानून की कुल 25 धाराओं को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया था। कानून का दायरा दिल्ली तक बढ़ाया गया था। इस याचिका की सुनवाई के आरम्भिक दौर में ही अदालत ने 16 मई 2015 को कहा था कि ‘‘ऐसे देश में भीख मांगना अपराध कैसे हो सकता है जहां सरकार भोजन या नौकरियां प्रदान करने में असमर्थ है।’’ 


देश में भिखारियों, बेघर, बेसहारों का मुद्दा इतना वृहद है कि उस पर संक्षेप में चर्चा करना इस मुद्दे के साथ औपचारिकता बरतने जैसा होगा। इस पर लम्बी, विस्तृत चर्चा और गहन चिंतन-मनन एवं विमर्श की आवश्यकता है। अतः इस विषय पर आगे की चर्चा मैं अगले ‘‘चर्चा प्लस’’ में जारी रखूंगी। जिसमें भिखारियों और सामाजिक व्यवस्था के परस्पर संबंधों की विस्तार से चर्चा करूंगी। (क्रमशः)  

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(दैनिक सागर दिनकर 03.02.2021 को प्रकाशित)

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