Saturday, March 13, 2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

कोरोना आपदा के बाद आमलोगों में भी सेहत के प्रति जागरूकता बढ़ी है। जिन काॅलोनियों में सेहत पार्क नहीं थे अथवा लापरवाह स्थिति में उपेक्षित पड़े थे वहां भी सेहत पार्क के अनुरूप एक्सरसाईज़र एक्यूप्मेंट्स लगा कर उन्हें स्वास्थ्य के लिए उपयोगी बना गया।
 

सेहत क्या है?

सेहत या स्वास्थ से तात्पर्य ऐसी स्थिति से है, जब कोई व्यक्ति शारीरिक, मानसिक रूप से स्वस्थ होता है। जब किसी व्यक्ति की रोग-प्रतिरोधक क्षमता (immunity power) काफी मजबूत होती है, तो उसे भी सेहतमंद कहा जाता है।

 6 उपायों को अपनाकर अच्छी सेहत प्राप्त कर सकते हैं-

पौष्टिक भोजन करना- अच्छी सेहत को बनाए रखने का सबसे आसान तरीका अपने खान-पान पर ध्यान देना है।

चूंकि, खराब भोजन हमें बीमारी कर सकता है, इसलिए हम सभी लोगों को केवल पौष्टिक भोजन करना चाहिए ताकि हम कम बीमार पड़े।

पर्याप्त मात्रा में पानी पीना- पौष्टिक भोजन के अलावा मानव शरीर को पानी की भी जरूरत पड़ती है, जो उसे डिहाइड्रेट होने से बचाती है।

अत: सभी लोगों को पर्याप्त मात्रा (6-7 गिलास प्रति दिन) पानी पीना चाहिए ताकि उसके शरीर में पानी की कमी न हो।

नशीले पदार्थों का सेवन न करना- जैसा कि ऊपर स्पष्ट किया गया है कि खराब सेहत नशीले पदार्थों का सेवन करने का नतीजा होती है।

इसी कारण, किसी भी व्यक्ति को नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए ताकि उनकी सेहत अच्छी बनी रहे।

अधिक चलना- वर्तमान समय में हम सभी लोगों को ज्यादातर काम एक जगह बैठकर ही करने पड़ते हैं, जिसका सीधा अपने शरीर पर पड़ता है।

इसी कारण, हमें अधिक चलने की कोशिश करनी चाहिए ताकि हमारा वजन अधिक न बढ़े और न ही हमारे शरीर में कमज़ोरी आए।

साफ-सफाई का ध्यान रखना- अच्छी सेहत को बनाए रखने का बेहतरीन तरीका साफ-सफाई का ध्यान रखना है।

ऐसा करने से हम तमाम तरीके से वायरस से बच सकते हैं और साथ ही खुद के बीमार होने की संभावना को भी कम कर सकते हैं।

एक्सराइज़ करना- यदि कोई व्यक्ति हर रोज़ कम-से-कम 30 मिनट एक्सराइज़ करता है, तो उसकी सेहत अच्छी बनी रहती है, जिससे वह कम बीमार पड़ता है।

इस प्रकार, हम सभी लोगों को हर रोज़ एक्सराइज़ करनी चाहिए ताकि हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता (immunity power) बढ़ सके, जो हमारी किसी भी बीमारी से ठीक होने में सहायता कर सके।

exercise equipments in Shanti Vihar Sehat Park, Makroniya, Sagar MP

मकरोनिया स्थित शांतिविहार कॉलोनी के हम सभी रहवासियों के लिए पार्क के रूप में मिली सौगात का एक भव्य कार्यक्रम में पार्क का लोकार्पण हमारे नरयावली विधानसभा क्षेत्र के लोकप्रिय विधायक इंजी. प्रदीप लारिया जी ने किया। इस आयोजन में मैंने अतिथि के रूप में अपने विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर मेरी दीदी सुप्रतिष्ठित ग़ज़लकार एवं वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ वर्षा सिंह भी उपस्थित थीं। दीदी की उपस्थिति मुझे सदैव ऊर्जा प्रदान करती है।अत्याधुनिक सुविधाओं से भरपूर इस पार्क में सेहत बनाने, मनोरंजन आदि की तमाम व्यवस्थाएं हैं। आखि़र,अच्छी सेहत के लिए एक्सरसाईज़ ज़रूरी है।

कार्यक्रम के प्रमुख आयोजक थे मकरोनिया भाजपा मंडल अध्यक्ष भाई कपिल कुशवाहा एवं सरदार जस्सी भाई।

- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

तस्वीरें उसी अवसर की ... 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में डाॅ वर्षा सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में डाॅ वर्षा सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में डाॅ वर्षा सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021 

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021 

सेहत पार्क के लोकार्पण में अतिथि डाॅ (सुश्री) शरद सिंह, 07.03.2021 


Thursday, March 11, 2021

चर्चा प्लस | शिवरात्रि पर्व पर विशेष | खजुराहो में हैं शिव के सभी रूप | डॉ. शरद सिंह

🚩शिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं 🚩
चर्चा प्लस 
शिवरात्रि पर्व पर विशेष :
खजुराहो में हैं शिव के सभी रूप
- डॉ. शरद सिंह 
         शिव समस्त संसार का कल्याण करने वाले देवता माने गए हैं। समुद्र-मंथन से निकला हुआ गरल यानी विष स्वर्ग में निवास करने वाले देवताओं को भी भस्म कर सकता था यदि शिव उसे अपने गले में धारण नहीं करते। आदि ग्रंथों एवं पुराणों में शिव के विविध रूपों का वर्णन मिलता है। यहां मैं अपनी पुस्तक ‘खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्व’ का वह अंश दे रही हूं जिसमें खजुराहो की शिव प्रतिमाओं की पूर्ण विविधता का विवरण है।
‘शिवपुराण’ के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने समुद्र-मंथन किया तो उसमें हलाहल विष निकला। यह इतना घातक था कि देवताओं को भी भस्म कर सकता था। देवता हलाहल विष की विषाक्तता से भयभीत हो उठे तक शिव ने आगे बढ़ कर उस विष का पान कर लिया। लेकिन वे भी उसे यदि अपने गले से नीचे पेट में उतरने देते तो वह विष शिव को भी क्षति पहुंचा सकता था अतः विष को शिव ने अपने गले में ही रोक लिया जिससे शिव का गला नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। विष को गले में धारण करने के बावजूद उसका प्रभाव इतना तेज था कि उनके शरीर में जलन होने लगी और उन्हें गरती का अनुभव होने लगा तब वे हिमालय की ओर आकाशमार्ग से चल पड़े। बीच में विंध्य पर्वत के ऊपर से गुज़रते हुए उन्हें शीतलता का अनुभव हुआ और वे कुछ समय के लिए वहीं रुक गए। वह विश्रामस्थल कालंजर था। उस समय कालंजर में निवास कर रही देवी उमा से शिव ने विवाह किया और दोनों साथ-साथ कुछ समय वहां रहे। इसके बाद देवी उमा कामाख्या चली गईं और शिव हिमालय के लिए निकल पड़े। इस पौराणिक कथानक के आधार पर कालंजर में उमा-महेश्वर की अनेक प्रतिमाओं से ले कर विवाहमंडप तक मिलता है। शिल्पकारों ने जिस सुंदरता से कालंजर में नीलंकठ एवं उमा-महेश्वर के विवाह की कथा को पत्थरों में तराशा है ठीक उसी प्रकार खजुराहो में शिव के विवध रूपों की अनेक प्रतिमाएं हैं जो पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं। सन् 2000 में डॉक्टरेट की उपाधि के लिए खजुराहो की मूर्तिकला पर शोध करते समय और उसके बाद ‘खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्व’ पुस्तक लिखते समय मुझे खजुराहो के मंदिरों में मौजूद शिव प्रतिमाओं की सम्पूर्ण विविधता को देखने और जानने का अवसर मिला। मेरी यह पुस्तक सन् 2006 में विश्वविद्यालय प्रकाशन, चौक, वाराणसी, उ.प्र. से प्रकाशित हुई। खजुराहो के मंदिर 950 से 1050 ई. के मध्य निर्मित हुए जिनमें मातंगेश्वर मंदिर प्राचीनतम हैं। विश्वनाथ मंदिर, लक्ष्मण और कंदरिया महादेव मंदिर के बीच की कड़ी है। इस मंदिर के मंडप दीवार पर लगे शिलालेख से पता चलता है, कि धंग द्वारा 1002 ई. में शंभु मरकतेश्वर के मंदिरों का निर्माण कराया गया था जिसमें मरकत तथा पाषाण निर्मित दो लिंगों की स्थापना का उल्लेख है। वर्तमान में पाषाण लिंग ही शेष है। इसी मंदिर के ठीक सामने नंदी मंदिर स्थित है। यह विश्वनाथ मंदिर का समकालीन है।

त्रिदेव में तीसरे देवता महेश अर्थात शिव हैं। जिनकी विविधता पूर्ण अनेक प्रतिमाएं खजुराहो के मंदिरों में मिलती है। ये एक ऐसे देव है जिनकी आराधना वैदिक काल से पूर्व सैन्धव युग में की जाती थी। वैदिक काल में शिव कारूद्र रूप अधिक प्रसिद्ध रहा। सांख्यायन तथा कौशितकि उपनिषदों में शिव, रूद्र, महादेव, महेश्वर, ईशान आदि नाम आते हैं। महाभारत में शिव के सहस्त्र नामों का उल्लेख हुआ है। उनके लिये शंकर, ईशान, शर्व, नीलकंठ, त्रयम्बक, धूर्जटि, नंदीश्वर, शिखिन, व्योमकेश, महादेव आदि नाम आये हैं। इन सभी रूपों में आयुध प्रतीकों की भिन्नता पायी जाती है, कभी शिव के हाथ में डमरू, खड्ग, खेटक, पारा तथा त्रिशूल रहता है तो कभी खप्पर, रूद्राक्षमाला, तलवार, धनुष, खट्वांग तथा ढाल आदि आयुध प्रतीक रहते हैं। खजुराहो में निर्मित शिव मूर्तियों में चतुर्भुजी, अष्टभुजी, बारहभुजी, सोलहभुजी रूप मिलते है। जिनमें विविध आयुध प्रदर्शित है।
चतुर्भुजी नटराज - दूला देव मंदिर में चतुर्भुज नटराज की मूर्ति है जिसमें उनकी प्रथम तीन भुजाओं में क्रमशः त्रिशूल, डमरू, खप्पर (कपाल) है जबकि चौथी भुजा भग्नावस्था में है। कुछ प्रतिमाओं में एक भुजा में अग्नि लिये हुये भी प्रदर्शित किया जाता है।
अष्टभुजी नटराज - खजुराहो संग्रहालय में स्थित अष्टभुजी प्रतिमा में उनकी आठों-भुजाओं में क्रमशः त्रिशूल, खड्ग, डमरू, खेटक, खट्वांग तथा खप्पर हैं। एक अन्य प्रतिमा में त्रिशूल, पाश, डमरू, अभय, कपाल अग्नि तथा घंटा प्रदर्शित है।
बारह भुजी नटराज - दूलादेव मंदिर में बारहभुजी नटराज की एक सुन्दर प्रतिमा है जिसमें बायां पैर नृत्य मुद्रा में उठा हुआ है। भुजाओं में त्रिशूल, पाश, डमरू, खेटक, खट्वांग, खड्ग, खप्पर, दृष्टिगत् है।
कल्याण सुन्दर शिव - शिव का कल्याण सुन्दर रूप शिव पार्वती के विवाह के अवसर का है। खजुराहो संग्रहालय, वामन मंदिर तथा भरत चित्रगुप्त मंदिर में स्थित कल्याण सुन्दर शिव को त्रिशूल के आयुध प्रतीक से युक्त दिखाया गया है।
नीलकंठ - खजुराहो के विभिन्न मंदिरों में नीलकंठ शिव की मूर्तियां हैं। कंदरिया मंदिर में नीलकंठ की भुजाओं में पदम, त्रिशूल, खट्वांग, तथा विषपात्र है। भरत चित्रगुप्त मंदिर में नीलकंठ को विषपात्र, त्रिशूल खट्वांग कमंडलु, डमरू तथा कमल सहित दिखाया गया है। एक अन्य प्रतिमा में नीलकंठ को खप्पर, डमरू, कमल तथा खट्वांग धारी दिखाया गया है। लक्ष्मण मंदिर तथा कंदरिया मंदिर में उन्हें विषपात्र, डमरू, खट्वांग तथा कमंडलु युक्त प्रदर्शित किया है। पार्श्वनाथ मंदिर में आलिंगनबद्ध नीलकंठ की भुजाओं में खट्वांग एवं कमल नाल दिखाया गया है।

अघोर शिव - जगदंबा मंदिर में अघोर शिव की प्रतिमा है। जिसमें उन्हें शूल, डमरू, पाश, दंड, धारण किये हुये बताया गया है। पार्श्वनाथ मंदिर में खट्वांग, पुस्तक तथा नीलकंठ पक्षी धारी अघोर शिव है। पार्श्वनाथ मंदिर में शिव के हाथ में घंटिका है। कंदरिया महादेव मंदिर में अष्टभुजी अघोर प्रतिमा है। जिसमें खप्पर, त्रिशूल, शक्ति डमरू, घंटिका, सर्प, खट्वांग तथा कमंडलु दिखाया गया है। विश्वनाथ मंदिर में अघोर शिव त्रिशूल डमरू घंटिका गदा और कमंडलुधारी हैं। दूलादेव मंदिर में शिव अघोर की वरद् मुद्रा, सर्प, त्रिशूल, डमरू, खट्वांग और कमंडलु धारी हैं।
गज संहार शिव - खजुराहो में गज संहार शिव की विभिन्न प्रतिमायें हैं। कंदरिया महादेव मंदिर में सोलह भुजी गज संहार शिव है। जबकि कुछ अन्य प्रतिमायें बारहमुखी हैं। शिव के इस रूप में उन्हें त्रिशूल वज्र डमरू तथा हाथी का चमड़ा लिये हुये प्रदर्शित किया गया है।

भैरव - खजुराहो में दो प्रकार की भैरव प्रतिमायें है। प्रथम श्वान वाहन सहित तथा दूसरी नग्न प्रतिमा है। एक अन्य प्रकार भी भैरव प्रतिमा का है जिसमें उन्हें भैरवी के साथ आलिंगन मुद्रा में दिखाया गया है। इस प्रतिमा में भैरव चक्र (छल्ला), कमल तथा घंटिका धारी हैं। कंदरिया महादेव, वामन तथा चतुर्भुज मंदिर में नग्न भैरव को पेय पात्र, डमरू, घंटी, नरमुण्ड, सहित दिखाया गया है। विश्वनाथ मंदिर, जगदम्बा मंदिर, भरत चित्रगुप्त मंदिर तथा लक्ष्मण मंदिर में भैरव पेय, डमरू, घंटी, नरमुण्ड, तथा खड्ग लिये हुये हैं। विश्वनाथ मंदिर में भैरव की एक ऐसी प्रतिमा भी है जिसमें उन्हें कमल, सर्प, खट्वांग तथा नरमुण्ड लिये हुये दिखाया गया है। इसी प्रकार लक्ष्मण मंदिर में खड्ग, घंटिका तथा सर्प सहित वामन मंदिर में खड्ग, करबाल तथा खट्वांग सहित हैं। कंदरिया मंदिर की प्रदक्षिणा में खड्ग, जगदम्बा मंदिर में पाश तथा खड्ग तथा विश्वनाथ मंदिर में खेटक, खड्ग तथा सर्प सहित भैरव हैं। श्वान वाहन युक्त भैरव प्रतिमा में गदा, डमरू, घंटिका, खप्पर, कमल तथा सर्प आयुध प्रतीक हैं। आदिनाथ मंदिर में गदा, सर्प के साथ फल प्रदर्शित हैं जबकि विश्वनाथ मंदिर की प्रदक्षिणा में गदा, खड्ग सर्प तथा नरमुण्ड और दूलादेव मंदिर में स्थित प्रतिमा में खड्ग, ढाल तथा नरमुण्ड है। जगदम्बा मंदिर में भैरव की एक ऐसी प्रतिमा भी है जिसमें उनके एक हाथ में पक्षी तथा शेष दो हाथों में घंटिका तथा खट्वांग है।

त्रिपुरान्तक - खजुराहो में आलिंगन मुद्रा की त्रिपुरान्तक प्रतिमा है। जिसमें उन्हें, घट, धनुष, बाण तथा नरमुण्ड धारण किये हुये बताया गया है।
यदि मुद्राओं के आधार पर देखा जाए तो खजुराहो में मौजूद शिव की चतुर्भज प्रतिमाओं को ही तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है - प्रथम श्रेणी में शिव की वे चतुर्भुजी प्रतिमायें है जिनमें शिव वरद मुद्रा में त्रिशूल, घट तथा सर्प धारण किये है। द्वितीय श्रेणी में वे शैव मूर्तियां हैं जिसमें पहली भुजा वरद अथवा अभय मुद्रा में है। तथा दूसरी भुजा में त्रिशूल है। अन्य भुजाओं में पाश, कमल अथवा पुस्तक है। तृतीय श्रेणी में शिव की वे प्रतिमायें है जिनमें शिव के दूसरी अथवा तीसरी भुजा में सर्प प्रदर्शित है जबकि पहली भुजा वरद, अभय अथवा आलिंगन मुद्रा में है। वरद मुद्रा में दूसरे हाथ में पुस्तक अथवा कमल तीसरे में सर्प और चौथे में घट प्रदर्शित है। अभय मुद्रा में दूसरे हाथ में पाश तीसरे में सर्प तथा चौथा कटि पर है।

भारतीय शिल्पकला यूं भी अत्यंत समृद्ध है और जब उसमें कथानक का समावेश हो जाता है तो ऐसा लगता है जैसे प्रतिमाएं जीवंत हो कर उन कथाओं को स्टेज पर मंचित कर रही हों। यूं भी भारत में प्रतिमा निर्माण की परम्परा बहुत प्राचीन है। खजुराहो का मूर्तिशिल्प शिव प्रतिमाओं के बिना पूर्ण हो ही नहीं सकता था। शिव जो संहारक हैं तो कल्याणकर्त्ता भी हैं। भोले हैं लेकिन दुखहर्त्ता हैं। संभवतः खजुराहो का शैव-शिल्प भी यही कहना चाहता है कि -‘शिव सबका कल्याण करें!’
------------------------
(दैनिक सागर दिनकर 11.03.2021 को प्रकाशित)
#शरदसिंह  #DrSharadSingh #miss_sharad #दैनिक #सागर_दिनकर #चर्चाप्लस #शिवरात्रि #खजुराहो #शिव

Thursday, March 4, 2021

चर्चा प्लस | विश्व वन्यजीव दिवस | यह दिवस उत्सव नहीं, मांग करता है ईमानदार प्रयासों की | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

विश्व वन्यजीव दिवस    
यह दिवस उत्सव नहीं, मांग करता है ईमानदार प्रयासों की  
        - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
   पिछले दो सालों में हमने दुनिया के बड़े-बड़े जंगलों को आग के हवाले होते देखा। उनके वन्य जीवन को धू-धू कर जलते देखा। ग्लेशियर्स के पिघलने और टूटने से होने वाली आपदा की धमक अपने देश के उत्तराखंड में भी सुनी। दुख है कि हम अभी भी वन और मानव जीवन के रिश्ते को अनदेखा ही किए जा रहे हैं। जबकि वन और वन्यजीवन पर ही पृथ्वी और मानव का अस्तित्व टिका है। यही तो हर वर्ष याद दिलाता है विश्व वन्यजीव दिवस कि पृथ्वी ही हमारा घर है और आपदाओं से बचाना हमारा कर्त्तव्य।    
        
हमने अपने घर की बैठक का दरवाज़ा सड़क के किनारे तक पहुंचा दिया है। अब घर के सामने बागीचा नहीं होता है। बागीचा न होने से, न तो तो मुलायम घास होती है और न तो सुगंध देने वाली पुष्पवाटिका और न ही छाया देने वाले पेड़। हमने अपने घर की बैठक के दरवाज़े को धूल, धुंआ वाले प्रदूषण की सुरंगों से जोड़ दिया है। उस पर हम एक सफल उपभोक्तावादी की तरह खुश होते हैं कि बाज़ार में एयर प्यूरीफायर तो है, वाटर प्यूरीफायर तो है, ढेर सारी दवाएं तो हैं। दरअसल हम उपभोक्तावादी नहीं हुए हैं बल्कि बाज़ार ने हमारी सोच को प्रकृति और पर्यावरण से दूर करके अपना गुलाम बना लिया है। यह बात कहने, सुनने, पढ़ने में कटु है, मगर सच है शतप्रतिशत। कभी-कभी ऐसा लगता है कि हम में से अधिकांश को पर्यावरण पर चर्चा करना जितना रोचक लगता है, उस पर अमल करना उतना ही ग़ैरजरूरी लगता है।

“तुम बादलों को रोकना
और पूछना-
कहां से आए तुम?
वह कहेगा- समुद्र से।
तुम समुद्र से पूछना-
कहां से मिला तुम्हें जल?
वह कहेगा-
नदियों से।
नदियों से पूछना-
कहां से मिला उन्हें पानी?
वह कहेंगी-
भूमिगत स्रोतों से।
भूमिगत स्रोतों से पूछना-
कैसे संजोकर रखा तुमने जल?
वे कहेंगे-
हमने नहीं, उन पेड़ों और वृक्षों की जड़ों ने
जिन्होंने रोक कर भूमि का क्षरण
हमें आकार दिया 
ताकि हम संजो सकें पानी नदियों के लिए।
अब समझे? 
कि क्यों कहता है समुद्र-
बचाना चाहते हो इस पृथ्वी को
तो पहले बचाओ पेड़ों को,
पेड़ रहेंगे तो रहेगी पृथ्वी भी।”

    - यह कविता मैंने सन् 2016 में लिखी थी विशेषरूप से ‘‘साहित्य, पृथ्वी और पर्यावरण’’ विषय पर आधारित एक कंवेन्शन में व्याख्यान देते समय बोलने के लिए। यह आयोजन लखनऊ (उ.प्र.) में एक एनजियो द्वारा आयोजित किया गया था। स्कूली छात्रों से ले कर पर्यावरणविदों तक ने उसमें भाग लिया था। मैंने प्रथम सत्र में अपने व्याख्यान के साथ अपनी इस कविता को सुनाया था। लोगों ने बेहद पसंद किया था इसे। लेकिन मैं नहीं जानती कि कितने लोगों ने इसके संदेश पर अमल किया।  
  
अपनी इस कविता का उल्लेख मैंने इसलिए किया क्योंकि यह मेरे दिल-दिमाग में हमेशा दस्तक देती रहती है और मुझे उलाहना भी देती है। आज 03 मार्च को इस कविता ने मुझे फिर उलाहना दिया। दुनियाभर में जंगलों एवं वन्यजीवों के संरक्षण हेतु 03 मार्च को विश्व वन्यजीव दिवस मनाया जाता है। जिसकी शुरूआत 20 दिसंबर 2013 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) द्वारा 68वें सत्र में की गई थी। इसका उद्देश्य दुनिया भर में वन और वन्य जीवन के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाना है। इस दिवस को मनाने के लिए 03 मार्च का दिन इसलिए चुना गया क्योंकि 1973 में इसी दिन वन्य जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन के हस्ताक्षर किए गए थे। विश्व वन्यजीव दिवस मनाया जाना अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वन्यजीवों, विलुप्त होने वाली प्रजातियों एवं पेड़-पौधों के संरक्षण के बारे में लोगों को सजग करने का एक वैश्विक प्रयास है। पृथ्वी पर जीवन की संभावनाओं को बनाए रखने के लिए और पर्यावरण में जीव-जंतु तथा पेड़-पौधों के महत्व को पहचानते हुए एक ‘‘सभा वन्य जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन’’ यानी ‘‘साइट्स’’ (कंवेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इन इनडेंजर्ड स्पशीज़ ऑफ वाइल्ड फउना एंड फ्लोरा) की स्थापना की गई। 

विश्व वन्यजीव दिवस मनाए जाने के लिए हर वर्ष विषय निर्धारित किए जाते हैं ताकि पृथ्वी पर मनुष्य के अतिरिक्त मौजूद जीवन के किसी एक पक्ष पर ध्यान केन्द्रित कर के उसके संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए वर्ष भर कार्य किया जाए। विश्व वन्यजीव दिवस की वर्ष 2015 की थीम थी ‘‘वन्यजीव अपराध के बारे में अब गंभीर होने का समय’’, 2016 का थीम थी ‘‘वन्यजीवों का भविष्य हमारे हाथ में’’ जिसके अंतर्गत एक उप-थीम भी थी ‘‘हाथियों का भविष्य हमारे हाथों में’’। यह दुनिया भर में हाथियों के संरक्षण और सुरक्षा की दिशा में किए जा रहे कार्यों पर केन्द्रित था। वर्ष 2017 की थीम थी ‘‘युवा आवाज़ सुनो’’। इसका आशय था कि वन और वन्य जीवन के प्रति युवाओं में जागरूकता लाना तथा वन और वन्य जीवन के प्रति चिन्ता व्यक्त करने वाले युवाओं के विचारों को सम्मान देते हुए उस पर अमल करते हुए वन्यजीवन को बचाने के लिए ज़रूरी कदम उठाना। वर्ष 2018 के लिए थीम तय की गई थी ‘‘बड़ी बिल्लियां - शिकारियों के खतरे में’’। बड़ी बिल्लियां अर्थात् शेर, चीता, तेंदुआ की आफ्रिका से ले कर बर्फीले साइबेरिया तक की प्रजातियों को शिकारियों द्वारा अवैध रूप से मारे जाने से बचाना। वर्ष 2019 की थीम थी ‘‘पानी के नीचे जीवन: लोगों और ग्रह के लिए’’। वन और वन्यजीवन के लिए पानी के नीचे मौजूद जीवन किस तरह जरूरी है, इसे अकसर लोग समझ नहीं पाते हैं। हरियाले वन और नदियों या समुद्रों में मछलियों, कोरल आदि के रूप में मौजूद जीवन के पारंपरिक संबंधों को समझने के लिए इकोसिस्टम यानी पर्यावरण की प्राकृतिक व्यवस्था को समझाना जरूरी है। इसका बहुत छोटा-सा उदाहरण है जिसे हम सभी अपने बचपन से सुनते आए हैं कि समुद्र का पानी भाप बन कर ऊपर उठता है और बादल के रूप में जल की वर्षा करता है जिससे थलीय क्षेत्र के वन्यजीवन तथा सामान्य जनजीवन का जीवन चलता है। 

बढ़ते हुए औद्योगिक दबाव ने विषैली गैसों के उत्सर्जन को इतना अधिक बढ़ा दिया है कि इससे धरती की सुरक्षा छतरी यानी ओज़ोन परत में छेद हो चले हैं। ओज़ोन परत सूर्य से आने वाली विकिरणयुक्त पराबैंगनी किरणों से पृथ्वी को बचाए रखता है। लेकिन हमने अपनी भौतिक लिप्सा के कारण जहां एक ओर जंगलों को बेतहाशा काटा है वहीं, दूसरी ओर हवा, पानी और मिट्टी तक को ज़हरीला बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इसीलिए वर्ष 2020 की थीम रखी गई थी ‘‘पृथ्वी पर जीवन कायम रखना’’। दुर्भाग्यवश, वर्ष 2020 में कोरोना आपदा ने ज़मीनी प्रयासों के रास्ते में बड़ी बाधा पहुंचाई फिर भी दुनिया भर के वैज्ञानिक, पर्यावरणविद् और पर्यावरण वालेंटियर्स कोरोना आपदा से डरे बिना अपने उद्देश्य पर डटे रहे। 

प्रकृति मानव जीवन का आधार है। मनुष्य सभ्यता के विकास से ही प्रकृति पर निर्भर है और प्राकृतिक संसाधनों का  प्रयोग करता है। हाल ही के दशकों में मानव सभ्यता ने प्राकृतिक संसाधनों का बहुत अधिक दोहन शुरू कर दिया गया। बड़े-बड़े जंगलों को खत्म कर दिया गया। ऐसे ही कितने ही जीव-जंतुओं का शिकार इस हद तक किया गया कि वह विलुप्त होने की कगार में हैं और कुछ तो विलुप्त भी हो गए। प्रदूषण लगातार बढ़ता जा रहा है जिससे प्रकृति में नकारात्मक बदलाव हो रहा है और ग्लोवर वार्मिंग जैसे भयावह परिणाम देखने को मिल रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार समुद्री जीवों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है। सबसे ज्यादा दोहन समुद्री जीवों का  किया जाता है साथ ही समुद्र में ही सबसे अधिक प्रदूषण भी है। जिसका परिणाम यह है कि तटीय क्षेत्र की सैकड़ों प्रजातियां आज लुप्त होने की कगार में हैं। इसीलिए इस साल, 2021 में विश्व वन्यजीव दिवस की थीम रखी गई है-‘‘ वन और आजीविका: लोगों और ग्रह को बनाए रखना’’ (फारेस्ट एंड लीवलीहुड्स: संस्टेनिंग प्यूपिल एंड प्लेनेट)। यह थीम हमारे ग्रह के वन और वानिकी की स्थिति और इन पर निर्भर रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका के संरक्षण पर आधारित है। सरल शब्दों में कहें तो जंगल और रोज़गार इस पृथ्वी के निवासियों के लिए जिससे पृथ्वी पर जीवन बचा रहे। पृथ्वी और पृथ्वी पर जीवन की रक्षा के लिए हर प्रयास किया जाना जरूरी है आखिर हर व्यक्ति मंगल या किसी और ग्रह पर तो नहीं जा सकेगा। इसीलिए विश्व वन्यजीव दिवस हर व्यक्ति से पृथ्वी को बचाने के लिए उत्सव नहीं ईमानदार प्रयासों की मांग करता है।
                 ----------------------------------------
(दैनिक सागर दिनकर 03.03.2021 को प्रकाशित)
#शरदसिंह  #DrSharadSingh #miss_sharad #दैनिक #सागर_दिनकर #चर्चाप्लस #विश्व_वन्यजीव_दिवस
#WorldWildlifeDay

Wednesday, March 3, 2021

3 मार्च विश्व वन्यजीव दिवस पर विशेष लेख | यह दिवस उत्सव नहीं, मांग करता है ईमानदार प्रयासों की | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh

3 मार्च विश्व वन्यजीव दिवस    

यह दिवस उत्सव नहीं, मांग करता है ईमानदार प्रयासों की         
  - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह

              पिछले दो सालों में हमने दुनिया के बड़े-बड़े जंगलों को आग के हवाले होते देखा। उनके वन्य जीवन को धू-धू कर जलते देखा। ग्लेशियर्स के पिघलने और टूटने से होने वाली आपदा की धमक अपने देश के उत्तराखंड में भी सुनी। दुख है कि हम अभी भी वन और मानव जीवन के रिश्ते को अनदेखा ही किए जा रहे हैं। जबकि वन और वन्यजीवन पर ही पृथ्वी और मानव का अस्तित्व टिका है। यही तो हर वर्ष याद दिलाता है विश्व वन्यजीव दिवस कि पृथ्वी ही हमारा घर है और आपदाओं से बचाना हमारा कर्त्तव्य।    
          
हमने अपने घर की बैठक का दरवाज़ा सड़क के किनारे तक पहुंचा दिया है। अब घर के सामने बागीचा नहीं होता है। बागीचा न होने से, न तो तो मुलायम घास होती है और न तो सुगंध देने वाली पुष्पवाटिका और न ही छाया देने वाले पेड़। हमने अपने घर की बैठक के दरवाज़े को धूल, धुंआ वाले प्रदूषण की सुरंगों से जोड़ दिया है। उस पर हम एक सफल उपभोक्तावादी की तरह खुश होते हैं कि बाज़ार में एयर प्यूरीफायर तो है, वाटर प्यूरीफायर तो है, ढेर सारी दवाएं तो हैं। दरअसल हम उपभोक्तावादी नहीं हुए हैं बल्कि बाज़ार ने हमारी सोच को प्रकृति और पर्यावरण से दूर करके अपना गुलाम बना लिया है। यह बात कहने, सुनने, पढ़ने में कटु है, मगर सच है शतप्रतिशत। कभी-कभी ऐसा लगता है कि हम में से अधिकांश को पर्यावरण पर चर्चा करना जितना रोचक लगता है, उस पर अमल करना उतना ही ग़ैरजरूरी लगता है।

“तुम बादलों को रोकना
और पूछना-
कहां से आए तुम?
वह कहेगा- समुद्र से।
तुम समुद्र से पूछना-
कहां से मिला तुम्हें जल?
वह कहेगा-
नदियों से।
नदियों से पूछना-
कहां से मिला उन्हें पानी?
वह कहेंगी-
भूमिगत स्रोतों से।
भूमिगत स्रोतों से पूछना-
कैसे संजोकर रखा तुमने जल?
वे कहेंगे-
हमने नहीं, उन पेड़ों और वृक्षों की जड़ों ने
जिन्होंने रोक कर भूमि का क्षरण
हमें आकार दिया 
ताकि हम संजो सकें पानी नदियों के लिए।
अब समझे? 
कि क्यों कहता है समुद्र-
बचाना चाहते हो इस पृथ्वी को
तो पहले बचाओ पेड़ों को,
पेड़ रहेंगे तो रहेगी पृथ्वी भी।”

    - यह कविता मैंने सन् 2016 में लिखी थी विशेषरूप से ‘‘साहित्य, पृथ्वी और पर्यावरण’’ विषय पर आधारित एक कंवेन्शन में व्याख्यान देते समय बोलने के लिए। यह आयोजन लखनऊ (उ.प्र.) में एक एनजियो द्वारा आयोजित किया गया था। स्कूली छात्रों से ले कर पर्यावरणविदों तक ने उसमें भाग लिया था। मैंने प्रथम सत्र में अपने व्याख्यान के साथ अपनी इस कविता को सुनाया था। लोगों ने बेहद पसंद किया था इसे। लेकिन मैं नहीं जानती कि कितने लोगों ने इसके संदेश पर अमल किया।  
  
अपनी इस कविता का उल्लेख मैंने इसलिए किया क्योंकि यह मेरे दिल-दिमाग में हमेशा दस्तक देती रहती है और मुझे उलाहना भी देती है। आज 03 मार्च को इस कविता ने मुझे फिर उलाहना दिया। दुनियाभर में जंगलों एवं वन्यजीवों के संरक्षण हेतु 03 मार्च को विश्व वन्यजीव दिवस मनाया जाता है। जिसकी शुरूआत 20 दिसंबर 2013 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) द्वारा 68वें सत्र में की गई थी। इसका उद्देश्य दुनिया भर में वन और वन्य जीवन के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाना है। इस दिवस को मनाने के लिए 03 मार्च का दिन इसलिए चुना गया क्योंकि 1973 में इसी दिन वन्य जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन के हस्ताक्षर किए गए थे। विश्व वन्यजीव दिवस मनाया जाना अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वन्यजीवों, विलुप्त होने वाली प्रजातियों एवं पेड़-पौधों के संरक्षण के बारे में लोगों को सजग करने का एक वैश्विक प्रयास है। पृथ्वी पर जीवन की संभावनाओं को बनाए रखने के लिए और पर्यावरण में जीव-जंतु तथा पेड़-पौधों के महत्व को पहचानते हुए एक ‘‘सभा वन्य जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन’’ यानी ‘‘साइट्स’’ (कंवेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इन इनडेंजर्ड स्पशीज़ ऑफ वाइल्ड फउना एंड फ्लोरा) की स्थापना की गई। 

विश्व वन्यजीव दिवस मनाए जाने के लिए हर वर्ष विषय निर्धारित किए जाते हैं ताकि पृथ्वी पर मनुष्य के अतिरिक्त मौजूद जीवन के किसी एक पक्ष पर ध्यान केन्द्रित कर के उसके संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए वर्ष भर कार्य किया जाए। विश्व वन्यजीव दिवस की वर्ष 2015 की थीम थी ‘‘वन्यजीव अपराध के बारे में अब गंभीर होने का समय’’, 2016 का थीम थी ‘‘वन्यजीवों का भविष्य हमारे हाथ में’’ जिसके अंतर्गत एक उप-थीम भी थी ‘‘हाथियों का भविष्य हमारे हाथों में’’। यह दुनिया भर में हाथियों के संरक्षण और सुरक्षा की दिशा में किए जा रहे कार्यों पर केन्द्रित था। वर्ष 2017 की थीम थी ‘‘युवा आवाज़ सुनो’’। इसका आशय था कि वन और वन्य जीवन के प्रति युवाओं में जागरूकता लाना तथा वन और वन्य जीवन के प्रति चिन्ता व्यक्त करने वाले युवाओं के विचारों को सम्मान देते हुए उस पर अमल करते हुए वन्यजीवन को बचाने के लिए ज़रूरी कदम उठाना। वर्ष 2018 के लिए थीम तय की गई थी ‘‘बड़ी बिल्लियां - शिकारियों के खतरे में’’। बड़ी बिल्लियां अर्थात् शेर, चीता, तेंदुआ की आफ्रिका से ले कर बर्फीले साइबेरिया तक की प्रजातियों को शिकारियों द्वारा अवैध रूप से मारे जाने से बचाना। वर्ष 2019 की थीम थी ‘‘पानी के नीचे जीवन: लोगों और ग्रह के लिए’’। वन और वन्यजीवन के लिए पानी के नीचे मौजूद जीवन किस तरह जरूरी है, इसे अकसर लोग समझ नहीं पाते हैं। हरियाले वन और नदियों या समुद्रों में मछलियों, कोरल आदि के रूप में मौजूद जीवन के पारंपरिक संबंधों को समझने के लिए इकोसिस्टम यानी पर्यावरण की प्राकृतिक व्यवस्था को समझाना जरूरी है। इसका बहुत छोटा-सा उदाहरण है जिसे हम सभी अपने बचपन से सुनते आए हैं कि समुद्र का पानी भाप बन कर ऊपर उठता है और बादल के रूप में जल की वर्षा करता है जिससे थलीय क्षेत्र के वन्यजीवन तथा सामान्य जनजीवन का जीवन चलता है। 

बढ़ते हुए औद्योगिक दबाव ने विषैली गैसों के उत्सर्जन को इतना अधिक बढ़ा दिया है कि इससे धरती की सुरक्षा छतरी यानी ओज़ोन परत में छेद हो चले हैं। ओज़ोन परत सूर्य से आने वाली विकिरणयुक्त पराबैंगनी किरणों से पृथ्वी को बचाए रखता है। लेकिन हमने अपनी भौतिक लिप्सा के कारण जहां एक ओर जंगलों को बेतहाशा काटा है वहीं, दूसरी ओर हवा, पानी और मिट्टी तक को ज़हरीला बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इसीलिए वर्ष 2020 की थीम रखी गई थी ‘‘पृथ्वी पर जीवन कायम रखना’’। दुर्भाग्यवश, वर्ष 2020 में कोरोना आपदा ने ज़मीनी प्रयासों के रास्ते में बड़ी बाधा पहुंचाई फिर भी दुनिया भर के वैज्ञानिक, पर्यावरणविद् और पर्यावरण वालेंटियर्स कोरोना आपदा से डरे बिना अपने उद्देश्य पर डटे रहे। 

प्रकृति मानव जीवन का आधार है। मनुष्य सभ्यता के विकास से ही प्रकृति पर निर्भर है और प्राकृतिक संसाधनों का  प्रयोग करता है। हाल ही के दशकों में मानव सभ्यता ने प्राकृतिक संसाधनों का बहुत अधिक दोहन शुरू कर दिया गया। बड़े-बड़े जंगलों को खत्म कर दिया गया। ऐसे ही कितने ही जीव-जंतुओं का शिकार इस हद तक किया गया कि वह विलुप्त होने की कगार में हैं और कुछ तो विलुप्त भी हो गए। प्रदूषण लगातार बढ़ता जा रहा है जिससे प्रकृति में नकारात्मक बदलाव हो रहा है और ग्लोवर वार्मिंग जैसे भयावह परिणाम देखने को मिल रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार समुद्री जीवों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है। सबसे ज्यादा दोहन समुद्री जीवों का  किया जाता है साथ ही समुद्र में ही सबसे अधिक प्रदूषण भी है। जिसका परिणाम यह है कि तटीय क्षेत्र की सैकड़ों प्रजातियां आज लुप्त होने की कगार में हैं। इसीलिए इस साल, 2021 में विश्व वन्यजीव दिवस की थीम रखी गई है-‘‘ वन और आजीविका: लोगों और ग्रह को बनाए रखना’’ (फारेस्ट एंड लीवलीहुड्स: संस्टेनिंग प्यूपिल एंड प्लेनेट)। यह थीम हमारे ग्रह के वन और वानिकी की स्थिति और इन पर निर्भर रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका के संरक्षण पर आधारित है। सरल शब्दों में कहें तो जंगल और रोज़गार इस पृथ्वी के निवासियों के लिए जिससे पृथ्वी पर जीवन बचा रहे। पृथ्वी और पृथ्वी पर जीवन की रक्षा के लिए हर प्रयास किया जाना जरूरी है आखिर हर व्यक्ति मंगल या किसी और ग्रह पर तो नहीं जा सकेगा। इसीलिए विश्व वन्यजीव दिवस हर व्यक्ति से पृथ्वी को बचाने के लिए उत्सव नहीं ईमानदार प्रयासों की मांग करता है।
                 ----------------------------------------

प्रिय ब्लॉग साथियों, मेरा यह लेख आज वेब मैग्जीन "युवाप्रवर्तक" में भी प्रकाशित हुआ है। अवलोकनार्थ लिंक दे रही हूं -

हार्दिक आभार युवाप्रवर्तक 🙏

                       ----------------
#विश्व_वन्यजीव_दिवस 

Wednesday, February 24, 2021

चर्चा प्लस | स्त्री-विरोधी होता समय बनाम बलात्कार की बढ़ती दर | डाॅ शरद सिंह

चर्चा प्लस
स्त्री-विरोधी होता समय बनाम बलात्कार की बढ़ती दर
  - डाॅ शरद सिंह
   यदि किसी युवती को बलात्कारी से अपनी जान बचाने के लिए यह कहते हुए गिड़गिड़ाना पड़े कि ‘‘मेरे साथ रेप कर लो लेकिन मुझे पत्थरों से मत मारो!’’ यह स्त्री की असहाय स्थिति और अपराधी की दबंगई की सारी पराकाष्ठा पार हो जाती है और समाज, समय और कानून तब स्त्री-विरोधी कटघरे में खड़े दिखाई देते हैं। दरअसल, स्त्री-सुरक्षा के कड़े कानून लागू किए जाने के साथ ही राजनीतिक दलों, सरकारों और पुलिस में उसे लागू करने की प्रबल इच्छाशक्ति का होना भी जरूरी है। वरना समय स्त्री-विरोधी ही रहेगा।
         
दरिंदे  घूमते  हैं  टोह  लेते  भेड़ियों से
भला कैसे हों अब आबाद घर की बेटियां
बना वहशी किसी नन्ही परी को देखकर
उसे आई नहीं क्या याद घर की बेटियां

मेरी अपनी ग़ज़ल की यह पंक्तियां मुझसे पूछती हैं कि अब तक हालात क्यों नहीं बदले? जी हां, एक नन्हीं बच्ची से किए गए बलात्कार की जघन्य घटना से विचलित हो कर 20 अप्रैल 2013 को अपने ब्लाॅग पर मैंने यह कविता लिखी थी। जिसे सागर शहर में ही एक स्कूली चपरासी द्वारा नर्सरी की छात्रा से गंदी हरकत करने की घटना पर ‘‘दैनिक भास्कर’’ ने 07 दिसम्बर 2018 को प्रकाशित किया था। यानी लगभग पांच साल बाद भी हालात वही थे। वहीं, आज लगभग प्रतिदिन अख़बारों के पन्ने बलात्कार की नृशंस घटनाओं से भरे रहते हैं। मेरे इन दो शेरों को पंजाबी के प्रतिष्ठित उपन्यासकार अशोक वशिष्ठ ने अपने नवीनतम पंजाबी उपन्यास ‘‘तंदां’’ में उद्धृत किया है। जो भी व्यक्ति संवेदनशील है वह बलात्कार की बढ़ती दर से विचलित है। बलात्कार के साथ नृशंसतापूर्वक हत्या की विकृत मानसिकता भी तेजी से बढ़ती जा रही है जो चींख-चींख कर आज के समय को स्त्री-विरोधी समय ठहराती है।
             यदि किसी युवती को बलात्कारी से अपनी जान बचाने के लिए यह कहते हुए गिड़गिड़ाना पड़े कि ‘‘मेरे साथ रेप कर लो लेकिन मुझे पत्थरों से मत मारो!’’ यह स्त्री की असहाय स्थिति और अपराधी की दबंगई की सारी पराकाष्ठा पार हो जाती हैं। भोपाल के कोलार इलाके में 16 जनवरी 2021 को यह पराकाष्ठा भी पार हो गई। पीड़िता की शिकायत के अनुसार 16 जनवरी की शाम को जब वह कोलार पुलिस थाना इलाके में अपने घर के पास टहल रही थी तभी एक व्यक्ति ने उस पर हमला किया और उसे खींच कर झाड़ियों में ले गया। शिकायत के अनुसार आरोपी ने उसके साथ बलात्कार करने की कोशिश की और उसे जमीन पर पटक दिया, जिससे उसकी रीढ़ की हड्डी में चोट आई। पीड़िता ने अपनी शिकायत में कहा कि विरोध करने पर आरोपी ने उसके सिर पर पत्थरों से हमला भी किया तब उसने जान बचाने के लिए बलात्कारी से दया की भीख मांगते हुए जान बख़्शने के बदले बलात्कार कर लेने की गुहार लगाई। अंततः उसकी मदद की पुकार सुन कर एक दंपति उसे बचाने पहुंच गया और उस युवती की जान बच गई।    
               दुर्भाग्य से हालात बदल ही नहीं रहे हैं। जब मैं अपने ‘‘चर्चा प्लस’’ काॅलम की फाईल उठा कर देखती हूं तो मुझे 12 जुलाई 2017 का अपना लेख याद दिलाता है कि तत्कालीन हालात जब मैंने ‘‘चर्चा प्लस’’ में लिखा था कि -‘‘आए दिन समाचारपत्र भरे रहते हैं बेटियों के प्रताड़ित होने के समाचारों से। कभी हत्या तो कभी बलात्कार तो कभी किसी अन्य तरह का शारीरिक उत्पीड़न। उस पर बैलों के स्थान पर जुती हुई दो बेटियों की अखबारों में छपी तस्वीर ने सोचने पर विवश कर दिया है कि प्रत्येक समुदाय में धर्मध्वजा उठाए रखने वाली और संस्कृति को प्रवाहमान बनाए रखने वाली बेटियां कब तक असुरक्षित रहेंगी? आज के सामाजिक एवं सुरक्षा संबंधी समुद्र मंथन में बेटियों का शोषण रूपी विष बढ़ता जा रहा है और मानो शिव का कण्ठ उसे धारण करने के लिए छोटा पड़ता जा रहा है। क्या हम शिव के तांडव की प्रतीक्षा कर रहे हैं?’’
               हम बलात्कार के आंकड़ों का विषपान किए जा रहे हैं लेकिन वारदातें हैं कि थमने का नाम नहीं ले रही हैं। देश में महिलाओं को अपराधों और अपराधियों से बचाने के लिए यूं तो ढ़ेर सारे कानून बनाए गए हैं, लेकिन अपराध के आंकड़े शर्म से सिर झुका लेने को विवश करते हैं। आज देश में बार-बार यह प्रश्न उठता है कि बलात्कार की घटनाओं पर कैसे अंकुश लगाया जाए? महिलाओं को यौन अपराध से कैसे सुरक्षित किया जाए? नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार भारत महिलाओं के लिए अब भी सुरक्षित नहीं हो पाया है। सन् 2012 में नई दिल्ली में चलती बस में पैरामेडिकल की छात्रा से जघन्य बलात्कार और हत्या के ‘‘निर्भया कांड’’ के बाद देश में यौन हिंसा के मामले को लेकर सख्त कानून और फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए गए लेकिन महिलाओं के खिलाफ हिंसा अब भी बेरोकटोक जारी है। एनसीआरबी के मुताबिक 2018 महिलाओं ने करीब 33,356 बलात्कार के मामलों की रिपोर्ट की। एक साल पहले 2017 में बलात्कार के 32,559 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि 2016 में यह संख्या 38,947 थी।  एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों में हर साल बढ़ोतरी हो रही है। राज्यों की बात करें तो सन् 2018 में बलात्कार के मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा 5,433 मामले दर्ज हुए, दूसरे स्थान पर राजस्थान 4,335 तथा तीसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश 3,946 था।
                 दिल्ली के निर्भया कांड के बाद कानूनों में सुधार के बावजूद रेप की बढ़ती घटनाओं ने सरकार और पुलिस को कठघरे में खड़ा कर दिया है। आखिर महिलाओं के खिलाफ जघन्य मामलों पर अंकुश क्यों नहीं लग पा रहा है? बलात्कार के सरकारी आंकड़े भयावह है। एनसीआरबी के आंकड़ों में बताते हैं कि वर्ष 2019 के दौरान रोजाना औसतन 88 महिलाओं के साथ रेप की घटनाएं हुईं। यहां ध्यान रखना होगा कि ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक कारणों एवं भय के कारण बलात्कार की हर घटना थाने में दर्ज़ नहीं हो पाती है। जिसका आशय है कि वास्तविक आंकड़े इससे और अधिक हो सकते हैं। यूं भी देश में बलात्कार को महिलाओं के लिए शर्म का मामला माना जाता है और इसकी शिकार महिला को कलंकित जीवन जीने के लिए मजबूर किया जाता है। बलात्कारी इसी मानसिक व सामाजिक सोच का फायदा उठाते हैं। कई मामलों में रेप का वीडियो वायरल करने की धमकी देकर भी पीड़िताओं का मुंह बंद रखा जाता है।
               बलात्कार की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए कई कड़े कानून बनाए गए हैं लेकिन जैसाकि आए दिन होने वाली जघन्य घटनाओं से जाहिर होता है कि बलात्कारियों को किसी कानून का ख़ौफ़ नहीं है। किसी जुनूनी हैवान की तरह वे अपराध को अंजाम दे डालते हैं। बलात्कार की निरंतर बढ़ती हुई आपराधिक प्रवृत्ति का कारण सभी अपने-अपने स्तर पर ढूंढते दिखाई देते हैं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने हाथरस गैंग रेप घटना की कड़ी निंदा करते हुए बेरोजगारी को इसकी वजह करार दिया था। काटजू ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा था कि ‘‘यौनसंबंध पुरुष की सामान्य इच्छा है। लेकिन भारत जैसे परंपरावादी समाज में शादी के बाद ही कोई यौनसंबंध बना सकता है। दूसरी ओर, बेरोजगारी बढ़ने की वजह से बड़ी तादाद में युवा सही उम्र में शादी नहीं कर सकते। तो क्या रेप की घटनाएं बढ़ेंगी नहीं?’’ पूर्व जज जस्टिस मार्कंडेय काटजू का यह तर्क आसानी से गले उतरने वाला नहीं था। बेरोजगारी एक कारण हो सकती है लेकिन मुख्य कारण नहीं। विकृत आपराधिक मानसिकता ही इस तरह के अपराध के लिए जिम्मेदार ठहराई जा सकती है और इस विकृति के बढ़ने के बुनियादी तौर पर दो कारण दिखाई देते हैं- एक तो बढ़ती हुई नशे की आदत और दूसरी इंटरनेट पर मानसिक विकृत पैदा करने वाली सामग्रियों की सहज उपलब्धता।
                 बलात्कार के साथ जो सबसे खतरनाक और विकृत ट्रेंड जुड़ता जा रहा है वह है बलात्कार के बाद नृशंसतापूर्वक हत्या किया जाना। एक तो बलात्कार का अपराध ही हमारी सामाजिक व्यवस्था में किसी भी स्त्री, युवती या बच्ची के सामान्य जीवन के अधिकार छीन लेता है, उस पर जीने का अधिकार छीन लिया जाना, वह भी प्रताड़ित कर के, विकृति की घातक स्थिति को दर्शाता है।
             हमारे देश में बलात्कार गैर-जमानती अपराध है। लेकिन एक सर्वे के अनुसार ज्यादातर मामलों में सबूतों के अभाव में अपराधियों को जमानत मिल जाती है। ऐसे अपराधियों को राजनेताओं, पुलिस का संरक्षण भी मिला रहता है। न्यायाधीशों की कमी के चलते मामले सुनवाई तक पहुंच ही नहीं पाते। ज्यादातर मामलों में सबूतों के अभाव में अपराधी बहुत आसानी से छूट जाते हैं। इसके अलावा आज भी ऐसे अपराधों के बाद पीड़िता की तरफ उंगली उठती हैं, इससे अपराधियों का मनोबल बढ़ता है। दरअसल कड़े कानून लागू किए जाने के साथ ही राजनीतिक दलों, सरकारों और पुलिस में उसे लागू करने की प्रबल इच्छाशक्ति का होना भी जरूरी है। इसके साथ ही सामाजिक सोच में बदलाव भी जरूरी है यानी बलात्कारी का सामजिक बहिष्कार भी जरूरी है। जब तक बलात्कारी मानसिकता वाले व्यक्ति के मन में कानून और समाज को ले कर भय नहीं होगा तब तक हाथरस से ले कर सीधी तक और कठुआ से ले कर शहडोल तक समय स्त्री-विरोधी ही रहेगा।
   -----------------------------------
(दैनिक सागर दिनकर 24.02.2021 को प्रकाशित)
#शरदसिंह  #DrSharadSingh #miss_sharad #दैनिक #सागर_दिनकर #चर्चाप्लस #स्त्रीविरोधी #बलात्कार #समय #कानून

Tuesday, February 23, 2021

आत्मनिर्भरता का संदेश देता सागर का माटी शिल्प | लेख| डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों, 
प्रस्तुत है मेरा यह लेख, जिसे जनसंपर्क विभाग, मध्यप्रदेश शासन, सागर द्वारा अपने फेसबुक पेजों पर भी अपलोड किया गया है। 

https://www.facebook.com/556319881414962/posts/1339572243089718/

https://www.facebook.com/219261998639716/posts/860470224518887/

और, Twitter पर भी...

https://twitter.com/JansamparkMP/status/1364186917831462915?s=08

तथा,

https://twitter.com/sagarjdjs/status/1364250735039324171?s=08

लेख :

आत्मनिर्भरता का संदेश देता सागर का माटी शिल्प

   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह        

       जब मनुष्य ने आकृतियां बनाना आरंभ किया होगा तब सबसे पहले उसने मिट्टी का ही सहारा लिया होगा । खाने के उपयोग में लाए जाने वाले बर्तन, बच्चों के खिलौने,  महिलाओं के पहनने वाले आभूषण सभी वस्तुएं मिट्टी से ही बनाना शुरू किया होगा। मनुष्यों ने बुंदेलखंड में प्रागैतिहासिक काल से मनुष्यों का निवास स्थान रहा है। अनेक स्थानों से प्रागैतिहासिक कालीन खिलौने और आभूषण के अवशेष प्राप्त हुए हैं जो यह साबित करते हैं बुंदेलखंड में मिट्टी से बनाई जाने वाली कलाकृतियों की परंपरा बहुत पुरानी है। यह आत्मनिर्भरता की ओर मज़बूत क़दम है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज की  मिट्टी से अनेक कलाकृतियां बनाई जाती हैं। जिनमें कुछ सजावटी होती हैं तो कुछ बच्चों के खेलने के लिए खिलौनों के रूप में, कुछ दैनिक जीवन में उपयोग में लाए जाने वाले बर्तनों के रूप में तथा कुछ आभूषण के रूप में।


         सागर ज़िले में बच्चों के खेलने के लिए हाथी, पक्षी,  गुड्डे-गुड़िया आदि खिलौने बनाए जाते हैं। कुछ खिलौने आमतौर पर कुछ विशेष त्योहारों के समय बनाए और बेंचे जाते हैं। जैसे संक्रांति के समय मिट्टी के घोड़े और हाथी बनाए जाते हैं, जिनमें  पाहिए लगे होते हैं। इनकी सुंदरता देखते ही बनती है। इनमें लगाम और महावत सहित सुंदर चित्रकारी भी होती है।  ये हाथी, घोड़े इस प्रकार के होते हैं कि जिनमें सुतली बांधकर बच्चे आसानी से दौड़ा सकते हैं। खिलौने  के रूप में बैलगाड़ी की बनाई जाती है। इसी प्रकार बालिकाओं को घरेलू कामकाज की शिक्षा देने वाले खिलौनों में गेहूं पीसने की चक्की  बनाई जाती है। इसमें बाक़ायदे  दो पाट होते हैं।  गेहूं अथवा अनाज डालने के लिए छेद भी बना होता है। साथ ही चक्की में  मूठ फंसाने  के लिए भी छेद होता है। बच्चों के खेलने के लिए गुड्डा और गुड़िया बनाई जाती हैं जिन्हें पुतरा- पुतरियां कहते हैं।  यह पुतरा- पुतरिया  खेलने के काम आती हैं और अक्षय तृतीया के समय इनका विवाह भी रचाया जाता है, जो सामाजिक संस्कारों की शिक्षा देने का एक बेहतरीन माध्यम बनता है।  मिट्टी की इन पुतरा- पुतरियों  को सुंदर कपड़े पहनाए जाते हैं तथा हाथ से बने सुंदर ज़ेवरों से सजाया जाता है। बच्चों के खेलने के लिए है पानी भरने के लिए छोटे-छोटे घड़े, रसोई घर के बर्तन, चूल्हा आदि बनाया जाता है। आजकल आधुनिक युग में  छोटे-छोटे गैस के सिलेंडर की बनाए जाते हैं,  जिन्हें बड़ी खूबसूरती से लाल रंग से रंगा जाता है जिससे वे देखने में असली कुकिंग गैस के सिलेंडर जैसे दिखाई देते हैं।


       धार्मिक आयोजनों के  लिए मिट्टी की बनी कलाकृतियां बनाई जाती हैं।  दीपावली के दिए तो सर्वविदित है और यह लगभग सभी जगह बनाए जाते हैं किंतु कुछ कलाकृतियां ऐसी हैं जो देवी-देवताओं की हैं और जिनका संबंध बुंदेलखंड से ही है। जैसे  महालक्ष्मी की पूजा के लिए महालक्ष्मी की प्रतिमा बनाई जाती है। यह प्रतिमा गज पर सवार महालक्ष्मी की होती है। इसकी विशेषता यह होती है कि इसे पूर्ण पकाया नहीं जाता है अर्थात  इसमें कच्चा रहता है किंतु इसकी साज-सज्जा बहुत ही सुंदर ढंग से की जाती है।  चटक रंग का प्रयोग करते हुए साड़ी, कपड़े और सोने के रंग के आभूषण उकेरे जाते हैं।  हाथी को भी सजाया जाता है। ग्वालन की मूर्तियां बनाई जाती है जो पूजा के दौरान दीप स्तंभ यानी कैंडल स्टैंड का काम भी करती हैं। इनमें पांच या पांच से अधिक दिए बनाए जाते हैं जिनमें तेल भरकर बाती लगाकर प्रज्वलित किया जाता है। देश के अन्य प्रांतों की भांति सागर ज़िले में भी  मिट्टी की गणेश प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। पूजा के उपयोग के लिए अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी बनाने में बुंदेलखंड के कलाकारों को महारत हासिल है।


        दैनिक जीवन में काम में आने वाली वस्तुओं में मिट्टी से बनाई जाने वाली अनेक वस्तुएं हैं जैसे घड़े, नांद और तसले आदि।  ये दो प्रकार के होते हैं-  लाल रंग के और काले रंग के।  लाल रंग के बर्तनों में अधिक छिद्र होते हैं और इन पर हल्की रंगों से अथवा सफेद रंग से चित्रकारी की जाती है।  वही काले रंग के बर्तन ग्लेज़्ड होते हैं।  इस प्रकार के बर्तनों का उपयोग आमतौर पर दही जमाने, भोजन पकाने, दूध-दही रखने  और अचार आदि  अधिक दिनों तक रखी जाने वाली खाद्य वस्तुओं  को रखने के लिए होता है।




          ज़िले के ग्रामीण अंचलों में मिट्टी की गुरियां बनाई जाती हैं। इन गुरियों से तरह-तरह की मालाएं बनाई जाती हैं।  आजकल इस तरह की माला तथा आभूषणों का चलन बढ़ गया है।  इनकी मांग  शहरों की दुकानों से लेकर एंपोरियम तक होती है।  ड्राइंग रूम को सजाने के लिए छोटे-छोटे घरों  की आकृतियां,  फेंगशुई में प्रचलित कछुए,  लाफिंग बुद्धा,  विंड चाइम्स, लैंपशेड आदि अनेक  वस्तुएं यहां के कलाकार बनाते हैं।  यह आमतौर पर बाजार हाट में अपनी छोटी-छोटी दुकानें लगाकर बेचते हैं।   मेलों में भी  इस प्रकार की वस्तुएं बेची जाती हैं।  सागर ज़िले का माटी शिल्प बुंदेली कला-संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है और सागर ज़िले को आत्मनिर्भर बनने में अपना योगदान देता है।

(माटीशिल्प की सभी फोटो : डॉ शरद सिंह)

              --------------------------------

------------------------------------

सागर, मध्यप्रदेश

#बुंदेलखंड #माटीशिल्प #आत्मनिर्भर  

#आत्मनिर्भरता