Wednesday, October 9, 2024

चर्चा प्लस | ’आज की रात मज़ा..’ पर थिरकते बच्चियों के कदम और भयावह कल | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस 
’आज की रात मज़ा..’ पर थिरकते बच्चियों के कदम और भयावह कल 
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                            
        आज 3 से 5 पांच तक की नन्हीं बच्चियां भी सुरक्षित नहीं है। भाजपा के कद्दावर नेता पं. गोपाल भार्गव ने इस पर चिंता व्यक्त करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि ‘दुनिया के किसी भी देश में मुझे ऐसे समाचार देखने या पढ़ने को नहीं मिले।’ उनकी चिंता उचित है। लेकिन क्या उन माता-पिता को चिंता नहीं है जो ‘आज की रात मज़ा’ जैसे गानों पर अपने बच्चों को अश्लील हाव-भाव के साथ नृत्य कराते हैं और फिर उसे रील के रूप में सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं जिसे सारी दुनिया देखती है। बच्चों के साथ बढ़ती यौनहिंसा की दर को देखते हुए क्या ये सुरक्षित है?
         यौन अपराध और अपराधियों का दुस्साहस इस कदर बढ़ता जा रहा है कि देख कर अचम्भा होता है। अभी हाल ही में मध्यप्रदेश के छतरपुर में बलात्कार के एक आरोपी ने पीड़िता के घर में घुस कर उसके चाचा और उसे गोली मार दी तथा उसके रिश्तेदारों को भी घायल कर दिया। इसके बाद बड़े आराम से वहां से निकल गया। बलात्कार की पीड़िताओं को डराना, धमकाना और मौत के घाट उतार देना आम सी बात होती जा रही है। इस दूषित वातावरण में छोटी बच्चियां भी सुरक्षित नहीं रह गई हैं। आए दिन समाचारपत्रों में एक न एक समाचार किसी अवयस्क बच्ची के साथ यौनहिंसा की पढ़ने को मिल जाती है। सोच कर ही आश्चर्य होता है कि हमारा समाज अपराध के किस रास्ते पर चल पड़ा है? हम यह कह कर पल्ला नहीं झाड़ सकते हैं के यह सब टीवी, मोबाईल और इंटरनेट का दुष्परिणाम है। बच्चे उन्हें देख कर बिगड़ रहे हैं। अपराधी उन्हें देख कर अपराध करने को आतुर हो रहे हैं। किसी हद तक ये सही है किन्तु बहुत-सी जिम्मेदारी समाज, परिवार एवं माता-पिता की भी है जो सारे खतरों को जानते हुए भी आंख मूंदे हुए है। छतरपुर की ही उक्त घटना में आरोपी द्वारा पीड़िता को गोली मारे जाने के पूर्व आरोपी की मां पीड़िता के घर केस वापस लेने का दबाव बनाने के लिए गई थी। यह एक मां के पुत्रमोह का वह चरण था जिसकी तुलना धृतराष्ट्र के पुत्रमोह से की जा सकती है। फिर भी धृतराष्ट्र तो जन्मांध था किन्तु यहां आंख वाले सब कुछ देखते हुए भी आंख बंद किए रहते हैं। जाहिर है कि उस मां ने अपने बेटे के पहले छोटे-छोटे अपराधों पर पर्दा डाल कर उसे प्रोत्साहित किया होगा अन्यथा नौबत यहां तक नहीं आती। बहरहाल, यह तो हुआ अपराधी का पक्ष जो अपनी विकृत मानसिकता के कारण युवतियों को ही नहीं वरन नन्हीं अबोध बच्चियों को भी अपनी हवस का शिकार बना लेते हैं। कुछ वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश के सागर शहर में एक छोटी बच्ची सुबह पूजा के लिए फूल तोड़ने घर से निकली और एक वहशी दरिंदे का शिकार बन गई। उस वहशी ने उस बच्ची के साथ दुव्र्यवहार तो किया ही, साथ ही उसे जान से मारने का प्रयास किया। वह बच्ची महीनों तक गहरे सदमें रही। 

आज 3 से 5 पांच तक की नन्हीं बच्चियां सुरक्षित नहीं है। भाजपा के कद्दावर नेता पं. गोपाल भार्गव ने इस पर चिंता व्यक्त करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि ‘दुनिया के किसी भी देश में मुझे ऐसे समाचार देखने या पढ़ने को नहीं मिले।’ उनकी चिंता उचित है लेकिन क्या उन माता-पिता को चिंता नहीं है जो ‘आज की रात मज़ा’ जैसे गानों पर अपने बच्चों को अश्लील हाव-भाव के साथ नृत्य कराते हैं और फिर उसे रील के रूप में सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं जिसे सारी दुनिया देखती है। बच्चों के साथ बढ़ती यौनहिंसा की दर को देखते हुए क्या ये सुरक्षित है?

जब वातावरण दूषित हो, अपराधयुक्त हो तो सावधानी में ही सुरक्षा है। लेकिन सोशलमीडिया के द्वारा कमाई के नशे ने गोया माता-पिता की चेतना को भी सुला दिया है। इन दिनों बाॅलीवुड की एक फिल्म का एक गाना बेहद चर्चित है -आज की रात मज़ा इश्क़ का...’’। गाने में कोई दोष नहीं है लेकिन उस गाने पर अत्यंत मादक नृत्य किया गया है। यदि फिल्मी गाने के रूप में उस पर विचार किया जाए तो उसके नृत्य पर भी आपत्ति की जा सकती है कि उसमें नृत्य मुद्राएं शालीन तो नहीं है किन्तु वह किसी नाबालिग बच्ची पर नहीं फिल्माया गया है। उस नृत्य के कामुक हाव-भाव को जब छोटी-छोटी बच्चियां करती हुई दिखाई देती हैं तो बहुत वीभत्स लगता है तथा इस बात की चिंता होती है कि सोशल मीडिया पर डाली गई उन रील्स को सभी तरह के लोग देखते हैं। कुछ दिनों पहले शिक्षा दिवस की एक रील बहुत चर्चा में रही जिसमें एक छोटी बच्ची ने इसी गाने को शिक्षक दिवस के मंच पर प्रस्तुत किया था। हद तो ये कि उसे कपड़े भी ठीक उसी तरह के पहनाए गए थे जो फिल्म में उस गाने में अभिनेत्री ने पहने है। क्या उस बच्ची के माता-पिता कोई उस पर कोई आपत्ति नहीं हुई? क्या उस विद्यालय के शिक्षकों को ज़रा भी शर्म नहीं आई? जब वह नृत्य रील के रूप में सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो क्या उस बच्ची के प्रति किसी आपराधिक मनोवृत्ति वाले व्यक्ति की नीयत खराब नहीं हुई होगी? ये सारे विचारणीय प्रश्न है। 
माता-पिता अपनों बच्चों के टैलेंट को दुनिया के सामने रखना चाहते हैं। यह स्वाभाविक है। इसकी शुरुआत वहीं से हो जाती है जब घर में किसी अतिथि के आने पर माता-पिता अपने बच्चे से कहते हैं कि बेटा/बेटी अंकल, आंटी को पोएम सुनाओ! कभी-कभी नृत्य कर के दिखाने को भी कहते हैं। लेकिन एक बैठक के कमरे में किया जाने वाले नृत्य और मंच किए जाने वाले नृत्य में अंतर होता है। उस पर सोशल मीडिया पर पोस्ट किए जाने वाले नृत्य तो और भी विचारणीय होते हैं। माता-पिता द्वारा इस तरह अनदेखी किए जाने की यह कोई इकलौती घटना नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व न जाने कितने बच्चों ने अपने माता-पिता के प्रोत्साहन पर ‘‘शीला की जवानी’’ गाने पर डांस किया। यहां तक कि गणेशोत्सव के पंडाल में भी बच्चों द्वारा जब यह डांस प्रस्तुत किया गया तब कुछ लोगों को चिंता हुई और तय किया गया कि ऐसे डांस धार्मिक अवसरों के आयोजनों में न किए जाएं। लेकिन सोशल मीडिया पर तो स्वयं माता-पिता को ही ध्यान रखना होगा। 

    यह आवश्यक नहीं है कि जिस बच्ची का वीडियो सोशल मीडिया पर डाला गया, मात्र उसी के लिए खतरा हो। रील देख कर सभी यह नहीं जान सकते हैं कि वह बच्ची किस शहर की है, वह कहां हैं लेकिन उसी के शहर के उसको पहचानने वालों से उसे खतरा हो सकता है। उस रील को देख कर आतुर हो उठे विकृत मानसिकता वाले व्यक्ति वह बच्ची नहीं तो दूसरी बच्ची को अपना शिकार बना सकता है। कहने का आशय यही है कि यदि बच्चों के प्रति यौन अपराध को रोकना है तो जिस प्रकार सरकार ने इंटरनेट पर पोर्न फिल्म देखने के विरुद्ध कड़ा कदम उठाया है, उसी प्रकार माता-पिता एवं बच्चों के परिजन को सोशल मीडिया पर छोटी बच्चियों के अश्लील एवं कामुक हाव-भाव वाले नृत्यों को रोकना होगा। वैसे भी छोटे बच्चों को इस प्रकार के नृत्य करने के लिए प्रोत्साहित करना भी नहीं चाहिए। वे मासूम हैं। उन्हें न तो उन बोलों का अर्थ पता होता है और न उन हाव-भाव का। वे तो बस, काॅपी करते हैं और प्रस्तुत कर देते हैं इस आशा में कि इससे उन्हें शाबाशी मिलेगी। इस बर्ष भी गणेशोत्सव पर हुए अनेक कार्यक्रमों जहां एक ओर कुछ बच्चों ने गणेश वंदना पर नृत्य किया तो वहीं कुछ बच्चों ने ‘‘काटी रात मैंने खेतों में तू आई नहीं’’ गाने को पेश किया। 08-15 साल के बच्चे अपने माता-पिता और परिचितों के सामने यह नृत्य करते रहे और तालियां बजती रहीं। वे बच्चे उस गाने का सही-सही अर्थ भी नहीं जानते हैं लेकिन उनके माता-पिता तो अर्थ जानते हैं। जब यही बच्चे बड़े हो कर इन्हीं हरकतों को दोहराएंगे तब माता-पिता होश में आ कर बवाल मचाएंगे। घर से भागने वाला लड़का दोषी ठहराया जाएगा कि वह लड़की को बहला-फुसला कर भगा ले गया और घर से भागने वाली लड़की तो जीवनपर्यंत ‘घर से भागी हुई’ कहलाएगी। उस समय उस ओर कोई नहीं देखेगा कि इस घटना का बीजारोपण कब हो गया था।

यह भी उचित नहीं है कि अपराध के भय से बच्चों को घर में कैद कर दिया जाए लेकिन उचित यह भी नहीं है कि बच्चों को अपनी लालसा के चलते किसी खतरे में डाल दिया जाए। जितनी भड़कदार रील, उतने, लाईक, रील की उतनी लोकप्रियता और उतने ही रील से मिलने वाले पैसे। लेकिन क्या पैसा बच्चों की सुरक्षा से अधिक कीमती है? इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा कि ‘आज की रात मज़ा..’ पर थिरकते बच्चियों के कदम कहीं उनके भयावह कल की ओर तो नहीं ले जा रहे हैं। वस्तुतः जब नन्हीं बच्चियों के प्रति यौनहिंसा दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही हो तो अपराधियों की इस प्रकार की खुली दावत देना उचित नहीं है। माता-पिता तथा अभिभावकों को इस बात की गंभीरता को समझना होगा।          
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Tuesday, October 8, 2024

पुस्तक समीक्षा | ‘जैनरेशन बाउंडिंग’ को स्थापना देती है पुस्तक -‘‘शक्ति पुंज’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

आज 08.10.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई डॉ. वंदना गुप्ता द्वारा संपादित पुस्तक "शक्ति पुंज" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा
‘जैनरेशन बाउंडिंग’ को स्थापना देती है पुस्तक -‘‘शक्ति पुंज’’
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक  - शक्ति पुंज
संपादक - डाॅ. वंदना गुप्ता 
प्रकाशक - एन.डी. पब्लिकेशन, बादापुर दक्षिण पूर्व, दिल्ली - 110044
मूल्य    - 300/- 
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‘‘न मातुः परदैवतं।’’ - इस पंक्ति का अर्थ है कि मां से बड़ा कोई देवता नहीं हो सकता। इसी बात को एक अन्य श्लोक में कुछ इस प्रकार कहा गया है कि -
नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रपा।।
अर्थात मां के जैसा न कोई छाया दे सकता है और न ही कोई आश्रय ही दे सकता है और मां के समान न ही कोई हमें सुरक्षा ही दे सकता है। मां इस पूरे ब्रह्मांड में जीवन दायिनी है और उसके जैसा कोई दूसरा नहीं है। निःसंदेह मां जननी होती है और संतान सबसे अधिक मां के निकट स्वयं को पाता है। आज पाश्चात्य रंग में रंग कर बेटी को ‘‘पापा की परी’’ या ‘‘डैडीज़ डाॅल’’ कहा जाने लगा है लेकिन सच यही है कि बेटियां अपने जीवन में प्रथम अध्याय से अंतिम अध्याय तक अपनी मां से ही शिक्षा ग्रहण करती हैं और उन्हीं के पदचिन्हों पर चलने का प्रयास करती हैं। यूं भी हर संतान का यह कर्तव्य होता है कि वह अपनी मां की ममता एवं त्याग के बदले उन्हें मान-सम्मान, प्रतिष्ठा एवं अपनत्व दे। पुस्तक ‘‘शक्ति पुंज’’ एक बेटी का अपनी मां के प्रति स्नेह एवं सम्मान प्रकट करने का अनुपम उदाहरण है। सागर की स्त्रीरोग चिकित्सक एवं योग विशेषज्ञ, गीतकार, साहित्यकार एवं समाजसेवी डाॅ. वंदना गुप्ता जो इन दिनों वैचारिक स्वच्छता अभियान से भी जुड़ी हुई हैं, उन्हीं के संपादन में प्रकाशित हुई है पुस्तक ‘‘शक्ति पुंज’’।

इस पुस्तक में डाॅ. वंदना गुप्ता ने अपनी विदुषी मां विजयलक्ष्मी गुप्ता की काव्य रचनाओं एवं गद्य रचनाओं का संपादन किया है। इस संबंध में उन्होंने ‘‘संपादक की कलम से’’ के अंतर्गत लिखा है कि ‘‘छोटी-छोटी कविताओं से लेकर उनके लिखे उद्बोधन को पढ़ा तो मुझे गर्व के साथ असीम शक्ति का आभास हुआ, क्योंकि मानव जीवन व सामाजिक जीवन से संबंधित शायद ही कोई ऐसा विषय हो जिस पर उनकी लेखनी ने उनका साथ न दिया हो। भारतीय संस्कृति एवं संस्कारों, परोपकार, ऋतु एवं प्रकृति, नारी की सुप्त शक्ति का जागरण उनकी लेखनी के प्रधान विषय हैं जिसे पढ़कर किसी के भी अंदर की सुप्त शक्ति स्वयमेव जागृत हो सकती है। मुझे लगा कि इनका सम्पूर्ण लेखन एक ‘शक्तिपुंज’ के समान है अतः इस पुस्तक का नाम हमने ‘शक्तिपुंज’ रखा। कई स्थानों पर विषय संबंधित वक्तव्य में इन्होंने कई अन्य लोगों की कविताओं को भी उद्धृत किया है। विषय का क्रम न टूटे इस कारण हमने उन्हें उनकी डायरी से यथावत ही इस कृति में प्रस्तुत किया है। विशेष रूप से समाजसेवा के क्षेत्र में कार्य कर रहे लोगों के लिए ‘शक्तिपुंज’ एक ज्योति के समान है जो कदम-कदम पर अपने प्रकाश से उनका मार्गदर्शन कर उनके सेवा पथ को आलोकित करने में पूर्ण सक्षम है।’’ 
निश्चित रूप से यह न केवल श्रमसाध्य कार्य था वरन भावनाओं को आंदोलित करने वाला दायित्व था जिसे स्वयं डाॅ. वंदना गुप्ता ने निर्वाह करने का निर्णय लिया। पुस्तक की संपूर्ण सामग्री दो भागों में विभक्त है। प्रथम भाग में मां विजय लक्ष्मी गुप्ता की काव्य रचनाएं हैं और दूसरे भाग में उनकी गद्य रचनाएं हैं। बीच-बीच में डाॅ. वंदना गुप्ता की रचनाएं भी शामिल हैं। एक प्रकार से भावनाओं की पूरक की भांति। 

‘‘रचनाकार की कलम से’’ के अंतर्गत विजयलक्ष्मी गुप्ता ने इस पुस्तक एवं अपनी पुत्री के संपादकत्व पर चर्चा करते हुए लिखा है कि -‘‘मेरी उपस्थिति में मेरी डायरी व कई अलग-अलग पन्नों में लिखी मेरी पंक्तियों को एक पुस्तक के रूप में देने का संकल्प लेकर इसे पूर्ण किया। उसके इस प्रयास व हठ को मैं नमन करती हूँ जिसने इस कृति ‘शक्तिपुंज’ के माध्यम से मुझे अमरत्व प्रदान किया है। डॉ. वन्दना की विशेषता है कि वह कुछ न कुछ अलग हटकर सृजनात्मक कार्य करती रहती हैं, जिससे समाज को शक्ति मिलती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण इनका राष्ट्रव्यापी ‘वैचारिक स्वच्छता अभियान’ है। यह अभियान मां-बहन बेटियों के सार्वजनिक अपमान को रोकने की जनजागृति मुहिम है। जिसका लक्ष्य है माँ-बहन बेटी की गालियों से मुक्त समाज का निर्माण हो सके। इसी विषय पर इनकी बनाई लघु फिल्म ‘घुटन समाज की’ प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति को झकझोरने वाली है। मेरे सम्पूर्ण जीवन की इस यात्रा में समाजसेवा के पथ पर हमें साथ लेकर चलने का, हमारी भाषा, अभिव्यक्ति व लेखनी की सक्षमता का समस्त श्रेय हमारे परोपकारी, कर्मठ, साहसी, कुशल वक्ता, चिन्तक व विचारक पति स्व. श्री ओमप्रकाश गुप्ता जी एडव्होकेट को जाता है। जिन्होंने मुझमें प्रेरणा भरकर मेरे अन्दर की प्रतिभाओं को निखारने का जीवनपर्यन्त प्रयास किया व भरपूर सहयोग प्रदान किया।’’
विजयलक्ष्मी गुप्ता के इन विचारों से स्पष्ट पता चलता है कि मां और बेटी के बीच कितनी गहरी वैचारिक संबद्धता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि डाॅ. वंदना गुप्ता को लोकसंस्कार एवं जनहित की चिंता का गुण अपनी मां से ही मिला है। 

पुस्तक की सम्मति प्रो. सुरेश आचार्य पूर्व डीन एवं विभागाध्यक्ष हिन्दी विभाग डॉ. हरिसिंह गौर केन्द्रीय वि. वि. सागर ने लिखी है। वे लिखते हैं कि -‘‘उन्होंने विरासत में मिली असली पूंजी को सहेजकर समाज के बीच प्रस्तुत करने का जो पुण्य कार्य किया है, पीढ़ियां उन्हें इस कार्य के लिए याद रखेंगी। साथ ही ऐसे अनेक लोगों के लिए भी वह इस कृति के माध्यम से प्रेरणा स्रोत बनेंगी। जिनके माता-पिता या पूर्वजों ने इस प्रकार की साहित्य सेवा की है परन्तु वह कागजों के पन्नों या डायरी में घर के कोने में कहीं पड़ी रहती है और समाज को उस लेखन की ऊर्जा का लाभ नहीं मिल पाता है। अतः दीमक लगकर रद्दी में फेंके जाने के पूर्व ऐसे संपादन से समाज के लोगों को प्रेरणा मिलेगी। जिससे समाज को शक्ति का प्रकाश पुंज प्राप्त हो सकेगा।’’

बेशक़ यही वर्तमान का कटु सत्य है कि आज संतानें अपने माता-पिता के प्रेम से विरत हो चली हैं। यही कारण है कि वृद्धाश्रम आज फल-फूल रहे हैं। इस दृष्टि से सचमुच यह पुस्तक एक ऐसा आदर्श रचती है जिसे सभी युवाओं को जानना और समझना चाहिए।

पुस्तक के संबंध में अपने ‘‘उद्गार’’ व्यक्त करते हुए न्यायमूर्ति श्री सूर्यप्रकाश केसरवानी, कलकत्ता हाईकोर्ट, पूर्व वरिष्ठ न्यायाधिपति इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिखा है कि -‘‘शक्तिपुंज के संपादन एवं प्रकाशन पर अपनी छोटी बहन डॉ. वन्दना गुप्ता को हार्दिक शुभकामनाएं एवं कोटिशः धन्यवाद। क्योंकि ‘मां’ की साहित्यिक धरोहर को कृति ‘शक्तिपुंज’ के माध्यम से समाज को लोकार्पित करने का उनका भागीरथी प्रयास स्तुत्य है। ‘शक्तिपुंज’ कृति में अंकित सम्पूर्ण बातें समाज को राह दिखाने वाली तथा प्रत्येक मातृशक्ति की सुप्त शक्ति को जागृत करने वाली है।’’

पुस्तक के कलेवर पर अत्यंत साहित्यिक आमुख लिखा है सागर के वरिष्ठ साहित्यकार एवं समीक्षक टीकाराम त्रिपाठी ने। वे लिखते हैं कि ‘‘शक्तिपुंज में भारतीय समाज में सामाजिक संबंध धर्म, शिक्षा, पर्यावरण, रीति-रिवाज, संस्कृति, सभ्यता, पाश्चात्य अंधानुकरण पर अनेकानेक रचनायें हैं। मेरे मस्तिष्क में कुतूहल होता है कि ‘शक्तिपुंज’ की रचनाओं की शक्ति दो-तीन पुस्तकों के समकक्ष है ही साथ ही ये रचनाएं यदि आधुनिककाल के छठवे सातवें दशक के कवि लेखकों के कालखंड में प्रकाशित हो जाती तो देश-समाज के कल्याण में पुरजोर तरीके से समादृत होतीं। बहरहाल पर्शियन भाषा की उक्ति ‘देर आयद दुरूस्त आयद’ के अनुसार विलंबित ही सही, प्रकाशन तो हो सका है।’’

यदि बात की जाए विजयलक्ष्मी गुप्ता जी की उन काव्य रचनाओं की जो इस पुस्तक में हैं तो उनमें विविधता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। कवयित्री की स्त्रीजीवन को लेकर धारणा वैशिष्ट्य युक्त है। ‘‘नारी" शीर्षक कविता में वे लिखती हैं कि -
नारी सशक्तिकरण का अब समय है आया
नारी नारायण की है, विश्व मोहनी माया।
उसके रोम-रोम में, सर्वभूतेषु समाया ।। 
वह है शक्ति शौर्य का, जाज्वल्य पुंज। 
इसी प्रकार ‘‘नारी नहीं बेचारी’’ शीर्षक कविता में वे साफ शब्दों में कहती हैं कि-
बेचारी की संज्ञा देकर किया उसे लाचार।। 
बाह्य जगत से वह रही पूर्ण अनजान। 
नजरबंद थी वह गृह में नहीं रहा दिशा का ज्ञान।। 
नारी सशक्तिकरण के बीजारोपण का अभियान।
जागृति की दिशा में लेकर आया एक नया तूफान।।

कवयित्री प्रकृति के महत्व को निरुपित करती हुई प्रकृति से शिक्षा लेने का आह्वान करती हैं। ‘‘प्रकृति से शिक्षा’’ कविता में वे लिखती हैं कि -
शिक्षा ले लो जग से बहनो, तुम लता प्रसून पवन से। 
जग की तुम सेवा कर लो, अपने तन-मन-धन से।। 
बन्दी बन जायें जग में, बंधे विश्व प्रेम बंधन से।
 देखें सदैव जग को बस, जग (अंर्तमन) के ही लोचन से। 
सद्भाव सुमन के भर दें हर मानव के दिल में।।  

नारी और प्रकृति पर्याय ही तो हैं परस्पर एक दूसरे की और इन दोनों को सुरक्षा की आवश्यकता है। पुस्तक के पद्यखंड में कुल 126 कविताएं हैं। वहीं गद्यखंड में छोटे-बड़े कुल 113 लेख, संदेश, पत्र एवं उद्बोधन सहेजे गए हैं। गद्यखंड भी अपने-आप में महत्वपूर्ण है। इसमें विजयलक्ष्मी गुप्ता के वे विचार हैं जो उनके व्यक्तित्व को भली-भांति व्याख्यायित करते हैं। 

इसमें कोई दो मत नहीं कि ‘‘शक्ति पुंज’’ पुस्तक मां के प्रति एक बेटी के अतुल स्नेह की परिचायक है अतः संवेदनहीन होते इस समय में यह पुस्तक बहुत महत्व रखती है। यह पुस्तक ‘जैनरेशन गैप’ के विचारों को खण्डित करती हुई ‘‘जैनरेशन बाउंडिंग’’ स्थापित करती है। यह पुस्तक बताती है कि यदि माता के प्रति संतान का सच्चा प्रेम हो तो वह अपने जीवन की तमाम व्यस्तताओं के बावज़ूद मां की सेवा कें लिए समय जुटा सकता है। बस, प्रश्न भावना का है और यह पुस्तक भावना के स्तर पर पठनीय एवं अनुकरणीय कही जा सकती है।                                               
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Saturday, October 5, 2024

टॉपिक एक्सपर्ट | पत्रिका | सबई पे किरपा राखियो, ओ मां ! | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली में
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सबई पे किरपा राखियो, ओ मां !
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
   नवरातें चल रईं। जागां-जागां माता की झांकियां सजी दिखा रईं। संझा-सकारें माता के जयकारे लग रए। अपने इते पुरव्याऊ टौरी की झांकी सबसे पुरानी आए। जेई 120 सालों से उते दुर्गा रखी जा रईं। हऔ, 1905 में पैली बेर उते दुर्गा मैया रखी गईं हतीं। लोग बताऊत आएं के जोन स्व. हीरासिंह राजपूत ने पैली मूर्ति राखी हती बा मूर्ति उन्ने खुदई  बनाई रई। ऊ टेम पे जे ट्रक-ट्रैक्टर तो इत्ते हते न, सो बनाबे वारी जागां से माता की मूरत खों कंधा पे बिठा के लाओ गओ रओ। तब से आज लौं पुरव्याऊ टौरी की दुर्गा मैया कंधा पे सवार हो के निकरत आएं औ सबरे कैत चलत आएं के “चल माई”। जे समै पे स्व. हीरासिंह राजपूत जू की चौथी पीढ़ी चल रई, मनो उन्ने सोई जे परंपरा बना रखी आए। रामधई ! जो अच्छी चीजें चलत रयें तो भौतई अच्छो लगत आए।
    सबई खों मां प्यारी औ मां खो सबई प्यारे। काए से के देवी मैया बच्चन में भेद-भाव  नईं करत, बा तो मानुष आए जोन के जी में ‘हमें-हमें’ लगो रैत आए। हमाये दोरे की रोड साजी बन जाए, दूसरे के दोरे की जाए चूला में। जेई चलन सो चल रओ। तभईं तो पूरे शहर की मुतकी रोडें मिटी डरीं, मनो कोनऊं मों बोल के नईं जानत। आवारा कुत्ता, गैयां सो बरहमेस रोड पे हल्लू-हाय करत मिलत आयें। मने का आए के इते तो फीता कटवाबे की जल्दी रैत आए, काम पूरो करबे की नोईं। सो, अब तो दुर्गा मैया को ई भरोसो आए के बे हम सबई पे किरपा बनाएं राखें। 
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Friday, October 4, 2024

शून्यकाल | देवी दुर्गा को भी बहुत प्रिय है मोटा अनाज जौ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक "नयादौर" में मेरा कॉलम "शून्यकाल" -                                                                 देवी दुर्गा को भी बहुत प्रिय है मोटा अनाज जौ
  - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
    नवरात्रि की शुरुआत के साथ ही जौ के बीज ‘‘ज्वारे’’ के रूप में बोए जाते हैं। क्या आप जानते हैं कि जौ कितना महत्वपूर्ण अनाज है? आप कहेंगे कि हाँ! आजकल इसे मोटे अनाज के रूप में खाने पर जोर दिया जा रहा है। इसे स्वास्थ्य के लिए अच्छा बताया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन को देखते हुए भी ज्वार की खेती को बढ़ावा देने की जरूरत महसूस की जा रही है। लेकिन क्या आप यह भी जानते हैं कि हमारे वैदिक साहित्य में इसे ‘‘ब्रह्मा का अन्न’’ माना गया है। वेदों में उल्लेख है कि धरती पर सबसे प्राचीन अनाज जौ है। इसीलिए इसे यज्ञ, हवन और जवारों में भी पवित्र अनाज के रूप में शामिल किया जाता है और देवी मां दुर्गा को भी मोटा अनाज जौ बहुत प्रिय है।
वर्तमान में पूरे विश्व में खाद्य समस्या और जलवायु परिवर्तन को देखते हुए मोटे अनाज के उपयोग और उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है। हमारे देश भारत में भी मोटे अनाज को खाद्यान्न के मूल आधार के रूप में देखा जा रहा है। ये मोटे अनाज हैं जौ, बाजरा, रागी आदि। ये सभी अनाज पहले हमारे भोजन की थाली में शामिल होते थे। लेकिन आधुनिकता और पाश्चात्य भोजन शैली के कारण ये हमारी भोजन की थाली से दूर होते चले गए। जबकि हमारे देश में, चाहे वे किसी भी धर्म से ताल्लुक रखते हों, सभी जानते हैं कि नवरात्रि की शुरुआत में श्ज्वारेश् बोए जाते हैं। यह एक तरह का धार्मिक अनुष्ठान है। इन बीजों को बोने का एक अर्थ यह भी है कि इससे देवी दुर्गा प्रसन्न होती हैं और अच्छी फसल का आशीर्वाद देती हैं। हालांकि इस संबंध में देश के अलग-अलग इलाकों में अलग-अलग मान्यताएं और कहानियां प्रचलित हैं। लेकिन सभी का मानना है कि देवी मां को जौ के बीज चढ़ाने से वे प्रसन्न होती हैं। इसका सीधा सा मतलब है कि देवी मां दुर्गा को भी मोटा अनाज जौ पसंद है। यह धरती पर उगाए जाने वाले सबसे पुराने अनाजों में से एक है। प्राचीन काल से ही इसका इस्तेमाल धार्मिक अनुष्ठानों में किया जाता रहा है। संस्कृत में इसे ‘‘यव’’ कहा जाता है। इसका उत्पादन मुख्य रूप से रूस, यूक्रेन, अमेरिका, जर्मनी, कनाडा और भारत में होता है।

नवरात्रि में जौ बोने का विशेष महत्व है। नवरात्रि में कलश और घटस्थापना के साथ ही घट में जौ (कभी-कभी गेहूं) बोया जाता है। मां दुर्गा को यह बहुत पसंद है। आइए जानते हैं क्या है इसका रहस्य। नवरात्रि में देवी दुर्गा के नौ रूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है और व्रत रखे जाते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों में लोग अपने घरों में अखंड ज्योति जलाते हैं। साथ ही माता रानी के नौ रूपों की पूजा भी करते हैं। नवरात्रि में कलश स्थापना और जौ का बहुत महत्व होता है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना यानी कलश स्थापना के साथ ही जौ बोए जाते हैं। कहा जाता है कि इसके बिना मां अम्बे की पूजा अधूरी रहती है। कलश स्थापना के साथ जौ बोने की परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है। ऐसे में आइए आज जानते हैं कि नवरात्रि में जौ क्यों बोए जाते हैं और इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यता और वैज्ञानिक महत्व है?

जौ को भगवान ब्रह्मा का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवान ब्रह्मा ने इस सृष्टि की रचना की तो वनस्पतियों में सबसे पहली फसल श्जौश् ही थी। इसीलिए नवरात्रि के पहले दिन घट स्थापना के समय सबसे पहले जौ की पूजा की जाती है और कलश में भी इसे स्थापित किया जाता है। जौ को सृष्टि की पहली फसल माना जाता है, इसलिए जब भी देवी-देवताओं की पूजा या हवन किया जाता है तो जौ को ही अर्पित किया जाता है। यह भी कहा जाता है कि जौ अन्न यानी ब्रह्मा के समान है और अन्न का हमेशा सम्मान करना चाहिए। इसलिए पूजा-पाठ में जौ का प्रयोग किया जाता है। नवरात्रि में कलश स्थापना के दौरान बोए गए जौ दो-तीन दिन में ही अंकुरित हो जाते हैं, लेकिन अगर ये अंकुरित न हों तो यह भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है। ऐसी मान्यता है कि अगर दो-तीन दिन बाद भी अंकुर न निकलें तो इसका मतलब है कि कड़ी मेहनत के बाद ही फल मिलेगा। इसके अलावा अगर जौ उग आए हैं लेकिन उनका रंग नीचे से आधा पीला और ऊपर से आधा हरा है तो इसका मतलब है कि आने वाला साल आधा तो ठीक रहेगा, लेकिन बाद में परेशानियों का सामना करना पड़ेगा। अगर बोए गए जौ सफेद या हरे रंग के उग रहे हैं तो इसे बहुत शुभ माना जाता है। इसका मतलब है कि पूजा सफल रही। आने वाला पूरा साल खुशियों से भरा रहेगा। नवरात्रि के दिनों में कलश के सामने मिट्टी के बर्तन में जौ या गेहूं बोया जाता है और उसकी पूजा भी की जाती है। बाद में जब नौ दिन में जवारे बड़े हो जाते हैं तो उन्हें नदी में विसर्जित कर दिया जाता है। देवी मां के साथ-साथ अन्य देवी-देवताओं के लिए जब भी हवन किया जाता है तो उसमें जौ का बहुत महत्व होता है। जौ बोने से बारिश, फसल और व्यक्ति के भविष्य का भी अनुमान लगाया जाता है। कहा जाता है कि अगर जौ सही आकार और लंबाई में नहीं उगते हैं तो साल छोटा रहेगा और फसल भी कम होगी। इसका असर भविष्य पर पड़ता है। बोए गए जौ का रंग भी शुभ और अशुभ संकेत देता है। ऐसा माना जाता है कि अगर जौ का ऊपरी आधा भाग हरा और निचला आधा भाग पीला है, तो इसका मतलब है कि आने वाला साल आधा अच्छा होगा और आधा मुश्किलों से भरा होगा। ऐसा माना जाता है कि अगर 2 से 3 दिन में जौ अंकुरित हो जाएं तो यह बहुत शुभ होता है और अगर आदि जौ नवरात्रि के अंत तक जौ नहीं उगते हैं, तो इसे अच्छा नहीं माना जाता है। हालाँकि, कभी-कभी ऐसा होता है कि अगर जौ को ठीक से नहीं बोया है, तो भी जौ नहीं उगते हैं। इसके साथ ही, अगर जौ का रंग हरा है या सफेद हो गया है, तो इसका मतलब है कि आने वाला साल बहुत अच्छा होगा। इतना ही नहीं, देवी भगवती की कृपा से आपके जीवन में अपार सुख और समृद्धि आएगी। ऐसा कहा जाता है कि नवरात्रि के दौरान बोए गए जौ जितने अधिक बढ़ते हैं, उतनी ही अधिक देवी दुर्गा की कृपा बरसती है। यह इस बात का भी संकेत है कि व्यक्ति के घर में सुख और समृद्धि आएगी।

जौ बोने की रस्म हमें अपने भोजन और अनाज का हमेशा सम्मान करना सिखाती है। इसका वैज्ञानिक पहलू यह है कि इस तरह खेती से न जुड़ा व्यक्ति भी खेती के काम को समझ पाता है। यहां तक कि परिवार के बच्चे भी ज्वार बोने और उसे हरा-भरा रखने में जरूरी सावधानियों को जान और समझ पाते हैं। स्वस्थ ज्वारे खेती के लिए मौसम को समझने में भी मदद करते हैं। जरा सोचिए जौ का मोटा अनाज कितना महत्वपूर्ण है, जिसे देवी मां को प्रसन्न करने के लिए उनके सामने उगाया जाता है और फिर नौ दिन बाद उन ज्वारों को देवी मां के साथ जल में विसर्जित कर दिया जाता है। यानी उन अनाजों को देवी मां के साथ ही भेज दिया जाता है, जैसे विदाई के समय रास्ते में किसी मेहमान को खाने के लिए खाना पैक करके दिया जाता है। ऐसे महत्वपूर्ण अनाजों को हमें अपने रोजमर्रा के जीवन में अपनाने में कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। वैज्ञानिक भी कहते हैं कि मोटा अनाज स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है। जौ जैसा मोटा अनाज खाने के बहुत लाभ हैं, जैसे- मोटे अनाज में प्रोटीन, खनिज, और विटामिन, चावल और गेहूं से तीन से पांच गुना ज्यादा होते हैं। मोटे अनाज में फाइबर काफी होता है, जिससे पाचन तंत्र बेहतर होता है। मोटे अनाज में कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स (जीआई) होता है, जिससे मधुमेह की रोकथाम में मदद मिलती है। मोटे अनाज में कैल्शियम, आयरन, और जिंक जैसे खनिज होते हैं। मोटे अनाज में मौजूद पोषक तत्व हड्डियों को मजबूत बनाते हैं और कैल्शियम की कमी को रोकते हैं। मोटे अनाज में मौजूद फाइबर की वजह से लंबे समय तक पेट भरा रहता है, जिससे बार-बार खाने की जरूरत नहीं होती। मोटे अनाज खाने से एनीमिया का खतरा कम होता है। मोटे अनाज दिल के लिए भी अच्छे होते हैं। 

खाद्य विशेषज्ञ मोटे अनाज खाने का तरीका भी सुझाते हैं। उनके अुनसार मोटे अनाज को हमेशा भिगोकर या अंकुरित करके खाना चाहिए। मोटे अनाज में फिटिक एसिड होता है, जो शरीर में बाकी पोषक तत्वों को अवशोषित नहीं होने देता। लेकिन परंपरागत तरीकों से भी मोटे अनाज को खाया जा सकता है जैसे उबाल कर, पीस कर रोटी आदि के रूप में।

यही सब कारण हैं कि आजकल मोटे अनाज को स्वास्थ्य के लिए अच्छा बताया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन को देखते हुए भी ज्वार की खेती को बढ़ावा देने की जरूरत महसूस की जा रही है। वेदों में उल्लेख है कि धरती पर सबसे प्राचीन अनाज जौ और इसकी भांति मोटे अनाज की श्रेणी में आनेे वाले अन्न ही हमें स्वास्थ्य एवं खद्यान्न संकट से भी उबार सकते हैं। अतः इस नवरात्रि से गर्व के साथ याद रखिए कि देवी मां दुर्गा को भी मोटा अनाज जौ बहुत प्रिय है और हम इसे उनके आशीर्वाद के रूप में अपनी खाद्यचर्या में शामिल कर सकते हैं। 
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Thursday, October 3, 2024

नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
सभी मित्रों को नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं 
🚩🚩🚩🙏🚩🚩🚩
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Wednesday, October 2, 2024

चर्चा प्लस | कैसा था महात्मा गांधी का ईश्वर | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस
(2 अक्टूबर, गांधी जयंती विशेष) 
कैसा था महात्मा गांधी का ईश्वर? 
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                            
        सभी जानते हैं कि महात्मा गांधी के अंतिम शब्द थे ‘‘हे राम!’’ तो क्या महात्मा गांधी सिर्फ़ श्रीराम को पूजते थे अथवा उनकी दृष्टि में ईश्वर का कोई भी स्वरूप था? महात्मा गांधी सत्य के पक्षधर थे और उन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक पक्ष को पूरी सच्चाई से दुनिया के सामने रखा। अपने आस्था पक्ष को भी उन्होंने कभी किसी से नहीं छिपाया। वे धर्मनिरपेक्ष थे किन्तु नास्तिक नहीं थे। विशुद्ध आस्तिक थे। इस तथ्य को उन लोगों को समझना चाहिए जो धर्म और ईश्वर के नाम पर कट्टर विचारों का पोषण करते हैं।  
       महात्मा गांधी ईश्वर के प्रति अपनी आस्था को जानना धर्म के एक ऐसे स्वरूप से परिचित होना है जिसमें ईश्वर साकार भी है और निराकार भी। शब्दों में वर्णन किए जाने योग्य भी है और वर्णनातीत भी। सभी जानते हैं कि महात्मा गांधी के अंतिम शब्द थे ‘‘हे राम!’’ तो क्या महात्मा गांधी सिर्फ़ श्रीराम को पूजते थे अथवा उनकी दृष्टि में ईश्वर का कोई भी स्वरूप था? महात्मा गांधी सत्य के पक्षधर थे और उन्होंने अपने जीवन के प्रत्येक पक्ष को पूरी सच्चाई से दुनिया के सामने रखा। अपने आस्था पक्ष को भी उन्होंने कभी किसी से नहीं छिपाया। वे धर्मनिरपेक्ष थे किन्तु नास्तिक नहीं थे। विशुद्ध आस्तिक थे। इस तथ्य को उन लोगों को समझना चाहिए जो धर्म और ईश्वर के नाम पर कट्टर विचारों का पोषण करते हैं।  
   महात्मा गांधी का कहना था कि -‘‘संसार का परित्याग तो मेरे लिए सरल है, लेकिन मैं ईश्वर का परित्याग करूं, यह अविचारणीय है। मैं जानता हूं कि मैं कुछ भी करने में समर्थ नहीं हूं। ईश्वर सर्वसमर्थ है। हे प्रभो, मुझे अपना समर्थ साधन बनाएं और जैसे चाहें, मेरा उपयोग करें। मैंने ईश्वर के न तो दर्शन किए हैं और न ही उन्हें जाना है। मैंने ईश्वर के प्रति दुनिया की आस्था को अपनी आस्था बना लिया है और चूंकि मेरी आस्था अमिट है, मैं उस आस्था को ही अनुभव मानता हूं लेकिन यह कहा जा सकता है कि आस्था को अनुभव मानना तो सत्य के साथ छेड़छाड़ करना है। सच्चाई शायद यह है कि ईश्वर के प्रति अपनी आस्था का वर्णन करने के लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं है।’’
गांधी जी ने अपने विचारों को उदाहरण देते हुए समझया कि -‘‘आप और मैं इस कमरे में बैठे हैं, इस तथ्य से भी ज्यादा पक्का भरोसा मुझे ईश्वर के अस्तित्व में है। इसलिए मैं यह भी निश्चयपूर्वक कह सकता हूं कि मैं वायु और जल के बिना तो जीवित रह सकता हूं, पर ईश्वर के बिना नहीं रह सकता। आप मेरी आंखें निकाल लें, पर मैं उससे मरूंगा नहीं। आप मेरी नाक काट लें, पर मैं उससे मरूंगा नहीं, पर ईश्वर के प्रति मेरी आस्था को ध्वस्त कर दें तो मैं मर जाऊंगा।’’ उन्होंने आगे कहा कि ‘‘आप इसे अंधविश्वास कह सकते हैं, पर मैं स्वीकार करता हूं कि मैं इस अंधविश्वास को उसी प्रकार श्रद्धापूर्वक गले लगाए हूं, जिस प्रकार कोई खतरा या संकट आने पर मैं अपने बचपन में ‘राम नाम’ का श्रद्धापूर्वक जप करने लग जाता था। इसकी सीख मुझे एक बूढ़ी परिचारिका ने दी थी।’’
महात्मा गांधी मानते थे कि ईश्वर डराता नहीं है, वह भभीत नहीं करता है, वह तो मनुष्य के मन में बैठा हुआ डर है जो उसे ईश्वर से भयभीत रहने को विवश करता है। इस संबंध में उन्होंने कहा कि -‘‘मेरा विश्वास है कि हम सभी ईश्वर के सन्देशवाहक बन सकते हैं, यदि हम मनुष्य से डरना छोड़ दें और केवल ईश्वर के सत्य का शोध करें। मेरा पक्का विश्वास है कि मैं केवल ईश्वर के सत्य का शोध कर रहा हूं और मनुष्य के भय से सर्वथा मुक्त हो गया हूं। मुझे ईश्वरीय इच्छा का कोई प्राकट्य नहीं हुआ है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि वह प्रत्येक व्यक्ति के सामने नित्य अपना प्रकटन करता है लेकिन हम अपनी अंतर्वाणी के लिए कान बंद कर लेते हैं। हम अपने सम्मुख दैदीप्यमान अग्निस्तम्भ से आंख मींच लेते हैं। मैं उसे सर्वव्यापी पाता हूं।’’
वे मानते थे कि ईश्वर में आस्था रखने वाला व्यक्ति भी कोई चमतकारी पुरुष नहीं बन जाता है। वह भी एक सामान्य मनुष्य ही रहता है। उनका कहना था कि -‘‘मुझे पत्र लिखने वालों में से कुछ यह समझते हैं कि मैं चमत्कार दिखा सकता हूं। सत्य के पुजारी होने के नाते मेरा कहना है कि मेरे पास ऐसी कोई सामथ्र्य नहीं है। मेरे पास जो भी शक्ति है, वह ईश्वर देता है, लेकिन वह सामने आकर काम नहीं करता। वह अपने असंख्य माध्यमों के जरिए काम करता है।’’
ईश्वर को ले कर महात्मा गांधी के विचार एकदम स्पष्ट थे। ईश्वर के स्वरूप को ले कर उनके मन में कोई अंतद्र्वन्द्व नहीं था। उनके अनुसार -‘‘मेरे लिए ईश्वर सत्य है और प्रेम है, ईश्वर आचारनीति है और नैतिकता है, ईश्वर अभय है। ईश्वर प्रकाश और जीवन का श्रोत है। फिर भी इन सबसे ऊपर और परे है। ईश्वर अंतःकरण है। वह नास्तिक की नास्तिकता भी है, चूंकि अपने असीम प्रेमवश ईश्वर नास्तिक को भी रहने की छूट देता है। वह हृदयों को स्वयं हमसे बेहतर जानता है। वह हमारी कही हुई बातों को सच नहीं मानता क्योंकि वह जानता है कि कई बार जान-बूझकर और कई बार अनजाने, हम जो बोलते हैं, हमारा अभिप्राय वह नहीं होता। जिन्हें ईश्वर की व्यक्तिगत उपस्थिति की दरकार है, उनके लिए वह व्यक्तिगत ईश्वर है जिन्हें उसका स्पर्श चाहिए, उनके लिए वह साकार है। वह विशुद्धतम तत्त्व है। जिन्हें आस्था है, उनके लिए तो बस वह है। वह सब मनुष्यों के लिए सब कुछ है। वह भीतर है, फिर भी हमसे ऊपर और परे है।’’
महात्मा गांधी धर्म के नाम पर परस्पर दुर्भावना रखने वालों सुधरने का अवसर देने की बात करते थे। उनके अनुसार - ‘‘उसके नाम पर घृणित दुराचार या अमानवीय क्रूरताएं की जाती हैं पर इनसे उसका अस्तित्व समाप्त नहीं हो सकता। वह दीर्घकाल से पीड़ा भोग रहा है। वह धैर्यवान है, पर भयंकर भी है। वह इस दुनिया और आने वाली दुनिया की सबसे कठोर हस्ती है। जैसा व्यवहार हम अपने पड़ोसियों-मनुष्यों और पशुओं-के साथ करते हैं, वैसा ही ईश्वर हमारे साथ करता है। वह अज्ञान को क्षमा नहीं करता। इसके बावजूद नित्य क्षमाशील है क्योंकि वह हमें सदा पश्चाताप करने का अवसर देता है।’’ गांधी जी मानते थे कि दुनिसा में सबसे बड़ा लोकतांत्रित कोई है तो वह है ईश्वर। वे रूपष्ट शब्दों में कहते थे कि ‘‘संसार में उस जैसा लोकतांत्रिक दूसरा नहीं है क्योंकि वह हमको अच्छाई और बुराई में से चुनाव करने के लिए स्वतंत्र छोड़ देता है। उस जैसा अत्याचारी भी आज तक नहीं हुआ जो प्रायः हमारे हांेठों से प्याला छीन लेता है और स्वेच्छा के नाम पर, हमें हाथ-पैर फेंकने के लिए अत्यंत संकुचित क्षेत्रा देकर फिर हमारी विवशता पर हंसता है। इसीलिए हिन्दू धर्म में कहा गया है कि यह सब उसका खेल अर्थात उसकी लीला है अथवा भ्रम यानी माया है। हम नहीं हैं, मात्रा वही है। यदि हम हैं तो हमें निरन्तर उसका स्तुतिगान करना है और उसकी इच्छानुसार कार्य करना है। हम उसकी बंसी की धुन पर नाचें तो सब कुछ ठीक हो जाएगा।’’
वहीं दूसरी ओर ईश्वर को सबसे अनुशासनप्रिय भी मानते थे। वे कहते थे कि ‘‘जहां तक मैं समझता हूं, ईश्वर दुनिया का सबसे कठोर अधिकारी है, वह तुम्हारी जमकर परीक्षा लेता है और जब तुम्हें लगता है कि तुम्हारी आस्था डिग रही है या तुम्हारा शरीर जवाब दे रहा है और तुम डूब रहे हो, वह किसी-न-किसी प्रकार तुम्हारी सहायता के लिए आ पहुंचता है और यह सिद्ध कर देता है कि तुम्हें अपनी आस्था नहीं छोड़नी चाहिए। वह सदा तुम्हारे इशारे पर दौड़ा चला आएगा, लेकिन अपनी शर्तों पर तुम्हारी शर्तों पर नहीं। मैंने तो उसे ऐसा ही पाया है। मुझे एक भी उदाहरण ऐसा याद नहीं आता जब ऐन मौके पर उसने मेरा साथ छोड़ दिया हो।’’
 महातमा गांधी के ईश्वर की व्यापकता ईश्वर अनंत थी। वे अपनी सभाओं में अपनी अपने बचपन के अनुभवों को भी साझा किया करते थे। फिर उन स्मृतियों एवं अनुभवों के आधार पर धर्म के स्वरूप और ईश्वर के अस्तित्व की व्याख्या करते थे। गाुधी जी का कहना था कि -‘‘शैशवकाल में मुझे ‘विष्णुसहस्त्रनाम’ का पाठ करना सिखाया गया था, लेकिन भगवान के ये हजार नाम ही नहीं हैं। हिन्दुओं का विश्वास है और मैं समझता हूं कि यह सत्य है कि संसार में जितने प्राणी हैं, उतने ही भगवान के नाम हैं। इसीलिए हम यह भी कहते हैं कि भगवान अनाम है और चूंकि भगवान के अनेक रूप हैं इसलिए हम उसे निराकार मानते हैं। जब मैंने इस्लाम का अध्ययन किया तो मैंने पाया कि इस्लाम में भी खुदा के बहुत से नाम हैं। जो कहते हैं कि ईश्वर प्रेम है, उनके साथ स्वर मिलाकर मैं भी कहूंगा कि ईश्वर प्रेम है लेकिन अपने अंतरतम में मेरा मानना है कि यद्यपि ईश्वर प्रेम है, पर सर्वोपरि ईश्वर सत्य है। यदि मनुष्य की वाणी के लिए ईश्वर का पूरा-पूरा वर्णन करना सम्भव हो तो मैं इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि, जहां तक मेरा सम्बन्ध है, ईश्वर सत्य है।’’
महात्मा गांधी कहते थे कि जीवन के सत्य एवं तथ्य को खेजने के लिए ईश्वर के अस्तित्व को नकारना आवश्यक नहीं है। इस संबंध में वे अपना अनुभव बताते थे कि -‘‘मैंने पाया कि सत्य तक पहुंचने का सबसे छोटा रास्ता प्रेम के माध्यम से है लेकिन मैंने देखा कि कम-से-कम अंग्रेजी भाषा में, प्रेम के अनेक अर्थ हैं और वासना के अर्थ में मानव प्रेम पतनकारी प्रवृत्ति भी हो सकता है। मैंने यह भी देखा कि अहिंसा के अर्थ में, प्रेम को मानने वाले लोग, इस दुनिया में बहुत कम हैं लेकिन सत्य के कभी दो अर्थ मैंने नहीं देखें और नास्तिक भी सत्य की आवश्यकता अथवा शक्ति के विषय में आपत्ति नहीं करते। लेकिन सत्य की खोज करने के उत्साह में नास्तिकों ने ईश्वर के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिद्द लगा दिया है जो उनकी दृष्टि से सही है। इस तर्क के कारण ही मुझे लगा कि ‘ईश्वर सत्य है’ के स्थान पर मुझे ‘सत्य ईश्वर है’ कहना चाहिए। ईश्वर सत्य है, पर वह और भी बहुत कुछ है। इसीलिए मैं कहता हूं कि सत्य ईश्वर है। केवल यह स्मरण रखें कि सत्य ईश्वर के अनेक गुणों में से एक गुण नहीं है। सत्य तो ईश्वर का जीवंत स्वरूप है, यही जीवन है, मैं सत्य को ही परिपूर्ण जीवन मानता हूं। इस प्रकार यह एक मूर्त वस्तु है क्योंकि सम्पूर्ण सृष्टि, सम्पूर्ण सत्ता ही ईश्वर है और जो कुछ विद्यमान है अर्थात् सत्य, उस सत्य की सेवा ही ईश्वर की सेवा है।’’
 इस प्रकार देखा जाए तो महात्मा गांधी का ईश्वर ही सत्य था और सत्य ही ईश्वर था। एक ऐसा ईश्वर जो जनप्रिय और जनहितकारी है, चाहे उसे किसी भी नाम से पुकारा जाए, चाहे किसी भी पद्धति से उसकी पूता की जाए। वस्तुतः महात्मा गांधी के ईश्वर संबंधी ये विचार आज अत्यंत प्रासंगिक हैं। कट्टरता के विरुद्ध ये विचार धर्म निरपेक्षता का उद्घोष करते हैं। अतः महात्मा गांधी के ईश्वर को समझना बेहद जरूरी है।
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Tuesday, October 1, 2024

पुस्तक समीक्षा | बुंदेलखण्ड की कथा लेखन परंपरा की साक्ष्य सहित पड़ताल | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

आज 01.10.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई प्रो. पुनीत बिसारिया द्वारा संपादित पुस्तक "बुंदेलखण्ड के कथाकार" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा
बुंदेलखण्ड की कथा लेखन परंपरा की साक्ष्य सहित पड़ताल
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक  - बुंदेलखण्ड के कथाकार
चयन एवं संपादन- प्रो. पुनीत बिसारिया 
प्रकाशक - हंस प्रकाशन, बी-336/1, गली नं.3, दूसरा पुस्ता, सोनिया विहार, नई दिल्ली - 110094
मूल्य    - 695/- (हार्ड बाउंड)
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      प्रो. पुनीत बिसारिया प्राध्यापकीय दायित्व निभाते हुए परंपरागत कार्यशैली से अलग हट कर सोचते हैं और हमेशा कुछ नया एवं सार्थक सृजन सामने लाते हैं। हिन्दी साहित्य को फिल्मों के साहित्यपक्ष की ओर आकर्षित करने की सार्थक पहल में उनका नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। एक ओर हिन्दी साहित्य और दूसरी ओर फिल्म साहित्य, इनके बीच वे उपभाषा बुंदेली के साहित्य पर भी अपनी पारखी दृष्टि जमाए हुए हैं। बुंदेलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी (उ.प्र.) के हिन्दी विभाग में आचार्य प्रो. पुनीत बिसारिया यूं तो रायबरेली के बछरावां कस्बे में जन्मे और डाॅक्टरेट की उपाधि लखनऊ विश्वविद्यालय से पाई किन्तु बुंदेलखण्ड में आने के बाद बुंदेली भाषा और संस्कृति से उन्हें गहरा लगाव होता गया। वे उपभाषा बुंदेली के विकास के लिए हरसंभव प्रयास करते रहते हैं। इसी श्रृंखला में उन्होंने बुंदेलखण्ड के कथाकारों पर केन्द्रित एक पुस्तक का संपादन किया है जिसका नाम है-‘‘बुंदेलखण्ड के कथाकार’’। इस पुस्तक के लिए उन्होंने कथाओं का चयन स्वयं किया।
बुन्देली लोक साहित्य  गद्य और पद्य दोनों विधाओं में धनी है। बुन्देली में सामान्य जन जीवन से जुड़े संदर्भों के काव्य के साथ ही लोक गाथाएं भी सदियों से कहीं-सुनी जा रही हैं। इनमें भारतीय इतिहास के महाकाव्य कहे जाने वाले रामायण एवं महाभारत काल की कथाओं को भी गाथाओं के रूप में गाया जाता है। बुन्देलखण्ड में जगनिक के बाद विष्णुदास ने लगभग 14 वीं सदी में महाभारत कथा और रामायण कथा लिखी। विष्णुदास की महाभारत कथा 1435 ई. माना गया है। यह गाथा शैली में दोहा, सोरठा, चौपाई तथा छंदों सं युक्त है। बुन्देली की प्रसि़द्ध महाभारतकाल संदर्भित लोकगाथाएं हैं- बैरायठा, कृष्ण-सुदामा, द्रौपदी चीरहरण तथा मेघासुर दानव आदि। इनके अतिरिक्त राजा जगदेव की लोकगाथा में भी पाण्डवों की चर्चा का समावेश है। महाभारत कालीन चरित्रों से जुड़ी गाथाओं का इस प्रकार बुन्देलखण्ड में रूचिपूर्वक गाया जाना इस बात का द्योतक है कि बुन्देली जन प्रकृति से जितने वीर होते हें तथा मानवीय संबंधों के आकलन को लेकर उतने ही संवेदनशील होते हैं। उन्हें व्यक्ति के अच्छे अथवा बुरे होने की परख होती है तथा साहसी, वीर, उदार, दानी और सच्चा व्यक्ति अपना आदर्श प्रतीत होता है। इसीलिए जन-जन में गाए जाने वाली बैरायठा लोकगाथा में ‘महाभारत’ महाकाव्य की लगभग सम्पूर्ण कथा को जन-परिवेश में पस्तुत किया गया है। लोकगाथा अर्थात कथात्मक गीतों के साथ ही समय के साथ गद्यात्मक कथालेखन ने बुंदेलखण्ड में अपना स्थान बनाया जिसमें हिन्दी और बुंदेली दोनों प्रकार कथाएं आकार लेती गईं। हिन्दी में लिखी गई कथाओं ने हिन्दी साहित्य का जो इतिहास रचा वह निश्चितरूप से  रेखांकित किए जाने योग्य है। 

बुंदेलखण्ड में संस्कृत, हिन्दी, उर्दू और बुंदेली तीनों में निरंतर साहित्य सृजन हो रहा है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि बुंदेली धरती साहित्य सृजन के लिए अत्यंत उर्वरा है। इस संबंध में प्रो. बिसारिया ने पुस्तक की प्रस्तावना में बुंदेलखण्ड के कथात्मक साहित्य की गौरवशाली परंपरा का एक संक्षिप्त परिचय दिया है जिसमें वे लिखते हैं कि -‘‘ बुन्देलखण्ड अंचल प्रकृति का रमणीक लीला स्थल रहा है, जहां अगस्त्य, अपाला, मैत्रेयी, लोपामुद्रा प्रभृति अनेक ऋषियों-ऋषिकाओं ने वैदिक ऋचाओं को अनुस्यूत कर कहानियों की शुरूआत की। रामायण काल में महर्षि वाल्मीकि ने चित्रकूट की सुरम्य उपत्यकाओं में बैठकर श्रामायणश् के माध्यम से रामकथा लिखी, जो उनके जीवनकाल में ही जन-मन का कंठहार बन गई और आज भी उतनी ही लोकप्रिय है। महाभारत काल में वेद व्यास ने कालप्रिय (वर्तमान कालपी) में ‘‘महाभारत’’ की सर्जना की। कालांतर में भवभूति ने यहीं ‘‘उत्तररामचरितं’’ लिखकर रामकथा को विस्तार दिया। हिन्दी साहित्य में देखें तो पाते हैं कि जगनिक ने ‘‘परमाल रासो’’ या ‘‘आल्ह खण्ड’’ लिखकर आल्हा ऊदल को तो अमर किया ही, वीरता के स्पंदन के लिए उत्प्रेरक की भूमिका भी निभाई।’’

बुंदेलखण्ड की कथात्मक साहित्य परंपरा में आधुनिककाल के साहित्यकारों ने अपने कथा लेखन से बुंदेलखंड में विशुद्ध कथापरंपरा को जन्म दिया। ‘‘बुंदेलखण्ड के कथाकार’’ पुस्तक में कुल 23 प्रतिनिधि कहानियां रखी गई हैं। यह बुंदेलखण्ड के कथाकारों पर केन्द्रित प्रथम खण्ड है। लेखक की महत्वाकांक्षी योजना में भावी खण्ड भी शामिल हैं। इस पुस्तक में बुंदेलखण्ड के कहानीकारों की वे कहानियां है जो उन्होंने हिन्दी में लिखी और इस क्षेत्र को हिन्दी साहित्य में स्थान दिलाया। 
पुस्तक की प्रथम कहानी है माधवराव सप्रे की कहानी ‘‘एक टोकरी-भर मिट्टी’’। इस कहानी को हिन्दी की प्रथम कहानी माना जाता है। इस प्रकार देखा जाए तो बुंदेलखण्ड ने हिन्दी साहित्य को प्रथम कहानी दी। सन 1871 में पथरिया जिला दमोह मध्यप्रदेश में जन्मे माधवराव सप्रे हिन्दी पत्रकारिता के पितामह माने जाते हैं। उनकी यह कहानी मर्मस्पर्शी भावनाओं से ओतप्रोत है। दूसरी कहानी मैथिलीशरण गुप्त की काव्यात्मक कथा है जो उन्होंने बच्चों के लिए लिखी थी। तीसरी कहानी मुंशी अजमेरी ‘‘प्रेम’’ की है जिसका नाम है ‘‘हेमला सत्ता’’। यहां यह बता देना समीचीन होगा कि इस पुस्तक में बुंदेलखण्ड की समग्रता को ध्यान में रखते हुए मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश दोनों क्षेत्रों के बुंदेली कथाकारों की कहानियों का चयन किया गया है। जैसे मधवराव सप्रे मध्यप्रदेश के बुंदेलखण्ड के थे तो मैथिलीशरण गुप्त, मुंशी अजमेरी, वृंदावनलाल वर्मा उत्तर प्रदेश के बुंदेलखण्ड के थे। चौथी कहानी वृंदावनलाल वर्मा की ‘‘शरणागत’’, पांचवी कहानी सियारामशरण गुप्त ‘‘काकी’’, छठी कहानी केदारनाथ अग्रवाल की ‘‘नर्तकी तथा सातवीं कहानी गोविंद मिश्र की ‘‘फांस’’ है।

पुस्तक में आठवीं कहानी हिन्दी की चर्चित कथाकार मैत्रेयी पुष्पा की ‘‘राय प्रवीण’’ है। वल्लभ सिद्धार्थ की कहानी ‘‘कथा’’ नवीं कहानी है तथा दसवीं कहानी डॉ. (सुश्री) शरद सिंह की ‘‘चल चकवा वा देस को, जहाँ रैन नहिं होय’’ है।

ग्यारहवीं कहानी ‘‘मैं भारत का सबसे गरीब आदमी’’ है जिसके कथाकार हैं डॉ. प्रमोद कुमार अग्रवाल तथा बारहवीं कहानी है रजनी गुप्त की ‘‘अमराई’’। तेरहवीं कहानी महेंद्र भीष्म की ‘‘हलाला’’, चैदहवीं कहानी विवेक मिश्र  की ‘‘दोपहर’’ तथा पंद्रहवीं कहानी डॉ. दया दीक्षित की ‘‘चिट्ठी-पत्तरी’’ है।
‘‘कोरोना लॉक डाउन और लड़की’’ सोलहवीं कहानी है जिसे लिखा है लखनलाल पाल ने। सत्रहवें क्रम में है बृज मोहन की ‘‘अपने अपने अस्त्र’’ तथा अठाहरवें पर पन्नालाल असर की कहानी ‘‘मुस्कुराता हुआ गुमनाम चेहरा’’। उन्नीसवी कहानी है डॉ. निधि अग्रवाल की ‘‘यमुना बैंक की वह मेट्रो’’ तथा बीसवीं कहानी है छाया सिंह  की ‘‘साँझी छत’’। 
पुस्तक की इक्कीसवीं कहानी है दिनेश बैस की ‘‘दूसरी पारी’’, बाईसवीं कहानी है अनीता श्रीवास्तव की ‘‘ईंट’’ तथा अंतिम तेईसवीं कहानी है डॉ. रामशंकर भारती की ‘‘देवस्वामिनी’’। 
इस पुस्तक में संग्रहीत कथाओं के द्वारा बुंदेलखण्ड के बीसवीं सदी से इक्कीसवीं सदी तक के कथा लेखन का एक बेहतरीन परिचय पाया जा सकता है। ये वे प्रतिनिधि कहानियां हैं जो इस क्षेत्र के कथाकारों की समसामयिकता को भी रेखांकित करती हैं। इन कहानियों में विषय की विविधता है। इन कहानियों में इतिहास भी है, पौराणिक संदर्भ भी हैं, अंचल की समस्याएं एवं कोरोनाकाल की विभीषिका की कठोर स्मृतियां भी हैं। ये कहानियों इस बात की साक्ष्य हैं कि बुंदेलखण्ड के कथाकार साहित्य के समायानुसार निरंतर विकास में आस्था रखते हैं। मैत्रेयी पुष्पा, शरद सिंह तथा रजनी गुप्त ने स्त्रीविमर्श की कहानियों को एक अलग पहचान दी। वहीं विवेक मिश्र का कथालेखन बाॅलीवुड के रजतपट तक जा पहुंचा है। ये कहानियां बताती है कि बुंदेली कथाकारों ने किस प्रकार समय की नब्ज़ को थाम कर कथानकों को परवान चढाया है। यह प्रो. पुनीत बिसारिया की चयन क्षमता की खूबी है कि उन्होंने बुंदेली कथाकारों के सृजन का गोया एक क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत कर दिया है। इससे इस पुस्तक की उपादेयता शोधार्थियों के लिए भी द्विगुणित हो गई है। यह पुस्तक पठनीय भी है और संग्रहणीय भी है।                                
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