Tuesday, July 9, 2024

पुस्तक समीक्षा | महिलाओं की ऐतिहासिक उपस्थिति को सहेजता एक महत्वपूर्ण ग्रंथ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण


आज 09.07.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई श्री पलाश सुरजन एवं सरिका ठाकुर द्वारा संपादित ग्रंथ "मध्य प्रदेश के इतिहास में महिलाएं" की समीक्षा।

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पुस्तक समीक्षा
महिलाओं की ऐतिहासिक उपस्थिति को सहेजता एक महत्वपूर्ण ग्रंथ
     समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक -  मध्य प्रदेश के इतिहास में महिलाएं
संपादक - पलाश सुरजन एवं सारिका ठाकुर
प्रकाशक - मीडियाटेक कम्युनिकेशन प्रा.लि. 26-बी, इंदिरा प्रेस कॉपलेक्स, जोन-1. महाराणा प्रताप नगर, भोपाल 462011
मूल्य - 1499/-
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इतिहास पर हमेशा यह आरोप लगता रहा है कि वह पुरुषों के वर्चस्व से भरा हुआ है। यह आरोप किसी हद तक सही भी है क्योंकि इतिहास में पुरुषों के कारनामों अथवा उपलब्धियां को महिमा मंडित करके लेखबद्ध किया गया है किंतु वहीं महिलाओं की उपलब्धियों को गौण रखा गया है। इतिहास चाहे राजनीति का हो, साहित्य का हो, कला का हो या किसी भी अन्य क्षेत्र का महिलाओं की उपलब्धियों को कम ही सहेजा गया। विगत में इस संदर्भ में जो कुछ महत्वपूर्ण काम हुआ, उसमें भी महिलाओं के योगदान को विषयवार अलग-अलग संकलित किया गया। जैसे- हरिहरनिवास द्विवेदी ने सन 1959 में एक ग्रंथ संपादित किया था - ‘‘मध्य भारत का इतिहास’’। सूचना एवं प्रकाशन मध्यप्रदेश से यह चार खण्डों में प्रकाशित हुआ था और प्रत्येक खंड में संदर्भानुसार महिलाओं के योगदान का अत्यंत संक्षिप्त उल्लेख किया गया था। सन 1960 में ‘‘हिन्दी की महिला साहित्यकार’’ सत्यप्रकाश मिलिंद के संपादन में राजकमल प्रकाशन से आया। सन 1962 में ‘‘आधुनिक हिन्दी कवयित्रियों के प्रेम गीत’’ का सम्पादन क्षेमचन्द्र ‘‘सुमन’’ किया, जिसे राजपाल एण्ड संस ने छापा था। समय-समय पर इस दिशा में फुटकर कार्य होता रहा।
एक लंबे अंतराल के बाद पलाश सुरजन द्वारा एक बड़ा और ठोस काम किया गया ‘‘स्वयंसिद्धा: मध्यप्रदेश महिला सन्दर्भ’’ के रूप में। यह ग्रंथ अपने आप में महत्वपूर्ण तो था ही साथ ही यह नींव का पत्थर बना ‘‘मध्य प्रदेश के इतिहास में महिलाएं’’ ग्रंथ का। जी हां, हाल ही में प्रकाशित ‘‘मध्य प्रदेश के इतिहास में महिलाएं’’ ग्रंथ का संपादन पलाश सुरजन तथा सरिका ठाकुर ने किया है। यह ग्रंथ विविध क्षेत्रों में महिलाओं की ऐतिहासिक उपस्थिति को सहेजता एक ऐतिहासिक ग्रंथ है। निश्चित रूप से इस तरह के ग्रंथ का संपादन करना और इसके लिए सामग्री एकत्र करना अत्यंत श्रमसाध्य कार्य है। ऐसा कार्य पर्याप्त समय और गहरी धैर्य की मांग करता है। ‘‘स्वयंसिद्धा: मध्यप्रदेश महिला सन्दर्भ’’ के सफल संपादन से उत्साहित होकर पलाश सुरजन ने इससे आगे बढ़कर कार्य करने का साहस जुटा लिया। सारिका ठाकुर भी बतौर संपादक इस महायज्ञ में शामिल हो गईं। जिसका सुपरिणाम इस सद्यः प्रकाशित ग्रंथ के रूप में हुआ। संपादक द्वय को यह महसूस हुआ कि जो कार्य उन्होंने ‘‘स्वयंसिद्धा...’’ के रूप में संपादित किया, उसमें कहीं न कहीं कुछ छूट गया है जिसे सामने लाना जरूरी है। कोई और संपादक होता तो शायद वह अपने कार्य को पूर्ण मानकर वहीं ठहर जाता, किंतु इस संपादक द्वय को यह लगा कि जितनी संपूर्णता से महिलाओं के योगदान को प्रस्तुत किया जाए उतना ही उत्तम होगा। इस संबंध में संपादक सरिका ठाकुर ने पुस्तक के आरंभ में ‘‘अपनी बात’’ में लिखा है-‘‘सन् 2012 में जब पुस्तक ‘स्वयंसिद्धाः मध्यप्रदेश महिला सन्दर्भ’ प्रकाशित हुई तो ऐसा लगा जैसे अतीत से लेकर वर्तमान तक मध्यप्रदेश की समस्त प्रमुख महिलाओं को हमने एक माला में पिरो लिया। उस समय ग्रंथ को भी वैसा ही सम्मान प्राप्त हुआ। समय व्यतीत हुआ और 2020 के कोरोना काल में हम श्स्वयंसिद्धाश् के डिजिटल संस्करण पर विचार करने लगे। इसके लिये 2012 की पुस्तक ‘स्वयंसिद्धा’ को अपडेट करने के साथ नये नामों को जोड़ने की जरूरत थी, क्योंकि विगत आठ वर्षों में प्रदेश की महिलाएं कई बड़े-बड़े कीर्तिमान रच चुकी थीं। इसी अपडेट करने की प्रक्रिया में वेबसाइट ‘स्वयंसिद्धा’ का जन्म हुआ, जिसमें एक झरोखे का नाम हमने ‘अतीत गाथा’ रखा। नाम से ही जाहिर है इसमें हम अतीत में जन्मी उन महिलाओं की जीवन गाथा संजो रहे थे, जिन्होंने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रदेश के इतिहास को प्रभावित किया हो। शोध की प्रक्रिया तभी प्रारंभ हुई।’’
गहन शोध कार्य तथा लगभग हर स्रोत को खंगालते हुए मध्यप्रदेश के इतिहास में महिलाओं के योगदान को ठीक उसी प्रकार निकाला गया जैसे गहरे समुद्र में गोता लगाकर सीप और मोती निकल जाते हैं। पलाश सुरजन ने  अपनी परिकल्पना को साकार करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया और सारिका ठाकुर ने संपादन का महत्वपूर्ण दायित्व पूरी गंभीरता से निभाया। वहीं उप संपादक सीमा चैबे ने व्हाट्सएप, फेसबुक आदि सोशल मीडिया के माध्यम से उल्लेखनीय महिलाओं के वंशजों से निरंतर संपर्क करते हुए सामग्री जुटाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। सतत परिश्रम कर इस समुद्र मंथन से रत्न के रूप में जो ग्रंथ सामने आया वह मध्य प्रदेश के इतिहास में महिलाओं की ऐतिहासिक उपस्थिति को बखूबी रेखांकित करता है।
ग्रंथ के संपूर्ण कलेवर को आठ खण्डों में विभक्त किया गया है - खंड एक - आदिकाल, खंड 2 - स्वतंत्रता आंदोलन (1857 -1947), खंड 3 - भोपाल की नवाब बेगमें, खंड चार - समाज सेवा एवं राजनीति खंड 5 - साहित्य एवं पत्रकारिता खंड 6 - गायन, वादन एवं नृत्य खंड 7 - रंगमंच, सिनेमा, टीवी, चित्रकला एवं सिरेमिक एवं खंड 8 - विविध।
खण्ड-1 आदिकाल में रानी दमयंती, देवी, संघमित्रा, मृगनयनी, रानी गणेश कुंवरी, रानी दुर्गावती, रानी रूपमती, राय प्रवीण, मुमताज महल, हीरा बाई, लाल कुंवरी/रानी सारंधा, रानी गौतमा बाई, मस्तानी बाजीराव, रानी कमलापति, रानी अहिल्या बाई होलकर तथा गन्ना बेगम का व्यक्तित्व एवं कृतित्व दिया गया है। साथ ही एक लेख है - ‘‘कहानी तीन विद्रोही विधवाओं की’’, जिसमें महादजी की तीन विधवाओं भागीरथी बाई यमुनाबाई और लक्ष्मी बाई के संघर्ष का उल्लेख है।
खण्ड-2 स्वतंत्रता आन्दोलन (1857-1947) -रानी तुलसा बाई होलकर, राजमाता कृष्णा बाई, भीमा बाई, रानी बायजा बाई शिंदे, रानी लक्ष्मी बाई, रानी अवंती बाई, रानी राजो, वीरा नयनी, सुरसी बाई, जानकी देवी बजाज, सुभद्रा कुमारी चैहान, सहोदरा बाई, इंदु मेहता एवं रानी कंचन प्रभा। इस खंड के अंत में एक लेख है- ‘‘स्वातंत्र्य समर की गुमनाम नायिकाएं’’।
खंड-3 भोपाल की नवाब बेगमें- नवाब कुदसिया बेगम, नवाब सिकंदर जहां बेगम, नवाब शाहजहां बेगम, नवाब सुल्तान जहां बेगम, आबिदा सुलतान अम्मा सरकार एवं शहनाज। इसी खंड में लेख है - ‘‘भोपाल विलीनीकरण आन्दोलन की वीरांगनाएं’’।
खण्ड-4 है समाज सेवा एवं राजनीति का। इसमें हैं- जयवंती हक्सर, यमुना ठाकुर, रानी चंद्रावती होल्कर, सीता परमानन्द, रत्नाकुमारी देवी, रतन देवी शास्त्री, मैत्रेयी पद्मनाभन, शालिनी ताई मोघे, अख्तर आपा, विजया राजे सिंधिया, विद्यावती चतुर्वेदी, चन्द्रप्रभा पटेरिया, यशोदा देवी, सरला ग्रेवाल, गायत्री देवी परमार, विमला शर्मा,  विमला वर्मा, जमुना देवी, पेरिन दाजी, कुसुम जैन, डॉ. नुसरत बानो ‘‘रूही’’, मृणालिनी देवी पंवार, मैमूना सुलतान, मोहिनी देवी, कृष्णा अग्रवाल, प्रभा राव, चम्पा बहन, उर्मिला सिंह, करुणा शुक्ल, सुषमा स्वराज, कल्पना पारुलेकर, कल्पना मेहता, डॉ. मेजर अनुराधा, साहित्य एवं पत्रकारिता, मध्य प्रदेश के हिन्दी साहित्य में महिला लेखन का इतिहास, हेमंत कुमारी देवी, उषा देवी मित्रा, तोरन देवी शुक्ल ‘‘लली’’,  दुर्गा भागवत, शकुन्त माथुर, पद्मा पटरथ,  डॉ. विद्यावती ‘‘मालविका’’ (मेरी स्वर्गीय माताजी), कमल शबनम कपूर, मन्नू भंडारी, क्रांति त्रिवेदी, मालती जोशी, डॉ. सुघरा मेहदी, अनुराधा जामदार, ज्योत्स्ना मिलन, इरफाना शरद, दविंदर कौर उप्पल एवं मुमताज सिद्दीकी।
खण्ड - 6 गायन, वादन एवं नृत्य में हैं- खालिदा बिलग्रामी, सुमति मुटाटकर, असगरी बाई, सुशीला पोहनकर, गायत्री नायक, जयमाला शिलेदार, अन्नपूर्णा देवी, वेणी कुंवर, लता मंगेशकर, वसुंधरा कोमकली, शकीला बानो श्भोपालीश्, बेगम खुर्शीद सिकंदर बख्त, विजय नरेश, सविता गोडबोले, शुभदा मराठे, रंजना टोणपे तथा डालिया दत्ता।
खण्ड -7 रंगमंच, सिनेमा, टीवी, चित्रकला एवं सिरेमिक में हैं - देवयानी कृष्णा, वनमाला,  गुलवर्धन, कृष्णा राजकपूर, पुष्पा जोशी, शिव कुमारी जोशी, रीता भादुड़ी, पुष्पनीर जैन एवं सीमा घुरैया।
खण्ड - 8 विविध में विविध क्षेत्र में अपने कार्यों से अपने नाम को स्थाई तो दिलाने वाली 17 महिलाओं का परिचय है।
आठों खंडों के उपरोक्त विवरण से ही सहज रूप से समझा जा सकता है की कितनी समग्रता से इस ग्रंथ में सामग्री जुटा कर प्रस्तुत की गई है। इनमें से कई नाम ऐसे हैं जो समय के साथ लगभग भुला दिए गए। जैसे भोपाल की बेगमों के योगदान को भी धीरे-धीरे हाशिए में समेट दिया गया। वस्तुतः बाजारवाद के इस दौर में ऐसा चलन आया कि यह माना जाने लगा कि ‘‘जो वर्तमान में भी समर्थ है’’ अथवा ‘‘जिसकी कथित मार्केट वैल्यू है’’, वही चर्चा में रहने योग्य है। इस सोच ने अतीत को यानी वर्तमान की नींव को ही उपेक्षित करने का दुखद कार्य किया है। मानवीय मूल्यों के गिरावट वाले एवं अपने इतिहास के प्रति उदासीनता ओढ़ने वाले ऐसे कठोर समय में  ‘‘मध्य प्रदेश के इतिहास में महिलाएं’’ जैसा ग्रंथ लाने के लिए संपादक द्वय पलाश सुरजन तथा सरिका ठाकुर को साधुवाद। यह ग्रंथ अतीत में सक्रिय सभी महिलाओं को पुनः सम्मानजनक स्थान दिलाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह अपने आप में एक ऐतिहासिक दस्तावेज की भांति है जो आने वाली पीढ़ी को अतीत के बारे में तथा अतीत में महिलाओं के ऐतिहासिक योगदान के बारे में पर्याप्त जानकारी दे सकेगा। निश्चित रूप से यह एक संग्रहणीय ग्रंथ है।  
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Saturday, July 6, 2024

टॉपिक एक्सपर्ट | पत्रिका | तनक सख्ती दिखाओ भैया जू! | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली में
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तनक सख्ती दिखाओ भैया जू!
    - डॉ (सुश्री) शरद सिंह       
         हरेक मानुस के दो ठईयां कान होत आएं। औ जो कोनऊं खों अपने कान पकरने होंय सो, ऊके लाने ऊपर वारे ने दो ठाईयां हाथ सोई दए आएं। औ दोई कान हाथ की पौंच में रैत आएं। जे नोंई के कान पकरबे के लाने चमीटा चाऊनें परत होय। पर इते तो कछू औरई सीन दिखानों। प्राब्लम इतई की, प्राब्लम वारे इतई के औ प्राब्लम पे नजर राखबे वारे इतई के, फेर बी उने प्रॉब्लम ठीक करबे में देरी काए हो रई? जे पूछबे के लाने उन्हें उते विधानसभा जाने परो। जे बात सोचबे वारी आए।
      हऔ हम लाखा बंजारा तला की बात कर रए।कौनऊं की आंखन में फूला नोंई परो, के दिखाए नोंई। जे सबई देख रए के तला को उद्धार को काम मुतकी सालों से घिसट रओ। अब लग रओ हतो के ई दफा बरसात के पैले-पैले तला संवर जैहे, सो ने संवरो। काय नईं संवरों? संवरबे में देरी काय हो रई? जे पूछबे के लाने अपने नगर विधायक भैया जू खों विधानसभा में पौंच के प्रश्न पूछने परो। सरकार अपनी, प्रशासन अपनो, अधिकारी अपने औ पूछबे उते जाने परो। ऐसो काय? जे तो बई भओ के अपनों कान पकरबे के लाने चमीटा काम में लाने परो होय। भओ जे चाइए के प्राब्लम ने सुधार पाने वारों की पैलई खिंचाई करी जाए, जोन से जे नौबत ने आए। काय से के ईसे पब्लिक में अच्छो मैसेज नईं जात। पब्लिक सोचत आय के जो उने उते जा के पूछने पर रओ सो इते हमाई को सुनहे? सो, तनक इतई सोई सख्ती दिखाओ भैया जू!
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Friday, July 5, 2024

शून्यकाल | आज फिर आवश्यकता है ‘ढाई आखर’ को समझने की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम "शून्यकाल"                                                                              आज फिर आवश्यकता है ‘ढाई आखर’ को समझने की
  - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                 
      साहित्य में प्रेम का स्वरूप बड़े सुंदर ढंग से परिभाषित किया गया है। अलौकिक प्रेम की बात करे तो ‘प्रेम गली अति सांकरी, जामें दो न समाय’ के माध्यम से अहं और ईश्वर दोनों का एक साथ प्रेम होना असंभव बताया गया है। वहीं लौकिक प्रेम में समर्पण और सादगी पर बल दिया जाता रहा है। लेकिन दोनों का आशय एक ही है। वैसे तेजी से बदलती जीवनशैली में कुछ घटनाओं को देख, सुन कर लगता है कि मानो समाज में प्रेम की भावना कम होती जा रही है। क्या सचमुच? या फिर प्रेम के प्रति समझ कम हो रही है?
     सूफ़ी संत रूमी से जुड़ा एक किस्सा है कि शिष्य ने अपने गुरु का द्वार खटखटाया। 
‘बाहर कौन है?’ गुरु ने पूछा।
‘मैं।’ शिष्य ने उत्तर दिया।
‘इस घर में मैं और तू एकसाथ नहीं रह सकते।’ भीतर से गुरू की आवाज आई। 
दुखी होकर शिष्य जंगल में तप करने चला गया। साल भर बाद वह फिर लौटा। द्वार पर दस्तक दी। 
‘कौन है?’ फिर वही प्रश्न किया गुरु ने।
‘आप ही हैं।’ इस बार शिष्य ने जवाब दिया और द्वार खुल गया। 
संत रूमी कहते हैं- ‘प्रेम के मकान में सब एक-सी आत्माएं रहती हैं। बस प्रवेश करने से पहले मैं का चोला उतारना पड़ता है।’
यह ‘मैं’ का चोला यदि न उतारा जाए और दो के अस्तित्व को प्रेम में मिल कर एक न बनने दिया जाए तो प्रेम में विद्रूपता आए बिना नहीं रहती है। इसीलिए कबीर ने भी कहा है- ‘‘प्रेम गली अति सांकरी, जामें दो न समाय।
‘प्रेम’ एक जादुई शब्द है। कोई कहता है कि प्रेम एक अनभूति है तो कोई इसे भावनाओं का पाखण्ड मानता है। जितने मन, उतनी धारणाएं। मन में प्रेम का संचार होते ही एक ऐसा केन्द्र बिन्दु मिल जाता है जिस पर सारा ध्यान केन्द्रित हो कर रह जाता है। सोते-जागते, उठते-बैठते अपने प्रेम की उपस्थिति से बड़ी कोई उपस्थिति नहीं होती, अपने प्रेम से बढ़ कर कोई अनुभूति नहीं होती और अपने प्रेम से बढ़ कर कोई मूल्यवान वस्तु नहीं होती। निःसंदेह प्रेम एक निराकार भावना है किन्तु देह में प्रवेश करते ही यह आकार लेने लगती है। एक ऐसा आकार जिसमें स्त्री मात्र स्त्री हो जाती है और पुरुष मात्र पुरुष, फिर भी एकात्मा।
प्रश्न उठता है कि पृथ्वी गोल है इसलिए दो विपरीत ध्रुव टिके हुए हैं अथवा दो विपरीत धु्रवों के होने से पृथ्वी अस्तित्व में है? ठीक इसी तरह प्रश्न जागता है कि प्रेम का अस्तित्व देह से है या देह का अस्तित्व प्रेम से? कोई भी व्यक्ति अपनी देह को उसी समय निहारता है जब वह किसी के प्रेम में पड़ता है अथवा प्रेम में पड़ने का इच्छुक हो उठता है। वह अपनी देह का आकलन करने लगता और उसे सजाने-संवारने लगता है। या फिर प्रेम के वशीभूत वह अपनी या पराई देह पर ध्यान देता है। प्रेम में पड़ कर पक्षी भी अपने परों को संवारने लगते हैं। बड़ी उलझी हुई भावना है प्रेम। इस भावना को लौकिक और अलौकिक के खेमे में बांट कर देखने से सामाजिक दबाव कम होता हुआ अनुभव होता है। इसीलिए कबीर बड़ी सहजत से ये कह पाते हैंकि -
‘पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, हुआ न पंडित कोय। 
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।।’
प्रेम कोई पोथी तो नहीं जिसे पढ़ा जा सके, फिर प्रेम को कैसे पढ़ा जा सकता है? यदि प्रेम को पढ़ा नहीं जा सकता, बूझा नहीं जा सकता तो समझा कैसे जाएगा? तो क्या प्रेम सोचने का भी अवसर देता है? कहा तो यही जाता है कि प्रेम सोच-समझ कर नहीं किया जाता है। यदि सोच-समझ को प्रेम के साथ जोड़ दिया जाए तो लाभ-हानि का गणित भी साथ-साथ चलने लगता है। बहरहाल सच्चाई तो यही है कि प्रेम बदले में प्रेम ही चाहता है और इस प्रेम में कोई छोटा या बड़ा हो ही नहीं सकता है। जहां छोटे या बड़े की बात आती है, वहीं प्रेम का धागा चटकने लगता है। ‘‘रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय। टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गंाठ पड़ जाए।’’ प्रेम सरलता, सहजता और स्निग्धता चाहता है, अहम की गंाठ नहीं। इसीलिए जब प्रेम किसी सामाजिक संबंध में ढल जाता है तो प्रेम करने वाले दो व्यक्तियों का पद स्वतः तय हो जाता है।

हजारी प्रसाद द्विवेद्वी लिखते हैं कि ‘‘प्रेम से जीवन को अलौकिक सौंदर्य प्राप्त होता है। प्रेम से जीवन पवित्र और सार्थक हो जाता है। प्रेम जीवन की संपूर्णता है।’ 
आचार्य रामचंद्र शुक्ल मानते थे कि ‘‘प्रेेम एक  संजीवनी शक्ति है। संसार के हर दुर्लभ कार्य को करने के लिए यह प्यार संबल प्रदान करता है। आत्मविश्वास बढ़ाता है। यह असीम होता है। इसका केंद्र तो होता है लेकिन परिधि नहीं होती।’’ 

क्या सचमुच परिधि नहीं होती प्रेम की? यदि प्रेम की परिधि नहीं होती है तो सामाजिक संबंधों में बंधते ही प्रेम सीमित क्यों होने लगता है?
प्रेमचंद ने लिखा है कि ‘‘मोहब्बत रूह की खुराक है। यह वह अमृतबूंद है, जो मरे हुए भावों को ज़िन्दा करती है। यह ज़िन्दगी की सबसे पाक, सबसे ऊंची, सबसे मुबारक़ बरक़त है।’’
प्रेम की परिभाषा बहुत कठिन है क्योंकि इसका सम्बन्ध अक्सर आसक्ति (वासना) से जोड़ दिया जाता है जो कि बिल्कुल अलग चीज है। जबकि प्रेम का अर्थ, एक साथ महसूस की जाने वाली उन सभी भावनाओं से जुड़ा है, जो मजबूत लगाव, सम्मान, घनिष्ठता, आकर्षण और मोह से सम्बन्धित हैं। प्रेम होने पर परवाह करने और सुरक्षा प्रदान करने की गहरी भावना व्यक्ति के मन में सदैव बनी रहती है। प्रेम वह अहसास है जो लम्बे समय तक साथ देता है और एक लहर की तरह आकर चला नहीं जाता। इसके विपरीत आसक्ति में व्यक्ति  पर प्रबल इच्छाएं या लगाव की भावनाएं हावी हो जाती हैं। यह एक अविवेकी भावना है जिसका कोई आधार नहीं होता और यह थोड़े समय के लिए ही कायम रहती है लेकिन यह बहुत सघन, तीव्र होती है अक्सर जुनून की तरह होती है। प्रेम वह अनुभूति है, जिससे मन-मस्तिष्क में कोमल भावनाएं जागती हैं, नई ऊर्जा मिलती है व जीवन में मीठी यादों की ताजगी का समावेश हो जाता है।  

प्रेम का मार्ग कठिन होता है। प्रेम मार्ग में अनेक बाधाएं होती हैं। मीरा को भी विषपान करना पड़ा था। तभी तो  जिगर मुरादाबादी कहते हैं-
ये इश्क़ नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है। 
प्रेम बलपूर्वक नहीं पाया जा सकता। दो व्यक्तियों में से कोई एक यह सोचे कि चूंकि मैं फलां से प्रेम करता हूं तो फलां को भी मुझसे प्रेम करना चाहिए, तो यह सबसे बड़ी भूल है। प्रेम कोई ‘एक्सचेंज़ आॅफर’ जैसा व्यवहार नहीं है कि आपने कुछ दिया है तो उसके बदले आप कुछ पाने के अधिकारी बन गए। यदि आपका प्रेम पात्र भी आपसे प्रेम करता होगा तो वह स्वतः प्रेरणा से प्रेम के बदले प्रेम देगा, अन्यथा आपको कुछ नहीं मिलेगा। बलात् पाने की चाह कामवासना हो सकती है प्रेम नहीं। वहीं, दो प्रेमियों के बीच कामवासना प्रेम का अंश हो सकती है सम्पूर्ण प्रेम नहीं। यदि प्रेम स्वयं ही अपूर्ण है तो वह प्रसन्नता, आह्ल्लाद कैसे देगा? वह दुख देगा, खिझाएगा और निरन्तर हठधर्मी बनाता चला जाएगा। प्रेम की इसी विचित्रता को रसखान ने इन शब्दों में लिखा है -
प्रेम रूप दर्पण अहे, रचै अजूबो खेल।
या में अपनो रूप कछु, लखि परिहै अनमेल।। 
आज के इस आधुनिक युग में भले ही लोग कहें कि प्रेम के मायने बदल गए हैं, लेकिन सच यही है कि सच्चे प्रेम का स्वरूप बदला नहीं है, वह जैसा सूर, कबीर और रसखान के समय था वैसा ही आज भी है, बस जरूरत है इसे समझने और याद रखने की। 
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Thursday, July 4, 2024

बतकाव बिन्ना की | ऊ राजा के दो सींग हते | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
ऊ राजा के दो सींग हते
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
    का आए के भौजी औ भैयाजी हफ्ता- खांड़ से बाहरे गए, सो उनसे बतकाव ने हो पा रई। सो मैंने सोची के आप ओरन से बतकाव बी कर लई जाए औ आप ओरन खों अपने इते की एक किसां सोई सुना दई जाए। काय से के ऐसी किसां कभऊं पुरानी नोई होत। ईको जो साहित्य की भाषा में कई जाए तो बरहमेस ‘‘समसामयिक मूल्य’’ होत आए। जे किसां आए एक राजा की। बाकी मैं पैलई कै रई के ई किसां को कोनऊं से जोर के ने देखो जाए, ने तो जो कछू नुकसान हुइए ऊकी जिम्मेदारी मोरी ने कही जैहे। सो, किसां को किसां घांई लइयो, ईकी ‘‘प्रासंगिकता’’ में ने परियो। सो, किसां ऐसी आए के -
एक हतो राजा। ऊको एक हतो नाई। कहो जाए तो बा राजनाई हतो। बा सिरफ राजा के मूंड़ को बाल काटत्तो, औ कोनऊं के मूंड़ को नईं। बा राजा के बाल काटत समै नायं-मायं की सबरी खबरें राजा को सुना देत्तो। एक दिनां का भओ के नाई राजा के मूंड़ को बाल काट रओ हतो औ खबरें सुनात जा रओ हतो। इत्ते में नाई को राजा के मूंड़ में कछू कड़ो-कड़ों सो लगो। ऊको लगो के राजा अपने मूंड़ में इत्तो तो चमेली को तेल डरवात आए, सो जे इनके बाल तो कर्रे हो नईं सकत। सो फेर का आय? ऊने तनक अच्छे से थथोलो। सो, बा जे देख के दंग रै गओ के राजा के मूंड़ में दो ठईयां सींग उग आए रए। तब लों राजा को सोई कछू गड़बड़ लगो के जे नाई हमाए मूंड़ में का थथोल रओ आए? सो, ऊने सोई अपने मूंड़ पे हाथ फेरो। जैसई ऊके समझ में आई के ऊके मूंड़ पे सींग आएं, सो बा घबड़ा गओ। राजा को जे बात को डर लगो के सींग उगे, सो उगे, मनो अब जे बात नाई सब खों बता दैहे तो सबरे ऊको राच्छस समझन लगहें। नाई सोई ताड़ गओ के राजा को जे पंसद ने आहे के नाई को ऊको भेद पतो रए। सो, राजा कछू कैतो ऊके पैलेई नाई राजा के आंगू हाथ जोड़ के ठाड़ो हो गओ।
‘‘महाराज! हमने आपको नमक खाओ आए, सो हम नमकहरामी कभऊं ने करहें। जो हम जे बात कोनऊं मानुस से कहें सो, रामधई, आप हमाओ मूंड़ कटवा दइयो।’’
‘‘पक्को! जे बात कोऊ से ने कैहो?’’ राजा ने पूछी।
‘‘पक्को! आप चाए जोन की कसम उठवा लेओ। का हमें अपनी जान प्यारी नोंई?’’ नाई गिड़गिड़ात भओ बोलो।
राजा ने सोची के अगर जे नाई खों मरवा दओ जाए तो ईसे का हुइए? बाल तो कोनऊं ने कोनऊं से कटवानेई परहे। जे तो हमााओ बरसों पुरानो सेवक आए, जे तो एक बेरा कोनऊं से ने कैहे। मनो नओ नाई को कोन भरोसो? ऊने कऊं बक-झक दओ तो फेर कोन-कोन को मों बंद करत फिरबी?
‘‘चलो ठीक आए। जब लौं तुम हमाए सींग को भेद, भेद राखहो, तब लौं तुमाई जान बख्शी रैहे।’’ राजा ने नाई को भरोसो दिलाओ।
नाई राजा खों तो मना-मुनू के महल से बाहरे निकर आओ, मनो कोनऊं से बताए बिना ऊको पेट पिरान लगो। मगर बा कोनऊं से कै नई सकत्तो। जो कोनऊं से कैतो औ राजा को पता पर जाती तो ऊकी तो जिनगी गई कहानी।
ऐसईं में कुल्ल मईना निकर गए। नाई जातो, राजा के मूंड़ के बाल काटतो औ राजा के मूंड़ पे बढ़त भए सींगन के बारे में कोनऊं से ने कह पाबे के कारण मन मसोस के रै जातो। जेई-जेई में ऊकी तबीयत बिगरन लगी। उकी लुगाई ने देखी के जाने कोन सी फिकर में ऊके घरवारे की तबीयत बिगरी जा रई, सो ऊने पूछी के का हो गओ। नाई ने कई के हम तुमें नई बता सकत, औ तुमें का कोनऊं खों नई बता सकत आएं, ने तो राजा हमाओ मूंड़ कटवा दैहे। ईपे ऊकी लुगाई ने कई के ऐसो करो के हारे में जा के कोनऊं पेड़ से तुम सब कछू कै आओ। ऐसे तुम कै बी लेहो औ कोनऊं मानुस सुन बी ने पाहे। नाई खों अपनी घरवारी की बात सई लगी। बा हारे गओ। उते पौंचे के जोन सबसे ऊंचो पेड़ दिखानों, ऊके गले लग के ऊको राजा के सींग के बारे में बता दओ। बतातई साथ नाई को जी हल्को हो गओ। ऊकी तबीयत सोई सुधर गई। लौट के आ के बा मजे से अपनो काम करन लगो।
कुल्ल समै बीत गओ। एक दिना राजा के दरबार में एक बाजो वारो आओ। ऊने कई के ऊके पास मंजीरा, सांरगी औ तबला आए। जो बा राजा खों भेंट करबो चात आए। राजा के मंत्री ने कई के पैले अपने बाजे बजा के दिखाओ के जे भेंट में लेने जोग आएं के नईं? बा बाजो वारो मान गओ। ऊने पैले सांरगी बजाई। सांरगीं से आवाज निकरी के -‘‘राजा के दो सींग।’’ जा सुन के राजा चैंक गओ। दरबारी सोई सन्नाटा खा गए। बाजो वारो सोई घबरा गओ। ऊने सारंगी एक तरफी धरी औ मंजीरा बजान लगो। मंजीरा से आवाज कढ़ी के ‘‘किन्ने कई? किन्ने कई?’’
     राजा को कछू समझ ने आ रई हती के जे बाजे ऐसो काय बोल गए? बाजा वारो सोई डरा गओ। ऊने तुरतईं मंजीरा छोर के तबला पकर लओ। जैसई ऊने तबला बजाओ, सो तबला बोल परो,‘‘नाई बब्बा ने कई, नाई बब्बा ने कई।’’
अब तो राजा समझ गओ के ऊकी पोल खुल गई आए। ऊने नाई खों बुलाओ औ बोलो के हमने तुमसे कई रई के तुम कोनऊं खों नई बताइयो औ तुमने कसम सोई खाई रई के ने बताहो, फेर जे सब का आए?’’
‘‘महाराज! हम सांची कै रै के हमने कोनऊं मानुस खों नई बताओ। आप चाओ तो हमाओ मूंड़ कटवा लेओ, मनो हम सांची कै रए के हमने कोनऊं मानुस से आपके सींगन के बारे में कछू नई कई।’’ नाई थरथर कांपत भओ बोलो।
राजा औ नाई की बात सुन के मंत्री को कछू शंका भई। ऊने बाजा वारे से पूछी के तुमने जे बाजा कां से बनवाए?
‘‘हजूर! हमने जे बाजा अपने इन्हईं हाथन से बनाए आएं। हम खुदई हारे गए रए। उते हमने खुदई पेड़ काटो औ ऊकी लकरिया से सारंगी औ तबला बनाओ। बाकी जे मंजीरा कांसे खों गला के बनाओ रओ।’’ बाजा वारे ने बताई। बाजा वारे की बात सुन के मंत्री समझ गओ।
‘‘नाई महाराज! अब तुम बताओ के तुमने का हारे जा के कोनऊं पेड़ से राजा को भेद कओ रओ?’’ मंत्री ने नाई से पूछो।
‘‘हओ हजूर! का करो जाए, कोनऊं से कै बिना हम मरे जा रए हते, औ कोऊ मानुस से कै ने सकत्ते सो हमने हारे जा के सूना-सन्नाटा में एक पेड़ से सब कै दई रई।’’ नाई डरात भओ बोलो।
‘‘महाराज!’’ फेर मंत्री ने राजा से कई,‘‘अब आपको भेद सब खों पता परई गओ आए। बाकी आपके सींगन से हमें कोनऊं परेसानी नोंई। काय से के आपको राज-काज अच्छो आए। कोऊ ने कोऊ गड़बड़ तो हर मानुस में रैत आए, इस, ऊको काम अच्छो भओ चाइए। सो आप के मूंड़ पे चाए सींग काय ने उग आएं, आपतो हमाए राजा हो, औ रैहो।’’
‘‘पर जे बताओ के जे तुमें कैसे समझ परी के जा नाई ने कोनऊं पेड़ से कई हुइए?’’ राजा ने मंत्री से पूछी।
‘‘महाराज! सूदी सी बात आए। आप तनक याद करो के जब सारंगी बजाई गई तो वा बोली के -राजा के दो सींग। फेर मंजीरा ने पूछी हती के -किन्ने कई, किन्ने कई? काय से ऊको पता ने रई। फेर तबला खों पता हतो सो बा बोल परो के -नाई बब्बा ने कई, नाई बब्बा ने कई। जा सुन के ई हम समझ गए रए के जा सारंगी औ तबला एकई पेड़ की लकरिया से बने हुइएं सो इन दोई खों आपको भेद पतो आए। जबकि सारंगी ठैरी कांसे की, सो बा ने जानत्ती, जेई पे किन्ने कई पूछन लगी।’’राजा मंत्री की बात सुन के ऊकी हुसियारी पे भौतई खुश भओ।
‘‘महाराज! जा नाई सोई अपन ओरन घांई इंसान की जात आए। भौत बड़ो भेद होय, सो ऊको पचानो मुस्किल होत आए। मनो ईने तो अपनी जान में कोनऊं से नई कई। ईको का पतो रओ के कभऊं पेड़ खों काट के बाजा बनाए जाहें औ बाजा सबरे भेद खोल दैहें। सो जा नाई को माफ करो जाए। जा आपके लाने भौतई ईमानदार आए।’’ मंत्री ने राजा खों समझाई। मंत्री के कहे पे नाई को बी माफ कर दओ गओ।    
सो भैया औ बैन हरों, जे हती ‘‘राजा के दो सींग’’ वारी किसां। जे किसां से दो बातें समझ में आउत आएं के राजा खों अपनी परजा से कोनऊं भेद नई रखो चाइए, बस अच्छो-अच्छो काम करो चाइए। परजा राजा की ब्यूटी नईं देखत आए औ ने हुन्ना-लत्ता देखत आए, ऊको तो सबसे पैले अपने लाने औ अपने परिवार के लाने रोटी, हुन्ना औ घर दिखात आए। सो, जो मैंगाई कम करे, बो सबसे अच्छो राजा कहाय, चाए फेर ऊके सिर पे सींग होंय, चाय पांछू पूंछ होए। औ दूसरी बात जे के जो भेद राखबे की बात करी होय, सो भेदई राखो, फेर दीवार होय चाए पेड़ होय, सबई के कान औ मों हो सकत आएं।
सो, जा अपने बुंदेलखंड की इत्ती नोनी किसां आए। बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की।
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Wednesday, July 3, 2024

चर्चा प्लस | हरदम हाशिए पर रहती है स्त्री-सुरक्षा | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस   
हरदम हाशिए पर रहती है स्त्री-सुरक्षा 
    - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                        
      किसी भी बजट में स्त्री-सुरक्षा पर कितना ध्यान रखा जाता है, यह जग जाहिर है। लाड़ली बहना योजना हो या ऐसी की कोई दूसरी योजना, स्त्रियों को आर्थिकरूप से सशक्त बनाने के लिए बेहतर है लेकिन स्त्री के लिए आर्थिक सशक्तिकरण ही सब कुछ नहीं है। उसे सबसे पहले सुरक्षा चाहिए। एक ऐसा वातावरण चाहिए जिसमें वह निडर और निश्चिंत हो कर घर से बाहर कदम रख सके एवं घर में भी सुरक्षित अनुभव कर सके। स्त्री के प्रति अपराध कारित हो जाने के बाद अपराधी के घर पर बुलडोजर चला देने से भी अपराध की दर कम नहीं हो रही है। इस पर सोचना होगा।   
चाहे राज्य का बजट हो या केन्द्र का बजट, स्त्रियों की आर्थिक शक्ति में भले ही ईजाफा कर दे लेकिन उसे उन्हें उनकी सुरक्षा को ले कर आश्वस्त नहीं कर पाता है। महिला थाने हैं किन्तु स्टाफ की कमी है। स्त्रीसुरक्षा एप्प जारी किए जाते हैं लेकिन वे भी चंद महीनों बाद बंद फाईलों जैसे हो जाते हैं। यूं भी इस प्रकार के एप्प उन्हीं महिलाओं के काम आ सकते हैं जिनके पास एंडरायड फोन हो। जिन महिलाओं पास एंडरायड फोन नहीं हैं, उनकी सुरक्षा का क्या उपाय है? वे घर से लाठी ले कर निकलें, सीटी ले कर निकलें यानी अपनी सुरक्षा का बंदोबस्त खुद करें। प्रायः सभी स्त्रियों को सलाह दी जाती है कि वे आत्मरक्षा के गुर सीखें। वे जूडो-कराटे आदि की एक्पर्ट बनें। इसका तो अर्थ यही हुआ कि समाज और कानून स्त्रियों को पूरी तरह सुरक्षा देने में स्वयं को असफल मान रहा है।

मध्यप्रदेश में स्त्रियों के प्रति अपराध करने वालों में डर पैदा करने के लिए उनके घर बुलडोजर चला कर धराशयी करने का तरीका अपनाया गया है। लेकिन यह उपाय भी पूरी तरह कारगर साबित नहीं हो पा रहा है। अपराध थम नहीं रहे हैं और अपराधी डर नहीं रहे हैं। चाहे मध्यप्रदेश हो या देश का कोई भी प्रांत, स्त्रियां कहीं भी अपने आपको सुरक्षित अनुभव नहीं कर पाती हैं। स्कूल-कालेज में पढ़ने वाली आयु की लड़कियों से ले कर कामकाजी महिलाएं तक शारीरिक शोषण के संभावित भय में जीती हैं। इस बारे में वे अपने परिजन से भी चर्चा करने से हिचकती हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि दोषी चाहे जो हो किन्तु सबसे पहले पाबंदी उन्हीं पर यानी लड़कियों और स्त्रियों पर ही लगाई जाएगी। लड़कियों को पढ़ाई छुड़ा दिए जाने का डर रहता है। वे जानती हैं कि यदि वे घरवालों को बताएंगी कि राह चलते लड़के उन्हें छेड़ते हैं या स्कूल-काॅलेज में कोई लड़का उन्हें परेशान करता है तो पहले तो उन्हीं लड़कियों के कपड़ों को लक्ष्य कर के ताना मारा जाएगा, फिर ‘‘स्कूल जाना बंद’’, ‘‘काॅलेज जाना बंद’’ की धमकी दी जाएगी। ऐसी लड़कियां सुरक्षा की उम्मींद रखें भी तो किससे?

यही दशा रहती है कामकाजी स्त्रियों की। वे कितना भी बेहतर परफारमेंस दें लेकिन हर कार्यस्थल में एक न एक लोललुप दृष्टि उन पर गड़ी रहती है। वे चाह कर भी किसी से नहीं कह पाती हैं क्योंकि वे भी जानती हैं कि सबसे से पहले तो उन्हीं को दोषी माना जाएगा कि ‘‘तुम्हीं लिफ्ट देती होगी’’। अरे, जब साथ काम करेंगे तो आपस में हंसना-बोलना तो पड़ेगा ही। अब यदि कोई स्त्री हंस कर दो बात कर ले तो इसे किसी के द्वारा ‘‘लिफ्ट’’ समझ लिया जाना सरासर गलत है। लेकिन ऐसी गलतफहमियां कई बार अपराध के सिरे तक जा पहुंचती हैं। यह अपराध किसी भी प्रकार का हो सकता है। दैहिक शोषण, मानसिक शोषण, आर्थिक चोट आदि कुछ भी। अन्यथा बदनाम करने का फितूर तो कहीं गया नहीं है। किसी स्त्री से बदला लेना है तो सबसे आसान रास्ता दिखता है उसके चरित्र पर कीचड़ उछालना। यह भी अपराध है। किन्तु इस अपराध को कानून के कटघरे तक पहुंचने की नौबत ही नहीं आती है, समाज पहले ही स्त्री को चरित्रहीन मान लेता है।

समाज में इस तरह की गिरावट क्यों आती जा रही है जबकि शासन बुलडोजर ले कर तैयार है? कहीं तो कुछ छूट रहा है जिस पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। दरअसल प्रायः शक्तिसम्पन्न परिवारों के अपराधी छूटते चले जाते हैं जिससे अपराध करने का उनका हौसला बढ़ता है। यह व्यवस्था की हर कड़ी में मौजूद खामी का दुष्परिणाम है। इस खामी की शुरूआत अपराध के विरुद्ध पहली सीढ़ी से हो जाती है। यानी पुलिस व्यवस्था आज भी स्त्रियों के मन में अपनी मजबूत छवि नहीं बना पाई है। स्त्रियां थाने जाने से हिचकती हैं। यदि स्त्री थाने पहुंच भी जाए तो स्टाफ की कमी के चलते कई बार त्वरित सहायता नहीं मिल पाती है। फिर इस समय सबसे बड़ी आपराधिक प्रवृत्ति बन कर उभरा है साइबर अपराध। स्त्रियों के विरुद्ध यह अपराध घातक ढंग से काम करता है। धोखा दे कर आपत्तिजनक तस्वीरें ले लेना और फिर उन्हें इंटरनेट पर वायरल करने की धमकी दे कर दैहिक शोषण करना। ऐसी पीड़िताओं को अपराधी खुले तौर पर धमकी देते हैं कि यदि वे पुलिस के पास गईं तो उनकी तस्वीरें या वीडियो तत्काल इंटरनेट पर डाल दिए जाएंगे। भयग्रस्त स्त्रियां या लड़कियां चाह कर भी किसी की मदद नहीं ले पाती हैं और निरंतर शोषण की शिकार होती रहती हैं। ऐसे भी कई मामले सामने आए हैं जिनमें अपराधियों ने लड़की को अपनी सहेलियों को भी अपने साथ लाने को बाध्य किया।

चाहे इंटरनेट की आड़ ले कर किया जाने वाला अपराध हो अथवा सीधे की जाने वाली यौनहिंसा हो, वह घर के बाहर घटित हो अथवा घर के भीतर किसी परिजन द्वारा घटित हो कड़ाई से रोका जाना जरूरी है। यह तभी संभव है जब अपराध की दर पर अंकुश लगे। यह तो दिख रहा है कि बुलडोजर चलाना पर्याप्त नहीं है। क्योंकि इससे अपराधी के परिजन भले ही भुगतें लेकिन अपराधी की ढीठ प्रवृति पर इसका असर नहीं पड़ता है। यूं भी यदि किसी अपराधी को अपने परिवार के भले-बुरे की चिंता होगी तो वह अपराध करेगा ही क्यो? जिसकी प्रवृति अपराधी नहीं है, उसे अपराध करने से पहले अपने परिवार की प्रतिष्ठा और परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्व उसे अवश्य याद आएंगे। अतः दण्ड को अपराधी पर केन्द्रित करना ही अधिक प्रभावी हो सकता है।
 
हम जब भी किसी महिला के साथ अपराध की खबर देखते या सुनते हैं तो उस अपराध के विरुद्ध आवाज उठाने की बजाय अपने घर की महिलाओं, बहनों और बेटियों पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगा देते हैं, जो स्वयं एक प्रकार का अपराध ही है। अकसर घरेलू हिंसा पति द्वारा पत्नी या ससुराल वालों के द्वारा बहू को शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न के रूप में नजर आती है और महिलाएँ इसे अपना भाग्य समझकर सहती रहती हैं। इस हिंसा को सहने का एक कारण यह भी है कि हमारे भारतीय समाज में शादी के पहले से ही लड़की के दिमाग में यह बात बैठा दी जाती है कि एक बार पिता के घर से डोली उठने के बाद पति के घर से ही अर्थी उठनी चाहिये यानी शादी के बाद लड़की अपने पिता के घर वापस आकर नहीं रह सकती, भले ही ससुराल वाले उसका कितना ही उत्पीड़न करें। जिसके चलते अधिकाँश महिलाएँ बिना किसी से शिकायत किये शांति से हिंसा को सहती रहती हैं।

घरेलू हिंसा की शिकार विवाहित तथा अविवाहित दोनों प्रकार की स्त्रियां होती हैं। हमारे पितृसत्तात्मक समाज में घर की बेटियों व महिलाओं के सभी महत्त्वपूर्ण निर्णय घर के पुरुष मुखिया ही करते हैं। जो अपना निर्णय उन पर थोपते हैं। यदि कोई लड़की अपना जीवनसाथी स्वयं चुन ले तो उसके परिवार वाले अपनी झूठी शान के लिये बेटी की हत्या करने में भी नहीं कतराते हैं।

महिलाओं के विरुद्ध हिंसा को लिंग आधारित हिंसा का कोई भी कार्य, जिसके परिणामस्वरूप महिलाओं को शारीरिक, यौन या मानसिक क्षति या पीड़ा होती है या होने की संभावना होती है, जिसमें ऐसे कार्यों की धमकी, जबरदस्ती या स्वतंत्रता से मनमाने ढंग से वंचित करना शामिल है, चाहे वह सार्वजनिक या निजी जीवन में हो। महिलाओं के खिलाफ हिंसा के कई रूप हैं, हत्या जैसे दहेज हत्या, ऑनर किलिंग, कन्या भ्रूण हत्या, यौन अपराध जैसे बलात्कार, शील भंग करने की हिंसा, मानव तस्करी, जबरन वेश्यावृत्ति, घरेलू हिंसा, तेजाब फेंकना, अपराध । राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की वार्षिक रिपोर्ट से पता चलता है कि भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में भारी वृद्धि हुई है। अकेले 2022 में 4,45,256 मामले दर्ज किए गए, जो हर घंटे लगभग 51 एफआईआर के बराबर है, डेटा 2021 और 2020 की तुलना में गंभीर वृद्धि को उजागर करता है। एनसीआरबी की वार्षिक अपराध रिपोर्ट ‘‘भारत में अपराध 2022’’ जो 2023 के अंत में जारी की गई थी, में दिए गए आंकड़ों से पता चलता है कि प्रति लाख आबादी पर महिलाओं के खिलाफ अपराधों की दर 66.4 थी, जबकि ऐसे मामलों में चार्जशीट 75.8 दर्ज की गई। ब्यूरो को अपराध डेटा के संग्रह और विश्लेषण का काम सौंपा गया है और यह केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है। एनसीआरबी के अनुसार, भारतीय दंड संहिता के तहत महिलाओं के खिलाफ अधिकांश अपराध पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता (31.4 प्रतिशत) के थे, जिसके बाद महिलाओं का अपहरण (19.2 प्रतिशत), महिलाओं पर उनकी शील भंग करने के इरादे से हमला (18.7 प्रतिशत) और बलात्कार (7.1 प्रतिशत) के मामले थे।  

ये आंकड़े अच्छा संकेत नहीं हैं। स्त्रियों की सुरक्षा को ले कर शासन, प्रशासन, सरकार और समाज सभी को गंभीरता से सोचना होगा। अन्यथा आंकड़े इसी तरह बढ़ते रहेंगे और स्त्रियां सुरक्षित माहौल के लिए तसरती रहेंगी।  
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Tuesday, July 2, 2024

पुस्तक समीक्षा | छंदमुक्त कविता में लालित्य की स्थापना है ‘‘पृथ्वी का प्रथम स्नान’’ | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

आज 02.07.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई डॉ. श्यामसुंदर दुबे जी के काव्य संग्रह "पृथ्वी का प्रथम स्नान" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा
छंदमुक्त कविता में लालित्य की स्थापना है ‘‘पृथ्वी का प्रथम स्नान’’
     समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक       - पृथ्वी का प्रथम स्नान
कवि         - श्यामसुंदर दुबे
प्रकाशक     - मेघा बुक्स, एक्स-11, नवीन शाहदरा, दिल्ली - 110052
मूल्य        - 200/-
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आधुनिक कविता की अपनी निजी समस्याएं हैं। इनमें सबसे बड़ी समस्या शुष्कता और सपाटबयानी की है। आधुनिक कविता जिसे छंदमुक्त कविता भी कहा जाता है, प्रायः इन दोनों समस्याओं से निरंतर जूझती रहती है। कवि में सृजन के प्रति ठहराव की कमी, संवेदना के कोमल पक्ष की अवहेलना और कभी-कभी यथार्थ को पूरी कटुता के साथ व्यक्त करने की जिद कविता को शुष्क बना देती हैं। जबकि आधुनिक कविता में भी लालित्यपूर्ण ढंग से संवाद किया जा सकता है। जैसे नरेश मेहता ने अपने प्रबंधकाव्य ‘‘प्रवाद पर्व’’ में किया। नरेश मेहता का प्रबंध काव्य ‘‘प्रवाद पर्व’’ राम कथा पर आधारित है। यह 1975 में लिखा गया और 1977 में प्रकाशित हुआ। इसमें नरेश मेहता ने छंदमुक्त आधुनिक काव्य शैली को अपनाया और यह साबित किया कि आधुनिक काव्य शैली में मात्र वामपंथी विचारों को ही नहीं अपितु पारंपरिक कथानकों को भी प्रस्तुत किया जा सकता है। नरेश मेहता के इस प्रबंध काव्य में मनोवैज्ञानिक पक्ष अत्यंत दृढ़ता से उभरा था, किन्तु प्रकृतिपक्ष अपेक्षाकृत सीमित था। जब काव्य में प्रकृति के तत्वों का प्रमुखता से समावेश करते हुए दैनिक जीवन की समस्याओं को भी व्यक्त किया जाता है तो उसमें जो लालित्य की छटा बहुलता से दिखाई देती है, वह भावनाओं को और अधिक गहरे रंगों के साथ प्रस्तुत करती है। यह बात श्यामसुंदर दुबे के काव्य संग्रह ‘‘पृथ्वी का प्रथम स्नान’’ की कविताओं से गुज़रते हुए स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है। 

डाॅ. श्यामसुंदर दुबे लोकजीवन से जुड़े हुए रचनाकार हैं। उन्होंने लोकजीवन पर अनेक ललित निबंध लिखे हैं। वे लोकजीवन के प्रतिष्ठित व्याख्याकार के रूप में भी जाने जाते हैं। चूंकि लोकजीवन प्रकृति के निकट रहता है और प्रकृति का सहचर एवं सहधर्मी होता है। अतः जब श्यामसुंदर दुबे कविता लिखते हैं तो उसमें प्रकृति, लोकजीवन और आमजन जीवन - तीनों का संतुलित प्रस्तुतिकरण दिखाई देता है। प्रकृति लालित्य की भावना को जागृत करती है, इसलिए श्यामसुंदर दुबे के इस काव्य संग्रह के प्रथम खंड की कविताएं प्रकृति के तत्वों को समर्पित हैं। 
     संग्रह के प्रथम खंड को उन्होंने शीर्षक दिया है ‘‘सृष्टि संभव’’। इस खंड में उन सभी मुख्य तत्वों पर कविताएं हैं जो सृष्टि को संभव बनाती हैं। जैसे- पृथ्वी, जल, आग, हवा, आकाश, देह और प्रेम। भारतीय दर्शन में पंचभूत अथवा पंचतत्व सभी पदार्थों के मूल माने गए हैं। ये पंचतत्व हैं- आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी। इन्हीं से सृष्टि का प्रत्येक पदार्थ बना है।  यहां तक कि मानव का अस्तित्व भी इन्हीं पंचतत्वों से बना है। जब इन पंच तत्वों में जीवन  का संचार होता है तो निर्जीव और सजीव में अंतर मुखर हो जाता है। सजीव में भावनाएं होती हैं। जहां भावनाएं होंगी वहां सृष्टि का आकलन एवं व्याख्या भी होगी। श्यामसुंदर दुबे अपनी पृथ्वी विषयक कविताओं में पृथ्वी को ‘‘गुस्सैल स्त्री’’, ‘‘लतामंगेशकर की तरह’’, ‘‘धरती का पता’’, ‘‘धरती की सुख-नींद’’और ‘‘धरती दिया बाती है’’ के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इन कविताओं में लालित्य के तत्वों की बात की जाए तो देखा जा सकता है कि मटेरियलिस्टिक एलीमेंट्स (जड़ तत्वों) का कवि ने किस तरह मानवीकरण किया है। उदाहरण के लिए ‘‘गुस्सैल स्त्री’’ की इन पंक्तियों को देखिए-
एक गुस्सैल स्त्री 
नहाती रही 
लावा की नदियों में वर्षों तक 
आग-आग होती रही 
घूमती वह चकरी-सी 
अकेली थी वह 
अपने पीड़ा भरे नृत्य में 
बिलकुल अकेली 
इस अनंत के ओर-छोर में 
वह तपती रही 
अपनी पोर-पोर में 
छिपाए अपने भीतर 
अपार संभावनाएं।

कवि ने जब जल की बात की है तो यही आह्वान किया है कि ‘‘पानी की लय न टूटने पाए’’। जल संबंधी अन्य कविताएं हैं-‘‘‘‘जल में कुंभ’’, ‘‘पानी में थी प्यास’’, ‘‘बर्फ से पूछना पानी का पता’’ और ‘‘पानी की अंतरंगता में’’। ‘‘बर्फ से पूछना पानी का पता’’ कविता में दृश्यात्मकता अद्भुत लालित्य रचती है। इस कविता की ये पंक्तियां बानगी स्वरूप-
जब कभी आप टकराएं बर्फ से
तो पूछना पानी का पता 
वह बताएगा आपको 
पानी की आँच में 
पिघलती प्यास के बारे में 
प्यास में डूबी पतझर की गलियों में 
घुमाने ले जाएगा वह 
जहाँ धीरे-धीरे पानी 
अपनी ताकत से 
बिछा रहा है वसंत 
जड़ों की धमनियों से 
झलकती उजास बना।

श्यामसुंदर दुबे ने आग को एक प्रेमगीत की तरह देखा है। ‘‘आग: प्रेमगीत है’’ कविता लिखते हुए वे कहते हैं कि -
चूल्हे के भीतर सेती है
संस्कृतियों के अंडे
अंडे जो फूट कर बनते हैं
चहचहाती कविता के दिग्गामी स्वर
वही है जो
अपनी उष्मा में ऋतुओं को उकसाती
जड़ों के रेशों में
रचती जो कम्प्यूटर
डालती मेमोरी में
वसंत, वर्षा, ग्रीष्म और शीत की
अनन्त अंगडाइयां।

‘‘पृथ्वी का प्रथम स्नान’’ संग्रह में दूसरे खंड की कविताओं को ‘‘दृश्य-परिदृश्य’’ शीर्षक से रखा गया है। इस खंड की कुल अट्ठाईस कविताओं में ‘‘मौत’’, ‘‘कुंभ’’,‘‘सूरज मछुआरा’’, ‘‘शहर’’, ‘‘नदी की स्मृति’’, ‘‘तुम नहीं लिख पाते प्रेमगीत’’, ‘‘खेत के बीचो बीच अड़ी टांग’’, ‘‘शहर में ट्रैक्टर’’, ‘‘अग्नि संस्कार’’, ‘‘दृष्टि विस्तार’’ आदि जैसी विविधतापूर्ण कविताएं हैं। कवि किसी एक बिम्ब में बंध कर नही रहना चाहता है। वह जीवन के प्रत्येक तत्व को प्रकृति के विविध बिम्बो के धरातल पर देखना चाहता है ताकि जीवन और प्रकृति का भावनात्मक संबंध बना रहे। बा़ढ़ के दृश्य को उकेरती तीखा कटाक्ष करती एक मार्मिक कविता है ‘‘फोटू बचे रहेंगे’’। कविता देखिए-
बाढ़ के बीच/उस आदमी की हिम्मत
टंगी है आकाश में
और धरती डूबती जा रही है
पांवों के नीचे/बचाने के लिए
अब उसके पास कुछ नहीं है
सिवाय अपने
वह बचा हुआ है/बचाने को बाढ़
बाढ़ बची रहेगी
तो बाढ़ से घिरे आदमी के 
फोटू बचे रहेंगे। 

डाॅ. श्यामसुंदर दुबे ने अपने इस संग्रह की कविताओं में जो लालित्य रचा है वह विश्वास दिलाता है कि छंदमुक्त कविताओं में सरसता और लालित्य को स्थापित किया और रखा जा सकता है। यथार्थ कहने के लिए सपाटबयानी ही आवश्यक नहीं है। सटीक बिम्बों का चयन तीखा प्रहार करने की क्षमता रखता है। शैलीगत परिपक्वता, भाषाई समृद्धि एवं अभिव्यक्ति की गहराई काव्य संग्रह ‘‘पृथ्वी का प्रथम स्नान’’ को पठनीय बनाती है तथा छंदमुक्त काव्य में लालित्य को स्थापना दिलाती है।     
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