Wednesday, July 19, 2023

चर्चा प्लस | गागर में सागर है सागर का नाट्य संसार -2 | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
गागर में सागर है सागर का नाट्य संसार
                - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह  
 (दूसरा भाग)
सागर के यशस्वी नाट्य संसार के संबंध में चर्चा के प्रथम खंड में आपने पढ़ा यहां की तीन नाट्य संस्थाओं के बारे में - प्रयोग, अन्वेषण थिएटर ग्रुप तथा तथागत नाट्य संस्था। इनमें प्रयोग एवं अन्वेषण थिएटर ग्रुप को शहर की बुनियादी संस्था का दर्ज़ा दिया जा सकता है। इन संस्थाओं से जुड़े रहे व्यक्तित्व आज भी इस शहर को ख्याति दिला रहे हैं। जहां एक ओर गोविन्द नामदेव, मुकेश तिवारी, आशुतोष राणा आदि बाॅलीवुड में स्थापना पा चुके हैं, वहीं रघु ठाकुर आज गांधीवादी चिंतक के रूप में सुपरिचित व्यक्तित्व हैं। उमाकांत मिश्र आज शहर में ‘‘श्यामलम’’ नामक संस्था के द्वारा साहित्य, संस्कृति एवं कला के विकास की अलख जगाए हुए हैं। शहर की नाट्य संस्थाओं के क्रम में पढ़िए कुछ और सक्रिय नाट्य संस्थाओं के बारे में।
इस लेख के प्रथम भाग के प्रकाशन के उपरांत मेरे व्हाट्सएप्प पर एक आपत्ति मेरे पास आई जिसमें कुछ तथ्यों के छूटने एवं त्रुटिपूर्ण होने के प्रति विरोध जताया गया था। किन्तु दुख है कि आपत्तिकर्ता ने वास्तविक तथ्यों से मुझे अवगत नहीं कराया।    वैसे मुझे प्रसन्नता हुई कि आपत्तिकर्ता ने मेरे लेख को ध्यानपूर्वक पढ़ा। यदि वे वास्तविक तथ्यों को मुझसे साझा करते तो मुझे और भी अधिक प्रसन्नता होती। कमियां हर लेख में होती हैं, उन्हें दूर करने में मदद करना एक उत्तम कार्य है। जैसा कि साहित्यकार डाॅ. अशोक मनवानी ने मेरे लेख को पढ़ कर सौजन्यतापूर्वक मुझे कई जानकारियां मेरे फेसबुक पर दीं, जिनमें कई तथ्य मुझे पहले ज्ञात नहीं हो सके थे। मैं डाॅ. अशोक मनवानी की आभारी हूं तथा उनके द्वारा प्रदत्त जानकारी साभार यहां शामिल कर रही हूं। उन्होंने अपनी तीन टिप्पणियों में क्रमशः लिखा कि -
प्रथम टिप्पणी - ‘‘श्री विवेक दत्त झा , प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति और पुरातत्व विभाग में प्रोफेसर थे। रंगमंच से जुड़े रहे। आजाद विद्यार्थी सांस्कृतिक संगठन ने 1981 में पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज के सभाकक्ष में प्रेमचंद जी लिखित आहुति का मंचन किया इसमें जगदीश सोनी कमलेश पाराशर ,श्यामाकांत दुबे की भूमिका थी। मैंने भी स्वतंत्रता सेनानी की भूमिका की थी। गोपालगंज में गुप्ता जी कोरियोग्राफी और नाटक अभिनय सिखाते थे, वे निर्देशन भी करते थे।’’
द्वितीय टिप्पणी -‘‘वर्ष 1967 में विश्व विद्यालय ऑडिटोरियम में एक सिंधी भाषा का नाटक हुआ। ‘‘एस्क्यूज मी मिस्टर बाल्मीकि’’ इसका निर्देशन मेरे पिता प्रोफेसर एस एन मनवानी ने किया था। इस नाटक में श्री अमोल सिंह पिंजवानी, प्रताप फुलवानी सेवकराम आदि ने भूमिका की। एडवोकेट चंद्र या चंदू भाई (शास्त्री मार्केट में इनका ऑफिस था कुछ साल पहले तक) इसमें एक किरदार थे।’’
तृतीय टिप्पणी -‘‘संभागीय उत्सव प्रारंभ हुए तो बीवी कारंत जी 1982 या 1983 में चर्चित नाटक ‘‘इंसाफ का घेरा’’ बुंदेली में लेकर आए ,जो काकेशियन चाक सर्किल का अनुवाद था। सागर के स्टेडियम के मंच पर इसकी प्रस्तुति हुई। दर्शक कम थे हालांकि। सागर के तीन स्थानीय कलाकार भी लिए गए जिनमें मैं भी एक था। संस्कृति विभाग ने इसी मौके पर एमएलबी विद्यालय के मंच पर कुमार गंधर्व जी का शास्त्रीय गायन भी संभागीय उत्सव के अंतर्गत रखा था। रश्मि वाजपेयी जी का नृत्य भी।’’

इसी प्रकार कवि एवं राजनीतिज्ञ डाॅ आशीष ज्योतिषी ने भी फेसबुक पर मेरे लेख के तारतम्य में दो टिप्पणियों के रूप में मुझे महत्वपूर्ण जानकारी दी कि -
प्रथम टिप्पणी - ‘‘मैंने अथग और सागर विश्वविद्यालय में अनेक नाटक किए है, जिनमे कोर्ट मार्शल, अंधायुग, मुख्यमंत्री, कंजूस, धुआँ में किरदार निभाए, नुककड़ नाटक किए।’’
द्वितीय टिप्पणी - ‘‘पं ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी सागर के रंगमंच का पहला नाम है जिन्होंने अंतिम ओज, अजेय भारत, इंकलाब की आवाज, नारद निर्वाण, जय भारत माता जैसे नाटकों की रचना की। बल्कि आजादी के पूर्व अजेय भारत और अंतिम ओज का मंचन किया और निर्देशन किया। उस दौर मै महिला पात्र भी पुरुष किया करते थे। दुर्गा नाई महिला किरदार निभाते थे।’’

मैं आभारी हूं डाॅ आशीष ज्योतिषी की जिन्होंने जानकारी दे कर मेरे ज्ञान में वृद्धि की। निश्चित रूप से अभी भी मेरे इस पूरे लेख में अनेक तथ्य छूटे हुए होंगे क्योंकि बहुत प्रयास करने पर भी कई बार बहुत सी बातें पता नहीं चल पाती हैं जबकि मैं चाहती हूं कि सागर के नाट्य जगत की अधिक से अधिक जानकारी हर व्यक्ति तक पहुंचे। अतः लेख के इस दूसरे भाग को पढ़ते हुए यदि किसी को कुछ स्मृतियां कौंधे तो मुझसे अवश्य साझा करें।
यहां मैं यह भी स्पष्ट करना चाहूंगी कि यह लेख लिखना अथवा इस लेख की सामग्री को जुटाना किसी अर्थलाभ वाले प्रोजेक्ट के तहत नहीं है, अपितु सागर की साहित्यिक, सांस्कृतिक गरिमा को सभी की स्मृतियों से जोड़े रखने का मेरा निःस्वार्थ उपक्रम है। अतः इसमें अपने ज्ञान का सहयोग मुझे दे सकते हैं। मैं रंगमंच की व्यक्ति नहीं हूं किन्तु मुझे रंगमंच से अगाध लगाव है। थिएटर मुझे लुभाता है। मेरा सौभाग्य है कि मुझे लखनऊ, दिल्ली, जयपुर तथा भोपाल में जोहरा सहगल, नादिरा बब्बर, इब्राहिम अलकाजी, मोहन शशि जैसे प्रतिष्ठित रंगकर्मियों से मिलने तथा चर्चा करने का सुअवसर मिला। लखनऊ ललित सिंह पोखरिया जी के साथ एक नाट्यलेखन वर्कशाप में लेखकीय कार्य किया। मैंने रेडियो के लिए अनेक धारावाहिक नाटक लिखे तथा दूरदर्शन के लिए प्रहसन लिखी। मेरा लिखा नाटक ‘‘बीवी ब्यूटी क्वीन’’ का प्रसार भारती, भारत सरकार द्वारा दिल्ली, आगरा, लखनऊ, कानपुर आदि देश के पांच शहरों में मंचन किया गया था।

उल्लेखनीय है कि मेरे दो नाटक संग्रह ‘‘गदर की चिंगारियां’’ तथा ‘‘आधी दुनिया पूरी धूप’’ प्रकाशित हो चुके हैं। खैर, अपने बारे में यह सारी जानकारी देने का उद्देश्य मात्र यही है कि मैं रेडियो नाट्य लेखन, फीचर तथा डाक्यूमेंट्री स्क्रिप्ट लेखन तथा मंचीय नाटकों में गहरी दिलचस्पी रखती हूं। मेरा यही लगाव मुझे अपने शहर के रंगमंच पर कुछ न कुछ लिखने के लिए प्रेरित करता रहता है।
समय के साथ अनेक तथ्य विस्मृति की फाईल में बंधते चले जाते हैं। यदि बातें न दोहराई जाएं तो उन्हें भूलने का क्रम आरंभ हो जाता है। आज बहुत कम लोगों को पता है कि आज जिन्हें हम गांधीवादी चिंतक, समाजसेवी एवं राजनीतिज्ञ के रूप में जानते हैं, वे रघु ठाकुर जी कभी रंगमंच पर सक्रिय थे। निश्चित रूप से यह जानकारी हमें उतनी ही चौंकाती है जितनी कि यह जानकारी कि साहित्य, कला, भाषा एवं संस्कृति के उन्नयन के लिए सतत क्रियाशील श्यामलम संस्था के अध्यक्ष उमाकांत मिश्र भी संगीत वाद्य कांगो प्लेयर होने के साथ ही रंगमंच के हर स्तर से सक्रियता से जुड़े रहे हैं। स्व. प्रो. विवेकदत्त झा जिन्होंने पुरातत्व के क्षेत्र में उल्लेखनीय उत्खनन तथा अन्वेषण किए और भरतीय इतिहास के कई खोए हुए पन्ने ढूंढ निकाले, वे भी रंगकर्मी थे। प्रो. बलभद्र तिवारी ने बुंदेली लोक साहित्य पर महत्वपूर्ण कार्य किया। वे भी रंगमंच पर सक्रिय रहे।

सागर के मंचों पर भी मोहन राकेश के प्रसिद्ध नाटक ‘‘आषाढ़ का एक दिन’’ कई बार मंचित हो चुका है। यह नाटक मुझे व्यक्तिगत रूप से हमेशा रोमांचित कर देता है। इसका मेरा एक निजी कारण यह है कि इप्टा की पन्ना इकाई द्वारा पन्ना जिला मुख्यालय में मंचित किए गए ‘‘आषाढ़ का एक दिन’’ में मेरी दीदी स्व. डाॅ. वर्षा सिंह ने नाटक की नायिका मल्लिका की मां ‘‘अंबिका’’ का रोल अभिनीत किया था। अतः अब जब भी मैं इस नाटक को मंचित होते देखती हूं तो अंबिका में मैं अपनी दीदी डाॅ. वर्षा सिंह की छवि तलाशने लगती हूं। यह नाटक इसलिए भी मुझे रोमांचित करता है क्योंकि इसे देश के लगभग सभी नामचीन रंगमंच निर्देशकों ने निर्देशित किया है। इब्राहिम अलकाजी, ओम शिवपुरी, अरविंद गौड़, श्यामानंद जालान, राम गोपाल बजाज इसे अपना पसंदीदा नाटक मानते आए। इब्राहिम अलकाजी का कहना था कि -‘‘यह नाटक मानवीय भावनाओं हर पक्ष को अपनी सम्पूर्णता के साथ सामने रखता है।’’ फिल्म निर्देशक मणि कौल भी इस नाटक से प्रभावित रहे और इसीलिए उन्होंने 1971 में इस नाटक पर आधारित ‘‘आषाढ़ का एक दिन’’ नाम से फिल्म बनाई, जिसे वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का ‘‘फिल्म फेयर पुरस्कार’’ दिया गया। इसमें कालिदास की भूमिका अरुण खोपकर ने तथा मल्लिका की भूमिका रेखा सबनीस ने निभाई थी।
ऐसे प्रतिष्ठित नाटकों को सागर के रंगमंच पर अपने सीमित साधनों द्वारा सफलतापूर्वक मंचित किया जाना किसी चुनौती को पूरा कर लेने से कम नहीं है। चलिए, सागर शहर के कुछ और थिएटर ग्रुप्स पर दृष्टिपात करते हैं। यूं तो मैं अपने इस लंबे लेख को दो किस्त में ही समाप्त करने वाली थी लेकिन जानकारियों में वृद्धि तथा व्यक्तिगत जानकारी शामिल करने के कारण इसे अगली किस्त में समाप्त कर सकूंगी। तो पढ़िए इस दूसरी किस्त में कुछ और थिएटर ग्रुप्स के बारे में संक्षिप्त जानकारी। वैसे यह अगली किस्त में भी जारी रहेगी।
 
रंग थिएटर फोरम
थिएटर फोरम कलर के विभिन्न क्षेत्रों के प्रगतिशील कलाकारों का समूह है। क्षेत्र के प्रमुख हिंदी थिएटर समूह में से एक रंग थिएटर फोरम सौंदर्य वाली रूप से नवीन और सामाजिक रूप से प्रासंगिक थिएटर के लिए प्रतिबद्ध है। 2008 में इसकी स्थापना के बाद से रंग थिएटर फोरम ने रंगमंच के प्रशिक्षण के क्षेत्र में अद्भुत कार्य करते हुए देश के अनेक हिस्सों में कार्यशाला का आयोजन किया है जिसमें देश-विदेश के अनेक जाने-माने विद्वानों ने प्रशिक्षण दिया है। थिएटर कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य नए कलाकारों को रंगकर्म के लिए आत्मनिर्भर बनाना है तथा  समकालीन मुद्दों और प्रचलित सामाजिक समस्याओं पर एक संवाद के निर्माण करने हेतु प्रशिक्षित करना है। रंग थिएटर फोरम ने विभिन्न सामाजिक राजनीतिक परिदृश्य के नाटकों का मंचन करते हुए क्षेत्रीय रंगमंच के दृश्य में भी खुद को स्थापित किया है। यह समूह समकालीनता के साथ मनोरंजन के बेहतरीन साधन प्रदान करते हुए हमारी समय की रूपरेखा को रेखांकित कर रहा है।

रंग थिएटर फोरम आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी जैसे प्रसिद्ध साहित्यकार एवं संस्कृतविद्  के नाटकों का भी मंचन कर चुका है। राधावल्लभ त्रिपाठी संस्कृत को आधुनिकता का संस्कार देने वाले विद्वान माने जाते हैं। उनके द्वारा लिखी गई कथा ‘‘विक्रमादित्य कथा’’ एक असाधारण कृति है। संस्कृत के महान गद्यकार महाकवि दंडी पद-लालित्य के लिए विख्यात हैं। ‘‘दशकुमार चरित’’ उनकी चर्चित कृति है। परंतु दिलचस्प बात यह है कि राधावल्लभ त्रिपाठी जी को उनकी एक और संस्कृत कृति ‘‘विक्रमादित्य कथा’’ की जीर्ण-शीर्ण पांडुलिपि हाथ लग गई। इस कृति को हिंदी में औपन्यासिक रूप देकर प्रो. त्रिपाठी ने जहां एक और मूल कृति के स्वरूप की रक्षा की है और वहीं दूसरी ओर उसे एक मार्मिक कथा के रूप में प्रस्तुत किया है। इस कृति से उस युग का नया परिदृश्य उद्घाटित होता है। नाट्य शास्त्र संस्कृत नाटक कार्यशाला 03 से 23 मार्च 2018 को विश्वविद्यालय में ‘‘विक्रमादित्य कथा’’ का मंचन रंग थिएटर फोरम द्वारा किया गया था।

फोरम द्वारा 01-15 फरवरी 2021 को प्रोडक्शन वर्कशॅाप आयोजित किया गया था जिसमें संगीत श्रीवास्तव जैसे रंगकर्मी ने आ कर प्रशिक्षण दिया था। संगीत श्रीवास्तव ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से वर्ष 2013 में रंगमंच तकनीक और परिकल्पना में विशेषज्ञता के साथ स्नातक उपाधि प्राप्त की। उसके बाद वे परिकल्पना प्रशिक्षक तथा मार्गदर्शक के रुप में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से जुड़ गए। साथ ही मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय, भारतेंदु नाट्य अकादमी, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय सिक्किम केंद्र आदि नाट्य प्रशिक्षण केंद्रों के शैक्षणिक कार्यक्रमों से भी जुड़े रहे हैं। संगीत श्रीवास्तव ने भारत और विदेश में कई प्रसिद्ध प्रस्तुति निर्माताओं के साथ एक प्रकाश परिकल्पक एवं दृश्य रचनाकार के रूप में सहयोग किया है। एक परिकल्प प्रस्तुति निर्माता और मिक्स मीडिया कलाकार के रूप में 14 देशों में 300 से अधिक प्रस्तुतियां कर चुके हैं। ऐसे रंगकर्मी का आ कर प्रशिक्षण देना सागर के युवा रंगकर्मियों के लिए विशेष अनुभव रहा।

मुझे आशा है कि मेरे लेख की इस दूसरी किस्त को पढ़ने के उपरांत विद्वतजन कुछ और जानकारियां मुझसे साझा करेंगे, जिन्हें मैं इस लेख की अगली एवं अंतिम किस्त में शामिल कर सकूंगी। संभवतः कुछ ऐसे नाट्य ग्रुप भी रहे हों जिन्होंने बहुत ही छोटे स्तर पर अथवा मात्र नुक्कड़ के रूप में नाट्य प्रदर्शन किया हो और वे मेरी जानकारी में अब तक नहीं आ सकें है तो यदि किसी को उनके बारे में जानकारी हो तो वे मुझे अवगत करा सकते हैं। अन्यथा मुझे प्राप्त जानकारी का शेष भाग मैं अपने अगले लेख में आप सबके सामने रखूंगी ही। (क्रमशः)  
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Tuesday, July 18, 2023

पुस्तक समीक्षा | प्रकृति और चेतना के तादात्म्य को व्यक्त करती काव्यांजलि | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 18.07.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई  डॉ अंजलि झा एवं डॉ गरिमा झा के काव्य संग्रह "सागर किनारे" की समीक्षा... 
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पुस्तक समीक्षा
प्रकृति और चेतना के तादात्म्य को व्यक्त करती काव्यांजलि
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - सागर किनारे
रचनाकार - डाॅ अंजलि झा, डाॅ गरिमा झा
प्रकाशक   - स्वराज प्रकाशन, 4648/1, 21, अंसारी रोड दरियागंज, नई दिल्ली-2
मूल्य       - 160/-
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    कविता साहित्यिक अभिव्यक्ति की वह विधा है जिसमें भावना प्रथम आधारभूत तत्व होता है। किसी का मिलन, किसी का विछोह या फिर रोज़मर्रा की ज़िन्दगी व्यक्ति के मन को सबसे अधिक प्रभावित करती है। व्याकुल मन को उस समय चैन मिलता है जब वह प्रकृति में अपनी पीड़ा का निदान पाता है तथा काव्य को उपचार का माध्यम बना लेता है। ‘‘सागर किनारे’’ एक काव्यांजलि कृति है। इसमें दो कवयित्रियों डाॅ. अंजलि झा तथा डाॅ. गरिमा झा ने अपनी कविताओं को सहेजा है। इसे समर्पित किया गया है पुत्र विधु और पिता प्रोफेसर विवेकदत्त झा की स्मृतियों को। इस कृति में मां और बेटी की काव्यात्मक अभिव्यक्ति का उल्लेखनीय सामंजस्य है, जो इस काव्य संग्रह की सबसे बड़ी खूबी है। मां डाॅ. अंजलि झा जो प्रोे. विवेकदत्त झा की अद्र्धांगिनी हैं और डाॅ. गरिमा झा उनकी पुत्री हैं। डाॅ. विवेकदत्त झा ने सागर विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में अपनी सेवाएं दीं। वे उच्चकोटि के पुराविद, इतिहासकार, रंगकर्मी, कुशल प्रशासक एवं साहित्य की गहरी समझ रखने वाले व्यक्ति थे। जब काव्य संग्रह ‘‘सागर किनारे’’ मेरे हाथो में आया तो मुझे यह देख कर सुूखद लगा कि डाॅ. अंजलि झा तथा डाॅ. गरिमा झा ने काव्यांजलि के रूप में अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है।

संग्रह की कविताओं में माता और पुत्री दोनों की कविताएं हैं जिन्हें अलग-अलग दो भागों में न बांटते हुए अक्रमित (रेंडम) रूप से रखा गया है। यह तथ्य स्मरण कराता है कि मां और पुत्री एक-सी होती हैं। पुत्री में मां का अंश और मां में पुत्री का व्यक्तित्व उपस्थित होता है। अतः दोनों कवयित्रियों की कविताओं को अक्रमित रूप में पढ़ते हुए भी कहीं बाधा या विचारों के स्तर का बदलाव अनुभव नहीं होता है। एक प्रवाह में पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है मानों ये सभी कविताएं किसी एक ही रचनाकार की लिखी हुई हैं। दोनों ही कवयित्रियों ने जीवन को गहराई से समझा है, प्रकृति के आनन्द को अनुभव किया है, वे आशा और निराशा की पगडंडियों से हो कर गुज़री हैं और दोनों के पास अभिव्यक्ति की उत्तम क्षमता है। वे इस बात को ले कर स्पष्ट हैं कि वे क्या कहना चाहती हैं। वे अपने अतीत में झांकती हैं, सुखद पलों का स्मरण करती हैं, दुखद पलों पर सिहरती हैं तथा वर्तमान स्थितियों एवं परिस्थितियों पर सटीक टिप्पणियां करती हैं।

संग्रह की भूमिका भी दोनों कवयित्रियों ने संयुक्त रूप से लिखी है। वे लिखती हैं कि -‘‘प्रकृति और मानव का अन्योन्याश्रित संबंध है। हम कह सकते हैं दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं । एक के बिना दूसरे की गति नहीं है। जीवनदायिनी, पालनहारिणी प्रकृति हमारी माँ -स्वरूपा है, साथ ही वो हमारी प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक भी है। कवि, कविता, मानव-जीवन और प्रकृति का संबंध परस्पर वैसा ही है जैसा कि आत्मा का परमात्मा से, सुर का ताल से । कवि अपने मन में उपजे विभिन्न भावों को अभिव्यक्त करने के लिए प्रकृति की ओर निहारता है। कविता हमारे विचारों का प्रतिबिंब है। काव्य के माध्यम से कवि जीवन व विचारों के बीच एक सेतु बाँधता है। जीवन के कहे अनकहे पहलुओं को, खट्टे-मीठे अनुभवों को, बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश को काव्य में पिरोकर, समाज को जागरूक करने, उसकी चेतना जगाने का प्रयास करता है। हमने जिन पलों को जिया, समझा, महसूस किया, उन्हें काव्य का रूप देकर इस काव्यांजलि में पिरोया है।’’

भूमिका पढ़ने के बाद जब पाठक संग्रह की तिरसठ कविताओं से हो कर गुज़रेगा तो पाएगा कि ये कविताएं काव्यांजलि ही नहीं अपितु श्रद्धांजलि एवं भावांजलि भी हैं। यद्यपि इन कविताओं में श्रद्धांजलि एवं भावांजलि व्यक्तिपरक न हो कर प्रकृति एवं चेतनापरक हैं। संग्रह की पहली कविता डाॅ. गरिमा झा की है, जिसका शीर्षक है ‘‘प्रकृति तुम’’। इस कविता में प्रकृति की सम्पूर्ण शक्तियों के प्रति कवयित्री की श्रद्धा को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है-
प्रकृति तुम विशाल, विपुल, जलधर
मैं बारिश की नन्ही बूँद
विस्तृत, उर्वर वसुंधरा तुम
मैं मुट्ठी भर धूल
तुम सागर अथाह, अपरिमित
मैं नदिया की विरल धार
मैं नश्वर, तुम अचल, अमिट, अपार
तुम पृथ्वी, जल, आकाश
तुम रौद्ररूपा, विनाशकारी,
तुम आनंनदमयी, तुम्ही जीवनदायिनी
तुम प्रकृति, तुम प्राण
मैं मनुज अज्ञानी।

डाॅ. गरिमा प्रकृति के अहम तत्व ऋतुओं पर भी चिंतन करती हैं और जीवन पर उनके प्रभाव को सरलतापूर्वक व्यक्त करती हैं अपनी कविता ‘‘नन्ही बूँदें’’ में-
नन्ही बूँदों ने कर दी देखो
कैसी हँसी ठिठोली
खेल गईं आँगन में आज हमारे होली,
पुलकित पुष्पों ने खाए हिचकोले
लचीली लताएँ झूम रहीं हौले-हौले
नीली छतरी, पीली बरसाती
चहुं ओर इतराती, रंग-बिरंगी
किश्ती की कतार
हुल्लड़ी बालक को लुभाती।

जहां ‘हुल्लड़ी बालकों’ के रूप में जीवन के उल्लास को सामने रखा गया है वहीं, अवसाद के रंग को भी उसके पूरे शेड्स के साथ ‘‘निशान’’ कविता में डाॅ. गरिमा ने बखूबी शब्दांकित किया है-
शाख से पत्ते झड़ जाते हैं
खिलकर गुल मुस्काते हैं
दिन उगकर ढल जाते हैं
मौसम आते-जाते हैं ।
फिर क्यों कुछ पल कुछ लम्हे रुक जाते हैं?
वो गम जो सह नहीं पाते
वो दर्द जो दिल की सतह पर जम जाते हैं
कुछ बातें, कुछ यादें
भीगी पलकों पर ओस-से ठहर जाते हैं।

जो भावप्रवणता डाॅ. गरिमा की कविताओं में परिलक्षित होती हैं, ठीक वही संवेदनात्मक गहराई डाॅ. अंजलि की कविताओं में भी उपस्थित है। उनकी कविताओं में जीवन की नमी और शुष्कता दोनों मुखर हैं। ‘‘चाहती थी लिखना’’ कविता में डाॅ. अंजलि ने जीवन और मन की उलझन को बड़े सुंदर शब्दों में व्यक्त किया है-
चाहती थी लिखना/लिख न पाई कभी
विचार आते रहे-जाते रहे/भाव उमड़ते-घुमड़ते रहे
द्वंद्व-प्रतिद्वंद्व चलता रहा/इसी उलझन में
मन उलझा रहा/विचार आये तो/शब्द नहीं मिले,
शब्द मिले तो/भाव गुम/इसी कश्मकश में
दिन गुजरते गए/मेज पर रखी लेखनी
राह तकती रही/काश कि मैं हाथों में
कागज-कलम/थाम लेती।

डाॅ अंजलि वेदना के उस आयाम की याद दिलाती हैं जिसका सामना हर व्यक्ति को कभी न कभी, किसी न किसी रूप में करना पड़ता है, एक शाश्वत सत्य की तरह। ‘‘मुंडेर’’ कविता की पंक्तियां देखिए-
साल दर साल बीते
कहाँ से कहाँ /आ गये हम,
और यादें हैं कि
आज भी उसी मुंडेर /पर बैठी
न जाने किस ऊर्जा से
सिंचित, पोषित, किस झूठी
आस की डोर से बँधी,
अविचल, अनवरत, अथक,
अविराम, अपलक, उस पथ को
निहारती, जिसका पथिक
लौटकर कभी आता नहीं।
संग्रह में डाॅ. अंजलि की कविताओं में एक कविता है ‘‘माॅर्निंग वाॅक’’ जिसमें उन्होंने प्रातः के सुरम्य वातावरण को भी मोबाईल फोन की भेंट चढ़ते देख कर कटाक्ष किया है तथा एक अन्य कविता है ‘‘आपाधापी’’ जो नैराश्य गढ़ती हुई प्रतीत होती हुई भी सत्य का अवगाहन करती है और मन को गहरे तक छूती है। पंक्तियां देखिए-
चाहतें अब बुढ़ाने
लगीं हैं, जिंदगी की आपाधापी में,
दायित्वों के निर्वहन में
चुनौतियों से
जूझती, संघर्ष करती
थक के चूर आ पहुँची हैं
उस मकाम पर,
जहाँ अर्थहीन है,
उनका पूरा होना न होना।

‘‘सागर किनारे’’ स्मृतियों एवं अनुभवों के सागर तट पर खड़े हो कर अंतर्मन को टटोलते हुए, प्रकृति में भावनाओं को अनुभव करते हुए लिखी गई कविताएं हैं। वस्तुतः यह कृति प्रकृति एवं चेतना के तादात्म्य को व्यक्ति करती काव्यांजलि है। इन कविताओं की भाषा सरज, सहज है तथा इनमें भरपूर सम्प्रेषणीयता है। इस संग्रह की कविताओं को पढ़ना निश्चित रूप से एक विशिष्ट अनुभूति देगा।
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Sunday, July 16, 2023

Article | Why Should We Think About Our Earth? | Dr (Ms) Sharad Singh | Central Chronicle


Article
Why Should We Think About Our Earth?
       -    Dr (Ms) Sharad Singh
Writer, Author & Social Activist
Blogger - "Climate Diary Of Dr (Ms) Sharad Singh"

     I asked one of my acquaintances, do you ever think about the earth? So he said what to think about the earth? This is very good. Then he started saying that I keep worrying whether I will get increment this time or not? I have also applied for house loan. If the loan section is not done, then my dream of building a house will not be fulfilled in this budget session. He was also objects that look, how much wrong presentation has been done in that movie. If there is opposition to that movie, then that opposition is correct. Actually we keep worrying about so many such things, but we find it unnecessary to think about our planet, our earth, whereas today it is necessary to think about the earth first. We will exist only when the earth remains habitable.


"We all know about the increasing pollution and deforestation. Deforestation means cutting down trees, which is very nicely explained in the book. We can use clothes bags instead of plastic bags. But it is possible when we take it seriously. The book is written in an informative but easy way. It is a nice book to read because this book will guide us to solve this global problem." These words are not mine, these words are only 11 year old school girl Tanishi  Sharma. Yes in that time she was 11 year old, when I requested her to write a comment for my book's blurb. Actually, when I was completed my book "Climate Change: We can slow the speed", I was decided that for my book blurbs I will written by school age children because our earth and earth's future depends on new generation's hands.
Second two young students Kavya Katare and Aaradhya Karma were 14 years old in that time. Look, what was written young girl Kavya Katare, "I always used to wonder what happened to our society. Why are we cutting the life of humans with our hands? Will we ever be able to get our healthy earth back again or will it be destroyed soon? But this book gave me each and every answer. This book has kept a challenge in front of us. Now it is our turn. Just say CHALLENGE ACCEPTED!"
And, the boy Aaradhya Karma wrote that, "We all have to accept this bitter truth that our steps to the so-called “Modernization” are continuously affecting Mother Earth. This book ‘Climate Change: We Can Slow The Speed" will encourage everyone to move toward conserving Nature. I think this is the kind of book that should be on everyone’s bookshelf."

    Forth student, 17 year old Urja Aklecha wrote very intellectually that, "I'm afraid that in future, even if we are willing to hold hands with our mother earth, she will refuse, or more likely, is too bedridden to do so... This book is an alarm for us to wake up now, or else this planet will sleep for eternity."

    Believe, I swear! I am not doing promotion my book. I am trying to express the fact that our younger are think about earth, more than us. I was surprised to read all four comments. Those four students had clear thought on climate change. They are aware about the serious condition of environment and climate. They not only thinking, they try to make better their little efforts. While we adults usually talk only about the irregularity of the weather but not about their causes. We discuss and fume over the propaganda of films for hours.
We have no planet B. We would not be alive if it weren't for the earth. Humans gain enormously from the earth's health benefits. Our planet is definitely a priceless gift from God. It is the principal source of all essential nutrients for all living things on the planet. The most vital thing that earth provides for survival is oxygen. Earth controls the complete cycle of breathing of all living beings. The oxygen we breathe comes from trees, and the carbon dioxide we exhale is absorbed by them. Earth provides everything we need, including the food we eat, the clothes we wear, and the home we live in. earth is known as 'Mother earth,' because, like our mother, she is always nursing us and providing for all of our needs. The United Nations suggests climate change is not just the defining issue of our time, but we are also at a defining moment in history. Weather patterns are changing and will threaten food production, and sea levels are rising and could cause catastrophic flooding across the globe. Countries must make drastic actions to avoid a future with irreversible damage to major ecosystems and planetary climate.

Taking care of Earth is not just a responsibility, it's a necessity. This is not too early to say that we have not enough time to rescue the earth. Scientists have different estimations of when they believe that Earth will no longer be habitable if humans continue down the path we’re on. However, humans, animals and ecosystems around the globe are already experiencing the negative effects of climate change. Pollution is a big hurdle on the way of healthy climate. Biological and electronic wastes contribute to water and land contamination as well. Another big issue that has led to environmental degradation is deforestation. When forests are removed, the newly accessible land is used to construct residential and industrial districts. We lose the ecological benefits that trees provide when we lose forest cover. So we should try to reduce every type of pollution.
Saving our earth and its environment becomes highly important as it provide us food and water to sustain life. Our well-being solely depends on this planet it gives food and water to all living things to it is our responsibility to take care of it.

I asked one of my acquaintances, do you ever think about the earth? So he said what to think about the earth? This is very good. Then he started saying that I keep worrying whether I will get increment this time or not? I have also applied for house loan. If the loan section is not done, then my dream of building a house will not be fulfilled in this budget session. He was also objects that look, how much wrong presentation has been done in that movie. If there is opposition to that movie, then that opposition is correct. Actually we keep worrying about so many such things, but we find it unnecessary to think about our planet, our earth, whereas today it is necessary to think about the earth first. We will exist only when the earth remains habitable. So once again think why we should think about our earth? The short answer is that we don't have any Planet B. It is the only earth where we are living and where we will live.
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(16.07.2023)
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Thursday, July 13, 2023

बतकाव बिन्ना की | "सो, भैयाजी ने बताओ मूत्रालय को विकासक्रम | डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम | बुंदेली व्यंग्य | प्रवीण प्रभात

"सो, भैयाजी ने बताओ मूत्रालय को विकासक्रम" - मित्रो, ये है मेरा बुंदेली कॉलम "बतकाव बिन्ना की" साप्ताहिक #प्रवीणप्रभात , छतरपुर में।
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बतकाव बिन्ना की  
सो, भैयाजी ने बताओ मूत्रालय को विकासक्रम          
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
         कुल्ल दिना से भैयाजी से बतकाव ने करी हती सो मन ऊंसई सो हो रओ हतो। काय से के भैयाजी से तनक नांय की-तनक मांय की बतकाव कर लेओ जो जी हल्को हो जात आए। सो, मैंने अपने घरे तारो डारो औ कढ़ चली भैयाजी के इते।
‘‘आओ बिन्ना, लिखा-पढ़ी में भौतई बिजी रई कां, जो अपने भैयाजी की याद ने आई?’’ भैयाजी ने मोए देखतई साथ बोले।
‘‘सो, आपको कोन सी मोरी याद आई? जो याद आई रई होती सो आ के हालचाल पूछते।’’ मैंने सोई भैयाजी खों सुना दई।
‘‘तुमाओ हाल सो मनो सोशल मीडिया से पतो चलत रैत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘काय? का मैंने कभऊं जे शेयर करी का, के मोरो हाल ठीक आए, के मोरो हाल ठीक नईयां?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘नईं, का आए के जो तुम इते-उते फिरत की अपनी फोटू-मोटू डारत रैत आओ सो समझ में आ जात आए कि हमाई बिन्ना ठीक-ठाक आएं, घूम-फिर रईं आएं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ, जरूर! जो कछू दिखात आए, ओके पांछू की सोई कछू पता कर लेओ करे। अब सोशल मीडिया की सो जे ठैरी के जो नाचत-गात की फोटू कोनऊं डारे सो नुक्कड़ नाटक घांई भीड़ आ जात आए, मनो जो कऊं कोनऊं गंभीर टाॅपिक की पोस्ट होय सो सबरे डरात फिरत आएं के ईको लाईक करो जाय के ने करो जाए? मोय कैने को मतलब जे के सोशल मीडिया दिखात को सोशल आए। चार घर के आगे को हाल ने पूछो औ हजार मील पै बैठी को लाड़ लड़ा रए।’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘तुमाओ का मतलब?’’ भैयाजी तनक चैंकत भए पूछ बैठे।
‘‘मैं सोई आपके सोशल मीडिया में ताक-झांक करत रैत आओं। मोय पतो आए के आपकी फ्रेंडलिस्ट में बा मैक्सिको की लूसियाना सोई आए। अब आपसे मैक्सिकन तो बनत नइयां, अंग्रेजी सोई आपकी कामचलाऊ आए, सो ऊसे चैट-मैट कैसे करत हो आप?’’ मैंने तनक चुटकी लई भैयाजी की।
‘‘हम काय को चैट-मैट करबी? तुम औ। बा तो ऊकी फ्रेंडरिक्वेस्ट आई रई, सो हमने सोची के एकाध बिदेसन हमाई फ्रेंड हुइए सो अपनी तनक सब पे धाक जम जेहे। चलो खैर, छोड़ो जे सब। तुम सोई कां की कां ले बैठती आओ।’’ भैयाजी खिजियात भए बोले।
‘‘आपई ने छेड़ी जे बात। जो आप मोरो हाल पता करबे आ गए होते सो इत्ती बात ने होती।’’ मैंने भैयाजी की टांग खिंचाई करई डारी।
‘‘अब का कहें, हम सो दो-चार दिनां से बड़ी सोच-फिकर में परे आएं।’’ भैयाजी बात बदलत भए बोले।
‘‘काय की सोच-फिकर?’’ मैंने पूछी।
‘‘जेई के जे मानुस की हमाई जिनगी ज्यादा दिनां की नोईं। देखियो एक दिनां अपन ओरें अमीबा बन जेहें।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अमीबा?’’ भैयाजी की बात सुन के मोरी मुण्डी चकरा गई। मैंने पूछी,‘‘अब जे अमीबा को आ?’’
‘‘तुमें नईं पता अमीबा? काय तुमने सो सोई हायर सेकेंड्री लों जूलाॅजी पढ़ी रई। औ जे सो जरनल नाॅलेज की बात आए के अमीबा एक कोशीय प्राणी होत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘बा अमीबा? बा प्राणी की बात कर रए आप? बा तो माइक्रोस्कोप से दिखात आए, ऐसे सो दिखतई नइयां। सो अपन ओरें इत्ते बड़े हो के अमीबा कैसे बन जेहें?’’ मोय कछू समझ ने परी।
‘‘बो का आए बिन्ना के अपन इंसानों में कई जने जानवर बने जा रए। अब देखों अपनो विकासवाद जेई कैत आए के पैले एक कोशीय जीव बने, ऊके बाद मछरिया, मेंढक, फेर पंछी, बंदरा। औ, बंदरा से पूंछ घिसा के अपन इंसान हरें बन गए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ तो? ईसे का?’’ मैंने पूछी।
ईसे जे के अबकी बेरा बिकास को क्रम उल्टो चलन लगो आए।’’ भैयाजी ने कई।
‘‘बो कैसे?’’ मैंने पूछी।
‘‘अब तुम देख तो रई आओ, के कोनऊं सुनहा कुत्ता घांई, मने जंगली कुत्ता घांई कोऊं अकेले जने खों घेर-घार के कूटन लगत आए। मनो सुनहा कुत्ता हरें सो खाबे के लाने ऐसो करत आएं, पर जे आजकाल दिखाबे के लाने ऐसो हो रओ। चार ने मिल के एक जने को कूटो और पांचवें ने मोबाईल पे वीडियो बना लई। फेर कर दई वायरल। लेन लगे सबरे मजा। अब जे सुनहा कुत्ता घांई काम नई भओ सो का भओ? बे ओरें कम से कम वीडियो सो नईं बनात आएं।’’ भैयाजी बोले।
‘‘हऔ भैयाजी, कै सो आप सांची रै हो। कछू सुनहा कुत्ता बन रए, सो कछू गली-मोहल्ला के कुत्ता घांई कर रए, के जां जी करो सेा टांग उठाई औ मूत दओ! अब जो का आए?’’ मैंने सोई कई।
‘‘जेई सो हम कै रए बिन्ना! के इंसान जानवर बनो जा रओ। मनो विकास को क्रम उल्टो भओ जा रओ। अब पैलऊं कछू जने कुत्ता बने जा रए। ईके बाद कछू मेंढक औ मगरमच्छ बन्ने लगहें। औ ईके बाद कोनऊं दिनां देखियो अमीबा लों पौंच जेहे।’’ भैयाजी बोले।
‘‘पौंचई जाने चाइए, भैयाजी! काय से एक जने मानो कोनऊं नशा में कुत्ता घांई मूत मारो, सो ऊके ऊपरे केस कर कुरा के मामलो खतम हो सकत्तो। अब वोई पे राजनीति होन लगी के बो को हतो जीपे मूतो गओ? औ बो को हतो जीके पैर धोए अपने मुख्यमंत्री जी ने? मनो चलो जे बी अपन छोड़ देबें, सो ओई में चैन नईयां! जेई पे बहस हो रई के जे मूतबे वारी घटना कोन के जमाने की आए? अब की, के तब की? गजबई हो रओ भैयाजी!’’ मैंने भैयाजी से कई।
‘‘गजब सो तुम सोई कर रईं, के बेर-बेर मूतबो शब्द बोल रईं, अरे पढ़ी-लिखी घांई यूरिन बोलो। जेई मीडिया बोल रओ, जेई सबरे बोल रए। जे जो तुम बोल रईं का अच्छो लगत आए?’’ भैयाजी ने यूरिन-कांड छोड़ के मोरे बोल पकर लए।
‘‘जे बताओ भैयाजी के दोई शब्द में का फरक आए? जो देसी भाषा में बोलो सो गंदो कहा गओ औ बोई बिदेसी भाषा में बोलो सो अच्छो कहा गओ, जे कोन सी बात भई?’’ मैंने सोई बिगरत भई भैयाजी से पूछी।
‘‘अब ऐसो आए बिन्ना के पैले मूत्रालय जात्ते, गुसलखाने जात्ते, हल्को होने जात्ते, फेर बाथरूम जान लगे औ अब वाशरूम जान लगे। सो समझो के जो बोलो जा रओ होय, बोई बोलो चाइए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘भैयाजी, बो सब तो ठीक आए, मनो जे अपन ओरे का करन लगे? कां तो आप प्राणियों के विकासक्रम की बात कर रए हते और अब मूत्रालय के विकासक्रम बतान लगे।’’ कैत भई मैं हंसन लगी। काय से के मोय हंसी आई गई।
‘‘तुम सोई!’’ कैत भए भैयाजी सोई हंसन लगे।
‘‘बाकी आपकी बात सच आए भैयाजी, के चाए अपनी भाषा बदलत-बदलत एलियन की भाषा में बदल जाए, मनो जेई हाल रओ सो अपनो विकासक्रम उलटत-उलटत अमीबा लों जा पौंच जेहे। अबई जानवर पना के सबरे लच्छन दिखान लगे आएं। औ जो बचे-खुचे ठैरे बे चुनाव आत-आत जाग जेहें।’’ मैंने कई।
‘‘जेई सोच के सो हमाओ जी बैठन लगत आए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘अब आप अपनो जी ने बैठाओ। ई सब रोकबे वारो कोनऊं दिखात नईंयां। सो अपन ओरें का कर लैंहे? आप सो भाषा के विकास के बारे में सोचो, सो मन लगो रैहे औ अभई सितम्बर आओ जा रओ, सो हिन्दी पे भाषण पैलबे में काम आहे।’’ मैंने भैयाजी से कई औ घरे भीतरे भौजी के ऐंगर बढ़ लई।
काए से के मनो बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। सो, सबई जनन खों शरद बिन्ना की राम-राम!
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Wednesday, July 12, 2023

चर्चा प्लस | गागर में सागर है सागर का नाट्य संसार -1| डॉ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
गागर में सागर है सागर का नाट्य संसार
        - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह  
         सागर की भूमि साहित्य और प्रदर्शनकारी कलाओं के लिए अत्यंत उर्वर है। इस भूमि में कई नाटक रचे गए, कई नाटक मंचित हुए और कई रंगकर्मी देश की बड़ी-बड़ी नाट्य संस्थाओं एवं मिल्मी दुनिया तक पहुंचे हैं। लेकिन इस माटी का मोह उन्हें बार-बार सागर खींच लाता है। चाहे मुकेश तिवारी हों या गोविन्द नामदेव या फिर संगीत श्रीवास्तव ये सभी सागर आ कर नाट्यमंचन द्वारा अपने अतीत की स्मृतियों को ताज़ा करते हैं तथा युवा रंगकर्मियों को मार्ग दिखाते हैं। सागर में इप्टा की इकाई भी रही है जिसके अंतर्गत नुक्कड़ नाटक खेले गए। सागर भले ही एक छोटा शहर है लेकिन इसका नाट्य संसार विस्तृत है। संक्षिप्त करते हुए भी यह जानकारी दो भाग में सिमट पा रही है। तो लेख का पहला भाग प्रस्तुत है आज।
प्रथम भाग :
बुंदेलखंड का एक छोटा-सा शहर जो बड़ा बनने के लिए जी तोड़ प्रयास कर रहा है, उसका नाम है सागर। कला और संस्कृति का धनी। कुछ समय पहले मुझे सागर के नाट्य संसार को खंगालने का अवसर मिला। किसी ने इस संबंध में मुझसे कुछ जानकारी चाही थी। बस, इसी सिलसिले में मैंने सागर की उन सारी संस्थाओं का पता लगाने के लिए कमर कस ली जो नाट्यकला से जुड़ी रही हैं। कुछ पता चला, बहुत कुछ शायद अभी भी छूटा हुआ हो। बहरहाल, जो भी जानकारी मुझे मिली वह संक्षेप में इस चर्चा प्लस के रूप में दे रही हूं। इसमें मैंने अपना ध्यान उन संस्थाओं और मंचन पर केन्द्रित रखा है जो विश्वविद्यालय के परफार्मिंग आर्ट विभाग के इतर नाट्य मंचन करते रहे, भले ही विश्वविद्यालय में कार्यरत व्यक्ति उससे जुड़े हुए थे। जितना मैंने खंगाला, जितना मैंने जाना वह गर्व करने योग्य है।
सागर के समूचे नाट्य परिदृश्य को जानने के लिए अतीत में झांकने पर पता चला कि आज सागर के नाट्य कौशल को जिस नाट्य संस्था ‘‘अथग’’ के रूप में ख्याति प्राप्त है, इससे पहले एक और नाट्य संस्था यहां बड़ी मेहनत से काम कर चुकी है, जिसका नाम था ‘‘प्रयोग’’। इस संस्था के बारे में सबसे पहले साहित्य, कला और संस्कृति के लिए समर्पित श्यामलम संस्था के अध्यक्ष उमाकांत मिश्र जी ने मुझे बताया। वे स्वयं ‘‘प्रयोग’’ के नाटकों में अभिनय किया करते थे। इस संस्था से जुड़े अनिल शर्मा के बारे में उनके भतीजे जो डाॅ हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में रहे हैं, डाॅ राकेश शर्मा से मेरी चर्चा हुई। चर्चा के दौरान डाॅ राकेश शर्मा ने डाॅ विनोद दीक्षित से जानकारी लेने का सुझाव दिया। जब मैंने डाॅ विनोद दीक्षित से बात की तो उन्होंने बताया कि डाॅ. कल्पना सैनी प्रयोग संस्था की सेक्रेटरी रह चुकी हैं, अतः मुझे उनसे जानकारी लेनी चाहिए। डाॅ. कल्पना सैनी से फोन पर चर्चा के दौरान उन्होंने अपने पति योगेन्द्र सैनी से संवाद कराया। इस तरह एक दीर्घ चर्चा श्रृंखला क बाद मैं उस व्यक्ति तक जा पहुंची जिनसे मुझे महत्वपूर्ण जानकारी मिली। जी हां, डाॅ. योगेन्द्र सैनी ने मुझे संस्था के बारे में अत्यंत विस्तृत जानकारी दी।

यह पूरा सिलसिला बताने के पीछे मेरा उद्देश्य यह है कि मैंने प्रयास किया है कि सागर का समूचा नाट्य परिदृश्य इस छोटे से लेख में आ जाए किन्तु इसे लिखते समय मुझे लग रहा है कि सागर का नाट्य परिदृश्य एक महासागर है और एक लेख रूपी गागर में नहीं समाया जा सकता है। फिर भी प्रस्तुत हैं कुछ प्रमुख जानकारियां। जो नाम, संदर्भ, प्रसंग छूट रहे हैं, वे इरादतन नहीं वरन कुछ सीमावश और कुछ अज्ञानतावश छूटे हैं।
सागर के वरिष्ठ रंगकर्मी रविंद्र दुबे कक्का से प्राप्त जानकारी के अनुसार सागर में पंडित स्व.  लोकनाथ सिलाकारी द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व ‘‘दीवान हरदौल जू’’ नाम से एक नाटक लिखा गया था। पचास के दशक में लिखे गए इस नाटक का मंचन सागर के तत्कालीन रंगकर्मी लक्ष्मी नारायण सिलाकारी, सेन बंधुओं और सर्राफ आदि ने मिलकर किया था। इसी प्रकार इसी समय एक और नाटक का मंचन भी सागर स्थित राधा टॉकीज से लगकर बने एक हॉल में किया गया था, जिसमें अभिनेता और अभिनेत्री के रूप में राजा दुबे एवं रामकली मिश्रा थे। इसके बाद एक नाटक उसी दौर में प्रभात भट्टाचार्य के निर्देशन में कालीबाड़ी मंदिर परिसर गोपालगंज में मंचित किया गया था। इस तरह एक दीर्घ परंपरा जुड़ी हुई है सागर के नाटय जगत से।

प्रयोग थिएटर ग्रुप
प्राप्त जानकारी के अनुसार सागर में अन्वेषण थिएटर ग्रुप के पूर्व एक और थिएटर संस्था थी जिसका नाम था - प्रयोग थिएटर ग्रुप। इसे सुप्रसिद्ध कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान के पुत्र विजय चौहान ने स्थापित किया था। इस संबंध में हटा के लोक संस्कृतविद डाॅ श्यामसुंदर दुबे ने भी जानकारी दी। युवा उत्सव में रूसी लेखक एन्तोन चेखव की कहानी का मंचन किया था। प्रयोग संस्था के बैनर तले नाटक ‘‘अंधायुग’’ एवं ‘‘फरार फौज’’ का मंचन भी किया था। ‘‘फरार फौज’’ की प्रस्तुति में विशेष बात यह थी कि वास्तविक जीप को चलाकर मंच पर लाया गया था जो अपने आप में सागर के मंच के लिए पहली घटना थी। नाटक ‘‘फरार फौज’’ में डॉ. विजय चौहान, जितेंद्र कुमार शर्मा, सत्येंद्र कुमार तिवारी, विवेकदत्त झा, मल्लिकार्जुन, रमेश दुबे, हंसराज नामदेव, कैलाश चंद्र सिंह आदि ने भी अभिनय किया था। इसमें रमेश दुबे की भी अहम भूमिका थी।
प्रयोग थिएटर ग्रुप में सचिव रह चुकी डाॅ. कल्पना सैनी तथा उनसे भी पहले से इस ग्रुप में से संबद्ध रहे उनके पति डाॅ. योगेन्द्र सैनी से विस्तृत चर्चा में प्रयोग संस्था के बारे में अनेक महत्वपूर्ण जानकारी मिली। जैसा कि डाॅ. योगेन्द्र सैनी जी ने बताया कि आरम्भ में महिला पात्र के लिए अभिनेत्रियां नहीं मिलती थीं अतः ऐसे नाटकों का चयन किया जाता था जिसमें सिर्फ़ पुरुष पात्र हों। प्रयोग के द्वारा ‘‘अंधेर नगरी चैपटराजा’’ और ‘‘मैकबेथ’’ जैसे नाटकों का सफलतापूर्वक कई बार मंचन किया गया। उस दिनों नाटकों के लिए किसी भी प्रकार की ग्रांट की व्यवस्था नहीं थी अतः नाट्यदल अपनी क्षमता के अनुसार पैसे कंट्रीब्यूट कर के मंचन के लिए सुविधाएं जुटाता था। बाद में कुछ महिलाएं इसमें बतौर अभिनेत्री जुड़ीं जिन्हें घर पहुंचाने का जिम्मा संस्था के पुरुषों का रहता था। इस संस्था से उमाकांत मिश्र, अनिल शर्मा आदि भी जुड़े रहे। वर्तमान में श्यामलम संस्था का संचालन कर रहे उमाकांत मिश्र ने उत्पल दत्त लिखित नाटक ‘‘फरार फौज’’ का मुझे तत्कालीन ब्रोशर दिखाया कराया। यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। ‘‘फरार फौज’’ नाटक का अनुवाद किया था - महेश प्रसाद जयसवाल, नरेन्द्र सिंह, मिहिर चटर्जी तथा विवेकदत्त झा ने। इसका निर्देशन भी मिहिर चटर्जी ने किया था। इसमें बलभद्र तिवारी, रघु ठाकुर, विष्णु पाठक, विवेकदत्त झा, श्रीनाथ शर्मा एवं उमाकांत मिश्र आदि का व्यवस्था से ले कर अभिनय तक सहयोग था। यह जानना दिलचस्प लगता है कि अधिकांश लोग जिनके नाम आज विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित व्यक्तियों के रूप में जानते हैं वे भी कभी रंगमंच से जुड़े रहे।
बाद में प्रो. विजय सिंह चौहान अमेरिका चले गए और इसी तरह कई अन्य सदस्य भी अपनी-अपनी आजीविका के कारण दूसरे शहरों में चले गए। संस्था को गतिमान रखने के लिए जितने लोगों की आवश्यकता थी, वे अब नहीं थे, परिणामतः प्रयोग संस्था बंद हो गई।

अन्वेषण थिएटर ग्रुप
सागर शहर के गोविंद नामदेव का चयन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दिल्ली में हो गया था और वहां से निकलने के बाद वह वही रंग मंडल में शामिल होकर रंग कर्म करने लगे थे। उनका जब भी सागर घर आना होता था तो वह सागर में स्थानीय शौकिया रंग कर्मियों को रंगकर्म की बारीकियों से अवगत कराया करते थे। उनका यह कार्य कई युवाओं के लिए प्रेरक बना। आगे चल कर मुकेश तिवारी, आशुतोष राणा, श्रीवर्धन त्रिवेदी, महेश मेवाती भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दिल्ली में चयनित हुए और रंगकर्म की विधा में प्रवीणता प्राप्त की। मुकेश तिवारी ने वहां से अध्ययन करने के बाद सागर आकर सबसे पहले नाटक ‘‘कोर्ट मार्शल’’ का निर्देशन किया। सन 1992 में अन्वेषण थिएटर ग्रुप की नींव पड़ी। अन्वेषण थिएटर ग्रुप यानी ’’अथग’’ शौकिया रंग कर्मियों के दल के रूप में मुकेश तिवारी, पंकज तिवारी, राकेश सोनी, जगदीश शर्मा, आनंद जैन, रविंद्र दुबे कक्का के निर्देशन में अनेक नाट्य प्रस्तुति सागर सहित दमोह, जबलपुर, बालाघाट, भोपाल, दिल्ली, चंडीगढ़ आदि जगहों पर लगातार किया जाता रहा। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से प्राप्त ग्रांट से 18 कलाकारों का संपूर्ण रंगमंडल बना चुके इस थेएटर ग्रुप के गुरु हैं गोविंद नामदेव। जो बाॅलीवुड और दक्षिण भारत की व्यावसायिक फिल्मों में एक ख्यातिलब्ध नाम हैं।
यहां प्रस्तुत अन्वेषण थिएटर ग्रुप की सम्पूर्ण जानकारी ग्रुप के वरिष्ठ रंगकर्मी रविन्द्र दुबे ‘कक्का के सौजन्य से प्राप्त है। उनका यह सहयोग इस लेख की लेखिका के लिए यानी मेरे लिए अति महत्वपूर्ण रहा है। इसमें कुछ जानकारी उनके उस लेख से साभार समाहित कर रही हूं जो डाॅ. लक्ष्मी पांडेय द्वारा संपादित ‘‘ये है बुंदेलखंड (भाग-दो)’’ में प्रकाशित हुआ था। रविन्द्र दुबे ‘कक्का के लेख से मुझे ज्ञात हुआ कि बा. व. कारंत ने सन 1997 में ‘‘प्रस्तुति परक कार्यशाला’’ में बुंदेलखंड के साथ ही मध्यप्रदेश (अविभाजित) के सुदूर क्षेत्रों से आए जैसे भोपाल, इटारसी बालाघाट, दुर्ग, भिलाई के  रंग कर्मियों को प्रशिक्षित किया गया था। जयंत देशमुख द्वारा बनाए गए मुक्ताकाश मंच पर सिविल लाइन स्थित मलैया बंगला में लगातार 9 दिन तक इसकी प्रस्तुतियां की गई थी जिन्हें देखने गोविंद नामदेव के साथ मुंबई से सिने अभिनेता अनुपम खेर भी आए थे। हबीब तनवीर जी ने भी भारत भवन के रंग कर्मियों को सागर लाकर अन्वेषण थिएटर ग्रुप के साथ 10 दिवसीय 1998 में आल्हा गायन और रंग कार्यशाला की थी इसमें उन्होंने ‘‘मुद्राराक्षस’’ और ‘‘जिन लाहौर नहीं देख्या, ओ जन्माई नई’’ का पाठ और अभ्यास कराया था। इसमें प्रमुख रूप से अनूप जोशी, विभा मिश्रा, सरोज शर्मा आदि वरिष्ठ रंगकर्मी भी शामिल हुए थे। लेख पढ़ कर मुझे याद आया कि सिविल लाईन के मुक्ताकाश मंच में खेले गए ‘‘बेगम का तकिया’’ नाटक मैंने भी देखा था।
मुकेश तिवारी ने अन्वेषण थिएटर ग्रुप में प्रस्तुति पर 35 दिवसीय कार्यशाला आयोजित की थी, कि जिसके अंतर्गत 1996 में ‘‘मुख्यमंत्री’’ नामक नाटक का मंचन किया गया था। अन्वेषण थिएटर ग्रुप को भारतीय रंग महोत्सव में 2003 में प्रथम बार भाग लेने का सुअवसर प्राप्त हुआ था। इसके बाद दूसरी बार 2024 में जगदीश शर्मा निर्देशित नाटक ‘‘सुदामा के चावल’’ की प्रस्तुति भारतीय रंग महोत्सव में की गई। अन्वेषण थिएटर ग्रुप के द्वारा 1997-98 में रंग कबीर नाट्य समारोह, 1999 में तीन दिवसीय नाट्योत्सव, 2000 में पांच दिवसीय ग्रीष्मकालीन नाट्य महोत्सव, 2018 में चार दिवसीय अन्वेषण नाट्य समारोह आयोजित कर के बाहर के थिएटर ग्रुपों की प्रस्तुतियां सागर में की गई।
वीर मधुकर शाह बुंदेला के गौरवपूर्ण कार्य और उनके जीवन पर फिल्म अभिनेता गोविंद नामदेव एक नाटक लिखा -‘‘मधुकर कौ कटक’’। इसका निर्देशन भी उन्होंने किया। उनके सह निर्देशक कर थे  मुंबई से आए डायरेक्टर संतोष तिवारी। एनएसडी, अथग और सागर विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में जो एक माह की वर्कशॉप की गई, उसी के प्रशिक्षणार्थियों को अभिनय के लिए चुना गया। यद्यपि कुछ अन्य लोग भी शामिल किया गया। इस नाटक ने सागर के जनमानस में गहरी पैंठ बनाई।
अन्वेषण थिएटर ग्रुप के सदस्य रहे राकेश सोनी ने सागर हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय में सेवारत रहते हुए विश्वविद्यालय के छात्रों को लेकर रंगकर्म जारी रखा तथा अनेक बार राष्ट्रीय युवा महोत्सव में प्रथम स्थान प्राप्त किया। अन्वेषण थिएटर ग्रुप ने अनेक रंगकर्मियों को न केवल प्रशिक्षित किया अपितु मंच भी प्रदान किया। अथग ने आशीष ज्योतिषी, पंकज सिंह जार्ज, पदम सिंह, अवधेश कुशवाहा, असरार अहमद, अमजद खान, कपिल नाहर, आशुतोष तिवारी, जयशेखर परोची, राकेश शुक्ला, शिवकांत ढिमोले, अतुल श्रीवास्तव, आशीष चैबे, बृजेश शर्मा, सचिन नायक आदि को स्थापना  दी।

तथागत नाट्य संस्था
अन्वेषण थिएटर ग्रुप द्वारा गोविंद नामदेव के निर्देशन में आयोजित की गई प्रस्तुति पर कार्यशाला 2013 में नए-नए अनेक रंग कर्मियों ने भाग लिया था इसमें लगभग 55 लोगों ने प्रशिक्षण पाया था। गोविंद नामदेव की कार्यशाला से प्रशिक्षण पाकर निकले कुछ तरुण रंग कर्मियों की टोली ने अन्य ऊर्जावान साथियों को जोड़ कर एक नाट्य ग्रुप बनाया जिसका नाम रखा ‘‘तथागत नाट्य संस्था’’। इस संस्था में शुभम उपाध्याय, राहुल वर्मा, आदित्य निर्मलकर, आशीष तिवारी, अप्रतिम मिश्रा, विश्वनाथ पटेल, संजय, आशा, दीपगंगा साहू, दीक्षा साहू आदि रंगकर्मी रहे हैं। आज भी तथागत थिएटर ग्रुप समय-समय पर नाट्य मंचन करता रहता है।
सागर का नाट्य संसार खूबियों एवं कर्मठता से भरपूर है। यहां संस्थाएं बनती-मिटती रहीं लेकिन नाट्य परिदृश्य किसी न किसी नाम का बैनर लेकर सतत जारी रहा। सागर की शेष नाट्य संस्थाओं के बारे में इस लेख के दूसरे और अंतिम भाग में अगले ‘‘चर्चा प्लस’’ में चर्चा करूंगी। फिलहाल इसे पढ़िए और कल्पना कीजिए सागर के नाट्य संसार के यशस्वी अतीत के बारे में। (क्रमशः)
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#DrMissSharadSingh #चर्चाप्लस  #सागरदिनकर #डॉसुश्रीशरदसिंह #नाटक #रंगमंच #सागर #गागरमेंसागर #सागरमेंरंगमंच #play #theater  

Tuesday, July 11, 2023

पुस्तक समीक्षा | कुंजीदाऊ की शादी की 50 वीं वर्षगांठ | समीक्षक डॉ (सुश्री) शरद सिंह

व्यंग्यकार श्री आर के तिवारी के व्यंग संग्रह "कुंजीदाऊ की शादी की 50 वीं वर्षगांठ" की मेरे द्वारा की गई समीक्षा ...
हार्दिक आभार युवाप्रवर्तक ए्ंव भाई देवेंद्र सोनी जी 🙏

पुस्तक समीक्षा | बाल साहित्य को समृद्ध करतीं बाल कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

प्रस्तुत है आज 11.07.2023 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई  कवि बृंदावन राय के काव्य संग्रह "बाल कविताओं का उपवन" की समीक्षा... 
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पुस्तक समीक्षा
बाल साहित्य को समृद्ध करतीं बाल कविताएं
- समीक्षक डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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काव्य संग्रह - बाल कविताओं का उपवन
कवि       - बृंदावन राय सरल
प्रकाशक  - शाॅपीज़ेन, 201, अश्वमेघ एलीजेंस-2, अम्बावडी मुख्य बाज़ार, कल्याण ज्वेलर्स के समीप, अम्बावडी, अहमदाबाद, गुजरात -380006
मूल्य       - 227/-
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    कवि बृंदावन राय सरल एक अरसे से साहित्य सृजन के क्षेत्र में हैं। उन्होंने बड़ों के लिए दोहा, चौपाई ग़ज़ल आदि लिखे हैं। साथ ही उन्होंने बच्चों लिए भी साहित्य सृजन किया है। बच्चों के लिए लिखना आसान नहीं होता है। एक बाल साहित्यकार के लिए प्राथमिक शर्त यही होती है कि वह बाल मनोविज्ञान को समझता हो और बच्चों के अनुरुप लिखने की क्षमता रखता हो। कवि सरल ने बालसृजन को बखूबी साधा है।

वयस्क जब अपने जीवन में उलझ जाते हैं तो उनसे जाने-अनजाने बच्चों की उपेक्षा होने लगती है। ठीक यही स्थिति साहित्य के क्षेत्र में है। हिन्दी साहित्य में बाल साहित्य का अपना विशेष स्थान रहा है। लेकिन जब यथार्थवादी लेखन का दौर आया तो पराग, चंपक, चंदामामा जैसी कुछ पत्रिकाएं थीं जिन्होंने बाल साहित्य को उसके मौलिक स्वरूप में बचाए रखा तथा कई प्रसिद्ध रचनाकारों को बाल साहित्य सृजन करने के लिए प्रेरित किया। फिर भी साहित्य की मूलधारा में बाल साहित्य गौण होता चला गया। एक स्थिति तो यह भी आई कि बाल साहित्य के रचनाकारों को साहित्यकारों की श्रेणी में गिने जाने से भी परहेज किया जाने लगा। जबकि बाल साहित्य वयस्क साहित्य की नींव है। यहां वयस्क साहित्य का अर्थ ‘‘ए-क्लास’’ अथवा ‘‘मात्र वयस्कों के लिए’’ लिखे जाने वाले कामुक अथवा थ्रिलर साहित्य से नहीं है। यहां वयस्क साहित्य का अर्थ है वह साहित्य जो बालमनो श्रेणी से से ऊपर की आयु के व्यक्तियों को ध्यान में रख कर लिखा गया हो। वहीं बाल साहित्य 12-14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए लिखा जाता है। बालसाहित्य का उद्देश्य होता है कि किस्से, कहानियों, कविताओं, नाटकों आदि के माध्यम से बच्चों को शिक्षाप्रद बातें बताई जाएं। ठीक वैसे ही जैसे खेल-खेल में शिक्षा देना। इसीलिए गद्य में छोटे-छोटे सरल संवाद और कविताओं में तुकबंदी प्रधान छोटी-छोटी पंक्तियों को अपनाया जाता है। इससे बच्चे उन्हें आसानी से समझ सकते हैं, गुनगुना सकते हैं, याद रख सकते हैं। इसका सबसे श्रेष्ठ और बहुप्रचलित उदाहरण है-‘‘मछली जल की रानी है/ जीवन जिसका पानी है/हाथ लगाओ डर जाएगी/ बाहर निकालो मर जाएगी।’’ इन चार पंक्तियों में मछली के बारे में पूरी जानकारी दे दी गई है। यही सहजता, सरलता एवं उपादेयता बच्चों के लिए आवश्यक होती है।

कवि बृंदावन राय सरल के काव्यसंग्रह ‘‘बाल कविताओं का उपवन’’ बालपाठकों को ध्यान में रख कर ही लिखा गया है। इस संग्रह की भूमिका डॉ. विकास दवे ने लिखी है जो कि निदेशक, साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश शासन, भोपाल हैं। डाॅ. दवे ने संग्रह की कविताओं पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि ‘‘सभी रचनाएं एक ओर बच्चों को सृष्टि से जोड़ने का काम करेंगी वही राष्ट्रीय चेतना से जुड़े विषय बच्चों को अपने देश के सरोकारों से जोड़ने का काम करेंगे।’’
इस संग्रह की कविताओं की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि उन्होंने उन विषयों को भी अपनी कविताओं में पिरोया है जो प्रायः छूट जाती हैं। संग्रह में भाषाई सरलता और सहजता के साथ विभिन्न विषयों को काव्य के रूप में प्रस्तुत किया हैै। जैसे ‘‘घड़ी’’ शीर्षक कविता में घड़ी की महत्ता को बताया है-
टिक टिक करती घड़ी हमारी।
अब भी हमको लगती प्यारी।
पल-पल का ये समय बताती।
मर्म समय का हमें सिखाती।
भिन्न-भिन्न आकार है इसके।
भिन्न भिन्न श्रृंगार हैं इसके।
इसमें तीन मिलेंगे कांटे।
अपने-अपने काम जो बांटे।
छोटा मुख्य समय बतलाए ।
बड़ा मिनट का पता दिखाए।
इसमें एक और है कांटा।
जो सैकिंड से हमें मिलाएं।

इसी तारतम्य में एक महत्वपूर्ण कविता है-‘‘मजदूर’’। आमतौर पर बालसाहित्य में मजदूरों पर बहुत कम लिखा जाता है। मजदूरों का जीवन वर्णन बड़ों के लिए पठनीय साम्रगी माना जाता है। किन्तु कवि सरल ने मजदूरों की दशा-दिशा पर ज्ञानवर्द्धक कविता लिखी है-
गांवों में जो सड़क बनाते।
नहरों से जो खेत सजाते।
खेतों से जो फसल काटते।
गड्ढे पथ के रोज पाटते ।
रोज पार्क में पानी देते।
पत्थर पर भी जो सो लेते।
एक बार जो दिन में खाते ।
फिर भी दिन भर जो मुस्काते।
ये सब ही मजदूर कहाते।
शहर गांव को स्वच्छ बनाते।
इनसे है शहरों में रौनक ।
इनसे है कस्बों में रौनक ।
इन पर निर्भर शहरी जीवन।
इनपर निर्भर शहरी साधन।
आओ इनको गले लगाएं।
इनको अपना मित्र बनाएं

इस प्रकार की कविताएं बालमन को जहां जीवन की विविधता से जोड़ती हैं, वहीं समाज में उपेक्षित वर्ग के प्रति सहानुभूति एवं सम्मान का बीज बोने का काम करती हैं। कवि सरल ने दैनिक जीवन में स्वच्छता के महत्व को बताने के लिए ‘‘बाथरूम’’ शीर्षक से बाथरूम एवं शौचालय पर भी कविता लिखी है जो आम बालकविताओं से हट कर नूतनता की परिचायक है-
बाथरूम हो घर का सुंदर।
साफ स्वच्छ हो जिसका परिसर ।
नल बिजली की सुविधाएं हों।
शौचालय की सुविधाएं हों।
पानी की मत हों बाधाएं।
फब्बारे की हों सुविधाएं ।
बदबू हरगिज तनक न आए।
ऐसी सभी व्यवस्था पाएं।
बाथरूम हो घर का सुंदर ।
साथ स्वच्छ हो जिसका परिसर ।
खिड़की शुद्ध हवा को हो इक।
गर्म पानी का भी हो नल इक।
बाथरूम हो इतना सुंदर ।
साफ स्वच्छ हो जिसका परिसर ।

बच्चों को उनकी बाल्यावस्था से ही यातायात के नियमों से परिचित कराना, यातायात सिग्नल्स की लाल एवं हरी लाईट्स का अर्थ समझाना आवश्यक होता है, जिससे वे स्कूल के लिए अकेले जाते समय तथा बड़े हो कर यातायात नियमों का पालन करें और स्वयं को सुरक्षित रखें। ‘‘बत्ती...सिग्नल....’’ कविता यातायात के बुनियादी नियम को सरल एवं रोचक शब्दों में समझाती है-
चौराहों पर बत्ती जलती।
जिससे कारें रुकती बढ़ती।
जो इनके नियमों को तोड़े।
पुलिस से अपना नाता जोड़े।
हरी का मतलब है बढ़ जाना।
लाल का अर्थ यहां रुक जाना।
इनसे नहीं हादसा होते ।
दुख से नहीं सामना होते ।
जनहानि से हम बच जाते।
यह सब नियम अगर अपनाते ।

कवि बृंदावनराय सरल पर्यावरण और जीव-जन्तुओं के प्रति बच्चों में जागरूकता लाना चाहते हैं। उनकी कविता ‘‘सांप’’ इसी बात की द्योतक है कि सांप भी प्रकृति का अभिन्न अंग है। प्राणिजगत में उनका भी विशेष स्थान है। इस कविता में कवि ने सांपों के प्रकार तथा उनके पाए जाने वाले स्थानों को भी लक्षित किया है। इस कविता की कुछ पंक्तियां देखें-
अद्भुत अद्भुत सांप धरा पर ।
खेतों वन में रहते अक्सर।
जहरीले भी सभी न होते।
ये भी हँसते ये भी रोते।
आपस में ही इनमें अंतर ।
खेत वनों में रहते अक्सर ।
सांप कोबरा अति जहरीला ।
जिसको डसता होता नीला।
सबसे बढ़कर होता अजगर ।
ये जंगल में रहते अक्सर ।
घर में कभी कभी आ जाते।
पानी में भी इनको पाते।

  इस तरह देखा जाए तो कवि बृंदावन राय सरल की कविताओं में विषय की विविधता के साथ ही विषय के चयन में अनूठापन भी है जो उनके इस संग्रह को महत्वपूर्ण बनाती है। ऐसे समय में जब बच्चों के लिए मौलिक साहित्य कम लिखा जा रहा है,‘‘बाल कविताओं का उपवन’’ का प्रकाशित होना स्वागत योग्य है। बालोपयोगी पुस्तक के अनुरुप मुद्रण एवं साज-सज्जा आकर्षक है। कुल इक्यावन बाल कविताओं का यह संग्रह कवि के बालसृजन के प्रति आश्वस्त करता है।
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