Thursday, February 14, 2019

चर्चा प्लस ... राजनीतिक झूले में झूलता ट्रिपल तलाक़ - डॉ. शरद सिंह

यूं तो वेलेंटाइन के दिन तलाक की चर्चा अटपटी लगती है लेकिन बात स्त्री के अधिकारों की हो तो मुझे हर दिन उचित लगता है...
      चर्चा प्लस ...
      राजनीतिक झूले में झूलता ट्रिपल तलाक़
        - डॉ. शरद सिंह
Dr (Miss) Sharad Singh
                                 राजनीतिज्ञ महिलाओं का सचमुच हित चाहते हैं या फिर सिर्फ़ दिखावा करते हैं, इनदिनों यह यक्षप्रश्न मुंह बाए खड़ा है। एक दल ने ट्रिपल तलाक के विरोध में आवाज़ उठाई तो दूसरा दल कह रहा है कि वह सत्ता पर आया तो ट्रिपल तलाक से संबंधित कानून को रद्द कर देगा। न पहले मुस्लिम महिलाओं से बहुमत लिया गया और न अब महिलाओं से पूछा जा रहा है। ट्रिपल तलाक का मुद्दा सफलता की पींगें भरेगा या औंधेमुंह गिरेगा, यह कहना अभी कठिन है लेकिन यह तो तय है कि इस संवेदनशील मुद्दे को राजनीति के झूले में जिस तरह झुलाया जा रहा है वह दुर्भाग्यपूर्ण है।       
 चर्चा प्लस .. राजनीतिक झूले में झूलता ट्रिपल तलाक़ - डॉ शरद सिंह ... Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Daily
     23 अगस्त 2017 ‘‘सागर दिनकर’’ के अपने इसी कॉलम ‘‘चर्चा प्लस’’ में मेरा लेख था- ‘‘आखिर मिल ही गया तीन तलाक से तलाक’’। जिसमें मैंने लिखा था कि -‘‘ 22 अगस्त 2017 का दिन भारतीय न्यायायिक इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। यह तारीख गवाह रहेगी भारतीय मुस्लिम महिलाओं की उस जीत की जो उन्होंने अपने मानवीय अधिकारों पक्ष में हासिल की। यही वह तारीख है जब सुप्रीम कोर्ट ने ‘तीन तलाक’ की प्रथा को असंवैधानिक करार दिया। यह निर्णय उस मार्ग को भी प्रशस्त करता है जो एक दिन सभी भारतीय मुस्लिम महिलाएं को दुनिया की सभी प्रगतिशील महिलाओं की पंक्ति में ला खड़ा करेगा। ‘तीन तलाक’ की प्रथा के विरोध ने भले ही कड़ा संघर्ष झेला लेकिन अनेक चौंकाने वाली सच्चाइयां भी सामने आईं जिनसे स्वयं अधिकांश भारतीय मुस्लिम महिलाएं अनभिज्ञ थीं।

इससे पहले 30 मार्च 2016 को ‘‘सागर दिनकर’’ के अपने इसी कॉलम ‘‘चर्चा प्लस’’ में मेरा लेख था- ‘‘मुस्लिम महिलाओं का भविष्य’’। इस लेख में मैंने एक सर्वे के हवाले से आंकड़े देते हुए लिखा था कि -‘‘सर्वे में शामिल 525 तलाकशुदा महिलाओं में से 65.9 फीसदी का जुबानी तलाक हुआ।’’ इसी लेख में मैंने आगे जानकारी दी थी कि ‘‘भारतीय मुस्लिम महिला आन्दोलन मुस्लिम महिलाओं के नेतृत्व में एक राष्ट्रीय मोर्चा है, जो पूरे समुदाय और विषेषरुप से मुस्लिम महिलाओं के नागरिक अधिकारों के लिए संघर्षरत है। यह ‘पाक कुरआन’ और भारतीय संविधान से मिले अधिकारों और निहित कर्तव्यों के लिए काम करता है। यह भारतीय संविधान में निहित न्याय , लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को मानता है और ‘कुरआन’ के द्वारा मुस्लिम महिलाओं को मिले अधिकारों के लिए संघर्ष करता है। 13 राज्यों की 70 हजार मुस्लिम महिलाएं सदस्यों वाले राष्ट्रीय गठबंधन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन ने मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार किए जाने की जरूरत जताते हुए नवम्बर, 2015 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत कई नेताओं को पत्र लिखा था तथा बराबरी के हक और लैंगिक न्याय की मांग की थी।’’

आज स्थितियां इतनी अधिक राजनीतिक हो गई हैं कि महिलाओं के हित के बजाएं ‘ट्रिपल तलाक कानून’ पुरुषों के विरुद्ध दिखाई देने लगा है। इस कानून में यदि कोई विसंगति है तो इसमें संशोधन किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए भी बेहतर होगा कि संशोधन से पहले मुस्लिम महिलाओं से उस पर बहुमत लिया जाए। जिस राजनीतिक दल की पहचान सेक्यूलर के रूप में हमेशा रही हो, उसके तरफ से ऐसे बयान चौंकाने के लिए पर्याप्त हैं, वह भी लोक सभा चुनाव के ठीक पहले। जबकि एक साथ तीन तलाक़ को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया है। कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच में से तीन जजों ने तीन तलाक़ को असंवैधानिक माना। कोर्ट ने सरकार को इस पर कानून बनाने के लिए कहा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि सरकार संसद में इस पर कानून बनाए।
ट्रिपल तलाक कानून को लेकर कांग्रेस की तरफ से बड़ा बयान उस समय सामने आया जब कांग्रेस के अल्पसंख्यक महाधिवेशन में महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव ने कहा, ’अगर हमारी सरकार आई, तो नरेंद्र मोदी सरकार के लाए ट्रिपल तलाक कानून को खत्म कर देंगे।“ उन्होंने यह भी कहा कि ये कानून मुस्लिम पुरुषों को जेल में भेजने की एक साजिश है। उस समय वे विगत 07 फरवरी 2019 को दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में कांग्रेस अल्पसंख्यक मोर्चा सम्मेलन को संबोधित कर रही थीं। उल्लेखनीय है कि इस सम्मेलन में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी समेत अन्यम कार्यकर्ता भी मौजूद थे। जबकि 30 जनवरी 2019 की घटना है कि एटा की महिला को कथित तौर पर घर समय पर नहीं आने की वजह से उसके पति ने फोन पर ही तीन तलाक दे दिया। पीड़ित महिला ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा कि उसने अपने पति से वादा किया था कि वह तीस मिनट के भीतर लौट आएगी, मगर ऐसा नहीं करने पर उसे तुंरत तलाक दे दिया गया। महिला ने कहा कि ’मैं अपनी दादी मां को देखने अपने मायके गई थी. मेरे पति ने आधे घंटे के भीतर आने को कहा था। मैं दस मिनट लेट हो गई. उसके बाद उन्होंने मेरे भाई के मोबाइल पर फोन किया और तीन बार ’तलाक-तलाक-तलाक’ कहा. उनकी इस हरकत से मैं पूरी तरह से टूट गई।’

एक ओर महिला नेतृत्व प्रदान करती प्रियंका गांधी आपनी पूरी ताकत आगामी चुनाव में झोंक देने को दृढ़संकल्प हैं और इधर सुष्मिता देव अपने बयान पर अडिग हैं। कांग्रेस सांसद सुष्मिता देव  ने कहा है कि वह तीन तलाक विधेयक पर दिए अपने बयान पर कायम हैं। देव ने कहा था कि अगर कांग्रेस सत्ता में आती है तो पार्टी मुस्लिम समुदाय के भीतर चर्चा से निकले विकल्पों पर जाने के बजाए तीन तलाक विधेयक  को रद्द करेगी। सांसद देव ने बताया, “जो मैंने उस दिन (गुरुवार) बैठक में कहा था, वहीं मैंने संसद के अंदर भी कहा है। तीन तलाक को अपराध करार देने वाले सभी कानूनों को कांग्रेस बदार्श्त नहीं करेगी।” उन्होंने कहा, “और उसके बाद मैंने यह भी कहा था कि जो भी कानून महिला सशक्तिकरण के लिए हैं, हम उन कानून का समर्थन करेंगे। लेकिन हम (तलाक के) अपराधीकरण का समर्थन नहीं करेंगे।”
यह हठधर्मिता है या एक ऐसा तुष्टिकरण वाला कदम जो कम से कम मुस्लिम महिलाओं के हित में तो दिखाई नहीं दे रहा हैं। देखा जाए तो यह मुद्दा समान नागरिक संहिता से जुड़ा हुआ है। यदि इतिहास के पन्ने पलटे जाएं सन् 1993 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले भेदभाव को दूर करने के लिए बने कानून में औपनिवेशिक काल के कानूनों में संशोधन किया गया। देखा जाए तो संशोधन की शुरुआत सन् 1772 की हैस्टिंग्स योजना से हुई और अंत शरिअत कानून के लागू होने से हुआ। यद्यपि सन् 1929 में, जमियत-अल-उलेमा ने बाल विवाह रोकने के खिलाफ मुसलमानों को अवज्ञा आंदोलन में शामिल होने की अपील की। इस बड़े अवज्ञा आंदोलन का अंत उस समझौते के बाद हुआ जिसके तहत मुस्लिम जजों को मुस्लिम शादियों को तोड़ने की अनुमति दी गई थी।
सन् 1985 में मध्य प्रदेश की रहने वाली शाह बानो को पति द्वारा तलाक़ दिए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला किया कि उन्हें आजीवन गुजारा भत्ता दिया जाए। शाहबानो के मामले पर जमकर हंगामा हुआ और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने संसद में ’मुस्लिम वीमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स आफ डाइवोर्स) एक्ट पास कराया जिसने सुप्रीम कोर्ट के शाह बानो के मामले में दिए गए फैसले को निरस्त कर दिया और निर्वाह भत्ते को आजीवन न रखते हुए तलाक के बाद के 90 दिन तक सीमित रख दिया गया।
कुर्सी का लालच और मीडिया में बने रहने की चाह में डूबे कथित राजनीतिज्ञों को कम से कम एक बार उन तीन महिलाओं के संघर्ष को याद कर लेना चाहिए जो निरंतर जूझती रहीं तीन तलाक के विरुद्ध। पहली महिला - जयपुर की आफ़रीन रहमान जिन्हें एक चिट्ठी में तीन बार तलाक लिख कर तलाक दे दिया गया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में केस दायर किया लेकिन स्वयं के लिए नहीं बल्कि इस बात को ध्यान में रख कर कि “अपने पति पर निर्भर अन्य औरतों को ऐसी नाइंसाफ़ी का सामना ना करना पड़े।’’ दूसरी महिला - सहारनपुर, उत्तर प्रदेश की अतिया साबरी जिनके पति ने दस रुपए के स्टैम्पपे पर तीन तलाक लिख कर उनके मायके भेज कर उन्हें तलाक दे दिया था। निराश हो कर अतिया ने सुप्रीम कोर्ट से इस प्रथा को असंवैधानिक क़रार देने की अपील की। इसके साथ मांग की कि ऐसा क़ानून बनाया जाए जो मुसलमान महिलाओं को तलाक़ से जुड़े फ़ैसले लेने के समान अधिकार दे। तीसरी महिला - काशीपुर, उत्तराखंड की शायरा बानो जो अपने पति के तीन तलाक के निर्णय से आहत् हो कर सुप्रीम कोर्ट की शरण में गईं। अक्तूबर 2015 में जब पति ने शायरा  के पास तलाक़ वाली चिट्ठी भेजी तब उनका बेटा और बेटी उनके पति के पास ही थे जिनसे वे दोबारा कभी नहीं मिल सकती थीं। एक मां की तड़प के साथ उन्होंने कोर्ट से अपील की कि “मैं तो इस प्रथा का शिकार हुई लेकिन ये नहीं चाहती कि आने वाली पुश्तें भी इसे झेलें, इसीलिए मैंने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि इसे असंवैधानिक क़रार दिया जाए।“
समान नागरिक अधिकार के मुद्दों को इस तरह राजनीतिक झूले पर झुलाते रहना जहां एक ओर लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है, वहीं दूसरी ओर यह महिला अधिकारों का भी हनन करता है।
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 14.02.2019)
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Sunday, February 10, 2019

ज़मीनी ज़रूरतों को तरसता बुंदेलखंड - डॉ. शरद सिंह ... Published in Patrika.com

Dr (Miss) Sharad Singh
आज 10.02.2019 'Patrika.com' में बुंदेलखंड में ज़मीनी ज़रूरतों की अनदेखी पर लिखे गए मेरे लेख को पोस्ट के रूप में प्रकाशित किया गया है..(10.02.2019)
🙏मैं आभारी हूं  'Patrika.com' तथा 'पत्रिका' के सागर संस्करण की जिन्होंने मेरे विचारों को इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफार्म दिया💐
इस लिंक पर जा कर आप मेरा लेख पढ़ सकते हैं....
https://www.patrika.com/sagar-news/drought-and-water-crisis-in-bundelkhand-4111258/

साथ ही यहां लेख का टेक्ट्स भी दे रही हूं...

ज़मीनी ज़रूरतों को तरसता बुंदेलखंड  - डॉ. शरद सिंह   

बुंदेलखंड वह इलाका है, जिसमें मध्यप्रदेश के छह जिले छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, दमोह, सागर व दतिया उत्तर प्रदेश के सात जिलों झांसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, बांदा, महोबा, कर्वी (चित्रकूट) आते हैं। नदियों, तालाबों, कुओं वाले इस क्षेत्र में जल का सही व्यवस्थापन नहीं होने के कारण लोग बूंद-बूद पानी के लिए तरसते रहते हैं। पिछले साल 2016 में बुंदेलखंड में पीने के पानी की ऐसी समस्या हुई कि केंद्र ने वाटर ट्रेन भी भेज दी, जिसपर खूब राजनीति हुई। कई गांव ऐसे हैं जहां 10 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर से पीने का पानी लाना पड़ता है।
Dr Sharad Singh - Article in Patrika . com - 09.02.2019 - जमीनी जरूरतों के लिए तरस रहा बुंदेलखंड

जब किसान तंगहाल होता है तो शेष व्यवसाय भी लड़खड़ाने लगते हैं। बुंदेलखंड की भुखमरी भी सुर्खियों में रही है। इस समाचार ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था कि बुंदेलखंड में लोग घास की रोटियां बनाकर खा रहे हैं’। बुंदेलखंड में खेती खत्म होने, उद्योग न होने और बेरोजगारी-भुखमरी के कारण गांव के लोग पलायन करने को विवश हैं। विभिन्न ऐजेंसियों के आंकड़ों के अनुसार पिछले 10 साल मे लगभग 50 लाख लोग बुंदेलखंड से पलायन कर चुके हैं। किसानों ने खेती छोड़ दी है और दूसरे प्रांतों में मजदूरी कर रहे हैं। यहां की बदहाली और लगातार पड़ रहे सूखे ने बुंदेलखंड के युवाओं को अपनी जड़ों से उखड़ने को विवश कर दिया है। युवा अपना गांव, अपना घर-परिवार छोड़ कर बाहर नौकरी करने जाने को मजबूर हैं। युवाओं के पास बाहर मजदूरी करके खाने-कमाने और परिवार को खिलाने के अलावा दूसरा चारा नहीं है।
प्रदेश सरकारें बढ़-चढ़ कर घोषणाएं करती रहती हैं- कभी सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने की तो कभी वेतन और भत्ता बढ़ाने की। सवाल उठता है कि क्या प्रदेश सरकारों के खजानों में इतना दम है कि वे लम्बे समय तक इस प्रकार की व्यवस्थाओं को बनाए रख सकेंगी या फिर खुद सरकारी खजाने कर्ज में डूबते चले जाएंगे? बुंदेलखंड में उद्योगों का माहौल बनाने के लिए यहां के लिए विशेष पैकेज की जरूरत है, जिससे उद्योगों को यहां आकर्षित किया जा सके। इससे भी पहले निवेशकों के लिए उपयुक्त वातावरण निर्मित करना भी जरूरी है। गड्ढों और मवेशियों से भरी सड़कों पर चल कर कोई निवेशक बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचलों तक नहीं पहुंच सकता है।     
लोकसभा चुनाव सामने हैं और योद्धा इस समर को जीतने के लिए अपनी-अपनी योजनाएं बनाने में जुट गए हैं। मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश इन दो राज्यों में बंटा बुंदेलखंड राजनीतिज्ञों के लिए एक ऐसा इलाका है जहां समस्याएं ही समस्याएं हैं इसलिए यहां आश्वासन की पोटली आसानी से खोल दी जाती है। पिछले आमसभा चुनाव के दौरान भी अनेक ऐसे राष्ट्रीयस्तर के नेता बुंदेलखंड में पधारे जिन्हें बुंदेलखंड कहां है यह जानने के लिए गूगलसर्च करना पड़ा होगा। फिर चुनाव के दिन करीब आए तो फिर बुंदेलखंड याद आया। इस बार फिर कई राजनीतिक खिलाड़ी बुंदेलखंड के राजनीतिक गलियारों से गुज़रेंगे। बुंदेलखंड के राजनीतिक मंच पर दृश्य वही रहेगा- ढेर सारे मुद्दे और उससे भी अधिक आश्वासन। इस प्रसंग में बार-बार एक छोटी-सी कहानी याद आता है कि एक गांव में एक तालाब था जिसमें साफ़-स्वच्छ पानी था। हर मौसम में तालाब लबालब भरा रहता। एक बार एक शिकारी ने चुपके से एक मगरमच्छ का बच्चा तालाब में छोड़ दिया। कुछ दिन बाद जब मगरमच्छ बड़ा हुआ और लोगों के लिए खतरा बन गया तो गांववालों को उस शिकारी से निवेदन किया कि वह मगरमच्छ को मार दे। शिकारी ने मगरमच्छ मारने में इतने अधिक दिन लगाए कि तब तक उस मगरमच्छ की कई संतानें हो गईं। शिकारी ने उस मगरमच्छ को पकड़ा, गांववालों से अपना ईनाम लिया और वहां से चलता बना। कुछ समय बाद गांव वालों को पता चला कि तालाब में तो अभी भी मगरमच्छ है। उन्होंने फिर शिकारी को बुलाया। फिर वहीं किस्सा दोहराया गया। एक बार शिकारी के सहायक ने ही उससे पूछ लिया कि शिकारी साहब आप हर बार मगरमच्छ का एक न एक बच्चा तालाब में क्यों जीवित छोड़ देते हैं? इस पर शिकारी ने मुस्कुरा कर उत्तर दिया कि अगर मैं एक बार में सारे मगरमच्छ मार दूंगा और तालाब को समस्या-मुक्त कर दूंगा तो गांव वाले मुझे फिर क्यों बुलाएंगे? लगता है यही कहानी चरितार्थ होती रहती है बुंदेलखंड में।
बुंदेलखंड की कल-कल करती नदियां अब सूख चली हैं। वनपरिक्षेत्र का धनी बुंदेलखंड अंधाधुंध अवैध कटाई को दशकों से झेल रहा है। रसूख वाले बांधों से पानी चुराते हैं और रेतमाफिया नदियों से रेत चुरा रहे हैं। परिणामतः बुंदेलखंड में भी जलवायु परिवर्तन का कालासाया मंडराने लगा है। मौसम का असंतुलन सूखे का समीकरण रचने लगा है। जब पर्याप्त बारिश नहीं होगी तो किसान कैसे फसल उगाएंगे? पर्याप्त फसल नहीं होगी तो किसान कर्ज के बोझ तले दबता जाएगा और कर्ज न चुका पाने की स्थिति में वहीं हो रहा है जो आए दिन अखबारों की सुर्खियों में पढ़ने को मिलता रहा है। कर्ज़माफी कोई ऐसा स्थाई हल नहीं है कि जिसके सहारे किसान कृषिकार्य से जुड़े रहें। किसानी से युवाओं के मोहभंग होने का एक सबसे बड़ा कारण यह भी है। बुंदेलखंड 2004 से ही सूखे की चपेट में रहा। जब बहुत शोर मचा तो पहली बार इलाके को 2007 में सूखाग्रस्त घोषित किया गया। 2014 में ओलावृष्टि की मार ने किसानों को तोड़ दिया। सूखा और ओलावृष्टि से यहां के किसान अब तक नहीं उबर पाए हैं। खेती घाटे का सौदा बन गई है और किसान तंगहाली में पहुंच चुके हैं। यहां के किसान लगातार कर्ज में डूबते जा रहे हैं। लगभग 80 प्रतिशत किसान साहूकारों और बैंको के कर्जे में डूबे हैं। ओलावृष्टि के दौरान तो सैकड़ों किसानों ने आत्महत्याएं तक कर लीं। इन आत्महत्याओं की वजह से ही बुंदेलखंड देश भर में चर्चा में रहा।
 लोकसभा चुनाव की प्रजातांत्रिक घड़ी में सवाल यह है कि उन गलियारों से गुज़रने वालों को बुंदेलखंड से लगाव है या सत्ता से, इसका आकलन करना होगा बुंदेलखंड के वासियों को और तय करना होगा अपना भावी विकास।
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Thursday, February 7, 2019

चर्चा प्लस... चुनाव आते ही पिटारे से निकलते हैं मुद्दों के सांप - डॉ. शरद सिंह

Dr (Miss) Sharad Singh
मेरे कॉलम "चर्चा प्लस , Sagar Dinkar में ... आप भी पढ़िए ...

चुनाव आते ही पिटारे से निकलते हैं मुद्दों के सांप
     - डॉ. शरद सिंह

       चुनाव का समय आते ही कुछ मुद्दे ऐसे उठ खड़े होते हैं मानो इस बार तो उनका निपटारा हो ही जाएगा। पिटारे में बंद मुद्दों के सांप को राजनीतिक दल अपनी-अपनी उंगली से कोंचने लगते हैं और वह फुंफकारते हुए बाहर निकल आता है। राम मंदिर मुद्दा या शारदा चिटफंड घोटाला इससे अलग नहीं है। ऐसा नहीं है कि इन मुद्दों को ठंडे बस्तों में डाल दिया गया हो लेकिन इनके प्रति जिस तरह की सजगता चुनाव आते ही दिखाई देने लगती है, उसे देख कर लगता है कि यदि यही सजगता शुरु से बनी रहती तो मुद्दे कब के निपट गए होते।                                              
चर्चा प्लस... चुनाव आते ही पिटारे से निकलते हैं मुद्दों के सांप - डॉ. शरद सिंह , Charcha Plus Column of Dr Sharad Singh in Sagar Dinkar Newspaper
    मुद्दों की भी अपनी वैरायटी होती है। कुछ मुद्दे समय सीमा वाले होते हैं, जैसे- दैनिक, साप्ताहिक, मासिक, वार्षिक या फिर पंचवर्षीय। पंचवर्षीय मुद्दे उठ खड़े होते हैं हर पांच साल में चुनाव का समय आते ही। राममंदिर मुद्दा और शारदा चिटफंड घोटाला भी पंचवर्षीय मुद्दे हो चले हैं। चुनाव आते ही इनको ले कर हाय-तौबा शुरू हो जाती है। शारदा चिटफंड घोटाले की आंच हर बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के के दामन तक जा पहुंचती है। इस बार भी चुनाव की सरगर्मियों के बीच जांच की अांच ममता बनर्जी को परेशान करने लगी है। चुनाव दर चुनाव खिंचने वाले मामलों की तरह इस मामले में भी चुस्ती-फुर्ती का नजारा सभी ने देखा। 

ऐसा माना जाता है कि शारदा चिटफंड घोटाला पश्चिम बंगाल के एक बड़ा आर्थिक घोटाला है, जिसमें कई राजनीतिक पार्टियों के नेताओं का हाथ होने का आरोप है। दरअसल पश्चिम बंगाल की चिटफंड कंपनी शारदा ग्रुप ने आम लोगों के ठगने के लिए कई लुभावन ऑफर दिए थे। इस कंपनी की ओर से 34 गुना रकम करने का वादा किया गया था और लोगों से पैसे ठग लिए। इस घोटाले में करीब 40 हजार करोड़ रुपये का हेर-फेर हुआ है। साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने भी सीबीआई को जांच का आदेश दिया था। साथ ही पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम पुलिस को आदेश दिया था कि वे सीबीआई के साथ जांच में सहयोग करें। दरअसल, इस कंपनी की स्थापना जुलाई 2008 में की गई थी। आरोप लगाया जाता है कि इस कंपनी के मालिक सुदिप्तो सेन ने ’सियासी प्रतिष्ठा और ताक़त’ हासिल करने के लिए मीडिया में खूब पैसे लगाए और हर पार्टी के नेताओं से जान पहचान बढ़ाई। शारदा चिटफंड घोटाले में कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार सीबीआई जांच के घेरे में हैं। दरअसल राजीव कुमार ने ही चिटफंड घोटालों की जांच करने वाली एसआईटी टीम की अगुवाई की थी। साथ ही कहा गया था कि इस जांच के दौरान घोटाला हुआ था। इस कमेटी की स्थापना साल 2013 में की गई थी। दरअसल पश्चिम बंगाल में सीबीआई की एंट्री पर बैन है, इसलिए सीबीआई प्रदेश में बिना अनुमति के कार्रवाई नहीं कर सकती है। शारदा चिटफंड घोटाले की जांच को लेकर सीबीआई कोलकाता में पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार से पूछताछ के लिए पहुंची थी लेकिन पुलिस ने यहां न सिर्फ सीबीआई को रोक दिया बल्कि सीबीआई के पांच अफसरों को भी गिरफ्तार करके थाने ले गई। इस मामले में सीएम ममता बनर्जी ने भी सीबीआई का विरोध करते हुए मोदी सरकार पर निशाना साधा। घटना के बाद बंगाल की मुख्यमंत्री धरने पर भी बैठ गईं।

केंद्र पर तीखा हमला बोलते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर आरोप लगाया कि वे राज्य में तख्ता पलट का प्रयास कर रहे हैं। सीबीआई कार्रवाई “राजनीतिक रूप से प्रतिशोध वाली“ और संवैधानिक मानदंडों पर हमला है। उन्होंने कहा, ’’मुझे ऐसे प्रधानमंत्री से बात करने में शर्म महसूस होती है जिनके हाथों में खून लगा है।“ ममता ने कहा, ’’नरेंद्र मोदी और अमित शाह राज्य में तख्तापलट का प्रयास कर रहे हैं क्योंकि हमने 19 जनवरी को विपक्ष की रैली आयोजित की थी। हम जानते थे कि रैली आयोजित करने के बाद सीबीआई हम पर हमला बोलेगी। वह ब्रिगेड रैली का जिक्र कर रही थीं जिसमें करीब 20 विपक्षी दलों के नेता शामिल हुए थे। सीबीआई की कार्रवाई राजनीतिक प्रतिशोध वाली है।’’ ममता बनर्जी ने पुलिस आयुक्त राजीव कुमार के आवास के बाहर जल्दबाजी में बुलाए गए संवाददाता सम्मेलन में कहा, ’’हमारी सरकार ने सत्ता में आने के बाद चिट फंड मालिकों को गिरफ्तार किया। हमने ही मामले की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया।’’ कोलकाता के पुलिस आयुक्त राजीव कुमार, पश्चिम बंगाल के डीजी वीरेंद्र और एडीजी (कानून व्यवस्था) अनुज शर्मा भी धरना स्थल पर मौजूद थे। एक तृणमूल कांग्रेस नेता ने कहा, “हम ममता बनर्जी के नेतृत्व में संविधान की रक्षा के लिए यहां आए हैं।“ 

लोकसभा चुनाव के नजदीक आते ही एक ओर जहां अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की मांग तेज हो रही है, वहीं आरएसएस का मानना है कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण का काम 2025 तक ही पूरा हो पाएगा। प्रयागराज में कुंभ मेले के दौरान एक कार्यक्रम में संघ में नंबर दो की हैसियत रखने वाले सरकार्यवाह भैयाजी जोशी ने कहा कि अगर आज से राम मंदिर का निर्माण कार्य शुरू होता है तो पांच साल में यह पूरा हो जाएगा।  वहीं, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण पर कांग्रेस की ओर से भी बड़ा बयान आया है. कांग्रेस नेता और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा कि कांग्रेस जब सत्ता में आएगी तभी राम मंदिर बनेगा। इससे पहले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ  नेता इंद्रेश कुमार ने अयोध्या मामले में देरी के लिए कांग्रेस, वाम दल औरसुप्रीम कोर्ट के दो तीन जजों को जिम्मेदारी ठहराया था। आरएसएस नेता इंद्रेश कुमार ने आरोप लगाया था कि कांग्रेस , वाम और ‘दो तीन जज’ उन गुनहगारों में हैं जो न्याय में देरी कर अयोध्या मेंराम मंदिर के निर्माण में अड़चन डाल रहे हैं। उन्होंने दोहराया कि आरएसएस की मांग है कि मंदिर के निर्माण के लिए सरकार अध्यादेश लाए।
केंद्र ने अयोध्या में विवादास्पद राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद स्थल के पास अधिग्रहण की गई 67 एकड़ जमीन को उसके मूल मालिकों को लौटाने की अनुमति मांगने के लिये न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। लोकसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार की यह कोशिश एक चुनावी दांव के तौर पर देखा जा रहा है। बीजेपी महासचिव राम माधव ने मोदी सरकार के इस कदम को ’बहुप्रतीक्षित’ बताया। वहीं विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने सरकार के इस कदम का स्वागत किया। विहिप ने कहा था कि यह सही दिशा में उठाया गया कदम है। वहीं सुप्रीम कोर्ट में बार-बार सुनवाई टलने के मुद्दे पर केंद्रीय कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कहा था कि अयोध्या ममाला जो करीब 70 सालों से लंबित है, उसकी जल्द सुनवाई होनी चाहिए क्योंकि देश के लोग वहां एक भव्य राम मंदिर का निर्माण होने की उम्मीद कर रहे हैं, जहां कभी बाबरी मस्जिद हुआ करती थी। उन्होंने यह भी कहा था कि “अयोध्या मामला पिछले 70 सालों से लंबित है। 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का आदेश मंदिर के पक्ष में था, लेकिन अब यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। इस मामले का जल्द निपटारा होना चाहिए।“ 

ऐसा ही एक मुद्दा है रार्बट वाड्रा का। जमीन घोटाले का आरोप और जांच पड़ताल, कोट्र-कचहरी आदि सभी कुछ चल रहा है। शिकोहपुर जमीन घोटाला मामले में इसी साल सितंबर में रॉबर्ट वाड्रा और हुड्डा के खिलाफ मामला दर्ज हुआ था। यह मामला नूंह के रहने वाले सुरेंद्र शर्मा नाम ने खेड़कीदौला थाने में दर्ज करवाया था। क्योंकि इस एफआईआर में हरियाणा के पूर्व सीएम का नाम भी शामिल था, इसीलिए पुलिस ने सरकार से इजाजत मांगी थी। शिकायत दर्ज करने वाले सुरेंद्र शर्मा ने आरोप लगाया था कि वाड्रा की कंपनी ने नियमों को ताक पर रखकर घोटाला किया और वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटेलिटी ने शिकोहपुर में करीब साढ़े सात करोड़ में जमीन खरीदी थी। कमर्शियल लाइसेंस मिलने के बाद इस जमीन की कीमत काफी हद तक बढ़ गई और बाद में इसे डीएलएफ यूनिवर्सल को 58 करोड़ रुपये में बेचा गया। इसमें शिकायत थी कि नियमों को ताक पर रखकर यह जमीन सौदा हुआ है। इसके अलावा कमर्शियल लाइसेंस देने में भी तत्कालीन हुड्डा सरकार ने नियमों का पालन नहीं किया गया।
इस मामले को लेकर शुरू से ही राजनीतिक हलचल भी देखी जा रही थी। बीजेपी जहां कांग्रेस और सोनिया गांधी पर इस मामले में तंज कसती आती रही, वहीं कांग्रेस इसे राजनीतिक साजिश बताती रही है। पिछले चुनाव के समय लगने लगा था कि चुनाव होते ही कुछ ही महीनों में निर्णय हो कर रहेगा लेकिन हुआ ऐसा नहीं। अब फिर चुनाव का समय आया तो अनेक राजनीतिज्ञों को रार्बट वाड्रा याद आने लगे। 

सवाल यह उठता है कि ‘‘जल्दी निर्णय’’ की मांग चुनाव करीब आते ही क्यों सुगबुगाती है? पांच साल किस बात की प्रतीक्षा? जनता अब इतनी नासमझ भी नहीं हैकि इन दोनों प्रश्नों का उत्तर न समझे। मीडिया से जुड़ी जनता भले ही प्रत्यक्षतः कुछ न कर सके लेकिन समझती सब कुछ है। दुख तो इस बात का है कि इन बड़े-बड़े मुद्दों के बीच जल, जमीन, जंगल जैसे बुनियादी मुद्दे सिर्फ़ जुमलेबाजी बन कर रह जाते हैं और राजनीतिक दलों की जागरूकता का ड्रामा चुनाव के मंच पर चलता रहता है। 
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(दैनिक ‘सागर दिनकर’, 07.02.2019)
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बुनियादी विकास की बाट जोहता बुंदेलखंड - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह - नवभारत में प्रकाशित


Dr (Miss) Sharad Singh
प्रतिष्ठित सामाचार पत्र " नवभारत " में 07.02.2019 को  बुंदेलखंड की समस्याओं पर केंद्रित मेरा लेख....
🙏 हार्दिक धन्यवाद #नवभारत

बुनियादी विकास की बाट जोहता बुंदेलखंड
   - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह                     
लोकसभा चुनाव सामने हैं और योद्धा इस समर को जीतने के लिए अपनी-अपनी योजनाएं बनाने में जुट गए हैं। मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश इन दो राज्यों में बंटा बुंदेलखंड राजनीतिज्ञों के लिए एक ऐसा इलाका है जहां समस्याएं ही समस्याएं हैं इसलिए यहां आश्वासन की पोटली आसानी से खोल दी जाती है। पिछले आमसभा चुनाव के दौरान भी अनेक ऐसे राष्ट्रीयस्तर के नेता बुंदेलखंड में पधारे जिन्हें बुंदेलखंड कहां है यह जानने के लिए गूगलसर्च करना पड़ा होगा। फिर चुनाव के दिन करीब आए तो फिर बुंदेलखंड याद आया। इस बार फिर कई राजनीतिक खिलाड़ी बुंदेलखंड के राजनीतिक गलियारों से गुज़रेंगे।
बुनियादी विकास की बाट जोहता बुंदेलखंड - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह - नवभारत में प्रकाशित  An article of Dr (Miss) Sharad Singh in Navbharat newspaper

बुंदेलखंड के राजनीतिक मंच पर दृश्य वही रहेगा- ढेर सारे मुद्दे और उससे भी अधिक आश्वासन। इस प्रसंग में बार-बार एक छोटी-सी कहानी याद आता है कि एक गांव में एक तालाब था जिसमें साफ़-स्वच्छ पानी था। हर मौसम में तालाब लबालब भरा रहता। एक बार एक शिकारी ने चुपके से एक मगरमच्छ का बच्चा तालाब में छोड़ दिया। कुछ दिन बाद जब मगरमच्छ बड़ा हुआ और लोगों के लिए खतरा बन गया तो गांववालों को उस शिकारी से निवेदन किया कि वह मगरमच्छ को मार दे। शिकारी ने मगरमच्छ मारने में इतने अधिक दिन लगाए कि तब तक उस मगरमच्छ की कई संतानें हो गईं। शिकारी ने उस मगरमच्छ को पकड़ा, गांववालों से अपना ईनाम लिया और वहां से चलता बना। कुछ समय बाद गांव वालों को पता चला कि तालाब में तो अभी भी मगरमच्छ है। उन्होंने फिर शिकारी को बुलाया। फिर वहीं किस्सा दोहराया गया। एक बार शिकारी के सहायक ने ही उससे पूछ लिया कि शिकारी साहब आप हर बार मगरमच्छ का एक न एक बच्चा तालाब में क्यों जीवित छोड़ देते हैं? इस पर शिकारी ने मुस्कुरा कर उत्तर दिया कि अगर मैं एक बार में सारे मगरमच्छ मार दूंगा और तालाब को समस्या-मुक्त कर दूंगा तो गांव वाले मुझे फिर क्यों बुलाएंगे? लगता है यही कहानी चरितार्थ होती रहती है बुंदेलखंड में।
बुंदेलखंड की कल-कल करती नदियां अब सूख चली हैं। वनपरिक्षेत्र का धनी बुंदेलखंड अंधाधुंध अवैध कटाई को दशकों से झेल रहा है। रसूख वाले बांधों से पानी चुराते हैं और रेतमाफिया नदियों से रेत चुरा रहे हैं। परिणामतः बुंदेलखंड में भी जलवायु परिवर्तन का कालासाया मंडराने लगा है। मौसम का असंतुलन सूखे का समीकरण रचने लगा है। जब पर्याप्त बारिश नहीं होगी तो किसान कैसे फसल उगाएंगे? पर्याप्त फसल नहीं होगी तो किसान कर्ज के बोझ तले दबता जाएगा और कर्ज न चुका पाने की स्थिति में वहीं हो रहा है जो आए दिन अखबारों की सुर्खियों में पढ़ने को मिलता रहा है। कर्ज़माफी कोई ऐसा स्थाई हल नहीं है कि जिसके सहारे किसान कृषिकार्य से जुड़े रहें। किसानी से युवाओं के मोहभंग होने का एक सबसे बड़ा कारण यह भी है। बुंदेलखंड 2004 से ही सूखे की चपेट में रहा। जब बहुत शोर मचा तो पहली बार इलाके को 2007 में सूखाग्रस्त घोषित किया गया। 2014 में ओलावृष्टि की मार ने किसानों को तोड़ दिया। सूखा और ओलावृष्टि से यहां के किसान अब तक नहीं उबर पाए हैं। खेती घाटे का सौदा बन गई है और किसान तंगहाली में पहुंच चुके हैं। यहां के किसान लगातार कर्ज में डूबते जा रहे हैं। लगभग 80 प्रतिशत किसान साहूकारों और बैंको के कर्जे में डूबे हैं। ओलावृष्टि के दौरान तो सैकड़ों किसानों ने आत्महत्याएं तक कर लीं। इन आत्महत्याओं की वजह से ही बुंदेलखंड देश भर में चर्चा में रहा।
बुंदेलखंड वह इलाका है, जिसमें मध्यप्रदेश के छह जिले छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, दमोह, सागर व दतिया उत्तर प्रदेश के सात जिलों झांसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, बांदा, महोबा, कर्वी (चित्रकूट) आते हैं। नदियों, तालाबों, कुओं वाले इस क्षेत्र में जल का सही व्यवस्थापन नहीं होने के कारण लोग बूंद-बूद पानी के लिए तरसते रहते हैं। पिछले साल 2016 में बुंदेलखंड में पीने के पानी की ऐसी समस्या हुई कि केंद्र ने वाटर ट्रेन भी भेज दी, जिसपर खूब राजनीति हुई। कई गांव ऐसे हैं जहां 10 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर से पीने का पानी लाना पड़ता है।
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(दैनिक ‘नवभारत’, 07.02.2019)
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Tuesday, February 5, 2019

मोती बी ए जी से अविस्मरणीय मुलाकात - डॉ. शरद सिंह

Dr Sharad Singh with Moti BA... and his son Bhalchandra Upadhyay at Deoria UP in year 2008
आज अचानक सन् 2008 की वह तस्वीर मुझे अपनी एक फाईल में मिली जिसने यादें ताज़ा कर दीं भोजपुरी के ‘शेक्सपीयर’ कहे जाने वाले कवि, गीतकार एवं नाटककार मोती बी ए जी से देवरिया (उप्र) में उनके निवास पर मुलाकात की... अनमोल मुलाक़ात एक लिविंग लीजेण्ड से ... अफसोस कि अब वे नहीं हैं.... उन दिनों भी वे अस्वस्थ थे, लगभग अल्जाइमर की स्थिति में... फिर भी उन्होंने ममत्व से भर कर मुस्कुराते हुए मुझसे दो बातें की थीं.... अविस्मरणीय... 📷 तस्वीर में मौजूद हैं मोती बी.ए. जी के सुपुत्र श्री भालचन्द्र उपाध्याय।
🔖 जो मित्र मोती बी ए जी के बारे में नहीं जानते हैं उनके लिए मोती बी ए जी का एक संक्षिप्त परिचय दे रही हूं यहां....
भोजपुरी के 'शेक्सपियर' कहे जाने वाले कवि एवं गीतकार मोती बी0ए0 (मोतीलाल उपाध्याय) का जन्म 1 अगस्त 1919 को गांव-बरेजी, बरहज, देवरिया में हुआ था । उनके लिखे गीत` असो आइल महुआ बारी में बहार सजनी´ और `सेमर के फूल´ जनमानस में इतने लोकप्रिय हुए कि पूरे पूर्वांचल में लोक कलाकारों ने इन्हें आदर के साथ गाया । मोती बी0ए0 की प्रमुख रचनाएं थीं – सेमर के फूल, कवि भावन मानव, पायल छम-छम बाजे,मोती के मुक्तक, अस के गुहर, राशन की दुकान, मेघदूत का पदानुवाद, रविबेनएजरा का अनुवाद, लव एंड ब्यूटी, अंग्रेजी कविताओं का संग्रह । 1947 से 1955 तक उन्होंने मुंबई फिल्मी दुनिया में काम किया । 1955 से 1980 तक स्थानीय श्रीकृष्ण इंटर कॉलेज, बरहज में प्राध्यापक रहे । `लोकरंग-1´ पुस्तक में हम मोती बी0ए0 पर आलेख एवं उनके प्रमुख गीतों को प्रकाशित कर रहे हैं । मोती बी0ए0 को हिन्दी फिल्मों में भोजपुरी गीतों के प्रचलन का श्रेय दिया जाता है । `कठवा के नइया बनइहे रे मलहवा, नदिया के पार दे उतार, `छपक-छपक चले तोरी नइया रे मलहवा आइल पुरुवइया के बहार´ और `मोरी रानी हो तू ही मेरा प्राण आधार´ जैसे चर्चित गीत लिखने वाले मोती बी0ए0 को स्मरण करते हुए लोकरंग सांस्कृतिक समिति उन्हें नमन करती है । मोती बी0ए0 ने नदिया के पार(पुरानी) के अलावा सुभद्रा, भक्त ध्रुव, सिंदूर, साजन, राम विवाह, सुरेखा, हरण, ममता, ठकुराइन, गजब भइले रामा,चम्पा चमेली, फिल्मों में गीत लिखे । 1984 में प्रदर्शित फिल्म-गजब भइले रामा में अभिनय भी किया हालांकि शोहरत नदिया के पार से मिली । मोती बी0ए0 लम्बे समय से अस्वस्थ रहे और 18 जनवरी 2009 उन्होंने इस संसार से विदा ले लिया।

Monday, February 4, 2019

बुंदेलखंड से गायब हो रहे बच्चे और बेफिक्र हम - डॉ. शरद सिंह .. Patrika.com में

Dr ((Miss) Sharad Singh
आज 'Patrika.com' में बच्चों की गुमशुदगी की चिंताजनक बढ़ती दर मेरे लेख को पोस्ट के रूप में प्रकाशित किया गया है... 🙏मैं आभारी हूं 'Patrika.com' तथा 'पत्रिका' के सागर संस्करण की जिन्होंने मेरे विचारों को इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफार्म दिया💐
इस लिंक पर जा कर आप मेरा लेख पढ़ सकते हैं....
https://m.patrika.com/…/kids-missing-every-year-from-bunde…/
बुंदेलखंड से गायब हो रहे बच्चे और बेफिक्र हम - Dr Sharad Singh Patrika dot com, 04.02.2019

बुंदेलखंड से गायब हो रहे बच्चे और बेफिक्र हम - डॉ. शरद सिंह

ह्यूमन ट्रैफिकिंग की आशंका, भीख मंगवाने वाले गिरोह का भी शिकंजा

- डॉ. शरद सिंह
  देश में प्रतिदिन औसतन चार सौ महिलाएं और बच्चे लापता हो जाते हैं और इनमें से अधिकतर का कभी पता नहीं चलता। हर साल घर से गायब होने वाले बच्चों में से 30 फीसदी वापस लौटकर नहीं आते। नाबालिगों की गुमशुदगी का आंकड़ा साल दर साल बढ़ रहा है। बुंदेलखंड इससे अछूता नहीं है। बच्चों के गुम होने के आंकड़े बुंदेलखंड में भी बढ़ते ही जा रहे हैं। सागर के अलावा टीकमगढ़, दमोह और छतरपुर जिलों से भी कई बच्चे गुम हो चुके हैं। चंद माह पहले सागर जिले की खुरई तहसील में एक किशोरी को उसके रिश्तेदार द्वारा उसे उत्तर प्रदेश में बेचे जाने का प्रयास किया गया। वहीं बण्डा, सुरखी, देवरी, बीना क्षेत्र से लापता किशोरियों का महीनों बाद भी अब तक कोई पता नहीं है। इन मामलों में ह्यूमन ट्रैफिकिंग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
सागर, टीकमगढ़, दमोह और छतरपुर जिलों से जनवरी 2018 से अगस्त 2018 के बीच 513 किशोर-किशोरी लापता हुए हैं। इनमें से करीब 362 बच्चे या तो स्वयं लौट आए या पुलिस द्वारा उन्हें विभिन्न स्थानों से दस्तयाब किया गया। लेकिन अब भी 151 से ज्यादा बच्चों को कोई पता ही नहीं चला है। वर्ष 2018 में जिले में किशोर-किशोरियों की गुमशुदगी के आंकड़ों में पहले की अपेक्षा बहुत अधिक है। कुल 178 गुमशुदगी दर्ज हुए मामलों में किशोरों की संख्या लगभग 55 थी और किशोरियों 123 थी। वर्ष 2015 में गुमशुदगी का आंकड़ा 136 था जो 2016 में 167 और पिछले साल 2017 में 215 तक पहुंच गया था। इन आंकड़ों को देखते हुए इस वर्ष 2018 के दिसम्बर तक यह संख्या ढाई सौ के आसपास पहुंच गई थी। लापता होने वालों में सबसे ज्यादा 14 से 17 आयु वर्ग के किशोर-किशोरी होते हैं। इनमें भी अधिकांश कक्षा 9 से 12 की कक्षाओं में पढऩे वाले स्कूली बच्चे हैं।
आखिर महानगरों के चौराहों पर ट्रैफिक रेड लाइट होने के दौरान सामान बेचने या भीख मांगने वाले बच्चे कहां से आते हैं? इन बच्चों की पहचान क्या है? अलायंस फॉर पीपुल्स राइट्स (एपीआर) और गैर सरकारी संगठन चाइल्ड राइट्स एंड यू (क्राई) द्वारा जब पड़ताल की गई तो पाया गया कि उनमें से अनेक बच्चे ऐसे थे जो भीख मंगवाने वाले गिरोह के सदस्य थे। माता-पिता विहीन उन बच्चों को यह भी याद नहीं था कि वे किस राज्य या किस शहर से महानगर पहुंचे हैं। जिन्हें माता-पिता की याद थी, वे भी अपने शहर के बारे में नहीं बता सके। पता नहीं उनमें से कितने बचचे बुंदेलखंड के हों। बचपन में यही कह कर डराया जाता है कि कहना नहीं मानोगे तो बाबा पकड़ ले जाएगा। बच्चे अगवा करने वाले कथित बाबाओं ने अब मानो अपने रूप बदल लिए हैं और वे हमारी लापरवाही, मजबूरी और लाचारी का फायदा उठाने के लिए नाना रूपों में आते हैं और हमारे समाज, परिवार के बच्चे को उठा ले जाते हैं और हम ठंडे भाव से अख़बार के पन्ने पर एक गुमशुदा की तस्वीर को उचटती नजऱ से देख कर पन्ने पलट देते हैं। यही कारण है कि बच्चों की गुमशुदगी की संख्या में दिनोंदिन बढ़ोत्तरी होती जा रही है। बच्चों के प्रति हमारी चिन्ता सिर्फ अपने बच्चों तक केन्द्रित हो कर रह गई है। 
मध्यप्रदेश राज्य सीआईडी के किशोर सहायता ब्यूरो से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार हाल ही के वर्षों में बच्चों के लापता होने के जो आंकड़ें सामने आए हैं वे दिल दहला देने वाले हैं। 2010 के बाद से राज्य में अब तक कुल 50 हजार से ज़्यादा बच्चे गायब हो चुके हैं। यानी मध्यप्रदेश हर दिन औसतन 22 बच्चे लापता हुए हैं। एक जनहित याचिका के उत्तर में यह खुलासा सामने आया। 2010-2014 के बीच गायब होने वाले कुल 45 हजार 391 बच्चों में से 11 हजार 847 बच्चों की खोज अब तक नहीं की जा सकी है, जिनमें से अधिकांश लड़कियां थीं। सन् 2014 में ग्वालियर, बालाघाट और अनूपुर जि़लों में 90 फीसदी से ज़्यादा गुमशुदा लड़कियों को खोजा ही नहीं जा सका। ध्यान देने वाली बात ये है कि लड़कों की अपेक्षा लड़कियों के लापता होने की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है जो विशेषरूप से 12 से 18 आयु वर्ग की हैं। निजी सर्वेक्षकों के अनुसार लापता होने वाली अधिकांश लड़कियों को जबरन घरेलू कामों और देह व्यापार में धकेल दिया जाता है। पिछले कुछ सालों में एक कारण ये भी सामने आया है कि उत्तर भारत की लड़कियों को अगवा कर उन्हें खाड़ी देशों में बेच दिया जाता है। इन लड़कियों के लिए खाड़ी देशों के अमीर लोग खासे दाम चुकाते हैं।
बदलते वक्त में अरबों रुपए के टर्नओवर वाली ऑनलाइन पोर्न इंडस्ट्री में भी गायब लड़कियों-लड़कों का उपयोग किया जाता है। इतने भयावह मामलों के बीच भिक्षावृत्ति तो वह अपराध है जो ऊपरी तौर पर दिखाई देता है, मगर ये सारे अपराध भी बच्चों से करवाए जाते हैं।
बच्चों के लापता होने के पीछे सबसे बड़ा हाथ होता है मानव तस्करों का जो अपहरण के द्वारा, बहला-फुसला कर अथवा आर्थिक विपन्ना का लाभ उठा कर बच्चों को ले जाते हैं और फिर उन बच्चों का कभी पता नहीं चल पाता है। इन बच्चों के साथ गम्भीर और जघन्य अपराध किए जाते हैं जैसे- बलात्कार, वेश्यावृत्ति, चाइल्ड पोर्नोग्राफी, बंधुआ मजदूरी, भीख मांगना, देह या अंग व्यापार आदि। इसके अलावा, बच्चों को गैर-कानूनी तौर पर गोद लेने के लिए भी बच्चों की चोरी के मामले सामने आए हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चे मानव तस्करों के आसान निशाना होते हैं। वे ऐसे परिवारों के बच्चों को अच्छी नौकरी देने के बहाने आसानी से अपने साथ ले जाते हैं। ये तस्कर या तो एक मुश्त पैसे दे कर बच्चे को अपने साथ ले जाते हैं अथवा किश्तों में पैसे देने का आश्वासन दे कर बाद में स्वयं भी संपर्क तोड़ लेते हैं। पीडि़त परिवार अपने बच्चे की तलाश में भटकता रह जाता है।
सच तो यह है कि बच्चे सिर्फ पुलिस, कानून या शासन के ही नहीं प्रत्येक नागरिक का दायित्व हैं और उन्हें सुरक्षित रखना भी हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है, चाहे वह बच्चा किसी भी धर्म, किसी भी जाति अथवा किसी भी तबके का हो।
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आभासी दुनिया में - डॉ. शरद सिंह ... 'जनसत्ता' में 'दुनिया मेरे आगे' कॉलम में प्रकाशित

Dr (Miss)Sharad Singh

आज 04.02.2019 को 
'जनसत्ता' में 'दुनिया मेरे आगे' कॉलम में प्रकाशित मेरा लेख ... इसे जरूर पढ़िए... लिंक और टेक्स्ट यहां दे रही हूं...

 
🙏हार्दिक धन्यवाद जनसत्ता 🙏 http://epaper.jansatta.com/c/36392646
दुनिया मेरे आगे
आभासी दुनिया में
- डॉ. शरद सिंह
मेरी एक परिचित मेरे घर से दुनिया के दूसरे छोर में रहती हैं यानी सिएटल में। उनकी उम्र 72 के आस-पास है। उम्र के अनुपात में वे आज भी चुस्त-दुरुस्त हैं। चेहरे पर उतर आई झांइयों और ढीली पड़ती चमड़ी को अनदेखा कर दिया जाए तो वे आज भी ठीक वैसी ही दिखाई देती हैं जैसे तीस साल पहले दिखती थीं। जब वे अपने पति और बेटे के साथ इन्दौर चली गई थीं। तब उन्हें पारिवारिक विदाई दी गई थी, रात्रिभोज के साथ। उस रात की उनकी छवि ही मेरी आंखों की थाती थी। 
Jansatta, Duniya Mere Aage - Aabhasi Duniya Me - Dr Sharad Singh, 04.02.2019
भागते-दौड़ते समय में कई बार उनकी याद आई, उसी रात्रिभोज वाली छवि के साथ। झुंझलाहट होती कि अब तो वे दैहिकरूप से बदल चुकी होंगी। शायद मोटी हो गई हों, थुलथुल या बेहद पतली, कौन जाने। पक्का था कि फिर देखूंगी तो पहचान नहीं सकूंगी उन्हें। अकसर यही तो होता है, बिछड़े हुए जब कई साल बाद मिलते हैं तो उनका आकार-प्रकार सब कुछ बदल चुका होता है। वे होते तो वही हैं, फिर भी वही नहीं होते। मैं उन्हें ‘मौसी’ कहती थी। उनके इन्दौर जाने तक तो आशा थी कि कभी न कभी उनसे मिलना हो ही जाएगा। लेकिन फिर पता चला कि उनके पति को यानी मौसा जी को सिएटल के किसी कॉलेज में अतिथि शिक्षक के रूप में बुला लिया गया है और सपरिवार अमेरिका चले गए हैं। सिएटल उन्हें रास आ गया। उनके कोई रिश्तेदार भी वहीं थे। कुछ समय बाद अचानक मौसाजी चल बसे। पर मौसी वहीं बस गईं। बेटे ने वहीं अपनी पढ़ाई पूरी की और वहीं नौकरी, शादी कर के हमेशा के लिए सिएटलवासी हो गया। यह सारी बातें मुझे मौसी से ही पता चलीं।
हुआ यूं कि एक दिन अचानक फेसबुक पर मौसी की ‘रिक्वेस्ट’ देख कर मैं चकित रह गई। दिल एकबारगी तेजी से धड़का और फिर अनुमान लगाने लगा कि प्रोफाईल में जो फोटो दिख रही है वह कितनी पुरानी है? क्योंकि उस तस्वीर में मौसी की उस रात्रिभोज वाली छवि कौंध रही थी। उनकी फेसबुक वाल पर जा कर उनकी कुछ ताज़ा तस्वीरें देखीं तो समझ में आ गया कि वे मात्र उतनी ही बदली हैं जितनी कि उम्र ने उन्हें बदला है, वह भी बड़ी कोमलता से। उनका सिकुड़ा हुआ चेहरा अभी भी वही भावभंगिमा दिखा रहा था। कलेण्डर ने मानो एक झटके में कई सारे पन्ने पलट दिए और मुझे उसी रात्रिभोज वाले समय में पहुंचा दिया। एक पल की देर नहीं लगाई मैंने उनकी ‘रिक्वेस्ट’ स्वीकार करने में। उनका मुझ तक पहुंचना कोई रहस्य नहीं था क्योंकि मैंने देखा हमारे कुछ मित्र ‘मीचुअल’ यानी साझा थे। उन्हीं में से किसी के जरिए उनहें मेरी कोई पोस्ट देखने को मिल गई होगी और उन्हें मेरा पता चल गया होगा।
जब मैं अपने बिस्तर पर गहरी में सो रही थी, उसी किसी समय मौसी ने मेरी एक पोस्ट को पहली बार ‘लाईक’ करते हुए लिखा-‘हलो, कैसी हो?’ फिर उनकी अगली टिप्पणी थी-‘मुझे पहचाना? मैं तुम्हारी शांता मौसी।’
बस, वहीं से हमारे बीच संवाद का सिलसिला चल पड़ा। लेकिन इसके बाद के सारे संवाद ‘वॉल’ से हट कर ‘इनबॉक्स’ में होने लगे। हमने एक-दूसरे से अपनी अब तक की जिंदगी की कई बातें साझा कीं। उन्होंने मेरा मोबाईल नंबर मांगा। मैंने दे दिया। इसके बाद एक सुबह अचानक उनका फोन आया मेरे मोबाईल पर।
‘मैं बोल रही हूं, तुम्हारी शांता मौसी।’ वही खनकती-सी आवाज़। उम्र की थकन यदि आवाज़ में न झलकती तो कुछ भी नहीं बदला था स्वरों के उतार-चढ़ाव में।
‘ओह, आप इंडिया कब आईं?’ मैंने पूछा।
‘नहीं मैं भारत में नहीं हूं, सिएटल में ही हूं।’ उनकी इस बात ने मुझे झेंपने पर विवश कर दिया। मैंने उनसे ‘इंडिया’ कहा था और उन्होंने उत्तर देते हुए ‘भारत’ कहा। उस पर यह मेरे लिए हर्ष मिश्रित आश्चर्य का विषय था कि वे सिएटल से मुझसे बात कर रही थीं। संभवतः भारत में रहने वाले उनके रिश्तेदारों को भी उनके द्वारा फोन किए जाने की इच्छा रहती होगी। यहां से वहां फोन करना मंहगा जो पड़ेगा। उस समय यही विचार आया मेरे मन में।
जल्दी-जल्दी परस्पर ढेर सारी बातें कर डाली थीं हम दोनों ने। उस दौरान उनके द्वारा कही गई एक बात मेरे मन को गहरे तक छीलती चली गई।
‘‘मैंने भारत के बहुत से पुराने परिचितों को अपने फेसबुक में जोड़ रखा है। उनसे मुझे अपनेपन का बोध होता है, वरना यहां तो पराएपन की गंध जाती ही नहीं है। सच, दम घुटता है।’’ उन्होंने कहा था। बाद में देर तक मैं अपने मन को खंगालती रही कि मैं भी क्या उन्हें वह अपनापन दे पा रही हूं जो वे सात समंदर पार से यहां ढूंढ रही हैं? न जाने क्यूं मुझे याद आ गइ्र्र टॉम हैंक्स और मेग रायन की प्रसिद्ध फिल्म ‘स्लीपलेस इप सिएटल’। हॉलीवुड की सन् 1993 की इस फिल्म में एक विधुर पिता को उसका आठ वर्षीय बेटा एक रेडियो टॉक शो में जाने के लिए प्रेरित करता है ताकि उसका पिता अपने लिए एक नया जीवनसाथी ढूंढ सके। यह कहानी याद आते ही मुझे लगा कि वह सिएटल कहीं भी हो सकता है, अमेरीका ही नहीं, भारत के छोटे से गांव-कस्बे में भी। जहां एकाकी लोग प्रेम भरे अपनेपन के लिए सोशल मीडिया का मुंह जोहते रहते हैं। सच कहूं तो यह सच मैंने उसी दिन जाना कि सिएटल ही नहीं बल्कि पूरी वह दुनिया अनिद्रा की शिकार है जो आंखें फाड़-फाड़ कर आभासीय दुनिया में अपने लिए मुट्ठी भर प्रेम तलाश कर रही है। उस आभासीय दुनिया में जहां सच और झूठ में अंतर करना बेहद कठिन है।
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(जनसत्ता, 04.02.2019)
जनसत्ता #शरदसिंह  आभासी_दुनिया_में  दुनिया मेरे आगे