Monday, September 9, 2024

डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने प्रलेस सागर इकाई की गोष्ठी की अध्यक्षता की

कल अपरान्ह मेरी अध्यक्षता में  प्रगतिशील लेखक संघ सागर इकाई की गोष्ठी संपन्न हुई । स्थानीय कवयित्री ममता भूरिया जी के निवास पर। दिलचस्प बात यह कि कल श्रीमती ममता भूरिया जी का जन्म दिवस भी था यानी कविताएं भी पढ़ी गई और जन्मदिन सेलिब्रेट भी किया गया। साहित्य और उल्लास का सुंदर समागम। कार्यक्रम का संचालन किया डॉ सतीश पांडे जी ने। कुछ तस्वीरें कल के आयोजन की....
08.09.2024
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Saturday, September 7, 2024

गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏- डॉ (सुश्री) शरद सिंह


विघ्नहर्ता सबके विघ्न दूर करें 🙏🚩🙏
May Vighnaharta remove everyone's obstacles 🙏🚩🙏
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टॉपिक एक्सपर्ट | पत्रिका | गणपति बप्पा इते की सबरी सल्ल मिटा देओ | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

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गणपति बप्पा इते की सबरी सल्ल मिटा देओ
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह

        गणपति बप्पा की अवाई सबई खों भौत अच्छी लगत आए। देख लइयो अबे से विसर्जन लौं पूरो सागर ‘गणपति बप्पा मोरया’ के जयकारे से गूंजत रैहे। गणपति बप्पा बुद्धि के देवता कहाऊत आएं। इने विघ्नहर्ता सोई कओ जात आए। जेई से इनकी अपने इते भौतई जरूरत आए। इते तो सबरे काम ऊंसई बिगरे परे। मुतके काम ऐसे आएं जोन सालोंसाल से घिसटत जा रै। औ मुतके कामन को जेई समझ नईं परत के करे काए गए? कऊं पुल लटको डरो,  सो कऊं सड़कें खुदी डरीं। कऊं अच्छी-भली नोनी सी रोटरी मिटा डारी, तो कऊं रोटरी के इते इत्तो पानी भर जात आए के उते ‘घोर-घोर रानी’ खेलबे को जी होन लगो तो। आप ओरें समझ गए हुइयो के हम कां-कां की कै रै। अरे, उतई कारीडोर लिंगे, जोन दिना खीबई पानी बरसो रओ, बा उते की रोटरी टापू घांईं दिखान लगी रई। औ सिविललेन की रोटरी काय के लाने मिटाई, अबलौं समझ में ने आई। चलो, मिटाई सो मिटाई मनो उते चौराओ तो पिलेन कर दओ होतो। उते कढ़ो तो मुतके दचका घलत आएं। औ लटको भओ काम देखने होय सो रेलवे के गेट नंबर 29 के इते देख लेओ। कोरोना के पैले से बनबो सुरू भऔ, औ अब लौं अटको परो। पांचेक सालें तो भईं जा रईं। 
     जोन जे हम गिना रये जे सब कलेक्ट्रेट औ कचेरी के पासई के आएं। जेई कहाऊत आएं दिया तरे को आंदियारे। सो, दूर की अब का कएं? सो जेई लाने अब हम गणपति बप्पा जू से बिनती कर रै के कछू इन ओरन खों बुद्धि देओ, लाज-सरम देओ, के जे ओरें सब कछू अच्छो-अच्छो करें, औ जल्दी-जल्दी करें। बप्पा के दरबार में सुनवाई होए, जे लाने, सबई जने बोलो ‘जै गणपति बप्पा मोरया !’
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Thank you Patrika 🙏
Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Friday, September 6, 2024

शून्यकाल | हर दिन प्रासंगिक हैं मानवता के पैरोकार डॉ. राधाकृष्णन के विचार | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम -                      शून्यकाल
हर दिन प्रासंगिक हैं मानवता के पैरोकार डॉ. राधाकृष्णन के विचार
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह
      देश के द्वितीय राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन देश शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है। शिक्षा के व्यावसायीकरण के दौर में आज भी प्रासंगिक हैं उनके विचार, अपितु हर दिन प्रासंगिक हैं। यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि डॉ. राधाकृष्णन के विचारों में वह क्षमता मौजूद है जो अनेक वर्तमान समस्याओं का हल सुझा सकती है। आवश्कता है तो ‘शिक्षक दिवस’ को एक दिवसीय आयोजन के रूप में मनाने के बजाए डॉ. राधाकृष्णन के विचारों को समझने की और 365 दिन के लिए जीवन में उतारने की।
        ‘‘मानव को एक होना चाहिए।’’ यह कथन ह प्रबंधन की बात करते हैं तो हमें विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबन्धन करना चाहिए। वह शिक्षा दोषपूर्ण है जो जाति, धर्म, समुदाय अथवा लिंगभेद का पाठ पढ़ाती हो। वह शिक्षक अपराधी है जो विद्यार्थियों की कोरी स्लेट के समान मस्तिष्क में भेद-भाव की इबारत लिखते हैं। शिक्षा और शिक्षक को हमेशा तर्क की कसौटी अपने पास रखते हुए बिना किसी भेद-भाव के एकता मानव एकता की शिक्षा देना चाहिए।

आज हम हर चार कदम पर एक अंग्रेजी माध्यम स्कूल, हर दो कदम पर एक कोचिंग सेंटर देखते हैं फिर भी हमें शैक्षिक उन्नति का वह स्वरूप दिखाई नहीं देता है जो वास्तव में दिखाई देना चाहिए। ऐसा लगता है कि शिक्षातंत्र कहीं भटक गया है। विद्यार्थी शिक्षित तो हो रहे हैं किन्तु एक ओर बेरोजगारी बढ़ रही है तो दूसरी ओर असंवेदनशीलता बढ़ रही है। माता-पिता और अपने शिक्षकों के प्रति विद्यार्थियों में वह सम्मान की भावना दिखाई नहीं देती है जो कुछ दशक पहले तक देखी जा सकती थी। इसका सबसे सीधा उत्तर है कि शिक्षा में व्यावसायिकता बढ़ गई है। व्यापमं घोटाला जैसी घटनाएं शिक्षा के वर्तमान प्रबंधन पर प्रश्नचिन्ह लगाती रहती हैं। ऐसे में यह कहना कठिन है कि शिक्षाजगत में सबकुछ ठीक है। शिक्षा क्षेत्र के दोषों को दूर करने के लिए डॉ राधाकृष्णन ने सुझाव दिया था कि जब भी शिक्षा के प्रबंधन पर चिन्तन किया जाए, शिक्षा को और अधिक उपयोगी बनाने पर मनन किया जाए तो सबसे पहले शैक्षिक प्रबंधन में यूनीफिकेशन पर बल देना चाहिए। कश्मीर से कन्याकुमारी तक शिक्षा का स्वरूप एक जैसा होगा तभी पारस्परिक संवाद बढ़ेगा और लोग एक-दूसरे की समस्याओं को समझ सकेंगे।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन मानते थे कि यह सम्पूर्ण विश्व एक विश्वविद्यालय की तरह है जिसमें सभी को नित सीखते और सिखाते रहना पड़ता है। वे शिक्षा को सबसे बड़ी मानवीय शक्ति के रूप में देखते थे। उनका मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है, शिक्षा ही वह क्षमता है जो मनुष्य को अन्य प्राणियों से श्रेष्टतम साबित करती है। ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय में दिये अपने भाषण में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था- “मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति होना चाहिए और यह तभी सम्भव है जब देशों की नीतियों का आधार पूरे विश्व में शान्ति की स्थापना का प्रयत्न हो।''
         दक्षिण मद्रास में लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तिरुतनी नामक छोटे से कस्बे में 5 सितंबर सन् 1888 को सर्वपल्ली वीरास्वामी के घर जन्मे डॉ. राधाकृष्णन का विवाह तत्कालीन रीतिरिवाज़ के अनुसार बहुत छोटी आयु में ही कर दिया गया था। उनके पिता वीरास्वामी जमींदार की कोर्ट में एक अधीनस्थ राजस्व अधिकारी थे। डॉ राधाकृष्णन को अपनी बाल्यावस्था से ही पढ़ाई में अगाध रूचि थी। उनकी प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा तिरूतनी हाईस्कूल बोर्ड व तिरुपति के हर्मेसबर्ग इवंजेलिकल लूथरन मिशन स्कूल में हुई। उन्होंने मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद येल्लोर के बोरी कालेज में प्रवेश लिया और यहां पर उन्हें छात्रवृत्ति भी मिली। सन् 1904 में विशेष योग्यता के साथ प्रथमकला परीक्षा उत्तीर्ण की तथा तत्कालीन मद्रास के क्रिश्चियन कालेज में 1905 में बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने केलिए उन्हें छात्रवृत्ति दी गयी। उच्च अध्ययन के लिए उन्होनें दर्शन शास्त्र को अपना विषय बनाया। इस विषय के अध्ययन से उन्हें समूचे विश्व में ख्याति मिली। एम.ए. की उपाधि प्राप्त करने के बाद 1909 में एक कालेज में अध्यापक नियुक्त हुए और प्रगति के पथ पर निरंतर बढ़ते चले गए। उन्होंने मैसूर तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में कार्य किया।

डॉ. राधाकृष्णन ने भारतीय धर्मदर्शन एवं शिक्षा के अंतर्सम्बंधों की नए ढंग से व्याख्या की। ’द एथिक्स ऑफ वेदांत’ नामक अपने शोधग्रंथ में उन्होंने लेख किया कि -‘‘ जो गांवों में रहते हैं, गरीब हैं और अपने धार्मिक रीतरिवाजों, संस्कारों एवं परम्पराओं में बंधे हुए हैं वे जीवन को अपेक्षाकृत अधिक अच्छे से समझते हैं। क्यों कि उन्हें जीवन के व्यावहार से ज्ञान की प्राप्ति होती है। वे प्रकृति और क्रियाशीलता के अधिक निकट होते हैं। यही तो शिक्षा है वेदांत की। वेद, पुराण, दर्शन आदि सभी ग्रंथ यही कहते हैं कि देखो, समझो और सीखो।
’द एथिक्स ऑफ वेदांत’ शोधग्रंथ में जहां उन्होंने दार्शनिक चीजों को सरल ढंग से समझने की का रास्ता सुझाया वहीं इसमें उन्होंने हिंदू धर्म की कमजोरियों का भी उल्लेख किया। उनका कहना था, “हिदू वेदांत वर्तमान शताब्दी के लिए उपयुक्त दर्शन उपलब्ध कराने की क्षमता रखता है। जिससे जीवन सार्थक व सुखमय बन सकता है। सन् 1910 में सैदायेट प्रशिक्षण कालेज में विद्यार्थियों को 12 व्याख्यान दिए। उन्होंने मनोविज्ञान के अनिवार्य तत्व पर पुस्तक लिखी जो कि 1912 में प्रकाशित हुई। वह विश्व को दिखाना चाहते थे कि मानवता के समक्ष सार्वभौम एकता प्राप्त करने का सर्वोत्तम साधन भारतीय धर्म दर्शन है।“
जहां तक दर्शन का प्रश्न है तो डॉ. राधाकृष्णन का दर्शन प्रत्ययवादी कहा जा सकता है। वे शंकर के अद्वैतवाद से अत्यंत प्रभावित थे। उन्होंने शंकर के अद्वैतवेदान्त की व्याख्या की जिसे ‘नववेदान्त’ के यप् में स्वीकार किया गया। डॉ. राधाकृष्णन ने पश्चिमी विचारकों की चुनौती को स्वीकार करते हुए सिद्ध किया कि हिन्दू धर्म शुद्ध अध्यात्मवाद होते हुए भी जीवन और जगत की सत्यता का सच्चा उद्घोष करता है। अनेक पश्चिमी विद्वानों ने डॉ राधाकृष्णन के दर्शन की व्याख्या की है। ब्रिटिश फिलॉसफर प्रोफ़ेसर सी.ई.एम. जोड ने उनके दर्शन पर ’‘काउंटर अटैक फ्रॉम दि ईस्ट : द फिलॉसफी ऑफ राधाकृष्णन’’ नामक ग्रंथ लिखा। जर्मनी में जन्मे और सन् 1952 में नोबल प्राईज़ के विजेता रहे अलबर्ट स्वाइत्ज़र ने डॉ. राधाकृष्णन के दर्शन में नव हिन्दू धर्म का प्रवर्तन देखा और उसको जीवन तथा जगत की सत्ता का प्रतिपादन करने वाला दर्शन माना। विदेशी विचारकों का डॉ. राधाकृष्णन के दर्शन और चिनतन के प्रति रुझान इसलिए भी था क्यों कि डॉ. राधाकृष्णन ने धर्मदर्शन को रुढ़िवादी दृष्टिकोण से बाहर निकाल कर विश्लेक्षणात्मक पद्धति से व्याख्यायित किया। उन्होंने अपनी धर्म मीमांसा में धर्ममीमांसा की आलोचना करने वाले सन्तों, सूफ़ियों और रहस्यवादियों को भी महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। धर्म की महत्ता को स्थापित करते हुए डॉ. राधाकृष्णन ने विज्ञान की प्रगति को भी आवश्क माना। उनका कहना था कि ‘‘धर्म, चिन्तन और जीवन-ये तीनों विज्ञान के जल से सिंचित हो कर और अधिक पल्लवित हो सकते हैं।’’ यद्यपि वे मानते थे कि धर्म और विज्ञान दोनों का ही वर्तमान स्वरूप दोषपूर्ण है और इन दोनों का परिष्कार होना जरूरी है।

‘शिक्षक दिवस’ मनाते हुए इसे एक महज औपचारिक प्रक्रिया जैसे अपनाने के बजाए यदि डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के विचारों एवं दर्शन को अपनाया जाए तो आपसी कटुता, आतंकवाद, मॉबलिंचिंग, हर तरह के भेदभाव की समस्या से निजात पाया जा सकता है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के विचार आज भी प्रासंगिक हैं।
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Thursday, September 5, 2024

चर्चा प्लस | बलिहारी गुरु आपने ! : शिक्षक जब खुद को ऐसा बना पाते हैं | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
बलिहारी गुरु आपने ! : शिक्षक जब खुद को ऐसा बना पाते हैं 
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                          
           भारतीय संस्कृति में शिक्षक का स्थान ईश्वर से भी ऊपर माना गया है। पुरातनकाल में शिक्षक गुरुकुल में निवास करते थे और वहीं विद्यार्थियों को शिक्षादान किया करते थे। समय के साथ शिक्षा के क्षेत्र में जो परिवर्तन हुए उन्होंने क्रमशः इसे व्यवसाय में परिवर्तित कर दिया। आज शिक्षा धनार्जन का साधन और व्यवसाय बन गया है। किन्तु वास्तविक पूंजी उसी शिक्षक के पास होती है जो अपने कर्म के प्रति ईमानदार रहता है। ऐसे शिक्षकों का स्थान समाज और विद्यार्थियों के हृदय में सदा रहता है। अब यह शिक्षक को स्वयं तय करना है कि वह किस तरह की पूंजी कमाना चाहता है?     
    भारतीय संस्कृति में गुरु अर्थात शिक्षक विद्यार्थियों के जीवन का निर्माता माना गया है। पौराणिक ग्रंथों एवं महाकाव्यों में अनेक ऐसे प्रसंग है जिनमें शिक्षक ने अपने शिष्य के जीवन को महत्वपूर्ण दिशा दिखाई। श्रीराम और श्रीकृष्ण जिन्हें ईश्वर का अवतार माना गया है, वे भी गुरुकुल में रह कर शिक्षा प्राप्त करते रहे। शिक्षा प्राप्त करने के साथ ही शिष्यों का कार्य होता था गुरुकुल परिसर की सफाई करना, चूल्हे के लिए लकड़ियां काट कर लाना और विशेष अवसरों पर भिक्षाटन भी करना होता था। यह सब भावी जीवन के निर्माण की प्रक्रिया थी जिसमें आगे चल कर शिष्य श्रम से न डरे, घमंड न करे और मिलजुल कर रहना सीखे। वहीं, शिक्षक अपने शिष्यों के साथ वत्सल भाव रखते थे। सभी शिष्य उनके लिए संतान की भांति होते थे जिनके जीवन को संवारना उनका दायित्व था। आज जब किसी शिक्षक द्वारा अपने विद्यार्थियों के साथ दुर्व्यवहार अथवा आर्थिक शोषण का समाचार सामने आता है तो शिक्षक की परंपरागत प्रतिष्ठा खण्डित होती दिखाई पड़ती है।

एक उत्तम शिक्षक का जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह मैं अपने अनुभव के आधार पर विश्वासपूर्वक बता सकती हूं। मेरे जीवन में कुछ शिक्षक ऐसे आए जिनकी दोषपूर्ण शिक्षा पद्धति के कारण मुझे कुछ विषयों से अरुचि हो गई थी। किन्तु वहीं स्कूल और काॅलेज जीवन में कुछ ऐसे शिक्षक भी मिले जिनका मेरे जीवन पर सकरात्मक प्रभाव पड़ा। यूं तो मेरी माता जी डाॅ. विद्यावती ‘‘मालविका’’ स्वयं एक उच्चकोटि की शिक्षिका थीं किन्तु विद्यालय में उनसे पढ़ने का सौभाग्य मुझे नहीं मिला और घर में वे मां पहले थीं, शिक्षिका बाद में। घर में मेरे आरंभिक शिक्षक रहे मेरे नानाजी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संत ठाकुर श्यामचरण सिंह। क,ख,ग,घ से ले कर अखबार पढ़ना तक मैंने उन्हीं से सीखा। फिर जब मैं नौवीं कक्षा में थी तो मेरी दीदी डाॅ वर्षा सिंह ने मुझे एक बार शिक्षा देने का प्रयास किया। वार्षिक परीक्षा के समय उन्होंने रात भर मुझे केमिस्ट्री में बेंजीन फार्मूला रटाया। जब सुबह परीक्षा के लिए निकलने के समय उन्होंने मुझसे वह फार्मूला पूछा तो मेरे दिमाग से वह गोल था। उसी पल दीदी ने घोषणा कर दी कि ‘‘मैं तुम्हें नहीं पढ़ा सकती।’’

उन दिनों मेरी एक टीचर थीं जिनका नाम था शमीम मसीह। अब वे कहां हैं, मुझे ज्ञात नहीं हैं। उनका स्वभाव बहुत मधुर था। वे मुझे अच्छी लगती थीं। वे कभी किसी को डांटती नहीं थीं, बस, प्यार से समझा देती थीं। वे सोशल स्टडीज़ के अलावा हमें क्राफ्ट सिखाया करती थीं। उन्होंने कार्डबोर्ड से चाय की ट्रे बनाना, राखी बनाना आदि बहुत-सी चीजें बनाना सिखाया था। उनके मधुर व्यवहार का मेरे बाल मानस पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उनकी उस समय की छवि मुझे आज तक याद है। 

दूसरे टीचर मुझे मिले महाविद्यालय में जिनकी शिक्षा पद्धति ने न केवल मुझे भारतीय इतिहास विषय से प्रेम करना सिखा दिया अपितु सही शिक्षण पद्धति भी सिखाई। उनका नाम है आर. डी. दास। कुछ समय पहले तक मुझे पता नहीं था कि वे इन दिनों कहां निवास कर रहे हैं। फिर संयोगवश छत्तीसगढ़ से चिकित्सक साहित्यकार डाॅ चंद्रकांत वाघ सागर आए और उन्हें मैंने चर्चा के दौरान बताया कि दास सर राजनादगांव के रहने वाले थे और शायद अब भी वहीं कहीं हों। सुखद आश्चर्य मुझे तब हुआ जब डाॅ वाघ ने उन्हें ढूंढ निकाला और मुझे उनका फोन नंबर भी उपलब्ध कराया। दास सर इन दिनों बालोद (छत्तीसगढ़) में रह रहे हैं। वर्षों बाद फोन पर उनसे बात करना कितना सुखद था, यह मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती हूं। दास सर के प्रति मेरी श्रद्धा उनकी शिक्षण पद्धति के कारण जागृत हुई थी। वे अपने काम के प्रति समर्पित थे। वे हमारी एक्स्ट्रा क्लासेस भी लिया करते थे। वे हमें इतिहास पढ़ाते थे। बिना किसी किताब या नोट्स के पूरी तारीखों सहित एक-एक घटना को इस तरह समझाते कि लगता कि इतिहास की वे सभी घटनाएं हमारी आंखों के सामने घटित हो रही हैं। कम से कम मुझे तो ऐसा ही लगता था। उनकी शिक्षण पद्धति ने इतिहास को याद रखना इतना आसान बना दिया कि मुझे इतिहास विषय से इतना गहरा प्रेम हुआ कि आगे चल कर मैंने पहले मध्यकालीन भारतीय इतिहास में एम.ए. किया। फिर प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व में एम.ए. किया और इसके बाद खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्वों पर पीएच.डी. कर डाली। दास सर के समय याद की हुई ऐतिहासिक तारीखें आज भी मुझे यांद हैं। वे युद्धों की व्यूह रचना ब्लैकबोर्ड पर चित्रित कर के समझाते थे। बाबर और इब्राहिम लोदी की व्यूह रचना आज भी मैं कागज़ पर उतार सकती हूं। 
यदि सच कहा जाए तो दास सर से ही मैंने पढ़ाना भी सीखा। जब मैं स्वयं विद्यालयीन शिक्षिका बनी तो मुझे दास सर की शिक्षण पद्धति याद रही। मैं पूरी तैयारी कर के कक्षा में जाती थी और किसी पुस्तक या नोट्स की सहायता के बिना अध्यापन करती थी। उस दौरान मुझे अनुभव हुआ कि मेरी शिक्षण पद्धति का मेरे छात्र भी आदर करते थे। वस्तुतः छात्र ऐसे शिक्षक को कभी गंभीरता से नहीं लेते हैं जो शिक्षा देने में लापरवाही करते हैं। ईमानदारी से पढ़ाने वाले शिक्षक छात्रों को पसंद आते हैं।

मेरे जीवन में अल्पकालिक रूप से एक और शिक्षक रहे जिनका नाम था अंबिका खरे सर। उनसे स्कूली शिक्षा तो ग्रहण नहीं की लेकिन जब मैं काॅलेज में पढ़ रही थी तो मुझे अपना अंग्रेजी ज्ञान सुधारने की इच्छा हुई। उन दिनों पन्ना जैसी छोटी जगह में इंग्लिश कोचिंग का चलन नहीं था। मेरी मां ने अंबिका खरे सर से बात की तो उन्होंने मुझे सिखाना सहर्ष स्वीकार कर लिया। मेरी पूरी स्कूली शिक्षा हिन्दी माध्यम के सरकारी स्कूल में हुई थी इसलिए अंग्रेजी की न तो मेरी रायटिंग अच्छी थी और न स्पेंलिंग्स सही रहती थी। ग्रामर की दशा तो पूछिए ही मत। लेकिन खरे सर ने बड़े धैर्य के साथ मुझे सिखाना शुरू किया। रायटिंग सुधरवाने के लिए चार लाईन वाली काॅपी में लिखने का अभ्यास कराने लगे। यह पढ़ कर सभी को हास्यास्पद लगेगा कि काॅलेज में पढ़ने वाली एक लड़की यानी मैं चार लाईन वाली बच्चों की काॅपी में रायटिंग सुधारने का अभ्यास करती थी। उन्होंने मुझे स्पेलिंग और उच्चारण के लिए बोल-बोल कर अखबार पढ़ने का निर्देश दिया। इन सबका काफी अच्छा नतीजा रहा। दुर्भाग्यवश यह सिलसिला अधिक समय तक नहीं चल सका। उन दिनों पत्रकारिता का कीड़ा मुझे काट चुका था अतः धीेरे-धीरे खरे सर के पास जाना छूट गया। आज सोचती हूं तो पछतावा होता है कि काश! कुछ समय और मन लगा कर उनसे पढ़ लिया होता। 

वस्तुतः हर व्यक्ति के जीवन में प्रभावी और कुछ अप्रभावी शिक्षक आते हैं। याद दोनों रह जाते हैं। लेकिन जिन शिक्षकों के कारण जीवन को सही दिशा मिलती है, वे हमेशा सम्मानजनक रूप से स्मृतियों में बने रहते हैं। जो निःस्वार्थ भाव से शिक्षा देते हैं उनके प्रति जीवनपर्यंत श्रद्धाभाव रहता है। क्या कोई ऐसे शिक्षक को सम्मान देना चाहेगा जिसने शिक्षा के बदले भरपूर पैसा वसूला हो। आज कोचिंग में पढ़ने वाले छात्र अपने कोचिंग सेंटर को याद रखते हैं, उसकी चर्चा करते हैं लेकिन वहां पढ़ाने वाले टीचर्स की नहीं। ऐसे टीचर्स पूरी मेहनत करते हैं, बच्चों का भविष्य संवारते हैं किन्तु एक व्यवसायी की भांति, इसलिए वे अपने छात्रों के दिलों में जगह नहीं बना पाते हैं। आज छात्र हों या उनके अभिभावक वे शान से यह तो कहते हैं कि उन्होंने कोटा में कोचिंग ली है, इन्दौर में कोचिंग ली है, बैंगलुरु में कोचिंग ली है लेकिन कोई सिर ऊंचा कर के एक भी नाम नहीं लेता है कि हमने फलां सर या मैडम से शिक्षा ली है। 

कभी सोचा है कि एकलव्य द्रोणाचार्य को ही अपना गुरु क्यों बनाना चाहता था? या फिर कर्ण जैसा योद्धा परशुराम से ही शिक्षा लेने को इतना आतुर क्यों था कि शिक्षा पाने के लिए उसने झूठ बोला। इन दोनों प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि चाहे द्रोण हो या परशुराम अपनी विद्या में पारंगत थे। उस समय हर योद्धा उन्हीं से शिक्षा प्राप्त करना चाहता था। इन दो गुरुओं की शिक्षणसंबंधी विशिष्टता को आज के शिक्षिकों को समझना चाहिए। क्योंकि यह तो शिक्षकों को स्वयं ही तय करना होगा कि उन्हें शिक्षा का व्यवसायी बनना है और केवल धन कमाना है अथवा शिक्षणकर्म को ईमानदारी से निभा कर धन के साथ सम्मान भी कमाना है। अर्थात् ‘‘बलिहारी’’ वाले शिक्षक बनना है अथवा दूकानदारी वाले शिक्षक।                   
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Tuesday, September 3, 2024

पुस्तक समीक्षा | युवा दृष्टि से जीवन का अन्वेषण करती कविताएं | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

आज 03.09.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई युवा कवि पवन रजक के काव्य संग्रह "मैं कौन हूं" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा
युवा दृष्टि से जीवन का अन्वेषण करती कविताएं
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक  - मैं कौन हूं?
कवि    - पवन रजक
प्रकाशक - एन.डी. पब्लिकेशन, बहादुरपुर, साउथ ईस्ट दिल्ली - 110044
मूल्य    - 150/-  
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पवन रजक काव्य जगत के लिए निःसंदेह एक नया नाम हैं, किन्तु वे नेपथ्य में रह कर एक लम्बे समय से काव्य सृजन कर रहे हैं। यह लम्बा समय बहुत दीर्घ भी नहीं है क्योंकि 05 अक्टूबर 1995 को ग्राम नरयावली में जन्मे पवन रजक अभी बहुत कम आयु के हैं जबकि उनकी कविताओं से उनकी आयु का अनुमान लगाना कठिन है। ‘‘कौन हूं मैं’’ इनका प्रथम काव्य संग्रह है जिसे मैं पवन रजक के काव्यात्मक उद्घोष का मंगलाचरण कहूंगी। इस प्रथम काव्य संग्रह की भूमिका लिखने का फोन पर आग्रह किया। मेरी स्वीकृति मिलने पर उन्होंने मुझे पांडुलिपि उपलब्ध करा दी। मेरी भेंट पवन से नहीं हुई थी। मैंने उनकी कविताएं पढ़ी और कविताओं में निहित गंभीर चिंतन ने मुझे प्रभावित किया। कई महीनों बाद जब उनका संग्रह प्रकाशित हो कर आया और उन्होंने मुझे भेंट किया तब संग्रह में दिए गए पवन के परिचय से मुझे उनकी वास्तविक आयु का पता चला। मैं यह सोच कर चकित रह गई कि ग्रामीण परिवेश में रह कर शिक्षा प्राप्त करने वाले एक युवक का जीवन के प्रति कितना गहरा दृष्टिकोण है।  

पवन रजक ने अपने इस प्रथम काव्य संग्रह में अपनी अतुकांत कविताओं को रखा है। जब पवन की कविताओं को मैंने पढ़ना आरम्भ किया तो मुझे लगा कि इस युवा कवि में अपार संभावनाएं हैं क्योंकि एक कवि के लिए जो सबसे पहला आवश्यक तत्व होता है संवदेनाओ का कोमल किन्तु दृढ़ उद्घोष, वह मुझे इस संग्रह की कविताओं में गुंजित होता सुनाई पड़ा। वस्तुतः कविता मन और आत्मिकता के मेल से उत्पन्न होती है। इसीलिए काव्यशास्त्रों में कवित्व को आत्मा की अनुभूति कहा गया है। जब कोई बात हमारे मन को स्पर्श करती है, हमें आंदोलित एवं आलोड़ित करती है, हमें विचार करने को विवश करती है और हम अपनी भावनाओं के आधार पर उसका आकलन करते हैं, तब जो अभिव्यक्ति बनती है, वही कविता होती है। पवन रजक एक युवा कवि हैं इसलिए उनकी कविताओं में संवेदना की सीमा अनंत है। उनकी जिज्ञासाएं अनंत हैं। सबसे पहले तो गोया वे स्वयं के बारे में जानने को उत्सुक हैं -‘‘कौन हूं मैं?’’ यह एक ऐसा यक्षप्रश्न है जिसका उत्तर मनुष्य के रूप में मनुष्य के लिए पाना कठिन है किन्तु यदि वह दार्शनिक भाव से विचार करे तो इसका उत्तर उसे ‘‘भगवद्गीता’’ के अध्याय (2/12) में मिल जाएगा, जहां श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि -
न त्वेवाहं जातुश्चं न त्वं नेमे जनाधिप।
न चैव न मृष्यामः प्राप्य द्वैतः परम्।।
- अर्थात् कभी ऐसा समय नहीं था जब मैं मौजूद नहीं था, न ही तुम, और न ही ये सभी, न ही भविष्य में हम में से कोई भी संघर्ष नहीं करेगा। सबसे सटीक उत्तर यही है कि मनुष्य भी एक प्रकृति है अथवा प्रकृति का अभिन्न तत्व है। इसीलिए वह पृथ्वी पर सदा उपस्थित है। और जब प्रकृति का होना ही पृथ्वी का होना है तो मनुष्य को स्वयं को प्रकृति के रूप में पहचान कर पृथ्वी की रक्षा करनी चाहिए। यह विस्तृत संदर्भ पवन रजक की उस एक कविता के परिप्रेक्ष्य में है जिसका शीर्षक है ‘‘मैं प्रकृति हूं’’। वे लिखते हैं- 
मैं प्रकृति हूं
मुझसे ही सब उपजे जग में
नील गगन और सुंदर वन
चांद-सितारे, फूल और कलियां
करती हूं सबकुछ अर्पण
मुझको रोज पूजने वाले
हर मानव की मैं संस्कृति हूं 
मैं प्रकृति हूं।

कविता के इस आरंभिक अंश में ही कवि ने मानो अपने प्रश्न ‘‘कौन हूं मैं’’ का उत्तर पा लिया है। फिर भी जीवन की जटिलताएं बार-बार उलझाती हैं। जीवन आसान नहीं है। जटिल परिस्थितियां  अनेक उत्तरों को भी अनुत्तरित कर देती हैं। अपने दुख, पराए दुख, दुख के कारण और दुख के प्रकार ये सभी आंदोलित करते हैं और इस प्रश्न को बार-बार उछालते हैं कि ‘‘कोई जीत कर क्या जीता और कोई हार कर क्या हारा?’’ ठीक यही प्रश्न मौजूद है पवन की कविता में। कवि ने अतीत के उदाहरणों को सामने रख कर वर्तमान को टटोलने का प्रयास किया है और प्रश्न किया है-
किसी ने जीता महाभारत का रण 
कई कईयो बार दिल्ली जीतें, 
हर युग में द्वंद हुए जिनमें 
कई कईयों के जीवन बीते। 
अर्जुन स्वयंवर मे द्रोपदी जीता 
सिकंदर ने जीत लिया भूगोल सारा, 
पर कोई जीत के क्या जीता 
और कोई हार कर क्या हारा।    

कवि पवन ने सामाजिक जीवन के यथार्थ को भी अपनी कविताओं में बड़ी मार्मिकता से पिरोया है। समाज में स्त्रियों की दशा लगभग सदा उपेक्षापूर्ण रही है। फिर भी स्त्रियां अपनी कोमल भावनाओं में जीती हुई डटी रहती हैं। वे हार नहीं मानती हैं। ‘‘फुआ’’ को ले कर लिखी गई उनकी कविता परिवार के उस रिश्ते की विडंबनाओं का आकलन करती है जिसकी ओर प्रायः किसी का ध्यान ही नहीं जाता है। फुआआंे को ले कर लिखी गई इस में बड़ी ही खूबसूरती से जिंदगी के बारीक से बारीक अनुभवों को शब्दों में पिरोया गया है। फुआ भी एक स्त्री होती है जो समाज की अन्य स्त्रियों से अलग नहीं है, उसे भी विसंगतियां झेलनी पड़ती हैं, फिर भी वह अपने कतर््व्यों से विमुख नहीं होती है। कविता का एक अंश देखिए-
भोर हुई ही थी आई खबर 
कि एक और फुआ शांत हुई, 
सालों तक तो आती रही 
पर सालों पहले एकांत हुई।
वह फुआ मुझे सैनिक लगी
जिसने जीवन का मान किया है, 
दो कुलों के मान के खातिर 
प्राणों का बलिदान किया।

अपनी अभिव्यक्ति के दायरे में जीवन की सहज अनुभूतियों और संवेदनाओं को प्रकट करती पवन रजक की कविताएं बहुत-सा अनकहा कह जाती हैं जिसके कारण संग्रह की कविताओं में एकरसता नहीं, वरन विविध रंग समाए हुए हैं। ये सभी जीवट रचनाएं हैं जो जीवन के अनुभवों से गुज़र कर शब्दों तक आई हैं। इन कविताओं में रचनाकार के सरोकारों का दायरा विस्तृत है और वैयक्तिक भावों के अतिरिक्त कवि नेे सामाजिक सरोकार पर बेहद पैनी और सधी हुई पंक्तियां कही हैं। ‘‘गांव की पंगत’’ सामाजिक सरोकारों पर एक सटीक कविता है। कवि पवन की यह विशेषता है कि वे समाज से ही नए बिम्ब चुनते हैं जिससे उनकी कविताएं और अधिक यथार्थवादी बन कर उभरती हैं। जैसे ‘‘गांव की पंगत’’ कविता में उन्होंने ‘‘पंगत’’ अर्थात् सामूहिक-भोज को जीवनधारा में सामाजिक लोकाचार के महत्व को बड़ी बारीकी से रेखांकित किया है। यूं तो संग्रह में कई कविताएं हैं जिन पर विस्तार से चर्चा की जा सकती है किन्तु बिना किसी चर्चा-परिचर्चा के भी उन्हें पढ़ा जा सकता है। फिर भी संग्रह की एक और कविता है जिसकी चर्चा मैं यहां करना चाहती हूं -‘‘ऐसा क्यों है’’। इस कविता में कवि ने उन परिस्थियों की ओर लक्ष्य किया है जिनके कारण समाज में विसंगतियां उत्पन्न होती हैं। जिनके कारण मनुष्य मनुष्य के बीच भेद-भाव बढ़ता है और जो जीवन में अशांति फैलाने के लिए जिम्मेदार ठहराई जा सकती हैं -‘‘ये भय/ ये झिझक/और ये/डर क्यों है,/वक्त के कोहरे से ढका/गुमनाम सा मेरा घर क्यों हैं।/आंधियों से जूझता दिन का हर/पहर क्यों है,/तूफान टकराकर हवेली से/मेरे झोपड़ पर ढाता कहर क्यों है।’’

कवि पवन अपनी कविताओं में बड़ी सादगी से कटाक्ष करते हैं। उनकी कविताओं की छोटी-छोटी पंक्तियां भी बड़े-बड़े भाव समेटे रहती हैं। कवि के शब्द-विन्यास में सटीकता है। वे अपनी बात पूरे विश्वास के साथ कहते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि युवा कवि पवन रजक के पास एक गहरी काव्य दृष्टि है। उनमें अभिव्यक्ति की उत्कट आकांक्षा है। वे समाज से ही नहीं वरन समय से भी संवाद करना चाहते हैं और इसीलिए वे अतीत के पन्ने पलट कर ‘‘रामायण’’, ‘‘महाभारत’’ तथा अन्य पौराणिक ग्रंथों के उद्धरण सामने रखते हैं ताकि उनसे सीख ले कर समाज अपना वर्तमान सुधार सके, संवार सके। यही वे विशेषताएं हैं जो पवन रजक को एक संभावनाशील कवि बनाती हैं। बेशक़ अभी उन्हें अभी स्वयं को विचारों और शिल्प के स्तर पर तराशना है क्योंकि निरंतर तराशे जाने पर ही एक श्रेष्ठतमकला स्थापना पाती है। निरंतरता ही शाश्वत प्रक्रिया है जो एक कवि को भी परिपक्वता की ओर ले जाती है। इस प्रथम संग्रह की कविताओं को पढ़ कर मुझे पूरा विश्वास है कि यदि इसी प्रकार सतत सृजन करते रहें तो पवन रजक काव्य जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाएंगे। यह भी विश्वास है कि इस संग्रह की कविताएं पाठकों को भी पसंद आएंगी तथा आत्मीय लगेंगी।
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Sunday, September 1, 2024

एक हैप्पी डे | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

सितंबर माह का प्रथम दिवस एक आत्मीयता भरे माहौल में व्यतीत हुआ ... जी हां, डॉ अलका जैन  जो सेवानिवृत्ति आयुष अधिकारी हैं किंतु उन्हें बागवानी से असीम प्यार है... उनके घर की छत पर लगा बगीचा मन मोह लेता है... 🌹🦋🌸🐝🏵️🌹🌱☘️🍀
     डॉ अलका दीदी के पास मेरे लिए एक न एक सरप्राइज जरूर रहता है जब मैं पिछली बार उनसे मिली थी तो उनके छत के बगीचे को देखकर चकित रह गई थी और इस बार मैं उनके एंटीक कलेक्शन को देखकर दंग रह गई... पुराने रेडियो, पुराने रिकॉर्ड प्लेयर्स तथा पुराने ऑडियो कैसेट्स का कलेक्शन देखकर चकित रह जाना स्वाभाविक था... उन्होंने सारी पुरानी वस्तुएं बहुत सहज कर रखी हैं... उनका रखरखाव देखकर ऐसा लगता है कि वे सभी नए इंस्ट्रूमेंट हों... रिकॉर्ड प्लेयर आज भी चल रहा है तथा पुराना रेडियो आज भी बज रहा है.... उनका यह कलेक्शन ऐसे सभी लोगों के लिए प्रेरणादायक है जो पुरानी वस्तुओं को बेकार का समान समझकर कबाड़ी के हाथों बेच देते हैं या फिर फेंक देते हैं.... 🔊📢📻🎼🎵🎶📣
     आज आरंभ में मैं और अलका दीदी आपस में बतियाते रहे किंतु फिर हमने कवयित्री सुमन झुड़ेले को भी फोन करके बुला लिया। हम तीनों में साहित्यिक अभिरुचि के अलावा एक चीज और कॉमन है, वह है बागवानी का जुनून। अलका दीदी ने छत के दो तल्लों पर बगीचा लगाया हुआ है, मैंने अपनी छोटी सी बालकनी में बगीचा लगा रखा है और सुमन अपने घर की चौथी मंजिल पर रूफटॉप बागवानी करती हैं। इन दो समानताओं के अलावा एक समानता और थी जिसके कारण हमारी बैठक एक छोटी-मोटी बैचलर पार्टी जैसी हो गई। 📣🥘🥣☕🎉🎊🎈🎏
       अलका दीदी के घर की छत से पुराने सागर की भी दिलचस्प झलक दिखाई देती है....
      🎈वैसे आज वाकई बहुत मज़ा आया। हमेशा की तरह डॉ. अलका जैन दीदी ने मुझे दो पौधे उपहार में दिए और विशेष प्रकार के  फल भी दिए जिनकी सब्जी बनाई जाती है। मैंने आज तक इसकी सब्जी नहीं खाई है। अब मैं पहली बार बनाऊंगी। सॉरी! इस फल का नाम मैं भूल रही हूं... कल उनसे फिर से पूछ कर बताऊंगी... वैसे यदि आप में से इसे कोई पहचानता हो तो मुझे नाम बता सकता है... 🌿🍀🌱🌸🌹🏵️🐝🦋
मेरे आज के दिन को सुखद और सार्थक बनाने के लिए हार्दिक धन्यवाद डॉ अलका जैन दीदी 🙏❤️🙏
और हमारे साथ शामिल होने के लिए दिली शुक्रिया प्रिय सुमन झुड़ेले 🌱❤️🌱
  
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