Sunday, September 15, 2024

डॉ (सुश्री) शरद सिंह आत्मरक्षा प्रशिक्षण कार्यशाला में बतौर अतिथि

डॉ (सुश्री) शरद सिंह आत्मरक्षा प्रशिक्षण कार्यशाला में बतौर अतिथि

"आज के माहौल में लड़कियों और महिलाओं को आत्मरक्षा के तरीके सीखना जरूरी है। इस दिशा में शस्त्र कला प्रशिक्षण एवं व्यक्तित्व कार्यशाला द्वारा महिलाओं और लड़कियों को लाठी, तलवारबाजी और कराटे सिखाया जाना एक महत्वपूर्ण शुरुआत है। इससे महिलाओं और बच्चियों में आत्मविश्वास भी बढ़ेगा।" - कल, 14.09. 2024 को मैंने अपने उद्बोधन में कहा। अवसर था समष्टि वेलफेयर फाउंडेशन एवं सिद्धत्व संस्था द्वारा लाठी एसोसिएशन के सहयोग से संचालित की जा रही शस्त्र कला प्रशिक्षण एवं व्यक्तित्व कार्यशाला का सत्र।  सिटी स्टेडियम में आयोजित की जा रही इस कार्यशाला के सत्र में बतौर अतिथि डॉ (सुश्री) शरद सिंह अर्थात मेरे साथ उल्लेखनीय उपस्थित थी सांसद श्रीमती लता वानखेडे, रीजनल डायरेक्टर हेल्थ डिपार्मेंट डॉ ज्योति चौहान तथा अंत्योदय समिति की अध्यक्ष श्रीमती प्रतिभा चौबे की। इस अवसर पर सांसद श्रीमती लता वानखेडे जी ने कहा कि इस तरह कि आत्मरक्षा कलाओं को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए और इस दिशा वे भी प्रयास करेंगी।
     आयोजनकर्ता डॉ. निवेदिता रत्नाकर, दीपा तिवारी (विधि विशेषज्ञ) एवं डॉ. श्वेता नेमा इस आयोजन के लिए प्रशंसा एवं धन्यवाद की पात्र हैं। 
     हार्दिक आभार एडवोकेट एवं समाजसेवी दीपा तिवारी जी का जिन्होंने मुझे इस आयोजन में आमंत्रित किया 🙏
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Saturday, September 14, 2024

टॉपिक एक्सपर्ट | पत्रिका | सबई खों पालन करो चाइए दसलक्षण | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली में
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टाॅपिक एक्सपर्ट
सबई खों पालन करो चाइए दसलक्षण
- डॉ (सुश्री) शरद सिंह
     गणपति बप्पा बिराजे हैं औ संगे जैन समाज को दसलक्षण परब सोई चल रओ । बप्पा सो भलो करहेईं, मनो अपन ओरन खों बी कछु अच्छे काम करो चाइए जीसे जिनगी सुदर जाए। अच्छी बातें सबई धरम में होत आएं। सो, अच्छी बातें चाए जोन धरम की होंए बे सबई मानुस को पालन करो चाइए। जो ने पतो होय सो खुदई देख लेओ। पैलो लक्षण आए क्षमा। दूसरो आए मार्दव। ने लड़ो औ ने झूठो गरब न करो। तीसरो आए आर्जव। मने दूसरों से जलापिट्टी ने करो। चौथो आए सत्य। अब ई बारे में आप सब खुदई जानत हो। पांचवो आए शौच। मने बुरई आदतन औ लालच खों छोर देओ। छठो आए संयम। सो, सहूरी धरे में भलाई ठैरी। सातमों तप औ आठमों आए त्याग। ईको मतलब जे के नोने काम करो औ सबरी बुराई खों छोर देओ, सो गिरहस्थी बी नोनी चलहे। नौमों अंकिचन औ दसमों आए  ब्रह्मचर्य। अंकिचन मने नियम खों पालो औ ब्रह्मचर्य मने बुरई आदत़ें छोर के भले मानुस बनो। सो जे सबरे लक्षण सबई के पालन जोग आएं। सांची कई के नईं?
    जो पइसा की जोड़ा-जोड़ी में ने परो जाए, सो जिनगी आसान हो जाए। फेर  रिशवतखोरी, कामचोरी, मिलावटखोरी ने हुइए। दूसरन की मदद करो। औ संगे, सांची बोलो औ कोनऊं सल्ल ने पालो। गणपति बप्पा बी जेई कैत आएं औ महवीर जू जेई कैत आएं। जो अपन ओरें अच्छे से रैहें, तो अपनो घर-परिवार अच्छो रैहे। जो घर-परिवार अच्छो रैहे, सो अपने गांव-शहर अच्छे रैहें। अच्छे गांव-शहरन सेई तो अपनो देस अच्छो रैहे। सो गणपति बप्पा खों पूजो औ दसलक्षणन खों मानों। फेर सब अच्छो-अच्छो हुइए।
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Thank you Dear Reshu Jain 🙏
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Friday, September 13, 2024

शून्यकाल | श्रीगणेश के प्रथमपूज्य देवता होने का समसामयिक महत्व | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम - 'शून्यकाल'  
       श्रीगणेश के प्रथमपूज्य देवता होने का समसामयिक महत्व
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह

             चाहे हिन्दू हों अथवा किसी अन्य धर्म को मानने वाले, किन्तु सभी जानते हैं कि हिन्दू पूजाविधि में श्रीगणेश की पूजा से ही हर अनुष्ठान आरम्भ होता है। हिन्दू धर्म में श्रीगणेश को कार्य आरम्भ करने का पर्याय माना गया है। इसीलिए किसी भी कार्य को आरम्भ करते हुए कहा जाता है कि ‘‘श्रीगणेश किया जाए’’। गणेश को विघ्नविनाशक देवता माना गया है अतः कार्य प्रारम्भ होने के पूर्व यह विध्नहर्ता की प्रार्थना भी आवश्यक है। किन्तु श्रीगणेश ही क्यों प्रथमपूज्य देवता माने गए, जबकि ब्रह्मा, विष्णु और महेश तो स्वयं में सर्वशक्तिमान देवता हैं? तो चलिए देखते हैं उन पौराणिक कथाओं को जो यह बताती हैं कि गणेश प्रथमपूज्य देवता कैसे बने। ये कथाएं वर्तमान जीवन को भी महत्वपूर्ण सबक देती हैं।

     हिन्दू धर्म संस्कृति में हर शुभकार्य एवं पूजाविधि का आरंभ श्रीगणेश पूजा से ही होता है। कुछ लोग कार्य का शुभारंभ करते समय सर्वप्रथम ‘‘श्रीगणेशाय नमः’’ लिखते हैं। यहां तक कि चिट्ठी और महत्वपूर्ण कागजों में लिखते समय भी ‘‘ऊं’’ या ‘‘श्रीगणेश’’ का नाम अंकित करते हैं। क्योंकि यह माना जाता है कि श्रीगणेश के नाम स्मरण मात्र से उनके कार्य निर्विघ्न संपन्न होते हैं। शुभकार्यों के आरंभ एवं पूजन के पूर्व श्रीगणेश पूजा ही क्यों की जाती है? इस संबंध में पौराणिक ग्रंथों में विविध कथाएं मिलती है। 
कहा जाता है कि कोई भी जीत बल से नहीं वरन बुद्धि से हासिल होती है। एक पहलवान शारीरिक दृष्टि से कितना भी बलशाली क्यों न हो, यदि उसमें दांव-पेंच की बुद्धि नहीं है तो उसका पटखनी खाना तय है। इसी बात को प्रमाणित करती है यह कथा कि श्रीगणेश प्रथमपूज्य देवता कैसे बने। 

कथा के अनुसार एक बार सभी देवता इंद्र की सभा में बैठे हुए थे। बात पृथ्वीलोक की होने लगी। तब यह प्रश्न उठा कि पृथ्वी पर किस देवता की पूजा सबसे पहले होनी चाहिए? सभी देवता स्वयं को बड़ा बताते हुए दावा करने लगे कि उनकी पूजा सबसे पहले होनी चाहिए। तब देवर्षि नारद ने हस्तक्षेप किया और सलाह दी कि सभी देवता अपने-अपने वाहन से पृथ्वी की परिक्रमा करें। जो देवता सबसे पहले परिक्रमा पूरी कर लेगा, वही पृथ्वी पर प्रथमपूज्य होगा। देवर्षि नारद ने शिव से निणार्यक बनने का आग्रह किया। सभी देव अपने वाहनों पर सवार हो चल पड़े। विष्णु गरुड़ पर, कार्तिकेय मयूर पर, इन्द्र ऐरावत पर सवार हो कर तेजी से निकल पड़े। जबकि श्रीगणेश मूषक पर सवार हुए और अपने पिता शिव और माता पार्वती की सात बार परिक्रमा की और शांत भाव से उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गए। माता पार्वती ने गणेश का यह कृत्य देखा तो उनसे पूछा कि ‘‘गणेश यह तुम क्या कर रहे हो? सभी देवता परिक्रमा के लिए निकल पड़े हैं और तुम हमारी परिक्रमा कर के यही खड़े हो? क्या तुम्हें पृथ्वी का प्रथमपूज्य देवता नहीं बनना है?’’
इस पर गणेश जी ने हाथ जोड़ कर उत्तर दिया,‘‘माता! मैंने आप दोनों की परिक्रमा कर के पृथ्वी ही नहीं अपितु पूरे ब्रह्मांड की परिक्रमा कर ली है। माता-पिता में ही पूरा ब्रह्मांड समाया होता है। अब मुझे पृथ्वी की परिक्रमा कर के क्या करना है!’’
पुत्र गणेश का उत्तर सुन कर शिव और पार्वती दोनों प्रसन्न हो गए। वे समझ गए कि उनका यह पुत्र सबसे अधिक बुद्धिमान है और एक सबसे बुद्धिमान देवता की पूजा से ही हर कार्य आरम्भ होना चाहिए।
तभी सभी देवताओं में कार्तिकेय सबसे पहले लौटा और उसने गर्व से कहा कि ‘‘पिताश्री! मैं पृथ्वी की परिक्रमा कर के सबसे पहले आया हूं अतः अब पृथ्वीवासी सबसे पहले मेरी पूजा किया करेंगे। मैं ही प्रथमपूज्य देवता हूं।’’  
तब शिव ने मुस्कुराते हुए कहा कि ‘‘हे पुत्र कार्तिकेय, तुम प्रथम नहीं आए हो! तुमसे पहले तुम्हारा भाई गणेश परिक्रमा कर चुका है। वह भी पृथ्वी की ही नहीं वरन पूरे ब्राम्हांड की। अतः यही प्रथमपूज्य होगा।’’ 
कार्तिकेय को यह सुन कर बहुत गुस्सा आया। उसे लगा कि माता-पिता पक्षपात कर रहे हैं। उसने शिव को उलाहना दिया कि ‘‘आप गणेश को इस लिए विजयी कह रहे हैं न क्योंकि वह आपका प्रिय पुत्र है? वह मोटा है और उसका वाहन छोटा चूहा है, इसलिए आपको उस पर दया आ रही है। यही बात है न?’’
यह सुन कर शिव ने पूर्ववत मुस्कुराते हुए कार्तिकेय को समझाया कि ‘‘नहीं पुत्र कार्तिकेय! मैं कोई पक्षपात नहीं कर रहा हूं। मेरे लिए मेरी सभी संतानें समान रूप से प्रिय हैं। तुम तथा अन्य देवता महर्षि नारद का प्रयोजन नहीं समझे जबकि गणेश ने समझ लिया। गणेश जान गया कि नारद बुद्धि की परीक्षा ले रहे हैं, परिक्रमा की गति की नहीं। अतः उसे बुद्धि से काम लिया और मेरी तथा तुम्हारी मां पार्वती की परिक्रमा करते हुए ब्रह्मांड की परिक्रमा का पुण्य प्राप्त कर लिया। इस प्रकार उसने प्रतियोगिता भी जीत ली।’’
जब कार्तिकेय ने यह विवरण सुना तो वह लज्जित हो उठा और उसने श्रीगणेश को उनकी विजय पर बधाई दी। तब तक सभी देवता परिक्रमा कर के लौट आए थे। उन्होंने भी सर्व सम्मति से बुद्धि के देवता गणेश को प्रथमपूज्य देवता स्वीकार कर लिया।

एक अन्य कथा भी है जो श्रीगणेश के जन्म से जुड़ी हुई है। एक बार माता पार्वती स्नान करने के लिए स्नानघर में प्रवेश करने वाली थीं। किन्तु वहां आस-पास कोई नहीं था जिसे वे द्वार पर पहरा देने का काम सौंपतीं। वे नहीं चाहती थीं कि जब वे स्नान कर रही हों तो कोई आ कर उनके स्नानकर्म में व्यवधान डाले। तब माता पार्वती को एक उपाय सूझा। उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक बालक की प्रतिमा बनाई और उसमें प्राण फूंक कर उसे जीवित कर दिया। प्राण प्राप्त होते ही बालक ने हाथ जोड़ कर पूछा,‘‘मेरे लिए क्या आज्ञा है माता?’’
‘‘तुम इस महल के द्वार पर पहरा दोगे। जब तक मेरा स्नान पूर्ण न हो जाए तब तक किसी को भी महल में प्रवेश मत करने देना।’’ पार्वती ने आज्ञा दी।
‘‘आपकी आज्ञा शिरोधार्य माता!’’ कहते हुए वह बालक द्वार पर पहरा देने लगा। 
कुछ देर में भगवान शिव वहां आ पहुंचे। द्वार पर बैठा बालक तो सद्यः जन्मा था अतः शिव अथवा किसी अन्य व्यक्ति के बारे में उसे ज्ञान नहीं था। उसने शिव को महल में प्रवेश करने से रोका। शिव ने उसे सामझाया कि वे इसी महल में रहते हैं और जिस माता की आज्ञा का तुम पालन कर रहे हो वह मेरी अद्र्धांगिनी है।
‘‘तो क्या अद्र्धांगिनी की कोई अपनी इच्छा या प्रतिष्ठा नहीं होती है? यदि वे चाहती हैं कि इस समय महल में कोई प्रवेश न करे, तो उनकी यह इच्छा आप पर भी लागू होती है।’’ उस बालक ने तर्क दिया। यह सुन कर शिव को क्रोध आ गया और उन्होंने क्रोधावेश में बालक का सिर काट दिया। तब तक झगड़े की आवाज सुन कर पार्वती द्वार तक आ पहुंची थीं। उन्होंने उस बालक को सिरविहीन देखा तो दुख और क्रोध से भर उठीं।
‘‘यह आपने क्या किया? आपने मेरे पुत्र का सिर क्यों काटा? मेरा पुत्र आपका भी पुत्र हुआ अतः आपने अपने पुत्र का सिर काट कर आप पुत्रहंता बन गए।’’ पार्वती ने कहा।
‘‘मुझे नहीं मालूम था कि यह आपका पुत्र है? यह हठ कर रहा था और मुझे महल में प्रवेश नहीं करने दे रहा था इसीलिए मुझे क्रोध आ गया।’’ शिव ने पार्वती को शांत करना चाहा।
‘‘मैं कुछ नहीं सुनना चाहती हूं! आप मेरे आज्ञाकारी पुत्र को जीवित करिए, अन्यथा मैं भी प्राण त्याग दूंगी।’’ पार्वती ने शिव को चेतावनी दी।
तब शिव ने हाथी के सद्यःमृत बच्चे के सिर को उस बालक धड़ से जोड़ दिया जिससे वह बालक पुनर्जीवित हो उठा। सूंड़धारी उस बालक को माता पार्वती ने प्रसन्नता से गले लगा लिया। उस बालक ने भगवान शिव को प्रणाम करते हुए कहा,‘‘पिताश्री, जिस प्रकार माता पार्वती ने मुझे बनाया और मुझे प्राण दिए उसी प्रकार आपने मुझे पुनर्जीवन दिया अतः आप दोनों मेरे जन्मदाता माता-पिता हैं, मैं आप दोनों को प्रणाम करता हूं।’’
यह सुन कर भगवान शिव समझ गए कि यह बालक सामान्य नहीं है अपितु सभी देवताओं में बुद्धिमान है अतः उन्होंने उस बालक का नामकरण करते हुए उसे आर्शीवाद दिया कि ‘‘तुम आज से गणेश, गणपति एवं गजानन, गजवदन आदि नामों से जाने जाओगे और तुम बुद्धि के देवता होने के कारण सभी देवताओं से पहले पूजे जाओगे।’’
   यह सुन कर माता पार्वती का क्रोध शांत हो गया तथा उन्होंने अपने पुत्र गणेश को ‘‘श्रीगणेश’’ कह कर संबोधित किया।

श्रीगणेश के प्रथम पूज्य होने के संबंध में प्रचलित तीसरी कथा इस प्रकार है कि एक बार पार्वती के मन में यह इच्छा पैदा हुई कि उनका एक ऐसा पुत्र हो जो समस्त देवताओं में प्रथम पूजन पाए। इन्होंने अपनी इच्छा भगवान शिव को बताई। इस पर शिव ने उन्हें पुष्पक व्रत करने की सलाह दी। पार्वती ने पुष्पक व्रत का अनुष्ठान करने का संकल्प किया और उस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए समस्त देवी-देवताओं को निमंत्रण दिया। शुभ मुहूर्त पर यज्ञ का आरम्भ हुआ। ब्रह्माजी के पुत्र सनत कुमार यज्ञ की पुरोहिताई कर रहे थे। 
यज्ञ पूर्ण होने पर विष्णु ने पार्वती को आशीर्वाद दिया कि जिस प्रकार यह यज्ञ निर्विघ्न सम्पन्न हुआ है उसी प्रकार आपकी इच्छानुरूप विध्नविनाशक पुत्र आपको प्राप्त होगा। विष्णु से यह आशीर्वाद पा कर माता पार्वती प्रसन्न हो उठीं। यह देख कर सनत कुमार ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि ‘‘मैं इस यज्ञ का ऋत्विक हूं। पुरोहित हूं। यज्ञ भले ही सफलतापूर्वक संपन्न हो गया है, परंतु शास्त्र-विधि के अनुसार जब तक पुरोहित को उचित दक्षिणा देकर संतुष्ट नहीं किया जाएगा, तब तक यज्ञकर्ता को यज्ञ का फल प्राप्त नहीं होगा।’’
‘‘बताइए आपको दक्षिणा में क्या चाहिए?’’ माता पार्वती ने सनत कुमार से पूछा।
‘‘माता भगवती, मैं आपके पतिदेव शिव जी को दक्षिणा स्वरूप चाहता हूं।’’ सनत कुमार ने विचित्र मांग की। 
‘‘ऋत्विक सनत कुमार!, आप एक स्त्री से उसका पति अर्थात् उसका सौभाग्य मांग रहे हैं जो देना मेरे लिए संभव नहीं है। अतः आप कुछ और मांगिए।’’ माता पार्वती ने सनत कुमार की मांग ठुकराते हुए कहा। 
सनत कुमार अपनी मांग पर अड़ गए। पार्वती ने उन्हें समझाने का प्रयास किया कि यदि मैं आपको अपना पति सौंप दूंगी तो मुझे पुत्र की प्राप्ति कैसे होगी? यज्ञ का फल तो उस स्थिति में भी नहीं मिलेगा। अतः आप हठ छोड़ दें। किन्तु सनत कुमार अपना हठ छोड़ने को तैयार नहीं थे। तब शिव ने पार्वती को समझाया कि ‘‘आप मुझे सनत कुमार को दक्षिणा में दान कर दें और विश्वास रखें कि आपकी इच्छा भी पूर्ण होगी।’’ 
पार्वती सनत कुमार को दक्षिणा में शिव का दान करने ही वाली थीं कि एक दिव्य प्रकाश के रूप में विष्णु प्रकाशित हुए तथा अगले ही पल श्रीकृष्ण का रूप धारण कर के सनत कुमार के सामने आ खड़े हुए। सनत कुमार ने विष्णु के कृष्ण रूप का दर्शन किया और कहा,‘‘मेरी इच्छा पूर्ण हुई अब मुझे दक्षिणा नहीं चाहिए। मैं जानता था कि आपको दान देने से रोकने के लिए विष्णु मेरी इच्छा पूर्ण अवश्य करेंगे।’’
इसके बाद सभी देवता तथा यज्ञकर्ता पार्वती को आशीर्वाद देकर वहां से चले गए। पार्वती अभी अपनी प्रसन्नता से आनन्दित ही हो रही थीं कि एक विप्र याचक वहां आ गया। उसने खाने को कुछ मांगा। पार्वती ने उसे मिष्ठान्न दिए। उतना खा लेने के बाद वह याचक बोला,‘‘मां अभी भूख नहीं मिटी है, थोड़ा और दो!’’
पार्वती ने और मिष्ठान्न दे दिया। इसके बाद याचक खाता जाता और मांगता जाता। पार्वती उसे खिला-खिला कर थक गईं। उन्होंने शिव से कहा कि ‘‘ये न जाने कैसा याचक आया है जिसका पेट ही नहीं भर रहा है। मैं तो खिला-खिला कर थक गई।’’ 
‘‘कहां है वह याचक?’’ कहते हुए शिव याचक को देखने निकले तो वहां कोई नहीं था। पार्वती चकित रह गईं कि अभी तो वह याचक भोजन की मांग कर रहा था और पल भर में कहां चला गया? तब शिव ने पार्वती को उस याचक का रहस्य समझाया कि वह कोई याचक नहीं बल्कि तुम्हारे उदर से जन्म लेने की तैयार कर रहा गणेश है जो जन्म के बाद लंबोदर कहलाएगा और देवताओं में प्रथम भोग पाने वाला प्रथम पूज्य होगा।’’
ये तीनों कथाएं न केवल अयंत रोचक हैं बल्कि यह बताती हैं कि बुद्धि का उपयोग करने वाला ज्ञानी ही प्रथम पूज्य बनता है। इन कथाओं को मात्र धार्मिक भावना से नहीं, वरन ज्ञान भावना से भी समझने का प्रयास करना चाहिए। बुद्धि ही है जो जीवन में सुख, संपदा और सफलता दिलाती है तथा बुद्धि के देवता हैं श्री गणेश इसीलिए तो वे ही प्रथम पूज्य देवता हैं। 
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Wednesday, September 11, 2024

चर्चा प्लस | श्रीगणपति के रोचक नाम और उनसे जुड़ी कुछ रोचक कथाएं | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
श्रीगणपति के रोचक नाम और उनसे जुड़ी कुछ रोचक कथाएं
     - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                  
     जब हम किसी दुखी, पीड़ित व्यक्ति को देखते हैं तो उसकी सहायता करने की इच्छा हमारे मन में जागती है। फिर दूसरे ही पल हमें अपने सीमित सामर्थ्य याद आ जाता है और हम ठिठक जाते हैं। यह सच है कि आज के उपभोक्तावादी दौर में बहुसंख्यक व्यक्तियों के पास बहुत अधिक सहायता करने की क्षमता नहीं रहती है। किन्तु, श्रीगणेश यही तो सिखाते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम कैसे दिखते हैं या हमारी क्षमताएं कितनी हैं, यदि हमारे मन में दृढ़इच्छा है तो हम किसी न किसी रूप में एक दुखी-पीड़ित की मदद कर सकते हैं। तभी तो श्रीगणेश के अनेक नाम हैं किन्तु काम एक ही है- सर्वकल्याण। यही तो सत्य मौजूद है श्रीगणेश के स्वरूप में और यही सत्य हमारे जीवन में उनके अस्तित्व को रोचक बनाता है।    
हिन्दू संस्कृति में श्रीगणेश एकमात्र ऐसे देवता है जिनका मुख हाथी का तथा शेष शरीर मनुष्यों  अथवा देवताओं जैसा है। उनका यह स्वरूप मानव और वन्यजीवन के बीच घनिष्ठ अटूट संबंधों को दर्शाता है। वन्य पशुओं में हाथी को सबसे अधिक बलशाली, सबसे अधिक बुद्धिमान, सबसे अधिक स्मरणशक्ति वाला तथा सबसे अधिक धैर्यवान माना जाता है। हाथी तब तक किसी पर प्रहार नहीं करता है जब तक कि उसके परिवार अथवा उस पर संकट न आए। हाथी दीर्घायु होता है तथा विशुद्ध शाकाहारी होता है। अलौकिक शक्ति के धनी होते हुए भी श्रीगणेश में समस्त गजतत्व मौजूद हैं। सृष्टि की योग्य कृति मानव तथा वन्य समुदाय की सर्वश्रेष्ठ रचना गज के सम्मिश्रण वाले श्री गणेश की शक्तियों का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। पौराणिक कथा के अनुसार गणेश जी ने ही महाभारत को अबाधगति से लिपिबद्ध किया था।
गजाननं भूतगणादि सेवितं, कपित्थ जम्बूफलसार भक्षितं।
उमासुतं शोक विनाशकारणं, नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजं।।

श्रीगणेश के एक नहीं अपितु 108 नाम हैं, जिनका जाप किया जाता है। प्रत्येक नाम का अपना एक अलग महत्व है। जैसे - अखुरथ- जिनके पास रथ के रूप में एक चूहा है, अलमपता- सदा सनातन भगवान, अमितःअतुलनीय प्रभु, अनंतचिद्रुपमयं- अनंत और चेतना-व्यक्तित्व, अवनीश- पूरी दुनिया के भगवान, अविघ्न- सभी बाधाओं को दूर करने वाला, बालगणपति- प्रिय और प्यारा बच्चा, भालचंद्र- चंद्रमा-कलक वाले भगवान, भीम- विशाल और विशाल, भूपति- देवताओं के स्वामी, भुवनपति - जगत के स्वामी, बुद्धिनाथ- ज्ञान के देवता, बुद्धिप्रिया- ज्ञान और बुद्धि को प्यार करने वाले भगवान, बुद्धिविधता- ज्ञान और बुद्धि के देवता, शूपर्णकर्ण- बड़े कान वाले भगवान, शुबनः सर्व मंगलमय प्रभु, शुभगुणकानन- वह जो सभी गुणों का स्वामी है, श्वेता- वह जो सफेद रंग की तरह पवित्र हो, सिद्धिधाता- सफलता और सिद्धियों के दाता, सिद्धिप्रिया- वह जो इच्छाओं और इच्छाओं को पूरा करती है, सिद्धिविनायक- सफलता के दाता, स्कंदपुर्वजा- स्कंद (भगवान मुरुगन) के बड़े भाई, सुमुख- जिसका मुख प्रसन्न है, सुरेश्वरम- सभी प्रभुओं के भगवान, स्वरूप - सौंदर्य के प्रेमी, तरुण- अजेय भगवान, उद्दंड- बुराइयों और दोषों की दासता, उमापुत्र- देवी उमा (पार्वती) के पुत्र, वक्रतुंड - घुमावदार सूंड वाले भगवान, वरगणपति - वरदानों के दाता, वरप्रदा- इच्छाओं और इच्छाओं का दाता, वरदविनायक - सफलता प्रदान करने वाले, वीरगणपति- वीर प्रभु, विद्यावारिधि- ज्ञान और बुद्धि के देवता, विघ्नहर्ता- विघ्नों का नाश करने वाले, विघ्नराज- सभी बाधाओं के भगवान, विघ्नस्वरूप- विघ्नों का रूप धारण करने वाले, विकट- विशाल और राक्षसी, विनायक- सभी लोगों के भगवान आदि।

श्रीगणेश के कुछ नामों की रोचक कथाएं भी देख ली जाएं। ये ही तो हमारी पौराणिक विरासत हैं-
एकदंत की कथा
श्रीगणेश के एकदंत होने की कई कथाएं मिलती हैं-
एक कथा- एक बार विष्णु के अवतार परशुराम शिव से मिलने कैलाश पर्वत पर आए। उस समय शिव ध्यानावस्थित थे तथा वे कोई व्यवधान नहीं चाहते थे। शिवपुत्र गणेश ने परशुराम को रोक दिया और मिलने की अनुमति नही दी। इस बात पर परशुराम क्रोधित हो उठे और उन्होंने श्री गणेश को युद्ध के लिए चुनौती दे दी। श्रीगणेश ने चुनौती स्वीकार कर ली। दोनों के बीच घनघोर युद्ध हुआ। इसी युद्ध में परशुरामजी के फरसे से उनका एक दांत टूट गया।
दूसरी कथा- भविष्य पुराण में कथा है जिसके अनुसार कार्तिकेय ने श्रीगणेश का दन्त तोडा था। श्रीगणेश अपनी बाल अवस्था में अति नटखट हुआ करते थे। एक बार उन्होंने खेल-खेल में अपने ज्येष्ठ भाई कार्तिकेय को परेशान करना शुरू कर दिया। कार्तिकेय को श्रीगणेश पर गुस्सा आ गया और वे गणेश से लड़ पड़े। इसी लड़ाई-झगड़े में गणपति का एक दांत टूट गया।
तीसरी कथा- एक अन्य कथा के अनुसार महर्षि वेदव्यास जी को महाभारत लिखने के लिए किसी बुद्धिमान लेखक की जरुरत थी। उन्होंने इस कार्य के लिए श्रीगणेश को चुना। श्रीगणेश इस कार्य के लिए मान तो गए। पर उन्होंने एक शर्त रखी कि महर्षि वेदव्यास महाभारत लिखाते समय रुकेंगे नहीं और न ही बोलना बंद करेंगे। वेदव्यास ने शर्त स्वीकार कर ली। तब श्री गणेश जी ने अपने एक दांत को तोड़कर उसकी कलम बना ली और उसी से वेद व्यास जी के वचनों पर महाभारत लिखी।
चौथी कथा- गजमुखासुर नामक एक महाबलशाली असुर हुआ जिसने अपनी घोर तपस्या से यह वरदान प्राप्त कर दिया की उसे कोई अस्त्र शास्त्र मार नही सकता। यह वरदान पाकर उसने तीनो लोको में अपना प्रभुत्व जमा लिया। सब उससे भयभीत रहने लगे। तब उसका वध करने के लिए सभी देवताओं ने श्रीगणेश को मनाया। गजानंद ने गजमुखासुर को युद्ध के ललकारा और अपना एक दांत तोड़कर हाथ में पकड़ लिया। गजमुखासुर को अपनी मृत्यु नजर आने लगी। वह मूषक रूप धारण करके युद्ध से भागने लगा। गणेशजी ने उसे पकड़ लिया और अपना वाहन बना लिया।
मोहासुरपति
जब कार्तिकेय ने तारकासुर का वध कर दिया तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने मोहासुर नाम के दैत्य को देवताओं को प्रताड़ित करने के लिए भेजा। मोहासुर से मुक्ति के लिए देवताओं ने गणेश की उपासना की। तब गणेश ने महोदर अवतार लिया। महोदर का उदर यानी पेट बहुत बड़ा था। वे मूषक पर सवार होकर मोहासुर के नगर में पहुंचे तो मोहासुर ने बिना युद्ध किये ही गणपति को अपना इष्ट बना लिया। तभी से श्रीगणेश मोहासुरपति कहलाए।
लंबोदर
समुद्रमंथन के समय भगवान विष्णु ने जब मोहिनी रूप धरा तो शिव उन पर मोहित हो गए। भावावेश में उनका स्खलन हो गया, जिससे एक काले रंग के दैत्य की उत्पत्ति हुई। इस दैत्य का नाम क्रोधासुर था। क्रोधासुर ने सूर्य की उपासना करके उनसे ब्रह्मांड विजय का वरदान ले लिया। क्रोधासुर के इस वरदान के कारण सारे देवता भयभीत हो गए। वो युद्ध करने निकल पड़ा। तब गणपति ने लंबोदर रूप धरकर उसे रोक लिया। क्रोधासुर को समझाया और उसे ये आभास दिलाया कि वो संसार में कभी अजेय योद्धा नहीं हो सकता। क्रोधासुर ने अपना विजयी अभियान रोक दिया और सब छोड़कर पाताल लोक में चला गया।
विकट
भगवान विष्णु ने जलंधर के विनाश के लिए उसकी पत्नी वृंदा का सतीत्व भंग किया। उससे एक दैत्य उत्पन्न हुआ, उसका नाम था कामासुर। कामासुर ने शिव की आराधना करके त्रिलोक विजय का वरदान पा लिया। इसके बाद उसने अन्य दैत्यों की तरह ही देवताओं पर अत्याचार करने शुरू कर दिए। तब सारे देवताओं ने भगवान गणेश का ध्यान किया। तब भगवान गणपति ने विकट रूप में अवतार लिया। विकट रूप में भगवान मोर पर विराजित होकर अवतरित हुए। उन्होंने देवताओं को अभय वरदान देकर कामासुर को पराजित किया।
विघ्नराज
एक बार पार्वती अपनी सखियों के साथ बातचीत के दौरान जोर से हंस पड़ीं। उनकी हंसी से एक विशाल पुरुष की उत्पत्ति हुई। पार्वती ने उसका नाम मम (ममता) रख दिया। वह माता पार्वती से मिलने के बाद वन में तप के लिए चला गया। वहीं उसकी भेंट शम्बरासुर से हुई। शम्बरासुर ने उसे कई आसुरी शक्तियां सीखा दीं। उसने मम को गणेश की उपासना करने को कहा। मम ने गणपति को प्रसन्न कर ब्रह्मांड का राज मांग लिया। शम्बर ने उसका विवाह अपनी पुत्री मोहिनी के साथ कर दिया। शुक्राचार्य ने मम के तप के बारे में सुना तो उसे दैत्यराज के पद पर विभूषित कर दिया। ममासुर ने भी अत्याचार शुरू कर दिए और सारे देवताओं के बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया। तब देवताओं ने गणेश की उपासना की। गणेश विघ्नराज के रूप में अवतरित हुए। उन्होंने ममासुर का मान मर्दन कर देवताओं को छुड़वाया।
धूम्रवर्ण
एक बार भगवान ब्रह्मा ने सूर्यदेव को कर्म राज्य का स्वामी नियुक्त कर दिया। राजा बनते ही सूर्य को अभिमान हो गया। उन्हें एक बार छींक आ गई और उस छींक से एक दैत्य की उत्पत्ति हुई। उसका नाम था अहम। वह शुक्राचार्य के पास गया और उन्हें गुरु बना लिया। वह अहम से अहंतासुर हो गया। उसने खुद का एक राज्य बसा लिया और भगवान गणेश को तप से प्रसन्न करके वरदान प्राप्त कर लिए। उसने भी बहुत अत्याचार और अनाचार फैलाया। तब गणेश ने धूम्रवर्ण के रूप में अवतार लिया। उनका वर्ण धुंए जैसा था। वे विकराल थे। उनके हाथ में भीषण पाश था जिससे बहुत ज्वालाएं निकलती थीं। धूम्रवर्ण ने अहंतासुर का पराभाव किया। उसे युद्ध में हराकर अपनी भक्ति प्रदान की।
             
 श्रीगणेश अन्य देवताओं की भांति शारीरिक दृष्टि से सुंदर नहीं हैं किन्तु उनकी अपरिमित बुद्धि के कारण उन्हें प्रथमपूज्य देवता का पद प्राप्त है। यही वह बात है जिसे हम मनुष्यों को सीखना चाहिए कि जाति, धर्म, आकार, प्रकार, सुंदरता, असुंदरता का कोई अर्थ नहीं है, यदि किसी चीज का अर्थ है तो वह है सर्वकल्याण। यही तो सत्य मौजूद है श्रीगणेश के स्वरूप में और यही सत्य हमारे जीवन में उनके अस्तित्व को रोचक बनाता है।                
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विघ्नहर्ता एकदंत के दरबार में .| डॉ (सुश्री) शरद सिंह

विघ्नहर्ता एकदंत के दरबार में ...
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10.09.2024
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Tuesday, September 10, 2024

पुस्तक समीक्षा | राजनीति की जंग में मोहब्बत की बिसात से परिचित कराती है यह किताब | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

आज 10.09.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक मुकेश भारद्वाज की पुस्तक " राहुल गांधी, नेता मोहब्बत वाला" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा
राजनीति की जंग में मोहब्बत की बिसात से परिचित कराती है यह किताब
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक  - राहुल गांधी नेता मोहब्बत वाला
लेखक   - मुकेश भारद्वाज
प्रकाशक - यात्रा बुक्स, वाणी प्रकाशन, 4695, 21- ए, दरियागंज, नयी दिल्ली- 110002
मूल्य    - 395/-
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मुकेश भारद्वाज जितने प्रबुद्ध पत्रकार हैं उतने की तार्किक लेखक भी हैं। उनके लेखन की विशेषता है कि वे किसी भी मुद्दे पर सतही टिप्पणी नहीं करते हैं अपितु उस मुद्दे को इतिहास, वर्तमान और भविष्य की कसौटी पर परखते हुए निष्कर्ष तक पहुंचते हैं। उनका निष्कर्ष सटीकता के इतने करीब होता है कि उससे असहमत होना उस मुद्दे के विरोधी के लिए भी कठिन हो जाता है। मुद्दे से असहमत होने वाले व्यक्ति या दल को भी एक बार आत्मावलोकन करने की आवश्यकता अवश्य महसूस होती होगी, भले ही वह इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं कर पाए। इस वर्ष अर्थात 2024 में मुकेश भरद्वाज की ऐसी दो पुस्तकें प्रकाशित हुईं जिनमें हम राजनीतिक कंट्रास्ट देख सकते हैं। एक पुस्तक है ‘‘मनमोदी’’ जिसमें लेखक ने नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रधानमंत्री के रूप में उठाए गए कदमों जैसे नोटबंदी, सांस्कृतिक पुनर्जागरण तथा सक्रिय विदेश नीति आदि का तर्कसंगत आकलन किया है। वहीं, लेखक की दूसरी पुस्तक है ‘‘राहुल गांधी, नेता मोहब्बत वाला’’। इनमें से इस बार की समीक्ष्य पुस्तक है ‘‘राहुल गांधी, नेता मोहब्बतवाला’’।

वर्तमान भारतीय राजनीति में दो ध्रुव दिखाई देते हैं, एक मजबूत तो दूसरा कमजोर। लेकिन दोनों परस्पर एक-दूसरे के पूरक के रूप में मौजूद हैं। दोनों में से किसी की भी उपस्थिति को नकारा नहीं जा सकता है। स्पष्ट है कि मजबूत ध्रुव भाजपा का है, नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में और कमजोर ध्रुव कांग्रेस का है जिसे सहेजने और समर्थ बनाने की कवायद में निरंतर जुटे हुए हैं राहुल गांधी। आयु और अनुभव का अंतर। एक जनअसंतोष से सशक्त बना दल तो दूसरा धीरे-धीरे पनपते जनअसंतोष से प्राणवायु लेता दल। आरंभ में एक बेमेल मुकाबला था यह जिसे भारतीय मीडिया ने सर्वज्ञाता और परममूर्ख के बीच की स्पर्द्धा करार देते हुए कांग्रेस को समाप्तप्राय घोषित कर दिया था। कमजोर पक्ष की अगुवाई करने वाले को सार्वजनिक रूप से ‘‘पप्पू’’ कह कर उपहास का पात्र बनाया गया। लेकिन कहा गया है कि ‘‘अति सर्वत्र वर्जयेत’’। अति अच्छी नहीं होती, उसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं। यह दुष्परिणाम साबित हुआ या सुपरिणाम यह तो भविष्य बखूबी बताएगा, जब पिछले पन्ने पलट कर इतिहास के रूप में इस सारे परिदृश्य का आकलन किया जाएगा किन्तु 2024 के चुनावों ने जो परिणाम दिए उसने लेखक मुकेश भारद्वाज के शब्दों में ‘‘मीडिया को ही पप्पू बना दिया’’। 

मुकेश भारद्वाज ‘‘जनसत्ता’’ में काॅलम लिखते हैं ‘‘बेबाक बोल’’। उनका यह काॅलम उनकी आकलन क्षमता  और स्पष्टवादिता के कारण अत्यंत लोकप्रिय है। उनके बेबाक बोल वास्तव में बेबाक एवं निर्भीक होते हैं। यही बेबाकी उनकी इस पुस्तक में देखी जा सकती है जिसमें उन्होंने राहुल गांधी की तमाम गलतियों को रेखांकित करते हुए उनके संघर्ष को क्रमबद्ध सामने रखा है। वस्तुतः यह एकदम ताज़ा इतिहास है जिसके हम सभी साक्षी बनते चल रहे हैं। देखा जाए तो राजनीति के संदर्भ में वर्तमान को लिखना सबसे दुरूह और जोखिम भरा होता है। इतिहास लेखन जिस तटस्थता की मांग करता है वह वर्तमान के साथ प्रायः संभव नहीं हो पाता है। अंग्रेजो के द्वारा लिखा गया भारतीय इतिहास इसीलिए बार-बार पुनर्लेखन और पुर्नआकलन की मांग करता है। राजनीतिक दबाव के चलते शक्ति के प्रति आसक्ति स्वाभाविक रूप से इतिहास लेखन को प्रभावित कर देती है। किन्तु मुकेश भरद्वाज के लेखन में वह तटस्थता है जो वर्तमान के इतिहास को लिखे जाने के लिए आवश्यक है। वे तटस्थरूप से बताते हैं कि राहुल गांधी जिन्हें कांग्रेस के लिए कलंक की भांति प्रचारित किया जा रहा था किस तरह नफरत की राजनीति के विरुद्ध प्रेम की बाजी चलते गए और लोकतंत्र के उस रूप को चरितार्थ कर दिया जिसमें जनता की शक्ति का उल्लेख किया जाता है।     
       
विरासत में मिली राजनीति सफलता की गारंटी नहीं होती यदि इस बात को चरितार्थ होते हुए देखना है तो कुछ वर्ष पूर्व से लेकर अब तक के भारतीय राजनीतिक परिदृश्य को देखकर बखूबी समझा जा सकता है। राजनीति भी मौलिक श्रम की मांग करती है। अपनी क्षमताओं को पहचानना भी इसी श्रम का एक अभिन्न अंग है। हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में रहने का गर्व करते हैं। करना भी चाहिए क्योंकि हमें बोलने की स्वतंत्रता है, लिखने की स्वतंत्रता है और विरोध करने की स्वतंत्रता है। लोकतंत्र को उसके मूल रूप में हमने अपनाया है जिसमें  जनता का, जनता के द्वारा तथा जनता के लिए शासन है। लोकतंत्र में ऐसी व्यवस्था रहती है की जनता अपनी मर्जी से विधायिका चुन सकती है। लोकतंत्र एक प्रकार की शासन व्यवस्था है, जिसमे सभी व्यक्ति को समान अधिकार होता हैं। लेकिन जब इन अधिकारों पर अदृश्य रूप से ग्रहण लगने लगे और लोकतंत्र के मानक टूटने लगें तो कुछ नूतन की सुगबुगाहट होने लगती है। जहां से लोकतंत्र के अवधारणा का आरंभ माना जाता है वहीं के महान विचार अरस्तू ने लोकतंत्र के बारे में कहा था, ‘‘तर्कयुक्त संकल्प दरअसल बहस के लिए गठित सभा, जहां बोलने की स्वतंत्रता होती है, में हुई खुली बहस में बनी सहमति है। विचार-विमर्श रहित बहुमत को जनता का तर्कसंगत संकल्प नहीं कहा जा सकता। तर्कसंगत संकल्प की ठोस व्यवस्था के बिना लोकतंत्र का अस्तित्व नहीं हो सकता।’’ इसके साथ ही, अरस्तू ने लोकतंत्र की खामियों पर भी टिप्पणी की और इसे ‘‘विकृतरूप’’ कहा। चाहे लोतंत्र हो या कोई अन्य तंत्र, जब राज के साथ ‘हठ’ जुड़ जाता है तो उस तंत्र में विकृति आने लगती है। यह राजनीति की अपनी विशेषता है कि जब उसके किसी तंत्र में विकृति आने लगती है तो सुधार की आकांक्षा रखने वाले परिवर्तन के बीच अपने-आप रोपित होने लगते हैं। 

मुकेश भारद्वाज ने अपनी पुस्तक 2014 के चुनाव में हुए परिवर्तनों से आरंभ करते हैं क्योंकि वही बुनियाद रही है राहुल गांधी की राजनीतिक यात्रा की। फिर वे उल्लेख करते हैं उन प्रसंगों की जो चुनाव से पहले और चुनाव के बाद घटित हुए और जिन्होंने सभी को राहुल गांधी के व्यक्तित्व से परिचित कराना आरंभ किया। इन घटनाओं में से एक थी जब राहुल गांधी ने अपनीे ही दल के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा लाए गए अध्यादेश के विरुद्ध शंखनाद कर दिया। परिणामतः वह अध्यादेश वापस ले लिया गया किन्तु आकलनकर्ताओं एवं राजनीति के पर्यवेक्षकों ने इसे एक गोलकीपर द्वारा अपने ही गोलपोस्ट पर गोल दाग देने जैसा माना। दूसरी बार राहुल गांधी ने प्रखर आवाज उठाई भट्टा पारसौल में जमीन अधिग्रहण को ले कर। लेकिन उसका परिणाम भी राहुल गांधी के पक्ष में नहीं गया। फिर कांग्रेस की अंतर्कलह और अतिआत्मविश्वास से भरी रणनीति ने 2014 के चुनाव में कांग्रेस को तो डुबाया ही, साथ ही राहुल गांधी की राजनीतिक छवि को भी डुबा दिया। आमजन के बीच से आया हुआ व्यक्ति आमजन को अपना-सा लगा और ‘‘राजकुमार’’ को राजनीतिक महल से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। लेखक ने स्मरण कराया है कि यह वही राजनीतिक पटल था जहां सोनिया गांधी ने पार्टी के हित तथा देश के हित के लिए प्रधानमंत्री की कुर्सी को ठुकरा दिया था। उसी पटल पर राहुल गांधी अपने अनुभवहीन प्रयासों को ले कर जूझते दिखाई पड़े। 

लेखक ने राहुल गांधी के बचकाने प्रयासों और बयानों को याद दिलाने में तनिक भी कोताही नहीं बरती है। क्योंकि राहुल गांधी के 2014 से 2024 तक की यात्रा को समझने के लिए उनकी उन गलतियों को याद रखना भी जरूरी है। यह इसलिए भी जरूरी है कि इससे भारतीय लोकतंत्र में समापन की ओर अग्रसर होते राजनीतिक दल को किस तरह फिर से उठने का अवसर मिलता है, इसे समझा जा सकता है। समय के साथ अपने कटु से कटुतर अनुभवों को आत्मसात करते हुए राहुल गांधी ने सीखा कि लोकतंत्र में जनता ही सबसे बड़ी शक्ति है। यदि राजनीति के दरवाजे में पुनः प्रवेश करना है तो आमजन के दिलों से हो कर गुज़रना होगा। इसीलिए लेखक ने राहुल गांधी की ‘‘भारत जोड़ो यात्रा’’ का उल्लेख किया है। इस यात्रा ने एक अपरिपक्व नेता को परिपक्वता के अर्थ समझा दिए और स्वयं को परिपक्व मान कर चल रहे राजनेताओं एवं मीडिया को अपरिपक्वता की सीमा पर ला खड़ा किया। राहुल गांधी को जिस तरह मीडिया ने ‘‘पप्पू’’ ‘‘राजकुमार’’ के रूप में प्रोजेक्ट कर के आमजन के सामने नकारा साबित कर दिया था, ‘‘भारत जोड़ो यात्रा’’ ने उसी आमजन को राहुल गांधी के भीतर मौजूद एक सहनशील और दृढ़ व्यक्ति को जानने का अवसर दिया। लेखक ने इस बात से भी आगाह किया है कि यह अंतिम सत्य नहीं है। अभी अनेक ऐसे सत्य हैं जिनका सामना राहुल गांधी को करना पड़ेगा। अभी तो उनकी यात्रा का एक बहुत छोड़ा-सा पड़ाव तय हुआ है। राहुल गांधी के समक्ष चुनौतियों की भरमार है। लेकिन जो उन्होंने अपने अनुभव से सीखा उसके आधार पर उन्होंने कहा कि वे नफरत के विरुद्ध मोहब्बत की बात करना चाहते हैं। इसे नकारा नहीं जा सकता है कि सहनशीलता की एक उल्लेखनीय राजनीतिक मिसाल इतिहास में दर्ज़ करा दी है राहुल गांधी ने। जब सत्ताधारी पक्ष के विशिष्ट प्रवक्ता और मीडिया एक साथ राहुल गंाधी के दल से ले कर उनके निजी जीवन पर, उनकी योग्यता पर अभद्र तरीके से हमला कर रही थी तब उन्होंने शांत बने रहने का रास्ता अपनाया। वस्तुतः यह एक बुनियादी सबक था जो राहुल गांधी को निखारने में सहायक सिद्ध हुआ। 

‘‘राहुल गांधी, नेता मोहब्बत वाला’’ पुस्तक 2024 में प्रकाशित हुई है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि चुनाव के परिणामों से प्रभावित हो यह पुस्तक लिखी गई हो। दरअसल इस पुस्तक में लेखक मुकेश भारद्वाज द्वारा सन् 2018 से अब तक लिखे गए लेखों में से चुनिंदा लेखों को संजोते हुए एक ऐतिहासिक दस्तावेजी पुस्तक तैयार की गई है जो भविष्य में इतिहास पढ़ने वालों को 2014 से 2024 के इतिहास को समझने में सहायक होगी। यह पुस्तक जहां राहुल गांधी के संघर्ष को बताती है, जहां भारतीय लोकतंत्र की महत्ता से परिचित कराती है, जहां राजनीति की जंग में मोहब्बत की बिसात से परिचित कराती है, वहीं यह भी सिखाती है कि तटस्थ हो कर वर्तमान की राजनीति का इतिहास लेखन किस प्रकार किया जाता है। मुकेश भारद्वाज की यह पुस्तक उनके निर्भीक लेखनी और लेखनी में लोकतांत्रिक मूल्यों को भी स्थापित करती है। यह पुस्तक हर पाठक के पढ़े जाने योग्य है।
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Monday, September 9, 2024

श्री गजानन के दरबार में भजनों की आनंद सरिता | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

09.09.2024... आज श्री गजानन के दरबार में भजनों की आनंद सरिता...
   लोग आपस में मिले और एक सामाजिक समरसता का भय-मुक्त माहौल बने इसी उद्देश्य से सन 1893 में बाल गंगाधर तिलक ने केशवजी नाइक चॉल सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडल की नींव डाली थी। अंग्रेजों का शासन था लेकिन तिलक अपने उद्देश्य में सफल रहे लोग गणेश उत्सव मैं एक दूसरे से मिलने लगे और ऐसा करने से शासन उन पर अंकुश भी नहीं लग पाया। आज कोई रोक-टोक नहीं है लेकिन जिंदगी में समय की कमी है । आज की व्यस्ततम ज़िंदगी में ऐसे अवसर ही तो सबको परस्पर एक-दूसरे के निकट लाते हैं। है न!
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