Tuesday, July 16, 2024

पुस्तक समीक्षा | मन से जन तक की यात्रा करते दोहे इस दौर के | समीक्षक डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | आचरण

आज 16.07.2024 को  #आचरण में प्रकाशित मेरे द्वारा की गई श्री राजेंद्र गौतम के काव्य संग्रह "कुछ दोहे इस दौर के" की समीक्षा।
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पुस्तक समीक्षा
मन से जन तक की यात्रा करते दोहे इस दौर के
समीक्षक - डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह
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पुस्तक -  कुछ दोहे इस दौर के
कवि - राजेंद्र गौतम
प्रकाशक - अनुज्ञा बुक्स, 1/10206, लेन नं 1ई, वेस्ट गोरख पार्क, शाहदरा, दिल्ली-32
मूल्य - 250/-
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हिंदी काव्य साहित्य में दोहा एक प्राचीनतम विधा है। यह सदियां पार करते हुए अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं। सूर, कबीर, रैदास, रहीम आदि के दोहे सभी की स्मृतियों में आज भी मौजूद हैं। कोई अन्य काव्य शैली अथवा छंद दोहों का स्थान नहीं ले सका। 13-11 मात्राओं वाली दो पंक्तियों के संक्षिप्त दोहे अभिव्यक्ति का अद्भुत मध्यम रहे हैं। समय के अनुसार दोहों की विषयवस्तु में कतिपय परिवर्तन होता रहा किंतु उसका मूल स्वरूप यथावत रहा। दोहों में भक्ति के भाव मुखरित हुए तो अंधविश्वास, शोषण एवं भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ भी बुलंद हुई। यह सब भक्तिकाल से यथावत चला आ रहा है। विनम्रता से ले कर कठोरता तक, सब कुछ दोहों के माध्यम से अभिव्यक्त किए गए। यह भी सच है कि दौर बदलता है तो स्थितियों में भले ही बहुत अधिक अंतर न आए किन्तु बिम्ब और मानक अवश्य बदलते हैं। पहले सामाजिक व्यवस्थाओं ने रोजगार को सीमित कर रखा था तो अब मशीनों ने तथा कम्प्यूटराइजेशन ने हाथों से काम छीन लिए हैं। अर्थात् कारण भले ही बदल गए किन्तु मूल दशा लगभग वही रही। इस दशा को लक्षित करता हुआ एक दोहा संग्रह आया है जिसका नाम है ‘‘कुछ दोहे इस दौर के’’। इस संग्रह के रचनाकार हैं प्रतिष्ठित नवगीतकार एवं दोहों के सुपरिचित हस्ताक्षर राजेन्द्र गौतम।
राजेन्द्र गौतम ने अपने दोहों के बारे में पुस्तक की भूमिका में आरंभ में ही बड़ी अच्छी बात लिखी है कि वे अपने दोहे निजी नहीं वरन जन का स्वर मानते हैं। उन्होंने लिखा है कि ‘‘ये दोहे मेरे नहीं, या कहूं, सिर्फ़ मेरे नहीं हैं क्योंकि इनमें केवल मेरे मन की बात नहीं है। है ‘मन की बात’ भी है पर थोड़ी है। ज्यादा इसमें ‘जन-मन की बात’ है।’’
‘‘स्वगत’’ में राजेन्द्र गौतम ने एक रोचक घटना का भी उल्ल्ेख किया है जो जनसरोकार को व्यख्यायित करता है और एक विमर्श भी खड़ा करता है। उन्होंने लिखा है कि उनके एक मित्र ने उन्हें उलाहना दिया कि वे जनसरोकारित नहीं हो सकते हैं क्योंकि उनके पास कार है, घर में एसी लगा हुआ है, भला वे निर्धन का दुख कैसे समझ सकते हैं? निश्चित रूप से कवि के मित्र का पाला ऐसे कथित उदारमना लोगों से पड़ा होगा जो एसी कमरों में बैठ कर निर्धनों के हित के लिए योजनाएं बनाने का ढोंग करते हैं अथवा सुने-सुनाए आधार पर कविताई करते हैं, जिसका खांटी यथार्थ से कोई लेना-देना नहीं होता है। किन्तु उतना ही सच यह भी है कि सभी कवि ‘एलीट वर्ग’ से नहीं आते हैं। जिनका बचपन गांव की धूल-मिट्टी में खेलता हुआ गुजरा हो, जिन्होंने अपने माता-पिता के संघर्षों को देखा हो और जिन्होंने अपनी नहीं तो कम से कम पराई कृषि जमीन को छल द्वारा हड़पे जाते देखा हो, वे एसी कक्ष में बैठ कर भी उस जन की पीड़ा को व्यक्त कर सकते हैं। क्योंकि बात संवेदना की होती है, दिखावे की नहीं। यदि कवि के भीतर संवेदनाएं जाग्रत अवस्था में हैं तो वह कहीं भी सांस लेता हुआ अपनी कविताओं में सच की आंच का ताप समेट सकता है। व्यक्ति चाहे एक बार ही क्यों न किसी रोटी की भाप से जला हो उसे जलने की पीड़ा का पता होता है। वहीं, राजेन्द्र गौतम एक ऐसे कवि हैं जो जमीन से जुड़े हुए हैं और उन्होंने अपने नवगीतों के माध्यम से गांव एवं शहर के जन की पीड़ा को हमेशा अभिव्यक्ति दी है। उनकी यह खूबी उनके दोहों में आना भी स्वाभाविक था।
पाल भसीन ने संग्रह में इस बात की तस्दीक भी की है कि ‘‘गांव से शहर पहुंच कर भी गांव की मिटटी से जुड़े रहना सभी के वश की बात नहीं होती। इस बात का प्रमाण उनके (राजेन्द्र गौतम के) नवगीतों और दोहों में सहज ही मिल जाता है और अब इनमें से कुछ इस एल्बम के रूप में आपके सामने हैं।’’
संग्रह की भूमिका लिखते हुए भारतेंदु मिश्र का कथन है कि ‘‘ये दोहे असल में कवि द्वारा हमारे समय का परिस्थितियों के अनुरूप किया गया संवाद है। ये हमारे समय की आहटें हैं और यह संवाद अभी जारी है।’’
काव्य की चाहे कोई भी विधा हो, जब समय से संवाद करते हुए समय के साथ चलती है तो उसकी उपादेयता स्वतः सिद्ध रहती है। राजेन्द्र गौतम के दोहों की भी उपादेयता स्वयंसिद्ध है। उनके दोहों में यथार्थ की मार्मिक प्रस्तुति है। जैसे यह दोहा देखिए-
व्यर्थ  सभी  संचार  हैं, तार और बेतार।
खटिया तक महदूद है, अम्मा का संसार।।
मां पर ही एक और दोहा देखिए-
चूल्हे-चैके में खटे जीवन का अनुवाद।
मां की पोथी में मिले, लिखे यही संवाद।।
भूख या गरीबी का संबंध जाति, धर्म, समुदाय से नहीं वरन आर्थिक स्थिति पर टिका होता है। जो अर्थबल से सम्पन्न है, उसकी की प्रभुता का बोलबाला रहता है किन्तु जो अर्थविहीन है वह दलितों और शोषितों की कतार में ही खड़ा दिखाई देता है, फिर चाहे वह किसी भी धर्म अथवा जाति का क्यों न हो। इसी बात को राजेन्द्र गौतम ने कुछ इस प्रकार कहा है-  
भूखे सोएं सांस भर, रामू और करीम।
मंदिर-मस्जिद बेख़बर, सुबके लेकिन नीम।।
जब पास में पूंजी न हो और सिर पर कर्जे का भारी बोझ लदा हो तो किसान या तो पलायन कर के शहरों में मजदूरी करने को विवश हो जाते हैं अथवा कुछ घबरा कर आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं। दोष इसमें गांव का नहीं अपितु उस व्यवस्था का है जिसमें देश की आजादी के कई दशक बीत जाने पर भी किसान सर्वाधिक शोषित है। फिर आज तो कार्पोरेट जगत की भी कुदृष्टि उस पर गड़ी रहती है। राजेन्द्र गौतम का ये दोहा इस दशा को बेहतर स्पष्ट करता है-  
बरगद को था क्या पता होंगे गांव मसान।
गीधों का आहार है हरिया या मलखान।।
जिस तरह किसान शोषण का शिकार है उसी तरह मजदूर की दशा भी उससे इतर नहीं है। दिन भर हाड़तोड़ मेहनत के बाद दिहाड़ी के रूप में कभी चंद रुपए, तो कभी मुट्ठी भर अनाज मिलता है। जिससे न तो उसके परिवार का पेट भरता है और न उसका स्वयं का। लेकिन मजदूर से काम लेने वाले को इससे कोई वास्ता नहीं है कि मजदूर को भरपेट खाना मिला है या नहीं, उसे तो मजदूर से ज्यादा से ज्यादा काम करवा लेने की भूख होती है। यह दोहा देखिए-
डेढ़  सेर  आटा  दिया, पंसारी  ने  तोल।
खून-पसीने का मिला, सांझ ढले यह मोल।।
गंावों का भी शहरीकरण हो रहा है। किन्तु यह शहरीकरण पूंजीपतियों की मुट्ठी में कैद है। किसानों, गरीबों की जमीनें आधे-पौने दामों में ले कर एम्यूजमेंट पार्क और पंच सितारा होटल बनाए जाते हैं। इनके ठीक चार कदम पर भूख और बदहाली अपना तांडव करती रहती है जिसकी ओर देखना भी किसी को गंवारा नहीं होता है। ये दोहे इसी कटु सच्चाई को बयान करते हैं-
झुग्गी वाले नगर का पाँच सितारा रूप।
कहीं पूस की रात है कहीं फागुनी धूप।।
होरी के घर आज भी नहीं पँसेरी धन ।
खेत-खेत में लिख रही भूख करुण गोदान।।
देसज परिदृश्य देख कर कवि का हृदय व्यथित हो उठता है। उसे क्षोभ होता है कि हम किस बात पर गर्व करें जब हमारे यहां भूख और गरीबी का बोलबाला है-  
पूरब-पच्छिम उड़ रहा इसका धानी चीर।
इसकी आंखों में बसी हर मीरा की पीर।।
बापू के मन का पढ़े, हृदय-विदारक क्लेश।
माथा ऊंचा  रख  सके,  कैसे गूंगा देश।।
कवि ने अपने दोहों में जहां एक ओर जन के कष्टों की बात की है, वहीं उसने मन की उमंगों से उपजती कोमल भावनाओं को भी सुंदरता से पिरोया है। इन दोहों में बिम्बों का आधुनिक स्वरूप भी अत्यंत रोचक है। बानगी देखिए-
चुटकी एक गुलाल की, सुर्ख हुए हैं गाल।
देह लरजती छुवन से, ज्यों फूलों की डाल।।
चुटकी एक गुलाल की, लाई कितनी याद।
भले वर्चुअल ही सही, दे जाती उन्माद।।
चुटकी एक गुलाल की बदले सारे सीन।
श्वेत-श्याम थी जिन्दगी अब सपने रंगीन।।
गुझियां देवर को मिलीं होली का उपहार
पिय को केवल मिल सका रुखा-सूखा प्यार।
कवि राजेन्द्र गौतम ने अपने इस संग्रह में अपने कुछ हरियाणवी दोहे भी शामिल किए हैं।
वैसे एक बात इस संग्रह के दोहों के विषय में है जो मुझे खटकी, वह है दोहों का फार्मैट। इस संग्रह के दोहे कथन की दृष्टि से, वजन की दृष्टि से और शैली की दृष्टि से परिपक्व एवं बेहतरीन हैं किन्तु कवि ने इन्हें संग्रह में प्रस्तुत करते समय दो लाईनों के बदले पांच लाईनों में तोड़ कर प्रस्तुत किया है। चूंकि दोहा एक परंपरागत विधा है और दो लाईनों में ही इसे देखने की आदत है अतः इसे पांच लाईनों में प्रस्तुत करने का उद्देश्य समझ से परे है। कवि की ओर से अपनी भूमिका में इस बारे में कोई कारण भी नहीं बताया गया है। कवि राजेन्द्र गौतम एक वरिष्ठ कवि हैं अतः उनके द्वारा किया गया यह प्रयोग चौंकाता है। क्योंकि उनके दोहों की प्रवृति एवं प्रकृति में पूर्वकालीन दोहा शैली से भिन्नता नहीं है किन्तु फार्मेट में यह भिन्नता होने से भ्रम उत्पन्न होता है। जब कोई पाठक पुस्तक का नाम ‘‘कुछ दोहे इस दौर के’’ पढ़ कर दोहे पढ़ने के मंसूबे से पुस्तक को अपने हाथों में लेगा और उसके कलेवर पर प्रथम दृष्टि डालेगा तो उसमें क्षणिकाएं होने का बोध होगा, जबकि सभी दोहे हैं। यह जोखिम कवि ने क्यों लिया, यह उन्होंने आत्मकथन में स्पष्ट किया होता तो उचित होता। फिर भी मात्र फार्मेट को ले कर संग्रह के दोहों को नकारा नहीं जा सकता है क्योंकि उनकी सम्प्रेषणीयता उन्हें पढ़ने के बाद विचारों को देर तक उद्वेलित करने में सक्षम है।            ---------------------------- 
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Monday, July 15, 2024

डॉ (सुश्री) शरद सिंह रेलवे स्टेशन पर श्रीराम सेवासमिति के जल सेवा समापन कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि

🚩"जा पर कृपा राम की होई। ता पर कृपा करहिं सब कोई॥ - श्रीराम की कृपा श्रीराम सेवा समिति पर हमेशा बनी हुई है। मैं उन सेवादारों को प्रणाम करती हूं जो मौसम की परवाह किए बिना भीषण गर्मी में चौबीसों घंटे रेलयात्रियों को निःशुल्क पानी पिला कर जलसेवा का कार्य करते हैं।" यह मेरे दिल से निकली अभिव्यक्ति थी जिसे मैंने अपने संक्षिप्त उद्बोधन के आरंभ में व्यक्त किया। अवसर था कल दोपहर श्रीराम सेवा समिति के इस वर्ष के जलसेवा कार्य के औपचारिक समापन का।
    🚩"इस बार जब दिल्ली भीषण जल संकट से जूझ रहा था, उस समय भी सागर से गुजरने वाले यात्रियों को पीने के पानी के किसी संकट का सामना नहीं करना पड़ा।" यह उद्गार थे गांधीवादी चिंतक, लेखक एवं समाज सेवी आदरणीय दादा रघु ठाकुर जी के। 
     🚩 मित्रो,  श्रीराम सेवा समिति विगत 26 वर्षों से सागर रेलवे स्टेशन पर प्रतिवर्ष गर्मी के मौसम में निशुल्क प्याऊ का संचालन करती है। प्रति वर्ष अनुसार इस वर्ष भी अप्रैल से इस  सेवाकार्य का आरंभ किया गया था, कल 14 जुलाई 2024 को अगले वर्ष तक के लिए स्थगित किया गया। 
      🚩समापन समारोह के अध्यक्ष थे गांधीवादी चिंतक, लेखक एवं समाज सेवी आदरणीय दादा रघु ठाकुर जी, मुख्य अतिथि थे रेलवे स्टेशन थाना प्रभारी श्री चौधरी जी, विशिष्ट अतिथि थे  श्री सरस्वती पुस्तकालय एवं उच्च न्यायालय के सचिव दादा श्री शुकदेव प्रसाद तिवारी जी, समाजसेवी भाई श्री रमाकांत यादव जी तथा मैं डॉ (सुश्री) शरद सिंह। 
    🚩 आयोजन के आरंभ में श्री राम सेवा समिति के अध्यक्ष समाजसेवी भाई विनोद तिवारी ने समिति के इस वर्ष के आय-व्यय का ब्योरा प्रस्तुत किया। उल्लेखनीय है कि इस संस्था को स्वर्गीय श्री हसरेजा एवं स्वर्गीय पाहवा जी ने आरंभ किया था और यह संस्था आज अध्यक्ष विनोद तिवारी जी के अथक प्रयासों से निरंतर फल-फूल रही है। इस संस्था के द्वारा जलसेवा के साथ ही हर जरूरतमंद को सहयोग दिया जाता है। जिसके लिए भाई विनोद तिवारी एवं उनके सभी साथी सेवादार साधुवाद के पात्र हैं।
       🚩परंपरा के अनुसार इस वर्ष भी कार्यक्रम के दौरान जल सेवादारों तथा जन सेवादारों का सम्मान किया गया।   
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🔸फोटो सौजन्य : श्रीराम सेवा समिति सागर, भाई विनोद तिवारी।
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Saturday, July 13, 2024

टॉपिक एक्सपर्ट | पत्रिका | एक दार में नईं सोचत के का करने है | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पत्रिका | टॉपिक एक्सपर्ट | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली में
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एक दार में नईं सोचत के का करने है?
    - डॉ (सुश्री) शरद सिंह       
         अबे लौं अपन ओरें सबईं जने जेई मानत रए के सगरी दुनिया में एक ठंइयां सवाल ऐसो आए जीको सई-सई उत्तर आज लौं कोऊ ने दे सको। कौन सो सवाल? अरे बोई सवाल के पैले मुर्गी भई, के पैले अंडा भओ? मनो अब पतो परो के ईसे बी बड़ो वारो सवाल पाओ जात आए ई दुनिया में। वा बी अपनई सागर शहर में। हो सकत के जे सवाल दूहरे शहरन में थोड़ो-भौत सोई चलत होय, मनो अपने इते तो सबई कऊं ईको डंका बजत आए। चाए कोनऊं रोड पे निकर जाओ, चाए कोनऊं मोहल्ला में घूम आओ, जेई सवाल ठक्काठाई बजत रैत आए। आप ओरें सोच रए हुइयो के ऐसो कोन सो सवाल गए? सो, चलो आपई ओरें बताओ ईको उत्तर के पैले रोड बनी के पैले पाईप डरी?
     हमें पतो, के ईको सई-सई उत्तर कोनऊं के पास नईयां। काय से के ने आपने औ ने हमने चार दिनां से ज्यादा कभऊं साबुत मने वन पीस रोड देखी। एक तो रोडन पे गड्ढा-मड्ढा रैतई आएं, ऊपे से रोड कऊं सुधार बी दई तो चिर दिनां में फेर के खोद-खाद के खड़ी कर दई जात आए। एक तो ऊंसई बरसात को मौसम, ऊपे खुदी डरी रोडें। कऊं-कऊं तो ऐसो चिकनो गिलावो रोड पे फैलो रैत आए मनो रोड नोंई घिसलपट्टी होय। हमाए कहे को भरोसो ने होय तो तनक मकरोनिया घूम लेओ। ने तो पीलीकोठी, प्राईवेट बसस्टेंड, ने तो डफरिन वारी रोड तो देखई लेओ। जे रोड बनाबे वारे और पाईप डारबे वारे कभऊं आपस में मिल बैठ के काय नईं तै करत आएं के चलो दोई काम संगे निपटा लए जाएं। ईसें खर्चा बचहे औ परेसानी बचहे। जे ओरें एक दार में नईं सोचत के का करने है? रामधई ! रोडन की जिनगी मिटा डारी आए इन ओरन ने।
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Friday, July 12, 2024

शून्यकाल | प्रेम का सबसे अद्भुत रूप है “सखी भाव” | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | नयादौर

दैनिक नयादौर में मेरा कॉलम -                     शून्यकाल
 प्रेम का सबसे अद्भुत रूप है “सखीभाव”
   - डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                                                                       
       गूंगे के गुड़ के समान होता है प्रेम। जिसका स्वाद तो लिया जा सकता है किंतु उसके आनंद का बखान नहीं किया सकता। यह एक ऐसी अनुभूति है जो दूसरे के प्रति संवेदना जगाती है। दूसरे के प्रति समर्पण जगाती है। भारतीय परम्परा में यह सदा माना गया है कि प्रेम के द्वारा ईश्वर को भी पाया जा सकता है। संतों, मनीषियों और विद्वानों ने प्रेम के विविध मार्ग बताए हैं। श्रीकृष्ण तो प्रेम के प्रतीक रहे हैं जिन्होंने रास के द्वारा सात्विक प्रेम का मानसिक मार्ग प्रशस्त किया। कृष्ण भक्ति मार्ग में ‘सखी भाव’ प्रेम का सबसे अद्भुत स्वरूप है।
‘‘जिन भेषा मोरे ठाकुर रीझे सो ही भेष धरूंगी।’’ 
-यही भाव होते हैं अपने प्रिय को मनाने के, जब प्रिय और कोई नहीं, स्वयं श्रीकृष्ण अर्थात ईश्वर हो। कई सम्प्रदायों में ईश्वर को परमात्मा अर्थात पुरुष और मनुष्य को आत्मा अर्थात स्त्री माना जाता है। ऐसे सम्प्रदाय के संत एवं भक्त जब भक्ति की पराकाष्ठा में पहुंच जाते हैं तो वे स्त्री का वेश धारण कर लेते हैं तथा स्त्रियों की भांति जीवन जीते हुए अपने प्रिय ईश्वर को मनाने, रिझाने का यत्न करते हैं। यह ‘सखी भाव’ कहलाता है अर्थात स्वयं को गोपी अथवा कृष्ण की सखी मान कर कृष्ण को अपना प्रियतम मानना। 
सखी भाव प्रेम का सबसे अद्भुत स्वरूप है। एक समूचा सम्प्रदाय ही सखी भाव को समर्पित है, जिसका नाम है सखी सम्प्रदाय। यह निम्बार्क मत की शाखा है। वस्तुतः वैष्णवों के प्रमुख चार सम्प्रदाय है जिनमे सबसे प्राचीन सम्प्रदाय है द्वैताद्वैत सम्प्रदाय हैं इस सम्प्रदाय के बारे में मान्यता है कि इसे भगवान विष्णु के 24 अवतारो मे से एक भगवान हंस ने प्रारंभ किया। इसी सम्प्रदाय के चतुर्थ आचार्य निम्बार्क ने इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए इस सम्प्रदाय को एक अलग पहचान दी। जिससे इस सम्प्रदाय को उन्हीं के नाम से अर्थात  ‘‘निम्बार्क सम्प्रदाय’’ के नाम जाना गया। इस सम्प्रदाय में गृहस्थ और विरक्त दोनों प्रकार के अनुयायी होते हैं। गुरुगद्दी के संचालक भी दोनों ही वर्गों में पाये जाते हैं, जो शिष्यों को मंत्रोपदेश करते हुए कृष्ण की भक्ति का प्रचार करते रहते है। दार्शनिक दृष्टि से यह भेदाभेदवादी है। भेदाभेद और द्वैताद्वैत मत प्रायः एक ही हैं। इस मत के अनुसार द्वैत भी सत्य है और अद्वैत भी। 

निम्बार्क मत के अनुयायी संत स्वामी हरिदास ने सखी सम्प्रदाय का प्रर्वतन किया। स्वामी हरिदास संत के साथ ही उच्चकोटि के संगीताचार्य भी थे। स्वामी हरिदास के जन्म स्थान, जन्मतिथि और जाति के संबेध में निंबार्क मतावलंबियों तथा विष्णु स्वामी संप्रदाय वालों में परस्पर विरोध रहा है। बहरहाल, स्वामी हरिदास का जन्म चाहे जहां हुआ हो अथवा वे किसी भी जाति के रहे हों किन्तु उनकी ख्याति उनके सखी भाव के कारण हुई। वह सखी भाव जो मनुष्य को ईश्वर अर्थात श्रीकृष्ण की सखी मानता है और श्रीकृष्ण की सखी होने के लिए जाति, धर्म को कोई बंधन नहीं होता है। 

उपलब्ध विवरण के अनुसार पच्चीस वर्ष की अवस्था में हरिदास वृन्दावन पहुंचे थे। वहां उन्होंने निधिवन को अपनी तपोस्थली बनाया था। स्वामी हरिदास ने प्रिया-प्रियतम की युगल छवि श्री बांकेबिहारीजी महाराज के रूप में प्रतिष्ठित किया। स्वामी हरिदास ने श्रीकृष्ण की भक्ति में भजन गाते हुए अनेक राग-रागिनियों की सृजन किया। बैजूबावरा और तानसेन जैसे विश्व-विख्यात संगीतज्ञ स्वामी हरिदास के शिष्य थे। कहा जाता है कि मुगल सम्राट अकबर उनका संगीत सुनने के लिए रूप बदलकर वृन्दावन पहुंचा था।
सखी संप्रदाय का मूल आधार इस एक पंक्ति में अभिव्यक्त है कि -‘‘जिन भेषा मोरे ठाकुर रीझे सो ही भेष धरूंगी।’’ इसी भावना के आधार पर श्रीकृष्ण को प्रिय और भक्त को सखी माना जाता है। सखी संप्रदाय के साधु नख से लेकर शिख तक स्वयं को सजाते हैं। वे स्वयं को स्त्री के रूप में कल्पना करते हैं। यहां तक कि  वे रजस्वला के प्रतीक के रूप में स्वयं को तीन दिवस तक अशुद्ध मानते हैं। यह ईश्वर के प्रति प्रेम का अद्भुत स्वरूप है।

 सखी सम्प्रदाय के भावों को स्वामी हरिदास के कुछ पदों से भली-भांति समझा जा सकता है। स्वामी हरिदास का एक पद है -
ज्योंहि ज्योंहि तुम राखत हौ,
त्योंही त्योंही रहियतु हैं, हो हरि।
और अचरगै पाइ धरौं,
सु तौ कहौं कौन के पैंड भरि।।
जदपि हौं अपनो भायो कियो चाहौ,
कैसे करि सकौं, सो तुम राखो पकरि।
कहि ‘हरिदास’ पिंजरा के जानवर लौं,
तरफराइ रह्यौ उड़िबे कों कितोउ करि।।

स्वामी हरिदास ने स्वयं को श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित कर दिया था। वे मानते थे कि जगत की प्रीत मिथ्या है, झूठी है। यदि सच्चा प्रेम कोई है तो वह है सिर्फ बिहारीजी का प्रेम।  
जगत प्रीति करि देखी नाहिनें गटी कौ कोऊ। 
छत्रपति रंक लौं देखे प्रकृति बिरोध बन्यों नहिं कोऊ।।
दिन जो गये बहुत जनमनि के ऐसें जाउ जिनि कोऊ।
कहें श्रीहरिदास मीत भले पाये बिहारी ऐसौ पावौ सब कोऊ।।

प्रेम की पराकाष्ठा एक निजी विचार हो सकते हैं, निजी भावनाएं हो सकती हैं किन्तु विशुद्ध प्रेम का मार्ग जीने की सही राह दिखाता है। आज सांसारिकता अपने चमोत्कर्ष पर है जिसे हम बाजारवाद कह कर पुकारते हैं। धन, पद, शक्ति आदि के पीछे भागना मानवीय प्रवृति रही है। किन्तु उसी मानव के भीतर एक प्रवृति प्रेम की भी रही है जिसे आधुनिक जीवन शैली ने गौण बना दिया है। प्रेम आज स्वार्थ के रथ पर सवार हो कर चलता है। यदि माता-पिता आर्थिक रूप से सक्षम हैं और अपनी संतान की हर इच्छा को पूरी करते हैं तो वहां प्रेम की फसल लहलहाती हुई दिखती है। यदि संतान माता-पिता के सपनों के अनुरूप मल्टीनेशनल कंपनी के उच्च पद पर काम करता है तो माता-पिता उस पर वारे जाते हैं। यदि पति और पत्नी आर्थिक रूप से सक्षम हैं और एक दूसरे के लिए मंहगे उपहार, वेकेशन डेस्टिनेशन गिफ्ट खरीद कर देते हैं तो वहां भी प्रेम की चहक सुनाई देती है। यदि प्रेमी-प्रेमी भेट-उपहार द्वारा परस्पर एक-दूसरे की आर्थिक ख्वाहिशें पूरी करते हैं तो वहां भी प्रेम पल्वित हो कर फलता-्फूलता दिखाई देता है। क्या सच्चा प्रेम आर्थिक सम्पन्नता पर ही निर्भर होता है? यदि ऐसा है तो झुग्गी-झोपड़ी में तो प्रेम की छाया भी नहीं पड़ती होगी।
यदि प्रेम का आधार आर्थिक सम्पन्नता ही है तो उस ईश्वर के प्रति प्रेम कैसे हो सकता है जो न तो दिखाई देता है, न तो किसी कार्पोरेट का मालिक है और न तो वह भेंट-उपहार देता है? ऐसा ईश्वर भला प्रेमपात्र कैसे हो सकता है? ऐसे ईश्वर के प्रति सखी भाव कैसे उपज सकता है? शायद इसीलिए स्वामी हरिदास ने कहा है कि -
देखौ इनि लोगन की लावनि ।
बूझत नांहिं हरि चरनकमल कौं मिथ्या जन्म गंवावनि।।

वस्तुतः सच्चा प्रेम सच्चा समर्पण मांगता है। यदि आप किसी से सच्चा प्रेम करते हैं तो आप उसके लिए अपना सब कुछ त्यागने के लिए सहर्ष तैयार हो जाएंगे। लेकिन यदि प्रेम में खोट है तो उसमें समर्पण की भावना नहीं अपितु नफा-नुकसान की भावना प्रभावी रहेगी। एक बार स्वामी हरिदास से उनके एक शिष्य ने पूछा कि ‘‘स्वामी, जब सोने के आभूषण बनाए जाते हैं तो उसमें अन्य धातु मिलाई जाति है जिसे खोट कहते हैं फिर भी लोग उस आभूषण को पाने के लिए लालायित रहते हैं किन्तु आप कहते हैं कि जहां शुद्धता है वहीं सच्चा प्रेम और सच्ची समृ़िद्ध है। यह बात मुझे समझ में नहीं आई है।’’
शिष्य का प्रश्न सुन कर स्वामी हरिदास मुस्कुराए और उन्होंने शिष्य को समझाया कि ‘‘जो खोट वाली वस्तुओं के पीछे पागल रहते हैं, इस दुनिया को छोड़ते समय उनके मन में शांति नहीं रहती है। वे इस बोझ के साथ प्राण त्यागते हैं कि उनका कमाया हुआ सब कुछ यहीं छूट रहा है। जबकि जो जीवन भर ईश्वर के प्रेम में लिप्त रहता है, उसे अपने अंतिम समय में यह उत्साह रहता है कि अब वह अपने प्रिय से मिल सकेगा और सदा उसके साथ रह सकेगा। क्योंकि परमात्मा ही तो प्रिय है और आत्मा उसकी प्रियतमा। हम सब परमात्मा की प्रियतमाएं हैं, यह हमें नहीं भूलना चाहिए।’’

स्वामी हरिदास का उत्तर सुन कर उनके शिष्य की शंका दूर हो गई और उसका चित्त शांत हो गया। सखी भाव यही तो सिखाता है कि प्रेम में शुद्धता बनाए रखना ही सच्चा प्रेम है। जहां वासना या स्वार्थ का बोलबाला हो, वहां प्रेम नहीं होता है। ‘‘प्रेम’’ शब्द जितना आसान है उसका स्वरूप उतना ही गूढ़ है। सखी भाव इसी गूढ़ता को समझाता करता है कि प्रेम एक निःस्वार्थ एवं समर्पण की भावना होती है जो धन-संपत्ति नहीं वरन शुद्ध भावना का सच्चा सौदा स्वरूप है।
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Thursday, July 11, 2024

ट्रेवलर डॉ (सुश्री) शरद सिंह | घुमक्कड़ी NH-26 में

10.07.2024, यानी कल झांसी जाते समय रास्ते में एक बहुत मजेदार घटना हुई। 😄🚦😄😜😮
   नेशनल हाईवे 26 सागर से झांसी के बीच बहुत तेजी से व्यावसायिक रूप से विकसित हो रहा है। रास्ते में अनेक होटल खुल गए हैं जिनमें कुछ लॉज भी है़ं। इसके बावजूद सड़क के दोनों और खूबसूरत खेत और हरियाली मौजूद है। 
   हुआ ये कि रास्ते में एक होटलनुमा ढाबे में रुक कर चाय पीने का मन हुआ। होटल में पहुंचकर लगा कि हल्का सा नाश्ता भी कर लिया जाए। तो फिंगर चिप्स यानी फ्रेंच फ्राइज का आर्डर दिया। ☕🍛🍵  
     कुछ देर में  बैरे ने लाकर फिंगर चिप्स की प्लेट रख दी किंतु उसने साथ में टूथपिक या कांटे नहीं दिए थे।  वह बैरा 21-22 साल का युवक था। देहाती किंतु स्टाईलिश। मैंने उसे बैरे को बुलाया और  कहा- "तुमने कांटे तो दिए नहीं, कांटे ले आओ!"
   उसे युवा बैरे ने बड़ी स्टाईल से मुझसे पूछा- " कांटे यानी फोर्क?"
   😮😛😜उसकी बात सुनकर मैं चकित रह गई और मैंने उसकी बात को दोहराया "हां! कांटे यानी फोर्क!"
    इसके बाद मेरे सहित हम सभी की हंसी फूट पड़ी।😄😄😄
    मैंने तो इसलिए कांटा कहा था कि शायद वह लड़का फोर्क नहीं समझेगा, लेकिन उस लड़के ने यह समझा कि शायद मुझे फोर्क नहीं मालूम है,  इसलिए मैं कांटा कह रही हूं। 😜
    बाकी रास्ते में भी इस मजेदार घटना को याद करके हंसी आती रही। 😜😄😛
    जी हां, NH-26, फोरलेन नेशनल हाईवे, सागर टू झांसी... पहाड़ी चट्टानों को काटकर बनाया गया खूबसूरत रास्ता... फिलहाल कहीं-कहीं गड्ढे हो गए हैं... फिर भी शहर के भीतर से तो बेहतर ही है... खुली हवा, शुद्ध वायु और मनोरम वातावरण... कभी कड़क धूप तो कभी बारिश की संभावना दिखाती छाया... सब कुछ बहुत खूबसूरत .... बहुत एनर्जेटिक 🎉⚡🌳
मेरी घुम्मकड़ी जिंदाबाद 😊🚩
🚙🌳🚙
    Traveller Dr. (Ms.) Sharad Singh says -  Traveling is always a fun experience.
     ट्रेवलर डॉ (सुश्री) शरद सिंह - "यात्राएं हमेशा मजेदार अनुभव देती हैं |"
🥰👩‍🎨 🎉🎈🌿🌹🎈❤️🎉

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बतकाव बिन्ना की | ऐसे हते अपने महाराज छत्रसाल जू | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | बुंदेली कॉलम

बुंदेली कॉलम | बतकाव बिन्ना की | डॉ (सुश्री) शरद सिंह | प्रवीण प्रभात
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बतकाव बिन्ना की
ऐसे हते अपने महाराज छत्रसाल जू!
 - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
       भैयाजी औ भौजी हफ्ता भरे के लाने बाहरे गए रए। लौट के बे ओंरे मोरे इते आए। ओरछा, छतरपुर, पन्ना, दमोए होत भए लौटे। पन्ना से बे मोरे लाने जुगल किशोर जू को प्रसाद लाए हते। मोरो तो जन्मई पन्ना में भओ रओ, सो मैंने तो बचपनई से उते के सबई मंदिर देखे रए। बा गीत सबई ने कभऊं ने कभऊं जरूर सुनो हुइए के -‘‘पन्ना के जुगल किशोर, मुरलिया में हीरा जड़े।’’
औ मुरलिया में का, उनकी तो ठुड़ी में सोई हीरा जड़े दिखात आएं। बाकी बा तो मंदिरन की नगरी ठैरी। उते बलदाऊ जू को मंदिर, राम-जानकी को मंदिर, जगन्नाथ स्वामी जू को मंदिर, हरदौल जू को मंदिर, औ महामती प्राणनाथ जू को मंदिर आएं। औ बे सबई इत्ते बड़े-बड़े आएं के उने देख के जी जुड़ा जात आएं। जबे भौजी ने मोए जुगल किशोर जू को परसाद दओ तो मोरी अंखियां से आंसू चू आए। बा सबरे मंदिर औ उते की गलियां याद आ गई रईं। 
उते पन्ना में एक पार्क सोई आए - छत्रसाल पार्क। बचपने में हम ओरें उते खूब खेलत रए। उते महाराज छत्रसाल की एक स्टेचू सोई लगी, जोन के पैडस्टल माने चैंतरा पे महाराज के किला औ वंशवृक्ष बनाओ गओ आए। ऊ टेम पे इत्तो नोनो पार्क औ कऊं ने रओ। मोय बा सोई याद आ गओ। 
‘‘आप ओरन की यात्रा कैसी रई?’’ मैंने भैयाजी से पूछी।
‘‘भौतई नोंनी।’’ भैयाजी चहकत भए बोले।
‘‘तुम सोई संगे चलतीं तो खूबई अच्छो रैतो।’’ भौजी ने कई।
‘‘जी तो मोरो बी रओ हतो, पर इते कछू जरूरी सो काम पर गओ रओ।’’ मैंने भौजी से कई। बाकी असल में मैंने ई कारण से मना करी हती के उन ओरन खों अपनी रिस्तेदारी में सोई जाने रओ। अब मैं उन ओरन के संगे कां जाती।
‘‘बिन्ना ई दारे धुबेला सोई हो आए। पिछली बेर ने जा पाए हते।’’ भौजी ने बताई। 
‘‘अच्छो लगो ने उते?’’ मैंने पूछी।
‘‘हऔ, भौतई अच्छो लगो। उते महाराज छत्रसाल को अंगरखा देखो, इत्तो बड़ो के का कओ जाए। बा देख के पतो परत आए के उन ओरन की ऊंचाई कित्ती ज्यादा हती।’’ भौजी बोलीं। 
‘‘हऔ, तो उनकी बंदूकें देखो! अब के ज्वान लौं उने पांच मिनट ने उठा पाहें, चलाबो तो दूर रओ।’’ भैयाजी बोले।
‘‘महाराज छत्रसाल जू की बातई अलग रई। बे ने होते तो अपनों बुंदेलखंड आज ने जाने कोन सी दसा में होतो। चलो, मैं आप ओरन खों उनको एक मजेदार किसां सुना रई। जोन से पतो परत आए के जोन समै औ राजा-महाराजा हरें नाच-रंग में डूबे रैत्ते, ऊ टेम पे अपने महाराज छत्रसाल कित्ते अच्छे औ पक्के चरित्र के रए।’’ मैंने भौजी और भैयाजी से कई।
‘‘कैसी किसां?’’ भौजी ने दिलचस्पी दिखात भई पूछी।
‘‘भओ का के एक दफा उनके दरबार में एक लुगाई पौंची। बा बड़ी रूपवती हती। महाराज छत्रसाल ने उसे आबेे को कारण पूछो।
‘‘आप अपनी पीरा बताओ! हम से जो कछू बी हो पाहे आपकी पीड़ा दूर करबे के लाने हम करबी।’’ महाराज छत्रसाल ने बा लुगाई से कई। 
‘‘महाराज! आपसे हाथ जोड़ के बिनती आए के आप हमाई बस एक इच्छा पूरी कर देओ।’’ बा लुगाई अपने दोई हाथ जोड़त भई बोली।
‘‘बताओ आपकी का इच्छा आए? सोना-चांदी के सिक्का चाउने, के जमीनें चाउने? जो कछू चाउने होय सो बिना डरे बोलो आप।’’ महाराज छत्रसाल ने पूछी।
‘‘महाराज, मोए ने तो सोना-चांदी चाउने औ ने जमीनें चाउने। बाकी मोय जो कछू चाउने बा आप ई दे सकत आओ।’’ बा लुगाई बोली।
‘‘आप बोलो तो, हमने कई न के आपकी इच्छा हम जरूर पूरी करहें।’’ महाराज छत्रसाल ने कई। जा सुन के बा लुगाई भौत खुस भई। 
‘‘महाराज! हमें आप भौतई अच्छे लगत आओ, सो हम चात आएं के हमाओ आप जैसो मोड़ा होय।’’ बा लुगाई भरे दरबार में बोली। ऊको लगो के सबई के आंगू महाराज ने उसकी इच्छा पूरी करबे को वादा करो आए, सो उने अपनो वादा पूरो करने पड़हें। औ वादा पूरो करने को जा मतलब रओ के महाराज बा लुगाई से ब्याओ करें औ ऊको एक मोड़ा पैदा करन देवें।
महाराज छत्रसाल सोई बा लुगाई की सयानपाना ताड़ गए। सो बे तुरतईं अपने सिंहासन से उठे औ ऊ लुगाई के आगूं ठाड़े हो गए। औ अपने दोई हाथ जोड़ के बोले,‘‘बस इत्ती-सी बात? आप हमाए जैसो बेटा पाबे के चक्कर में काए पड़ रईं? ईसे अच्छो तो जो आए के आप हमें अपनो बेटा मान लेओ। हमई तुमाए बेटा आएं। माता जू आप हमें अीशीर्वाद देओ! ’’कैत भए महाराज छत्रसाल ने बा लुगाई के पांव छू लए। पूरो दरबार महाराज के जैकारे करन लगो।
बा लुगाई भौतई शरमिन्दा भई। बा समझ गई के महाराज छत्रसाल औ राजा-महाराजा घांई नोंईं। जे चरित्र के पक्के आएं। ऊने महाराज से माफी मांगी।
‘‘आपको हमने अपनी मताई कओ आए, सो आप हमसे माफी मांग के हमें नरक में ने ढकेलो।’’ महाराज छत्रसाल ने बा लुगाई से कई। फेर अपने मंत्री हरों के बोल के ऊको भेंट-उपहार दए।
‘‘सो जे हती महाराज छत्रसाल की किसां। कोनऊं औ राजा होतो तो इत्ती सुंदरी को अपनी मताई ने बनातो, बल्कि ऊके संगे मजा करतो औ कछू पईसा-कौड़ी दे के उते से भगा देतो। मनो महाराज छत्रसाल ने बा लुगाई खों पूरी इज्जत दई। ऐसे हते अपने महाराज छत्रसाल जू।’’ मैंने किसां पूरी करत भई कई।
‘‘हओ बिन्ना! तभई तो उनके राज में परजा बड़े सुख से रई औ लुगाइन खों बड़ो मान करो जात रओ।’’ भौजी बोलीं।
‘‘हऔ, हमने उनको महल देखो। उनको मुकरबां देखो। औ जा सोच के अच्छो लगत रओ के बे अपन ओरन के पुरखा रए।’’ भैयाजी बोले।
‘‘औ का भैयाजी! महाराज छत्रसाल की तो ऐसी-ऐसी किसां आएं के का कओ जाए। आप ओरन खों पतोई हुइए के जबें महाकवि भूषण इते बुंदेलखंड पधारे तो उनके आबे की खबर पा के महाराज छत्रसाल खुदई दौड़ के गए औ उनकी पालकी खों अपनो कंधा दओ। तभईं तो महाकवि भूषण बोल परे हते के - 
और कोनऊं राजा, ने मन में ल्याऊं अब।
शिवा खों सराहों के सराहों छत्रसाल को।। 
         मने महाकवि भूषण ने महाराज छत्रसाल को शिवाजी महाराज के बरोबर पाओ रओ।’’ मैंने भैया जी से कई। 
‘‘सई कई बिन्ना! महाराज छत्रसाल घांई औ कोनऊं ने भओ।’’ भौजी बोलीं।
सो, आप सब ओरें सोई महाराज छत्रसाल को याद राखो करे। बाकी बतकाव हती सो बढ़ा गई, हंड़ियां हती सो चढ़ा गई। अब अगले हफ्ता करबी बतकाव, तब लों जुगाली करो जेई की। 
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Wednesday, July 10, 2024

चर्चा प्लस | नहीं की जा सकती है संशय के साथ सफलता की उम्मीद | डाॅ (सुश्री) शरद सिंह | सागर दिनकर

चर्चा प्लस  
नहीं की जा सकती है संशय के साथ सफलता की उम्मीद  
- डाॅ (सुश्री) शरद सिंह                                              चाहे छात्र जीवन हो या राजनीति का महासमर, चाहे पारिवारिक जिम्मेदारियां हों अथवा संबंधों का निर्वाह हर व्यक्ति सफलता चाहता है। क्या जीवन में सफल होना आसान है? नहीं! समूचा जीवन विभिन्न प्रकार की परीक्षाओं से घिरा रहता है। जो व्यक्ति इन परीक्षाओं में उत्तीर्ण होता चलता है, वही सफलता का स्वाद चख पाता है। सो, इन परीक्षाओं को उत्तीर्ण करने का एक साॅलिड रास्ता है जिस पर चल कर सफलता के दरवाज़े पर दस्तक दी जा सकती है। चलिए देखें, कौन सा है वह रास्ता?      
एक काॅलेज छात्रा जब अविवाहित मां बनी तो उस पर अपने बेटे को पालने के लिए कोई मजबूत सहारा नहीं था। उसे कुछ लोगों ने सलाह दी कि यदि वह अपने बेटे को किसी निःसंतान दंपति को सौंप दे तो उसके बेटे का जीवन संवर जाएगा। उस अविवाहित मां ने जी कड़ा कर के इस निर्णय को स्वीकार कर लिया लेकिन जब उसे पता चला कि जो दंपति उसके बेटे को गोद ले रहे हैं, वे ग्रेजुएट नहीं हैं तो उसने उन्हें अपना बेटा सौंपने से मना कर दिया। मां चाहती थी कि उसके बेटे को पालने वाले माता-पिता कम से कम ग्रेजुएट तो हों ताकि उसके बेटे को आगे चल कर उच्चशिक्षा दिला सकें। जब उस दंपति ने विश्वास दिलाया कि वे उसके बेटे को अपने बेटे की तरह पालेंगे और उसे काॅलेज की शिक्षा दिलाएंगे, तब कहीं जा कर वह अविवाहित मां अपने बेटे को उस निःसंतान दंपति को सौंपने को राजी हुई। उस दंपति ने अपना वादा निभाया और जब वह बालक 17 वर्ष का युवा हो गया तथा अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर चुका तो उसे कौलेज में दाखिला दिला दिया। उस बालक के माता-पिता अपना वादा पूरा करते हुए अपने गोद लिए बेटे की पढ़ाई में अपना पूरा पैसा खर्च कर रहे थे। यह बात उस युवक को अच्छी नहीं लगी। उसे लगा कि वह अपने माता-पिता पर और बोझ नहीं डाल सकता है। तब उसने काॅलेज से ड्राॅप लिया और अपने एक दोस्त के साथ रहते हुए छोटे-मोटे काम करने लगा। वह खाने का जुगाड़ करने के लिए कोक की बॉटल्स बेचता था। जहां वह रहता था वहां से लगभग सात मील दूर एक कृष्ण मंदिर था जहां लंगर का आयोजन किया जाता था। वह युवक भी खाने में खर्च होने वाला पैसा बचाने के लिए सात मील दूर भोजन करने जाता था। उसी दौरान उसे लगा कि उसे कैलीग्राफी की पढ़ाई करना चाहिए। पोस्टर्स आदि में कैलीग्राफी लिखावट की बहुत मांग रही है, उससे अच्छे पैसे मिलेंगे। फिर उसने मुद्रण में आने वाले शेरीफ और सैन शेरीफ टाइपफेस सीखे। फिर उसने उस टाइपफेस से अलग-अलग शब्दों को जोड़कर टाइपोग्राफी तैयार की।

इसके बाद उस युवक ने अपने मित्र के साथ मिलकर एक गैरेज में एप्पल कंपनी की शुरुआत की। जी हां यह पूरा घटनाक्रम है उस युवक के जीवन का जिसे आज दुनिया स्टीव जॉब्स के नाम से पहचानती है। स्टीव जॉब्स ने जब एप्पल की शुरुआत की तो उनकी उम्र मात्र 20 साल थी। अपने दोस्त वॉजनिएक के साथ स्टीव जॉब्स ने  खूब मेहनत की और 10 वर्ष में ही ‘एप्पल’ को एक पहचान दिला दिया। एक गैरेज में दो लोगों से शुरू हुई कंपनी में 4000 कर्मचारियों को रोजगार मिला। इसके साथ ही उन दोनों मित्रों ने मैकिन्टोश कंप्यूटर को दुनिया के सामने लाया। लेकिन जीवन में अभी बहुत से उतार-चढाव आने बाकी थे। स्टीव जाब्स जब 30 साल के थे, तो उन्हें उन्हीं की कंपनी से निकाल दिया गया। यह एक विचित्र और असंभावित-सी घटना थी, लेकिन यही सच था।

स्टीव जॉब्स ने इसे भी एक सबक की तरह लिया और इसके बाद पांच वर्ष के संघर्ष के बाद एक नई कंपनी ‘‘नेक्स्ट’’ के नाम से स्थापित की। और इसके बाद एक और कंपनी ‘‘पिक्स्चर’’ के नाम से बनाई जिसने एनिमेशन की दुनिया में तहलका मचा दिया। इसके बाद घटनाक्रम ने एक बार फिर यू टर्न लिया और एप्पल ने नेक्स्ट कंपनी को खरीद लिया जिससे स्टीव जॉब्स एक बार फिर एप्पल में जा पहुंचे। स्टीव जॉब्स मानते थे कि यदि उन्हें अपनी ही एप्पल कंपनी से नहीं निकाला जाता तो वे ‘‘नेक्स्ट’’ और ‘‘पिक्स्चर’’ को नहीं बना पाते। फिर बिना झिझक एप्पल में लौटने का उनका निर्णय सही रहा। इससे वे एप्पल के एक बार फिर सर्वेसर्वा बन कर उसे सर्वाच्च शिखर पर पहुंचा सके।

यह सच्ची कहानी है स्टीव जॉब्स के जीवन की। जो बताती है कि यदि व्यक्ति अपनी क्षमता पर भरोसा रखे वह अपने जीवन की सही दिशा पा सकता है। सही दिशा पाने के लिए कई बार जोखिम भी उठाने पड़ते हैं जैसे स्टीव जाॅब्स ने काॅलेज की पढ़ाई छोड़ कर कैलीग्राफी का रास्ता अपनाया। उन्होंनेे एक कठिन संघर्ष के मार्ग को चुना। वह चांदी का चम्मच मुंह में ले कर पैदा नहीं हुए थे, लेकिन उन्होंने अपने संघर्ष से वह सफलता पाई जिसने सारी दुनिया की जीवनशैली को नया मोड़ दे दिया। यह सब इसलिए संभव हुआ कि उन्होंने अपनी क्षमता के प्रति, अपने संघर्ष के प्रति कभी अपने मन में किसी भी प्रकार का संशय नहीं रखा। यानी जीवन में सफलता पाने की सबसे पहली शर्त है, स्वयं के प्रयासों पर संशय यानी संदेह की काली छाया नहीं पड़ने देना। जब व्यक्ति को अपने आप पर भरोसा रहता है तो वह सब कुछ सफलतापूर्वक कर सकता है। जीवन में रास्ता बदल कर भी तभी देखा जा सकता है जब खुद पर यकीन हो।

बचपन में मैंने एक संस्कृत की कथा पढ़ी थी जो मुझे आज तक याद है। एक गांव में एक पिता और पुत्र रहते थे। एक बार गांव में महामारी फैली। लोग गांव छोड़ कर भागने लगे। पिता-पुत्र ने भी गांव छोड़ने का निर्णय लिया और दूसरे स्थान की ओर चल पड़े। रास्ते में एक गहरी नदी पड़ी। उस नदी को पार किए बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता था। नदी पर कोई पुल नहीं था और वहां कोई नाव भी नहीं थी। तब पिता ने पुत्र की मदद से एक लंबे वृक्ष को काटा और उसे नदी के उस स्थान पर आर-पार डाल दिया, जहां नदी थोड़ी संकरी थी। इस तरह पेड़़ से पुल बन गया। लेकिन गोल-गोल एक खतरनाक पुल। पुत्र ने उस पुल से हो कर नदी पार करने से मना कर दिया क्योंकि उसे गिर कर डूब जाने का डर था। तब पिता ने कहा कि मैं पहले उस पार जाता हूं। यदि मैं सुरक्षित उस पार पहुंच गया तो तुम भी इस पुल को सुरक्षित जान कर नदी पार कर लेना। पुत्र मान गया। पिता ने हिम्मत जुटाई और निर्भय हो कर सुरक्षित नदी के उस पार जा पहुंचा। तब उसने पुत्र को नदी पार करने को कहा। पुत्र अब भी नदी पार करने को ले कर संशयग्रस्त था। उसका साहस नहीं हो पा रहा था कि वह पेड़ के उस पुल पर पांव भी रखे। किन्तु अब पिता उस पार पहुंच चुका था और वह अकेला छूट गया था। पिता समझ गया कि उसका पुत्र डर रहा है। तो उसने अपने पुत्र को दो सलाह दी कि ‘‘नीचे मत देखना’’ और ‘‘पीछे मत देखना’’, बस आगे मेरी ओर देखते हुए बढ़ते जाना। पुत्र ने पिता की सलाह पर अमल किया और वह भी सुरक्षित नदी पार कर गया। दरअसल कई बार यही होता है कि हम अज्ञात भय को अपने ऊपर हावी होने देते हैं और वहीं से असफलता की शुरुआत होती है। दूसरी बात यह कि कई बार हम अपनी पिछली असफलताओं को बार-बार याद कर के आत्मविश्वास खोते रहते हैं जिससे सफलता तो दूर, उसकी झलक भी नहीं मिल पाती है।

जीवन में सफलता पाने के लिए सबसे पहली शर्त है आत्मविश्वास और दूसरी शर्त है अपने शुभचिंतकों पर विश्वास। स्टीव जॉब्स ने आत्मविश्वास बनाए रखा। वहीं संस्कृत कहानी के युवक ने अपने पिता की सलाह पर विश्वास करके आत्मविश्वास पाया। जबकि आजकल ऐसी घटनाएं बहुतायत घट रही हैं जिसमें परीक्षा में आशानुकूल परसेंटेज न मिलने पर अथवा मनचाही नौकरी न मिलने पर युवा आत्महत्या जैसा कदम उठा रहे हैं। वहीं, आत्मविश्वास खोना तो आम-सी बात होती जा रही है। डिप्रेशन युवाओं में एक आम बीमारी बन गई है। जबकि समझने की जरूरत यह है कि यदि आपके मुंह पर एक दरवाजा बंद हो रहा है तो समझ जाइए कि वह दरवाजा आपके प्रवेश करने के लिए नहीं है। दूसरा दरवाजा देखिए, तीसरा देखिए, चौथा देखिए। एक न एक दरवाजा ऐसा जरूर मिलेगा जो आपको प्रवेश करने देगा और जीवन में सफलता के शिखर तक पहुंचा देगा। सिर्फ जरूरत है तो अपनी क्षमताओं पर विश्वास करने की, अपनी सही योग्यता को पहचानने की, क्योंकि संशय के साथ सफलता की उम्मीद नहीं की जा सकती है। संशय और सफलता परस्पर दो विपरीत ध्रुव हैं। यानी सफलता आत्मविश्वास से मिलती है, संशय से नहीं।        
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